सत्य का अनुसरण कैसे करें (15) भाग एक

उत्पत्तियों के आधार पर लोगों की तीन श्रेणियाँ

दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशेषताएँ

II. दूसरी विशेषता : विकृति

ख. देह की यौन इच्छाओं में लिप्त होना

पिछली बार हमने दानवों से पुनर्जन्म लेने वालों में विकृति की तीन विशिष्ट अभिव्यक्तियों के बारे में संगति की थी : लंपटता, कामोत्तेजकता और व्यभिचारिता—यानी लोगों में यौन इच्छा से संबंधित विकृति की अभिव्यक्तियाँ। ऐसे लोगों की मुख्य समस्या यह है कि यौन इच्छा के प्रति उनका दृष्टिकोण विशेष रूप से उच्छृंखल होता है; वे सामान्य मानवता के जमीर और विवेक की सीमाओं का उल्लंघन करते हैं और किसी भी परिस्थिति में अपनी यौन इच्छाओं पर संयम नहीं रखते या उन्हें नियंत्रित नहीं करते, बल्कि उन्हें खुली छूट देते हैं। लोगों का एक हिस्सा ऐसे व्यक्तियों का भी होता है जो विशेष रूप से उच्छृंखल होते हैं; अर्थात् उच्छृंखल होने के आधार पर वे धृष्ट हो जाते हैं, बद से बदतर होते जाते हैं। उनमें से कुछ तो सुसमाचार का प्रचार करते हुए भी अपनी यौन इच्छाएँ पूरी करने के लिए तमाम तरह के अवसर खोजते और बनाते हैं। वे विशेष रूप से विपरीत लिंग के सदस्यों को सुसमाचार सुनाते हैं, और एक बार जब उन्हें कोई उपयुक्त लक्ष्य मिल जाता है तो वे हमला बोल देते हैं, दूसरे पक्ष को अपने जाल में फँसाने के लिए विभिन्न तरीके और साधन इस्तेमाल करते हैं, यहाँ तक कि अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए घृणित चालें भी चलते हैं। सुसमाचार का प्रचार करते हुए ये लोग न केवल इस तरह से व्यवहार करते हैं, बल्कि ऐसे काम भी करते हैं जो परमेश्वर के नाम को बहुत ज्यादा कलंकित करते हैं। केवल इतना ही नहीं है कि वे कामुक विचार रखते हैं, बल्कि वे सुसमाचार के प्रचार के बहाने अपनी यौन इच्छाएँ पूरी करने के लिए अवसर का फायदा उठाते हैं। यही नहीं, वे अलग-अलग उम्र और अलग-अलग परिस्थितियों वाले लोगों के साथ वही चीजें करते हुए वही गलती बार-बार करते हैं। मुझे बताओ, जब ऐसे लोगों का पता चले तो उन्हें कैसे सँभालना चाहिए? क्या उन्हें सुसमाचार के प्रचार का कर्तव्य निभाते रहने देना चाहिए या उन्हें चलता कर देना चाहिए और इस कर्तव्य को निभाने से रोक देना चाहिए? (उन्हें चलता कर देना चाहिए।) क्या उन्हें चलता कर देना अफसोस की बात है? अगर वे किसी और व्यक्ति को प्राप्त कर सकते हों तो? (अगर उन्हें वहीं रखा गया और सुसमाचार का प्रचार करते रहने दिया गया, तो परिणाम और भी गंभीर होंगे। एक बार जब वे व्यभिचारी गतिविधियों में लिप्त हो जाते हैं, तो परमेश्वर का नाम कलंकित होता है।) मुझे बताओ, क्या ऐसे लोग, जिनका मन लगातार यौन इच्छा से भरा रहता है, सुसमाचार का प्रचार करते समय लोगों को प्राप्त कर सकते हैं? (नहीं, वे नहीं कर सकते।) भले ही वे सुसमाचार का प्रचार करके कभी-कभार कुछ लोगों को प्राप्त कर लें, लेकिन वे ऐसी चीजें करने में भी सक्षम होते हैं जो परमेश्वर का नाम कलंकित