सत्य का अनुसरण कैसे करें (16) भाग तीन

हमने अभी-अभी लोगों की मानवता के भीतर उचित-अनुचित का भेद पहचानने की क्षमता के बारे में बात की, यानी क्या लोग सकारात्मक और नकारात्मक चीजों की पहचान कर सकते हैं या नहीं। बहुत ही कम लोग यह भेद पहचानने में सक्षम होते हैं, फिर भी लोग अपने जीवन में बार-बार सकारात्मक और नकारात्मक दोनों चीजों के संपर्क में आते हैं। उदाहरण के लिए, क्या लोगों के सामान्य भाव—आनंद, गुस्सा, दुःख, खुशी—सकारात्मक चीजें हैं या नकारात्मक चीजें? (सकारात्मक चीजें हैं।) परमेश्वर के खिलाफ लोगों के विद्रोह के बारे में क्या कहना है? क्या यह सकारात्मक चीज है या नकारात्मक? (नकारात्मक चीज।) और परमेश्वर के प्रति लोगों की अत्यधिक इच्छाओं के बारे में क्या कहना है? क्या ये सकारात्मक चीजें हैं या नकारात्मक? (नकारात्मक चीजें।) लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में, जब उन बहुत-सी चीजों की बात आती है जिनसे उनका सामना होता है तब लोगों में वास्तव में कोई बोध नहीं होता है। कुछ सकारात्मक चीजें लोगों के जीवन और अस्तित्व में हमेशा उनके साथ रहती हैं; वे उनके जीवन में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और मानव उत्तरजीविता पर उनके सकारात्मक प्रभाव को किसी भी नकारात्मक चीज के प्रभाव से बदला नहीं जा सकता। लेकिन लोग अक्सर इन सकारात्मक चीजों को नजरअंदाज कर देते हैं, इसके बजाय वे यह मानते हैं कि बहुत-सी नकारात्मक चीजें ही हमेशा लोगों के साथ रहती हैं, उनके जीवन को बनाए रखती हैं और उनके अस्तित्व में उनके साथ चलती हैं। इससे यह देखा जा सकता है कि बहुत-से लोगों में सकारात्मक चीजों के प्रति वास्तव में कोई भावना नहीं होती है। अगर तुम्हारे मन में इन चीजों के प्रति कोई भावना नहीं है तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह जानने के बाद कि वे सकारात्मक चीजें हैं, जब तक तुम उनसे विमुख नहीं होते हो, बल्कि अपने दिल की गहराइयों से उनकी लालसा भी कर सकते हो और उनसे प्रेम भी कर सकते हो तब तक यह प्रमाणित होता है कि तुम्हारी मानवता सकारात्मक चीजों की लालसा करती है। मान लो कि तुम जानते हो कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं और नकारात्मक चीजें क्या होती हैं, लेकिन फिर भी तुम खुद को सकारात्मक चीजें पसंद करने के लिए राजी नहीं कर सकते। बल्कि अपने दिल में तुम नकारात्मक चीजों को पसंद करते हो, यहाँ तक कि तुम्हें उनमें विशेष रूप से दिलचस्पी भी है और एक कदम आगे बढ़ा जाए तो अगर स्थितियाँ सही हों और तुम्हें अवसर मिल जाए तो निश्चित रूप से तुम उनका अनुसरण करोगे और उन्हें हासिल करने का प्रयास करोगे। यह बताता है कि जब सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के प्रति तुम्हारे रुझान की बात आती है तब तुम्हें नकारात्मक चीजें पसंद हैं, सकारात्मक चीजें नहीं। अगर तुम्हें सकारात्मक चीजें पसंद नहीं हैं तो यह दर्शाता है कि तुम सकारात्मक व्यक्ति नहीं हो। अगर तुम सकारात्मक व्यक्ति नहीं हो तो तुम निश्चित रूप से जमीर और विवेक वाले व्यक्ति नहीं हो; तुम नकारात्मक व्यक्ति हो। अगर तुम जमीर और विवेक वाले व्यक्ति नहीं हो तो फिर तुम गैर-मानव हो, तुम व्यक्ति नहीं हो। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति टमाटर उगाता है। वह कहीं सुनता है कि जब पौधों पर टमाटर लग जाते हैं, उसके बाद उन पर सिर्फ एक रासायनिक पदार्थ लगाकर उन्हें रातों-रात हरे से लाल टमाटरों में बदला जा सकता है और फिर तुरंत बेचने के लिए तैयार किया जा सकता है। फिर वह सोचता है, “यह तो बढ़िया है। बाकी सभी लोग इन्हें इसी तरीके से बेचते हैं, इसलिए मैं भी ऐसे ही बेचूँगा। इस तरीके से मैं अमीर बन सकता हूँ और मैं टमाटर भी जल्दी खा सकता हूँ। यह बिल्कुल सही है!” इसलिए वह इन टमाटरों को बेच देता है और खुद भी इन्हें खाता है। कोई व्यक्ति उसे चेताता है कि रासायनिक पदार्थों से पकाए गए टमाटर लोगों के लिए नुकसानदायक होते हैं और ऐसी चीजें बेचना दूसरों को नुकसान पहुँचाना है, लेकिन वह इसे मानने से इनकार कर देता है, कहता है, “इससे लोगों को कैसे नुकसान पहुँच सकता है? यह तो वैज्ञानिक शोध का फल है; यह एक सकारात्मक चीज है। विज्ञान मानवजाति की सेवा करता है और चूँकि इन चीजों का आविष्कार विज्ञान के जरिए हुआ है, इसलिए लोगों के जीवन में इनका व्यापक रूप से उपयोग किया जाना चाहिए। विज्ञान के बिना लोगों का जीवन नहीं चल सकता; हमें इस पर भरोसा करना ही पड़ेगा।” यहाँ तक कि कुछ लोग विज्ञान को सत्य भी मानते हैं और वे लोगों को विज्ञान से प्रेम करना, उसे सीखना, उसका उपयोग करना और साथ ही हर चीज को उस पर आधारित करना सिखाते हैं। हो सकता है कि कुछ लोगों ने अब यह पता लगा लिया हो कि विज्ञान आवश्यक रूप से सही नहीं है और विज्ञान के जरिए आविष्कृत कुछ चीजें लोगों के लिए नुकसानदायक हैं—उदाहरण के लिए, रासायनिक हथियार और उन्नत हथियार मानवजाति का संहार करने में सक्षम हैं और विशेष रूप से आनुवंशिक रूप से संशोधित खाद्य पदार्थ मानवजाति के लिए अंतहीन संकट हैं। लेकिन बहुत से लोग ऐसा नहीं सोचते हैं, वे कहते हैं, “क्या विज्ञान गलत हो सकता है? अगर विज्ञान गलत होता तो क्या राज्य उसका समर्थन करता? समस्त मानवजाति विज्ञान सीखती है और उसका उपयोग करती है—क्या समस्त मानवजाति गलत हो सकती है?” क्या यह कथन सही है? उनका मानना है कि चूँकि समस्त मानवजाति विज्ञान का सम्मान करती है और उसका उपयोग करती है और यही सामाजिक प्रवृत्ति है, इसलिए चाहे यह कितनी भी नकारात्मक क्यों न हो, यह एक सकारात्मक चीज बन सकती है। क्या ये उचित-अनुचित का भेद पहचान सकने वाले लोग हैं? (नहीं।) वे जो शब्द बोलते हैं वे क्या हैं? (भ्रांतियाँ।) ये भ्रांतियाँ, पाखंड और टेढ़ी-मेढ़ी दलीलें हैं। हालाँकि बुरी मानवजाति में ज्यादातर लोग इन कहावतों से सहमत होते हैं और इन्हें स्वीकारते हैं, लेकिन चाहे कितने भी लोग इन्हें स्वीकारें और इनका अनुमोदन करें, जो गलत है वह हमेशा गलत ही रहेगा, नकारात्मक चीजें हमेशा नकारात्मक चीजें ही रहेंगी और टेढ़े-मेढ़े तर्क हमेशा टेढ़े-मेढ़े तर्क ही रहेंगे। उनका सकारात्मक चीजें बनना असंभव है और न ही वे कभी सत्य बन सकती हैं।

जो लोग हमेशा सामाजिक प्रवृत्तियों का अनुसरण करते हैं और भ्रांतियाँ बोलना पसंद करते हैं, क्या वे वही नहीं हैं जो नकारात्मक चीजों को विशेष रूप से पसंद करते हैं? (हाँ।) क्या वे सत्य और सकारात्मक चीजों को स्वीकार सकते हैं? (नहीं।) वे सकारात्मक चीजों को नहीं स्वीकार सकते। उदाहरण के लिए, कुछ लोग बीमार पड़ जाते हैं और दरअसल उनकी बीमारी व्यायाम से और उनकी दिनचर्या में बदलावों से ठीक हो सकती है, लेकिन वे इलाज के आधुनिक, उच्च-तकनीक वाले साधनों और विधियों का उपयोग करने पर अड़ जाते हैं। हो सकता है कि तुम कहो, “भले ही अब चिकित्सा पद्धति उन्नत है और उस उपचार के स्पष्ट नतीजे हैं, लेकिन इससे अवशिष्ट प्रभाव होंगे जिनकी जटिलताएँ वापस पलटने योग्य नहीं होंगी। तुम्हें कोई प्राकृतिक विधि अपनानी चाहिए—जैसे कि व्यायाम करना, अपनी दिनचर्या में बदलाव करना और अपनी आहार-संबंधी आदतों और दिनचर्या में बदलाव करना—ताकि धीरे-धीरे तुम्हारा शरीर एक सामान्य, प्राकृतिक लय में प्रवेश कर जाए, जिसके बाद कुछ लक्षण धीरे-धीरे कम हो जाएँगे।” कुछ लोग इस तरह के दृष्टिकोण को स्वीकार सकते हैं, लेकिन दूसरे लोग नहीं। वे सोचते हैं, “यह पुराना दृष्टिकोण है। यही वह तरीका और फलसफा था जिससे हजारों वर्ष पहले मानवजाति