सत्य का अनुसरण कैसे करें (12) भाग तीन

II. दूसरी विशेषता : सुन्नता

पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की एक और अभिव्यक्ति यह है कि वे बहुत सारे लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करते समय विशेष रूप से सुन्न होते हैं। वे न सिर्फ मामलों को जिद्दी और विरूपित तरीके से देखते हैं, बल्कि वे यह भी बिल्कुल समझ नहीं सकते कि जो भी चीज उत्पन्न होती है उसकी प्रकृति, सार या मूल कारण क्या है, वह क्या प्रभाव ला सकती है या उसके कारण क्या नतीजे हो सकते हैं। वे अभी भी इन चीजों को समझ नहीं सकते और इनके प्रति अनजान बने रहते हैं, यहाँ तक कि तब भी जब कुछ लोगों ने पहले ही कुछ चीजें कह दी हों या कर दी हों या कुछ चिन्ह और संकेत प्रकट कर दिए हों—यह ऐसा है मानो वे बेवकूफ हों। जब तक वे उन्हें समझ पाते हैं तब तक मामला पहले ही समाप्त हो चुका होता है और नतीजे पहले ही उत्पन्न हो चुके होते हैं। इतने सारे सत्य सुनने के बाद भी वे नहीं जानते हैं और उन्हें आभास नहीं हो सकता है कि उनके आस-पास के लोग किस तरह के हैं, उनका सार क्या है या वे क्या करने में सक्षम हैं। कुछ लोग ऐसी चीजें कहते हैं जो स्पष्ट रूप से समस्यात्मक होती हैं, फिर भी वे इसका आभास नहीं कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, जब कुछ लोग शेखी बघारते हैं, बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, दिखावा करते हैं और अपनी शान दिखाते हैं, तो यह स्पष्ट रूप से घमंडी स्वभाव का प्रकाशन है, लेकिन पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग फिर भी इस समस्या को समझ नहीं सकते हैं। बल्कि वे सोचते हैं कि ये लोग सक्षम हैं, वे उनकी तारीफ करते हैं और उनका आदर करते हैं और यहाँ तक कि ऐसे लोगों का बाद में अनुसरण तक करना चाहते हैं। यह दिखाता है कि वे सुन्न हैं। स्पष्ट बुरे लोग और बुरे कर्म, भ्रष्ट स्वभावों के स्पष्ट प्रकाशन, जिस दिशा में चीजें स्पष्ट रूप से जा रही हैं—ऐसे लोग इनमें से कुछ भी समझ नहीं सकते हैं। वे नहीं जानते हैं कि मामले का सार क्या है या समस्या की जड़ क्या है; उन्हें इसका बिल्कुल भी आभास नहीं हो सकता है, उन्हें तो इसकी जानकारी तक नहीं होती है। वे वही लोग हैं जिन्हें हम अक्सर बिना आत्मा की लाशें कहते हैं। जब सत्य सिद्धांतों से संबंधित मामलों की बात आती है तब इस प्रकार का व्यक्ति और भी कम खरा उतरता है। ऐसे लोगों को तुम बताते हो कि उन्हें किस सिद्धांत के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, लेकिन वे नहीं समझते हैं; वे सिर्फ उन विनियमों को याद कर लेते हैं जिनका उन्हें पालन करना चाहिए। वे उन सिद्धांतों को नहीं समझ सकते हैं जिनके बारे में तुम संगति करते हो, वे उनसे परे हैं। तुम उनमें एक विशेष अवस्था की तरफ उनका ध्यान दिलाते हो, जो भ्रष्ट स्वभाव के उनके प्रकाशन की अभिव्यक्ति है, लेकिन उन्हें लगता है कि तुम किसी और के बारे में बात कर रहे हो। अगर वे मौखिक रूप से यह मान भी लेते हैं कि उनमें भी इस तरह का भ्रष्ट स्वभाव है, तो भी वे यह नहीं पहचानते हैं कि उन्होंने ऐसे कौन-से शब्द कहे हैं या कौन-से क्रियाकलाप किए हैं जो इस अवस्था या इस अभिव्यक्ति से मेल खाते हैं। वे समझते नहीं हैं और न ही वे जानते हैं कि तुम किस बारे में बात कर रहे हो। सभाओं के दौरान सत्य के बारे में संगति करते समय जब दूसरे लोग पहले ही अगले विषय पर जा चुके होते हैं, वे तब भी पिछले विषय पर बात करने के लिए चर्चा को वापस मोड़ देते हैं। क्या यह मंदबुद्धि और सुन्न होना नहीं है? जब दूसरे लोग बोलते हैं तब वे उनके साथ रफ्तार बनाए नहीं रख सकते हैं—इसलिए नहीं कि उनकी