करती हैं। क्या ऐसे लोगों का उपयोग करने से लाभ कम और नुकसान ज्यादा नहीं होता? (हाँ, होता है।) तो क्या उन्हें चलता कर देना तब भी अफसोस की बात है? (नहीं।) क्या ऐसे व्यक्ति बदल सकते हैं? क्या उनकी समस्या का समाधान होना आसान है? (यह आसान नहीं है। यह उनके प्रकृति सार की समस्या है; यह बदल नहीं सकती।) जो लोग वासना से भरे होते हैं, वे मनुष्य नहीं होते हैं; उनके भीतर दानव रहता है, जो मनचाही चीज कहने और करने के लिए उनकी देह का उपयोग करता है। अगर दूसरे लोग जमीर और विवेक के अनुरूप उपदेशों और चेतावनियों का उपयोग करते हैं, तो क्या ये चीजें उनके प्रकृति सार को बदल सकती हैं? (नहीं बदल सकतीं।) तो क्या उनकी मदद करने के लिए इस समस्या का समाधान सत्य की संगति करके किया जा सकता है? (नहीं किया जा सकता।) अगर उनकी काट-छाँट की जाए, किसी को उनके पर्यवेक्षण के लिए नियुक्त किया जाए या उन्हें किसी अलग परिवेश में स्थानांतरित कर दिया जाए, ताकि उन्हें अपनी यौन इच्छाएँ तृप्त करने का कोई अवसर न मिले, तो भी क्या उनके भीतर की दानवी प्रकृति का समाधान किया जा सकता है? (नहीं।) दानवों से पुनर्जन्म लेने वाले लोग जो कुछ भी करते हैं, वह मानवता से रहित होता है। यह उनके प्रकृति सार से निर्धारित होता है। इसलिए, तुम उन्हें प्रोत्साहित करने या उनकी मदद करने के लिए सत्य पर चाहे कितनी भी संगति करो, यह उनके प्रकृति सार की समस्या का समाधान नहीं कर सकता। एक तो, ऐसा इसलिए है क्योंकि दानवों का प्रकृति सार ऐसा होता है कि वे सत्य से घृणा करते हैं और सत्य जरा भी नहीं स्वीकार सकते। दूसरे, दानवों से पुनर्जन्म लेने वालों में जमीर और विवेक की कमी होती है और उनमें स्वयं द्वारा किए गए बुरे कर्मों के बारे में जरा भी जागरूकता नहीं होती और वे कभी शर्म, पश्चात्ताप या दुःख महसूस नहीं करते। इस तरह उनमें वह शर्मिंदगी या लज्जा का भाव नहीं होता जो सामान्य लोगों में होना चाहिए। वे मानवीय नैतिकता और आचार-नीति, या व्यक्ति के आचरण में जो गरिमा और लज्जा की भावना होनी चाहिए, उसे नहीं समझते। वे इन चीजों में से कुछ नहीं समझते। भले ही वे कुछ अच्छे लगने वाले धर्म-सिद्धांत प्रस्तुत कर सकते हों, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि उनमें सामान्य मानवता है; वे सिर्फ पाखंडी और धोखेबाज लोग होते हैं। इसलिए ऐसे लोगों के लिए चाहे जिन सत्यों पर संगति की जाए, उनका प्रकृति सार नहीं बदला जा सकता। तो फिर इसका एक ही उपाय है : ऐसे लोगों को कर्तव्य के लिए इस्तेमाल मत करो। उन्हें दूर करो। इससे समस्या का समाधान हो जाता है। कुछ लोग कहते हैं, “अगर उन्हें हटा दिया जाए और बाहर निकाल दिया जाए, और वे अब परमेश्वर के घर में अपनी यौन इच्छाएँ तृप्त नहीं करते और कार्य में बाधा नहीं डालते, तो क्या वे गैर-विश्वासियों के बीच ये चीजें करके लोगों को नुकसान नहीं पहुँचाएँगे? क्या उन्हें समाज में लोगों को नुकसान पहुँचाने से रोकने के लिए, किसी को उनके पर्यवेक्षण के लिए नियुक्त