बीमारियों का इलाज किया करती थी। यह विचार कि बीमारी का ठीक होना तीस प्रतिशत उपचार और सत्तर प्रतिशत स्वास्थ्य-लाभ पर निर्भर करता है, अब कोई मायने नहीं रखता! अब चिकित्सा पद्धति उन्नत है और उच्च-तकनीक वाले उपचार जल्द नतीजे लाते हैं। दवाइयाँ तुम्हें चुटकियों में ठीक कर देती हैं!” उनके दृष्टिकोणों के अनुसार, अगर चिकित्सा पद्धति उन्नत है और मानवजाति की विभिन्न बीमारियों का इलाज कर सकती है और लोगों को लंबी उम्र जीने दे सकती है, तो चिकित्सा पद्धति एक सकारात्मक चीज बन जाती है; लोगों को चिकित्सा पद्धति और विज्ञान में विश्वास रखना चाहिए और अपनी नियति पर विज्ञान को संप्रभु होने देना चाहिए। वे सोचते हैं कि चाहे लोगों को कितनी भी बीमारियाँ हो जाएँ, डरने की कोई बात नहीं है—उच्च-तकनीक वाले साधनों से किसी भी जटिल, असाध्य बीमारी को ठीक किया जा सकता है और अगर कुछ अवशिष्ट प्रभाव होते हैं तो भी इस बारे में चिंता करने की कोई बात नहीं है। क्या ये दृष्टिकोण सटीक हैं? ये भ्रांतियाँ हैं। मुझे बताओ, अगर तुम इस तरह के व्यक्ति से सकारात्मक चीजों के बारे में बात करो तो क्या तुम उसे समझा सकोगे? क्या वह इसे स्वीकार सकेगा? (नहीं, हम उसे नहीं समझा सकेंगे।) तुम्हारे उसे नहीं समझा सकने का एक कारण यह है कि वह खुद ही सकारात्मक दृष्टिकोणों को स्वीकारने में असमर्थ है। और दूसरा कारण यह है कि दुनिया भर में समस्त मानवजाति बुरी प्रवृत्तियों के बहाव में बहती चली जा रही है और इसका एक भी अपवाद नहीं है। भले ही वह परमेश्वर में विश्वास रखता है, लेकिन अपने दिल की गहराई में वह सत्य नहीं स्वीकारता है, वह सकारात्मक चीजों को नहीं स्वीकारता है और वह लोगों और चीजों को परमेश्वर के वचनों के आधार पर नहीं देखता है। बल्कि वह हर मामले को देखने या उससे पेश आने के लिए आधार के रूप में अभी भी शैतान के दृष्टिकोणों और शैतान की बुरी प्रवृत्तियों का उपयोग करता है। इसलिए, भले ही इस तरह के व्यक्ति को परमेश्वर में विश्वास रखते हुए कई वर्ष हो गए हैं, उसने कुछ धर्मोपदेश सुने हैं, वह अपना कर्तव्य करता रहा है और वह सत्य स्वीकारने के लिए इच्छुक होने का दावा करता है, लेकिन वास्तविक जीवन में चीजों के बारे में वह जिन दृष्टिकोणों को अपनाता है वे नहीं बदलते हैं और न ही इस मामले में कोई बदलाव आता है कि वह नकारात्मक चीजों और सकारात्मक चीजों के बीच क्या चुनता है। जिन नकारात्मक चीजों को उसने स्वीकार लिया है, वे उसके दिल में पहले से ही जड़ें जमा चुकी हैं और अगर वह यह बात जानता है कि ये चीजें सत्य नहीं हैं तब भी वह उन पर ही कायम रहेगा। इससे यह काफी स्पष्ट है कि अपने दिल में उसे जिन चीजों से सच्चा प्रेम है, वे नकारात्मक चीजें हैं, सत्य नहीं। भले ही उसने परमेश्वर के वचन पढ़े हों और सत्य पर धर्मोपदेश सुने हों और वह धर्म-सिद्धांत के लिहाज से यह समझता हो कि ये वचन सही और सत्य हैं, फिर भी वह उन नकारात्मक चीजों को छोड़ने के लिए इच्छुक नहीं है जिन्हें वह बहुत पहले अपने दिल की गहराई में स्वीकार चुका है और वह कभी भी नकारात्मक चीजों का भेद पहचानने के लिए आधार के रूप में परमेश्वर के वचनों का उपयोग नहीं करता है। जब उसका सामना विशिष्ट मामलों से होता है तब भी वह अपने दिल में अपने मूल, गलत दृष्टिकोणों से चिपका रहता है और तब भी वह नकारात्मक चीजों को सकारात्मक चीजें और गलत दृष्टिकोणों को सही दृष्टिकोण मानता है। जहाँ तक सकारात्मक चीजों का प्रश्न है, भले ही वह स्पष्ट रूप से यह नहीं कहता है कि वे नकारात्मक चीजें हैं, लेकिन अपने दिल में वह नकारात्मक चीजों को छोड़ने और सकारात्मक चीजों को स्वीकारने के लिए इच्छुक नहीं है, क्योंकि उसे लगता है, “ऐसा लगता है कि सकारात्मक चीजों का प्रभाव बहुत ही कम होता है और बहुत ही कम लोग उन्हें स्वीकार सकते हैं। वे समाज में व्यवहार्य नहीं हैं—यह एक वस्तुनिष्ठ तथ्य है।” इससे प्रमाणित होता है कि उसके दिल में उचित-अनुचित का भेद पहचानने की क्षमता नहीं है और उसकी मानवता में कोई समस्या है। इस तरह के व्यक्ति को सकारात्मक चीजों में दिलचस्पी नहीं होती और वह अक्सर प्रकृति को बदलना चाहता है, प्राकृतिक दुनिया की उत्तरजीविता के नियमों को बदलना चाहता है, मानव शरीर विज्ञान के नियमों को बदलना चाहता है और मानव उत्तरजीविता के नियमों को बदलना चाहता है, उसे हमेशा प्रकृति पर विजय पाने और विभिन्न सजीव प्राणियों पर विजय पाने की चाह रहती है। उदाहरण के लिए, वह हमेशा इस तरह की बातों पर मनन करता रहता है : “हम बिल्लियों के आनुवांशिक गुण कुत्तों में कैसे पहुँचा सकते हैं ताकि बिल्लियों की तरह कुत्ते भी चूहे पकड़ सकें? और क्या यह अद्भुत नहीं होगा अगर बिल्लियाँ चूहे भी पकड़ सकें और कुत्तों की तरह घर की रखवाली भी कर सकें?” “अगर मुर्गियाँ अंडे दे सकतीं और बाँग भी दे सकतीं तो हमें सिर्फ मुर्गियाँ ही पालनी पड़तीं—वह कितना बढ़िया होता!” देखो, वह हमेशा अनुचित चीजों पर मनन करता रहता है। अगर यह कोई ऐसा व्यक्ति होता जो उचित-अनुचित का भेद पहचान सकता तो वह सोचता, “परमेश्वर द्वारा बनाए गए पशु कितने अद्भुत हैं! मुर्गे बाँग दे सकते हैं और मुर्गियों का साथ दे सकते हैं, मुर्गियाँ अंडे दे सकती हैं और अंडों को सेकर चूजे निकाल सकती हैं और मनुष्य मुर्गों और मुर्गियों दोनों का माँस खा सकते हैं। कुत्ते घर की रखवाली कर सकते हैं और अपने मालिकों के साथी बन सकते हैं, बिल्लियाँ चूहे पकड़ सकती हैं और कभी-कभी परिवार में एक सदस्य की तरह ऐसे घुलमिल सकती हैं कि उनकी मौजूदगी भी महसूस नहीं होती। ये सभी बढ़िया हैं, हरेक का अपना खुद का कार्य है—परमेश्वर की बनाई हर चीज अच्छी है!” लेकिन जो लोग सकारात्मक चीजों को नहीं समझ सकते, वे शैतान के दृष्टिकोणों का उपयोग उन्हें नकारने और उनकी निंदा करने के लिए करेंगे; वे शैतान के दृष्टिकोणों के आधार पर विभिन्न प्राणियों की उत्तरजीविता के नियमों को बदलने का, प्राकृतिक दुनिया के विभिन्न नियमों को बदलने का और यहाँ तक कि मानव उत्तरजीविता के नियमों को बदलने का भी प्रयास करेंगे; वे यह सब इसलिए करेंगे ताकि सत्ता विज्ञान के पास हो। ऐसे लोगों में निश्चित रूप से सामान्य मानवता नहीं होती है। उनकी मानवता में उचित-अनुचित का भेद पहचानने में समर्थ होने की विशेषता की कमी होती है। इसके अतिरिक्त, वे नहीं जानते कि प्राकृतिक नियमों के अनुसार अपने जीवन का प्रबंधन कैसे करना है और वे हमेशा मानवीय इच्छा के अनुसार चीजें करना चाहते हैं, भौतिक जीवन के सामान्य नियमों को बदलने के लिए तकनीकी साधनों या कृत्रिम विधियों का उपयोग करना चाहते हैं। उदाहरण के लिए, एक सामान्य व्यक्ति को ऊर्जा से भरपूर रहने और दिन भर जीने और कार्य करने के लिए दिन में सात-आठ घंटे के आराम की जरूरत होती है, लेकिन इस तरह का व्यक्ति सोचता है, “क्या यह बहुत अच्छा नहीं होगा अगर लोग बिना सोए या खाए हर रोज सामान्य रूप से जी सकें और कार्य कर सकें? आखिर इसे हासिल करने के लिए कौन-से उच्च-तकनीक वाले साधनों का उपयोग किया जा सकता है?” उसके मन में बेहूदे और अजीब विचार यूँ ही उत्पन्न हो सकते हैं। वह इस पर मनन नहीं करता कि सामान्य मानवता के परिप्रेक्ष्य से इन नियमों के अनुसार खुद को कैसे ढालना है और उनका पालन कैसे करना है और इस प्रकार देह की विभिन्न जरूरतों और समस्याओं को सही ढंग से कैसे सँभालना है, बल्कि वह हमेशा इन नियमों को बदलना चाहता है, सामान्य लोगों से भिन्न होना चाहता है, अपनी शारीरिक सहज प्रवृत्तियों से परे जाना चाहता है और अपनी देह द्वारा