सत्य का अनुसरण कैसे करें (17) भाग पाँच

आओ, एक और उदाहरण के बारे में बात करते हैं। एक दिन मैं एक खेत पर गया और संयोग से कुछ ऐसा हुआ कि वहाँ लोग नाशपातियाँ तोड़ रहे थे। कोई मेरे लिए कुछ नाशपातियाँ लाया। एक नजर में मैंने देखा कि वे नाशपातियाँ काफी हरी थीं और ज्यादा पकी नहीं थीं, लेकिन मैंने देखा कि नाशपातियाँ तोड़ने वाला व्यक्ति एक चटक पीले रंग की नाशपाती पकड़े हुए था और उसे खा रहा था, और खाते हुए कह रहा था, “कितनी मीठी है, यह नाशपाती बहुत स्वादिष्ट है!” उसने पकी हुई नाशपातियाँ अपने खाने के लिए रख ली थीं और जो उसने मेरे लिए तोड़ीं, वे लगभग सभी कच्ची थीं। इस मामले को अलग रखते हुए कि नाशपातियाँ पकी थीं या नहीं, नाशपातियाँ तोड़ने वाला व्यक्ति मूर्ख नहीं था। वह दिन-रात नाशपाती के उन पेड़ों के पास बिताता था और उसे पता था कि कौन-सी नाशपातियाँ पकी हैं और कौन-सी नहीं। संयोग से मैं वहाँ गया और उसने पेड़ से कच्ची नाशपातियाँ तोड़कर मुझे दे दीं। दरअसल, मुझे कच्चे फल या ठंडी प्रकृति वाले फल खाना पसंद नहीं है और मैं कच्चे फल तो खास तौर से नहीं खा सकता, क्योंकि इससे मेरा पेट खराब हो जाता है। लेकिन उसने मुझे कच्ची नाशपातियाँ दीं, जबकि उसने पकी हुई नाशपाती तोड़कर खाई। इस घटना ने मुझ पर गहरा प्रभाव डाला। मैं जानता था कि वह कच्ची और पकी नाशपाती में अंतर कर सकता था। उसने समझा कि दूसरे लोग मूर्ख हैं और अंतर नहीं कर सकते, और सोचा, “मेरा तुम्हें कच्ची नाशपाती देना ही पर्याप्त है। यहाँ तक कि मैं तुम्हें कई नाशपातियाँ दे रहा हूँ। तुम नहीं जानते कि नाशपातियाँ पकी हैं या नहीं, तुम्हें यह ज्ञान नहीं है! भले ही तुम स्पष्ट और तार्किक रूप से सत्य पर उपदेश दे सकते हो, लेकिन तुम निश्चित रूप से अब भी सोचते हो कि मैं अच्छा हूँ और तुम्हारे लिए इतनी सारी कच्ची नाशपातियाँ तोड़कर मैं तुम्हारे साथ अच्छी तरह पेश आ रहा हूँ।” ऐसा करने वाले व्यक्ति ने सोचा कि दूसरे मूर्ख हैं और खास तौर से मैं मूर्ख हूँ। जब उसने यह मूर्खतापूर्ण चीज की तो क्या उसके दिल में कोई जागरूकता थी? (नहीं।) उसमें कोई जागरूकता नहीं थी। उसने सोचा कि उसने दूसरों को मूर्ख बना दिया है और वह बहुत चतुर है। क्या वह चतुर था? (नहीं।) अगर वह सचमुच चतुर होता, तो वह ऐसी अत्यंत मूर्खतापूर्ण चीज कैसे कर सकता था और फिर भी उसमें कोई जागरूकता नहीं थी? इससे साबित हुआ कि वह चतुर नहीं था, बल्कि तुच्छ मानसिकता वाला था। उसने कच्ची नाशपातियाँ तोड़कर मुझे खाने को दीं, जबकि उसने खुद एक पकी हुई नाशपाती लेकर खाई। क्या यह करतूत हास्यास्पद नहीं लगेगी? मैंने इसे अनदेखा कर दिया, लेकिन उसने जो किया, उसने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी। यह