सोच रफ्तार नहीं बनाए रख सकती है, बल्कि इसलिए कि उनकी काबिलियत अपर्याप्त है और कम पड़ जाती है। जब कुछ बुरे लोग उन्हें धोखा देने, उनके साथ खिलवाड़ करने या उन्हें सताने का प्रयास करते हैं तब उन्हें इसका आभास नहीं हो सकता है, बल्कि इसके बजाय वे बुरे लोगों से भाई-बहनों की तरह पेश आते हैं और उनके साथ घनिष्ठता से मिलजुलकर रहते हैं और उनके द्वारा नुकसान पहुँचाए जाने के बाद ही उन्हें एहसास होता है कि उन्हें उल्लू बनाया गया है। फिर वे सोचते हैं, “मैं कितना बेवकूफ हूँ! मुझे नहीं पता कि लोगों को कैसे आँकना है, मुझे नहीं पता कि लोगों का भेद कैसे पहचानना है! इस बार मैंने सच में अपना सबक सीख लिया है—आगे से मैं किसी पर भी विश्वास नहीं करूँगा, मैं सिर्फ खुद पर विश्वास करूँगा। यही सबसे बड़ी बुद्धिमानी है!” एक बार धोखा खाने के बाद उन्हें लगता है कि उन्हें अंतर्दृष्टि प्राप्त हो गई है और वे यह तक सोचते हैं कि अब वे ज्यादा होशियार हैं, एक छोर से दूसरे छोर पर चले जाते हैं। पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग हर मामले के प्रति सुन्न होते हैं। उदाहरण के लिए, एक ऐसा ही व्यक्ति पशुपालन और पौधरोपण का प्रभारी था। एक दिन तापमान में गिरावट आई और मैंने उससे कहा, “आज रात तापमान शून्य से पाँच डिग्री कम रहेगा। क्या उन पौधों और पशुओं को सँभाला नहीं जाना चाहिए जो ठंड बर्दाश्त नहीं कर सकते?” यह सुनने के बाद उसने उत्तर दिया, “मेरे पास एक सूती गद्दीदार जैकेट है और रात को मैं रजाई और कंबल लेकर सोता हूँ, इसलिए मुझे ठंड नहीं लगेगी।” क्या उसे मेरी बात समझ आई? इस उत्तर के आधार पर स्पष्ट रूप से वह नहीं समझा। क्या यह सुन्न होना नहीं है? (है।) अगर मैंने यह कहा होता, “आज रात तापमान शून्य से पाँच डिग्री नीचे रहेगा। अगर फूल आँगन में रह गए तो वे जमकर मर जाएँगे। जो पशु ठंड के प्रति संवेदनशील हैं और जो कमजोर हैं, उन्हें खलिहानों में रखा जाना चाहिए। तुम्हें दरवाजे पर एक अतिरिक्त पर्दा टाँगना चाहिए और खलिहानों में जहाँ से ठंडी हवा के झोंके आते हैं उन जगहों पर पैबंद लगा देने चाहिए।” यह सुनने के बाद वह एक पल के लिए बात को मन में तोलता और कहता “ओह, तुम पशुओं और पौधों के बारे में बात कर रहे थे। तो फिर क्या बस फूलों को भीतर ले आना ठीक नहीं होगा? इतने सारे पशु हैं और तुमने यह नहीं बताया कि कौन-से पशु ठंड के प्रति संवेदनशील हैं और कौन-से नहीं, किन्हें भीतर ले आना चाहिए और किन्हें नहीं।” बिल्कुल, मैंने स्पष्ट नहीं किया—लेकिन क्या तुम सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं कर सकते? तुम्हें यह एहसास तक नहीं है कि सर्दियों में बाहर छोड़े गए फूल जम कर मर सकते हैं और अगर मैं तुम्हें ये चीजें नहीं सौंपता हूँ तो तुम उन्हें नहीं करोगे—यह किस तरह की समस्या है? क्या यह सुन्न होना नहीं है? (हाँ।) यह दिखाता है कि वह सुन्न है। उदाहरण के लिए, बाहर धूप निकली हुई है और कपड़े बाहर आँगन में सूखने के लिए टँगे हुए हैं और कोई कहता है, “लगता है दोपहर में बारिश होने वाली है। क्या बाहर सूख रहे कपड़े भीग जाएँगे?”—ये शब्द चेतावनी का संकेत देते हैं। सामान्य मानवीय सोच वाला व्यक्ति यह सुनेगा और सोचेगा, “मुझे ध्यान देना चाहिए—जब आसमान में बादल छा जाएँगे तब मैं जल्दी से कपड़े भीतर ले आऊँगा।” लेकिन जो लोग सामान्य मानवता की सोच नहीं रखते हैं, वे इसके बारे में सचेत नहीं होंगे। जब तुम कहते हो कि दोपहर में बारिश होने वाली है तब वे यह सुनते हैं और सोचते हैं, “ऐसा कहने का क्या मतलब है? इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं है। मैं तो भीतर रहूँगा, इसलिए अगर बारिश होती