सत्य का अनुसरण कैसे करें (15) भाग पाँच

ग. सत्य की जगह लेने की कोशिश करना

शैतान के बुरे सार वाले लोगों में विशेष रूप से दुर्भावनापूर्ण स्वभाव होते हैं। वे न सिर्फ सत्य के प्रति शत्रुता दिखाते हैं और सत्य पर हमला करते हैं, बल्कि सत्य की जगह लेने के लिए अपने ही पाखंडों और भ्रांतियों का इस्तेमाल भी करना चाहते हैं। उनकी मुख्य अभिव्यक्ति यह होती है कि जो कोई भी उनकी काट-छाँट करता है या उन्हें उजागर करता है, वे उससे घृणा करते हैं और उस पर हमला करते हैं, और उसके लिए चीजें मुश्किल बना देते हैं। यह स्वभाव सार बहुत बुरा होता है, किसी खूँखार जानवर के स्वभाव सार से भी ज्यादा क्रूर होता है। हालाँकि बाघों और शेरों में खूँखार स्वभाव होते हैं, लेकिन जब वे भूखे नहीं होते या जब तुम उनके लिए कोई खतरा नहीं बनते, तब वे तुम्हें नजरअंदाज कर देते हैं और तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाना चाहते। लेकिन दानव अलग होते हैं। अगर तुम उन्हें नजरअंदाज कर दो तो भी, जब तक तुम उनके रुतबे के लिए खतरा हो तब तक वे तुम्हें नहीं छोड़ेंगे; वे तुम पर हमला करने की पहल करेंगे—अगर तुम उन्हें उजागर कर दो और उनकी काट-छाँट कर दो तो वे यह और भी ज्यादा करेंगे। वे न सिर्फ कभी काट-छाँट स्वीकार नहीं करते, बल्कि वे कोई सही कथन या सुझाव सुनने से भी इनकार कर देते हैं। इसके बजाय, वे हार को जीत में बदलने, हर संघर्ष और मुकाबले में बढ़त हासिल करने, निष्क्रियता को पहल में बदलने के लिए दूसरे पक्ष से बदला लेने के तरह-तरह के तरीके सोचते हैं। मान लो तुम कलीसिया में किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हो जो नियमों का पालन नहीं करता, किसी संयम से बँधा नहीं है, किसी के द्वारा की गई आलोचना या विरोध बर्दाश्त नहीं कर सकता, जब कोई सत्य पर संगति करता है तो उसे स्वीकार नहीं करता, काट-छाँट किए जाने पर प्रतिरोध और बहस करता है, और जो कोई उसे उजागर करता है उससे नफरत करता है और उस पर हमला करता है—तो यह एक दानव है। कुछ लोग अपने काम में कुछ गलतियाँ कर देते हैं, और इससे पहले कि दूसरे लोग किसी चीज के लिए उनकी आलोचना करें या उन्हें उजागर करें, वे पहले ही हमला कर देते हैं, खुद को सही ठहराने और अपना बचाव करने के लिए हर तरह के तर्क ढूँढ़ने लगते हैं, कहते हैं कि उनके खराब काम के पीछे कारण और स्पष्टीकरण हैं और किसी ने उसे बिगाड़ा है, जिम्मेदारी दूसरों पर डालने और अपना नाम हटाने की हर संभव कोशिश करते हैं। जब कोई अपने भ्रष्ट स्वभाव पर संगति करता है और उसका गहन-विश्लेषण करता है, तब वे यह मानते हुए विशेष रूप से संवेदनशील हो जाते हैं कि यह असल में उनके बारे में है, और वे अपने अहंकार की रक्षा करने और अपनी गलतियाँ छिपाने का हर संभव प्रयास करते हैं, यहाँ तक कि सत्य पर संगति करने वालों की आलोचना और निंदा भी करते हैं। ऐसे लोग कभी अपनी गलतियाँ नहीं स्वीकारेंगे या आत्म-चिंतन नहीं करेंगे, पश्चात्ताप करना तो दूर की बात है। इसके बजाय वे खुद को छिपाने का, दूसरों की नजरों में पूर्ण लोग और दोषरहित व्यक्ति बनने का हर उपाय सोचते हैं—ऐसे लोग जिन्हें दूसरे लोग कभी गलती न करने वाले लोगों के रूप में देखते हैं। चाहे वे कोई वाक्यांश गलत बोलें, कोई गलत शब्द इस्तेमाल करें, या उनके काम में कुछ विचलन या खामियाँ हों, या वे कुछ भ्रष्ट स्वभाव और इरादे उजागर करें जो दूसरों को पता चल जाते हैं, उन्हें लगता है कि यह एक अपशकुन है, मानो कुछ भयानक होने वाला हो, उनका जीवन दाँव पर लगा हो या दुनिया खत्म हो रही हो। फिर वे खुद को सही ठहराने और अपना बचाव करने के विभिन्न तरीके सोचते हैं; यह उनकी सहज प्रतिक्रिया है। अपने आसपास के लोगों को धोखा देने के लिए वे कुछ दिखावे भी करते हैं, ऐसी चीजें कहते हैं जो लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप होती हैं, ऐसे शब्द कहते हैं जो लोगों का दिल जीत लेते हैं। वे खास तौर पर इस बात से डरते हैं कि लोग उनके असली रूप, उनकी कमजोरियाँ और खामियाँ न जान जाएँ, और खास तौर पर अपनी असली