करके उन्हें परमेश्वर के घर में ही नहीं रखे रहना चाहिए?” क्या यह कथन सही है? (नहीं।) यह गलत क्यों है? (उन्हें परमेश्वर के घर में रखने से भाई-बहनों को नुकसान पहुँचता है, कलीसिया के कार्य में बाधा पहुँचती है और परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ होती है। यह अनुचित है। उन्हें दुनिया में वापस जाने दो। दुनिया में बहुत सारे दानव और शैतान हैं, और चाहे वे जिस भी तरह की विघ्न-बाधाएँ पैदा करें, उसे दानवों को नुकसान पहुँचाना नहीं माना जा सकता। चूँकि वे सभी दानव हैं, इसलिए वे जो करते हैं उसे नुकसान पहुँचाना नहीं माना जा सकता।) क्या यह विचार वास्तविकता के अनुरूप नहीं है? (बिल्कुल है।) यह विचार सही है। जो लोग यौन इच्छाएँ तृप्त करते हैं, वे दानव हैं और उन्हें परमेश्वर के घर में रहकर भाई-बहनों को नुकसान पहुँचाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। वे समाज में जो कुछ भी करते हैं उसका परमेश्वर के घर से कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि जो लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं करते उनमें मानवता का अभाव होता है और वे सभी दानव होते हैं। चाहे दानव आपस में कैसे भी लड़ाई करें, उससे परमेश्वर के घर के काम में बाधा नहीं पड़ेगी। वे सभी शैतान के हैं और उनकी पहले से ही शैतान के साथ साँठ-गाँठ है। वे हजारों साल से एक-दूसरे से लड़ते और एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाते आ रहे हैं। हमारा इससे क्या लेना-देना? वे एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाते हैं और ऐसा वे स्वेच्छा से करते हैं। वे सब एक ही प्रकार की खराब किस्म के लोग हैं; एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। संक्षेप में, परमेश्वर का घर ऐसे लोगों को नहीं चाहता। क्योंकि जो लोग दानव हैं, वे उचित कार्य नहीं करते और उनमें जमीर या विवेक नहीं होता, वे जहाँ भी होते हैं, सिर्फ बाधाएँ ही पैदा करते हैं, और वे सिर्फ तोड़फोड़ और विनाश में ही लगे रहते हैं। वे ऐसा कुछ नहीं कर सकते जो लोगों के लिए लाभदायक हो। वे सिर्फ लोगों को नुकसान पहुँचा सकते हैं। अगर वे कुछ सेवा कर भी सकें, तो भी उनके द्वारा पहुँचाया गया नुकसान उससे कहीं ज्यादा होता है। ऐसे लोग भले ही काफी अच्छे व्यवहार वाले लगें और ऐसा लगे कि उन्होंने कुछ भी बुरा नहीं किया है, लेकिन एक बार मौका मिलते ही वे वास्तव में बुरी चीजें करने में सक्षम होते हैं। इसलिए, ऐसे लोगों को शीघ्र बाहर निकालकर उनसे निपटा जाना चाहिए। हालाँकि वे कुछ सेवा प्रदान कर सकते हैं और कुछ सही चीजें कर सकते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उन्होंने वाकई पश्चात्ताप किया है, और यह तो बिल्कुल भी नहीं कि उनका प्रकृति सार बदल गया है। उनकी वर्तमान स्थिति चाहे जो भी हो, किसी को उनके झूठे रंग-रूप से गुमराह नहीं होना चाहिए, उन पर भरोसा या यह विश्वास तो बिल्कुल नहीं करना चाहिए कि वे कोई काम कर सकते