तथ्य कि यह व्यक्ति मेरे साथ ऐसा कर सकता है—क्या इसकी प्रकृति बहुत गंभीर नहीं है? इस मामले में उसके दृष्टिकोण, चीजों को सँभालने के सिद्धांत और तरीके के संदर्भ में, उसकी मानवता कैसी थी? क्या वह जानता था कि उसने जो किया वह गलत था, कि लोगों के साथ ऐसा व्यवहार करना गलत है? (वह यह नहीं जानता था।) वह सोचता था कि वह बहुत चतुर है। “देखो मैं कितना होशियार हूँ, मैंने तुम्हें कच्ची नाशपातियाँ दीं और तुम पहचान भी नहीं पाए! मैंने सारी पकी नाशपातियाँ अपने लिए रख लीं और तुम्हें एक भी पकी नाशपाती खाने को नहीं मिलेगी! अगर तुम दोबारा आए, तो भी मैं तुम्हारे लिए पकी नाशपातियाँ नहीं तोडूँगा, मैं तुम्हें कच्ची नाशपातियाँ ही दूँगा!” सिर्फ नाशपातियाँ तोड़ने की बात ने ही उसे बेनकाब कर दिया। क्या यह इंसान बेकार नहीं है? (है।) वह बेकार है और नहीं जानता कि क्या सही है और क्या गलत। बताओ, यह कैसी मानवता है? मेरी नजर में वह एक जानवर है और उसका सिर्फ रूप-रंग ही मानव का है, जबकि असल में वह मानव कहलाने लायक नहीं है। उसने जो किया और यह जो गलती उसने की, ये बेहद घिनौनी हरकतें थीं, कोई जानवर जो करता उससे जरा भी बेहतर नहीं थीं। लोग हमेशा कहते हैं कि मानव उच्चतर जानवर हैं, लेकिन मेरी नजर में कई लोग जानवरों से भी बदतर हैं! जो उसने किया उससे, उसके क्रियाकलापों के सिद्धांतों से और उन क्रियाकलापों से पेश आने के तरीकों से यह स्पष्ट है कि उसमें कोई मानवता होना तो दूर, वह अपने मालिक के प्रति एक पहरेदार कुत्ते जितना भी वफादार नहीं है। हमारे घर में एक कुत्ता है। एक बार वह सुअर का कान खा रहा था और मैंने उसे यह कहते हुए चिढ़ाया, “तुम्हें सच में मजा आ रहा है, है ना? एक निवाला मुझे क्यों नहीं देता?” उसने सुअर का कान नीचे रखा और मेरी ओर बढ़ा दिया, मानो कह रहा हो, “यह लो।” मांस और हड्डियाँ कुत्ते के लिए सबसे स्वादिष्ट चीजें होती हैं। अगर उसका पिल्ला भी माँगता, तो वह उसे सुअर का कान न देता, लेकिन मैंने कहा कि मैं इसे खाना चाहता हूँ और उसने तुरंत वह मुझे दे दिया। देखो, जब तुम किसी कुत्ते के मालिक होते हो, तो तुम देख सकते हो कि वह क्या चीज है जो कुत्तों को प्यारा बनाती है। तुम उसकी देखभाल करते हो और उसके साथ अच्छी तरह पेश आते हो, और उसके लिए तुम उसका परिवार हो। अगर तुम उससे उसके पास जो सबसे अच्छी चीज है वह माँगो, तो वह तुम्हें दे देगा। वह तुमसे स्नेह करता है। लोग ऐसा करने में असमर्थ हैं—तो वे उच्चतर जानवर कैसे हैं? दानव कहते हैं कि मानव उच्चतर जानवर हैं। यह शुद्ध भ्रांति है, यह विकृत तर्क और अपसिद्धांत है। अगर व्यक्ति में मानवता नहीं है, तो इस शैतानी दुनिया में रहते हुए वह कोई भी दुष्कर्म कर सकता है—वह जितना बुरा हो