सत्य का अनुसरण कैसे करें (15) भाग तीन

हमने अभी जिन अभिव्यक्तियों पर संगति की, वे उन लोगों में विचित्रता की सबसे गंभीर अभिव्यक्तियाँ थीं जो दानव हैं। इन अभिव्यक्तियों का भेद पहचानना लोगों के लिए थोड़ा आसान होता है। कुछ अभिव्यक्तियाँ थोड़ी कम गंभीर भी होती हैं। यानी दैनिक जीवन में वे अक्सर कुछ चरम विचार और दृष्टिकोण रखते हैं, और चरम व्यवहार और अभ्यास करते हैं; उनके क्रियाकलाप अक्सर सामान्य मानवता की सहनशीलता की सीमा पार कर जाते हैं। उदाहरण के लिए, अगर वे कुछ गलत कहते हैं या करते हैं, तो वे खुद से नफरत करते हैं, अपने चेहरे पर थप्पड़ मारते हैं, यहाँ तक कि दिन में खाना न खाकर और रात में नींद न लेकर खुद को सज़ा भी देते हैं। वे अपनी देह को दंड देने के लिए अक्सर चरम तरीके इस्तेमाल करते हैं, इसका अपनी गलतियाँ सुधारने का अपना दृढ़ संकल्प दिखाने के तरीके के तौर पर उपयोग करते हैं। हो सकता है कोई उन्हें यह सलाह दे, “ऐसा करने से समस्या हल नहीं होगी। तुम्हें पहले परमेश्वर के वचनों के आधार पर आत्म-चिंतन करना होगा और खुद को जानना होगा, फिर अभ्यास के सिद्धांत और अभ्यास का मार्ग खोजना होगा, तभी धीरे-धीरे बदलाव आ सकता है। किसी भी तरह का भ्रष्ट स्वभाव बदलना कोई ऐसी चीज नहीं है जो एक-दो दिन में हो सकती है; इसके लिए एक निश्चित समय की जरूरत होती है, इसकी एक प्रक्रिया होनी आवश्यक है।” यह एक सटीक कथन है, लेकिन वे न तो इसे स्वीकारते हैं, न ही इसका अभ्यास करते हैं। वे विभिन्न समस्याओं से सत्य सिद्धांतों के आधार पर पेश नहीं आते, बल्कि चरम उपाय अपनाते हैं। वे कितने चरम होते हैं? देखो, समस्याएँ हल करने के लिए वे अक्सर ऐसे तरीके इस्तेमाल करते हैं जो उनकी देह को नुकसान पहुँचाते हैं और ऐसे तरीके इस्तेमाल करते हैं जो उन्हें पीड़ा देते हैं। क्या यह चरम नहीं है? (हाँ, है।) वे दूसरों के साथ भी ऐसा ही व्यवहार करते हैं, उनके विरुद्ध भी चरम तरीके इस्तेमाल करते हैं। वे विभिन्न मामलों से पेश आने के लिए भी चरम तरीके इस्तेमाल करते हैं। उदाहरण के लिए, मान लो कोई महिला अक्सर महसूस करती है कि वह अपने कर्तव्य में बहुत व्यस्त रहती है और उसे लगता है कि बाल काटने और धोने में समय बिताना बहुत झंझट भरा है, इसलिए वह अपने सारे बाल मुँड़वा लेती है। बाल मुँड़वाने की आवृत्ति कम करने के लिए वह बालों की सामान्य बढ़त रोकने के लिए कुछ रासायनिक उत्पाद भी लगाती है। क्या यह चरम नहीं है? उसे गंजा देखकर लोग मान लेते हैं कि वह पुरुष है, लेकिन उसकी आवाज और देहयष्टि से आँकने पर उन्हें लगता है कि वह स्त्री हो सकती है—वे बस बता नहीं सकते कि वह पुरुष है या स्त्री। दूसरे भाई-बहनों से पूछने पर ही उन्हें पता चलता है कि वह स्त्री है और परेशानी से बचने के लिए उसने अपना सिर मुँड़वा लिया है। भेद न पहचानने वाले कुछ लोग तो ऐसे व्यक्ति की प्रशंसा करते हुए इसका अनुमोदन भी कर देते हैं : “देखो, देह के विरुद्ध विद्रोह करने का उसका दृढ़ संकल्प वाकई साधारण लोगों से परे है। देह के प्रति उसकी घृणा सच्ची घृणा है; जब देह से लगाव न रखने की बात आती है, तो वह सचमुच कार्रवाई करती है! एक दिन मैं भी उसकी तरह अपना सिर मुँड़वा लूँगा।” कुछ तो उसकी नकल भी करते हैं! क्या वे भी उसी तरह के नहीं हैं? उनकी मुलाकात एक हमरूह इंसान से हुई है; न सिर्फ वे इस मामले का भेद नहीं पहचानते, बल्कि वे इसकी बहुत प्रशंसा भी करते हैं और इसका अनुकरण करना चाहते हैं। क्या ये चरम लोग नहीं हैं? (हाँ, हैं।) मुझे बताओ, क्या चरम लोग हर चीज किसी विकृत प्रेरक शक्ति के साथ नहीं करते? (हाँ, करते हैं।) यह विकृत प्रेरक शक्ति कहाँ से आती है? क्या सामान्य मानवता में यह विकृत प्रेरक शक्ति होती है? (नहीं।) तो सामान्य मानवता में यह विकृत प्रेरक शक्ति क्यों नहीं होती? क्योंकि, अगर लोगों में सामान्य मानवता की सोच, जमीर और विवेक हो, तो वे मामलों पर अपेक्षाकृत सामान्य, सकारात्मक और व्यावहारिक तरीके से विचार करेंगे; इस प्रकार वे इन चरम व्यवहारों में बिल्कुल भी संलग्न नहीं होंगे। अर्थात्, चाहे वे कुछ भी करें, चाहे वह उन्हें पसंद हो या न हो, वे सामान्य और तर्कसंगत तरीके से व्यवहार करेंगे और चरम तक नहीं जाएँगे। तो क्या यह कहा जा सकता है कि चरम तक जाने वाले इस तरह के व्यक्ति की सोच में कुछ गड़बड़ है? (हाँ।) उनकी समझ में कुछ समस्या है, है ना? (हाँ।) उदाहरण के लिए, परमेश्वर अपेक्षा करता है कि लोग अपना कर्तव्य निभाने में वफादार रहें। वे मनन करते हैं कि वफादारी कैसे हासिल करें और इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उन्हें कष्ट सहना चाहिए, इसलिए वे कष्ट सहने का अभ्यास करते हैं : वे हर भोजन के