सत्य का अनुसरण कैसे करें (16) भाग पाँच

अगर कोई व्यक्ति मनुष्य है और उसमें सामान्य मानवता है तो उसका उचित-अनुचित का भेद पहचानने में समर्थ होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब उसने परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति प्राप्त नहीं की है और वह सत्य नहीं समझता है तब वह कुछ सरल सकारात्मक और नकारात्मक चीजें समझने के लिए अपने जमीर और विवेक का उपयोग कर सकता है। जब उन कुछ सकारात्मक और नकारात्मक चीजों की बात आती है जिनके वह वास्तविक जीवन में संपर्क में आता है तब उसके पास कुछ भेद पहचानने की और संज्ञानात्मक क्षमताएँ होती हैं। वह मूलभूत मानवीय सामान्य समझ के तहत आने वाली चीजों के प्रति, मानव उत्तरजीविता के नियमों के प्रति और कुछ लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति जिनसे उसका अक्सर सामना होता है, भेद पहचानने की कुछ क्षमता रखने में समर्थ होता है। वह कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो भ्रमित तरीके से जीता हो, बल्कि जब मानव जगत की सकारात्मक और नकारात्मक चीजों की बात आती है तब उसमें भेद पहचानने की और संज्ञानात्मक क्षमताएँ होती हैं और यकीनन उसके पास इन चीजों के प्रति कुछ विचार, रुख और सही रवैये भी होते हैं। तीस वर्ष की उम्र के बाद ऐसे लोगों का धीरे-धीरे जीवन के विभिन्न मामलों से सामना होने लगता है। अगर उन्होंने परमेश्वर के वचनों को नहीं पढ़ा है या परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति नहीं प्राप्त की है तो भी जब वे पचास-साठ वर्ष के हो जाते हैं तब वे धीरे-धीरे यह पता लगा सकते हैं कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं और नकारात्मक चीजें क्या होती हैं, और फिर वे जिन सकारात्मक चीजों को बूझ सकते हैं उनके अनुसार जीवन जी सकते हैं और सकारात्मक चीजों के कुछ नियमों का पालन कर सकते हैं। जहाँ तक कुछ नकारात्मक चीजों का प्रश्न है, वे उनका भेद पहचानने में समर्थ होने के साथ-साथ अपने दिलों की गहराइयों से खुद को उनसे दूर भी कर सकते हैं। जब उनके पास सांसारिक रुझानों या सांसारिक आचरण के फलसफों और लोगों के बीच प्रचलित कहावतों का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है तब उन्हें लगता है कि वे अपने जमीर के खिलाफ जा रहे हैं और उनका जमीर उन्हें धिक्कारेगा। वे अपने दिलों की गहराइयों से ऐसे नजरिए स्वीकार नहीं करते हैं; वे सिर्फ उत्तरजीविता या अस्थायी फायदों की खातिर ही इस तरीके से कार्य करते हैं। ये चीजें करना उनका मूल उद्देश्य नहीं होता; बल्कि यह उनकी इच्छा के खिलाफ किया गया चुनाव होता है। ऐसे लोग परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद, इस बात को लेकर ज्यादा चिंतित रहते हैं कि सभी प्रकार के मुद्दों, जैसे कि मानव जीवन और उत्तरजीविता से संबंधित मुद्दों के बारे में परमेश्वर के वचन वास्तव में क्या कहते हैं, मानव जीवन की कठिन समस्याओं के बारे में परमेश्वर के सटीक कथन वास्तव में क्या हैं और जब इनसे लोगों का सामना होता है तब परमेश्वर लोगों से वास्तव में क्या करने के लिए कहता है। वे इन प्रश्नों के उत्तर पाने की लालसा करते हैं। जब वे उत्तर प्राप्त करते हैं तब उन्हें नहीं लगता कि परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करना बहुत कठिन है या मानवता की जरूरतों के विपरीत है। इसके बजाय उन्हें लगता है कि केवल ये सत्य ही वे सही मार्ग हैं, जिन्हें लोगों को अपनाना चाहिए, जिन्हें उन्हें प्राप्त करना चाहिए और जो वह सदृश्यता है, जो लोगों के जीवन में होनी चाहिए। उन्हें लगता है कि अगर लोग इस तरीके से जीते हैं तो यह सही मायने में उनके जमीर और मानवता की जरूरतों को पूरा कर सकता है और सिर्फ इसी तरीके से जीने से ही वे अपनी इच्छा के खिलाफ नहीं जाते हैं और सिर्फ तभी वे अपने भीतर स्थिरता महसूस कर सकते हैं और आनंद और शांति पा सकते हैं। उन्हें यह भी लगता है कि सिर्फ तभी लोगों के पास उम्मीद होगी और वे जीते रहने के इच्छुक होंगे और सिर्फ तभी वे विभिन्न बुरी शक्तियों, विभिन्न बुरे रुझानों और उस खोखली अवस्था से मुक्त हो सकेंगे जिसमें मानवजाति रहती है। अपने दिलों की गहराई में अपने जमीर के प्रभाव में वे परमेश्वर के वचनों में विभिन्न कथनों, शिक्षाओं और भरण-पोषण को पसंद करते हैं और वे उन्हें अपने दिलों की गहराइयों से अपनाते हैं। उनमें सत्य प्राप्त करने का प्रयास करने की इच्छा होती है। इसके अलावा, जैसे-जैसे परमेश्वर के वचन अधिकाधिक व्यक्त किए जाते हैं और परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति अधिकाधिक व्यावहारिक और विस्तृत होती जाती है, सत्य और सकारात्मक चीजों के लिए उनकी लालसा भी उत्तरोत्तर संतुष्ट होती जाती है। ऐसा नहीं है कि वे जितना ज्यादा सुनते हैं, उतने ही ज्यादा अशांत हो जाते हैं, इसे उतना ही अत्यधिक विस्तृत पाते हैं या उन्हें यह उतना ही उलझा हुआ लगता है। इसके विपरीत, वे जितना ज्यादा सुनते हैं, उन्हें चीजें उतनी ही ज्यादा स्पष्ट लगती हैं और उन्हें उतना ही ज्यादा ऐसा लगता है कि वे चीजों की असलियत देख सकते हैं और उनके पास एक मार्ग है। उन्हें लगता है कि आगे उम्मीद है, उन्हें प्रकाश दिखाई दे रहा है और उनके पास सत्य का अभ्यास करने और उद्धार प्राप्त करने का एक मार्ग है। उनके दिल अधिकाधिक स्थिरता महसूस करते हैं और उन्हें अधिकाधिक यह लगता है कि परमेश्वर में विश्वास रखने का मार्ग सही है और परमेश्वर में विश्वास रखने में उन्होंने अब तक हर रोज जो कीमत चुकाई है और जो ऊर्जा और दिल का खून खपाया है, वे सब सार्थक और अर्थपूर्ण रहे हैं। इसकी पुष्टि उनके दिलों की गहराइयों में होती है। हालाँकि उनकी इच्छा पूरी हो गई है और सत्य के लिए उनकी लालसा कुछ हद तक तृप्त हो गई है, फिर भी जो लोग सही मायने में सत्य की लालसा करते हैं, वे अपना संकल्प नियत करेंगे और योजनाएँ बनाएँगे तथा स्वयं से यह अपेक्षा करेंगे कि वे सत्य के सभी पहलुओं का अभ्यास करें और उनमें प्रवेश करें, परमेश्वर के वचनों, विभिन्न सत्य सिद्धांतों और परमेश्वर की विभिन्न अपेक्षाओं को अपने में कार्यान्वित करने की आवश्यकता होगी, इस प्रकार वे परमेश्वर के वचनों को वास्तविक जीवन में अपने क्रियाकलापों और स्व-आचरण के लिए कसौटी और अपनी जीवन वास्तविकता बनने देंगे। पहले जब वे सत्य नहीं समझते थे तब वे सिर्फ कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत ही बोल सकते थे। जब उनका सामना चीजों से होता था तब उनके प्रति उनका सिर्फ एकतरफा नजरिया होता था, जैसे अंधे लोगों और हाथी की नीतिकथा में था; वे समस्या का सार देखने में असमर्थ थे और उन्हें नहीं पता था कि क्या करना है। उन्हें लगता था कि जीवन बहुत उबाऊ है जिसमें ऐसा कोई लक्ष्य नहीं है जिसकी तरफ प्रयास किया जाए और कोई उम्मीद नहीं है और वे एक भ्रमित तरीके से जीवन जीते थे। लेकिन अब स्थिति भिन्न है। परमेश्वर के वचन अधिकाधिक स्पष्ट रूप से बोले जाते हैं और सत्य की संगति अधिकाधिक स्पष्ट रूप से की जाती है। उन्हें लगता है कि मार्ग ज्यादा उज्ज्वल और ज्यादा स्पष्ट होता जा रहा है और आगे बढ़ने का एक रास्ता है। और हर शब्द जो वे कहते हैं, हर चीज जो वे करते हैं और हर प्रकार का व्यक्ति जिससे उनका सामना होता है, इन सबके लिए आधार के रूप में पालन करने के लिए उनके पास परमेश्वर के वचन हैं। उन्हें लगता है कि परमेश्वर के वचन बहुत व्यावहारिक और बहुत अच्छे हैं और उन्होंने दृढ़ता से मान लिया है कि परमेश्वर में विश्वास रखना ही सही मार्ग है, और परमेश्वर में विश्वास रखने से उद्धार मिल सकता है और इस प्रकार परमेश्वर में विश्वास रखना उन्हें मानव के समान जीवन जीने में समर्थ बना सकता है और यह बहुत अर्थपूर्ण और मूल्यवान है! सत्यों के लिए लालसा करते हुए और उनका अभ्यास करते हुए वे इन सत्यों में निरंतर प्रवेश भी कर रहे हैं और निरंतर अच्छी फसल भी प्राप्त कर रहे हैं। जैसे-जैसे उनके ज़मीर और मानवता की सकारात्मक चीजों की लालसा और ज़रूरत पूरी होती जा रही है, उनका जीवन भी धीरे-धीरे बदलता जा रहा है। हालाँकि वे अक्सर भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं और परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करते हैं और जब चीजों से उनका सामना होता है तब वे अक्सर—न चाहते हुए भी—अपने भ्रष्ट स्वभावों, अपनी देह और अपने बेवकूफी भरे, भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों के अनुसार कार्य करते हैं और साथ ही साथ एक अच्छी परिघटना भी घटित होती है : जब वे ऐसा करते हैं तब उनका जमीर बार-बार असहज हो उठता है और उन्हें लगता है कि उनके भ्रष्ट स्वभाव की जड़ें गहराई तक पहुँच चुकी हैं और उन्हें बदलना मुश्किल है। फिर अपने जमीर के प्रभाव में वे अपने दिलों में बार-बार धिक्कारे गए महसूस करते हैं, उन्हें अपराधबोध और पछतावा महसूस होता है। वे बार-बार इस पर विचार करते हैं कि आखिर उन्होंने कहाँ गलती कर दी और वे अक्सर पश्चात्ताप करते हैं। ये सभी जमीर के प्रभाव हैं। अगर लोगों में जमीर है तो उनमें ये भावनाएँ और ये अभिव्यक्तियाँ होंगी; अगर लोगों में जमीर है तो वे इसी तरीके से जिएँगे, अक्सर आत्म-चिंतन करेंगे, अक्सर पश्चात्ताप करेंगे और अपना रास्ता बदल लेंगे। हालाँकि वे बार-बार असफलताओं और रुकावटों का सामना करते हैं और गलत कर्म करने के कारण बार-बार काट-छाँट, न्याय और ताड़ना का सामना करते हैं, लेकिन चूँकि वे अक्सर पश्चात्ताप करते हैं और बदल जाते हैं, इसलिए सत्य का अनुसरण करने का उनका लक्ष्य वही रहता है, और अंत में उन्हें अच्छा नतीजा और अच्छी फसल मिलेगी। वे अक्सर धिक्कार और अपराधबोध महसूस करते हैं और वे अक्सर अपना रास्ता बदल लेते हैं और पश्चात्ताप करते हैं। यह अच्छी परिघटना है—यह दर्शाता है कि वे पहले से ही सही मार्ग पर हैं और अंततः उन्हें वास्तविक फायदे होंगे। एक बात तो यह है कि उनके भ्रष्ट स्वभाव कुछ हद तक कम हो गए हैं और परमेश्वर के प्रति उनका विद्रोहीपन भी घट गया है। इससे पहले जब उनका ऐसी चीजों से सामना होता था जो उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं होती थीं तब वे शिकायत करते थे, लेकिन अब वे और शिकायत नहीं करते