सत्य का अनुसरण कैसे करें (13) भाग एक
उत्पत्तियों के आधार पर लोगों की तीन श्रेणियाँ
पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशेषताएँ
पिछली बार हमने जिस विषय पर संगति की थी वह इससे संबंधित था कि लोगों का भेद कैसे पहचानें और उन्हें कैसे देखें। यह कहा जा सकता है कि इस तरह का विषय लोगों के लिए रुचिकर होता है लेकिन, क्योंकि यह विषय कुछ हद तक विशिष्ट है और लोगों की संभावनाओं और नियतियों के महत्वपूर्ण मुद्दे से संबंधित है, इसलिए यह श्रोताओं में कुछ ऐसी भावनाएँ जगाता है जो सत्य के दूसरे पहलुओं द्वारा उत्पन्न भावनाओं से भिन्न होती हैं। कुछ लोगों के लिए ये भावनाएँ विशेष रूप से सुखद नहीं होतीं। यह विषय सुनने के बाद कुछ लोग गंभीर आंतरिक उथल-पुथल का अनुभव कर सकते हैं और सुन्न लोग भी कुछ थोड़ी-सी आंतरिक उथल-पुथल का अनुभव कर सकते हैं। है ना? (हाँ।) लोगों की प्रतिक्रियाएँ चाहे जो भी हों, बहरहाल, जब इन विषयों पर संगति हो चुकी होती है उसके बाद परमेश्वर के चुने हुए लोगों को लोगों का भेद पहचानने और विभिन्न मामलों की असलियत जानने में कुछ सहायता मिलती है और वे कुछ अंतर्दृष्टि और भेद पहचानने की क्षमता प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। है ना? (हाँ।) पिछली बार हमने पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की कुछ अभिव्यक्तियों और विशेषताओं के बारे में संगति की थी। तो इस किस्म के लोगों की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? (पिछली बार, हमने संगति की थी कि पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में चार विशेषताएँ होती हैं : पहली, उनमें विरूपित समझ होती है; दूसरी, वे विशेष रूप से सुन्न होते हैं; तीसरी, वे विशेष रूप से भ्रमित होते हैं; और चौथी, वे विशेष रूप से बेवकूफ होते हैं।) ये चार लक्षण पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की मूलभूत विशेषताएँ हैं। तो क्या तुम सभी ने यह समझ लिया है कि इस किस्म के लोगों की मूलभूत अभिव्यक्तियाँ वास्तव में क्या हैं? दूसरे शब्दों में, उनके बाहरी रूप—उनकी वाणी, आचरण और उनकी मानवता की विभिन्न अभिव्यक्तियों—को देखा जाए तो उनमें ऐसी कौन-सी अभिव्यक्तियाँ हैं जो इन चार विशेषताओं से संबंधित हैं? उदाहरण के लिए, सत्य से पेश आने के उनके तरीके की और उनकी मानवता के जमीर और विवेक की क्या विशेषताएँ हैं? यकीनन ये लक्षण मूल रूप से विरूपित समझ, सुन्नता, भ्रमित होना और बेवकूफी की चार विशेषताओं में शामिल किए जाते हैं, है ना? (हाँ।) अब वास्तविक जीवन में तुम जिन अभिव्यक्तियों को देख सकते हो और जिनका सामना कर सकते हो, उनमें से कुछ अभिव्यक्तियों के आधार पर इन चार विशेषताओं को और विस्तार से समझाओ। तुम लोग दूसरी किन अभिव्यक्तियों के बारे में जानते हो? उदाहरण के लिए, पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग बहुत सुन्न होते हैं। अगर तुम सिर्फ एक प्रतीकात्मक उदाहरण देकर उनकी समस्या की तरफ ध्यान दिलाते हो तो भले ही तुम उन्हें