है तो मैं नहीं भीगूँगा। इसके अलावा, बारिश होने के बारे में मैं क्या कर सकता हूँ? मुझे यह बताने का कोई फायदा नहीं है!” उन्हें बस यह समझ ही नहीं आता कि उन्हें यह क्यों बताया जा रहा है या यह मामला क्यों उठाया जा रहा है। तो तुम्हें उनसे कैसे बात करनी होगी ताकि वे वास्तव में समझ सकें? तुम्हें उन्हें बताना होगा, “दोपहर में इतने बजे बारिश होगी। बारिश होने से पहले जब तुम आसमान में बादल छाते देखो तब जल्दी से कपड़े भीतर ले आना। अगर तुमने ऐसा नहीं किया तो वे भीग जाएँगे और उन्हें दोबारा धोना पड़ेगा। साथ ही, कपड़े इकट्ठा करते समय यह भी देख लेना कि आँगन में ऐसी कोई और चीज तो नहीं है जो गीली नहीं होनी चाहिए या बारिश में पड़ी नहीं रहनी चाहिए और अगर हो, तो उसे भी भीतर ले आना।” तुम्हें उन्हें इस तरह से निर्देश देना होगा। अगर तुम उन्हें इस तरह से निर्देश नहीं देते हो तो उन्हें यह समझ नहीं आएगा कि उन्हें कपड़े भीतर लाने की जरूरत है और न ही उन्हें यह समझ आएगा कि उन्हें ऐसी कोई और चीज इकट्ठा करनी है जिस पर बारिश नहीं पड़नी चाहिए। वे ये चीजें नहीं करेंगे। क्यों? क्योंकि वे बहुत ही ज्यादा सुन्न हैं, उनके पास सामान्य मानवता की सोच नहीं है और वे सामान्य मानवता के मानक को पूरा नहीं करते हैं। यानी उनकी बुद्धिमत्ता और काबिलियत सामान्य मानवता के मानक तक नहीं पहुँचती है। पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग ऐसे होते हैं। ऐसे व्यक्तियों से कुछ करने के लिए कहते समय, भले ही मैं पहले ही कई बार उन्हें निर्देश दे चुका हूँ और उन्होंने पहले भी कई बार इसे किया हो, फिर भी मुझे उन्हें फिर से निर्देश देना पड़ता है। अगर मैं उन्हें निर्देश नहीं देता हूँ तो उन्हें समझ नहीं आएगा कि क्या करने की जरूरत है और न ही वे उसे करने में समर्थ होंगे। इसलिए जब भी उनके सामने इस तरह का कोई काम आता है तब तुम्हें उन्हें बताना होगा कि ठीक-ठीक क्या करने की जरूरत है और इसे कैसे करना है और उन्हें प्रक्रिया के हर चरण पर निर्देश देना होगा। अगर तुम एक अकेली चीज भी छोड़ देते हो तो वे उस चीज को नहीं करेंगे या शायद वे पूरी चीज को ही गड़बड़ कर देंगे। और फिर अगर तुम उनकी समस्याओं की तरफ उनका ध्यान दिलाते हो तो वे ढेरों विरूपित दलीलों के साथ उत्तर देंगे और फिर से मनमाने ढंग से अतार्किक व्यवहार करने लगेंगे। यह सुन्न होने की अभिव्यक्ति है।

पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की यह विशेषता, उनकी सुन्नता, बहुत ही स्पष्ट है। उदाहरण के लिए, सत्य पर संगति से वे धर्म-सिद्धांत के लिहाज से यह समझते हैं कि यह भेद कैसे पहचाना जाए कि कोई कलीसियाई अगुआ वास्तविक कार्य करता है या नहीं, वह मानकों के अनुरूप अगुआ है या नहीं या क्या वह नकली अगुआ या मसीह-विरोधी है। लेकिन जब यह भेद पहचानने की बात आती है कि उनका अपना कलीसियाई अगुआ किस श्रेणी में आता है तब भले ही वे कलीसियाई अगुआ द्वारा प्रस्तुत की गई कुछ अभिव्यक्तियों को देख लें, फिर भी वे नहीं जानते कि उनका भेद कैसे पहचानना है। अगर तुम उनसे पूछते हो, “क्या तुम लोगों का कलीसियाई अगुआ वास्तविक कार्य करता है?” तो वे कहते हैं, “मैं उसे हर रोज सभाओं में व्यस्त रहते हुए और चीजें व्यवस्थित करते हुए इधर-उधर भागते हुए देखता हूँ, उसने भाई-बहनों को पुस्तकें वितरित कीं और सुसमाचार कार्य पर अनुवर्ती कार्रवाई की।” फिर तुम पूछते हो, “तो फिर वह अपना कार्य कितनी अच्छी तरह से करता है? क्या वह सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति है?” वे उत्तर देते हैं, “उसने अपना करियर और परिवार छोड़ दिया है। यहाँ तक कि जब उसके माता-पिता मिलने आए तब