और सत्य की तलाश कर सकते हैं; वे जानते हैं कि धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर परमेश्वर और परमेश्वर के कार्य से पेश आना बेतुका, बेहूदा और गलत है। इसके अतिरिक्त, जहाँ इससे पहले मुश्किलों से सामना होने पर वे नकारात्मक होते थे, वहीं अब वे और नकारात्मक नहीं होते हैं; वे उनसे सही ढंग से पेश आ सकते हैं और परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर सकते हैं। हालाँकि वे कभी-कभी नकारात्मक हो सकते हैं, लेकिन यह उनके कर्तव्य के प्रदर्शन को प्रभावित नहीं करता और वे अपना कर्तव्य करने में समर्पित हो चुके हैं। उनका जमीर उन्हें बताएगा कि ऐसा करना सही है। जब वे इस तरीके से कार्य करेंगे तब उनके दिलों में शांति होगी और दोषारोपण का कोई बोध नहीं होगा और उन्हें यह उत्तरोत्तर महसूस होगा कि यही वह तरीका है जिससे उन्हें कार्य करना चाहिए। वे इस तरीके से जितना ज्यादा अभ्यास करते हैं, उतना ही ज्यादा उन्हें सभी चीजों में सत्य की तलाश और अभ्यास करने का महत्व समझ आता है और उतना ही ज्यादा उन्हें लगता है कि उन्हें सत्य की तलाश करनी चाहिए और सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, कि यह मार्ग सही है और इस तरीके से अभ्यास करने से फायदे मिलते हैं। जब लोगों को ऐसे फायदे मिलते हैं तब वे पाते हैं कि परमेश्वर के साथ उनका रिश्ता बदल रहा है, उनके भीतर का जीवन बदल रहा है और उनके भ्रष्ट स्वभावों की पकड़ उत्तरोत्तर कमजोर पड़ती जा रही है, उन पर ये स्वभाव जो बंधन और अवरोध डालते हैं, वे कम हो रहे हैं; वे यह भी पाते हैं कि सत्य का अनुसरण करने की उनकी इच्छा और उसके लिए उनकी लालसा मजबूत होती जा रही है और सत्य का अभ्यास करने और अपने भ्रष्ट स्वभावों पर विजय पाने की उनकी ताकत भी बढ़ती जा रही है। इस तरीके से लोगों में एक विशेष तरह की भावना उत्पन्न होगी, जो यह है कि उनके लिए भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ देने और उद्धार प्राप्त करने की उम्मीद है, वे जिस मार्ग पर चल रहे हैं वह सही है और सत्य स्वीकारना, उसका अभ्यास करना और उसके प्रति समर्पण करना सही है। यही वह रवैया है जो मानवता के जमीर और विवेक वाले लोगों का सत्य के प्रति होता है। जैसे-जैसे लोग धीरे-धीरे सत्य स्वीकारते हैं, उनमें यही अभिव्यक्ति होती है। यह सबसे सामान्य अभिव्यक्ति है। जिन लोगों में यह अभिव्यक्ति नहीं होती, उनका जमीर कोई नियामक भूमिका नहीं निभा सकता है—यह कम-से-कम है। अगर तुममें जमीर है तो तुम्हारा जमीर निश्चित रूप से एक नियामक भूमिका निभाएगा। अगर तुम्हारा जमीर नियामक भूमिका नहीं निभा सकता है तो फिर तुम्हारा वह जमीर, जमीर नहीं है—तुममें जमीर है ही नहीं। अगर लोगों में जमीर है तो वे उचित-अनुचित का भेद पहचान पाएँगे, सकारात्मक चीजों और नकारात्मक चीजों के बीच का भेद पहचान पाएँगे और सकारात्मक चीजें चुनेंगे और नकारात्मक चीजें छोड़ देंगे। अगर लोगों में जमीर है और वे उचित-अनुचित का भेद पहचान सकते हैं तो वे सत्य स्वीकारना, उसका अभ्यास करना, उसके प्रति समर्पण करना और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चुनेंगे। अगर वे इस बार सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं तो उनका जमीर उन्हें धिक्कारेगा और अगर वे अगली बार सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं तो उन्हें फिर से धिक्कारा जाएगा। अगर तुममें जमीर है, तुम सही और गलत में अंतर समझते हो, और इतने सारे सत्य सुन चुके हो तो जब तुम बार-बार गलत कर्म करोगे तब तुम्हारा जमीर तुम्हें और भी ज्यादा धिक्कारेगा और दोष देगा और तुम अपने जमीर की भावना के प्रति समर्पण करने और सही चुनाव करने में समर्थ होगे। कुछ लोग कहते हैं, “जब मैं गलत कर्म करता हूँ तब मेरा जमीर भी मुझे धिक्कारता है, लेकिन दस-बीस वर्षों तक धिक्कारे जाने के बाद भी मैं सत्य का अभ्यास करने का चुनाव नहीं करना चाहता।” तो फिर मैं कहता हूँ कि तुम्हारा वह जमीर जमीर है ही नहीं। तुम कहते हो कि तुम अपने जमीर द्वारा धिक्कारे गए महसूस करते हो, लेकिन इतने वर्षों से तुम अपना रास्ता बदलने में या पश्चात्ताप करने में असमर्थ रहे हो और तुम्हारा तथाकथित जमीर तुम्हें नियमित करने में विफल हो गया है ताकि तुम सही मार्ग चुनो। तो फिर तुम्हारा जमीर जमीर नहीं है और तुममें कोई मानवता नहीं है। तुम कहते हो, “मैं जानता हूँ कि क्या सही है और क्या गलत—तुम यह कैसे कह सकते हो कि मुझमें कोई जमीर नहीं है?” इसका सिर्फ यही मतलब हो सकता है कि तुम्हारा दिल बहुत ही ज्यादा अड़ियल है और तुम्हारा जमीर अब और काम नहीं कर रहा है। अगर तुममें सही मायने में मानवता का जमीर है तो जब तुम गलत कर्म करोगे और तुम्हारा जमीर तुम्हें धिक्कारेगा तब तुम्हारी मानवता का झुकाव सकारात्मक की तरफ होगा और तुम्हारा जमीर तुम्हें भीतर से दोष देगा, कहेगा, “यह गलत है, इसमें मानवता की बहुत कमी है!” अगर यह तुम्हें हमेशा इसी तरह से धिक्कारता है तो इसकी कोई समझ नहीं होने के लिए तुम्हें किस तरह का व्यक्ति होना पड़ेगा? सिर्फ जमीर रहित लोगों में ही