इस समस्या के बारे में कई बार बताओ, वे फिर भी नहीं समझेंगे। इसलिए, उन्हें यह एहसास दिलाने के लिए कि यह उनके बारे में है तुम्हें स्पष्ट रूप से कहना पड़ेगा, “मैं तुम्हारे बारे में बात कर रहा हूँ।” नहीं तो वे मान लेंगे कि यह किसी और की समस्या के बारे में है, यह उनसे संबंधित नहीं है और वे सोचेंगे कि वे बिल्कुल ठीक कर रहे हैं। क्या यह सुन्नता नहीं है? (हाँ।) उनसे जरा-सी प्रतिक्रिया करवाने के लिए भी तुम्हें इसे ठीक उनकी आँखों के सामने रखना होगा। तो क्या वे सत्य समझ सकते हैं? (नहीं।) वे सत्य क्यों नहीं समझ सकते? (क्योंकि वे प्रतिक्रिया करने में सुस्त होते हैं और परमेश्वर के वचनों का अर्थ नहीं समझ सकते। जब दूसरे लोग उनकी समस्याओं पर ध्यान दिलाते हैं तब वे सिर्फ एक धर्म-सिद्धांत या विनियम पर ही पकड़ बना पाते हैं; वे इसे किसी सकारात्मक परिप्रेक्ष्य से नहीं समझ सकते हैं और इस प्रकार उनके लिए सकारात्मक प्रवेश पाना असंभव है।) यह बोध क्षमता से रहित होना है। सुन्नता के लिहाज से, जब कोई किसी तरह की अवस्था पर उनका ध्यान दिलाता है तब वे बस यह एहसास कर ही नहीं सकते कि इसका उनसे क्या लेना-देना है, उनके पास वाकई इस तरह की अवस्था है या नहीं और वाकई खुद उन्हें उस तरह की समस्या है या नहीं—वे इन चीजों का एहसास नहीं कर सकते हैं और न ही यह समझ सकते हैं कि दूसरा व्यक्ति क्या कह रहा है। भले ही तुम स्पष्ट रूप से बता दो कि उन्होंने क्या चीज की, उन्होंने कौन-से शब्द कहे या किस दिन उन्होंने कौन-सी अभिव्यक्ति प्रदर्शित की और वे जानते हैं कि तुम उनके बारे में बात कर रहे हो, लेकिन फिर भी वे जिस पर पकड़ बनाते हैं वह बस एक मामला, एक कथन या एक वाक्य होता है और वे उसे अस्पष्ट, सतही ढंग से याद कर लेते हैं। उसे याद कर लेने के बाद वे बस एक विनियम से चिपके रहते हैं : वे शब्द मत कहो और वे चीजें मत करो; ये चीजें करो, और उस तरीके से कार्य करो। वे जीवन भर इस विनियम से चिपके रह सकते हैं जिसके चलते वे किसी की भी संगति स्वीकारने से इनकार कर देते हैं और यहाँ तक कि जंगली घोड़े भी उन्हें खींचकर दूर नहीं ले जा सकते। जैसे-जैसे समय, भौगोलिक परिवेश, लोगों, घटनाओं और चीजों वगैरह में बदलावों के कारण स्थिति विकसित होती है, तुम उन्हें बताते हो कि जिस तरीके से वे पहले कार्य करते थे, वह अब और कारगर नहीं है और उन्हें अपने पेश आने के तरीके या रणनीति को समायोजित करने की जरूरत है—हालाँकि सिद्धांत वास्तव में नहीं बदला है—लेकिन वे इसे समझ नहीं सकते हैं। वे कहते हैं, “मैं इतने वर्षों से इसी तरीके से अभ्यास कर रहा हूँ और मुझे यह ठीक लगता है। बहुत वर्षों पहले अगुआओं और कार्यकर्ताओं ने जिस बारे में संगति की थी मैं उसी के आधार पर अभ्यास कर रहा हूँ। मैं अपने अभ्यास का तरीका क्यों बदलूँ?” उनके पास एक आधार भी है, लेकिन दरअसल वे वर्षों से इसे जाने बिना या खुद इसका एहसास किए बिना ही एक विनियम का पालन किए जा रहे हैं।