भी वह अपना कर्तव्य करने में इतना व्यस्त था कि उनसे मिल ही नहीं पाया। वह जरूर सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति है, है ना?” वे कलीसियाई अगुआ की इन बाहरी अभिव्यक्तियों को ही देखते हैं; लेकिन अगुआ गुप्त रूप से चाहे कितने भी बुरे कर्म करे, अगर वे इसे देखते भी हैं, तो भी वे इसे एक समस्या के रूप में नहीं पहचानते हैं, वे नहीं जानते हैं कि यह एक समस्या है। चाहे इनमें से कितनी भी चीजें उनके सामने घटती हों, ऐसा लगता है जैसे उन्होंने कभी कुछ देखा ही नहीं, मानो वे लोगों के बीच नहीं बल्कि किसी दूसरी ही दुनिया में रह रहे हों। क्या ऐसे लोग अत्यधिक सुन्न नहीं हैं? (हाँ।) यह सुन्न होना है। जब उनके सामने कोई ऐसा व्यक्ति आता है जिसमें दुष्ट आत्माओं का कार्य है, जो हमेशा अलौकिक मामलों पर ध्यान देता है और हमेशा उन चीजों के बारे में बात करता है जिनका उसे आभास होता है, और हमेशा ऐसी चीजें कहता है, “मैंने एक आवाज सुनी, परमेश्वर ने मुझे प्रबुद्ध किया, परमेश्वर ने मुझे रोशन किया, परमेश्वर ने मेरा मार्गदर्शन किया, परमेश्वर ने फिर से मेरे भीतर कोई चीज प्रकट की” तब सुन्न लोग सोचते हैं, “वह सही मायने में परमेश्वर से प्रेम करता है। उसे प्रकाशन प्राप्त हुए हैं—मुझे क्यों नहीं हुए?” उन्हें बस यह ऐहसास ही नहीं होता कि यह दुष्ट आत्माओं का कार्य है। जब एक दिन वह व्यक्ति अचानक पागल हो जाता है, सबके सामने बड़ा तमाशा करता है, जमीन पर लोटता है और सड़कों पर नंगा दौड़ता है, तब जाकर उन्हें अंततः समझ आता है कि यह एक दुष्ट आत्मा है। दरअसल उस व्यक्ति के पागल हो जाने से पहले ही बहुत सारे संकेत मौजूद थे, और ये अभिव्यक्तियाँ उसका एक ऐसे व्यक्ति के रूप में निरूपण करने जिस पर दुष्ट आत्मा का कार्य है और उसे हटाकर पहले ही सँभाल लिए जाने के लिए पर्याप्त होतीं। लेकिन वे सुन्न हैं, इन बातों को समझ नहीं सकते और उन्हें यह एहसास नहीं है कि ऐसे व्यक्ति को कलीसिया में रहने देने के क्या नतीजे सामने आ सकते हैं—क्या यह विपत्तियाँ आने का कारण नहीं बन सकता? कुछ दुष्ट आत्मा और दुष्ट दानव तो लोगों को नुकसान पहुँचाने की हद तक भी पहुँच जाते हैं, फिर भी सुन्न लोग उन्हें वैसे नहीं देख पाते जैसे वे वास्तव में हैं। वे यह तक मानते हैं कि ऐसे व्यक्ति वाकई परमेश्वर से प्रेम करते हैं और वे जोश से भरे हुए हैं, अक्सर देर रात तक जागकर परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं और भजन सीखते हैं, कई दिनों तक न खाते हैं और न ही सोते हैं, लेकिन फिर भी थकान महसूस नहीं करते हैं। भले ही यह स्पष्ट रूप से असामान्य है, फिर भी वे दावा करते हैं कि यह परमेश्वर के लिए प्रेम है। क्या वे हद से ज्यादा सुन्न नहीं हैं? एक चीज तो यह है कि सुन्न लोग मामलों की असलियत नहीं जान सकते; वे मुद्दों के सार की असलियत जानने के लिए सतही परिघटनाओं से परे देखने में असमर्थ होते हैं। इसलिए, उनके लिए किसी भी मुद्दे का सटीकता से निरूपण करना बहुत मुश्किल होता है। इसके अलावा, सुन्न लोगों में सोचने के सामान्य तरीके नहीं होते हैं या चीजों को पहचानने की क्षमता नहीं होती है, इसलिए वे अपने आस-पास हो रही बहुत-सी घटनाओं से पूरी तरह से बेखबर होते हैं। ऐसे लोग किसी जगह पर कई वर्षों तक रह सकते हैं और फिर भी उनसे यह पूछे जाने पर कि “वहाँ की जलवायु कैसी है? मौसमी प्रवृत्तियाँ क्या हैं? क्या वह रहने के लिए आरामदेह जगह है?” वे उत्तर नहीं दे पाते हैं। वे कहते हैं, “जलवायु के बारे में क्या? मुझे नहीं पता। बहरहाल, फूल अप्रैल में खिलते हैं, पत्ते सितंबर या अक्टूबर के आस-पास पीले पड़ जाते हैं और गिरने लगते हैं और जब सर्दियाँ आती हैं तब बर्फबारी का समय होता है।” अगर पूछा जाए, “स्थानीय रीति-रिवाज किस तरह के हैं? सामाजिक व्यवस्था कैसी है? क्या वहाँ नस्लीय भेदभाव है? सरकार की नीतियाँ कैसी हैं? वे दूसरी जगहों से आने वाले लोगों से कैसे पेश आते हैं?” तो वे पूरी तरह से अनजान होते हैं, हक्के-बक्के होकर ताकते रहते हैं, कुछ भी कहने में असमर्थ होते हैं। यहाँ तक कि जब सबसे महत्वपूर्ण मामले—धार्मिक विश्वास के प्रति सरकार के रवैये—की बात आती है तब भी वे कुछ नहीं कह सकते हैं, बस यही उत्तर देते हैं, “देखो, हम वहाँ रहते हैं और सरकार हमें कभी भी परेशान नहीं करती है।” वे लकड़ी के पुतलों की तरह होते हैं, सभी चीजों से पूरी तरह से बेखबर होते हैं—यह चरम सुन्नता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो कहते हैं कि वे अपना कर्तव्य करने में बहुत ही ज्यादा व्यस्त रहते हैं और उनके पास इन चीजों को सुलझाने का समय नहीं है—क्या यह बस एक बहाना नहीं है? (हाँ।) यह स्पष्ट है कि यह एक बहाना है। क्या ऐसी सरल चीजों के लिए सोच-समझकर ध्यान देने और रिकॉर्ड रखने की जरूरत पड़ती है? नहीं पड़ती। अगर तुममें सामान्य मानवता की सोच है तो किसी जगह तीन वर्ष से ज्यादा समय तक रहने के बाद तुम्हें मूल रूप से स्थानीय जलवायु, रीति-रिवाजों, जीवनशैली की आदतों, धार्मिक विश्वास से संबंधित स्थिति, और सरकार की नीतियों और दूसरी जगहों से आने वाले लोगों के प्रति उसके रवैये की समझ हो जानी चाहिए। तुम्हें इस जानकारी के बारे में विशेष रूप से जानने, पता लगाने या उसे इकट्ठा करने की जरूरत नहीं होगी—तुम्हें बस पता होगा। सामान्य मानवता की सोच वाला कोई भी व्यक्ति इन चीजों को बहुत स्वाभाविक रूप से समझ सकता है। अगर तुम उन मुद्दों को भी समझने में असमर्थ हो जिन्हें सामान्य लोग समझ सकते हैं और स्पष्ट रूप से देख सकते हैं तो यह क्या बताता है? यह बताता है कि तुम्हारे पास सामान्य मानवता की सोच या तर्क-शक्ति नहीं है और तुम सामान्य मानवता के मानक को पूरा नहीं करते। इस प्रकार के व्यक्ति का सामान्य मानवता के मानक को पूरा करने में विफल होने का मूल कारण यह है कि उसने मनुष्यों से नहीं बल्कि पशुओं से पुनर्जन्म लिया है। तुम समझ रहे हो? (हाँ।) अगर व्यक्ति की सुन्नता की विशेषता बहुत स्पष्ट है तो यह समस्या के बारे में बहुत कुछ बयान करता है।

पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशेषताओं के संबंध में अभी-अभी हमारी संगति से तुम लोगों ने क्या समझा? क्या तुम लोगों ने एक तथ्य पर गौर किया—कि विरूपित समझ और सुन्नता, ये दोनों विशेषताएँ इस श्रेणी के लोगों में बहुत ही सुस्पष्ट होती हैं? (हाँ।) इन लोगों में ये दो अभिव्यक्तियाँ क्यों होती हैं? उनकी मानवता में किसकी कमी है? (सामान्य सोच की।) यह कुछ हद तक उपयुक्त है—उनके पास मानवीय बुद्धिमत्ता नहीं होती है। ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है जैसे इन लोगों में खराब काबिलियत है—आखिर यह कितनी खराब है? वे विरूपणों के प्रति प्रवृत्त भी हैं और वे सुन्न भी हैं; जब कुछ ऐसे मुद्दों की बात आती है जिनका सामान्य मानवता वाले लोग बार-बार सामना करते हैं और जिन्हें वे स्वतंत्र रूप से सँभाल सकते हैं और हल कर सकते हैं, तब ये लोग कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं और उन्हें हल नहीं कर सकते हैं, वे बहुत ही बचकाने, बेहूदे और अपरिपक्व लगते हैं। ज्यादा गंभीर बात यह है कि इनमें से कुछ लोगों में स्वतंत्र रूप से जीवित रह पाने की क्षमता नहीं होती है—वे स्वयं अपना भरण-पोषण नहीं कर सकते हैं और चाहे वे कार्य करने के लिए बाहर जाएँ या किसी भी तरह का काम करें, वे असमर्थ ही होते हैं। वे चाहे कहीं भी जाएँ, नियोक्ता या तो उन्हें रखना नहीं चाहते या उन्हें बर्खास्त कर देते हैं। इसके अलावा, मुख्य चीज यह है कि अपने जीवन के दायरे में विभिन्न मुद्दों, जैसे कि जीवन के आम मुद्दों और यहाँ तक कि कुछ तुच्छ मामलों से भी सामना होने पर वे उन्हें अच्छी तरह से सँभाल नहीं सकते। यहाँ तक कि वे एक बहुत ही सरल मुद्दे को भी गड़बड़ कर सकते हैं; वे हमेशा बस आँख मूँदकर विनियमों को लागू कर देते हैं। चीजों को सँभालने के लिए वे जिन विधियों और तरीकों का उपयोग करते हैं, वे अत्यधिक बेवकूफी भरे और बेढंगे होते हैं; उनके पास वे विधियाँ और साधन नहीं होते जिनका उपयोग एक वयस्क दुनिया की चीजों से निपटने के लिए करेगा। इससे यह बहुत ही स्पष्ट हो जाता है कि उनके पास मानवीय बुद्धिमत्ता नहीं होती है। उदाहरण के लिए मान लो, ऐसा ही एक व्यक्ति बीमार हो जाता है और उसकी तबीयत हमेशा खराब रहती है। वह कुछ जानकारी खोजता है और उसमें लिखा होता है कि यह कोई गंभीर बीमारी या बड़ी बीमारी हो सकती है; वह भयभीत हो जाता है और जाँच के लिए जल्दी से अस्पताल चला जाता है। डॉक्टर कहता है, “यह बीमारी बहुत गंभीर है। इसमें मृत्यु दर अत्यधिक ज्यादा है। अगर इलाज नहीं किया गया तो यह और गंभीर हो जाएगी और मृत्यु हो जाएगी। सर्जरी ही इसे ठीक करने का एकमात्र तरीका है। अगर तुमने सर्जरी नहीं करवाई तो तुम ज्यादा-से-ज्यादा तीन महीने जिंदा रहोगे।” यह सुनकर वह अत्यधिक भयभीत हो जाता है और उसे पता नहीं होता कि क्या करे। निदान की पुष्टि करने के लिए आगे कोई भी परीक्षण करवाए बिना वह बस डॉक्टर की बात मान लेता है और सर्जरी करवाने का फैसला कर लेता है। ऑपरेशन से पहले वह यह तक नहीं पूछता कि क्या सावधानियाँ बरतने की जरूरत है, ऑपरेशन पूरा हो जाने के बाद दुष्प्रभाव होंगे या नहीं—उसे ये प्रश्न पूछने तक नहीं आते, और वह डॉक्टर के डर से आज्ञाकारी ढंग से ऑपरेशन टेबल पर लेट जाता है। अंत में सर्जरी के बाद उसे यहाँ-वहाँ बेचैनी महसूस होने लगती है और दवा लेने से भी कोई फायदा नहीं पहुँचता है। बाद में वह दूसरों से सुनता है कि इस बीमारी के लिए सर्जरी की जरूरत नहीं है, यह वास्तव में कोई गंभीर बीमारी नहीं है और व्यायाम से और कुछ आम दवाएँ लेने से यह धीरे-धीरे ठीक हो जाएगी और न तो बढ़ेगी और न ही बिगड़ेगी। पैसे कमाने के लिए डॉक्टर कभी-कभी भयावह बयान देते हैं ताकि लोग डर जाएँ और सुन्न व्यक्ति के पास अपना खुद का कोई विचार नहीं होता और वह निर्णय नहीं ले सकता; डॉक्टर की बात सुनकर वह बुरी तरह से डर जाता है और जब डॉक्टर उसे सर्जरी करवाने के लिए कहता है तब वह सर्जरी करवा लेता है। जब उसके साथ ऐसे मामले होते हैं तब अगर उसके आस-पास कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसके पास अपने खुद के विचार हों और जो दृढ़-निश्चयी हो और जिसके पास चीजों को जाँचने में उसकी मदद करने के लिए बुद्धिमत्ता हो तो वह घुमावदार रास्ता लेने से बच पाएगा और थोड़ा कम कष्ट सहेगा। लेकिन अगर उसे ऐसे मामलों को, विशेष रूप से बड़े मामलों को, अकेले ही सँभालने के लिए छोड़ दिया जाए तो वह या तो इस तरफ या फिर उस तरफ भटकेगा, उसे या तो ठगा जाएगा या फिर उसका नुकसान किया जाएगा; वह हमेशा चरम उपाय करता है। वह ऐसे मामलों को सँभालने के सिद्धांतों के आधार पर या उनके लिए आमतौर पर उपयोग किए जाने वाले तरीकों और विधियों के आधार पर चीजों को व्यापक रूप से मापने और फिर उनसे पेश आने का सबसे उचित और तर्कसंगत तरीका ढूँढ़ने में बस असमर्थ है। कोई भी उसे धोखा दे सकता है, उसके साथ खिलवाड़ कर सकता है, उसे प्रभावित कर सकता है और उसे गुमराह कर सकता है। कुछ लोग पूछते