इस समझ की कमी होती है। अगर तुममें सही मायने में जमीर है तो जब तुम्हारा जमीर तुम्हें धिक्कारता है तब क्या तुम अड़ियल बने रह सकते हो? अगर तुम कहते हो, “मुझे दस-बीस वर्षों से धिक्कारा जा रहा है और मैंने विशेष रूप से कुछ महसूस नहीं किया है” तो तुम जमीर वाले व्यक्ति नहीं हो। क्या यह ऐसा नहीं है? (हाँ।) तुममें कोई जमीर नहीं है, लेकिन तुम फिर भी अपने में मानवता होने का दावा करते हो—क्या यह लोगों को धोखा देना नहीं है? अगर तुममें मानवता है तो ऐसा कैसे हो सकता है कि तुममें कोई जमीर न हो? अगर तुममें कोई जमीर नहीं है तो फिर तुममें कोई मानवता भी नहीं है। मानवता नहीं होने का एक संकेत यह है कि व्यक्ति नहीं समझता कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं और नकारात्मक चीजें क्या होती हैं। तुम कहते हो कि तुममें जमीर है, तो फिर तुम उचित-अनुचित का भेद पहचानने में असमर्थ क्यों हो? तुमने बहुत सारे धर्मोपदेश सुने हैं, तो फिर तुम सत्य का अनुसरण करने की लालसा क्यों नहीं करते? तुम कहते हो, “मेरा दिल सत्य का अनुसरण करने का इच्छुक है और सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक है”—तो फिर तुमने किन सत्यों का अभ्यास किया है? प्रमाण कहाँ है? अगर तुम्हारा दिल सत्य से प्रेम करता है और सत्य का अनुसरण करने का इच्छुक है तो तुम सत्य का अभ्यास क्यों नहीं करते? क्या यह लोगों को धोखा देना नहीं है? क्या यह किसी धोखेबाज के झूठों जैसा नहीं है? यह ठीक उस बड़े लाल अजगर जैसा है जो हमेशा यह प्रचार करता है कि वह जो कुछ भी करता है वह लोगों की सेवा करने के लिए और उन्हें सुखी जीवन जीने में समर्थ बनाने के लिए है, लेकिन जब लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और सही मार्ग पर चलते हैं तब वह उन्हें पागलों की तरह गिरफ्तार करता है और सताता है। वह लोगों को परमेश्वर का अनुसरण करने, सत्य स्वीकारने और उद्धार प्राप्त करने की अनुमति नहीं देता है—वह उन्हें सिर्फ पार्टी का अनुसरण करने और उसके आदेशों को मानने की अनुमति देता है जिससे वे अंत में नरक पहुँच जाते हैं और दंडित किए जाते हैं, जिससे बड़े लाल अजगर को बहुत खुशी मिलती है। तो क्या बड़े लाल अजगर के ये शब्द कि वह “लोगों की सेवा करता है” सच है या झूठ? शैतान हमेशा कहता है कि वह जो कुछ भी करता है वह लोगों के फायदे के लिए होता है, लेकिन वह लोगों को सत्य की आपूर्ति नहीं कर सकता और न ही वह लोगों को जीवन में सही मार्ग पर ले जाने के लिए उनका मार्गदर्शन कर सकता है। वह लोगों के मन में सिर्फ पाखंड और भ्रांतियाँ बिठाता है, उन्हें भोग-विलास के जीवन में लिप्त होने और बुराई के मार्ग पर चलने, संसार के पीछे भागने, शोहरत और लाभ के पीछे भागने और एक-दूसरे से लड़ने तथा एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाने के लिए उकसाता है, वह लोगों को सही मार्ग पर चलने की अनुमति नहीं देता और उन्हें परमेश्वर के पक्ष से छीन ले जाता है। अंत में लोगों को शोहरत और लाभ तो हासिल हो जाता है, लेकिन उनके शरीर और मन पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं; वे शैतान के पाखंडों और भ्रांतियों से भर जाते हैं, परमेश्वर उनके दिल में मौजूद नहीं होता और वे यह विश्वास अब और नहीं करते कि मानवजाति को परमेश्वर ने बनाया। वे परमेश्वर को नकारना शुरू कर देते हैं और उसके प्रति शत्रुतापूर्ण हो जाते हैं। क्या शैतान यह मनुष्य के फायदे के लिए कर रहा है? क्या यह लोगों को नुकसान पहुँचाना और बरबाद करना नहीं है? फिर भी जो लोग उचित-अनुचित का भेद पहचानने में समर्थ नहीं हैं, वे इन चीजों की असलियत नहीं देख पाते हैं।

कुछ लोग कहते हैं, “मुझमें मानवता है और मैं उचित-अनुचित का भेद पहचान सकता हूँ और ज्यादातर लोगों की तुलना में मुझमें ज्यादा जमीर है।” तो फिर आज संगति की गई विषय-वस्तु से अपनी तुलना करो और देखो कि क्या तुममें जमीर है, क्या तुम सत्य स्वीकार सकते हो और उसका अभ्यास कर सकते हो, क्या जब तुम गलत करते हो तब तुम्हें अफसोस और अपराधबोध महसूस होता है और क्या तुमने सही मायने में पश्चात्ताप किया है और तुम सही मायने में बदल गए हो। अगर तुममें जीवन प्रवेश की ये अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं तो यह प्रमाणित करता है कि जब से तुमने परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू किया, उसके बाद से बहुत-से धर्मोपदेश सुनने के बावजूद तुम्हारे जमीर ने काम नहीं किया है। तुम्हारे जमीर के काम नहीं करने के पीछे क्या कारण है? सिर्फ एक ही कारण इस समस्या की व्याख्या कर सकता है : तुम एक जमीर रहित व्यक्ति हो। कुछ लोग कहते हैं, “हालाँकि मेरे पास जीवन प्रवेश नहीं है, लेकिन मैं सभी सत्य समझता हूँ।” अगर तुम सत्य समझते हो तो तुम उसका अभ्यास क्यों नहीं करते? तुम्हें अभी तक कोई प्रवेश क्यों नहीं मिला? तुम्हारा जीवन अभी भी क्यों नहीं बदला? तुम सत्य समझते हो, लेकिन उसका अभ्यास नहीं करते—तुम्हारा जमीर कहाँ है? कुछ लोग तो बहस तक करते हैं, “मुझे परमेश्वर में विश्वास रखते हुए बहुत-से वर्ष हो गए