सत्य का अनुसरण कैसे करें (16) भाग एक
उत्पत्तियों के आधार पर लोगों की तीन श्रेणियाँ
हमारी हाल ही की संगति की विषय-वस्तु विभिन्न प्रकार के लोगों का भेद पहचानने के बारे में रही है—उनकी उत्पत्तियों के आधार पर उनकी विभिन्न श्रेणियों और वर्गीकरणों में अंतर करना और फिर वास्तविक जीवन में विभिन्न प्रकार के लोगों की विविध अभिव्यक्तियों के जरिए उनके सार का भेद पहचानना। विभिन्न प्रकार के लोगों का भेद पहचानना सीखना इस संबंध में फायदेमंद है कि उनसे सही ढंग से कैसे पेश आया जाए और खुद से सही ढंग से कैसे पेश आया जाए, है ना? (हाँ।) क्या इन चीजों पर संगति करने से परमेश्वर में विश्वासियों के बारे में लोगों की पिछली धारणाएँ और कल्पनाएँ भी हल नहीं हो गई हैं? उदाहरण के लिए, बहुत-से लोग सभी विश्वासियों से भाई-बहनों की तरह पेश आते थे। जब तक कोई व्यक्ति कलीसिया में होता था, जब तक वह अपना कर्तव्य करने में उत्साही था, तब तक चाहे उसने कितना भी बुरा कर्म किया हो, उसकी मानवता कितनी भी भयानक रही हो या उसका स्वभाव कितना भी घमंडी, धूर्त या धोखेबाज रहा हो, ये लोग उससे भाई-बहनों की तरह पेश आते थे और प्रेम से उसकी मदद करते थे। क्या ऐसे लोगों में भेद पहचानने की क्षमता होती है? (नहीं।) इन पिछले कुछ वर्षों की सिंचाई और पोषण के जरिए तुम लोगों के दृष्टिकोण काफी बदल गए हैं, है ना? (हाँ।) अब जब तुम्हारे दृष्टिकोण बदल गए हैं तो क्या तुम विभिन्न प्रकार के लोगों से पेश आने में अपेक्षाकृत सिद्धांतयुक्त नहीं हो? (हाँ।) क्या विभिन्न प्रकार के लोगों के प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण और रवैये पहले से भिन्न नहीं हैं? (हाँ, वे भिन्न हैं।) इन मुद्दों पर संगति करने से पहले लोगों में विभिन्न प्रकार के लोगों का भेद पहचानने की कोई क्षमता नहीं थी, उनका विश्वास था कि जब तक कोई व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास रखता है तब तक वह अच्छा व्यक्ति है, परमेश्वर के घर का सदस्य है और यहाँ तक कि बुरी मानवता वाले लोग भी वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर बचाने का इरादा रखता है। इसे अब देखा जाए तो क्या ऐसी ही बात है? (नहीं।) अब यह ऐसी बात नहीं है। तो, इसे अब देखा जाए तो क्या अच्छे लोग ज्यादा हैं या बुरे लोग? (मुझे लगता है कि बुरे लोग ज्यादा हैं। इससे पहले मुझे बहुत-से लोग काफी अच्छे दिखाई देते थे, लेकिन परमेश्वर की संगति के जरिए और इसे विभिन्न प्रकार के लोगों की अभिव्यक्तियों से संबद्ध करने से अब मुझे लगता है कि बुरे लोग ज्यादा हैं।) इससे पहले ज्यादा-से-ज्यादा तुममें उन लोगों का भेद पहचानने की कुछ क्षमता थी जो स्पष्ट रूप से छद्म-विश्वासी, अवसरवादी, दुष्ट आत्मा, अशुद्ध आत्माएँ थीं और जो स्पष्ट गड़बड़ियाँ और विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न कर सकते थे, तुम जानते थे कि वे अच्छे लोग या भाई-बहन नहीं हैं। अब ऐसी संगति के जरिए स्पष्ट अभिव्यक्तियों वाले लोगों का भेद पहचानने में समर्थ होने के अलावा, क्या तुम लोगों के प्रकाशनों और अभिव्यक्तियों के आधार पर मूलतः सभी लोगों का भेद पहचानने में समर्थ नहीं हो? (हाँ।) तो ऐसी संगति के बाद, जब तुम लोग फिर से लोगों से मेलजोल रखते हो तब क्या यह पहले से अलग महसूस नहीं होता है? (यह जरा-सा अलग है। अब जब मैं लोगों से मेलजोल रखता हूँ तब मैं उनके प्रकाशनों पर और यह देखने पर ध्यान केंद्रित करता हूँ कि चीजों से सामना होने पर वे क्या नजरिए व्यक्त करते हैं ताकि यह अनुमान लगा सकूँ कि वे मनुष्यों, पशुओं या दानवों—इन तीनों में से किससे पुनर्जन्म लिए हुए हैं। मैं लोगों के सार और वर्गीकरण के आधार पर उनका भेद पहचानने पर ध्यान केंद्रित करने लगा हूँ।) इसका मतलब है कि तुमने लोगों का भेद पहचानना सीख लिया है। तो फिर क्या तुम अपना भेद पहचान सकते हो? (जरा-सा।) संक्षेप में, इस विषय पर संगति करना लोगों का भेद पहचानने के लिए फायदेमंद है। यह विभिन्न प्रकार के लोगों के व्यवहार और नजरियों का भेद पहचानने और इन लोगों के सार की असलियत देखने में तुम्हारी मदद कर सकता है। इस तरीके से तुम विभिन्न प्रकार के लोगों से सिद्धांतों के अनुसार पेश आओगे और कुछ विशेष लोगों, घटनाओं या चीजों का सामना करते समय तुम उनसे धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर पेश नहीं आओगे और तुम समस्याओं को सँभालने के कुछ मूलभूत सिद्धांतों पर पकड़ बना पाओगे और इस प्रकार तुम मूर्खतापूर्ण चीजें कम करोगे। उदाहरण के लिए, इससे पहले असामान्य व्यवहार या विकृत विचारों और नजरियों वाले लोगों को देखते समय तुमने सोचा होगा कि ऐसे लोगों में खराब काबिलियत है, उनमें कोई बोध क्षमता नहीं है या उन्होंने बहुत कम धर्मोपदेश सुने हैं और उनकी नींव बहुत ही ज्यादा उथली है, और इसलिए तुम्हें उन्हें सींचने और उनकी ज्यादा मदद करने के लिए कुछ मेहनत करनी चाहिए। अब संगति के जरिए पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए और दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों का भेद पहचानने की क्षमता प्राप्त करने के बाद तुम उन पिछले मूर्खतापूर्ण अभ्यासों को छोड़ दोगे और निरर्थक कामों में अब और शामिल नहीं होगे। तो क्या तुम लोग लोगों से सत्य सिद्धांतों के अनुसार पेश आ सकते हो? (हम ऐसा कुछ हद तक कर सकते हैं।) क्या तुम्हारे अभ्यास में विचलन आएँगे? (अगर मैं किसी व्यक्ति के सार के बारे में सटीकता से राय नहीं बना सकता तो हो सकता है कि मेरे अभ्यास में विचलन आएँ।) किन परिस्थितियों में