हैं, “क्या इन लोगों के अपने विचार या राय नहीं होती हैं?” वास्तव में ऐसा नहीं है कि उनके अपने विचार या राय नहीं हैं—तुम देखो, जब वे गलत कर्म करते हैं और भ्रामक तर्क बोलते हैं तब वे निश्चित रूप से अपनी राय पर अडिग रहते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन सही चीजें कहता है, वे नहीं सुनते और अगर कोई व्यक्ति सही चीजें कहे, तो भी वे उद्दंड होते हैं और बस अपनी भ्रामक, उलझी हुई दलीलों पर अड़े रहते हैं। फिर भी जब दैनिक जीवन में उत्पन्न होने वाली समस्याओं का सामना करने और उनसे सही ढंग से पेश आने और उन्हें सँभालने के लिए सामान्य विवेक और सामान्य सोच का उपयोग करने की वास्तव में जरूरत पड़ती है तब उन्हें पता ही नहीं होता कि उन्हें सँभालने के लिए कौन-सी विधि या प्रक्रिया का उपयोग करना है, उन्हें पता ही नहीं होता कि उनसे कैसे पेश आना है, उनके पास कोई तरीके या विधियाँ नहीं होतीं और न ही उनके अपने कोई विचार या रायें होती हैं। अंत में वे दूसरों द्वारा सिर्फ नियंत्रित ही किए जा सकते हैं—वे वही करते हैं जो दूसरे उन्हें करने के लिए कहते हैं। सामान्य मानवता की बुद्धिमत्ता की कमी होना पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशेषता है। तो फिर वे अपनी भ्रामक, उलझी हुई दलीलों पर अड़े रहने में समर्थ कैसे हैं, यहाँ तक कि उन्हें जोर से बोलने और हर जगह फैलाने में भी समर्थ कैसे हैं? इससे साबित होता है कि अपनी बुद्धिमत्ता के लिहाज से वे यह भेद पहचानने में अक्षम हैं कि सत्य क्या है और भ्रामक तर्क क्या है, क्या सामान्य तार्किकता के अनुरूप है और क्या नहीं—वे इन चीजों में अंतर नहीं कर सकते; इसलिए जब तुम ऐसा तर्क साझा करते हो जो सही है तब वे उसे स्वीकार नहीं कर सकते और न ही वे उसे समझते हैं। वे बस अपने विरूपित, उलझे हुए तर्क पर अड़े रहते हैं और उसे सही मानते हैं। चाहे कोई और उनसे बात करने के लिए किसी भी विधि का उपयोग करे, चाहे उसके बोलने का तरीका कितना भी अच्छा या बुद्धिमानी भरा हो, पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग इसे आत्मसात नहीं कर सकते और न ही इसे समझते हैं—उनका काम तमाम हो चुका है। यह दिखाता है कि उनमें सामान्य मानवता की बुद्धिमत्ता नहीं है। दैनिक जीवन के सबसे सामान्य मामले पर भी जब तुम उनके साथ तर्क करते हो तब वह उनकी समझ में नहीं आता—वे तब भी अपनी उलझी हुई तार्किकता पर अड़े रहते हैं। जब लोग इसे देखते हैं तब वे सोचते हैं, “यह व्यक्ति इतना अजीब क्यों है? इस पर तर्क का कोई असर क्यों नहीं होता? यह मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति जैसा भी है और ऐसा भी जैसे अभी परिपक्व नहीं हुआ हो—वह हमेशा बचकाने ढंग से क्यों बोलता है?” लेकिन वे बच्चे नहीं हैं—जब वे पचास या साठ वर्ष के होते हैं तब भी ऐसे होते हैं और जब वे अस्सी वर्ष के हो जाते हैं तब भी वे ऐसे ही होते हैं। जीवन भर वे कम बुद्धिमत्ता वाले व्यक्ति ही बने रहते हैं; जीवन भर उनमें सामान्य मानवीय सोच या सामान्य मानवीय बुद्धिमत्ता नहीं होती है। यह पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशेषता है। क्या यह विशेषता स्पष्ट है? (हाँ।) उदाहरण के लिए, मान लो कि एक बेवकूफ महिला है जो दिखने में थोड़ी-बहुत सुंदर है और किसी घटिया बदमाश द्वारा पटाए जाने के बाद वे दोनों साथ रहने लगते हैं। यह घटिया बदमाश हर समय बाहर इश्कबाजी करता फिरता है, लेकिन जब इस महिला को पता चलता है तब वह गुस्सा नहीं होती है—जो भी हो, जब तक वह आदमी उसके साथ अच्छी तरह से व्यवहार करता है तब तक उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। बाद में यह घटिया बदमाश किसी