हैं। अगर मुझमें कोई जमीर नहीं होता तो क्या मैं इतना ज्यादा त्याग कर सकता था, इतना ज्यादा कष्ट सह सकता था और इतनी बड़ी कीमत चुका सकता था? क्या मैं खुशी से अपना कर्तव्य कर सकता था?” अगर तुम्हारे पास जमीर है तो फिर तुम्हारे द्वारा बहुत-से सत्य सुने जाने के बाद उसका क्या प्रभाव पड़ा है? क्या यह तुम पर अंकुश लगा सकता है ताकि तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करो? क्या यह तुम्हारे व्यवहार और विचारों को नियंत्रित कर सकता है? तुम बहुत-से वर्षों से धर्मोपदेश सुनते आ रहे हो, तुम बहुत-से सिद्धांत बोल सकते हो, तुमने बहुत कष्ट सहा है और बहुत बड़ी कीमत चुकाई है—तो फिर तुम्हारा जमीर तुम्हारे व्यवहार को नियंत्रित करने, तुमसे सिद्धांतों के अनुसार कार्य करवाने और सिद्धांतों का उल्लंघन करने से रोकने में कोई भूमिका क्यों नहीं निभाता? अगर तुममें बहुत सारा जमीर और मानवता है और तुमने बहुत-से सत्य समझ लिए हैं तो तुम उन्हें व्यवहार में क्यों नहीं ला सकते? तुम कैसे खुलेआम सिद्धांतों का उल्लंघन कर सकते हो और खुलेआम कलीसिया के कार्य में बाधा डाल सकते हो? अगर तुममें जमीर है तो क्या इतने वर्षों तक अपना कर्तव्य करने के बाद तुम्हारा जीवन बदल गया है? तुम नहीं बदले हो और सत्य में तुम्हारा किसी भी तरह का कोई प्रवेश नहीं है; यह दर्शाता है कि तुममें जमीर नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, “अगर मेरे पास जमीर नहीं होता तो क्या मैं अपना कर्तव्य कर सकता था?” तुम अपना कर्तव्य नहीं कर रहे हो; तुम श्रम कर रहे हो। श्रम करने के लिए जमीर की जरूरत नहीं होती; जरा-सा प्रयास करना ही पर्याप्त होता है। यह इस कहावत की निश्चित रूप से पुष्टि करता है : जो लोग श्रम करते हैं वे जमीर रहित होते हैं; वे जीवन प्रवेश या सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे सिर्फ श्रम करने की इच्छा करते हैं और प्रयास करने के इच्छुक रहते हैं। श्रम करने की क्या विशेषताएँ हैं? कष्ट सहने और कीमत चुकाने का इच्छुक होना, कष्ट सहने और कीमत चुकाने में अपनी खुशी, महत्व का बोध और मूल्य तलाश करना, आशीषों की अपनी इच्छा और परमेश्वर के साथ सौदे करने की अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने का प्रयास करना और अपने कष्टों और बलिदान के बदले आशीषें पाने का प्रयास करना। अगर तुम उनसे कार्य में प्रयास करने, कष्ट सहने और कीमत चुकाने को कहते हो तो उनमें इसके लिए बहुत सारा जोश होता है; लेकिन अगर तुम उनसे सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने और सत्य का अभ्यास करने को कहते हो तो वे उदासीन और हैरान हो जाते हैं और उन्हें नहीं पता होता कि अभ्यास कैसे करना है। कुछ लोग तो यह तक महसूस करते हैं कि उन्हें मुश्किल परिस्थिति में डाल दिया गया है, और वे सोचते हैं, “अगर तुम मुझसे प्रयास करने, कष्ट सहने और कीमत चुकाने को कहते हो तो कोई बात नहीं। मैं किसी भी मात्रा में कष्ट सह सकता हूँ और चाहे मैं कितना भी थक जाऊँ, मैं शिकायत नहीं करूँगा। लेकिन मुझे सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने के लिए कहना—क्या यह मेरे लिए चीजों को मुश्किल बनाना नहीं है? प्रयास करना, बिना किसी शिकायत के कष्ट सहना और कीमत चुकाना पहले से ही काफी अच्छा है—फिर भी तुम मुझसे सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने की अपेक्षा क्यों करते हो? लोगों से तुम्हारी माँगें बहुत ही ज्यादा हैं! लोग जिस भी तरीके से चीजें करना चाहते हैं उन्हें करने दो; अगर कार्य पूरा हो जाता है, तो यह काफी है। अगर यह अच्छी तरह से नहीं किया जाता है तो इसे समय के साथ ही ठीक किया जा सकता है!” वे बस श्रम करने के इच्छुक होते हैं और श्रम करते समय वे बहुत ऊर्जावान होते हैं, लेकिन जब सत्य का अभ्यास करने की बात आती है तब वे उदासीन हो जाते हैं और जब जीवन प्रवेश की बात आती है तब तो वे और भी उलझन में पड़ जाते हैं। लेकिन फिर भी वे सोचते हैं कि वे अच्छे लोग हैं। वे अक्सर कहते हैं, “मैं जमीर वाला व्यक्ति हूँ और मैं दयालु हूँ। मैं अपनी सारी ऊर्जा अपना कर्तव्य करने में लगा देता हूँ और मैं कभी भी खुद को रोककर नहीं रखता। मैं परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के लिए अपने परिवार और करियर को छोड़ सकता हूँ। मैं इतना प्रेरित कैसे हो सकता हूँ? मैं स्वाभाविक रूप से एक अच्छा व्यक्ति हूँ!” दरअसल, वह कोई सत्य नहीं समझता है, सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य तो और भी कम कर सकता है। वह सिर्फ पशुबल का उपयोग करना जानता है, लेकिन फिर भी वह यही समझता है कि वह अच्छा है। इस चरण में भी उसके जमीर और विवेक में कोई भावना नहीं है। अगर सही मायने में तुम्हारे पास जमीर होता तो तुम ऐसी टेढ़ी-मेढ़ी दलीलें कैसे दे सकते थे? तुम्हारे पास सत्य की शुद्ध समझ कैसे नहीं हो सकती थी? अगर तुम्हारे पास जमीर और मानवता होती तो तुम परमेश्वर के वचनों को, लोगों के लिए परमेश्वर की अपेक्षित कसौटियों को और तुम जो भी चीज करते हो उस हर चीज में किन सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए उसको, ध्यान से कैसे नहीं सुन सकते थे? अगर तुम सुनते तो हो लेकिन समझते नहीं हो और सत्य के प्रति सुन्न हो तो तुम जमीर और मानवता रहित व्यक्ति हो। क्या तुम्हें लगता है कि तुम सत्य और जीवन के लिए, उद्धार के लिए अपने पाशविक परिश्रम की अदला-बदली कर सकते हो? यह असंभव है; वह मार्ग कारगर नहीं है। अगर तुम प्रयास करने और ईमानदारी से परिश्रम करने के इच्छुक हो, थोड़ा कष्ट सह सकते हो और लोगों की नजरों में तुम कुछ हद तक समर्पित हो, तो भी यह कहना मुश्किल है कि तुम अंत तक समर्पित रह सकोगे या नहीं। यह नहीं कहा जा सकता कि कब तुम्हारी पाशविक प्रकृति भड़क उठेगी और तुम परेशानी खड़ी कर दोगे, गड़बड़ियाँ और विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करोगे और फिर तुम्हें दूर करना पड़ेगा। क्या हाल ही में कलीसिया से कुछ लोगों को दूर नहीं कर दिया गया? ऐसे लोग बहुत ही सुखद लगने वाले शब्द बोलते हैं और जो कोई भी उन्हें सुनता है, उसे लगता है कि वे सत्य समझते हैं, लेकिन वे सत्य का अभ्यास करते ही नहीं हैं। वे सुखद लगने वाली चीजें कहते हैं, लेकिन वास्तविक कार्य नहीं करते हैं। वे खुद को न सिर्फ लोगों के खिलाफ, बल्कि परमेश्वर के घर के खिलाफ भी खड़े कर लेते हैं। क्या यह परमेश्वर का प्रतिरोध करना नहीं है? क्या परमेश्वर का घर उन्हें जगह दे सकता है? अगर वे अपना कर्तव्य करने के इच्छुक हैं तो उन्हें इसे आज्ञा और नियमों का पालन करते हुए करना चाहिए, लेकिन वे ऐसा नहीं करते हैं। वे प्रभारी बनने और शक्ति रखने का प्रयास करते हैं और यहाँ तक कि वे विघ्न-बाधाएँ और विनाश भी उत्पन्न करते हैं। वे किस हद तक विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करते हैं? जब मैं कुछ कर रहा होता हूँ तब भी वे दखलंदाजी करने, किसी न किसी चीज की आलोचना करने, रुकावट और व्यवधान डालने का प्रयास करते हैं। वे मेरे क्रियाकलापों में व्यवधान डालने का प्रयास करते हैं—क्या मैं उनके प्रति दया दिखा सकता हूँ? अगर तुम सिर्फ मेरे निजी जीवन में व्यवधान डाल रहे होते तो मैं तुम्हें एक तरफ कर सकता था और अनदेखा कर सकता था, लेकिन मैं परमेश्वर के घर में कार्य कर रहा हूँ, परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए कुछ वास्तविक कार्य कर रहा हूँ और फिर भी तुम उसमें व्यवधान डालने और उसे कमजोर करने का प्रयास करते हो। यहाँ क्या समस्या है? ऐसे व्यक्ति के साथ क्या किया जाना चाहिए? (उसे दूर कर दिया जाना चाहिए।) परमेश्वर के घर में लोगों को सँभालने के लिए कुछ सिद्धांत हैं और ऐसे लोगों को दूर कर दिया जाना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, “मेरे साथ अन्याय हुआ है! मुझे नहीं पता था कि इससे तुम्हें ठेस पहुँचेगी। मुझे नहीं पता था कि मैं ऊपरवाले की अवज्ञा कर रहा हूँ और परमेश्वर की अवज्ञा कर रहा हूँ। मैंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया।” यह तथ्य कि तुम ऐसा कर सके दर्शाता है कि तुम जानबूझकर ऐसा कर रहे थे। तुम कितने वर्षों से धर्मोपदेश सुनते आ रहे हो? क्या तुममें जमीर है—क्या तुममें मानवता है? अगर तुम मनुष्य होते, अगर तुममें मानवता होती और तुम्हारे पास जमीर और विवेक होता तो तुम ऐसी चीजें नहीं करते, वह चाहे जानबूझकर हो या अनजाने में। मैं कार्य कर रहा हूँ और वे जानबूझकर उसमें व्यवधान डालते हैं और उसे कमजोर करने का प्रयास करते हैं। क्या वे मनुष्य हैं भी? क्या वे दानव नहीं हैं? अगर लोगों में सही मायने में जमीर और विवेक है और सही मायने में मानवता है तो भले ही यह कोई साधारण व्यक्ति ही कुछ कर रहा हो, जब तक वह चीज कलीसिया के कार्य के लिए और भाई-बहनों के लिए फायदेमंद है तब तक वे जानते हैं कि उन्हें उसे बनाए रखना चाहिए और उसे कमजोर नहीं करना चाहिए और तब की बात तो छोड़ ही दो जब वह कोई ऐसी चीज है जिस पर मैं व्यक्तिगत रूप से ध्यान दे रहा हूँ। फिर भी वे व्यवधान उत्पन्न करने पर और उसे नुकसान पहुँचाने का प्रयास करने पर अड़ जाते हैं और उन्हें कोई नहीं रोक सकता। वे पक्के दानव बन गए हैं, है ना? मैं कहता हूँ कि ऐसे चरित्रों के बुरे कर्म गंभीर हैं—हमें उनके साथ नरमी नहीं बरतनी चाहिए; परमेश्वर के घर में लोगों को सँभालने के लिए सिद्धांत हैं और उन्हें बाहर निकालकर सँभाला जाना चाहिए। क्या यह उनसे पेश आने का उचित तरीका है? (हाँ।) वे अगर सिर्फ अपने रोजमर्रा के जीवन में अपनी निजी पसंदों का पालन करते हैं तो यह स्वीकार्य है। उदाहरण के लिए, हो सकता है कि मैं कहूँ, “मुझे नूडल्स खाना पसंद है,” जिस पर वे कहते हैं, “मुझे नूडल्स खाना पसंद नहीं है। जब मैं खाना बनाऊँगा तब तुम्हारे लिए नूडल्स बनाऊँगा और अपने लिए चावल बनाऊँगा।” यह मामला कलीसिया के कार्य से संबंधित नहीं है और न ही यह सत्य सिद्धांतों से संबंधित है, फिर व्यक्ति की मानवता या जमीर से तो यह और भी कम संबंधित है। यहाँ तुम्हारी व्यक्तिगत पसंद का पालन करना ठीक है, लेकिन जब कलीसिया के कार्य से संबंधित मामलों की बात आती है, तब यह स्वीकार्य नहीं है। अगर तुम मनमाने ढंग