लिए विनियमों का पालन करते हैं, एक निश्चित संख्या में चावल के दाने और सब्जी के टुकड़े खाते हैं; जब उनके कपड़े फट जाते हैं तो वे उन पर पैबंद लगाते हैं और उन्हें पहनना जारी रखते हैं, दूसरों के सामने तपस्वी जैसे लगते हैं; जहाँ दूसरे लोग प्रतिदिन छह से आठ घंटे सोते हैं, वे सिर्फ एक-दो घंटे ही सोते हैं। उन्हें लगता है कि उनमें कष्ट सहने का संकल्प है और वे किसी और से ज्यादा वफादार हैं। वे हमेशा इन चरम विचारों और व्यवहारों पर मनन करते हैं, जिन्हें सामान्य लोग नहीं समझ सकते। उदाहरण के लिए, अगर वे किसी से बात करते समय कुछ गलत कह देते हैं या किसी शब्द का गलत इस्तेमाल कर देते हैं और उनका मजाक उड़ाया जाता है, तो वे अपमानित महसूस करते हैं और सोचते हैं : “मैं अपने जीवन में फिर कभी इस शब्द का इस्तेमाल नहीं करूँगा, और इतना ही नहीं—मैं इस व्यक्ति को अपने जीवन में फिर कभी नहीं देखूँगा और इस व्यक्ति से कभी बात नहीं करूँगा, ताकि यह मुझमें कोई दोष न निकाल सके!” और वे ऐसा कर सकते हैं—वे इस पर अड़े रह सकते हैं। वे जीवन भर किसी चरम व्यवहार या विचार और दृष्टिकोण पर अड़े रह सकते हैं और किसी के द्वारा भी मनाए जाने पर इनकार कर सकते हैं। वे बस इसी तरह अड़े रहते हैं, यहाँ तक कि उनके पास अपने अड़े रहने के कारण और आधार भी होते हैं, वे मानते हैं कि यह सत्य के प्रति समर्पण की अभिव्यक्ति है, परमेश्वर से प्रेम करने की अभिव्यक्ति है और वफादारी की अभिव्यक्ति है। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोग परेशानी पैदा करने वाले नहीं होते? (हाँ, होते हैं।) क्या उनके साथ मेलजोल रखना आसान है? (नहीं।) तो उनके व्यवहार कैसे पैदा होते हैं? क्या वे एक तरह की चरम सोच के कारण पैदा नहीं होते? वे इन चरम व्यवहारों और अभिव्यक्तियों को सत्य का अभ्यास करना समझते हैं और ऐसा करने में लगे रहते हैं। क्या ये चरम विचार और दृष्टिकोण इस प्रकार के व्यक्ति में इन व्यवहारों की जड़ नहीं हैं? वे मानते हैं कि इस तरह से चीजें करना सत्य का अभ्यास करना और परमेश्वर के प्रति वफादारी व्यक्त करना है, और इसके अलावा, जो ऐसा नहीं करते उन लोगों की मन ही मन वे निंदा करते हैं और उनके साथ भेदभाव करते हैं, और उनके प्रति तिरस्कार का भाव दर्शाते हैं। उदाहरण के लिए, पूर्व में उल्लिखित उस महिला पर विचार करो जिसने अपना सिर मुँड़वा लिया था; दूसरों को सिर न मुँड़वाते देखकर वह सोचती है, “हुँह, तुम लोग ऐसे लंबे बाल रखते हो, यहाँ तक कि उन्हें तरह-तरह से सँवारते भी हो। तुम सब अपने रूप-रंग की ज्यादा ही चिंता करते हो। तुम लोग परमेश्वर से प्रेम नहीं करते! मुझे देखो, मैं इतने सालों से गंजी हूँ और कभी हँसी उड़ाए जाने से नहीं डरी; मैं अपने रूप-रंग को लेकर ज्यादा चिंता नहीं करती हूँ। तुम लोग अपने बाल इतने लंबे रखते हो और तुम्हें उन्हें बार-बार धोना पड़ता है—समय की कितनी बर्बादी होती है! उतने समय में क्या परमेश्वर के वचन और पढ़ना, और थोड़ा और कर्तव्य निभाना अच्छा नहीं रहेगा?” यहाँ तक कि वह दूसरों की निंदा भी करती है! ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के बहुत सारे वचन सुनता है और इतने वर्षों से धर्मोपदेश सुनता है, फिर भी यह नहीं समझता कि सत्य क्या है। वह अभी भी कई चरम विचार रखता है और इन चरम विचारों के मार्गदर्शन में वह कई चरम व्यवहार, अभ्यास और शैलियाँ प्रदर्शित करता है, फिर खुद को परमेश्वर से सबसे ज्यादा प्रेम करने वाले और सबसे वफादार व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है। क्या यह विकृति की एक और अभिव्यक्ति नहीं है? (हाँ, है।) हर चीज में चरम पर जाना विकृति है। मुझे बताओ, ये चरम अभिव्यक्तियाँ दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचातीं, तो फिर हम इन्हें विकृति क्यों कहते हैं? (ये अभिव्यक्तियाँ सामान्य लोगों की सोच के अनुरूप नहीं होतीं; ये वे व्यवहार और अभ्यास नहीं हैं जो सामान्य लोगों में होने चाहिए।) इन चरम अभिव्यक्तियों का सामान्य लोगों की सोच और अभिव्यक्तियों से बिल्कुल भी लेना-देना नहीं है; ये वास्तविकता से अलग हैं, उस वस्तुनिष्ठ, व्यावहारिक जीवन से अलग हैं जो सामान्य मानवता वाले लोगों का होना चाहिए। वे विभिन्न मामलों से पेश आने का एक उग्र तरीका अपनाते हैं, फिर इन चरम, उग्र विचारों, दृष्टिकोणों और व्यवहारों को सकारात्मक चीजों के रूप में परिभाषित करते हैं, जबकि सत्य को एक नकारात्मक चीज के रूप में परिभाषित करते हैं। क्या यह सही को गलत और गलत को सही समझना, काले को सफेद में बदलना नहीं है? (हाँ, है।) सही को गलत और गलत को सही समझना, काले को सफेद में बदलना, भ्रमित करके अवधारणाओं में अदला-बदली