तुम्हारे अभ्यास में विचलन आएँगे? मान लो कि उनका बाहरी व्यवहार ज्यादातर लोगों की धारणाओं के बहुत ज्यादा अनुरूप है—वे कीमत चुका सकते हैं और चीजों का त्याग कर सकते हैं, अक्सर सही बातें कहते हैं और बार-बार दान देते हैं और दूसरों की मदद करते हैं—तो मानवता के लिहाज से इस व्यक्ति को दयालु माना जाता है, लेकिन साथ ही, वे बिल्कुल भी सामान्य नहीं हैं, वे अक्सर कुछ अतिवादी व्यवहार प्रदर्शित करते हैं और वे कुछ अलौकिक अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करते हैं, तो क्या तुम ऐसे व्यक्ति का भेद पहचान पाओगे? क्या तुम जानते हो कि उससे कैसे पेश आना है? (सिर्फ परमेश्वर की पिछली संगति के कारण ही मुझे पता चला है कि ऐसा व्यक्ति दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में से एक है।) तुम उसके सार का दानव के सार के रूप में निरूपण कर सकते हो और इस तथ्य की असलियत देख सकते हो, लेकिन क्या तुम यह तय कर सकते हो कि दैनिक जीवन में उसकी अभिव्यक्तियों और उसकी मौजूदा अवस्था के आधार पर उससे पेश आने का उचित तरीका क्या है? इसमें लोगों से पेश आने के सिद्धांत शामिल हैं। तो इस प्रकार के व्यक्ति से पेश आने का उचित तरीका क्या है? अगर उसके जीवन की अवस्था मूलतः सामान्य है, उसने कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न नहीं की हैं और दूसरों को परेशान नहीं किया है तो उससे सही तरीके से पेश आओ—अगर वह सेवा कर सकता है तो उसे ऐसा करने दो; अगर वह नहीं कर सकता है और उसने दूसरों के लिए विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न की हैं और ज्यादातर लोगों ने उसकी अभिव्यक्तियों और प्रकाशनों की असलियत देख ली है और वे यह तय कर सकते हैं कि उसका सार दानव का सार है तो उसे अब भी बाहर निकालकर सँभाला जा सकता है—बहुत देर नहीं हुई है। क्या यह एक सिद्धांत नहीं है? (हाँ।) यह सिद्धांत है; तुम्हें अपने दिल में स्पष्ट होना चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाद में उसे कैसे सँभाला जाता है, समय का चयन उचित होना चाहिए। मान लो कि तुम उसकी असलियत देख लेते हो, लेकिन ज्यादातर लोगों का उससे संपर्क नहीं रहा है और उन्होंने उसकी असलियत तो और भी कम देखी है। फिर अगर तुम सत्य पर संगति किए बिना और उसका भेद पहचानने का तरीका समझाए बिना सीधे उसका चरित्र चित्रण करते हो और उसे सँभालते हो तो यह बहुत ही ज्यादा जल्दबाजी होगी। और मान लो कि उसके सार की असलियत देख लेने के बाद तुम उसके प्रति विकर्षण महसूस करना शुरू कर देते हो और फिर उसकी काट-छाँट करने के मौके ढूँढ़ते रहते हो या अपने शब्दों और क्रियाकलापों में और साथ ही सत्य पर संगति करते समय हमेशा उसे निशाना बनाते हो—तो क्या यह कार्य करने का अच्छा तरीका है? (नहीं।) क्यों नहीं? (क्योंकि अगर हम उससे इस तरीके से पेश आए तो ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं चलेगा कि क्या चल रहा है और यह तक हो सकता है कि उनमें गलतफहमियाँ उत्पन्न हो जाएँ। इस व्यक्ति के सार को तथ्यों के जरिए बेनकाब करना और स्पष्ट रूप से सामने लाना आवश्यक है और सिर्फ तभी जब लोगों के पास उसका भेद पहचानने की क्षमता हो जाए, उसे उजागर करना और उसका गहन-विश्लेषण करना या उसकी काट-छाँट करना उचित होगा—तब सभी लोग समझ जाएँगे। अगर यह व्यक्ति सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति नहीं है, लेकिन वह विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न नहीं करता और अब भी कुछ सेवा कर सकता है तो हमें उसे सेवा करने देना चाहिए। अगर हम जानते हैं कि वह सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति नहीं है, लेकिन फिर भी हम लगातार उसकी काट-छाँट करते हैं तो यह उसके कर्तव्य के निर्वहन को प्रभावित करेगा।) यह सही है। इस तरह से कार्य करना सिद्धांतहीन है। दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए और पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों से पेश आते समय लंबे समय तक संपर्क और अवलोकन के जरिए भले ही तुमने उनके सार की असलियत देख ली हो, फिर भी तुम्हें कुछ बुद्धिमानी का उपयोग करना चाहिए और उनसे सिद्धांतों के अनुसार पेश आना चाहिए। बुद्धिमानी का उपयोग करना ठीक है, लेकिन तुम सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं कर सकते। ऐसे लोगों से सिद्धांतों के अनुसार पेश आने में कई विवरण शामिल हैं। उनमें से एक यह है कि भले ही तुम स्पष्ट रूप से यह देखते हो कि वे सत्य से विमुख लोग हैं जिनका सार दानवों का सार है, फिर भी तुम हमेशा उनमें दोष नहीं ढूँढ़ सकते, उनकी काट-छाँट करने के लिए उनकी मामूली-सी गलतियों पर उन्हें टोक नहीं सकते या हर मोड़ पर उन्हें उजागर नहीं कर सकते। उन्हें पता ही नहीं होगा कि क्या चल रहा है; वे बेखबर होंगे और उन्हें यह पता नहीं होगा कि तुम क्यों उनकी काट-छाँट कर रहे हो और क्यों उन्हें निशाना बना रहे हो। ऐसा करने से उनके कर्तव्य के निर्वहन पर भी प्रभाव पड़ेगा। दूसरों की नजर में भले ही तुम जो करते हो या कहते हो उसमें तुम गलत नहीं हो, लेकिन इस तरीके से कार्य करने से न सिर्फ कोई नतीजा नहीं मिलता है, बल्कि इसके प्रतिकूल नतीजे भी होते हैं और यह सत्य-सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। इसलिए, चाहे तुम किसी भी प्रकार के व्यक्ति से निपट रहे हो, तुम्हें उससे सिद्धांतों के अनुसार और निष्पक्षता से पेश आना चाहिए; इस आधार पर कार्य मत करो कि तुम कैसा महसूस करते हो। थोड़ा-बहुत बुद्धिमानी का उपयोग करना ठीक