सकता है उतना बुरा हो सकता है, जितना नीच हो सकता है उतना नीच हो सकता है, जितना कुरूप हो सकता है उतना कुरूप हो सकता है और जितना घृणित हो सकता है उतना घृणित हो सकता है। अगर उसमें जमीर का कार्य नहीं है और वह नहीं जानता कि क्या सही है और क्या गलत, तो वह कोई भी दुष्कर्म कर सकता है और अपने मुँह से कोई भी गलत शब्द, विकृत तर्क और अपसिद्धांत निकाल सकता है। मानव जानवरों से ज्यादा भयावह होते हैं। जानवर वास्तव में भयावह नहीं होते; वे बहुत सरल, बहुत शुद्ध और बहुत सीधे होते हैं। मेरा जो छोटा कुत्ता है, जब वह छोटा था और सूअर का कान खा रहा था, तब वह मुझे देखकर इतना खुश हो गया कि अपना सिर और पूँछ हिलाने लगा। वह मुझे खुश करना जानता था। लेकिन अगर मैं उसे छेड़ता और उससे खाना माँगता तो वह मुझे नहीं देता था और जल्दी से छिप जाता था और खाना खा लेने के बाद ही बाहर आता था। दो-तीन साल का होने के बाद से उसका व्यवहार अलग हो गया है, अब वह समझदार हो गया है। जब मैं उससे उसकी पसंद की कोई चीज माँगता हूँ तो वह मुझे दे देता है। जब वह उसे मुझे देता है तो वह सच्चा होता है, मुझसे कोई माँग नहीं करता या मेरे प्रति कोई गुप्त इरादे नहीं रखता। और जब वह उसे मुझे नहीं देता, तब भी वह सच्चा होता है, मेरे प्रति कोई द्वेष नहीं रखता। चाहे वह मुझे दे या न दे, वह सच्चा होता है। ये उसके जन्मजात गुण और सहज प्रवृत्तियाँ हैं। जानवरों में भ्रष्ट स्वभाव नहीं होते। उनमें ऐसी कोई चीज नहीं होती जो शैतान द्वारा संसाधित की गई हो और उनके सभी प्रकाशन प्राकृतिक और बहुत सीधे और सरल होते हैं। तुम्हें उनके इरादों का अंदाजा लगाने की जरूरत नहीं होती और तुम्हें उनसे सावधान रहने की भी जरूरत नहीं होती। अगर कोई जानवर तुम्हें कुछ देता है तो वह तुम्हें दे रहा है और अगर नहीं देता तो नहीं दे रहा। अगर वह खुश है तो खुश है और अगर नहीं है तो नहीं है। वह अपनी भावनाओं से नियंत्रित नहीं होगा और तुम्हारे प्रति बुरे इरादे नहीं रखेगा। लोगों की बात अलग है। लोग भयावह होते हैं। अगर वे इंसानी खाल पहने हुए भी जमीर या विवेक नहीं रखते, तो उनका जानवरों से बेहतर होना बिल्कुल असंभव है, बल्कि जितना बुरा हो सकता है, वे उतने बुरे हो सकते हैं। वे कितने बुरे हो सकते हैं? इतने बुरे कि तुम्हें लगेगा कि तुमने कोई जिंदा राक्षस देख लिया है जिससे तुम महसूस करोगे कि यह अकल्पनीय है, वह तुम्हारे जमीर को झकझोर देगा, तुम्हारे दिल की गहराइयों पर चोट करेगा और उसे पीड़ा पहुँचाएगा। जब मैं ये चीजें महसूस करता हूँ तो मैं मन ही मन आह भरता हूँ और सोचता हूँ, “क्या यह ऐसी चीज है जो मानव को करनी चाहिए? लोग इतने बुरे कैसे हो सकते हैं? वह परमेश्वर में विश्वास करता है, फिर भी वह ये चीजें