करना—यह विकृति है। चाहे तुम सामान्य मानवता, जमीर और विवेक, सामान्य लोगों की सोच या उन विचारों और दृष्टिकोणों के बारे में जो विभिन्न मामलों के प्रति सामान्य लोगों में होने चाहिए, कैसे भी संगति करो, वे उसे ग्रहण नहीं कर सकते और आंतरिक रूप से वे उसे स्वीकारते ही नहीं हैं। उसे न स्वीकारने के अलावा, वे कुछ हास्यास्पद और विचित्र प्रथाएँ, व्यवहार, यहाँ तक कि ऐसे विचार और दृष्टिकोण भी गढ़ लेते हैं जो सामान्य मानवता के मार्ग से अलग होते हैं, उन्हें अपने अंदर कार्यान्वित करते हैं, और साथ ही इसे तमाम लोगों, घटनाओं और चीजों को मापने के मानक के रूप में इस्तेमाल करते हैं और मानते हैं कि जो कुछ भी उनके चरम विचारों, दृष्टिकोणों और व्यवहारों के अनुरूप नहीं है वह गलत है, जबकि जो कुछ भी उनके चरम विचारों, दृष्टिकोणों और व्यवहारों के अनुरूप है वह सही है और सत्य के अनुरूप है। क्या यह सही को गलत और गलत को सही समझना नहीं है? क्या यह काले को सफेद में बदलना नहीं है, क्या यह भ्रमित करके अवधारणाओं की अदला-बदली करना नहीं है? यह दानवों से पुनर्जन्म लेने वालों में विकृति की एक और अभिव्यक्ति है। यानी वे कभी सकारात्मक चीजें नहीं स्वीकारते, बल्कि गैर-सकारात्मक या नकारात्मक चीजों को सकारात्मक बताकर लोगों को उनका अनुकरण करने और नकल उतारने के लिए प्रेरित करते हैं और इससे लोगों को परमेश्वर से दूर करने का लक्ष्य प्राप्त करते हैं। यह भी एक तरह का चरम व्यवहार है।

जो लोग दानव हैं उनमें विकृति की एक और अभिव्यक्ति होती है : वे सत्य से जरा भी प्रेम नहीं करते। वे असामान्य, अलौकिक चीजों का अनुसरण करना पसंद करते हैं, हमेशा पूरी तरह से आध्यात्मिक सिद्धांतों और कहावतों का एक समुच्चय गढ़ना चाहते हैं, यहाँ तक कि इन अलौकिक मामलों के आधार के बारे में शोध भी करना चाहते हैं। वे इन चीजों को सत्य, दैनिक जीवन के क्रियाकलापों के लिए मार्गदर्शक, दिशा-निर्देश और लक्ष्य समझते हैं और इनका इस्तेमाल तमाम तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों से निपटने और उनका आकलन करने के लिए करते हैं। उदाहरण के लिए, जब उनके लिए चीजें सुचारु रूप से नहीं चलतीं, तो वे याद करते हैं कि पिछली रात उन्होंने क्या सपने देखे थे, क्या उनके आसपास कोई असामान्य परिघटना घटी थी या क्या कोई अशुभ संकेत मिले थे, और अपने भाग्य का निर्धारण करने के लिए उनमें कोई आधार खोजने की कोशिश करते हैं; ये ऐसी चीजें हैं जिनका वे हमेशा अनुसरण करते हैं। खासकर जब उनका सामना गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लोगों से होता है, तो वे उन्हें अशुभ समझते हैं और मानते हैं कि ऐसे लोगों से संपर्क उनकी जीवन-ऊर्जा समाप्त कर देगा और दुर्भाग्य लाएगा। इसलिए ऐसे लोगों से संपर्क होने के बाद वे अक्सर आईने में देखते हैं कि उनका माथा काला तो नहीं पड़ गया या उनके आसपास दुर्भाग्य का कोई भाव तो नहीं है। साधारणतया वे हमेशा यही मनन करते रहते हैं कि भला उनका भाग्य कैसा होगा। जब भी उनके पास खाली समय होता है, वे पुराने पंचांग पलटते हैं या ऑनलाइन जाकर भविष्य बताने वाली कहावतें खोजते हैं। उन्होंने जो सपना देखा या दूसरों से कोई अंधविश्वास भरी कहावत सुनी—इन सबको वे इस बात का अनुमान लगाने का आधार बना सकते हैं कि उनका भाग्य अच्छा है या बुरा। हालाँकि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन वे कभी अपने आसपास के लोगों, घटनाओं और चीजों के साथ पेश आने के आधार के रूप में परमेश्वर के वचनों का इस्तेमाल नहीं करते, न ही वे अपने आसपास घटने वाली हर घटना के साथ पेश आने के आधार के रूप में सत्य का इस्तेमाल करते हैं। इसके बजाय, वे हमेशा कुछ असामान्य अनुभूतियाँ तलाशते हैं। उदाहरण के लिए, अगर किसी दिन गाते समय वे थोड़े अस्वस्थ महसूस करते हैं, तो वे सोचते हैं, “क्या परमेश्वर मुझे रोक रहा है? क्या परमेश्वर नहीं चाहता कि मैं गाऊँ?” अगर वे किसी दिन सुसमाचार का प्रचार करने जाते हैं, तो भले ही उन्होंने किसी के साथ समय और स्थान स्पष्ट रूप से तय कर लिया हो, फिर भी उन्हें अपनी आत्मिक अनुभूति को समझने के लिए प्रार्थना करनी पड़ती है। प्रार्थना करने के बाद वे कुछ मिनट प्रतीक्षा करते हैं, लेकिन उन्हें कुछ महसूस नहीं होता। तब वे देखते हैं कि उस दिन सूर्य के साथ कोई असामान्य परिघटनाएँ तो नहीं हो रही हैं, या बाहर मुटरियाँ चहचहा तो नहीं रही हैं या कौवे काँव-काँव तो नहीं कर रहे हैं, इनका इस्तेमाल कर वे यह तय करते हैं कि उस दिन उनका भाग्य कैसा रहेगा, क्या सुसमाचार का प्रचार करने जाना सुचारु रूप से होगा और क्या उन्हें लोग प्राप्त होंगे। अगर ये तरीके काम नहीं करते, तो वे यह तय करने के लिए कि