है, लेकिन तुम्हें उससे सिद्धांतों के अनुसार पेश आना चाहिए। इस तरीके से कार्य करना, एक तो यह है कि यह व्यवस्था का पालन करता है और नियमों की अनुपालना करता है और इससे गड़बड़ियाँ उत्पन्न होने की संभावना कम रहती है; दूसरा यह है कि इससे यह भी सिद्ध होता है कि तुम्हारे पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल है, तुम पागलों की तरह गलत कर्म नहीं कर रहे हो और न ही तुम अपने खुद के इरादों के अनुसार जानबूझकर या लापरवाही से चीजें कर रहे हो। तुम्हारे पास हर प्रकार के व्यक्ति से पेश आने के लिए सिद्धांत होने चाहिए। चाहे वे दानव हों, पशु हों या मनुष्य हों, तुम्हें उनके साथ सिद्धांतों के अनुसार पेश आना चाहिए। तुम्हें इस प्रकार के लोगों का भेद पहचानने और लोगों से पेश आने के सिद्धांतों पर पकड़ बनाने में समर्थ होना चाहिए। जब इस मामले की बात आती है तब तुम्हारे पास विकृत समझ नहीं होनी चाहिए, है ना? (सही कहा।) गड़बड़ करने वाली कोई भी चीज मत करो। अगर तुम कुछ ऐसा करते हो जिससे गड़बड़ियाँ या विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न होती हैं तो फिर तुम बहुत ही ज्यादा बेवकूफ हो; मनुष्य को ऐसा नहीं करना चाहिए। समझे? (समझ गए।)
इससे पहले हमने उन लोगों के सार की अभिव्यक्तियों के बारे में संगति की थी जो पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए हैं और जो दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए हैं, जो कि दो अलग वर्गीकरणों से संबंधित हैं। इससे लोगों को यह देखने में मदद मिली कि वैसे तो सभी प्रकार के लोगों के पास मानवीय रंग-रूप होता है, फिर भी सत्य के प्रति उनके अलग-अलग रवैयों के जरिए उनके सार और उनके वर्गीकरण में अंतरों का भेद पहचाना जा सकता है। किसी व्यक्ति का बाहरी रंग-रूप चाहे कैसा भी हो—शायद किसी के नैन-नक्श समानुपातिक हों, वह काफी सुसंस्कृत और दयालु दिखता हो या शिक्षित, कुलीन, रुतबे और शालीनता वाला प्रतीत होता हो और यहाँ तक कि ऐसा प्रतीत होता हो कि उसमें गरिमा है, वह काफी महान है, कोई साधारण व्यक्ति नहीं है—इनमें से कोई भी उसके सार को निरूपित करने का आधार नहीं है। चाहे उसके नैन-नक्श कैसे भी हों, चाहे वह लंबा हो या ठिगना, मोटा हो या पतला, उसकी त्वचा का रंग कैसा भी हो या उसका जीवन संपन्न हो या विपन्न, इनमें से कोई भी यह प्रदर्शित नहीं कर सकता कि वास्तव में उसका सार क्या है। व्यक्ति के सार का निरूपण मानवीय पारंपरिक संस्कृति के मानकों या नैतिक आचरण के बारे में कहावतों पर आधारित नहीं हो सकता और न ही यह प्रसिद्ध लोगों के उन आदर्श वाक्यों या प्रसिद्ध उक्तियों पर आधारित हो सकता है जिनका पूरे इतिहास में लोगों द्वारा सारांश किया जाता है और न ही यह सत्तारूढ़ दलों के भ्रामक बयानों पर आधारित हो सकता है। तो फिर इसे किस पर आधारित होना चाहिए? लोगों को विभिन्न प्रकार के लोगों के सार के बारे में राय बनाने और उनका सार तय करने के आधार के रूप में परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य और लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाओं का उपयोग करना चाहिए। लोगों के बाहरी रंग-रूप, उनके गुणों या वे जिस ज्ञान पर पकड़ बनाने लगे हैं उसके आधार पर उनके बारे में राय बिल्कुल नहीं बनानी चाहिए, और व्यक्ति के रुतबे या समाज में और लोगों के बीच वह जो भूमिका निभाता है उसके आधार पर तो निश्चित रूप से राय नहीं बनानी चाहिए। लोगों के बारे में राय बनाने के ऐसे सभी तरीके गलत हैं। परमेश्वर के वचनों के आधार पर लोगों के बारे में राय बनानी चाहिए; सिर्फ परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं। एक बात तो यह है कि इसे सत्य पर आधारित होना चाहिए; दूसरी बात यह है कि इसे सत्य के प्रति व्यक्ति के रवैये और इस बात पर आधारित होना चाहिए कि क्या वह सत्य समझ सकता है। सत्य के आधार पर व्यक्ति के सार का भेद पहचानना और उसका वर्गीकरण तय करना सबसे सटीक है। इससे निश्चित रूप से कोई त्रुटि नहीं होगी।
मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशेषताएँ
I. जमीर और विवेक का होना
पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग और दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग—इन दो प्रकार के लोगों की अभिव्यक्तियों पर संगति करने के बाद आगे हमें उन लोगों की अभिव्यक्तियों पर संगति करनी चाहिए जो सच्चे मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए हैं। अब हम सबसे महत्वपूर्ण भाग पर आ गए हैं। इसके लिए पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में दिखाने के लिए निश्चित अभिव्यक्तियाँ और विशेषताएँ होती हैं, जैसे कि दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में होती हैं। तो क्या मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में भी इनके अनुरूप अभिव्यक्तियाँ और विशेषताएँ होती हैं? (हाँ।) यह निश्चित है। हमने मानवता की कुछ ऐसी मूलभूत अभिव्यक्तियों और विशेषताओं का जिक्र किया है जो सच्चे मनुष्यों में होती हैं। आज हम मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशिष्ट अभिव्यक्तियों और विशेषताओं पर संगति करेंगे। यह देखते हुए कि इस प्रकार के व्यक्ति का वर्गीकरण मानवीय है, इसलिए औपचारिक रूप से संगति करने से पहले आओ, सबसे पहले यह सोचें कि मनुष्य होने की मूलभूत विशेषताएँ क्या हैं। अथवा, वर्षों लोगों के साथ बातचीत करने और मेलजोल रखने के जरिए, तुमने इस प्रकार के व्यक्ति में, जिसमें मनुष्य होने का वर्गीकरण