कैसे कर सकता है?” एक बार जब कोई व्यक्ति अपना जमीर और विवेक खो देता है, तो वह जितना बुरा हो सकता है उतना बुरा हो सकता है। वह सिर्फ उतना ही बुरा नहीं हो सकता है जितना वह अभी है, बल्कि वह और भी बदतर हो सकता है और उसका पतन जारी रह सकता है। लोगों का यह नहीं जानना कि क्या सही है और क्या गलत, मानवजाति के पतन की शुरुआत है, मानवजाति की गिरावट की शुरुआत है।

अगर व्यक्ति नहीं जानता कि क्या सही है और क्या गलत, तो उसमें जमीर या विवेक नहीं होता है और इस तरह उसमें कोई मानवता नहीं होती, और संभव है कि वह राक्षसी प्रकृति का हो। चाहे वह बाद में कुछ भी प्रकट करे या अपने जीवनकाल में कुछ भी जिए, संक्षेप में, उसे छुटकारा नहीं मिलेगा, उसे कभी छुटकारा नहीं मिलेगा। अगर किसी व्यक्ति में जमीर नहीं है और न ही विवेक है—सटीक रूप से कहें तो, अगर उसमें मानवता नहीं है—तो वह सुधर नहीं सकता और उसे छुटकारा नहीं मिल सकता। वास्तव में ऐसा ही है। अगर वह यह भी नहीं जानता कि क्या सही है और क्या गलत, तो वह जमीर और विवेक के अनुरूप कोई काम कैसे कर सकता है? ऐसा कहना बेतुका होगा। कुछ लोग ईर्ष्या और झगड़ा करने की ओर प्रवृत्त होते हैं। अगर वे दूसरे लोगों के साथ झगड़ा करते हैं तो तुम सोच सकते हो कि इसकी प्रकृति बहुत गंभीर नहीं है, लेकिन कुछ लोग मेरे साथ झगड़ा करते हैं। तो फिर ये “परमेश्वर में विश्वास करने वाले” वास्तव में किसमें विश्वास करते हैं? यह तथ्य कि वे मेरे साथ झगड़ा कर सकते हैं, इस समस्या को गंभीर बनाता है। जब मैं कुछ लोगों की कोई समस्या बताता हूँ तो वे इसे कभी नहीं भूलते और बाद में चिंतन करते हैं कि मेरे खिलाफ इस्तेमाल की जा सकने वाली कोई चीज ढूँढ़कर बदला लेने का कौन-सा तरीका वे इस्तेमाल कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, मैंने एक बार ऐसे ही एक व्यक्ति से कहा, “तुम हमेशा इतना ज्यादा खाना बनाते हो, बस जितना चाहिए उतना ही क्यों नहीं बनाते?” इस पर उसने सोचा, “तुम कहते हो कि खाना कितनी मात्रा में बनाना चाहिए, मुझे इसका सही अंदाजा नहीं है। क्या इसका मतलब यह नहीं है कि मैं कुशाग्रबुद्धि नहीं हूँ, यानी मैं किसी काम का नहीं हूँ? तो फिर तुम ही एक बार खाना बनाकर दिखाओ!” जब मैंने खाना बनाया और थोड़ा-सा बच भी गया, तो उसने मुँह से तो कुछ नहीं कहा, लेकिन मन ही मन सोचा, “तुम भी बिल्कुल सही मात्रा में खाना नहीं बना सकते, है ना? मुझे तुमसे बदला लेने का मौका मिल गया है। तुमने मेरी समस्या उजागर की, तो मैं भी तुम्हें उजागर कर दूँगा!” वह हमेशा मुझे निशाना बनाने के तरीके ढूँढ़ने की कोशिश करता रहता था। कुछ लोग कहते हैं, “क्या ऐसा है कि तुम उन लोगों से द्वेष रखते हो जो तुम्हें निशाना बनाते हैं? तो दूसरों को निशाना बनाया जाना ठीक है, लेकिन तुम्हें नहीं?” क्या उनका यह कहना सही है? (नहीं।) एक अन्य अवसर पर मैंने किसी से मेज साफ करने के लिए कहा और वह बोला, “इसे मैंने गंदा नहीं किया!” मैंने कहा, “भले ही तुमने इसे गंदा नहीं किया, फिर भी तुम इसे साफ तो कर सकते हो।” वह बोला, “भले ही मैं इसे साफ कर दूँ, फिर भी मुझे यह स्पष्ट करना होगा कि मैंने इसे गंदा नहीं किया।” मैंने उससे अलमारी में रखी चीजें व्यवस्थित करने के लिए कहा और वह बोला, “उसमें रखी चीजें मैंने नहीं खरीदीं!” मैंने कहा, “तुमने उन्हें नहीं खरीदा, लेकिन क्या तुम उन्हें व्यवस्थित नहीं कर सकते? ऐसा क्यों है कि जब मैं कुछ कहता हूँ, तो तुम उसे इतनी कम तवज्जो देते हो? तुम्हें बस यह पता लगाना है कि उन्हें किसने खरीदा था, तभी तुम उन्हें व्यवस्थित कर सकते हो?” क्या वह जानता था कि वह जो कह रहा है वह सही है या गलत? वह विकृत तर्क व्यक्त कर रहा था, है ना? (हाँ।) मैंने कहा कि वह विकृत तर्क व्यक्त कर रहा है, लेकिन वह दिल में आश्वस्त नहीं हुआ, और उसने सोचा कि मेरे विशेष दर्जे का मतलब है कि दूसरों को मेरी कही हर बात माननी पड़ेगी, मानो मैं रौब झाड़ रहा हूँ। क्या उसकी सोच सही थी? (नहीं।) बाद में मैंने देखा कि उसने सत्य बिल्कुल स्वीकार नहीं किया था और मैं चाहे कुछ भी कहता, वह उसे अपने दिल में स्वीकार नहीं करता, इसलिए फिर उससे बात करने में मैंने अपनी ऊर्जा और समय बर्बाद नहीं किया—वह जो चाहे करे, और मैं उसे माफ कर देता और सहन कर लेता। हालाँकि मेरी यह पहचान और दर्जा है, फिर भी बहुत-से लोग हैं जो मेरी बात नहीं सुनते और मेरा विरोध करते हैं। मैंने व्यक्तिगत रूप से कई भाई-बहनों को देखा है जो मेरे प्रति अशिष्ट हैं। ऐसे बहुत-से लोग हैं जो मेरे प्रति अवज्ञाकारी हैं और मुझसे नाराज हैं, ऐसे बहुत-से लोग हैं जो मुझसे ईर्ष्या करते हैं और अपने दिलों में मुझसे नफरत करते हैं, ऐसे बहुत-से लोग हैं जो मुझे नीची नजर से देखते हैं और मुझे तुच्छ समझते हैं, ऐसे बहुत-से लोग हैं जो मेरे पीठ पीछे मेरी आलोचना करते हैं और ऐसे बहुत-से लोग हैं जो खुलेआम मेरा उपहास करते हैं और मजाक उड़ाते हैं। मैंने उनके साथ कैसा व्यवहार किया है? अपने लगभग तीस साल के कार्य में मैंने एक भी व्यक्ति से प्रतिशोध नहीं लिया है। मैंने किसी से नफरत नहीं की है, न ही मैंने अपना दर्जा ग्रहण करने के बाद उन्हें इसलिए सताया है क्योंकि जब मेरी पहचान खुले तौर पर प्रकट नहीं हुई थी तब वे मेरे प्रति अशिष्ट थे। मैंने एक बार भी ऐसा कुछ नहीं किया है। इसके अलावा, इन लोगों ने मेरे साथ कुछ अभद्र या आहत करने वाली चीजें की हैं और मैंने उन्हें कभी जवाबदेह नहीं ठहराया। लेकिन, मुझे ऐसी समस्याओं को