जाना है या नहीं, सिक्का तक उछालेंगे। अगर चित आता है तो उनके लिए इसका मतलब होता है कि चीजें सुचारु रूप से चलेंगी और वे लोगों को प्राप्त कर पाएँगे; अगर पट आता है तो इसका मतलब है कि चीजें सुचारु रूप से नहीं चलेंगी और उन्हें लोग प्राप्त नहीं होंगे। वे इन्हीं चीजों के आधार पर तय करते हैं कि उन्हें बाहर जाना है या नहीं। ऐसे लोग चाहे कितने भी लंबे समय से परमेश्वर में विश्वास कर रहे हों, वे सत्य को अपने अभ्यास के आधार या सिद्धांत के रूप में कभी इस्तेमाल नहीं करते। इसके बजाय, वे लोगों, घटनाओं और चीजों का आकलन करने, अपने आसपास घटित होने वाले विभिन्न मामलों से निपटने या वे सिद्धांत निर्धारित करने के लिए जिनके अनुसार उन्हें अभ्यास करना चाहिए, हमेशा उन अंधविश्वास भरी कहावतों या असामान्य अनुभूतियों और परिघटनाओं पर भरोसा करते हैं। वे हमेशा इन निराधार, विचित्र, अजीब, अलौकिक अनुभूतियों की तलाश में रहते हैं और हमेशा इन्हीं के आधार पर क्रियाकलाप करते और जीते हैं। कुछ लोग बाहर जाते समय काली बिल्ली देखकर यह मान लेते हैं कि यह दुर्भाग्य का प्रतीक है, और वे मामले को कुछ समय के लिए टाल देते हैं और घर के बाहर नहीं निकलते हैं। कुछ लोगों की कार कोई काम सँभालने के लिए जाते समय रास्ते में खराब हो जाती है और वे मानते हैं कि परमेश्वर उन्हें रोक रहा है, कि आज उनकी किस्मत खराब है और उन्हें बाहर नहीं निकलना चाहिए था। कुछ लोग बाहर जाते समय ताबूत देखकर मान लेते हैं कि आज भाग्यवश उन्हें धन की प्राप्ति होगी। कुछ भी करते समय ऐसा व्यक्ति हमेशा किसी तरह की अंधविश्वास भरी कहावत में आधार खोजता है; उसके पास सत्य पर आधारित अभ्यास के सटीक सिद्धांत नहीं होते। दूसरे लोग चाहे कैसे भी संगति करें या परमेश्वर का घर कैसे भी कार्य करे, वे सत्य सिद्धांतों के अनुसार जीना और कार्य करना कभी नहीं सीखते। अगर घर में कभी कोई असामान्य परिघटना घट जाए, जैसे नल का अचानक टूट जाना और रिसना, तो वे इसे अपशकुन मानते हैं। अगर कभी हवा का झोंका आने से खिड़की खुल जाए और शीशा टूट जाए तो उन्हें लगता है, “यह हवा का झोंका सामान्य नहीं है; यह आपदा का संकेत लगता है। क्या परमेश्वर मुझे बाहर जाने से रोक रहा है?” अगर उनके बाहर जाने पर बर्फबारी हो जाए तो वे कहते हैं, “देखो, जैसे ही मैं बाहर गया, बर्फबारी शुरू हो गई। लोग अक्सर कहते हैं, ‘जब ऊँचे पद वाले लोग बाहर जाते हैं तो हवा और बर्फ को आकर्षित करते हैं।’ लगता है मैं एक ऊँचे पद वाला व्यक्ति हूँ!” क्या यह बकवास नहीं है? वे हर चीज आँकने और तय करने के आधार के रूप में इन अजीब और विचित्र कहावतों का इस्तेमाल करते हैं। उदाहरण के लिए, अगर बाहर जाते समय उनके पीठ के थैले का पट्टा किसी दरवाजे के दस्ते में फँस जाता है, तो वे मानते हैं कि इसके लिए कोई कहावत है और इसका कोई अभिप्राय है। वे जल्दी से पंचांग से परामर्श करते हैं और देखते हैं कि इस समय चीजें करने बाहर जाने के लिए यह कहावत है : “सारे मामले प्रतिकूल हैं; बाहर जाने के लिए उपयुक्त नहीं हैं।” वे मनन करते हैं, “सारे मामले प्रतिकूल हैं—इसका मतलब है कि मैं कुछ नहीं कर सकता, मुझे घर पर ही रहना चाहिए। यह परमेश्वर है जो मुझे आराम करने और सुख लेने दे रहा है; यह परमेश्वर की सुरक्षा है!” यहाँ तक कि वे इसके लिए एक आधार भी ढूँढ़ लेते हैं। क्या यह हास्यास्पद नहीं है? स्थिति चाहे जो भी हो, उन्हें लगता है कि उसके लिए कोई न कोई कहावत होगी। क्या यह विचित्र नहीं है? अपने आसपास घटित होने वाली हर चीज को वे एक विचित्र परिघटना मानते हैं और उनके इन “विचित्र परिघटनाओं” को सँभालने का आधार तरह-तरह की विचित्र कहावतें होती हैं। वे अपने आसपास घटित होने वाली हर चीज के साथ पेश आने के लिए इन तरह-तरह की विचित्र कहावतों का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए अगर तुम ऐसे व्यक्ति के साथ रहते हो, तो तुम्हें अक्सर लगेगा कि वे विशेष रूप से विचित्र हैं। वे अचानक कुछ ऐसा कह सकते हैं जिससे तुम्हारा दिल जोरों से धड़कने लगे, तुम्हारे भीतर सिहरन दौड़ जाए। उदाहरण के लिए, देर रात कुत्ते का भौंकना सुनाई देना बहुत सामान्य है, लेकिन उनके लिए यह एक बड़ी घटना होती है। उन्हें जानकारी खोजनी होगी, शकुन-विचार और भविष्य-कथन का सहारा लेना होगा, ताकि यह पता चल सके कि कौन-सी कहावत उस समय कुत्ते के भौंकने का अर्थ बताती है। कुछ समय उनके साथ बातचीत करने और जुड़ने के बाद तुम कैसा महसूस करोगे? तुम निश्चित रूप से कुछ बेतुकी कहावतों से अक्सर बाधित होगे। क्या तुम्हारे दिल में शांति और आनंद होगा? (नहीं।) बिना शांति और आनंद के तुम उन्हीं की तरह बेचैन हो जाओगे, हर चीज के लिए कोई न कोई कहावत ढूँढ़ने