स्थिति उजागर होने से डरते हैं। वे कभी स्वीकार नहीं करते कि उनकी काबिलियत खराब है या उनकी मानवता में कोई समस्या है, और बेशक, वे स्वयं द्वारा की गई गलतियाँ या स्वयं द्वारा प्रकट किए गए भ्रष्ट स्वभाव तो बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते। वे खुद को पूरी तरह से छिपाकर रखते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि अनजाने में कुछ बाहर न आ जाए। उनका लक्ष्य अपने रुतबे और प्रतिष्ठा की रक्षा करना, लोगों के दिलों में हमेशा एक शानदार, निष्कलंक छवि बनाए रखना है, ताकि लोग यह सोचें कि उनकी मानवता में कोई दोष नहीं है, वे सत्य से प्रेम करते हैं और उसका अनुसरण करते हैं, सत्य का अभ्यास कर सकते हैं, कष्ट सह सकते हैं और कीमत चुका सकते हैं, और उनमें कोई भ्रष्ट स्वभाव नहीं हैं। ऐसे लोग इंसान नहीं, दानव होते हैं। दानव सत्य स्वीकार ही नहीं करते, यहाँ तक कि खुद को सत्य के साक्षात स्वरूप, एक पूर्ण छवि के प्रतीक के रूप में छिपाने का हर संभव तरीका सोचते हैं। यह विकृत भी है और बुरा भी, है ना? चाहे वे कितने भी वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते हों, वे हमेशा खुद को दोषरहित, परिपूर्ण व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं। अगर उनमें नकारात्मकता, कमजोरी या धारणाएँ हों तो भी वे कभी उन्हें उजागर करने की हिम्मत नहीं करते, बस उन्हें छिपाए रखते हैं। एक बार जब कोई उन्हें उजागर कर देता है, तो फिर वे उस व्यक्ति से घृणा करते हैं और उसे सताने के तरह-तरह के तरीके सोचते हैं, साथ ही अपनी छवि सुधारने के लिए विभिन्न तरीके और साधन इस्तेमाल करते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग हमेशा कुछ भ्रामक दानवी शब्द बोलते हुए और जानबूझकर काले को सफेद करते हुए और सही-गलत को गड्ड-मड्ड करते हुए अपना बचाव करते हैं, ताकि भेद पहचानने में असमर्थ कुछ लोगों को गुमराह कर अपने बारे में उनकी धारणा बदली जा सके और लोगों से अपने चरित्र-चित्रण का पुनर्मूल्यांकन करवाया जा सके। ऐसे लोग असली दानव होते हैं, जिनमें लेशमात्र भी मानवता नहीं होती। दानव चाहे जितना भी अच्छा निर्वहन कर लें, विभिन्न मामलों पर उनके जो भी दृष्टिकोण हों, संक्षेप में, चूँकि उनमें बुरी प्रकृति होती है, इसलिए वे सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण रहेंगे। अर्थात्, अपने दिलों की गहराइयों से वे कभी सत्य या सकारात्मक चीजें स्वीकार नहीं करते। वे परमेश्वर के वचन नहीं सुनते या स्वीकार नहीं करते; उनका प्रकृति सार परमेश्वर से घृणा करना होता है। परमेश्वर जो कुछ भी कहता है, उससे वे विकर्षण महसूस करते हैं। शायद तुम उनका विकर्षण महसूस न कर सको; बाहरी तौर पर, वे भी सभाओं में जाते हैं और परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं और हर सत्य के प्रति शत्रुता का रवैया नहीं दिखाते। लेकिन जब कुछ ऐसा होता है जो उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं होता या उनके हितों से जुड़ा होता है, तब वे परमेश्वर की, परमेश्वर के घर की और सत्य की आलोचना करेंगे, सत्य का अनुसरण करने वालों की आलोचना करेंगे और उन पर हमला करेंगे, और किसी भी सकारात्मक चीज की आलोचना करेंगे—वे अपनी बुरी प्रकृति उजागर करेंगे। इस समय तुम पाओगे कि सत्य स्वीकारने के लिए तैयार होने का उनका दावा सिर्फ दिखावा है; अपने दिलों की गहराई में वे सत्य से घृणा करते हैं और उसे ठुकराते हैं और उसे जरा भी नहीं स्वीकारते। लेकिन चूँकि वे खुद को छिपाने में माहिर हैं, इसलिए वे बिल्कुल फरीसियों की तरह कुछ लोगों को धोखा दे देते हैं।