विरूपित समझ होने की विशेषता के लिहाज से, पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए ज्यादातर लोग विरूपित समझ की अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करते हैं। उनके सोचने का ढंग सामान्य लोगों के सोचने के ढंग से भिन्न होता है। उनके विचार बहुत ही सनकी, अजीब और कभी-कभी तो चौंका देने वाले ढंग से अप्रत्याशित भी होते हैं—तुम बस कल्पना ही नहीं कर सकते कि वे ऐसा क्यों सोचते हैं और तुमने कभी सोचा भी न होगा कि इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति मुद्दों पर इतने अनोखे ढंग से विचार करेगा। उनके विचारों से तुम हक्के-बक्के रह सकते हो। वह इसलिए क्योंकि सामान्य सोच वाले लोग आमतौर पर मुद्दों पर सामान्य सोचने के ढंग के अनुसार विचार करते हैं, जबकि पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों के सोचने का ढंग बहुत ही अजीब होता है। वे अक्सर कुछ अजीब और बेतुके कथन व्यक्त करते हैं और जब कोई सामान्य सोच वाला व्यक्ति उन्हें सुनता है तब वह चौंक पड़ता है। अगर तुम किसी मुद्दे पर विचार करने के लिए उनके सोचने के तरीके का पालन करने का प्रयास करो तो तुम पाओगे कि यह बहुत ही अजीब है और गतिरोध की स्थिति में आ जाता है। क्योंकि उनके सोचने का तरीका ऐसा होता है, इसलिए वास्तविक जीवन में—चाहे वे अपना कर्तव्य कर रहे हों, दूसरों से मेलजोल रख रहे हों या कुछ विशेष हालातों, लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना कर रहे हों—उनके विचार हमेशा बहुत ही अजीब होते हैं और वे ज्यादातर लोगों के साथ मिलजुलकर नहीं रह सकते हैं। वे मानव जगत में रहने वाले प्राणी नहीं लगते हैं, बल्कि ऐसा लगता है जैसे वे किसी दूसरी दुनिया में रह रहे हों। तुम यह कभी नहीं समझ सकते कि वे जिस तरीके से सोचते हैं उसका क्या कारण है या वे ऐसे विचार क्यों पेश करते हैं। वे जिस तरीके से मुद्दों पर विचार करते हैं, वह अक्सर सामान्य मानवता की सोच के दायरे को पार कर जाता है और सामान्य सोच के उचित मार्ग से भटक जाता है। अंतिम नतीजा यह होता है कि सभी लोगों को मुद्दों पर विचार करने का उनका ढंग, रुख और सिद्धांत बहुत अजीब लगते हैं। अगर ऐसा व्यक्ति उस समय मौजूद हो जब सभी लोग किसी मुद्दे पर विचार कर रहे हों या संगति कर रहे हों और वहाँ ज्यादातर लोगों में भेद पहचानने की क्षमता की कमी हो, उनके पास अपनी राय नहीं हो या वे सत्य सिद्धांतों को नहीं समझते हों तो अक्सर होता यह है कि उस व्यक्ति के किसी एक विरूपित विचार और दृष्टिकोण के कारण उनकी विचार शृंखलाएँ पूरी तरह से थम जाएँगी या सामान्य चर्चा में व्यवधान पड़ेगा और वह बाधित हो जाएगी। और अंतिम नतीजा क्या होगा? इस तरह से काफी बहस और विचार-विमर्श करने के बाद लोगों को पता चलता है कि उस व्यक्ति द्वारा पेश किया गया नजरिया सही मार्ग से भटक गया है, वह न तो वस्तुनिष्ठ है और न ही व्यावहारिक और इसके अतिरिक्त यह बहुत ही सनकी भी है और मुद्दों पर विचार करने का उसका ढंग भी बेहद अजीब है। जब सामान्य लोग बातचीत करते हैं तब बातचीत और जीवंत हो उठती है, सभी लोग संबंधित मुद्दों पर और स्पष्ट हो जाते हैं और वे जितनी ज्यादा गपशप करते हैं, विषय उतना ही आगे बढ़ता जाता है। लेकिन अगर यह व्यक्ति एक शब्द भी बीच में बोल देता है तो बातचीत विषय से हट जाती है। दूसरे लोग अवाक रह जाते हैं, उन्हें लगता है कि इस व्यक्ति के शब्द बहुत ही अजीब हैं और वे उनका उत्तर नहीं दे पाते हैं। इस प्रकार चर्चा का विषय बाधित हो जाता है। वैसे तो इस प्रकार के व्यक्ति के विचार और नजरिए “अनोखे” होते हैं, फिर भी वे सामान्य सोच वाले लोगों द्वारा पेश किए गए नजरियों से लगातार भिन्न होते हैं। उनके विचार और नजरिए वे नहीं होते हैं जो सामान्य मानवता के होने चाहिए और वे सामान्य मानवता की सोच के दायरे में नहीं आते हैं, इसलिए वे जो चीजें कहते हैं वे दूसरों को अजीब या यहाँ तक कि अकल्पनीय भी लगती हैं और उनके समाधानों और मार्गों से लोगों को कोई मदद नहीं मिलती है और ऊपर से उनमें गड़बड़ी करने, विघ्न-बाधा डालने, नष्ट करने और तोड़फोड़ करने की प्रकृति होती है। अगर वे चुप रहते हैं और सभी की विचार शृंखलाएँ कुछ हद तक स्पष्ट रहती हैं तो यह ठीक है, लेकिन जैसे ही वे बीच में टोक देते हैं और अपनी राय बताते हैं या कोई सुझाव देते हैं, तो सभी लोग इसे सुनकर अस्त-व्यस्त हो जाते हैं, इससे चर्चा विषय से भटक जाती है और अच्छे नतीजे हासिल करना मुश्किल हो जाता है। लेकिन सचमुच अच्छी काबिलियत वाला व्यक्ति मुद्दे के मूल को सटीकता से पहचान सकता है और वह उसके महत्वपूर्ण बिंदु पर पकड़ बना सकता है और समस्या को हल करने के लिए सही मार्ग बता सकता है। कम से कम वह कुछ सार्थक और मूल्यवान सुझाव तो दे ही सकता है जो दूसरों की विचार शृंखलाओं पर बने होते हैं। अगर वह कोई सुझाव पेश करता है और सभी को वह उपयुक्त लगता है और वे उसे स्वीकारने को तैयार हैं तो फिर इसका मतलब है कि इस अच्छी काबिलियत वाले व्यक्ति द्वारा पेश किया गया सुझाव महत्वपूर्ण बिंदु पर जा लगा है, क्योंकि यह व्यक्ति चीजों की असलियत जानने में समर्थ है। अगर वह कुछ नहीं बोलता है तो हो सकता है कि सभी लोग किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचे बिना तीन दिनों तक चर्चा करते रहें। देखो, इन दोनों प्रकार के लोगों के ही अपने-अपने अनोखे विचार होते हैं जो दूसरे लोगों से भिन्न होते हैं, लेकिन अच्छी काबिलियत वाले व्यक्ति द्वारा पेश किए गए नजरिए दूसरों को किसी मुद्दे के सार की असलियत जानने में मदद कर सकते हैं और जब लोग खो जाते हैं तब उन्हें सही दिशा और अभ्यास का मार्ग ढूँढ़ने में सहायता कर सकते हैं। विरूपित समझ वाला व्यक्ति भिन्न होता है। उसके नजरिए और सोचने का विरूपित ढंग अक्सर उस समय ध्वस्त करने और बाधा डालने वाले प्रभाव डालते हैं जब लोग मामलों पर चर्चा कर रहे होते हैं या सामान्य बातचीत कर रहे होते हैं। इसलिए, अगर पशु से पुनर्जन्म लिया हुआ विरूपित समझ वाला व्यक्ति किसी भी कलीसिया में या कार्य के किसी भी पहलू में शामिल है तो वह विघ्न-बाधाएँ और गड़बड़ियाँ उत्पन्न कर सकता है और हर कोई उससे पूरी तरह से तंग आ जाएगा और मन में सोचेगा, “बस जल्दी करो और उसे बाहर निकाल दो—वह बहुत ही ज्यादा परेशान करने वाला व्यक्ति है! वह हर रोज बेतुकी बकवास करता है और फिर भी खुद को बहुत विद्वान समझता है, जबकि वास्तव में वह जो कहता है वे सब भ्रांतियाँ होती हैं।” शुरू में हो सकता है कि कुछ लोग उसे पूजें, लेकिन समय के साथ वे उसकी असलियत जान जाएँगे और कहेंगे, “इस व्यक्ति में कोई गहन अंतर्दृष्टि नहीं है। वह दिन भर दिखावटी ढंग से बुद्धिमान व्यक्ति होने का बस दिखावा कर रहा है। दरअसल वह जो नजरिए और विचार पेश करता है, वे सरासर बेतुके होते हैं और उनका उन मुद्दों से कोई लेना-देना ही नहीं होता है जिन्हें सँभाला जाना चाहिए।” उन्हें यह व्यक्ति चिढ़ पैदा करने वाला लगने लगेगा और वे उससे विकर्षित होते चले जाएँगे। इसलिए, अगर इस प्रकार का व्यक्ति किसी बहुत ही तकनीकी या पेशेवर कार्य के लिए जिम्मेदार है या अपना कर्तव्य करते हुए कोई महत्वपूर्ण कार्य स्वीकारता है तो वह जल्द ही दूसरों में चिढ़ उकसाएगा क्योंकि वह जो नजरिए और माँगें पेश करता है वे हमेशा लोगों को हैरतअंगेज लगती हैं और कार्य करने के उचित तरीके के बारे में निश्चित नहीं होने देतीं। अगर वह सिर्फ एक साधारण अनुयायी है, सिर्फ निर्देशों और आदेशों का पालन कर रहा है तो वह जो चीजें करेगा उनमें कुछ विचलन बार-बार दिखाई देंगे। अगुआओं, कार्यकर्ताओं और उसके आस-पास के लोगों को लगातार उस पर अनुवर्ती कार्रवाई करनी होगी और उसका पर्यवेक्षण करना होगा। जैसे ही वे उससे अपनी नजरें हटाएँगे, वह गलतियाँ करेगा और दूसरों को उसकी त्रुटियाँ ठीक करने में, उनका उपाय करने में और उसकी गड़बड़ियाँ साफ करने में हमेशा उसकी मदद करनी पड़ेगी। अंत में जब सब देखेंगे कि इस प्रकार का व्यक्ति मदद से परे है तब वे कहेंगे, “वह हमेशा यहाँ विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करता रहता है और किसी को भी शांति नहीं मिल पाती है। क्या उसे बाहर नहीं निकाला जा सकता? वह जहाँ भी जाना चाहता है उसे जाने दो!” सबकी यही प्रतिक्रिया होगी। शुरू में वे उसके साथ धैर्य रखेंगे, सोचेंगे, “हम सब भाई-बहन हैं, हममें से किसी का भी आध्यात्मिक कद बड़ा नहीं है और सत्य की हमारी समझ उथली है—आओ, एक-दूसरे को सहारा दें और मदद करें।” लेकिन लंबे समय तक उसके संपर्क में रहने के दौरान वे उसकी असलियत जान लेंगे। यह पता चलता है कि उसका मुद्दा छोटा आध्यात्मिक कद होने का मुद्दा नहीं है—उसकी काबिलियत और समझ में समस्या है। ऐसा नहीं है कि उसकी समझ उथली है या उसकी सोच बचकानी है; बल्कि उसकी समझ विरूपित है। चीजों को देखने का उसका तरीका और उसके विचार और नजरिए सामान्य सोच के दायरे के बाहर हैं और उसकी राय अक्सर बाकी सभी से भिन्न होती है। दूसरे लोग जो कहते हैं वह उन्हें स्वीकारने से इनकार कर देता है, भले ही वह सही ही हो और वह किसी भी तरह का स्पष्टीकरण नहीं सुनता। एक बार जब वह अपने खुद के विचार पर डट जाता है तो फिर जंगली घोड़े भी उसे उससे पीछे नहीं खींच सकते हैं। कहने का मतलब है कि वह अच्छे-बुरे में भेद नहीं कर सकता। जिन चीजों को वह अपने विचारों और नजरिए में अच्छा मानता है, वे सामान्य मानवता की सोच वाले लोगों के लिए और कुछ नहीं बल्कि विरूपित चीजें होती हैं—ऐसी चीजें जिन्हें खुलेआम पेश नहीं किया जा सकता। उसके नजरिए सिर्फ बचकाने या नीच और बेकार ही नहीं होते; वे ऐसे विचार या नजरिए होते ही नहीं हैं जो सामान्य मानवता की सोच से उत्पन्न होते हों। इसलिए इस प्रकार का व्यक्ति ज्यादातर लोगों के साथ मिलजुलकर नहीं रह सकता। ऐसा किसी भ्रष्ट स्वभाव या जीवनयापन की आदतों में अंतर या भाषा-संबंधी बाधाओं के कारण नहीं होता है और यह निश्चित रूप से उसके द्वारा कुछ बुरे कर्म करने या विचित्र व्यवहार में शामिल होने के कारण नहीं होता है। यह मुख्य रूप से उन विशेषताओं के कारण होता है जो उसकी मानवता प्रदर्शित करती है—विरूपित समझ, सुन्नता, भ्रमित होना और बेवकूफी—जिससे उसके लिए ज्यादातर लोगों के साथ मिलजुलकर रहना असंभव हो जाता है। यकीनन, बुरे लोग और मसीह-विरोधी भी ज्यादातर लोगों के साथ मिलजुलकर नहीं रह सकते हैं, लेकिन वैसे तो उनमें भी यही लक्षण होता है, फिर भी दूसरों के साथ मिलजुलकर रहने में उनकी असमर्थता का सार या परिघटना पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों से भिन्न होती है। बुरे लोग और मसीह-विरोधी दूसरों के साथ इसलिए मिल-जुलकर नहीं रह सकते क्योंकि वे सार में दानव होते हैं, जबकि पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में सामान्य मानवता की सोच, बुद्धिमत्ता और साथ ही सामान्य मानवता के जमीर और विवेक की पूरी तरह से कमी होती है, इसलिए सामान्य लोगों के लिए उनसे बातचीत करना बहुत मुश्किल होता है—वे सिर्फ मामूली, घरेलू मामलों के बारे में ही बात कर सकते हैं जिनमें सिद्धांत शामिल नहीं होते हैं जिससे बातचीत का दायरा बहुत सीमित रह जाता है। पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग आखिर दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग नहीं होते, वे उस किस्म के लोगों से भिन्न होते हैं, और वे सजीव प्राणियों की एक श्रेणी से भी संबंधित होते हैं। इसलिए, जब तक प्रमुख सिद्धांत शामिल नहीं होते हैं तब तक वे अपने दैनिक जीवन में या अपने कर्तव्य करते हुए दूसरों से जैसे-तैसे करके जुड़ सकते हैं, संप्रेषण कर सकते हैं और मेलजोल रख सकते हैं। हालाँकि, जैसे ही प्रमुख सत्य सिद्धांत या कौन-सा मार्ग अपनाना है इस बारे में चुनाव शामिल होते हैं, इस प्रकार का व्यक्ति ज्यादातर लोगों के साथ पूरी तरह से बेमेल हो जाता है और अब उनके साथ और मेलजोल नहीं रख सकता है। उदाहरण के लिए, तुम इस प्रकार के व्यक्ति से रोजमर्रा के जीवन के विषयों पर बातचीत करते हो—तुम्हें कौन-से खाद्य पदार्थ और पकवान पसंद हैं, उन्हें अच्छी तरह से कैसे पकाया जाए, अपने घर के शहर के बारे में बातें वगैरह-वगैरह। तुम जितनी ज्यादा बात करते हो, तुम्हारे पास कहने के लिए उतनी ही ज्यादा चीजें होती हैं और बातचीत उतनी ही गर्माहट भरी होती जाती है। क्या इसका मतलब यह है कि तुम दोनों एक-दूसरे के अनुकूल हो? क्या इसका मतलब यह है कि तुम एक ही श्रेणी से संबंधित हो? (नहीं।) तुम सिर्फ इस तरह की बातचीत के आधार पर उन चीजों को नहीं पहचान सकते। लेकिन जब तुम इन विषयों पर जैसे कि तुम परमेश्वर में क्यों विश्वास रखते हो और परमेश्वर में विश्वास पर तुम्हारे क्या नजरिए हैं और ऐसे विषयों पर बात करते हो जो विचारों और नजरियों, सत्य सिद्धांतों, जीवन के प्रति दृष्टिकोणों, मूल्यों, लोगों द्वारा अपनाए जाने वाले मार्गों, लोगों के लक्ष्यों वगैरह-वगैरह से जुड़े होते हैं, तब तुम्हारे विचार, नजरिए और तुम्हारे सोचने के ढंग उत्तरोत्तर भिन्न दिशाओं में चले जाते हैं, एक ही रास्ते पर नहीं रहते हैं और बातचीत थम जाती है। और ऐसा क्यों होता है? क्योंकि उनकी समझ विरूपित होती है। जब तुम उन्हें पहली बार बोलते हुए सुनते हो तब तुम्हें लगता है कि वे बहुत चतुर हैं, लेकिन समय के साथ तुम्हें पता चलता है कि वे सिर्फ शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलते हैं और बहुत धृष्ट हैं। उनके प्रति तुम्हारी भावनाएँ बदल जाती हैं, अब ये उतनी गर्माहट भरी नहीं रहतीं, बाधाएँ खड़ी हो जाती हैं और तुममें से प्रत्येक जिन श्रेणियों से संबंधित है, उनका भेद स्पष्ट हो जाता है। देखो, जब तुम लोग पारिवारिक जीवन या अपने व्यक्तिगत अतीत पर चर्चा करते हो या रोजमर्रा के जीवन के दायरे के भीतर विषयों के बारे में बातचीत करते हो, जैसे कि खाना-पीना, फुर्सत, रुचियाँ और शौक, तब भी तुम बातचीत कर सकते हो। लेकिन जैसे ही बातचीत में विचारों और नजरियों, सत्य सिद्धांतों, जीवन के प्रति दृष्टिकोणों, मूल्यों, जीवन मार्गों या परमेश्वर और कर्तव्य के प्रति रवैयों का जिक्र होता है तो वह थम जाती है। उनके प्रति तुम्हारा नजरिया बदल जाता है और तुम्हारे प्रति उनका नजरिया भी बदल जाता है। तुम अपने दिल में उनके प्रति कुछ चिढ महसूस करने लगते हो और उनके दिल में तुम्हारे प्रति बाधाएँ खड़ी होने लगती हैं। वे तुम्हें नापसंद करते हैं और तुम उन्हें नापसंद करते हो। धीरे-धीरे तुम एक-दूसरे से दूर होते चले जाते हो और अब तुम्हारे पास कोई साझा भाषा नहीं रह जाती। इस प्रकार से लोगों की विभिन्न श्रेणियों का भेद स्पष्ट हो जाता है। इसलिए, यह भेद करने के लिए कि कोई व्यक्ति किस श्रेणी से संबंधित है, यह देखना चाहिए कि उसकी समझने की क्षमता कैसी है, क्या उसमें सामान्य व्यक्ति जैसे जमीर और विवेक हैं और क्या उसमें सामान्य सोच और बुद्धिमत्ता हैं। जहाँ तक इस प्रकार के व्यक्ति का प्रश्न है जिसने पशु से पुनर्जन्म लिया है, तो हम विशिष्ट रूप से अब और उस पर संगति नहीं करेंगे। इसके बाद हम दूसरे दो प्रकार के लोगों पर संगति करना जारी रखेंगे। वह समाप्त करने के बाद हम वापस आएँगे और इन तीन प्रकारों की तुलना करेंगे। इस तुलना के जरिए इन तीन प्रकार के लोगों का भेद कैसे पहचाना जाए, यह विषय उत्तरोत्तर स्पष्ट और विशिष्ट होता जाएगा।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?