की जरूरत महसूस करोगे। तुम्हारे खोज पर खोज करने पर परमेश्वर तुम्हारे दिल से ओझल हो जाएगा और तुम्हारे दिल में सिर्फ वही अंधविश्वास भरी कहावतें रह जाएँगी। इसका मतलब है कि तुम दुष्टात्माओं, दानवों और शैतानों द्वारा इस हद तक बाधित किए जा रहे हो कि तुम्हारे विचार क्षुब्ध हो गए हैं, तुम्हारे दिल में शांति या आनंद नहीं रहा, तुम्हारी सोच अराजक हो गई है और तुम सामान्य मानवता की अभिव्यक्तियाँ खो देते हो। इन अराजक विचारों और अराजक कहावतों से लोगों के जीवन की सामान्य व्यवस्था और प्रतिरूप पूरी तरह अव्यवस्थित हो जाते हैं। चाहे कुछ भी हो जाए, ऐसा व्यक्ति उसे किसी विचित्र कहावत से समझा सकता है और अंततः उसके साथ हास्यास्पद, अजीब तरीके से पेश आ सकता है। यह विकृति है। कुछ लोग तो ऐसे भी होते हैं जो किसी अगुआ द्वारा काट-छाँट किए जाने के बाद सोचते हैं : “आज सुबह मुझे महसूस हुआ कि मेरे शरीर के साथ कुछ ठीक नहीं है। चेहरा धोते समय मैंने देखा कि मेरा माथा काला पड़ा हुआ था। निश्चित रूप से आज मेरी काट-छाँट की गई। देखो, इसके संकेत हैं। इसलिए मुझे रोज जब भी फुरसत मिले, आईना देखना चाहिए। अगर मुझे दिखे कि मेरा माथा काला पड़ गया है, तो मुझे सावधान रहना होगा—हो सकता है कि मेरी काट-छाँट की जाए, हो सकता है मैं किसी दीवार से टकरा जाऊँ या किसी चीज से निराश हो जाऊँ।” जब कुछ लोग सुसमाचार का प्रचार करने जाते हैं और देखते हैं कि संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ता एक बहुत अच्छा इंसान है जिसका दिल लालायित रहता है और खोजता है, और संगति किए जाने पर वह सत्य स्वीकार सकता है, तो परमेश्वर का धन्यवाद करने के अलावा वे यह भी सोचते हैं : “कल मैंने सपना देखा कि मैं एक झरने में अपने पैर धो रहा हूँ। वह झरना धन का प्रतीक है और धन प्राप्त करना सुसमाचार के प्रचार के जरिये किसी को प्राप्त करने का प्रतीक है। इसलिए, आज इस व्यक्ति को प्राप्त करने के लिए मुझे परमेश्वर का भी धन्यवाद करना चाहिए; परमेश्वर ने पहले ही एक संकेत दे दिया है!” चाहे उनका सामना जिससे भी हो या उन्हें जो भी महसूस हो, वे हमेशा उसके मूल कारण का पता लगाना चाहते हैं और उन्हें हमेशा एक आधार खोजने की जरूरत पड़ती है। कुछ लोग इस अंधविश्वास भरी कहावत पर विश्वास करते हैं, “बाईं आँख का फड़कना अच्छे भाग्य की भविष्यवाणी करता है, लेकिन दाईं आँख का फड़कना विपत्ति की भविष्यवाणी करता है,” और इसी को अपने साथ घटित होने वाली घटनाओं का आकलन करने के आधार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। वे सत्य के लिए कभी प्रयास नहीं करते, न वे सत्य खोजते हैं और न ही विभिन्न मामलों का आकलन करने के आधार के रूप में सत्य का इस्तेमाल करते हैं। उनके दिल पूरी तरह से विभिन्न विचित्र, हास्यास्पद, अजीब, यहाँ तक कि अलौकिक कहावतों, विचारों और दृष्टिकोणों, पाखंडों और भ्रांतियों से भरे रहते हैं; वे इन चीजों में रमे रहते हैं।

कुछ लोग बाहर से बिलकुल सामान्य दिखाई देते हैं; उनका जीवन, कार्य और दूसरों के साथ मेलजोल कोई चरम, अलौकिक या विचित्र अभिव्यक्तियाँ नहीं दिखाते। लेकिन उनके साथ लंबे समय तक जुड़े रहने के बाद व्यक्ति को पता चलता है कि उनके मन और दिल पूरी तरह से तमाम तरह की हास्यास्पद, विचित्र और विकृत अंधविश्वासपूर्ण कहावतों से भरे हुए हैं, जो बुरी प्रवृत्तियों से उत्पन्न होती हैं और वे अपने आसपास घटित होने वाले विभिन्न मामलों का आकलन करने के लिए आधार के रूप में इन चीजों का इस्तेमाल करते हैं। यहाँ तक कि जब वे यह जानते हैं कि चीजें परमेश्वर की संप्रभुता, व्यवस्थाओं और संरक्षण के अधीन हैं, तब भी वे ऐसे मामलों की व्याख्या करने के लिए किसी तरह की अंधविश्वासपूर्ण कहावत आधार के रूप में खोजते हैं और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं की व्याख्या अंधविश्वासपूर्ण कहावतों से करते हैं। क्या यह विकृति नहीं है? (हाँ, है।) इतना सारा सत्य सुनने के बाद भी ऐसा कैसे है कि वे सत्य नहीं समझ सकते, समस्याएँ सत्य के साथ नहीं देख सकते और एक भी चीज सत्य के अनुरूप नहीं कह सकते? उनके दिल सत्य से रहित कैसे हो सकते हैं और उसके बजाय उन पाखंडों, भ्रांतियों और अंधविश्वासों के कब्जे में और उनसे भरे हुए कैसे हो सकते हैं? क्या यह विकृति नहीं है? (हाँ, है।) कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं, “चींटियों पर पैर नहीं रखना चाहिए! चींटी भी एक जीवित प्राणी है। अगर तुम किसी चींटी पर पैर रखते हो और उसे मार देते हो, और वह आध्यात्मिक क्षेत्र में लौटकर आकाश में उस बूढ़े व्यक्ति से तुम्हारी रिपोर्ट कर दे, तो तुम दंड भुगतोगे।” “अगर तुम कोई मछली मारते हो और उसका मुँह