जो लोग दानवों से पुनर्जन्म लेते हैं, वे सत्य के प्रति शत्रुता, आलोचना और हमलों के सिवा कुछ नहीं रखते; ऐसी मानसिकता के साथ उनके लिए सत्य स्वीकारना असंभव है। जब परमेश्वर के घर की कार्य व्यवस्थाओं की बात आती है, तो वे उन्हें बस सरसरी तौर पर पढ़कर सुना देते हैं ताकि दूसरे उन्हें सुन लें और फिर उन्हें लागू हुआ मान लेते हैं। जब वास्तविक कार्य करने का समय आता है, तब वे कार्य व्यवस्थाओं में अपेक्षित सिद्धांतों के अनुसार बिल्कुल अभ्यास नहीं करते, बल्कि अपनी इच्छा, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार कार्य करते हैं। यहाँ तक कि वे सिर्फ उन्हीं कार्य व्यवस्थाओं को लागू करेंगे जो उनके रुतबे और प्रतिष्ठा के लिए लाभदायक हों; अगर कार्य व्यवस्थाएँ उनकी प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के लिए लाभदायक नहीं होतीं, तो वे उन्हें लागू नहीं करेंगे, भले ही उनमें ऐसा करने की काबिलियत हो। ऐसा क्यों है? क्योंकि एक बार कार्य व्यवस्थाएँ लागू हो जाने पर लोग जान जाएँगे कि यह परमेश्वर के घर ने किया है और वे सिर्फ परमेश्वर को धन्यवाद देंगे, उन्हें नहीं; लोगों को लगेगा कि परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है और उन्हें यह नहीं लगेगा कि उनमें कोई गुण है, जिसका अर्थ है कि उन्हें प्रतिष्ठा, रुतबा या कोई लाभ प्राप्त नहीं होगा। यह एक कारण है। दूसरा कारण यह है कि चूँकि दानवों की प्रकृति सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण होती है, इसलिए वे कुछ भी सत्य सिद्धांतों के अनुसार नहीं करेंगे, बल्कि अपनी महत्वाकांक्षाओं, इच्छाओं और सहज प्रवृत्तियों के अनुसार क्रियाकलाप करेंगे। शैतान की सहज प्रवृत्तियाँ क्या हैं? बुराई करना और परमेश्वर का प्रतिरोध करना, परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ करना, और लोगों को परमेश्वर से दूर करवाना, उनसे परमेश्वर के साथ विश्वासघात करवाना और उसके बजाय अपनी आराधना करवाना। कलीसिया में आने का शैतान का उद्देश्य कलीसिया के कार्य में बाधा डालना और उसे नष्ट करना है। वह कलीसिया के कार्य में अराजकता और बाधा लाने वाला हर काम करेगा। अगर इससे उसके रुतबे या प्रतिष्ठा को कोई लाभ न हो तो भी, अगर यह कलीसिया के कार्य में गड़बड़, बाधा और क्षति ला सकता है तो वह अपना लक्ष्य प्राप्त कर चुका होता है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर का घर समस्त इलाकों की कलीसियाओं से अपेक्षा करता है कि वे हर महीने सुसमाचार प्रचार के जरिये प्राप्त लोगों की संख्या की सटीकता और सच्चाई के साथ रिपोर्ट करें। क्या वे इसे बिना किसी छल-कपट के कर सकते हैं? नहीं, वे धोखा देने और झूठी संख्याएँ बताने का हर तरीका सोचेंगे, इस महीने सौ अतिरिक्त लोगों की रिपोर्ट करेंगे, अगले महीने दो सौ अतिरिक्त लोगों की, और अगर किसी को पता नहीं चला, तो वे कई सौ और लोगों की रिपोर्ट करेंगे। वे कभी कार्य व्यवस्थाओं के अनुसार अभ्यास नहीं करते और चाहे उन्हें किसी भी समस्या का सामना करना पड़े, वे सत्य सिद्धांत नहीं खोजते; वे जिस तरह आचरण या क्रियाकलाप करते हैं, उसमें कोई नैतिक सीमाएँ नहीं होतीं। वे दानव हैं। चाहे सत्य पर कैसे भी संगति की जाए, वे उसे स्वीकार नहीं करेंगे। उनका जमीर भावना से रहित होता है; वे बेजमीर प्राणी हैं। परमेश्वर के घर की कार्य व्यवस्थाएँ परमेश्वर के वचनों की पुस्तकें वितरित करने के सिद्धांत निर्धारित करती हैं—वे किसे वितरित की जानी चाहिए और किसे नहीं। क्या वे इन सिद्धांतों के अनुसार क्रियाकलाप कर सकते हैं? (नहीं।) कार्य व्यवस्थाएँ निर्धारित करती हैं कि एक कलीसिया स्थापित करने के लिए कितने लोगों की आवश्यकता है, कितनी कलीसियाएँ एक जिले का गठन करती हैं, कितने जिले एक क्षेत्र का गठन कर सकते हैं और सभी स्तरों पर अगुआ स्थापित करने के लिए क्या शर्तें और सिद्धांत हैं। क्या वे इन सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कर सकते हैं? (नहीं।) वे ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जो परमेश्वर के घर के कार्य या भाई-बहनों के जीवन प्रवेश के लिए लाभदायक हो। वे मन ही मन सोचते हैं, “अगर मैं तुम्हारे लिए अच्छी तरह से काम करूँ और सभी भाई-बहन जीवन में आगे बढ़ें और मेरा भेद पहचान जाएँ, तो क्या मैं तब भी अपना स्थान और रुतबा बनाए रख पाऊँगा? निश्चित रूप से मैं तुम्हारे लिए खुद को थकाऊँगा नहीं! मैं बस बेतरतीबी से काम करूँगा। परमेश्वर का घर अपेक्षा करता