नियंत्रित या सीमित नहीं किए जाने में समर्थ होना चाहता है। क्या यह भयावह नहीं है? वह हमेशा भीड़ से अलग दिखना चाहता है। दूसरे लोग दिन में आठ घंटे सोते हैं, लेकिन वह सिर्फ दस मिनट या ज्यादा-से-ज्यादा एक-दो घंटे सोना चाहता है और फिर भी दिन भर के लिए पर्याप्त ऊर्जा चाहता है। यह कुछ ऐसी चीज है जो सामान्य लोग हासिल नहीं कर सकते। मानव शरीर के प्राकृतिक नियम परमेश्वर के विधान के तहत पहले से ही निर्धारित किए जा चुके हैं। किसी व्यक्ति की भूख कितनी बड़ी है, उसके आंतरिक अंगों के कार्य करने के नियम क्या हैं, किसी व्यक्ति में कितनी ऊर्जा है, वह एक दिन में कितना कार्य कर सकता है, उसका दिमाग एक दिन में कितनी चीजों के बारे में सोच सकता है और वह उनके बारे में कितनी देर तक सोच सकता है—ये सब निर्धारित हैं। मानवता के परिप्रेक्ष्य से, ये नियम वास्तव में सामान्य हैं और ये सकारात्मक चीजें हैं। सिर्फ निश्चित नियमों का पालन करके ही मानवजाति वर्षों तक जीवित रह सकती है, वंश-वृद्धि कर सकती है, पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रह सकती है और मानवजाति की उत्तरजीविता जारी रह सकती है। यह सभी प्राणियों के लिए ऐसा ही है। सिर्फ निश्चित प्राकृतिक नियमों और जीवन के निश्चित नियमों का पालन करके और आराम और गतिविधि दोनों की अवधियों को अपनाकर ही उनके जीवन की निरंतरता बनी रह सकती है। अगर कोई प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करता है तो उसके जीवन की निरंतरता में समस्याएँ आएँगी और हो सकता है कि वह बहुत लंबे समय तक जीवित न रहे। अगर किसी व्यक्ति की शारीरिक स्थिति में कोई समस्या उत्पन्न होती है तो उसका सामान्य जीवन, उसके दैनिक भोजन और साथ ही उसकी सामान्य सोच, सामान्य निर्णय-क्षमता और एक दिन में उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य की मात्रा इत्यादि सभी प्रभावित होंगे। इसलिए, मानवजाति के प्राकृतिक नियम मानवजाति की सामान्य उत्तरजीविता की रक्षा करते हैं। ये सकारात्मक चीजें हैं और लोगों को इनका तिरस्कार नहीं करना चाहिए और न ही लोगों को इनसे विमुख होना चाहिए। बल्कि उन्हें इनका सम्मान करना चाहिए और इनका पालन करना चाहिए। वे गैर-मानव जो शैतान के हैं, हमेशा महसूस करते हैं, “मानवजाति के इन प्राकृतिक नियमों का पालन करने से लोग पूरी तरह से अक्षम और निकम्मे लगते हैं! हमें हमेशा इन प्राकृतिक नियमों द्वारा सीमित किया जा रहा है—जब तुम थक जाते हो तब तुम्हें सोने जाना पड़ता है; जब तुम्हें भूख लगती है तब तुम्हें खाने जाना पड़ता है। अगर तुम ये चीजें नहीं करते हो तो तुम्हारा दिमाग तुम्हारे मुँह के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता है, तुम्हारे हाथ काँपने लगते हैं, तुम्हारा दिल तेजी से धड़कने लगता है, तुम्हारी टाँगें कमजोर हो जाती हैं और तुम मजबूती से खड़े नहीं रह सकते हो। यह कितनी दिक्कत वाली बात है! कल्पना करो कि तुम बस कोई दवा लेकर सामान्य रूप से जी सकते या कई दिनों तक आराम नहीं करने के बाद भी ऊर्जा से भरपूर रह सकते, जो तुम्हें एक रोबोट से भी ज्यादा अद्भुत बना देता। या कल्पना करो कि जब तुम्हें भूख लगती है तब तुम बस एक विशेष दबाव-बिंदु दबाते हो और तुरंत तुम्हें भूख लगनी बंद हो जाती है। या कल्पना करो कि तुम कई दिनों तक खाना नहीं खाते हो और फिर भी ठीक रहते हो, तुम्हारी देह कमजोर नहीं होती, तुम्हारी ऊर्जा में कमी नहीं आती और तुम्हारा शरीर सामान्य और स्वस्थ रहता है। यह तो अद्भुत होगा!” लोग हमेशा इन प्राकृतिक नियमों को बदलना चाहते हैं। क्या यह सकारात्मक चीजों को नकारना और उनका विरोध करना नहीं है? (हाँ।) इन सकारात्मक चीजों का अस्तित्व मानवजाति के सामान्य अस्तित्व को सुनिश्चित करता है और मानवजाति के सामान्य जीवन को बनाए रखता है, इसलिए लोगों को न सिर्फ इनका पालन करना चाहिए बल्कि इनसे तर्कसंगत रूप से पेश भी आना चाहिए। उन्हें इनके खिलाफ नहीं जाना चाहिए, इन्हें दबाना नहीं चाहिए या इनका प्रतिरोधी नहीं हो जाना चाहिए, इनका विरोध करने की बात तो दूर है। दूसरी तरफ, वे चीजें जो मानवजाति के प्राकृतिक नियमों से परे हैं, लोगों की कल्पनाएँ, उनके कुछ असामान्य विचार और असाधारण व्यवहार, ये सभी नकारात्मक चीजें हैं। चूँकि ये सभी नकारात्मक चीजें हैं, इसलिए लोगों को इनका भेद पहचानना चाहिए और इन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए, इन्हें नहीं स्वीकारना चाहिए। अगर तुममें सकारात्मक और नकारात्मक चीजों का भेद पहचानने की क्षमता है और तुम जीवनयापन करने के दौरान उनसे सही ढंग से पेश आ सकते हो और तर्कसंगत रूप से उन्हें सँभाल सकते हो तो इसका मतलब है कि तुम्हारी मानवता सामान्य है। अगर तुम अक्सर खुद पर इन सकारात्मक चीजों का सकारात्मक प्रभाव महसूस नहीं करते हो और तुम अक्सर इनका विरोध करना और ऐसी चीजें करना चाहते हो जो इनके विपरीत हों, तुम कुछ नकारात्मक कहावतों और दृष्टिकोणों के आधार पर अक्सर इन सकारात्मक चीजों को बदलने का प्रयास करते हो, चीजों के वस्तुनिष्ठ नियमों का उल्लंघन करते हो तो इससे यह साबित होता है कि अपनी मानवता के लिहाज से तुममें उचित-अनुचित का भेद समझने की क्षमता नहीं है। इस तरीके से संगति करने के बाद क्या अब तुम समझ गए हो? (हाँ।)

अगर किसी व्यक्ति में मानवता है तो क्या उसे यह नहीं समझना चाहिए कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और क्या उसे उन्हें नहीं स्वीकारना चाहिए? (हाँ।) और क्या उसे नकारात्मक चीजों का भेद पहचानने में भी समर्थ नहीं होना चाहिए और साथ ही साथ उसे अपने दिल से उनसे नफरत करने और उन्हें अस्वीकार करने में भी समर्थ नहीं होना चाहिए? (हाँ।) तो दूसरी कौन-सी चीजें हैं जिन्हें लोग सकारात्मक या नकारात्मक के रूप में पहचानने में असमर्थ होते हैं? क्या परमेश्वर में विश्वास रखना और उसका अनुसरण करना सकारात्मक चीज है या नकारात्मक चीज? (सकारात्मक चीज है।) क्या मनुष्य की नियति पर परमेश्वर की संप्रभुता सकारात्मक चीज है या नकारात्मक चीज? (सकारात्मक चीज।) मनुष्य की नियति पर परमेश्वर की संप्रभुता सकारात्मक चीज है। तो परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजनों के प्रति भ्रष्ट मानवजाति के विरोध को अनुबल देने वाले मुख्य दृष्टिकोण क्या हैं? (लोग मानते हैं कि व्यक्ति की नियति उसी के हाथ में होती है और ज्ञान उसकी नियति को बदल सकता है।) ये वे दृष्टिकोण हैं जो भ्रष्ट मानवजाति द्वारा परमेश्वर को नकारने और परमेश्वर का प्रतिरोध करने को अनुबल देते हैं; ये सही मायने में नकारात्मक चीजें हैं। तो लोगों को परमेश्वर के मनुष्य की नियति पर संप्रभुता रखने के मामले को कैसे बूझना चाहिए? कुछ लोग हालाँकि, धर्म-सिद्धांत के रूप में यह स्वीकारते हैं कि “परमेश्वर मनुष्य की नियति पर संप्रभु है” यह कथन सही है और सकारात्मक है, लेकिन फिर भी वे अपने दिलों में यह विश्वास करते हैं कि मनुष्य के अपने प्रयास उसकी नियति को बदल सकते हैं, उसकी नियति उसी के हाथ में हो सकती है और अंतिम फैसला उसी का होता है। उन्हें लगता है कि अगर वे कड़ी मेहनत से पढ़ाई नहीं करेंगे और लगन से प्रयास नहीं करेंगे तो वे किसी अच्छे विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं पा सकेंगे और उनके पास अच्छी नौकरी, अच्छी संभावनाएँ नहीं होंगी और न ही जीवनयापन की अच्छी स्थितियाँ होंगी। क्या ये उस तरह के लोग हैं जो उचित-अनुचित का भेद पहचान सकते हैं? (नहीं।) बीस-तीस वर्ष जीने के बाद भी वे अभी भी यह नहीं जानते कि “परमेश्वर मनुष्य की नियति पर संप्रभु है” इस कथन का क्या मतलब है। परमेश्वर में विश्वास रखते हुए उन्हें बहुत-से वर्ष हो चुके हैं, लेकिन वे अभी भी यही सोचते हैं कि उनकी नियति उन्हीं के हाथ में है, ज्ञान उनकी नियति को बदल सकता है और अगर वे एक अच्छा गंतव्य चाहते हैं, अच्छी चीजों का आनंद लेना चाहते हैं और एक अच्छा जीवन जीना चाहते हैं तो उन्हें अपने स्वयं के प्रयासों पर भरोसा करना होगा—ठीक वैसे ही जैसे अविश्वासी कहते हैं, “जीतने के लिए तुम्हें अपना सब कुछ दाँव पर लगाना पड़ेगा।” क्या यह उस तरह का व्यक्ति है जो उचित-अनुचित का भेद पहचान सकता है? (नहीं।) क्या जो व्यक्ति उचित-अनुचित का भेद नहीं पहचान सकता, वह मनुष्य है? (नहीं।) वह अच्छे जीवन का आनंद लेता है, अच्छा खाता-पीता है, अच्छे कपड़े पहनता है और समाज में दूसरे लोग उसका बहुत सम्मान करते हैं और उसे लगता है कि अब उसके पास जो जीवन है, वह पूरी तरह से उसकी अपनी कड़ी मेहनत की बदौलत है। इसलिए, उसका मानना है कि “जीतने के लिए तुम्हें अपना सब कुछ दाँव पर लगाना पड़ेगा और मनुष्य की नियति खुद उसी पर निर्भर करती है, दूसरों पर नहीं” यह कथन सच है और यह एक सही दृष्टिकोण है। क्या यह सामान्य मानवता की अभिव्यक्ति है? (नहीं।) लोग ज्ञान प्राप्त करने से पहले इन चीजों को नहीं समझते, लेकिन एक बार जब वे कुछ ज्ञान पर पकड़ बना लेते हैं तब वे “परमेश्वर मानवजाति की नियति पर संप्रभु है” इस कथन को पूरी तरह से नकार देते हैं और सोचते हैं, “किसी व्यक्ति की नियति उसी के हाथ में होती है; व्यक्ति खुद अपने हाथ से खुशी की रचना कर सकता है।” क्या यह उस तरह का व्यक्ति है जो उचित-अनुचित का भेद पहचान सकता है? (नहीं।) तो ऐसा व्यक्ति किस तरह का प्राणी है? क्या वह मानवता से रहित नहीं है? (हाँ।) ऐसा व्यक्ति जमीर और विवेक से रहित व्यक्ति है और जमीर और विवेक से रहित व्यक्ति उचित-अनुचित का भेद नहीं पहचान सकता। जीवन के तथ्यों का सही मायने में अनुभव कर लेने के बाद भी वह सही मायने में यह बूझ नहीं पाता कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं और न ही वह सही मायने में इस बात को समझ पाता है कि सकारात्मक चीजों का सार क्या है। यह दर्शाता है कि वह उचित-अनुचित का भेद पहचानने में असमर्थ है। ऐसे व्यक्ति में कोई मानवता नहीं होती है; वह बिल्कुल भी मनुष्य नहीं होता है। ऐसे भी कुछ लोग हैं जो धर्म-सिद्धांतों को बिना समझे-बूझे ही दोहरा सकते हैं, वे कहते हैं, “सभी चीजों के नियम परमेश्वर से आते हैं, वे सकारात्मक चीजें हैं, वे मानवता के लिए फायदेमंद हैं और वे वही हैं जिनका मानवता को पालन करना चाहिए और वे वही हैं जिनकी मानवता को लालसा करनी चाहिए और अनुसरण करना चाहिए,” लेकिन कुछ उच्च-तकनीक वाली जानकारी और उच्च-तकनीक वाली चीजों के संपर्क में आने के बाद इन मामलों पर उनके नजरिए बदल जाते हैं। वे किस प्रकार के विचारों में बदल जाते हैं? वे कहते हैं, “हम लोग, जो परमेश्वर में विश्वासी हैं, जीने के नियमों, सभी चीजों के नियमों और सभी चीजों की उत्तरजीविता के नियमों के बारे में हमेशा बात करते रहते हैं और हमें लगता है कि ये सकारात्मक चीजें हैं। यह बहुत ही पिछड़ापन है! यह ज्ञान की कमी को दर्शाता है, यह कुएँ का मेंढक होना है! अब तकनीक बहुत उन्नत है; ऐसी बहुत-सी चीजें हैं जो तुम्हें खुद नहीं करनी पड़तीं क्योंकि तकनीकी उत्पाद तुम्हारे लिए उन्हें कर सकते हैं—इसे ही उन्नत कहते हैं! देखो, कुछ कारें खुद ही चल सकती हैं। कार में बैठने के बाद तुम गंतव्य सुनिश्चित करते हो और फिर तुम बस एक शब्द कहते हो और कार चलने लगती है। यह वाकई उच्च-तकनीक है, यह बहुत ही उम्दा है! मानवजाति ने उन्नत तकनीक विकसित की है और हम बिना कुछ किए ही सभी चीजों के मालिक बन गए हैं। इसलिए, सिर्फ विज्ञान ही परम सत्य है! जिन लोगों में शिक्षा और ज्ञान की कमी है और जो विज्ञान नहीं समझते हैं, वे पिछड़े हुए और असभ्य हैं!” उनका नजरिया बदल गया है, है ना? अपने दिलों में उन्होंने सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बीच के अंतर का भेद नहीं पहचाना है। ऐसे भी कुछ लोग हैं जो किसी विमानन संग्रहालय घूम आने के बाद हैरत से कहते हैं, “वाह, क्या आँखें खोल देने वाली चीज है, विज्ञान तो बहुत ही उन्नत है! हम आम लोगों को वह जगह अपनी समझ-बूझ से परे लगती है—हम उसका कुछ भी समझ नहीं सकते हैं। तुम कल्पना तक नहीं कर सकते कि विज्ञान अब किस हद तक विकसित हो गया है। हम तो उस आधुनिक, उन्नत तकनीकी चीज के संपर्क तक में नहीं आए हैं! और हम अभी भी परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और प्राकृतिक नियमों और कानूनों की बात करते हैं—हम बहुत ही पिछड़े हुए हैं!” आधुनिक समाज की इन चकाचौंध भरी चीजों को देखने के बाद ऐसे लोग अपने दिलों की गहराइयों से सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बारे में उन सिद्धांतों को पूरी तरह से नकार देते हैं जिन्हें वे इससे पहले समझते थे। वे सकारात्मक चीजों को ज्यादा स्पष्ट रूप से नहीं पहचानते हैं, बल्कि यह मानते हैं कि सकारात्मक चीजें पिछड़ी हुई हैं और आधुनिक तकनीक से और मानव विकास की आधुनिक गति से पीछे रह गई हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, वे इन नकारात्मक चीजों को विशेष रूप से स्वीकृति देते हैं और उनकी लालसा करते हैं, और उम्मीद करते हैं कि वे भी उन लोगों में से कोई एक बनेंगे जो आधुनिक, उन्नत तकनीक विकसित करते हैं। क्या इस तरह का व्यक्ति कोई ऐसा है जो उचित-अनुचित का भेद समझ सकता है? (नहीं।) यह देखते हुए कि उचित-अनुचित का भेद पहचानने में समर्थ होना मानवता की एक विशेषता है, नतीजतन यह कुछ ऐसा है जो मानवता में अंतर्निहित और जन्मजात है, न कि कुछ ऐसा है जो बाद में बनता है। यानी उचित-अनुचित का भेद पहचानने में समर्थ होना, मानवता की यह विशेषता समय के साथ या भौगोलिक वातावरण या लोगों, घटनाओं और चीजों में बदलावों के साथ नहीं बदलेगी। इसे कोई नहीं बदल सकता और कुछ भी इसे बदल या हटा नहीं सकता। जो लोग उचित-अनुचित का भेद पहचान सकते हैं, उनके दिलों की गहराइयों में सकारात्मक चीजें हमेशा वही होती हैं जिनकी वे लालसा करते हैं, जबकि नकारात्मक चीजें हमेशा वही होती हैं जिनसे वे विमुख होते हैं और नफरत करते हैं और ये वे चीजें नहीं होतीं जिनकी उनकी मानवता को जरूरत है। उन्हें किन चीजों की जरूरत है? उन्हें ऐसी चीजों की जरूरत है जो भौतिक जीवन के नियमों के लिए और उनकी भौतिक उत्तरजीविता के लिए फायदेमंद हैं, ऐसी चीजें जो प्राकृतिक हैं, जो लोगों को शांतिपूर्ण और सुकून महसूस करवाती हैं और जो सामान्य मानवता के जमीर और विवेक की जरूरतों के अनुरूप हैं, न कि ऐसी चीजें जो भव्य, उदात्त और प्रभावशाली हैं। देखो, जब यह बात आती है कि व्यक्ति कैसे आचरण करता है तब कुछ लोग यह पसंद करते हैं कि उनका जीवन थोड़ा ज्यादा सरल और ज्यादा सादगी भरा हो; वे असाधारण जीवन जीना पसंद नहीं करते हैं, बल्कि वे बस शांति पसंद करते हैं और सुकून और आनंद पाना, बहुत ही शांत जीवन जीना पसंद करते हैं। लेकिन दूसरे लोग यह पसंद नहीं करते हैं; वे असाधारण जीवन जीना पसंद करते हैं, वे भव्य, उदात्त और प्रभावशाली चीजें पसंद करते हैं, वे प्रदर्शन करना पसंद करते हैं, वे भीड़ से अलग दिखना और मशहूर होना पसंद करते हैं और वे सादगी या स्वाभाविकता पसंद नहीं करते हैं। यही बात लोगों की मानवता में अंतर को दर्शाती है।

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