तुम्हारी ओर खुला रहता है, तो इसका मतलब है कि वह तुम पर आरोप लगा रही है! तुम वह मछली नहीं खा सकते; खाओगे तो तुम्हें दंड भुगतना होगा! मुर्गे, कुत्ते, बैल, सूअर मारना—यह सब जीवन लेना है; तुम इसके लिए दंड भुगतोगे!” उन्हें ये पाखंड और भ्रांतियाँ कहाँ मिलती हैं? क्या वे इन्हें इस दुष्ट मानवजाति से नहीं सुनते? वे एक कहावत यहाँ से और एक कहावत वहाँ से उठाते हैं, उन सभी को स्वीकारते हैं, यहाँ तक कि इन कहावतों को सर्वोच्च आदेश मानते हैं, उन्हें परमेश्वर की इच्छा जितना ही ऊँचा मानते हैं। कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी कुछ लोग ऐसी बातें कहते हैं, “तुम मुर्गे नहीं मार सकते। अगर तुम इस जन्म में मुर्गे मारोगे, तो अगले जन्म में मुर्गा बनोगे और किसी के हाथों मारे जाओगे। इसलिए तुम जीवन नहीं ले सकते; जीवन लेने पर तुम्हें दंड भुगतना पड़ेगा!” वे ऐसा कहते हैं, लेकिन जब मुर्गा खाने की बात आती है, तब वे खुद एक बार में ही एक पूरा मुर्गा खा सकते हैं। क्या यह विकृति नहीं है? दूसरे कहते हैं, “तुम जानवरों की खाल नहीं पहन सकते। जानवरों के मरने के बाद भी उनकी आत्माएँ महसूस कर सकती हैं। अगर तुम जानवरों की खाल पहनते हो, तो यह खुद को जानवर की आत्मा से आच्छादित करने जैसा है। अगर यह जानवर अन्यायपूर्ण तरीके से मरा है, तो यह तुम्हें ढूँढ़कर तुम्हारा पीछा कर सकता है और एक बार जब वह तुम्हारा पीछा करना शुरू कर देगा, तो फिर तुम्हें चैन नहीं मिलेगा।” बताओ, क्या ये कहावतें विचित्र नहीं हैं? (हाँ, हैं।) कुछ और लोगों के पास भी, किसी और को नकली बाल पहने देखकर, कुछ कहने के लिए होता है : “तुम्हारे पास जो नकली बाल हैं, हो सकता है उसके मूल मालिक की मृत्यु अन्यायपूर्ण ढंग से हुई हो; उसकी आत्मा अभी भी बालों में है। अगर तुम उसके बाल पहनोगे तो उसकी आत्मा तुम्हारा पीछा करेगी।” तमाम तरह की विचित्र, अजीब और बेतुकी कहावतें ऐसे व्यक्ति के लिए दिल में सँजोकर रखने वाली चीजें बन जाती हैं; ये उनके लिए सर्वोच्च निर्देश होते हैं। वे इन बेतुकी और हास्यास्पद कहावतों का ऐसे पालन करते हैं मानो वे सत्य हों, और फिर भी वे मानते हैं कि वे परमेश्वर के मार्ग पर चल रहे हैं। न सिर्फ वे खुद इनका पालन करते हैं, बल्कि दूसरों को भी ऐसा करने के लिए कहते हैं। अगर दूसरे लोग इनका पालन नहीं करते, तो वे उन्हें डराने-धमकाने के लिए डरावनी, रोंगटे खड़े कर देने वाली कहावतें तक इस्तेमाल करते हैं और उन्हें इनकी अनुपालना करने के लिए मजबूर करते हैं। जो लोग सत्य नहीं समझते, वे इनसे भयभीत हो जाते हैं। ये अजीब और हास्यास्पद कहावतें दानवों और शैतान द्वारा मानव-जगत में फैलाई गईं कुछ निराधार अफवाहें और भ्रांतियाँ होती हैं। एक तो ये लोगों की सामान्य सोच और स्वतंत्र इच्छा में हस्तक्षेप करती हैं और उन्हें नियंत्रित करती हैं; दूसरे, दानव और शैतान इन पाखंडों और भ्रांतियों का इस्तेमाल कुछ लोगों को अपने वश में करने के लिए करते हैं, जिससे ये लोग इस मानव-जगत में उनकी सेवा करते हैं और उनके निकास-मार्ग बनते हैं, उनके विभिन्न अजीब और विचित्र विचारों के कार्यान्वयनकर्ता बन जाते हैं। इसलिए इन विचित्र लोगों की किसी भी अभिव्यक्ति से आँकें तो उनका प्रकृति सार दुष्ट होता है। वे सत्य जरा भी नहीं स्वीकारते; वे विकृत चीजों का सबसे ज्यादा सम्मान करते हैं। यही समस्या है। जब लोग सत्य नहीं समझते और जब उनमें भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती, तब वे अक्सर अनजाने ही इन विचित्र और अजीब कहावतों से प्रभावित और गुमराह हो जाते हैं। लेकिन जब लोग सत्य समझते हैं, तब वे सामान्य विवेक और सामान्य सोच के आधार पर यह तय करना जानते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं, और जब उनके साथ घटनाएँ घटित होती हैं, तो वे जानते हैं क्रियाकलाप कैसे करने चाहिए, क्या कायम रखना चाहिए और क्या त्याग देना चाहिए। यही वह चीज है जिसे सामान्य मानवता वाले लोगों को समझना और कायम रखना चाहिए, न कि भेद पहचानने, आकलन करने और यह निर्णय लेने के लिए कि लोगों, घटनाओं और चीजों के साथ कैसे पेश आना है, इन अजीब और हास्यास्पद कहावतों का इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसे विचित्र व्यक्ति का भेद पहचानने के बाद क्या तुम उसका सार स्पष्ट रूप से देखते हो? उसका सार क्या है? वह विकृति का सार है। वह परमेश्वर को महान नहीं मानता, बल्कि शैतान को महान मानता है। यहाँ तक कि जब वह सत्य के किसी पहलू के बारे में बात करना चाहता है, परमेश्वर को धन्यवाद देना चाहता है या परमेश्वर द्वारा इंतजाम किए गए परिवेशों को स्वीकार करना चाहता है, तब भी वह अपने आधार के रूप में कोई