है कि पचास लोग एक कलीसिया गठित करें, लेकिन मैं अस्सी या नब्बे पर जोर दूँगा। रही बात यह कि कलीसिया के अगुआओं का चुनाव कैसे किया जाता है, तो यह इस पर निर्भर करता है कि मुझे किस अभ्यास से लाभ होता है। अगर कलीसिया का चुना गया अगुआ मेरी पसंद का न हुआ, तो मैं किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करूँगा जो मेरी बात सुने और मेरी आज्ञा माने।” उनके इस तरह काम करने से क्या सामान्य कलीसियाई जीवन साकार हो सकता है? इसमें बहुत समय लगेगा। सामान्य कलीसियाई जीवन के बिना क्या भाई-बहन जीवन प्रवेश में तेजी से आगे बढ़ सकते हैं? क्या नए विश्वासी जल्दी से नींव स्थापित कर सकते हैं? (नहीं।) कहने का तात्पर्य यह है कि ये नकली अगुआ और मसीह-विरोधी, जो कि दानव हैं, ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जो भाई-बहनों के जीवन प्रवेश के लिए लाभदायक हो। तुम उन्हें पूरी ऊर्जा के साथ व्यस्त देखते हो, लेकिन वे कर क्या रहे हैं? वे सिर्फ अपनी प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के लिए काम कर रहे हैं। वे जो चाहें करते हैं, जब तक कि इससे उन्हें लाभ होता है, और खुद को ऐसा करने की पूरी स्वतंत्रता देते हैं। उनकी जो भी महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ होती हैं, सत्ता हासिल करने पर वे उन्हें पूरी तरह से साकार करेंगे; वे यह मौका बिल्कुल नहीं चूकेंगे। जहाँ तक कलीसियाई जीवन की, भाई-बहनों के जीवन प्रवेश की, कलीसिया की व्यवस्था की और परमेश्वर के घर के सुसमाचार कार्य और दूसरे क्षेत्रों में कार्य के आगे बढ़ने या सुचारु रूप से आगे बढ़ने की बात है—इनमें से कोई भी उनकी चिंता का विषय नहीं होता। उदाहरण के लिए, अगर उन्हें बताया जाए कि कलीसिया को किताबें कैसे और किसे वितरित करनी चाहिए, तो वे सोचते हैं, “इतना सख्त होने की जरूरत नहीं है। मैं उन्हें कैसे भी वितरित कर दूँगा और बस हो जाएगा।” जब उनसे यह पूछा जाता है कि क्या कलीसिया में किताबें रखने की जगह सुरक्षित है, तो वे कहते हैं, “किसे पड़ी है कि वह सुरक्षित है या नहीं? कुछ भी हो, हमारे पास किताबें रखने की जगह है, इसलिए यह ठीक है।” देखो, उनके पास उच्चाधिकारियों की नीतियों के प्रतिकार के उपाय हैं। वे परमेश्वर के घर की कोई भी कार्य व्यवस्था या अभ्यास के विशिष्ट सिद्धांत लागू नहीं करते; इसके बजाय वे अपने विचारों और तरीकों के अनुसार क्रियाकलाप करते हैं। क्या यह सत्य की जगह अपने अभ्यासों का उपयोग करने की कोशिश करना नहीं है? अगर परमेश्वर के चुने हुए लोग ऐसे दानवों के हाथों में पड़ गए, तो वे कष्ट झेलेंगे—दानव जो चाहें सो करेंगे और हर किसी को उनकी बात सुननी होगी, मानो वे डाकुओं के सरगना हों, स्थानीय तानाशाह, मालिक या सम्राट हों। परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए सामान्य कलीसियाई जीवन जीना असंभव होगा, उनके लिए सच्चे मार्ग पर शीघ्रता से नींव स्थापित करना असंभव होगा और उनके लिए विभिन्न सत्यों में तेजी से प्रगति करना असंभव होगा। दानव एक भी अच्छा काम नहीं करेंगे। कहीं भी कोई कलीसिया बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों से बाधाएँ महसूस करती है और अराजकता की स्थिति उत्पन्न होती है, तो इससे यह साबित होता है कि उस कलीसिया के अगुआ वास्तविक कार्य करने में अक्षम हैं और सिर्फ नाममात्र के अगुआ हैं। जो भाई-बहन विश्वास में नए हैं, वे नींव स्थापित करने से पहले ही मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह कर दिए जाते हैं और कलीसियाई जीवन भी अराजकता में डूब जाता है। यह सब झूठे अगुआओं द्वारा वास्तविक कार्य न करने के कारण होता है। क्या ऐसा हो सकता है कि झूठे अगुआओं के पास वास्तविक कार्य करने का समय न होता हो? (नहीं।) अगर वे यह अनिवार्य कार्य करना चाहते, तो उनके पास पर्याप्त से ज्यादा समय होता, लेकिन वे बस उसे करते नहीं हैं। यह दानवों की बुरी प्रकृति उजागर करता है। वे कलीसिया में अराजकता न होने से ज्यादा किसी चीज से नहीं डरते, वे चाहते हैं कि वह पूरी तरह