है, क्या विशेषताएँ देखी हैं? उसकी क्या अभिव्यक्तियाँ होती हैं? बताओ। (इस प्रकार के व्यक्ति में, जिसमें मानव होने का वर्गीकरण है, जमीर और विवेक होता है। उदाहरण के लिए, अगर वह कुछ गलत करता है या किसी के साथ गलत करता है या कुछ ऐसा करता है जो सत्य का उल्लंघन करता हो तो वह अपने जमीर में धिक्कार महसूस करता है।) (इस प्रकार का व्यक्ति कम-से-कम सत्य समझ सकता है, वह सकारात्मक चीजों से प्रेम करता है और नकारात्मक चीजों से नफरत करता है। उसका जमीर और विवेक सही-सलामत होते हैं।) सत्य समझने में समर्थ होना अपेक्षाकृत उच्च मानक है। सत्य से सामना होने से पहले इस प्रकार के व्यक्ति में मानवता की कौन-सी विशेषताएँ होती हैं? उसके क्रियाकलापों, वाणी और वह कैसे आचरण करता है और कैसे दुनिया से निपटता है इनकी क्या विशेषताएँ होती हैं? वह सामान्य मानवता की कौन-सी अभिव्यक्तियों और प्रकाशनों को प्रदर्शित करता है? यानी जब वह लोगों से बातचीत करता है और मेलजोल रखता है तब वह ऐसी कौन-सी अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करता है जिससे दूसरे लोग यह देख सकें कि वह सकारात्मक व्यक्ति है? (वह अपेक्षाकृत तर्कसंगत होता है, वह रहमदिल होता है, वह ऐसी चीजें नहीं करता जो दूसरों को धोखा देती हों या नुकसान पहुँचाती हों और उसका दूसरों को नुकसान पहुँचाने का कोई इरादा नहीं होता।) तुम लोग जिन चीजों के बारे में सोच सकते हो वे यही सकारात्मक अभिव्यक्तियाँ हैं जो मानवता के अपेक्षाकृत अनुरूप हैं, जो लोगों के मन में एक अच्छे व्यक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं। रहमदिल होना, दूसरों को धोखा नहीं देना या नुकसान नहीं पहुँचाना, अपनी बात के प्रति सच्चा रहना, जिम्मेदारी का बोध होना, दूसरों के साथ मिल-जुलकर रहने में समर्थ होना, सकारात्मक चीजों की लालसा रखना और नकारात्मक चीजों से नफरत करना—ये सभी मानवता की कुछ सकारात्मक अभिव्यक्तियाँ हैं। क्या और भी हैं? (इसमें आध्यात्मिक समझ होना—परमेश्वर के वचनों को समझने में समर्थ होना—भी है।) आध्यात्मिक समझ होना मानवता से असंबंधित है, जिस पर हम फिलहाल चर्चा कर रहे हैं। हम मुख्य रूप से मामलों को सँभालने में मानवता वाले लोगों के विभिन्न दृष्टिकोणों के बारे में बात कर रहे हैं और साथ ही, व्यक्ति के स्व-आचरण और दूसरों से पेश आने के सार की अभिव्यक्तियों, और जब स्व-आचरण और क्रियाकलापों की बात आती है तब उसके सिद्धांतों और न्यूनतम मानकों वगैरह के बारे में बात कर रहे हैं। मानवता की जिन सकारात्मक अभिव्यक्तियों को लोग देख और जान सकते हैं, उनकी संख्या कम है। ऐसा लगता है कि मानवजाति में जो लोग यह समझते हैं कि कैसे आचरण करना है, वे सच में दुर्लभ हैं। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि बहुत-से लोग कहते हैं कि वे आचरण करने में विफल हो गए हैं। यह देखो कि फिल्मों और टीवी शो में अभिनेता सकारात्मक किरदारों को कैसे चित्रित करते हैं—जब किसी मामले में किसी विशेष दृष्टिकोण, अभिव्यक्ति या रवैये को प्रकट करने की बात आती है तब अभिनेता यह नहीं जानते कि उसका अभिनय कैसे करना है या उसे कैसे व्यक्त करना है और इस क्षेत्र में उनकी समझ खाली होती है। अगर तुम उनसे गुंडे, बदमाश, माफिया सरगना, वेश्या, स्वच्छंद महिला या किसी मशहूर या महान व्यक्ति का किरदार निभाने को कहो तो वे उस किरदार को बखूबी निभा सकते हैं, वे इन लोगों के हर हाव-भाव, हर शब्द और हर क्रियाकलाप, यहाँ तक कि उनकी एक नजर को भी पूरी जीवंतता और विशिष्टता के साथ चित्रित कर सकते हैं। कुछ दर्शक उन्हें कोई नकारात्मक भूमिका निभाते हुए देखने के बाद गलती से यह तक मान बैठते हैं कि सच में शो वाले बुरे व्यक्ति वे ही हैं, और अगर वे उन्हें कभी दिख जाएँ तो उन्हें पीटना चाहेंगे। कुछ तो उन पर थूक भी देंगे। देखो, उन्होंने अपनी भूमिका को कितनी जीवंतता से चित्रित किया, उन्होंने उस बुरे इंसान को वाकई जीवित कर दिया। जब एक अच्छे व्यक्ति का किरदार निभाने की बात आती है तब क्या होता है? क्या लोग उनके अभिनय से कुछ प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं, क्या यह जान सकते हैं कि मानवता वाला व्यक्ति कैसे बनना है? वाकई ऐसा कोई अभिनेता नहीं है। जब मानवता वाला व्यक्ति बनने की बात आती है तब मानवजाति को कुछ समझ नहीं आता। न सिर्फ पटकथा लेखकों और निर्देशकों को कुछ समझ नहीं आता, बल्कि दर्शकों को भी कुछ समझ नहीं आता—कोई नहीं समझता कि मानवता होने का मतलब क्या होता है। और इसलिए फिल्मों और टीवी शो में इसे पूरे खोखलेपन से चित्रित किया जाता है। उदाहरण के लिए, जब कोई अभिनेता कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य की भूमिका निभाता है जो मरने से ठीक पहले अपनी आँखें बंद कर लेता है, तब दर्शक कहते हैं, “वह निश्चित रूप से अभी तक नहीं मरा है, उसने अपनी पार्टी का बकाया जो नहीं चुकाया है!” और जैसा सोचा था वैसा ही होता है, एक सेकंड पूरा होने से पहले ही वह अपनी आँखें खोल लेता है और काँपते हुए अपनी जेब से कुछ सिक्के निकालता है और कहता है, “ये मेरी पार्टी का बकाया है। मैं पार्टी का कर्जा नहीं रख सकता। पार्टी निश्चिंत रहे। जब मैं दूसरी दुनिया में पहुँचूँगा तब भी मैं बिना डगमगाए, यहाँ तक कि मरते दम तक पार्टी के प्रति वफादार रहूँगा!” सिर्फ तभी वह दम तोड़ता है। इसी तरह से फिल्मों और टीवी शो में मानवता वाले व्यक्ति को चित्रित किया जाता है। दर्शकों की नजर में यह वास्तव में पूरी तरह से खोखला है। ऐसे लोग वास्तविक जीवन में मौजूद नहीं होते और लोगों