से बुरे कर्म करते हो और गड़बड़ियाँ तथा विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करते हो, तो तुम प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन कर रहे हो। किस तरह का व्यक्ति प्रशासनिक आदेशों का बेशर्मी से उल्लंघन कर सकता है? किस तरह का व्यक्ति खुलेआम सत्य और परमेश्वर के घर की अवज्ञा कर सकता है? (दानव।) वे बेवकूफ उलझे हुए लोग और दरिंदे इस तरीके से अवज्ञा कर सकते हैं और व्यवधान उत्पन्न कर सकते हैं, और दानव तो ऐसा करने में और भी ज्यादा सक्षम हैं। परमेश्वर का घर चाहे कुछ भी करे, दानव हमेशा उसमें व्यवधान डालने का प्रयास करते हैं—वे नतीजों की परवाह किए बिना विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करते हैं मानो वे आत्माओं के कब्जे में हों। वे इस हद तक व्यवधान डाल सकते हैं और फिर भी उन्हें इसका एहसास नहीं होता, उन्हें अभी भी यही लगता है कि उन्होंने कोई व्यवधान नहीं डाला है, वे पूरी तरह से मासूम हैं, और यहाँ तक कि वे अपना बचाव भी करते हैं। ऐसे लोगों के साथ किसी भी चीज की संगति करने की जरूरत नहीं है; बस उन्हें बाहर निकाल देना ही सही काम है। इस तरह के लोग, जिनमें मानवता का कोई जमीर और विवेक नहीं होता, पक्के दानव होते हैं; वे कभी नहीं बदलेंगे। तुमसे सत्य का अनुसरण करने की अपेक्षा नहीं की जाती है और न ही तुमसे सभी चीजों में सत्य का अभ्यास करने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन कम-से-कम तुम्हें नियमों का पालन करना तो आना ही चाहिए। अगर तुम नियम तक नहीं समझते और तुम परमेश्वर के घर के प्रशासनिक आदेश नहीं समझते और जब तुम प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करते हो तब तुम्हें पता तक नहीं चलता तो क्या तुममें मानवता है? तुममें कोई मानवता नहीं है; तुम दानव हो। जब दानव बुराई करते हैं तब वे खुद को रोक नहीं सकते। परमेश्वर के प्रति उनका प्रतिरोध, उनके द्वारा परमेश्वर की आलोचना और परमेश्वर के खिलाफ उनकी ईश-निंदा उनकी प्रकृति के स्वाभाविक प्रकाशन हैं। वे किसी के द्वारा उकसाए या शिक्षित किए बिना ही स्वाभाविक रूप से इस तरह की बुराई कर सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनकी शैतानी प्रकृति उन पर हावी रहती है।

आज हमने उचित-अनुचित का भेद पहचानने के मुद्दे पर संगति की, जो लोगों के जमीर और विवेक का हिस्सा है। इस संगति के जरिए क्या तुम लोग अब इस पहलू को स्पष्ट रूप से देख रहे हो? एक सच्चे मनुष्य में जमीर होता है और वह उचित-अनुचित का भेद पहचान सकता है; उसका जमीर काम कर रहा है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किन व्यक्तियों, घटनाओं या चीजों से उसका सामना होता है और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन-से मुद्दे उत्पन्न होते हैं, उसका जमीर कम-से-कम बचाव की पहली पंक्ति तो होती ही है। एक बात तो यह है कि तुम्हारा जमीर तुम्हें इन चीजों के बारे में राय बनाने और उनका भेद पहचानने में मदद करेगा कि कौन-सी चीजें सकारात्मक हैं और कौन-सी नकारात्मक; दूसरी बात यह है कि यह तुम्हें अपने आगे के मार्ग की परख और जाँच करने में मदद कर सकता है ताकि तुम स्व-आचरण के न्यूनतम मानकों से नीचे न गिरो और अंततः यह तुम्हें विवेकपूर्ण चुनाव करने और सही मार्ग चुनने में मदद करेगा। बेशक, जो लोग सत्य समझते हैं या जिन्हें परमेश्वर में विश्वास रखते हुए बहुत-से वर्ष हो चुके हैं और जिनके विश्वास में एक मजबूत नींव है, वे अपने जमीर के प्रभाव में अंततः सकारात्मक चीजें चुनेंगे और सत्य की तलाश करना और सत्य स्वीकारना चुनेंगे। इसलिए, मानवता में जमीर एक प्रमुख भूमिका निभाता है; यह लोगों को सही मार्ग की तरफ ले जाने में मार्गदर्शन करने और लोगों को नियमित करने की भूमिका निभाता है ताकि वे सकारात्मक चीजों का चयन करें। अगर किसी व्यक्ति में जमीर नहीं है तो यह कहने की जरूरत ही नहीं है कि वह न सिर्फ सकारात्मक चीजें और सही मार्ग चुनने में असमर्थ होगा, बल्कि वह जो कुछ भी करेगा, उसमें जमीर के न्यूनतम अंकुश और नियमन की कमी होगी। ऐसा व्यक्ति बड़े संकट में है; उसके बुराई करने और परमेश्वर का प्रतिरोध करने की बहुत संभावना है। अगर वह किसी पशु से पुनर्जन्म लिया हुआ है तो हो सकता है कि वह ऐसी चीजें करे जो दुष्ट राक्षस करते हैं, और जो लोग दुष्ट राक्षस और दानव हैं, वे और भी बड़ी बुराइयाँ कर सकते हैं, जो बहुत भयावह है। इसलिए जमीर होना बहुत महत्वपूर्ण है। क्या यह स्पष्ट है? (हाँ।) अगर किसी व्यक्ति में अपने व्यवहार को नियमित करने और सही मार्ग पर चलने के लिए मार्गदर्शन करने के लिए कोई जमीर नहीं है तो उसके द्वारा चुना गया मार्ग अनिवार्य रूप से गलत मार्ग होगा और वह जो करेगा वह नकारात्मक चीजें होंगी—इसके नतीजों की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अगर वह बेशर्मी से सत्य का और चीजों के विकास के नियमों का उल्लंघन कर सकता है और लापरवाही से ईश-निंदा कर सकता है, सत्य के बारे में और परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले सभी कार्यों के बारे में राय बना सकता है, यहाँ तक कि खुलेआम परमेश्वर का प्रतिरोध भी कर सकता है और परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन भी कर सकता है और दुस्साहसपूर्वक परमेश्वर को कोस सकता है, उसकी निंदा कर सकता है और ईश-निंदा कर सकता है तो वह बिल्कुल दानवों और शैतान के समान है। वह वे सारी बुराइयाँ कर सकता है जो दानव और शैतान कर सकते हैं, वे सारी चीजें कर सकता है जो दानव और शैतान कर सकते हैं और वे सारी भ्रांतियाँ, पाखंड और टेढ़ी-मेढ़ी दलीलें कह सकता है जो दानव और शैतान कह सकते हैं। ये लोग सच्चे अर्थों में दानव और शैतान हैं।