और के साथ रिश्ता बना लेता है, लेकिन जब इस महिला को पता चलता है तब वह परवाह नहीं करती और अब भी उस घटिया बदमाश के साथ अटूट निष्ठा से बनी रहती है। वह यह तक कहती है, “जब तक वह मुझे छोड़ नहीं देता तब तक मुझे कोई समस्या नहीं है।” कोई उसे सलाह देता है, “वह पहले से ही इतना गिर चुका है—तुम्हें उसके साथ रहना बंद कर देना चाहिए।” वह कहती है, “नहीं, मैं उसके बिना नहीं रह सकती। वह मुझसे प्रेम करता है और वह मुझे अच्छा लगता है!” ऐसा व्यक्ति इस घटिया बदमाश के साथ जीवन भर रहने और कष्ट सहने के लायक ही है—वह बस यह भेद पहचान ही नहीं सकती कि अच्छा व्यक्ति क्या होता है या सभ्य व्यक्ति क्या होता है। वह एक घटिया बदमाश के साथ प्रेम संबंध बनाती है और यह भी सोचती है कि वह उससे सही मायने में प्रेम करता है। वह घटिया बदमाश उससे कुछ मीठे-मीठे शब्द कहता है और उसे कुछ बढ़िया भोजन खरीदकर देता है और बस यूँ ही उससे चिकनी-चुपड़ी बातें करके अपनी बाँहों में भर लेता है। वह उसके साथ ऐसे खिलवाड़ करता है मानो गीली मिट्टी से खेल रहा हो। जब वह उसकी पीठ पीछे इश्कबाजी करता फिरता है और इस महिला को पता चल जाता है तब वह बस कुछ ही शब्दों से बिगड़े मामले को शांत कर देता है, उसे धोखा देता है और वह महिला बस इसकी असलियत जान ही नहीं सकती। अंत में वह घटिया बदमाश उसकी सारी संपत्ति और घर हड़प लेता है और फिर उसे छोड़ देता है। वह उसे यह कहकर कोसती है कि उसमें कोई जमीर नहीं है, लेकिन वह यह बिल्कुल नहीं कहती कि वह इसलिए धोखा खा गई क्योंकि वह लोगों की असलियत नहीं जान सकती। उस घटिया बदमाश ने दूसरों को धोखा क्यों नहीं दिया, लेकिन उसे धोखा देने में क्यों समर्थ रहा? क्या ऐसा इसलिए नहीं है कि वह महिला बेवकूफ है? इस तरह के व्यक्ति की मुख्य विशेषताएँ यह हैं कि वह हर चीज को समझने और उससे पेश आने में जिद्दी और बेहूदा होता है और उसमें सामान्य मानवता की बुद्धिमत्ता नहीं होती है। यही कारण है कि हम कहते हैं कि उसने पशुओं से पुनर्जन्म लिया है। क्योंकि वह पशु है, इसलिए उसमें मानवीय बुद्धिमत्ता नहीं है। यह तथ्य कि उसमें मानवीय बुद्धिमत्ता नहीं है यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि उसके भीतर जो सार है वह मनुष्यों का सार नहीं है। इसलिए वह मानवीय मामलों का सामना नहीं कर सकता या उन मुद्दों को सँभाल नहीं सकता और हल नहीं कर सकता जिन्हें सँभालने और हल करने में सामान्य मनुष्यों को समर्थ होना चाहिए। यहाँ तक कि जब बात उसके अपने दैनिक जीवन की चीजों—उसके दैनिक भोजन, मूलभूत जरूरतों और साथ ही पारस्परिक रिश्तों और आस-पास के परिवेश—के प्रति उसके दृष्टिकोण की आती है, तब भी वह बहुत सुन्न होता है। इसके अलावा, जब उसके सामने ऐसे कुछ मामले आते हैं जिनका उसे सामना करने और सँभालने की जरूरत होती है तब उसके पास सामान्य लोगों की बुद्धिमत्ता नहीं होती है, फिर बुद्धिमानी की तो बात ही रहने दो। जब वह इन मुद्दों का सामना करता है तब वह उन्हें बड़ी मुश्किल से, बहुत थकावट से और बेहद अनाड़ीपन से सँभालता है। वह इतना बूढ़ा हो चुका है और उसने इतना लंबा जीवन जिया है : वह चीजों को इस तरीके से कैसे सँभाल सकता है? वह जो चीजें कहता है वे बहुत ही घिनौनी और बहुत ही अजीब क्यों लगती हैं? वह सामान्य लोगों की तरह बात क्यों नहीं करता है? उसने इतने वर्षों तक जीवन जिया है और बहुत सारी चीजें अनुभव की हैं, फिर भी इतने सरल मामले को सँभालते समय वह इस तरह से कैसे व्यवहार कर सकता है? उसके पास मानवता की सबसे मूलभूत सीमाएँ या वे सबसे मूलभूत सिद्धांत तक नहीं हैं जो लोगों के पास होने चाहिए।

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