से अराजक हो जाए, वे कलीसिया के कार्य में अराजकता और ठहराव की स्थिति की लालसा रखते हैं, वे आशा करते हैं कि कलीसिया के तमाम सदस्य बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों की आज्ञा मानेंगे और मसीह-विरोधियों, बुरे लोगों और दानवों द्वारा गुमराह किए जाएँगे और परमेश्वर का अनुसरण नहीं करेंगे। यह ठीक वही होगा जो वे चाहते हैं और वे खुश और संतुष्ट होंगे। जब भाई-बहनों का कलीसियाई जीवन सामान्य होता है, वे सामान्य रूप से परमेश्वर के वचन खा-पी सकते हैं और सत्य पर संगति कर सकते हैं, और कलीसियाई जीवन में भाग लेकर हर बार कुछ न कुछ हासिल कर सकते हैं, तब वे असहज महसूस करते हैं। क्योंकि अगर लोग हमेशा कुछ न कुछ हासिल करते रहते हैं और जीवन में धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहते हैं, तो वे उनका भेद पहचान जाएँगे और उन्हें अस्वीकार कर देंगे, और वे अपना रुतबा खो देंगे, और यह एक ऐसा परिणाम है जो वे नहीं देखना चाहते। उन्हें लगता है कि कलीसिया जितनी ज्यादा अव्यवस्थित होगी, उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने के उतने ही ज्यादा मौके मिलेंगे, अपनी प्रतिभा का उपयोग करने की उतनी ही ज्यादा गुंजाइश रहेगी, और वे उतना ही ज्यादा अपने रंग में रह सकेंगे और अराजकता में जीत खोज सकेंगे। वाकई दानवों की यही साजिश होती है! जहाँ दानव मौजूद होते हैं, वहाँ कोई सत्य सिद्धांत और कोई विशिष्ट कार्य व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती। भाई-बहन कार्य व्यवस्थाएँ पढ़ने में समर्थ नहीं होते और उनके पास अपना कर्तव्य निभाने का कोई रास्ता नहीं होता। जब कलीसिया में अराजकता फैलती है, तब ये झूठे अगुआ और मसीह-विरोधी, जो दानव होते हैं, उसे बिल्कुल नहीं सुलझाते, यहाँ तक कि गुप्त रूप से खुशी भी मनाते हैं। वे गड़बड़ी पैदा करने का हर संभव तरीका सोचते हैं, किसी दूसरे दानव या मसीह-विरोधी को अगुआ नियुक्त करते हैं जिससे कलीसिया और भी ज्यादा अराजक हो जाती है; इससे उन्हें और ज्यादा खुशी मिलती है। क्या यह वैसा ही नहीं है, जैसे बड़ा लाल अजगर चीजें करता है? बड़ा लाल अजगर लोगों को परमेश्वर में विश्वास करने, उसका अनुगमन करने या अपना कर्तव्य निभाने नहीं देता; वह लोगों को सिर्फ पार्टी की बात सुनने और पार्टी का अनुगमन करने देता है। वे खा-पी सकते हैं, मौज-मस्ती कर सकते हैं और कोई भी अपराध कर सकते हैं; वे चाहे जो अपराध करें, वह उन्हें नहीं रोकता। समाज में कई स्थानीय गुंडे, बदमाश और वेश्याएँ हैं; लोग पाप में जीते हैं और पाप के मजे लेते हैं, इसलिए कोई राष्ट्रीय मामलों की परवाह नहीं करता, और कोई यह जाँच नहीं करता कि सीसीपी ने पर्दे के पीछे कितनी बुराई की है। इसे ध्यान भटकाना कहते हैं। चीन पर अपने कई वर्षों के शासन के दौरान बड़े लाल अजगर की सबसे कारगर रणनीति विभिन्न देशों से विभिन्न बुरी प्रवृत्तियाँ, बुरे विचार और दृष्टिकोण चीन में लाना रही है। इसके बाद चीनी लोग सेक्स के मामले में पूरी तरह आजाद हो गए हैं, उनके मन खुले हैं और सेक्स पर बात करने का उनका तरीका भी खुला है। वे दिन भर इन्हीं चीजों के बारे में सोचते रहते हैं। आम लोगों की जिंदगी क्या हो गई है? वह भोजन और सेक्स, उनकी प्राकृतिक इच्छाओं के इर्द-गिर्द घूमती है। तमाम आम लोग ऐसे ही दुष्चक्र में फँसे हुए हैं, इसलिए वे राजनीति और शासकों के प्रति अपनी सतर्कता कम कर देते हैं, राजनीति और शासकों के प्रति कोई संवेदनशीलता नहीं रखते और अब उनकी परवाह भी नहीं करते। अफीम के नशेड़ियों की तरह उनकी इच्छाशक्ति क्षीण हो जाती है। पुरुषों में अब करियर बनाने की महत्वाकांक्षा नहीं रही और महिलाओं में अब अच्छी पत्नी और प्यारी माँ बनने की इच्छा नहीं रही। लोग सही मार्ग पर नहीं चलते या उचित कार्य नहीं करते। कोई भी राजनीति में भाग नहीं लेता और हर कोई पूरी तरह से बड़े लाल अजगर के अधीन है। इस तरह, बड़े लाल अजगर का शासन मजबूत हो गया है, क्योंकि ऐसे लोगों पर शासन करना आसान होता है। “शासन करना आसान होने” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि बड़ा लाल अजगर आम लोगों पर चाहे जितना भी अत्याचार करे, उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती और उन्हें इसे सहना ही होता है। क्या ठीक यही वह प्रभाव नहीं है जो अब प्राप्त हुआ है? (हाँ।) चीनी फिल्मों या ऑनलाइन वीडियो पर नजर डालो; उनमें से अस्सी से नब्बे प्रतिशत यौन इच्छा या स्त्री-पुरुष संबंधों के बारे में होती हैं। इनका लोगों पर भयंकर प्रभाव पड़ता है; ये बच्चों और नाबालिगों की रक्षा नहीं करते। पश्चिमी देशों के बाशिंदों के इस संबंध में कड़े विनियम हैं; वे बच्चों और नाबालिगों की सुरक्षा करते हैं और उनके लिए निवारक उपाय करते हैं। चीनी युवा आज ऐसे सामाजिक परिवेश में बड़े होते हैं। बहुत कम उम्र में ही उनके मन में रोमांस, प्रेम, सेक्स और विवाह जैसी बातें ठूँस दी जाती हैं। यह भयावह है! अगर मानवजाति ऐसे सामाजिक संदर्भ में रहती है और सामाजिक परिवेश के अनुकूलन और शिक्षा के माध्यम से मानवजाति की सामान्य शारीरिक आवश्यकताएँ शैतान द्वारा पतित स्तर तक भ्रष्ट कर दी जाती हैं, तो लोगों के दिल दुष्ट और पतित हो जाएँगे। दुष्टता और पतितता की एक अभिव्यक्ति यह है कि लोगों में इस संबंध में शर्मिंदगी की कोई भावना नहीं होती या इस संबंध में शर्मिंदगी की भावना का उनका मानक नीचा कर दिया जाता है। चूँकि कुछ लोगों में जमीर और विवेक होता है, इसलिए उनके दिलों में एक रेखा होती है जिसे वे पार नहीं करते; यह शर्मिंदगी की वह छोटी-सी भावना है जिसे उनका अल्प जमीर और विवेक प्राप्त कर सकता है। लेकिन परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी ये लोग उस सामाजिक संदर्भ में पले-बढ़े होने की छाया और छाप लिए रहते हैं। आज कुछ लोग धीरे-धीरे उनसे छुटकारा पा रहे हैं, जबकि कुछ अभी भी उस छाया में जी रहे हैं और उससे बाहर नहीं निकले हैं। ऐसे सामाजिक परिवेश और पृष्ठभूमि में पले-बढ़े लोगों की सकारात्मक चीजों के लिए, न्याय के लिए आंतरिक इच्छा और सही मार्ग पर चलने का उनका संकल्प, निश्चय या उसकी लालसा कुछ हद तक नष्ट हो चुकी होती है। “नष्ट होने” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि ऐसे सामाजिक परिवेश से अनुकूलित और शिक्षित होने के कारण इन लोगों का सकारात्मक चीजों की लालसा करने और प्रकाश और न्याय का अनुसरण करने का दृढ़ संकल्प, दृढ़ता और इच्छाशक्ति बहुत कमजोर होती है; वे किसी तूफान, किसी बाधा या किसी पराजय का सामना नहीं कर सकते। यह उन लोगों की तरह है जिन्होंने अफीम का सेवन किया है; अगर वे छोड़ भी दें तो भी नशे का नुकसान यहीं नहीं रुकता। जब उन्हें बाधाएँ या असफलताएँ मिलती हैं, जब वे हतोत्साहित या नकारात्मक महसूस करते हैं, तब वे फिर से नशे की लत में पड़ सकते हैं और अपने मन को सुन्न करने और जीवन की विभिन्न कठिनाइयों से बचने के लिए फिर से अफीम का सेवन कर सकते हैं। यानी उनके लिए नशे की लत हमेशा के लिए छोड़ना असंभव है; इस सफर के दौरान, उन्हें फिर से नशे की लत लग जाएगी, वे अपने पुराने तौर-तरीकों पर लौट जाएँगे और जीवन की विभिन्न समस्याएँ हल करने के लिए वही तरीका इस्तेमाल करेंगे। ऐसे बुरे सामाजिक परिवेश और पृष्ठभूमि में पले-बढ़े इन लोगों ने शैतान से कई पाखंड और भ्रांतियाँ पाई हैं, जिन्होंने उनके दिलों में गहरी जड़ें जमा ली हैं। सत्य का अनुसरण करने की उनकी इच्छा अभी भी बहुत कमजोर है, और वे शैतानी बुरी शक्तियों द्वारा गुमराह किए जाने और बहकाए जाने का या उनके विभिन्न प्रलोभनों का सामना नहीं कर सकते। अर्थात्, हालाँकि ये लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं फिर भी जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण, उनकी मूल्य-पद्धति, प्रेम के प्रति उनका दृष्टिकोण और सुख के प्रति उनका दृष्टिकोण, सभी बुरी प्रवृत्तियों से गहराई से प्रभावित और अनुकूलित हैं, यहाँ तक कि वे इन चीजों से बँधे और जकड़े हुए हैं। कुछ लोग अभी भी सुखी विवाह, दो लोगों की दुनिया की चाहत रखते हैं और यौन इच्छा तृप्त करने के लिए दुनिया की बुरी प्रवृत्तियों