के लिए इसे प्राप्त करना बहुत मुश्किल है। इसलिए मानवजाति बस समझ ही नहीं पाती कि सच्ची मानवता क्या है और उसके लिए इसका मानक परिभाषित करना बहुत मुश्किल है। या तो मानक बहुत ही ज्यादा ऊँचा तय किया जाता है और यह पूरी तरह से खोखला होता है या लोग बेखबर होते हैं और इसे मनमाने ढंग से तय करते हैं। वास्तव में एक सच्चे मनुष्य में जो मानवता होती है वह बहुत सरल होती है। कितनी सरल? यह कुछ ऐसी चीज है जो तुम्हारी पहुँच में है, कुछ ऐसी चीज है जिसे तुम प्राप्त कर सकते हो। इसका तुम्हारी पहुँच में होने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि यह बहुत व्यावहारिक, बहुत वास्तविक, बहुत वस्तुनिष्ठ है, यह बिल्कुल भी खोखली नहीं है। क्योंकि यह बहुत वस्तुनिष्ठ और व्यावहारिक है, इसलिए लोगों को लगता है कि यह बहुत साधारण है और जिक्र करने लायक नहीं है, और यह तो उन्हें और भी कम लगता है कि ये अभिव्यक्तियाँ वही हैं जो मानवजाति को प्रदर्शित करनी चाहिए। यह मानवजाति उन चीजों की हिमायत करती है जो भव्य, उन्नत और प्रभावशाली हैं। बहुत-से लोगों में न सिर्फ सच्ची मानवता की अभिव्यक्तियाँ नहीं होतीं, बल्कि वे उनका तिरस्कार भी करते हैं क्योंकि सामान्य मानवता की अभिव्यक्तियाँ बहुत व्यावहारिक, बहुत साधारण, बहुत आम होती हैं, और इसके बजाय वे ज्ञान का अनुसरण करते हैं और उसका आदर करते हैं। इस तरीके से पूरे समाज में एक बुरा रुझान उत्पन्न हो गया है, एक ऐसा रुझान जो सच्चे मानव की अभिव्यक्तियों का तिरस्कार करता है और उसे नीची नजर से देखता है। यहाँ तक कि एक ऐसा व्यक्ति जिसमें सच में मानवता है, उसे भी ऐसा नहीं लगता कि इस तरीके से आचरण करना एक सच्चा मनुष्य होना या मानवता वाला व्यक्ति होना है। इसके विपरीत, वह तथाकथित नेक और असाधारण व्यक्ति बनने का प्रयास करता है जिसकी हिमायत समाज के बुरे रुझान करते हैं। यह उस मानवता सार को नकारता है और ढकता है जो उन कुछ लोगों में होता है जिनमें मानवता होती है। यहाँ “ढकने” का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि कोई भी तुम्हें मानवता वाला व्यक्ति नहीं मानता। इसका मतलब है कि तुम चाहे कुछ भी करो, दूसरे लोग तुम्हें अलग-थलग कर देते हैं और तुम्हें नीची नजर से देखते हैं, और लोगों के बीच तुम्हें अपनी प्रतिभा का उपयोग करने की कोई जगह नहीं मिलती, तुम्हें बोलने की कोई जगह नहीं मिलती और तुम्हें अपनी शक्तियों का उपयोग करने का कोई अवसर नहीं मिलता। “नकारने” का मतलब है कि भ्रष्ट मानवजाति में तुम्हारी सामान्य मानवता बस जिक्र करने लायक ही नहीं है। मानवता होना कोई ऐसी चीज नहीं है जिसकी वे हिमायत करते हैं। वे किसकी हिमायत करते हैं? वे भीड़ को खुश करने, चालाकी से अपना काम निकालने, चापलूसी और खुशामद करने, झूठ बोलने और धोखा देने की हिमायत करते हैं, और कुछ भी कहने में समर्थ होते हैं चाहे वह बात कितनी भी घिनौनी मिठास से भरी और उनकी सच्ची भावनाओं के बिलकुल विपरीत ही क्यों न हो। इस समाज में सच बोलने से तुम्हें कोई सफलता नहीं मिलेगी। तुम्हारी मानवता चाहे कितनी भी अच्छी हो, यह समाज उसकी हिमायत नहीं करता है और वह उसे नकार देगा। अगर तुम कुछ सकारात्मक, न्यायसंगत या निष्पक्ष चीजें या जमीर के शब्द कहते हो, अगर तुम अपनी उचित जगह ग्रहण करते हुए कुछ तर्कसंगत चीजें कहते हो तो वे तुम्हें अलग-थलग कर देंगे, तुम्हें नकार देंगे और तुम्हें छोटा साबित करेंगे। कुछ तो ऐसे भी हैं जो तुम्हारा मजाक उड़ाएँगे, तुम्हारा उपहास करेंगे, तुम्हें अपमानित करेंगे और फिर तुम पर आक्रमण करने और तुम्हारा बहिष्कार करने के लिए सभी दुष्ट शक्तियों और ताकतों को इकट्ठा करेंगे, और अंततः तुम्हें इतना शर्मिंदा महसूस करने पर मजबूर कर देंगे कि तुम अपना चेहरा नहीं दिखा पाओगे, वे तुम्हें खुद को नकारने पर मजबूर कर देंगे। अंत में तुम यही सोचोगे, “मैं किसी काम का नहीं हूँ, मैं न तो समाज के रुझानों के अनुसार और न ही इन लोगों के अनुसार खुद को ढाल सकता हूँ। मुझे चालबाजियों को अंजाम देना नहीं आता, मैं षड्यंत्र या चालें नहीं सोच सकता, इसलिए इन लोगों के बीच मेरा जीवित रहना बहुत मुश्किल है।” तुम खुद को बहुत हीन समझना शुरू कर देते हो, इन लोगों के साथ घुलने-मिलने में असमर्थ महसूस करते हो। दरअसल, तुम उनके सांसारिक आचरण के फलसफों को, मामलों को सँभालने की उनकी विधियों और साधनों को, और उनके जीवित रहने के तरीके को आत्मसात करने में असमर्थ हो। इस बुरे रुझान और इन बुरे लोगों द्वारा नकारे जाने के बाद तुम अपनी खुद की मानवता को नकार देते हो और फिर उनके अनुसार ढल जाने के लिए, उनका अनुसरण करने के लिए, समाज में घुलने-मिलने के लिए, इन दुष्ट लोगों के साथ घुलने-मिलने के लिए और इस बुरे रुझान में घुलने-मिलने के लिए हर संभव प्रयास करते हो। दूसरे लोग जिस तरह से चालबाजियों, कूट युक्तियों और षड्यंत्रों का उपयोग करते हैं तुम उसकी नकल करने का प्रयास करते हो और दूसरे लोग जिस तरह से चापलूसी भरे शब्द, घिनौनी मिठास से भरे शब्द और उनकी सच्ची भावनाओं के विपरीत शब्द बोलते हैं तुम उसकी भी नकल करने का प्रयास करते हो। लेकिन तुम चाहे इन चीजों की नकल करने का कैसे भी प्रयास करो और तुम चाहे कितनी भी मेहनत करो, कुल मिलाकर तुम्हें लगता है कि ये वे शब्द नहीं हैं जो तुम बोलना चाहते हो या वे चीजें नहीं हैं जो तुम करना चाहते हो। हर शब्द जो तुम बोलते हो वह तुम्हारी सच्ची भावनाओं के बहुत विपरीत होता है, और हर चीज जो तुम करते हो उससे तुम अपने जमीर में धिक्कार महसूस करते हो; तुम्हें लगता है कि तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए या ऐसा नहीं करना चाहिए। तुम हर रोज इसी तरह मुखौटा पहने हुए जीते हो। हालाँकि ऐसा लगता है कि व्यवहार, वाणी, या कुछ विचारों और नजरियों के लिहाज से तुम इस बुरे रुझान में घुल-मिल गए हो और इस भ्रष्ट मानवजाति के साथ घुल-मिल गए हो, लेकिन अंदर ही अंदर तुम दर्द, दमन और आक्रोश से भरे हो। ऐसा जीवन अनुभव होने के बाद तुम निष्पक्ष और न्यायपूर्ण व्यवहार की, सकारात्मक चीजों की और प्रकाश की लालसा करना शुरू कर दोगे। तो ऐसे व्यक्ति में मानवता की कौन-सी विशेषताएँ होती हैं जो उसे दूसरे लोगों और बुरे रुझानों के बीच ऐसी भावनाएँ और ऐसे अनुभव होने की अनुमति देती हैं? वास्तव में यह बहुत सरल है : जब किसी व्यक्ति में जमीर और विवेक का मानवता सार होता है तब लोगों के बीच रहते समय उसे ऐसे अनुभव होंगे।
जमीर और विवेक वे दो सबसे मूलभूत चीजें हैं जो मानवता वाले लोगों में होनी चाहिए। वैसे तो इन दोनों चीजों पर बार-बार चर्चा की गई है, फिर भी ये लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं और इसका आकलन करने के लिए भी ये सबसे महत्वपूर्ण कसौटियाँ हैं कि किसी व्यक्ति का वर्गीकरण मनुष्य है या नहीं। जमीर का विशिष्ट रूप से क्या मतलब है? मैंने पहले बताया है कि जमीर व्यक्ति के दिल में उत्पन्न होने वाली एक क्षमता है और यह लोगों से कुछ माँगें करता है और मुख्य रूप से व्यक्ति के आचरण के सिद्धांतों और स्व-आचरण के न्यूनतम मानकों में अभिव्यक्त होता है। विशिष्ट रूप से किसी व्यक्ति के आचरण करने के सिद्धांत, उसके आचरण करने के और दुनिया से निपटने के सिद्धांत और उसकी मानवता के प्रकाशन यह प्रमाणित कर सकते हैं कि उसमें जमीर है या नहीं। अभी-अभी जब मैंने पूछा कि जमीर का विशिष्ट रूप से क्या मतलब है तब तुम लोग उत्तर नहीं दे सके। तुम लोग सिर्फ उन बातों पर ध्यान केंद्रित करते हो जिन्हें तुम लोग गहन सत्य मानते हो, लेकिन जहाँ तक इस प्रकार के सत्यों की बात है तो तुम लोगों को लगता है कि वे इतने मामूली, इतने साधारण और इतने महत्वहीन हैं कि जिक्र करने योग्य ही नहीं हैं, इसलिए तुम लोग उन पर बस ध्यान ही नहीं देते हो और उन्हें गंभीरता से नहीं लेते हो। अगर किसी व्यक्ति में जमीर है तो इसका मतलब है कि उसकी मानवता में दो विशेषताएँ हैं : एक है सत्यनिष्ठा और दूसरी है दयालुता। हो सकता है कि तुम बाहरी रंग-रूप से यह न बता पाओ कि कोई व्यक्ति दयालु है या नहीं, लेकिन अगर कोई व्यक्ति रहमदिल है तो जैसे ही तुम उससे मेलजोल रखोगे तुम्हें यह बात पता चल जाएगी। कोई व्यक्ति सत्यनिष्ठ है या नहीं इसका आकलन करने का आधार क्या है? यह आधार उसके आचरण करने और दुनिया से निपटने के सिद्धांत हैं। अगर वह विश्वासघाती, धूर्त, कपटी, दुनियादारी जानने वाला, षड्यंत्रकारी, और आचरण करने और दुनिया से निपटने के मामले में रहस्यमय है तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से सत्यनिष्ठ नहीं है। अगर उसका आचरण करने और दुनिया से निपटने का तरीका बहुत सरल, बहुत सीधा और बहुत सच्चा है, अगर वह दूसरों से बहुत साफ तौर पर बात करता है, लोगों के साथ मेलजोल रखते समय कुटिलता या धोखेबाजी नहीं करता है, असत्यता के बिना बोलता है और कार्य करता है—काले को काला और सफेद को सफेद कहता है, ऐसी बातों में बहुत स्पष्ट रूप से अंतर करता है—सकारात्मक चीजों का पालन करता है और बुरी शक्तियों से समझौता नहीं करता तो वह व्यक्ति काफी सत्यनिष्ठ है। अगर कोई व्यक्ति सत्यनिष्ठ और दयालु दोनों है तो उस व्यक्ति में जमीर है, उसमें मानवता की न्यूनतम विशेषताएँ हैं। मानवता की एक दूसरी विशेषता विवेक है। विवेक भी एक ऐसा पद और विषय है जिस पर हम अक्सर चर्चा करते हैं, लेकिन किसी ने भी कभी स्पष्ट रूप से यह परिभाषित नहीं किया है कि विवेक क्या है। विवेक के भीतर क्या शामिल है और किस प्रकार की अभिव्यक्तियाँ विवेक होने की अभिव्यक्तियाँ मानी जाती हैं—क्या तुम लोग इस पर स्पष्ट हो? ज्यादातर लोग बहुत स्पष्ट नहीं हैं; इस क्षेत्र में उनकी समझ अभी भी अपेक्षाकृत धुँधली है। तो विवेक होने का क्या मतलब है? इसका मतलब है सही रुख अपनाते हुए जो कहना चाहिए उसे कहने में समर्थ होना और जो करना चाहिए उसे करने में समर्थ होना; यही विवेक होना है। अगर तुम मानवता वाले व्यक्ति हो तो तुम्हारी वाणी और क्रियाकलाप नपे-तुले होंगे। तुम्हें पता होगा कि मौजूदा परिवेश में और तुम्हारी पहचान और रुतबे के आधार पर तुम्हें कौन-से शब्द बोलने चाहिए, कौन-सी चीजें करनी चाहिए, इन शब्दों को बोलते समय तुम्हारा क्या रुख होना चाहिए और किसी विशेष मामले को व्यक्त करने के लिए तुम्हें किस प्रकार की वाणी का उपयोग करना चाहिए। इन चीजों के लिए तुम्हारे दिल में मानक और संयम होगा। यानी तुम्हारा विवेक तुम्हारे शब्दों और व्यवहार को विनियमित कर सकेगा जिससे तुम्हारे शब्द और व्यवहार उचित हो जाएँगे, और बाहर से देखने पर दूसरे लोग उन्हें तर्कसंगत और नपे-तुले समझेंगे, तुम्हारी वाणी और क्रियाकलाप बिल्कुल सही होंगे और लोगों का नैतिक उन्नयन करने में सक्षम होंगे। चाहे तुम जो शब्द कहते हो और तुम जो चीजें करते हो वे तुम्हारी काबिलियत, तुम्हारी शिक्षा के स्तर या तुम्हारी उम्र के लिहाज से, पूरी तरह उपयुक्त हों या न हों, कम-से-कम तुम्हारे दिल में सीमाएँ होंगी, एक मानक होगा जो तुम्हें नियंत्रण में रखेगा, जो तुम्हें तर्कसंगत अवस्था में बोलने और कार्य करने की अनुमति देगा। विवेक होने का यही मतलब है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि विवेकी व्यक्ति किसका सामना करता है—चाहे वह कोई अमीर व्यक्ति हो या गरीब या कोई रुतबे वाला व्यक्ति हो या बिना रुतबे वाला—किसी भी परिस्थिति में उसकी वाणी और कार्य इस बात से बाधित नहीं होते हैं कि उसका मिजाज अच्छा है या बुरा और न ही वह इस बात पर विचार करता है कि कोई मामला उसके लिए फायदेमंद है या नहीं; उसके दिल में हमेशा संयम होता है, एक मानक या सीमा होती है जो उसे विनियमित करने का काम करती है। वह जानबूझकर टेढ़ी-मेढ़ी दलीलें नहीं देगा और न ही वह अनुचित रूप से परेशान करने वाला व्यक्ति होगा। भले ही वह कभी-कभी अंदर से गुस्से में और बहुत ही परेशान हो और उसके शब्दों का चयन काफी उचित न भी हो, तो भी वह जो कहता है वे टेढ़ी-मेढ़ी दलीलें या भ्रांतियाँ नहीं होतीं; बल्कि वे प्रस्तुत करने योग्य और दमदार होती हैं। “दमदार होने” का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि भले ही वह जो कहता है वह आवश्यक रूप से सत्य के अनुरूप न हो, तो भी ज्यादातर लोगों की नजर में यह “तर्क” टिका रह सकता है; आमतौर पर इसे किसी सही चीज के रूप में पहचाना जाता है और कोई भी इसका विरोध नहीं करता। ऐसा व्यक्ति विवेकशील व्यक्ति है।
जमीर और विवेक, इन दोनों पहलुओं को स्पष्ट रूप से समझा दिया गया है। मानवता होने की यही दो मुख्य अभिव्यक्तियाँ हैं : एक है जमीर होना और दूसरी है विवेक होना। मुझे बताओ, क्या ये दोनों पहलू खोखले हैं या नहीं? (वे नहीं हैं।) क्या ये बहुत वास्तविक नहीं हैं? (हाँ।) ये बहुत वास्तविक हैं, खोखले नहीं हैं। तो फिर मानवजाति इनकी हिमायत क्यों नहीं करती? क्योंकि जमीर वाले व्यक्ति में सत्यनिष्ठा और दयालुता होती है और बुरी प्रवृत्तियों के बीच और बुरी, भ्रष्ट मानवजाति के बीच, सत्यनिष्ठ और दयालु लोग घिनौने और साथ ही बेहद महत्वहीन माने जाते हैं, सभी लोग इन्हें नीची नजर से देखते हैं। अगर तुम सत्यनिष्ठ और दयालु व्यक्ति हो तो वे तुमसे वास्तव में कड़ी पूछताछ तक करेंगे : “तुम्हारे सत्यनिष्ठ और दयालु होने का क्या फायदा है? क्या तुम्हारे पास ज्ञान है? क्या तुम्हारे पास सामाजिक रुतबा है? क्या समाज में तुम्हारे पास शोहरत या शक्ति है?” तुम कहते हो, “मेरे पास कोई शोहरत या शक्ति नहीं है; मैं बस कुछ हद तक सत्यनिष्ठ और दयालु व्यक्ति हूँ।” लोग तुम पर हँसेंगे और नफरत से तुम्हें ठुकरा देंगे। उनकी नजर में तुम्हारे पास जमीर होना और तुम्हारा सत्यनिष्ठ और दयालु होना पूँजी नहीं है—ज्ञान, रुतबे और शोहरत, या शक्ति के बिना तुम्हें समाज में कोई सफलता नहीं मिलेगी। वे कहते हैं, “तुम्हारे पास जमीर है, लेकिन जमीर की कीमत है ही क्या? तुम क्या कर सकते हो? क्या तुम षड्यंत्र और साजिशें कर सकते हो या लोगों को धोखा दे सकते हो? क्या तुम लोगों का दिल जीत सकते हो और अपने लिए उनकी तरफदारी खरीद सकते हो?” तुम इनमें से कुछ भी नहीं कर सकते। अगर तुममें जमीर है, अगर तुममें मानवता के ये दो पहलू—सत्यनिष्ठा और दयालुता—हैं तो तुम समाज की बुरी प्रवृत्तियों में पाई जाने वाली उन चीजों में दिलचस्पी नहीं लोगे, तुम इन प्रवृत्तियों का अनुसरण नहीं करोगे, इसलिए तुम्हें समाज में कोई सफलता नहीं मिलेगी और तुम लोगों द्वारा बहिष्कृत कर दिए जाओगे। वे तुम्हें बहिष्कृत क्यों करेंगे? क्योंकि ज्यादातर लोग बुरी प्रवृत्तियों का सम्मान करते हैं और बुरी प्रवृत्तियाँ समाज की मुख्यधारा बन चुकी हैं—अगर तुम अपने जमीर के अनुसार कार्य करते हो और सभी मामलों में चीजों को निष्पक्षता से सँभालते हो तो दूसरे लोग तुम्हें अनुपयुक्त समझेंगे और तुम्हें अलग-थलग कर देंगे। अगर कलीसिया में तुम अपने जमीर पर भरोसा कर सकते हो, अपनी वाणी और क्रियाकलापों में सत्य सिद्धांतों का पालन कर सकते हो और बुरे लोगों को उजागर करने और उनका गहन-विश्लेषण करने की हिम्मत कर सकते हो तो जो लोग दानवों के हैं, वे अपने पैरों के नीचे की जमीन खो देंगे और बेनकाब हो जाएँगे; उनकी कूट युक्तियाँ और षड्यंत्र, और साथ ही सत्य से नफरत करने वाली उनकी शैतानी प्रकृति पूरी तरह से खोलकर रख दी जाएगी। इसलिए, ये लोग जो दानवों के हैं, वे कलीसिया में ऐसे लोगों के होने से विशेष रूप से डरते हैं जो सत्य सिद्धांतों का पालन करते हैं। जब भी वे किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं जो सत्य समझता है तब वे उसे अलग-थलग कर देते हैं और उसे कुचल डालते हैं, इस बात से डरते हैं कि सत्य समझने वाले लोग उन्हें उजागर करने के लिए उठ खड़े होंगे जिससे वे बेनकाब हो जाएँगे और निकाल दिए जाएँगे। वे इस तरीके से कार्य करने के लिए अपनी शैतानी प्रकृति द्वारा संचालित होते हैं। परमेश्वर के घर में जो लोग दानवों के हैं, वे ठीक इस कारण से डटे नहीं रह सकते क्योंकि परमेश्वर के घर में सत्य की सत्ता है, परमेश्वर की सत्ता है। लेकिन अविश्वासी दुनिया में यह अलग है। चूँकि इस दुनिया में नास्तिकता और बुरी प्रवृत्तियाँ ही प्रबल हैं, इसलिए मानवता वाले लोग बुरी प्रवृत्तियों के बीच और बुरी, भ्रष्ट मानवजाति के बीच अपने पैर नहीं जमा पाते हैं। इस बीच जो लोग अपनी युक्तियों में निष्ठुर होते हैं, कपटी और धूर्त होते हैं, वे अक्सर अगुआ, असाधारण और लोगों के बीच तथाकथित संभ्रांत लोग होते हैं। मानवता वाला व्यक्ति, चाहे उसकी काबिलियत, खूबियाँ, शक्तियाँ या प्रतिभाएँ कुछ भी हों, उसे अलग-थलग कर दिया जाता है और उसके पास आगे बढ़ने का कोई अवसर नहीं होता। जब तक वह कुछ न्यायसंगत शब्द बोलता रहेगा या निष्पक्षता से मामलों को सँभालता रहेगा तब तक वे बुरे लोग और दानव उसे सताते