हैं। चूँकि उनका प्रकृति सार दानव का होता है, इसलिए जहाँ भी वे कलीसियाई जीवन जीते हैं, वे एक टाइम बम की तरह होते हैं और सभी के लिए खतरा हैं। अगर वे अस्थायी तौर पर बुरी चीजें करने से दूर रहते हैं, तो भी उनका हर शब्द और हर क्रियाकलाप, उनका हर कदम तुम्हारे मन और भावनाओं में दखल देगा, यहाँ तक कि वह तुम्हारे दृष्टिकोण को भी प्रभावित कर सकता है। यह दानव के आसपास होने का परिणाम है। उदाहरण के लिए, मान लो तुम हाल ही में किसी बुरी दशा में या कुछ हद तक नकारात्मक रहे हो या तुमने कुछ नकारात्मक प्रचार और निराधार अफवाहें सुनी हैं, जिनके कारण तुमने परमेश्वर के बारे में धारणाएँ विकसित कर ली हैं। अगर तुम्हारे आसपास कोई दानव है, तो हो सकता है तुम्हें सोते समय बुरे सपने आते रहें। यह भी हो सकता है कि उससे बातचीत करने के बाद न सिर्फ तुम्हारी दशा सकारात्मक और उत्साहित होने में विफल रहे, बल्कि तुम अपने आत्मा के भीतर उत्तरोत्तर खिन्न और अंधकारमय महसूस करो। तुम उसके जितने करीब आते हो, उतना ही कम तुम परमेश्वर की उपस्थिति महसूस कर सकते हो। तुम जितने लंबे समय तक उसके संपर्क में रहते हो, तुम्हारा हृदय परमेश्वर से उतना ही दूर होता जाता है, और तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करना उतना ही निरर्थक लगेगा, यहाँ तक कि उसका हर शब्द और क्रियाकलाप तुम्हारे विचारों को प्रभावित करेगा और तुम्हारे आसपास के लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति तुम्हारे दृष्टिकोणों और रवैयों को प्रभावित करेगा। लेकिन जब तुम साधारण भ्रष्ट मनुष्यों के साथ बातचीत करते हो और उनसे जुड़ते हो, तब अलग बात होती है, और तब तुम्हें ये प्रतिकूल प्रतिक्रियाएँ नहीं मिलेंगी। इसलिए, अगर लोग ऐसे लोगों के आसपास होने पर जो दानव हैं, उनकी वजह से होने वाला नुकसान स्पष्ट रूप से महसूस नहीं कर सकते, तो भी वे दूसरों को जो नुकसान पहुँचाते हैं वह हमेशा मौजूद रहता है, वैसे ही उनसे अन्य लोगों को खतरा भी हमेशा मौजूद रहता है। अगर वे तुम्हारे प्रति काफी मित्रवत दिखें, तुमसे घृणा करते न दिखें और उन्होंने तुम्हारी आलोचना या तुम पर हमला न किया हो, तो भी जब तक वे दानव हैं और मनुष्य नहीं हैं, तब तक उनके शब्दों और क्रियाकलापों, वाणी और व्यवहार का तुम पर प्रभाव पड़ेगा। यह प्रभाव तुम्हारे जाने बिना ही पड़ता है, और जो लोग सत्य नहीं समझते वे हो सकता है इसे महसूस न करें। इसलिए अगर दानवों से पुनर्जन्म लेने वाले लोग सुसमाचार-टीमों के भीतर पाए जाते हैं, खासकर वे लोग जो बेलगाम अपनी यौन इच्छाएँ तृप्त करते हैं, तो उनसे शीघ्र निपटना चाहिए और उन्हें बाहर निकाल देना चाहिए। बुरे लोगों के साथ उदार नहीं होना चाहिए और उन्हें बर्दाश्त नहीं करना चाहिए। लोग हमेशा सोचते हैं कि सुसमाचार-टीमों में एक और व्यक्ति का होना सुसमाचार के प्रयासों में ताकत जोड़ता है। एक और व्यक्ति का होना स्वीकार्य है, लेकिन किसी दानव के जुड़ने का मतलब है मुसीबत। अगर वह एक और व्यक्ति