विचित्र, अजीब, हास्यास्पद या बेतुकी कहावत खोजता है। उसके लिए ये विचित्र और हास्यास्पद कहावतें और विचार सत्य और परमेश्वर की संप्रभुता से ऊपर होते हैं। इसलिए ऐसे व्यक्ति का प्रकृति सार निस्संदेह एक विकृत सार होता है। क्योंकि जो जीवन वह जीता है वह शैतान का जीवन होता है, जिसकी वह बड़ाई, वकालत और सराहना करता है वह सत्य नहीं, बल्कि शैतान के पाखंड और भ्रांतियाँ होती हैं। भले ही तुम जो देखते हो वह उसका व्यक्तिगत व्यवहार है, इन व्यक्तिगत व्यवहारों के पीछे की प्रेरक शक्ति दानवों और शैतान के विभिन्न विचार और दृष्टिकोण होते हैं। हालाँकि वह बाहर से मानव प्रतीत होता है, फिर भी वह दानवों और शैतान के विभिन्न पाखंडों और भ्रांतियों के लिए एक निकास, उनका उत्तराधिकारी और गवाह होता है। वह जिसकी गवाही देता और वकालत करता है वह शैतान के पाखंड और भ्रांतियाँ होती हैं, सत्य नहीं। यह उनके विकृत प्रकृति सार की अभिव्यक्ति होती है।

मुझे बताओ, क्या देवदूत देख पाना किसी व्यक्ति के लिए अच्छी चीज है? अगर कोई सचमुच देवदूत देख सकता है तो यह निश्चित रूप से एक अच्छी चीज है। लेकिन अगर वह देवदूत सच्चा देवदूत न होकर देवदूत के भेस में शैतान है, तो उसे देखना बहुत खतरनाक है। अगर शैतान देवदूत का भेस बनाता है और तुम्हें उसे देखने देता है, तो यह तुम्हारे लिए अच्छी चीज है या बुरी चीज? (बुरी चीज।) तुम क्यों कहते हो कि यह बुरी चीज है? क्या सामान्य परिस्थितियों में नश्वर देह देवदूत को देख सकता है? (नहीं।) क्या मनुष्यों में यह क्षमता है? (हममें नहीं है।) सटीक रूप से कहें तो, मनुष्यों में शैतान या देवदूत, जो आध्यात्मिक क्षेत्र के हैं, उनको देखने की क्षमता नहीं है। लेकिन अगर तुम उन्हें देखते हो, तो क्या हो रहा है? क्या इसका मतलब यह नहीं है कि तुम्हारी देह की क्षमता कुछ बदल गई है? (हाँ।) बिल्कुल यही बात है। जब देह की क्षमता के साथ कोई अपप्राकृतिक परिघटना घटी है, तो क्या वह परमेश्वर द्वारा बदली गई थी, किसी और चीज द्वारा बदली गई थी या तुम्हारे द्वारा बदली गई थी? (शायद वह किसी और चीज द्वारा बदली गई थी।) तो क्या परमेश्वर इसे तुम्हारे लिए बदल देगा? (नहीं, परमेश्वर ऐसा कार्य नहीं करता।) जब लोग जीवित होते हैं, तब क्या परमेश्वर उनकी आस्था दृढ़ करने के लिए उनकी क्षमताएँ बदल देगा, क्या उन्हें देवदूत या आध्यात्मिक क्षेत्र की कुछ चीजें देखने देगा? क्या परमेश्वर ये चीजें करेगा? (नहीं।) हम निश्चितता के साथ कह सकते हैं कि वह नहीं करेगा। किसी व्यक्ति के उद्धार प्राप्त करने से पहले परमेश्वर ये चीजें बिल्कुल नहीं करेगा; यह निश्चित है, कोई शक नहीं है। फिर, अगर तुम्हारी देह की क्षमता अचानक बदल जाती है और कोई अलौकिक परिघटना घटित होती है—और उसे परमेश्वर ने नहीं बदला, न ही तुम खुद उसे बदल सकते—तो यह क्या हो रहा है? परमेश्वर ऐसी चीज नहीं करेगा और तुम खुद इसे बदल नहीं सकते। एकमात्र संभावना यह है कि शैतान और दुष्ट आत्माएँ तुम पर काम कर रही हैं; अर्थात् शैतान और दुष्ट आत्माओं ने तुम्हें गुमराह और नियंत्रित किया है, जिससे तुम अलौकिक अभ्यासों में संलग्न हो जाते हो, जिससे तुम ऐसी चीजें देख पाते हो जिन्हें सामान्य लोग नहीं देख सकते और ऐसे शब्द सुन पाते हो जो सामान्य लोग नहीं सुन सकते। यह अच्छी चीज बिल्कुल नहीं है। अगर शैतान तुम्हें ऐसी चीजें देखने देता है जिन्हें दूसरे लोग नहीं देख सकते, तो उसका मकसद क्या है? क्या यह तुम्हारे क्षितिज को व्यापक बनाने के लिए है, क्या यह तुम्हें आध्यात्मिक क्षेत्र के अस्तित्व में विश्वास दिलाने के लिए है, या क्या यह तुम्हें परमेश्वर में आस्था देने के लिए है? (नहीं।) जब शैतान तुम्हारे साथ ऐसा करता है तो क्या उसके इरादे या उद्देश्य नेक होते हैं? (नहीं।) निश्चित रूप से नहीं। शैतान तुम्हारी इस अपप्राकृतिक क्षमता का इस्तेमाल करके तुम्हें कुछ ऐसी चीजें देखने देता है जिन्हें सामान्यतः तुम नहीं देख सकते, और इससे वह तुम्हें ललचाता है और आध्यात्मिक क्षेत्र के मामलों में तुम्हारी रुचि बढ़ाता है। वह तुम्हें यह थोड़ा-सा लाभ, थोड़ा-सा स्वाद देता है और फिर तुम्हें वह स्वीकार करने के लिए फुसलाता है जो वह आगे करेगा। और वह क्या होगा? क्या शैतान तुम्हें सत्य प्रदान करेगा? क्या वह तुम्हें जीवन की आपूर्ति करेगा? नहीं, वह तुम्हें क्षत-विक्षत कर देगा, तुम्हारी देह की विभिन्न जन्मजात क्षमताओं को नष्ट कर देगा, फिर तुम पर कब्जा कर लेगा, तुम्हें परमेश्वर के पक्ष से छीन लेगा और तुमसे परमेश्वर का त्याग करवा देगा। चाहे शैतान किसी व्यक्ति को देवदूत या आध्यात्मिक क्षेत्र की कोई परिघटना देखने दे, मुझे बताओ, क्या यह अच्छी चीज है? (नहीं।) अगर कोई