आज की संगति से तुम लोगों को क्या समझ आया है? (मैं समझ गया हूँ कि मानवता वाले लोगों में जमीर और विवेक होता है और वे उचित-अनुचित का भेद पहचान सकते हैं। उचित-अनुचित का भेद पहचानने के संबंध में, परमेश्वर ने विभिन्न उदाहरणों का उपयोग करते हुए अत्यंत स्पष्टता से समझाया कि सकारात्मक चीजें और नकारात्मक चीजें क्या होती हैं ताकि जब हमारा सामना चीजों से हो तब हम सटीक फैसले ले सकें और साथ ही अपने अनुसरण के पीछे सही परिप्रेक्ष्य रख सकें—हमें सकारात्मक चीजों की लालसा करनी चाहिए और उनका अनुसरण करना चाहिए और नकारात्मक चीजों से नफरत करनी चाहिए और उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए।) मानवता में जमीर और विवेक किसी व्यक्ति के लिए उद्धार प्राप्त करने की सबसे मूलभूत शर्तें हैं। अगर तुममें ये दो मूलभूत शर्तें हैं, लेकिन तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते हो और जो जरा-सा सत्य तुम समझते हो, उसका अभ्यास नहीं करते और अंततः सत्य के प्रति समर्पण प्राप्त नहीं कर सकते तो तुम अभी भी उद्धार प्राप्त करने में असमर्थ रहोगे। जमीर और विवेक उद्धार की सिर्फ मूलभूत शर्तें हैं; जहाँ तक यह प्रश्न है कि तुम किस मार्ग पर चलते हो, यह तुम्हारी अपनी पसंद पर निर्भर करता है। अगर तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसके पास सही मायने में जमीर और विवेक है तो तुम्हें अपने जमीर के नियमन के तहत, सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना शुरू करने का चुनाव करने का अवसर मिलेगा। अगर तुम्हारा जमीर तुम्हें नियमित करता है और तुम्हारा मार्गदर्शन करता है ताकि तुम सही मार्ग चुनो, लेकिन तुम कष्ट सहने और कीमत चुकाने के इच्छुक नहीं हो, देह के खिलाफ विद्रोह करने और अपने दैहिक स्वार्थों से जुड़ी चीजें छोड़ने के इच्छुक नहीं हो और तुमने सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना शुरू नहीं किया है तो अभी भी तुम्हारे पास उद्धार प्राप्त करने की कोई उम्मीद नहीं होगी। उद्धार प्राप्त करने की उम्मीद, एक बात तो यह है कि सीधे तुम्हारी मानवता के जमीर से संबंधित है; दूसरी बात यह है कि यह सीधे उस कीमत से संबंधित है जो तुम सत्य का अनुसरण करने में चुका सकते हो और यह सीधे सत्य का अभ्यास करने के तुम्हारे दृढ़ संकल्प और इच्छा से भी संबंधित है। जमीर तुम्हें बचाए जाने के लिए सिर्फ एक मूलभूत शर्त प्रदान करता है और यह तुम्हारे लिए सत्य का अभ्यास करने के बहुत-से अवसर भी उत्पन्न करता है, जिससे तुम्हें अपने जमीर के नियमन के तहत सही मार्ग पर चलने का मौका मिलता है। यानी तुम्हारे सही मार्ग पर चलना शुरू करने की संभावना अपेक्षाकृत ज्यादा होगी और उद्धार प्राप्त करने की तुम्हारी उम्मीद भी अपेक्षाकृत ज्यादा होगी, पचास प्रतिशत से ज्यादा—लेकिन इसकी गारंटी नहीं होगी। इसलिए, अगर तुम्हें यह महसूस हो कि तुममें जमीर और मानवता है तो भी इसे लेकर आत्मतुष्ट मत हो, यह मत सोचो कि सिर्फ जमीर और विवेक होने का मतलब है कि तुम एक अच्छे व्यक्ति हो और उद्धार प्राप्त कर सकते हो, कि यह तुम्हारी मुट्ठी में है। अगर तुम इस तरीके से सोचते हो तो मैं तुम्हें बता दूँ कि इस मामले में तुम्हारी बूझ में विचलन हैं। अगर तुममें जमीर और मानवता है तो यह सिर्फ इस बात की पुष्टि करता है कि तुम वह व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर ने चुना है और बुलाया है। लेकिन तुम अंततः उद्धार प्राप्त कर सकते हो या नहीं, इसका सबसे महत्वपूर्ण निर्णायक कारक तुम्हारे अपने अनुसरण में निहित है। भले ही तुम्हारा जमीर आमतौर पर सक्रिय हो, अक्सर तुम्हारे व्यवहार को नियमित करता हो और तुम्हें नियमित करता हो ताकि तुम सही मार्ग चुनो, लेकिन अगर तुम अक्सर अपने जमीर का उल्लंघन करते हो, सही मार्ग नहीं चुनते हो और सत्य का अभ्यास करना नहीं चुनते हो, बल्कि बार-बार अपने व्यक्तिगत स्वार्थों, अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और गौरव का बचाव करते हो और अक्सर अपनी व्यक्तिगत संभावनाओं, महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं पर विचार करते हो तो अंततः उद्धार प्राप्त करने की तुम्हारी उम्मीद बहुत कम होगी—तुम धीरे-धीरे इसे बरबाद कर चुके होगे। यह बहुत दुखद चीज होगी। तुम समझ रहे हो? (हाँ।) तो ठीक है, आज की हमारी संगति के लिए बस इतना ही। अलविदा!

9 मार्च 2024

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें