सत्य का अनुसरण कैसे करें (14) भाग एक

उत्पत्तियों के आधार पर लोगों की तीन श्रेणियाँ

दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशेषताएँ

हाल ही में हमने एक विषय पर संगति की जो लोगों की उत्पत्ति के आधार पर उनकी विभिन्न श्रेणियों में अंतर करने से संबंधित है। यह एक खास विषय है जो लोगों की जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों के और अधिक व्यापक विषय से उत्पन्न होता है। हमने इस खास विषय से संबंधित कुछ सामग्री पर संगति की—इसमें क्या शामिल था? (परमेश्वर ने लोगों को उनकी उत्पत्ति के अनुसार तीन प्रकारों में श्रेणीबद्ध किया : पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग, दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग और मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग। पहली बार, परमेश्वर ने पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की चार विशेषताओं के बारे में संगति की : पहली विशेषता यह है कि उनमें विरूपित समझ होती है; दूसरी विशेषता यह है कि वे विशेष रूप से सुन्न होते हैं; तीसरी विशेषता यह है कि वे विशेष रूप से भ्रमित होते हैं; और चौथी विशेषता यह है कि वे बेवकूफ होते हैं। दूसरी बार, परमेश्वर ने दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशेषताओं के बारे में संगति की : पहली विशेषता यह है कि वे आदतन झूठ बोलने वाले हैं; दूसरी विशेषता यह है कि वे विकृत होते हैं; और तीसरी विशेषता यह है कि वे बुरे लोग होते हैं। इस संगति का मुख्य केंद्र उनके आदतन झूठ बोलने और विकृत होने की दो अभिव्यक्तियों पर था।) आदतन झूठ बोलने वाले होने की मुख्य अभिव्यक्ति छल है। जहाँ तक विकृत होने की अभिव्यक्तियों की बात है, तो हमने उन्हें भी श्रेणीबद्ध किया—वहाँ कितनी अभिव्यक्तियाँ थीं? (वहाँ तीन अभिव्यक्तियाँ थीं। पहली अभिव्यक्ति स्वभाव से संबंधित है; यानी कुटिल होना। दूसरी अभिव्यक्ति देह की दुष्ट वासना से संबंधित है। तीसरी अभिव्यक्ति विचित्र होना है; यानी अक्सर सुनने से संबंधित और दूसरे संवेदी मतिभ्रमों का अनुभव करना और हमेशा असामान्य व्यवहार प्रदर्शित करना।) सामान्यतः इन बातों को शामिल किया गया था।

II. दूसरी विशेषता : विकृति

पिछली बार हमने दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों के विकृत पहलू की कुछ अभिव्यक्तियों पर संगति की। मैंने कलीसिया द्वारा संकलित निष्कासन संबंधी दस्तावेजों में एक व्यक्ति की अभिव्यक्तियों के बारे में पढ़ा—सभी सुनो और देखो कि क्या उसकी अभिव्यक्तियाँ उस चीज से संबंधित हैं जिस पर हमने संगति की। यह व्यक्ति खेत में सब्जियाँ उगाने के लिए जिम्मेदार था। उसकी मुख्य अभिव्यक्तियों का वर्णन इस प्रकार किया गया था : “उसकी मानवता दुर्भावनापूर्ण है और ऊपरवाले के प्रति उसका रवैया अनादरयुक्त है,” जिसके साथ कई विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ सूचीबद्ध की गई थीं। पहली अभिव्यक्ति थी : “उसने ऊपरवाले के लिए सब्जियाँ उगाने के लिए लापरवाही से जगह चुनी। बाद में पता चला कि उस जगह की जमीन नीची थी और उसमें अक्सर जलभराव होता था। वहाँ डाली गई खाद पानी से बह गई जिसके कारण उगाई गई सब्जियों का आकार बहुत छोटा था। वह जानता था कि खाद फिर से डाली जानी चाहिए, लेकिन उसने ऐसा किया ही नहीं। उसने देखा कि सब्जियाँ अच्छी तरह से नहीं उग रही हैं, लेकिन उसने कुछ भी नहीं किया—उसने जानबूझकर ऊपरवाले को खराब उगी हुई सब्जियाँ खाने के लिए दीं।” यह पहली अभिव्यक्ति थी। दूसरी अभिव्यक्ति थी : “आमतौर पर वह सिर्फ भाई-बहनों के लिए उगाई गई सब्जियों की देखभाल करता था और फिर चला जाता था। जहाँ तक ऊपरवाले के लिए उगाई गई सब्जियों की बात है, उसने उनकी देखभाल नहीं की या उनका प्रबंध नहीं किया—उसने इस मामले में दिलचस्पी नहीं ली या इस बारे में कुछ नहीं किया।” तीसरी अभिव्यक्ति थी : “वह जानता था कि सब्जियों में बहुत सारे कीड़े लग गए हैं जिन्होंने सब्जियों को काट-काटकर उनमें छेद ही छेद बना दिए हैं जो देखने में घिनौने लगते हैं और जिससे सब्जियाँ खाने लायक नहीं रही हैं, लेकिन उसने बस यूँ ही कुछ कीटनाशक छिड़क दिए, बिना यह परवाह किए कि वह असरदार है भी या नहीं। जब दूसरों ने उसे सब्जियों से कीड़े चुनकर निकालने की बात याद दिलाई, तो वह पूरी तरह से उदासीन था, सोच रहा था, ‘इसमें इतना परेशान होने की क्या बात है? मुझे बहुत सारे काम करने हैं—मैं हर रोज इन सब्जियों के इर्द-गिर्द चक्कर नहीं लगा सकता!’” तुम देखो, वह अपने दिल में यह सोचता था—यहाँ तक कि जब दूसरे लोग उसे याद दिलाते थे तब भी वह कोई कार्रवाई नहीं करता था। चौथी अभिव्यक्ति थी : “ऊपरवाले के लिए सब्जियाँ उगाने के बारे में वह अपने दिल में यह सोचता था : ‘मैं जो सब्जियाँ उगाता हूँ वे चाहे जैसी भी हों, तुम्हें बस वे ही खानी पड़ेंगी। अगर वे अच्छी निकलीं, तो तुम्हें खाने के लिए अच्छी सब्जियाँ मिलेंगी। अगर मैंने अच्छी सब्जी नहीं उगाई, तो उन्हें मत खाना। जो भी हो, मैंने ये तुम्हारे लिए उगाई हैं—तुम्हें मेरा शुक्रगुजार होना पड़ेगा!’” उसके दिल में ये दुर्भावनापूर्ण विचार थे और उसने ये विचार उन लोगों को बताए जिनके साथ वह रहता था। “जब दूसरों ने उसे यह बात याद दिलाई कि ऊपरवाले को सब्जियाँ पहुँचाते समय वह सब्जियों के सड़े पत्तों के लिए उपयोग में ली जाने वाली टोकरी का उपयोग न करे, तो उसने कहा, ‘मैं इस बारे में कोई आश्वासन नहीं दे सकता।’” तुम देखो, दूसरों ने उसे याद दिलाया और फिर भी उसने नहीं सुना। उसने जो चाहा बस वही किया। यह चौथी अभिव्यक्ति थी। पाँचवीं अभिव्यक्ति थी : “वह ऊपरवाले के लिए उगाई गई सब्जियों के साथ अपने दिल में बिना किसी जागरूकता के, बिना रत्ती भर पछतावे के इस तरह पेश आया। जब भी किसी ने उसे याद दिलाया, उसे और ज्यादा सचेत रहने के लिए कहा, वह प्रतिरोधी और विमुख हो गया। जो कोई भी उसे सुझाव देता—उस व्यक्ति से उसे नफरत हो जाती।” अगुआओं और कार्यकर्ताओं ने कुल पाँच अभिव्यक्तियाँ सारांशित कीं। उन्होंने इस व्यक्ति की सामान्य अभिव्यक्तियों के साथ-साथ सत्य के प्रति उसके रवैये और कर्तव्य के प्रति उसके रवैये का सारांश भी प्रस्तुत किया और उन्होंने विशिष्ट उदाहरण भी सूचीबद्ध किए। यह सारांश काफी अच्छा था। इसे सुनने के बाद तुम लोगों को कैसा लग रहा है? क्या जिस व्यक्ति में ये अभिव्यक्तियाँ हैं, उसमें अच्छी मानवता है? (नहीं।) यह कितना बुरा था? क्या इस व्यक्ति की अभिव्यक्तियाँ दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की उन अभिव्यक्तियों से मेल खाती थीं जिनके बारे में हमने संगति की? (हाँ।) वे किस अभिव्यक्ति से मेल खाती थीं? (ऐसे लोगों के बुरे होने की अभिव्यक्ति से।) बुरा होने के अलावा क्या उसके पास विकृत होने की कोई अभिव्यक्ति थी जो दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशेषता है? (हाँ।) यह कैसे स्पष्ट था? (आम लोग ऊपरवाले के लिए सब्जियाँ उगाते समय अच्छी जमीन चुनने को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन उसने भाई-बहनों को खुश करने का चुनाव किया—उसने सिर्फ भाई-बहनों के लिए उगाई गई सब्जियों की देखभाल की। ऊपरवाले के लिए उगाई गई सब्जियों के लिए उसने खराब जमीन चुनी, उसने उनकी देखभाल नहीं की और न ही वह कीड़ों से निपटा और उसने ऊपरवाले को खाने के लिए हमेशा खराब उगी हुई सब्जियाँ दीं। ऊपरवाले के प्रति, परमेश्वर के प्रति उसका रवैया दुश्मनी वाला था।) ऊपरवाले के प्रति उसका रवैया दुश्मनी वाला क्यों था? क्या ऊपरवाले ने उसे नाराज किया था? (नहीं। उसका रवैया उसके प्रकृति सार से निर्धारित था—वह परमेश्वर से नफरत करता था और सकारात्मक चीजों से नफरत करता था।) मैं वास्तव में इस व्यक्ति को बिल्कुल नहीं जानता था—मेरा उससे कभी कोई वास्ता नहीं पड़ा। फिर वह अपने दिल में इतनी गहरी नफरत कैसे रख पाया था? यह उसकी प्रकृति की समस्या है। एक बात यह है कि यह बुरी थी; दूसरी बात यह है कि यह विकृत थी, है ना? क्या यह वैसी ही नहीं है जैसी बड़े लाल अजगर की है? (हाँ।) वह जिस तरीके से परमेश्वर और सकारात्मक चीजों से पेश आता था, उसमें उसके दिल में एक तरह की नफरत झलकती थी। अगर तुम उससे पूछते कि क्या चल रहा है, तो वह खुद भी इसे स्पष्ट रूप से नहीं बता पाता—उसे बस नफरत महसूस होती थी। उसे विशेष रूप से परमेश्वर और सत्य से नफरत थी, उसे विशेष रूप से सकारात्मक चीजों से नफरत थी। क्या यह विकृत होना नहीं है? (हाँ।) इस तरह का व्यक्ति दानव होता है। अगर तुम उससे पूछते, “वह कौन है जिसमें तुम विश्वास रखते हो?” तो वह निश्चित रूप से कहता कि वह परमेश्वर में विश्वास रखता है। वह परमेश्वर में विश्वास रखता है और फिर भी वह परमेश्वर से नफरत करता है—इससे दानव की मानसिकता प्रकट होती है। यह विकृत होना है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? पहली बात, मैं इस व्यक्ति को बिल्कुल भी नहीं जानता था और मैंने कभी उसकी काट-छाँट नहीं की थी, लेकिन फिर भी वह मेरे प्रति इतनी गहरी नफरत रखता था—यह विकृत होना है। दूसरी बात, ये सब्जियाँ उगाने की व्यवस्था उसके लिए भाई-बहनों ने की थी। अगर वह इसे करने का इच्छुक नहीं था तो वह यह मुद्दा उठा सकता था, लेकिन इसके बजाय उसने अपना गुस्सा सब्जियों के खेत पर निकाला। सब्जियाँ लगाने के बाद उसने उनकी उचित रूप से देखभाल नहीं की और ऊपरवाले को खाने के लिए खराब उगी हुई सब्जियाँ दीं। तीसरी बात, जब भाई-बहनों के लिए सब्जियाँ उगाने की बात आई तो वह काफी इच्छुक था और उसने उनकी अच्छी देखभाल की, लेकिन जब ऊपरवाले के लिए सब्जियाँ उगाने की बात आई तो अपने दिल में वह अनिच्छुक था। वह विशेष रूप से नफरत से भरा हुआ था और यह स्पष्ट नहीं है कि क्यों—किसी ने उसे नाराज नहीं किया था, लेकिन फिर भी वह ऊपरवाले और परमेश्वर से इस तरीके से पेश आया। क्या यह विकृत होना नहीं है? (हाँ।) यह विकृत प्रेरक शक्ति बहुत बड़ी है! एक बात यह है कि यह बुरी है; दूसरी बात यह है कि यह विकृति है—यह दानव की प्रकृति है। चाहे परमेश्वर का घर दानवों से कितने भी सहनशील और धीरज भरे तरीके से प्रेम से पेश आए, चाहे परमेश्वर का घर कैसे भी उन्हें उद्धार पाने के मौके दे, वे ये बातें बिल्कुल भी नहीं समझते हैं। अपने दिलों में वे बस ऐसे ही परमेश्वर और परमेश्वर के घर से नफरत करते हैं। इसका कारण केवल यह है कि दानव की प्रकृति ही परमेश्वर से नफरत करना और सकारात्मक चीजों से नफरत करना है। कोई भी स्पष्ट रूप से नहीं कह सकता कि इसका क्या कारण है—दानव बस परमेश्वर और सकारात्मक चीजों के प्रति बेवजह नफरत रखते हैं। इसे ही विकृत होना कहते हैं। वह हर रोज क्या सोचता था? “मैं जो सब्जियाँ उगाता हूँ वे चाहे जैसी भी हों, तुम्हें बस वे ही खानी पड़ेंगी। अगर वे अच्छी निकलीं, तो तुम्हें खाने के लिए अच्छी सब्जियाँ मिलेंगी। अगर मैंने अच्छी सब्जी नहीं उगाई, तो उन्हें मत खाना। जो भी हो, मैंने ये तुम्हारे लिए उगाई हैं—तुम्हें मेरा शुक्रगुजार होना पड़ेगा!” क्या उसके दिल में चीजें विकृत नहीं थीं? वह जो सोच रहा था, वह सब कुछ दुष्ट और कुटिल था। जमीर और विवेक वाले लोगों को लगता है कि उसके विचार समझ से बाहर हैं—वे किसी भी तरह से यह समझ ही नहीं सकते हैं कि वह इस तरीके से क्यों सोचता है। दानव ठीक इसी तरीके से कार्य करते हैं। वह अपने दिल में जो सोचता था और जो इरादा रखता था, वे सब अंधकारमय और दुष्ट चीजें थीं। क्या इस तरह का कोई व्यक्ति—जो दानव है—सत्य स्वीकार सकता है? (नहीं।) उसमें तो मूलभूत मानवीय नैतिक मूल्य या जमीर और विवेक तक नहीं थे। जब परमेश्वर का जिक्र किया जाता था वह गुस्सा हो जाता था और उसे नफरत महसूस होती थी। जब दूसरे उससे कोई और काम करने के लिए कहते थे तब वह उतना प्रतिरोधी नहीं होता था; जब ऊपरवाले के लिए सब्जियाँ उगाने की बात आती थी, सिर्फ तब वह विशेष रूप से प्रतिरोधी होता था। यह बुरा होना है, यह विकृत होना है। तुम उससे पूछ सकते हो कि वह इतना प्रतिरोधी क्यों है—यह दिल का मामला है, और हो सकता है कि वह स्पष्ट रूप से यह न बता पाए कि आखिर इसकी जड़ कहाँ है। क्या तुम लोग स्पष्ट रूप से देख पा रहे हो कि इस समस्या की जड़ कहाँ है? वह परमेश्वर से ऐसे क्यों पेश आया? ज्यादातर लोगों को यह पूरी तरह से चकरा देने वाली बात लगेगी : “परमेश्वर में विश्वास रखने वाला व्यक्ति परमेश्वर से ऐसे कैसे पेश आ सकता है? क्या वह अविश्वासी नहीं है?” अब सत्य पर संगति के जरिये क्या तुम लोग विभिन्न प्रकार के लोगों के सार और उत्पत्ति को थोड़ा-सा और स्पष्ट रूप से देख पा रहे हो? (हाँ।) अब तुम्हें थोड़ा-सा और स्पष्ट रूप से देखने में समर्थ होना चाहिए—ये ठीक उसी तरह के लोग हैं जो दानवों से पुनर्जन्म लेते हैं और उनकी प्रकृति परमेश्वर से नफरत करना है।

मुझे बताओ, क्या दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग बदल सकते हैं? (वे नहीं बदल सकते।) वे ठीक बड़े लाल अजगर की तरह हैं। वे भी सही शब्द कह सकते हैं, जमीर और नैतिकता से मेल खाने वाले शब्द कह सकते हैं—लेकिन वे अपनी कही हुई चीजों को बिल्कुल भी अमल में नहीं ला सकते। वे बहुत-से सुखद शब्द बोल सकते हैं, लेकिन जब उनके लिए वास्तविक चीजें करने का समय आता है, तब वे एक भी चीज नहीं कर सकते। वे उन्हें क्यों नहीं कर सकते? क्योंकि वे भीतर से दानव हैं। अगर उन्होंने सकारात्मक चीजें और ऐसी चीजें कीं जो मानव जमीर के मानक के अनुरूप हैं, तो वे अंदर से बेचैन और दुखी महसूस करेंगे। सिर्फ बुरे कर्म करते समय, दानवों द्वारा की जाने वाली चीजें करते समय और वह सोचते समय जो दानव सोचते हैं, वे अंदर से आराम और आनंदित महसूस करते हैं। यही इस तरह के व्यक्ति का असली चेहरा है। अगर तुम उनसे बेकार में गपशप करो, दैहिक जीवन के मामलों के बारे में बात करो या यहाँ तक कि मौजूदा घटनाओं और राजनीति पर चर्चा करो, तो वे शांत बैठने में समर्थ हैं। लेकिन जैसे ही संगति की सामग्री सकारात्मक चीजों, सत्य, परमेश्वर, परमेश्वर की पहचान, परमेश्वर के सार, परमेश्वर के कार्य, मनुष्य के लिए परमेश्वर के इरादों या मनुष्य के लिए परमेश्वर की अपेक्षाओं का जिक्र करती है, वे अपने दिलों में विमुख और प्रतिरोधी हो जाते हैं—वे इसे नहीं सुनना चाहते। वे अपने कान और गाल खुजलाने लगते हैं, मानो वे कीलों और सुइयों पर बैठे हों। उनके दिलों में घबराहट और बेचैनी की अनुभूतियाँ रेंगने लगती हैं, मानो उनके भीतर खर-पतवार बेरोकटोक उग रही हो। उन्हें लगता है कि एक पल भी और रुकना यातना झेलने जैसा है और यहाँ तक कि उनमें से कुछ तो फौरन उठ खड़े होंगे और वहाँ से चले जाएँगे। भले ही कुछ लोग दिखावे की खातिर बहुत विनम्रता से वहाँ बैठे भी रहें और वहाँ से न भी जाएँ, लेकिन उनका दिमाग पहले से ही दूर भटक रहा होता है—उनके विचार बहुत पहले ही उड़कर बादलों के पार जा चुके होते हैं और तुम जो कह रहे हो वे उसे सुन ही नहीं रहे होते हैं। उनमें ये अभिव्यक्तियाँ क्यों हैं? क्योंकि अपने दिलों में वे परमेश्वर और सकारात्मक चीजों से घृणा करते हैं। उन्हें सत्य में कोई दिलचस्पी नहीं है; वे इसे नहीं अपना सकते और इसे स्वीकारने के इच्छुक नहीं हैं। जैसे ही सभा के दौरान सत्य पर संगति की जाती है, वे वहाँ से चले जाने के लिए तरह-तरह के बहाने सोचने लगते हैं, कहते हैं, “मुझे किसी चीज को सँभालने के लिए जाना पड़ेगा,” या “मुझे किसी को वापस कॉल करनी है।” वे भागने के लिए बस कोई भी बहाना लपक लेना चाहते हैं। ऐसे लोग स्पष्ट रूप से विकृत होते हैं। अगर कोई यह बात मान लेता है कि वह परमेश्वर में विश्वास रखने वाला और उसका अनुसरण करने वाला व्यक्ति है, तो उसमें ये अभिव्यक्तियाँ नहीं होनी चाहिए। लेकिन जब सकारात्मक चीजों से जुड़े या परमेश्वर से जुड़े मामलों की बात आती है, तो दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में ये अभिव्यक्तियाँ होती हैं—यह उनके अपने नियंत्रण से परे है और उनके प्रकृति सार का मामला है। यह उनकी उत्पत्ति से तय होता है और कोई भी इस तथ्य को बदल नहीं सकता। जब तुम सत्य पर, सकारात्मक चीजों पर, परमेश्वर के इरादों पर और परमेश्वर के वचनों पर संगति करते हो, तब उन्हें ऐसा लगता है जैसे तुम उनका न्याय कर रहे हो, जैसे इससे उनका जीवन खत्म होने वाला है। यह परमेश्वर, सत्य और सकारात्मक चीजों से पेश आने के उनके तरीके की वास्तविक आंतरिक स्थिति है। यकीनन यह भी ऐसे लोगों के दुष्ट सार की एक तरह की अभिव्यक्ति है। क्योंकि वे सकारात्मक चीजों, सत्य और परमेश्वर से घृणा करते हैं और उनसे नफरत करते हैं, इसलिए वे हर रोज अपनी अंदरूनी दुनियाओं में जिस बारे में सोचते हैं और चिंतन करते हैं उसका सकारात्मक चीजों, सत्य या परमेश्वर के कार्य से कोई लेना-देना नहीं होता है। अपने दिलों में वे जिस बारे में भी सोचते हैं वह सब कुछ विकृत चीजों से संबंधित है। वे इस बारे में सोचते हैं कि कैसे अपना दिखावा करना है ताकि लोगों के बीच उनका रुतबा और उनकी प्रतिष्ठा बन सके, कैसे कार्य करना है ताकि लोगों को गुमराह किया जा सके, रुतबा हासिल किया जा सके और ज्यादा लोगों को उन्हें स्वीकारने और उनका सम्मान करने के लिए मनाया जा सके, कैसे कार्य करना है ताकि लोगों के दिल जीते जा सकें और उनकी स्वीकृति हासिल की जा सके और कैसे परमेश्वर के घर या हर स्तर पर अगुआओं से मान्यता और पदोन्नतियाँ अर्जित की जाएँ। वे जिस बारे में भी सोचते हैं और वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें होड़ करना, लड़ना, छीन लेना, धोखा देना, षड्यंत्र करना, साजिशें रचना, उकसाना, बहलाना, नियंत्रित करना और गुमराह करना शामिल है, है ना? (हाँ।) वे इन चीजों को करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं—वे कोई भी कष्ट सहने को तैयार रहते हैं। अपने कष्ट सहने की पूरी प्रक्रिया के दौरान वे इस बारे में योजनाएँ बना रहे होते हैं और षड्यंत्र कर रहे होते हैं कि क्या बुरा कर्म करना है, किसके खिलाफ जोड़-भाग करना है और कौन-से लक्ष्य हासिल करने हैं। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें रणनीति होती है, उसमें विशिष्ट इरादा होता है। बाहर से वे खुलेआम ऐसी बातें नहीं कहते हैं जो सत्य के खिलाफ जाती हैं और न ही वे खुलेआम ऐसी चीजें करते हैं जो कलीसिया के कार्य में गड़बड़ करती हैं या उसमें बाधा डालती हैं और इससे भी बढ़कर यह कि वे खुलेआम परमेश्वर की आलोचना नहीं करते हैं, उस पर हमला नहीं करते हैं या उसकी ईश-निंदा नहीं करते हैं। वे ये स्पष्ट बुरे कर्म नहीं करते हैं। लेकिन अपनी अंदरूनी दुनियाओं में वे कभी भी सत्य या सकारात्मक चीजों से संबंधित किसी भी चीज के बारे में नहीं सोचते हैं और यहाँ तक कि कभी भी मानवीय जमीर और विवेक, या नैतिकता से संबंधित किसी भी चीज पर विचार नहीं करते हैं। तो ऐसा क्या है जिस पर वे जरूर विचार करते हैं? उनके मन पूरी तरह से मंसूबे बनाने, चालें चलने, जोड़-भाग करने, मिलीभगत करने और साजिशें रचने में फँसे होते हैं। इसलिए भले ही तुम उन्हें बाहर से खुलेआम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हुए न देखो या उन्हें परमेश्वर के खिलाफ शिकायत के, परमेश्वर के प्रति शक के, परमेश्वर की आलोचना के या यहाँ तक कि परमेश्वर के खिलाफ ईश-निंदा के शब्द बोलते न सुनो, तो भी अपने दिलों में वे परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के कार्य से संबंधित हर चीज के प्रति तिरस्कार, घिन और अनादर के रवैये से भरे होते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर क्या कहता है, परमेश्वर की लोगों से क्या अपेक्षाएँ हैं, परमेश्वर के इरादे क्या हैं या परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले विभिन्न प्रकार के कार्यों के पीछे क्या सिद्धांत हैं, वे कभी भी उन पर ध्यान नहीं देते हैं या उन्हें स्वीकार नहीं करते हैं—इन लोगों के भीतर ये सकारात्मक चीजें ग्रहण करने के लिए कोई पात्र ही नहीं है। वैसे तो तुम्हें वे इन सकारात्मक चीजों का खुलेआम प्रतिरोध या निंदा करते दिखाई नहीं देंगे, लेकिन अपने दिलों की गहराइयों के परिप्रेक्ष्य से वे उनसे घृणा करते हैं और उनसे नफरत करते हैं। जब वे धर्मोपदेश सुनते हैं तब वे इस बात पर विचार नहीं कर रहे होते हैं कि सत्य कैसे स्वीकारना है और सत्य का अभ्यास कैसे करना है, बल्कि वे इस बात पर विचार कर रहे होते हैं कि वे जो ताजा प्रकाश और वाक्यांश सुनते हैं, उन्हें संक्षेप में कैसे प्रस्तुत करना है और उन्हें दूसरों के साथ साझा करने के लिए अपने शब्दों में कैसे बदलना है ताकि लोग उनका सम्मान करें और उन्हें पूजें। वे मन में सोचते हैं, “अगर फिर मैं इन शब्दों का प्रचार उन लोगों में करूँ जो अभी-अभी कलीसिया में शामिल हुए हैं तो मैं लोगों की और भी ज्यादा श्रद्धा और पूजा प्राप्त कर पाऊँगा और लोगों के बीच मेरा रुतबा और भी ऊँचा हो जाएगा। यह रुतबा इस बात पर आधारित होगा कि मैं कितना धर्म-सिद्धांत समझता हूँ और उस पर पकड़ बनाता हूँ और मैं कितने व्यापक रूप से इस पर पकड़ बनाता हूँ।” भले ही वे वहाँ बैठकर धर्मोपदेश सुनें—यहाँ तक कि बहुत ध्यान से और लगन से सुनें और इसमें बहुत मेहनत करें—तो भी उनका रवैया सकारात्मक नहीं होता है और उनका लक्ष्य शुद्ध नहीं होता है। वे सत्य स्वीकारने के रवैये से नहीं सुनते हैं, बल्कि इस पर ऐसे विचार करते हैं मानो वे धर्मशास्त्र का अध्ययन कर रहे हों, वे धर्मोपदेशों में कही गई बातों की तुलना बाइबल से करते हैं। वे परमेश्वर के वचन स्वीकार नहीं करते हैं और उनसे अपनी तुलना नहीं करते हैं, न ही वे अपनी विभिन्न समस्याओं को समझने और उनसे समाधान का मार्ग और अभ्यास के लिए सिद्धांत ढूँढ़ने का प्रयास करते हैं जिससे वे खुद को जानना शुरू कर सकें, सच्चा पश्चात्ताप उत्पन्न कर सकें, अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ सकें, उस तरीके से कार्य कर सकें और व्यवहार कर सकें जो सत्य सिद्धांतों के अनुरूप है और परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर सकें—यह उनका लक्ष्य बिल्कुल नहीं होता है। उनका क्या लक्ष्य है? लक्ष्य है खुद को ज्यादा धर्म-सिद्धांतों से लैस करना ताकि वे अपना प्रदर्शन और दिखावा कर सकें और लोगों को उनका सम्मान करने और उन्हें पूजने के लिए मना सकें। यह पहला लक्ष्य है। उनका दूसरा लक्ष्य है आशीषें प्राप्त करने का सबसे सरल मार्ग ढूँढ़ना। धर्मोपदेश सुनने और यह पुष्टि करने के बाद कि यही सच्चा मार्ग है, वे विचार करना शुरू कर देते हैं कि उनके आशीष प्राप्त करने की कितनी उम्मीद है, उनके उद्धार प्राप्त करने की कितनी उम्मीद है। फिर वे ठान लेते हैं कि वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों का और परमेश्वर के घर का धोखे से भरोसा हासिल करने के लिए कष्ट सहने और कीमत चुकाने के तरीके का उपयोग करेंगे और परमेश्वर को वे कष्ट दिखाएँगे जिन्हें वे सहते हैं और वह कीमत दिखाएँगे जिसे वे चुकाते हैं। वे सोचते हैं कि वे इस तरीके से परमेश्वर में विश्वास रखकर महान आशीष और एक अद्भुत गंतव्य प्राप्त कर सकते हैं। तुम देखो, धर्मोपदेशों के प्रति और सत्य के हर पहलू के प्रति उनका रवैया सीधे-सीधे इसे स्वीकारना और फिर इसका अभ्यास करना और अनुभव करना नहीं है—बल्कि उनकी गुप्त योजनाएँ और षड्यंत्र होते हैं। वे हमेशा अपने मन को और बयानबाजी के शस्त्रागार को लैस करने के लिए धर्मोपदेशों और संगति से खास वाक्यांशों या श्रेष्ठ सुविचारों का उपयोग करने की उम्मीद करते रहते हैं ताकि वे भाई-बहनों को गुमराह कर सकें, सभी को उनकी पूजा करने के लिए मना सकें, खुद को लोगों के बीच प्रतिष्ठा हासिल करने दे सकें और दूसरों के उच्च सम्मान का आनंद लेने में समर्थ हो सकें। क्या धर्मोपदेश सुनते समय वे जो विचार, इरादे और रवैये रखते हैं वे यह दिखाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं कि ऐसे लोग बहुत ही विकृत होते हैं? (हाँ।) क्या कोई उनमें इस विकृत प्रेरक शक्ति को ठीक कर सकता है? अगर तुम उनसे कहो, “इस तरह से सोचना सत्य स्वीकारना नहीं है—यह वह रवैया नहीं है जो सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति को रखना चाहिए। अगर तुम इस तरह से सोचते हो, तो सत्य का तुम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा; यह तुम्हें उद्धार प्राप्त करने में सक्षम नहीं करेगा। तुम्हें सत्य स्वीकारना चाहिए, इसमें अभ्यास के सिद्धांत ढूँढ़ने चाहिए और वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करना चाहिए ताकि परमेश्वर के वचन तुम्हारी सत्य वास्तविकता बन जाएँ और अंत में वे तुम्हारा जीवन बन जाएँ”—तो क्या वे इसे हासिल करने में समर्थ होंगे? (वे नहीं होंगे।) क्यों नहीं? क्या इसलिए क्योंकि उन्होंने पर्याप्त मेहनत नहीं की है या इसलिए क्योंकि सत्य पर हमारी संगति ने उनकी भावनाओं का ध्यान नहीं रखा है या सत्य का ऐसा कोई उपयुक्त प्रावधान शामिल नहीं किया है जो उनकी अवस्था की तरफ निर्देशित हो? (इनमें से कोई भी बात नहीं है।) तो फिर क्या कारण है? (यह उनके सत्य से नफरत करने के सार द्वारा तय होता है।) इसलिए यह कहा जाना चाहिए कि इन लोगों की अभिव्यक्तियों को उनके सार से अलग नहीं किया जा सकता—वे घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। कोई भी उनके दिलों में विचारों को ठीक नहीं कर सकता और कोई भी इन लोगों के, जो दानव हैं, दुष्ट प्रकृति सार को नहीं बदल सकता। वे सत्य से नफरत करते हैं और सत्य नकारते हैं, इसलिए सत्य उन्हें बदलने में असमर्थ है। तो क्या यह कहा जा सकता है कि इस तरह का व्यक्ति मदद से परे होता है? (हाँ।) उत्तर निश्चित रूप से हाँ है। क्यों? क्योंकि उनका प्रकृति सार वही है जो दानवों का होता है। वे जो कुछ भी प्रकट करते हैं वह पूरी तरह से दानवों की प्रकृति द्वारा शासित होता है—यह भ्रष्टता का अस्थायी खुलासा बिल्कुल नहीं है और न ही यह भ्रष्ट मानवजाति के दुष्ट भ्रष्ट स्वभावों का प्रकाशन है। वह इसलिए क्योंकि वे दानव हैं, सृजित मनुष्य नहीं हैं—यही समस्या की जड़ है।

धर्मोपदेश सुनते समय इस तरह के व्यक्ति में कुछ अतिरिक्त अभिव्यक्तियाँ होती हैं—हर बार जब परमेश्वर का घर सत्य पर संगति करता है और इसमें निश्चित लोगों के बुरे कर्मों और अभिव्यक्तियों को उजागर करने और उनका गहन-विश्लेषण करने की जरूरत पड़ती है, तब वह ऐसी चीजें कहता है : “क्या तुम उस घटना के बारे में बात नहीं कर रहे हो जो पहले हुई थी? मुझे पूरी कहानी पता है। मुझे अच्छी तरह पता है कि इस बात को उठाने के पीछे तुम्हारा क्या मकसद है। क्या तुम इस मामले पर संगति करने और इसका गहन-विश्लेषण करने का उपयोग करके सिर्फ अपना अधिकार स्थापित करने और लोगों को अपनी बात सुनाने का प्रयास नहीं कर रहे हो? क्या बात सिर्फ यह नहीं है कि तुम कुछ लोगों को सबक सिखाना चाहते हो और कुछ लोगों को दबाना चाहते हो? क्या यह सिर्फ एक मुहिम शुरू करना नहीं है? सिर्फ एक बेवकूफ ही तुम्हारी बातों पर विश्वास करेगा! सिर्फ एक बेवकूफ ही तुम्हारी बात सुनेगा और सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करेगा!” तुम देखो, यहाँ तक कि जब वे लोगों के कुछ ऐसे उदाहरण, कथन या विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ सुनते हैं जो सत्य के किसी पहलू से संबंधित हैं, तब भी वे जो समझते हैं वह उस चीज से पूरी तरह से अलग होता है जो दूसरे लोग समझते हैं। वे इन चीजों को सही ढंग से नहीं समझ सकते हैं और न ही उनसे सही ढंग से पेश आ सकते हैं और यहाँ तक कि वे तथ्यों को तोड़-मरोड़ भी सकते हैं और सकारात्मक चीजों के बारे में राय भी बना सकते हैं और उनकी निंदा भी कर सकते हैं। वे अपने दिलों में जिस चीज के बारे में सोचते हैं वह हमेशा बहुत ही अंधकारमय होती है, फिर भी उन्हें लगता है कि वे विशेष रूप से चतुर हैं और उन्हें असली कहानी मालूम है। क्या यह विकृति नहीं है? यह बिल्कुल बड़े लाल अजगर की तरह है—बड़ा लाल अजगर कहता है कि जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया लोगों को बहिष्कृत या निष्कासित करती है, तब यह शक्ति प्रदर्शन के रूप में दूसरों को दिखाने के लिए किया जाता है, लेकिन वह यह कभी नहीं कहता कि जब परमेश्वर का घर, कलीसिया लोगों को बाहर निकाल देती है, तो यह कलीसिया की शुद्धि करना होता है। वह इसलिए क्योंकि वह अविश्वासी दानव है जो सत्य नहीं समझ सकता; वह सकारात्मक चीजों को हमेशा तोड़-मरोड़ देता है, उनके बारे में राय बनाता है और उनकी निंदा करता है और वह सकारात्मक चीजों के साथ सही मानसिकता से बिल्कुल पेश नहीं आएगा। वह यह मानने के बजाय कि मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया है यह मानना ज्यादा पसंद करेगा कि मनुष्य वानरों से विकसित हुए हैं, वे ड्रैगन के वंशज हैं। अभी हाल ही में मैंने कुछ वैज्ञानिक शोधकर्ताओं को यह तक कहते सुना कि करोड़ों वर्ष पहले की एक बहुत बड़ी चूहे की प्रजाति मानवजाति की पूर्वज है—यह कितना बेहूदा और विचित्र सिद्धांत है! अगर तुम उनसे यह मनवा लेने का प्रयास करते हो कि मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया, उनसे यह विश्वास करवाने का प्रयास करते हो कि मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया, तो तुम इसे चाहे कैसे भी कहो, वे इसे मानने से मना कर देते हैं। यह तथ्य उनकी आँखों के सामने पेश किए जाने के बाद भी वे अब भी यह विश्वास नहीं करते हैं। वे बस यही मानते हैं कि मनुष्य वानरों से विकसित हुए हैं या वे चूहों की संतानें हैं या वे ड्रैगन के वंशज हैं। वे इन दानवी शब्दों पर विश्वास करना ज्यादा पसंद करेंगे बजाय इसके कि मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया—कि मानव जीवन और साँस परमेश्वर द्वारा दिए गए हैं। वे इस पर विश्वास नहीं करते हैं, इसे नहीं मानते हैं और इस तथ्य को स्वीकारने को तैयार नहीं होते हैं। क्या यह विकृति नहीं है? (हाँ।) अगर तुम कहते हो कि वे ड्रैगन के वंशज हैं तो वे खुश हो जाते हैं। अगर तुम कहते हो कि वे वानरों से विकसित हुए हैं और वानरों के वंशज हैं या एक बहुत ही बड़ा चूहा उनका पूर्वज है, तो वे कहते हैं, “हाँ, कितने सम्मान की बात है!” लेकिन अगर तुम कहते हो कि मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया है, तो वे शत्रुतापूर्ण हो जाते हैं—उनकी आँखें गुस्से से धधकने लगती हैं और वे तुम्हारे प्रति नफरत से भर जाते हैं। यह कितना विकृत है!

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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