है, तो भले ही उसकी काबिलियत थोड़ी खराब हो और वह सिर्फ आसान काम ही कर सके, कम से कम वह किसी दानव की तरह कलीसिया के काम में बाधा तो नहीं डालेगा या उसे नुकसान तो नहीं पहुँचाएगा। लेकिन दानव अलग होता है। शायद वह बाहर से स्पष्टवादी और वाक्पटु हो और अपनी काबिलियत के आधार पर किसी खास कार्यक्षेत्र के पर्यवेक्षक के रूप में वह सक्षम हो सकता है। लेकिन उसके प्रकृति सार को देखते हुए उसके लिए कार्य अच्छी तरह से करना बिल्कुल असंभव है। वह उसे पूरी तरह से बिगाड़ ही सकता है, क्योंकि दानव जो कुछ भी करते हैं, वह गड़बड़ी, विघ्न और नुकसान ही लाता है। इसलिए, ऐसे लोगों के बुरे कर्म शीघ्र उजागर करने चाहिए और उनका भेद पहचानना चाहिए, ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोग दानवों के बुरे कर्म पहचान सकें और उनका भेद पहचान सकें। जब तक तुम्हें यह पता नहीं चलता या एहसास नहीं होता कि वे दानव हैं और तुम्हें लगता है कि वे सामान्य लोग हैं जो कभी-कभार अपनी दुष्ट काम-वासना प्रकट कर देते हैं—तब तक उन्हें आगे की निगरानी के लिए रुकने देना किसी तरह से जायज ठहराया जा सकता है। अगर तुम्हें पता चले कि वे सिर्फ कभी-कभार दुष्ट काम-वासना प्रकट नहीं करते, बल्कि उसमें आनंद लेते हैं, उन लंपट लोगों की तरह जो जहाँ भी जाते हैं, अपनी यौन इच्छाओं को तृप्त करने के लिए विपरीत लिंग के अपने पसंदीदा सदस्यों को खोजना अपनी प्राथमिकता बना लेते हैं—जैसे दानवों का उन आत्माओं को खोजना जिन्हें वे निगल सकें, हर जगह लोगों को गुमराह करना, फँसाना और नुकसान पहुँचाना—और वे जिसके भी संपर्क में आते हैं वही उनका उत्पीड़न सहता है, और वे अपने पीछे लगातार ऐसी समस्याएँ छोड़ते जाते हैं, तो यह किसी इंसान का व्यवहार नहीं है; यह स्पष्ट रूप से किसी दानव का व्यवहार है। भावी परेशानी से बचने के लिए दानवों को जल्द से जल्द बाहर निकाल देना चाहिए। हर व्यक्ति कभी-कभार गलतियाँ कर सकता है, नियंत्रण खो सकता है, यहाँ तक कि मानवता की सीमाएँ लाँघने वाली चीजें भी कर सकता है, लेकिन यह व्यवहार हमेशा नहीं होता, वह इसमें आनंद नहीं लेता, और गलत काम और अपराध करने के बाद उसे पछतावा, अपराध-बोध और शर्मिंदगी महसूस होती है। जब उसका फिर से उसी स्थिति या मामले से सामना होता है, तब वह प्रलोभन से बच सकता है और पीछे मुड़ने और पश्चात्ताप करने के संकेत दिखा सकता है। लेकिन दानव कभी पीछे नहीं मुड़ते, क्योंकि वे पश्चात्ताप नहीं कर सकते, न ही वे पश्चात्ताप करते हैं। क्या तुमने कभी दानवों की परमेश्वर का विरोध करने, उसकी निंदा करने और उस पर आक्रमण करने की प्रकृति बदलते देखी है? वह नहीं बदलती। चाहे परमेश्वर ने कितने भी समय तक मानवजाति पर संप्रभुता रखी हो और उसका प्रबंध किया हो, और चाहे परमेश्वर ने अपनी कितनी भी सर्वशक्तिमत्ता, बुद्धि और अधिकार प्रकट किया हो, शैतान उद्दंड बना रहता है और परमेश्वर के विरुद्ध शोर मचाता रहता है। हालाँकि वह हमेशा से परमेश्वर का पराजित शत्रु रहा है, फिर भी वह परमेश्वर के विरुद्ध शोर मचाता है, और फिर भी वह उस पर आक्रमण और उसका विरोध करता है। इसलिए, अगर किसी व्यक्ति का प्रकृति सार दानव का है, तो उसका विकृत प्रकृति सार कभी नहीं बदल सकता। विकृति ही उसका असली चेहरा होता है, विकृति ही उसकी पसंद होती है और उसकी प्रकृति भी, इसलिए वह नहीं बदलेगा। तुम्हें चाहे किसी भी कलीसिया में ऐसा व्यक्ति दिखाई दे, तुम्हें यथाशीघ्र उसे उजागर करना चाहिए, उसका भेद पहचानना चाहिए और फिर उसे बाहर निकाल देना चाहिए। दानवों को पश्चात्ताप करने का मौका मत दो। यह तरीका अपनाने से कलीसिया के कार्य और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को लाभ होता है। तो फिर कैसे व्यक्ति को पश्चात्ताप का मौका देना चाहिए? तुम्हें निश्चित होना चाहिए कि वह व्यक्ति एक सामान्य व्यक्ति है, दानव नहीं है, और उसने सिर्फ अस्थायी कमजोरी या विशेष परिस्थितियों में ही अपराध किया था, लेकिन बाद में उसे पछतावा हुआ, यहाँ तक कि उसने खुद से नफरत की और अपने चेहरे पर थप्पड़ भी मारे। तुम्हें निश्चित होना चाहिए कि उसका जमीर काम कर सकता है। ऐसे लोगों को पश्चात्ताप करने का मौका दिया जा सकता है। लेकिन दानवों को जब भी मौका मिलता है, वे अपनी यौन इच्छाएँ तृप्त करते हैं। यह उनकी प्रकृति से निर्धारित होता है। इसलिए दानवों को पश्चात्ताप करने का मौका नहीं दिया जा सकता, और उनसे जितनी जल्दी हो सके निपटा जाना चाहिए, उन्हें बहिष्कृत या निष्कासित कर दिया जाना चाहिए। ऐसे व्यक्ति के साथ व्यवहार करने का यही सिद्धांत है, और यही उसे सँभालने का सबसे अच्छा तरीका है। क्या अब यह मामला स्पष्ट है? (हाँ।)

कुछ लोग चीजों की असलियत नहीं जान सकते। वे देखते हैं कि दानवों में से कुछ काफी बूढ़े हैं, फिर भी वे लगातार यौन इच्छा के खेल में लगे रहते हैं। दूसरे लोग सत्य पर चाहे कैसे भी संगति करें, वे इस पर ध्यान नहीं देते। अगर वे आमने-सामने स्वीकार कर लें कि उन्होंने गलती की है, तो भी बाद में वे वही करेंगे जो वे चाहते हैं। जो लोग चीजों की असलियत नहीं जान सकते, वे हैरान रह जाते हैं : “दानवों में इतनी प्रबल यौन इच्छाएँ कैसे हो सकती हैं? इतने बुढ़ापे में भी वे इतने विकृत कैसे हो सकते हैं? यह व्यक्ति इन मामलों में आदतन अपराधी है, लगातार इस तरह का व्यवहार करता रहता है। इसमें शर्मिंदगी का एहसास कैसे नहीं हो सकता? यह संयम कैसे नहीं जानता?” क्या यह चीजों की असलियत जानने में विफल होना नहीं है? इतने सालों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी वे लोगों के साथ उनके प्रकृति सार के आधार पर व्यवहार करना नहीं जानते, न ही वे यह समझते हैं कि दानवों का प्रकृति सार कभी नहीं बदलता। क्या यह बहुत ही मूर्खतापूर्ण और अज्ञानतापूर्ण नहीं है? दानव ऐसे ही पैदा होते हैं; पुरुष हों या स्त्री, उनकी कोई भी उम्र हो, वे ठीक इसी तरह के प्राणी होते हैं। उनका प्रकृति सार दानव जैसा ही होता है। दानवों की लंपटता, कामोत्तेजकता और व्यभिचारिता की एक अभिव्यक्ति विशेष रूप से यौन इच्छा के खेल में लिप्त होना और तब तक लिप्त रहना है जब तक उनका देह नष्ट न हो जाए। इसलिए चाहे वे कितने भी बूढ़े हो जाएँ, वे इसी तरह के व्यक्ति बने रहते हैं और बदलेंगे नहीं—यह कोई अजीब बात नहीं है। देखो, वे युवा नहीं हैं और बाहरी तौर पर वे यौन इच्छा के खेल में लिप्त होने वाले व्यक्ति नहीं लगते, लेकिन चूँकि उनके भीतर एक दानव निवास करता है, इसलिए वे अपने देह की उम्र या लिंग से या अपने परिवेश से सीमित हुए बिना यौन इच्छा के खेल में लगे रहते हैं। यह जरूरी नहीं कि यह उनके परिवार या माता-पिता से संबंधित हो; यह आनुवंशिकी का मामला नहीं है, बल्कि उनके आंतरिक प्रकृति सार की समस्या है। उनका प्रकृति सार विकृत होता है और वही निर्धारित करता है कि उनका लक्षण दानव का है। चूँकि उनका प्रकृति सार पहले ही उजागर हो चुका होता है और उनका प्रकृति सार ही उनके लक्षण को निर्धारित करता है, इसलिए इस तरह के लोगों के मामले में, चाहे वे पहले किसी भी व्यवसाय में रहे हों, चाहे उनकी उम्र अब कितनी भी हो, और चाहे उनके बोलने के कौशल या उनकी जन्मजात स्थितियाँ कैसी भी हों—इनमें से कोई भी उनके लक्षण को प्रभावित नहीं करता। अगर तुम सिर्फ उनका बाहरी रंग-रूप देखते हो, तो तुम उससे आसानी से गुमराह हो जाओगे और कहोगे : “यह व्यक्ति बहुत सुसंस्कृत और सभ्य दिखता है और बहुत सुरुचिपूर्ण ढंग से बोलता है; निश्चित रूप से यह ऐसा व्यक्ति है जो मर्यादा, धार्मिकता, सत्यनिष्ठा और लज्जा को समझता है। यह ऐसी दुष्ट चीजें कैसे कर सकता है? यह यौन इच्छा के खेल में लिप्त होने वाला व्यक्ति नहीं लगता!” तुम इस मामले की असलियत नहीं समझ सकते; तुम्हें यह कुछ हद तक अकल्पनीय और कुछ हद तक मुश्किल से विश्वास करने योग्य लगता है। तुम बड़े मूर्ख हो जो यह दृष्टिकोण रखते हो! दानव चाहे किसी भी देह में हो, दानवोचित चीजें ही कर सकता है। वह व्यक्ति बाहरी रूप से चाहे कैसा भी दिखे, उसकी उम्र कितनी भी हो या उसका व्यक्तित्व कैसा भी हो, वह वही करेगा जो उसकी प्रकृति के अनुरूप होगा। इसका उसके रंग-रूप, उम्र या शिक्षा से कोई लेना-देना नहीं है, न ही उसकी धार्मिक पृष्ठभूमि से कोई लेना-देना है, उसकी जातीयता से तो बिल्कुल भी लेना-देना नहीं है, और बेशक, इसका उसके पारिवारिक परिवेश से भी कोई लेना-देना नहीं है। उसका ये चीजें कर सकना और ये अभिव्यक्तियाँ रखना उसके सार और प्रकृति से निर्धारित होता है। इसलिए, एक तो इसे अजीब या अकल्पनीय मत समझो; और दूसरी बात, मूर्खतापूर्ण चीजें मत करो। उसे हमेशा बर्दाश्त करने, उसके साथ धैर्य रखने और उसे पश्चात्ताप के मौके देने की चाहत मत रखो, उसे इसलिए बचाने की इच्छा मत रखो कि वह बदल जाएगा, उसे इसलिए सत्य से प्रेम करने के लिए प्रेरित मत करो कि वह सामान्य मानवता के मार्ग पर लौट सकेगा। अगर तुम अब भी इन लोगों की, जो कि दानव हैं, मदद करने और उन्हें बचाने का इरादा रखते हो, तो तुम बहुत मूर्ख हो—तुम ऐसे व्यक्ति का सार नहीं समझते, उसके साथ व्यवहार करने के सिद्धांत नहीं समझते, सत्य नहीं समझते और परमेश्वर के इरादे नहीं समझते। अगर तुम देखते हो कि उसमें एक विकृत प्रकृति सार है और फिर भी उसकी इसलिए मदद करने का इरादा रखते हो कि वह पश्चात्ताप कर ले, तो यह दर्शाता है कि तुम परमेश्वर के वचनों पर विश्वास नहीं करते; तुम परमेश्वर के वचनों के आधार पर लोगों, घटनाओं और चीजों को नहीं देख रहे हो या उनका मूल्यांकन नहीं कर रहे हो, और तुममें परमेश्वर के वचनों के प्रति सच्चा समर्पण या स्वीकृति नहीं है। तुम सिर्फ जो देखते हो उसके और बाहरी परिघटनाओं के आधार पर विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों को देखना और उनका मूल्यांकन करना चाहते हो, और सिर्फ अपने उत्साह और नेक इरादों के आधार पर क्रियाकलाप करना चाहते हो। यह एक भ्रांत विचार और दृष्टिकोण है और यह विद्रोहशीलता की अभिव्यक्ति भी है। यौन इच्छा के खेल में लिप्त रहने वाले ऐसे व्यक्ति को सँभालने का उपाय बहुत सरल है : उसके साथ उसके सार के अनुसार व्यवहार करो। अगर तुम्हें यकीन है कि वह ऐसा व्यक्ति है, तो उसे बाहर निकालकर उससे निपटो; उसे पश्चात्ताप करने का एक और मौका देने की कोई जरूरत नहीं है। अगर दूसरे न समझें, तो भी बेबस मत हो। दानवों का सार नहीं बदलेगा। वे अपनी युवावस्था में ऐसे प्राणी होते हैं, अधेड़ावस्था में भी ऐसे ही व्यक्ति बने रहते हैं, और बुढ़ापे में—उम्रदराज होने के बावजूद—वे अब भी ऐसे ही प्राणी होते हैं; वे नहीं बदलेंगे। मुझे बताओ, क्या सत्तर-अस्सी साल के ऐसे पुरुष हैं जो जवान लड़कियों को फुसलाते हैं, या साठ-सत्तर साल की ऐसी स्त्रियाँ हैं जो जवान लड़के खोजती हैं? (हाँ।) समाज में ऐसी कई विचित्र और विकृत चीजें हैं। क्या उन्होंने सिर्फ बूढ़े होने पर ही यौन इच्छा के खेल में संलग्न होना शुरू किया? (नहीं।) वे जवानी में भी ऐसे ही थे; वे जीवन भर ऐसे ही प्राणी रहे हैं। गैर-विश्वासी इसका वर्णन करने के लिए किन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं? वे इसे “पालने को लूटना” कहते हैं; वे इसे रसिक होना कहते हैं। देखो उनके शब्द कितने मधुर हैं। वे ऐसी चीज और ऐसे व्यक्ति का वर्णन करने के लिए “रसिक”, “आजाद पंछी”, “जिंदादिल इंसान” या “सांसारिक रूढ़ियाँ तोड़ने में सक्षम” जैसे शब्दों या कहावतों का इस्तेमाल करते हैं। गैर-विश्वासी लोग ऐसे मामले परिभाषित करने के लिए जिन शब्दों और कहावतों का इस्तेमाल करते हैं, वे घृणित हैं। वे इन मामलों का जड़ से, सार से निरूपण करने के लिए सही शब्दावली इस्तेमाल नहीं कर सकते, क्योंकि एक ओर गैर-विश्वासी दुनिया और यह मानवजाति स्वयं विकृत है, और दूसरी ओर, कोई भी ऐसी समस्याओं की असलियत नहीं जान सकता। इसलिए, इन मामलों को परिभाषित करने में उनके दृष्टिकोण बहुत उथले और साथ ही बहुत बेतुके और दुष्टतापूर्ण हैं; वे इन मामलों के सार से अलग हैं।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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