अक्सर ऐसी चीजें देख सकता है जिन्हें दूसरे नहीं देख सकते, या कहता है कि वह अक्सर अपनी छत पर देवदूत उड़ते हुए देखता है और कहता है कि देवदूत गौरवर्ण और साफ-सुथरे होते हैं और अक्सर उससे बात करते हैं, तो ऐसे व्यक्ति से सामना होने पर तुम्हें क्या करना चाहिए? (तुरंत दूर हो जाना चाहिए।) तुम्हें ऐसे व्यक्ति से तुरंत दूर हो जाना चाहिए; उससे किसी चीज की चर्चा मत करो। अगर तुम इस मामले में रुचि लेते हो और इस पर उससे चर्चा करते हो, तो यह खतरनाक है। उससे यह मत कहो, “तुम खतरे में हो; तुम हमेशा ऐसी चीजें देख सकते हो जिन्हें दूसरे नहीं देख सकते। तुम विकृत हो रहे हो, मैं अब तुम्हारे साथ नहीं रहूँगा।” तुम्हें ये चीजें कहने की जरूरत नहीं है; बस अपने दिल में सचेत रहो—इतना काफी है। शैतान और दानव पहले ही उसे निशाना बना चुके हैं, या यह व्यक्ति प्राकृतिक रूप से दानव है, इंसान नहीं। इंसान दानवों के साथ नहीं रह सकते। दानवों के साथ रहने वाले इंसानों का एक ही अंतिम परिणाम होता है : दानवों द्वारा निगल लिया जाना। जब तुम्हारा ऐसे व्यक्ति से सामना हो जो अलौकिक परिघटनाओं का अनुभव करता है, तो चाहे वह कितनी भी अजीब या विचित्र बातें कहे, तुम्हें बिल्कुल भी उत्सुक नहीं होना चाहिए। ऐसे लोगों से तुरंत दूर हो जाओ; उनका अवलोकन मत करो, अध्ययन मत करो या उन्हें बदलने की कोशिश मत करो, उन्हें सुसमाचार सुनाने और परमेश्वर में विश्वास करने के लिए प्रेरित करने की तो बात ही छोड़ दो। अगर तुम ऐसा करते हो तो तुम बहुत मूर्ख हो। यहाँ तक कि परमेश्वर भी ऐसे लोगों को नहीं चाहता जो दानव हैं; फिर भी तुम किसी दानव को परमेश्वर के घर में ले आओगे और उससे कर्तव्य निभवाओगे। क्या इससे कलीसिया के कार्य को लाभ हो सकता है? इससे न सिर्फ कोई लाभ नहीं होगा, बल्कि यह कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधाएँ भी लाएगा। हालाँकि तुम यह अच्छे इरादों से करते हो, फिर भी परमेश्वर इसे याद नहीं रखेगा और तुम्हारी निंदा तक करेगा; यह एक बुरा कर्म है। इसलिए तुम्हें ऐसी चीजें कभी नहीं करनी चाहिए। चाहे वह तुम्हारा कोई परिचित व्यक्ति हो या नहीं, चाहे वह तुम्हारे परिवार से हो, निकटतम रिश्तेदार हों, या मित्र हों, या वे भाई-बहन हों जिनके साथ तुम सहयोग करते हो—अगर वे अक्सर किसी को अपने आँगन में टहलते हुए देखते हैं या किसी को हमेशा दरवाजे की दरार से झाँककर उन्हें ताकते हुए देखते हैं, और वे अक्सर यह भी कहते हैं कि वे देवदूतों से बात कर सकते हैं, परमेश्वर उनसे जो कहता है वे उसे सुन सकते हैं, वे पहले से ही महसूस करते हैं कि वे विजयी नर बालक हैं, वे पहलौठे पुत्र हैं, ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें उठा लिया जाएगा—क्या तुम अभी भी ऐसे व्यक्ति को भाई-बहन मान सकते हो? (नहीं।) तुम लोगों को अपने दिलों में स्पष्ट होना चाहिए; ऐसे लोगों को भाई-बहन समझने की गलती मत करो, मूर्ख मत बनो। अगर तुम मूर्ख हो और ऐसे लोगों को देखकर सोचते हो, “ये विजेता हैं, पहलौठे पुत्र हैं, पूर्ण किए गए लोग हैं; इनके पास सत्य है, मुझे इनके करीब जाना चाहिए,” तो तुम न सिर्फ खतरे में हो, बल्कि तुम उनके द्वारा आसानी से गुमराह भी कर दिए जाओगे जो तकलीफदेह होगा। तुम लोगों का भेद नहीं पहचान सकते या उनके प्रकृति सार की असलियत नहीं जान सकते। क्या परमेश्वर ऐसा कार्य करेगा? परमेश्वर दानवों और शैतानों को नहीं बचाता। परमेश्वर का कार्य लोगों को सत्य की आपूर्ति करना है, ताकि वे सत्य समझकर, उसका अभ्यास करके और उसके प्रति समर्पण करके सत्य को अपना जीवन बनाना हासिल कर सकें, और सच्चा ज्ञान और परमेश्वर का सच्चा भय प्राप्त कर सकें, जिससे वे शैतान के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त हो सकें और उद्धार प्राप्त कर सकें। यही वह कार्य है जो परमेश्वर करता है। सिर्फ सत्य ही लोगों को बचा सकता है, कोई विचित्र कहावतें, पाखंड या भ्रांतियाँ नहीं। इन पाखंडों और भ्रांतियों का सत्य से कोई संबंध नहीं है; ये सिर्फ लोगों को गुमराह और भ्रष्ट कर सकती हैं, और लोगों को उद्धार प्राप्त करने में सक्षम बिल्कुल नहीं बना सकतीं। उद्धार प्राप्त करने, परमेश्वर के प्रति समर्पण हासिल करने और बुराई से दूर रहने के लिए लोगों के पास एकमात्र मार्ग सत्य स्वीकारना और सत्य का अभ्यास करना है; कोई दूसरा मार्ग नहीं है। उद्धार प्राप्त करने के लिए कुछ चरम तरीकों या कहावतों, या हास्यास्पद और अजीब कहावतों को सत्य के रूप में प्रस्तुत करने या उन्हें सत्य का स्थान देने का प्रयास मत करो। इनमें से कोई भी मार्ग काम नहीं करता; ये परमेश्वर से नहीं आए हैं।

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