रहेंगे। इसलिए, यह बुरी मानवजाति जो दानवों की है, जमीर की अवहेलना करती है; सिर्फ मानवता वाले लोगों में ही जमीर होता है। जहाँ तक विवेक की बात है, विवेक होने की अभिव्यक्ति यह है कि व्यक्ति के साथ चाहे कुछ भी घटित हो जाए, वह उससे तर्कसंगत रूप से पेश आ सकता है, न्यायपूर्ण रूप से बोल सकता है और कार्य कर सकता है, वह अपनी भावनाओं या अपनी शोहरत या रुतबे के अनुसार कार्य नहीं करेगा और वह दूसरों को मजबूर या बाधित नहीं करेगा। वह मामले से तर्कसंगत रूप से पेश आने में समर्थ होता है : अगर वह सही है तो वह सही है; अगर वह गलत है तो वह गलत है; अगर वह उचित है तो वह उचित है; अगर वह अनुचित है तो वह अनुचित है। वह चीजों का मूल्यांकन निष्पक्ष रूप से करता है और चीजों को सिद्धांतों के अनुसार न्यायसंगत रूप से करता है, और वह मानवता की नैतिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं करता। यही विवेक होने की अभिव्यक्ति है। ये दो चीजें, जमीर और विवेक, समाज में नहीं टिकतीं, विशेष रूप से बुरे देशों में और बुरी प्रवृत्तियों के बीच, जहाँ ये और भी ज्यादा नहीं टिकतीं और अस्वीकार्य होती हैं। लेकिन जमीर और विवेक ही ठीक वे दो प्रमुख विशेषताएँ हैं जो सामान्य मानवता में होती हैं और ये वे विशेषताएँ भी हैं जो मानवजाति में होनी चाहिए। जब तुममें ये दोनों विशेषताएँ होंगी, सिर्फ तभी तुम एक सच्चे मनुष्य होगे। अगर तुम जमीर और मानवता वाले व्यक्ति हो तो एक बात तो यह है कि तुम अपने आचरण में विशेष रूप से सिद्धांतयुक्त होगे और लोगों से अपेक्षाकृत न्यायसंगत तरीके से पेश आ पाओगे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी व्यक्ति के साथ तुम्हारा रिश्ता कैसा है या उसने तुम्हें चोट पहुँचाई है या नहीं, तुम उससे सही ढंग से पेश आ सकते हो और उसका वस्तुनिष्ठ रूप से मूल्यांकन कर सकते हो। यही सत्यनिष्ठा है, जो मानवता की एक विशेषता है। इसके अतिरिक्त, अगर तुममें दयालुता है, जो मानवता की एक और विशेषता है तो लोगों से निपटते समय या चीजें करते समय तुम्हारी एक निश्चित सीमा होगी, जो तुम्हें अपने जमीर के खिलाफ बोलने या कार्य करने से रोक सकती है। उदाहरण के लिए, बुरे लोग हमेशा टेढ़े-मेढ़े शब्द बोलते हैं और टेढ़ी-मेढ़ी दलीलें बकते हैं, काले और सफेद को उलट-पुलट कर पेश करते हैं और तथ्यों को तोड़-मरोड़ देते हैं। जो कोई भी उनके लिए हानिकारक है या जिसने भी उन्हें चोट पहुंचाई है या निशाना बनाया है, उसके प्रति वे द्वेष रखते हैं और हर तरह से उसे सताने और उस पर पलटकर हमला करने के अवसर ढूँढ़ने का प्रयास करते हैं। लेकिन मानवता वाले व्यक्ति के लिए, क्योंकि उसमें सत्यनिष्ठा और दयालुता होती है जो जमीर का हिस्सा हैं, भले ही किसी ने उसे नुकसान पहुँचाया हो या धोखा दिया हो और वह पलटकर हमला करना और बदला लेना चाहता हो और हो सकता है कि आवेश में वह कुछ कठोर शब्द कह डाले, जैसे कि “मैं उससे दिल की गहराइयों से नफरत करता हूँ!”, लेकिन जब बदला लेने का वास्तविक अवसर सामने आता है तब उसका दिल पिघल जाता है और वह नरम पड़ जाता है; वह ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है, उसका दिल नहीं मानता। और कुछ समय बाद, वह इस नफरत को अब और जगा नहीं पाता। दयालु व्यक्ति ऐसा ही होता है। अगर किसी ने तुम्हें धोखा दिया है या तुम्हें नुकसान पहुँचाया है और तुम्हारे पास बदला लेने का अवसर है, अपने दुश्मन को सजा और प्रतिकार भुगतते देखने का अवसर है तो क्या तुम क्रियाकलाप कर पाओगे और उन पर पलटकर हमला करने के लिए चीजें कर पाओगे? जब तुम गुस्से में होते हो, तब हो सकता है कि तुम कहो, “मैं उस पर जरूर पलटकर हमला करूँगा! वह पूरी तरह से भयानक और निष्ठुर है!” लेकिन जब बदला लेने का मौका सचमुच आता है तब तुम ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। तुम कहोगे, “जाने दो, वह तो बहुत पहले की बात है। चलो, उसे वहीं समाप्त कर दें।” तुम अंतहीन रूप से उसका पीछा नहीं करोगे और न ही तुम अपने दुश्मन को सजा या बुरा अंजाम भुगतते देखने पर अड़ जाओगे। तुम अपने दिल में लगातार नफरत लेकर नहीं जीओगे; कुछ समय बाद यह नफरत गायब हो जाएगी। यही दयालु दिल होने की अभिव्यक्ति है। दयालुता जमीर वाले व्यक्ति की एक विशेष अभिव्यक्ति है और साथ ही मनुष्य होने की विशेषता भी है। यकीनन कुछ लोगों की नजर में दयालुता एक कमजोरी है। यहाँ तक कि हो सकता है कि कुछ अविश्वासी लोग तुम्हें कायर तक समझें और तुम्हें उकसाते हुए कहें, “तुम्हें निष्ठुर और पत्थरदिल होना चाहिए। जब बदला लेने का अवसर आता है तब तुम्हें खून का बदला खून से लेना चाहिए, अपने दुश्मन को खुद कुचल डालना चाहिए और उसे अपने ही हाथों से मार डालना चाहिए।” लेकिन तुम सोचते हो, “अगर मैं अपने दुश्मन को अपने ही हाथों से मार डालता हूँ तो क्या मैं बुराई नहीं कर रहा होऊँगा? उसका जीवित रहना मुझे प्रभावित नहीं करता; बस यही है कि उसने जो एक चीज की, वह हद पार कर गई और मुझे चोट लग गई, लेकिन वह सब अतीत की बात है।” समय के साथ तुम पाते हो कि तुम उससे अब और नफरत नहीं करते। कुछ लोग कहते हैं कि तुम बहुत कायर हो, पर्याप्त निष्ठुर नहीं हो। खुद तुम्हें भी यह हैरानी में डालने वाला लगता है : “मैं निष्ठुर क्यों नहीं हो सकता? मैं अपने दुश्मनों के प्रति हमेशा नरमी क्यों बरतता हूँ और द्वेष क्यों नहीं रख पाता?” कुछ लोगों की नजर में दयालु दिल होना मानवता की कमजोरी है। लेकिन वास्तव में यह मानवता की एक विशेषता है, है ना? (हाँ।)
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?