की ओर लौट जाना चाहते हैं। इन लोगों का उन बुरे विचारों और दृष्टिकोणों से फिर से पूरी तरह भर जाना या नियंत्रित होना बहुत आसान है। खासकर जब लोग प्रेम और विवाह से जुड़ी कुछ फिल्में देखते हैं, तब उनके दिल कमजोर हो जाते हैं, वे उन गैर-विश्वासियों से ईर्ष्या करने लगते हैं जो विवाहित हैं, प्रेम करते हैं और जीवन का आनंद ले रहे हैं, और उनमें सत्य का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य निभाने की इच्छा खत्म हो जाती है। यह बहुत भयानक चीज है। इन वास्तविक स्थितियों से यह देखा जा सकता है कि आज तक परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए अनगिनत कष्ट सहने के बावजूद हर व्यक्ति अभी भी सुरक्षित नहीं है। शायद तुम्हें लगता है कि तुम सत्य का अनुसरण करने, सत्य को स्वीकार करने और सत्य का अभ्यास करने में अपनी पूरी ताकत पहले ही झोंक चुके हो, लेकिन मनुष्य पर शैतान के कहर के प्रभाव अभी तुममें खत्म नहीं किए गए हैं, इसलिए तुम अभी बहुत खतरे में हो।

आओ, दानवों की बुरी अभिव्यक्तियों पर संगति जारी रखते हैं। दानवों की बुरी अभिव्यक्तियाँ बहुत ज्यादा हैं; तुम कह सकते हो कि वे सर्वव्यापी हैं—तुम उन्हें लोगों के किसी भी समूह में पाओगे। हम दानवों की विभिन्न बुरी अभिव्यक्तियाँ मुख्यतः सत्य के अनुसार मापते हैं, ताकि उनके बुरे सार का निरूपण किया जा सके। यह सबसे सटीक तरीका है। सत्य के प्रति दानवों के विभिन्न रवैयों—उसके प्रति शत्रुतापूर्ण होना, उस पर हमला करना और उसकी जगह लेने का प्रयास करना—के आधार पर, ऐसे व्यक्ति का प्रकृति सार एक बुरा सार, दानव का सार होता है। वह कभी नहीं बदलेगा, क्योंकि वह कभी सत्य नहीं स्वीकारता और सत्य को कभी सकारात्मक चीज नहीं मानता। वह सत्य को सकारात्मक चीज क्यों नहीं मानता? क्योंकि उसमें मानवता नहीं होती और वह दानव होता है; वह सत्य नहीं स्वीकार सकता और उसमें सत्य स्वीकारने की कोई क्षमता नहीं होती, न ही उसे सत्य स्वीकारने की कोई आवश्यकता होती है। तो फिर, उसे किस चीज की आवश्यकता होती है? वह है बुरी चीजें करना, ऐसी चीजें जो परमेश्वर और सत्य की विरोधी होती हैं और ऐसी चीजें जो सत्य पर आक्रमण करती हैं और उसका स्थान लेती हैं। यही उसका मिशन होता है और यह उसके प्रकृति सार से भी आदेशित होता है। इसलिए, अंत में ऐसे लोगों को सिर्फ कलीसिया से बाहर ही निकाला जा सकता है। परमेश्वर के घर में उनके लिए कोई स्थान नहीं है, न ही उनके निभाने के लिए कोई कर्तव्य है। परमेश्वर के घर को उनकी जरा भी आवश्यकता नहीं है। जो लोग परमेश्वर के घर में ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते हैं, चाहे वे सत्य से प्रेम करते हों या नहीं, वे कम से कम व्यक्तिपरक रूप से सत्य स्वीकारने के इच्छुक होते हैं, सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण नहीं होते, कभी सत्य से इनकार नहीं करेंगे और कभी परमेश्वर की आलोचना, उस पर हमला या उसकी निंदा नहीं करेंगे। निस्संदेह, वे जानबूझकर कोई ऐसा कथन नहीं कहेंगे या ऐसे व्यवहारों या अभ्यासों में संलग्न नहीं होंगे जो सत्य का स्थान लेते हों। शैतान और दानवों की बुरी अभिव्यक्तियाँ—सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण होना, सत्य पर हमला करना और सत्य की जगह लेना—यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि शैतान में बुरा सार है; वे कलीसिया में नहीं रह सकते। जैसे-जैसे परमेश्वर के चुने हुए लोग सत्य ज्यादा से ज्यादा समझते हैं और जैसे-जैसे ज्यादातर लोग विभिन्न प्रकार के ऐसे लोगों का भेद पहचानते हैं जो सत्य से विमुख और उसके प्रति शत्रुतापूर्ण होते हैं, वैसे-वैसे उन लोगों का प्रकृति सार, जो दानव हैं, ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट रूप से उजागर होता जाता है और लोगों द्वारा ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट और सटीक रूप से जाना जाता है और उसका भेद पहचाना जाता है। इसलिए, ये लोग दूसरों द्वारा लगातार और अधिक अस्वीकृत होते जाते हैं और दूसरों के साथ सौहार्दपूर्ण ढंग से रहने और सहयोग करने में लगातार और अधिक असमर्थ होते जाते हैं। अंततः, तब उन्हें सिर्फ धीरे-धीरे हटाया ही जा सकता है। क्या तुम लोग ऐसे लोगों को हटाए जाते हुए देखना चाहते हो? (हाँ।) उनका धीरे-धीरे हटाया जाना एक अच्छी बात है। एक तो यह साबित करता है कि परमेश्वर के चुने हुए ज्यादातर लोगों का आध्यात्मिक कद बढ़ा है और उन्होंने उनका भेद पहचान लिया है जो दानव हैं, अब वे उन्हें परमेश्वर में विश्वास करने वाले या भाई-बहन नहीं मानते। दूसरे, जो दानव हैं उनके द्वारा की गई चीजें लगातार और अधिक उजागर होती जाती हैं। लोग उनका प्रकृति सार उजागर कर देते हैं और हर कोई देख लेता है कि वे जो सेवा प्रदान करते हैं वह मानक स्तर की नहीं है; वे सिर्फ कलीसिया में बाधाएँ और गड़बड़ियाँ पैदा करते हैं और कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं डालते। एक बार जब उन्हें हटा दिया जाता है और बाहर निकाल दिया जाता है, तो फिर कलीसिया का कार्य सामान्य रूप से आगे बढ़ता है। जो लोग दानव होते हैं, उनमें कोई मानवता नहीं होती; वे जानवरों से भी बदतर होते हैं। कुछ जानवर अपने मालिकों की बात सुनना जानते हैं, लगन से काम करते हैं और अपने मालिकों के लिए परेशानी खड़ी नहीं करते। जानवरों के पास कुछ विवेक होता है, लेकिन दानव इसे हासिल नहीं कर सकते। अगर तुम कोई कर्तव्य करने के लिए उनका इस्तेमाल करते हो, तो फिर भी तुम्हें उनका पर्यवेक्षण करने के लिए कुछ लोगों की व्यवस्था करनी होगी। अगर वे आज्ञाकारी ढंग से सेवा कर सकें, तो यह स्वीकार्य होगा, लेकिन वे ठीक से सेवा प्रदान नहीं करेंगे। अगर तुम उनका पर्यवेक्षण भी करते हो तो भी ऐसे अवसर हमेशा होंगे जब तुम उन पर नजर नहीं रख पाओगे। अगर तुम एक पल के लिए भी उनसे नजरें हटा लो या एक चीज नजरअंदाज कर दो, तो दानव इस खामी का फायदा उठाएँगे और कलीसिया के कार्य में अराजकता और परेशानी पैदा कर देंगे। तुम उन पर नजर रखने के लिए कई लोगों का इस्तेमाल करते हो, और फिर भी अंत में, उनके द्वारा फैलाई गई गंदगी साफ करने के लिए तुम्हें कई लोगों की जरूरत पड़ेगी। तुम्हें लगेगा कि किसी कर्तव्य के लिए उनका इस्तेमाल करने से बहुत बड़ा नुकसान होता है, यह इसके लायक नहीं है, और उनका इस्तेमाल करना बहुत कष्टदायक और क्रोधित करने वाला है। उन्हें काम करते देखना जानवरों को काम करते देखने जैसा है; वे कभी वह नहीं कर सकते जो सामान्य लोग कर सकते हैं। अंततः तुम उनकी असलियत जान जाओगे: ऐसे लोग जानवर हैं, वे दानव हैं; वे कभी नहीं बदलेंगे। जानवर और दानव कभी सत्य नहीं स्वीकारेंगे। अंततः तुम इस मामले को स्पष्ट रूप से समझ जाते हो और अंततः तय करते हो कि फिर कभी दानवों का इस्तेमाल नहीं करोगे और तुम उन्हें दूर कर देते हो। क्या जानवर और दानव मनुष्य बन सकते हैं? यह असंभव है। बड़े लाल अजगर से कसाई का चाकू नीचे रखवाना असंभव है; उसकी प्रकृति दानव की प्रकृति है—वह बिना पलक झपकाए लोगों को मार देता है। दानव और शैतान एक ही गुट के हैं। तुम जिस तरह से बड़े लाल अजगर को देखते हो, उसी तरह से तुम्हें इन जानवरों और दानवों को देखना चाहिए; यह सही है। अगर दानवों को देखने की तुम्हारी नजर शैतान और बड़े लाल अजगर को देखने की नजर से अलग है तो इससे साबित होता है कि तुम्हें अब भी दानवों के सार की पूरी समझ नहीं है; अगर तुम अब भी उन्हें मनुष्य समझते हो, मानते हो कि उनमें मानवता है, उनमें कुछ सराहनीय गुण हैं और उन्हें अभी भी छुटकारा दिलाया जा सकता है और तुम्हें उन्हें अभी भी मौके देने की जरूरत है तो तुम अज्ञानी हो, तुम फिर से उनके झाँसे में आ गए हो और तुम्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। उनके झाँसे में आने से बचने के लिए तुम्हें दानवों को पूरी तरह से बाहर निकाल देना चाहिए। उनके साथ कोई नरमी मत बरतो! ठीक है, दानवों की बुरी अभिव्यक्तियों पर आज की संगति में बस इतना ही। अलविदा!

17 फरवरी 2024

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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