सत्य से जोड़कर उन पर संगति अवश्य करनी है ताकि हर व्यक्ति को भेद पहचानने की क्षमता हासिल करने में मदद मिल सके—यह हर व्यक्ति के लिए लाभदायक है। लेकिन बहुत-से लोगों में इन लोगों द्वारा की गई चीजों का भेद पहचानने की क्षमता नहीं है। वे ऐसी चीजों को गंभीरता से नहीं लेते, मानो वे जिक्र करने लायक ही न हों। क्या यह एक समस्या नहीं है? इसलिए, ऐसे मामलों पर संगति करना बेहद जरूरी है ताकि सभी को भेद पहचानने की क्षमता हासिल करने में मदद मिल सके। चूँकि तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, इसलिए मैं तुम्हें एक विश्वासी समझता हूँ। मैं तुम्हारे द्वारा किए जा रहे कर्तव्य के आधार पर तुमसे अपेक्षाएँ करता हूँ, तो क्या तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए? क्या तुम्हें समर्पण नहीं करना चाहिए? (हाँ।) मेरी यह पहचान है और मैं इस पहचान और दर्जे के साथ तुमसे अपेक्षाएँ कर रहा हूँ, इसलिए मैं जो कहता हूँ तुम्हें उसे एक सृजित प्राणी के रवैये से लेना चाहिए। तुम अपना कर्तव्य निभा रहे हो; तुम्हें कोई और टिप्पणी नहीं करनी चाहिए, तुम्हें विकृत तर्क नहीं बोलना चाहिए और तुम्हें मेरा विरोध नहीं करना चाहिए। यह मानवता की न्यूनतम तार्किकता और अभिव्यक्ति है जो एक सृजित प्राणी के रूप में तुममें होनी चाहिए। लेकिन इस व्यक्ति में न सिर्फ ऐसा रवैया नहीं था, बल्कि उसने विकृत तर्क भी इस्तेमाल किया। क्या वह जानता था कि क्या सही है और क्या गलत? वह नहीं जानता था। जो लोग नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत, वे मानवता से रहित होते हैं, है ना? (हाँ।) यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उनमें कोई मानवता नहीं है। अगर कोई साधारण व्यक्ति तुमसे मेज साफ करने और अलमारी व्यवस्थित करने के लिए कहता है और तुम ऐसा नहीं करना चाहते या तुम्हें लगता है कि दूसरा व्यक्ति एक साधारण व्यक्ति है और उसे तुमसे ऐसा करने के लिए कहने का कोई अधिकार नहीं है, तो तुम ऐसा नहीं करना चुन सकते हो। लेकिन तुमने जो दो चीजें कहीं, “इसे मैंने गंदा नहीं किया!” और “अलमारी में रखी चीजें मैंने नहीं खरीदीं!”—क्या कोई जमीर और विवेक वाला व्यक्ति यही कहेगा? क्या यह हद से ज्यादा अनुचित नहीं है? (हाँ।) जब कोई साधारण व्यक्ति तुमसे इस तरह बात करता है, तो तुम अवज्ञाकारी व्यवहार करते हो, लेकिन अब मैं तुमसे बात कर रहा हूँ और तुम अभी भी मेरे सामने विकृत तर्क का इस्तेमाल करने और सत्याभासी तर्क से अपना बचाव करने का साहस कर रहे हो। तुम इस तरह विकृत तर्क का इस्तेमाल कर सकते हो, यह तुम्हारे चरित्र के बारे में क्या कहता है? तुमने कहा, “इसे मैंने गंदा नहीं किया,” जिसका अर्थ है, “जिसने भी इसे गंदा किया है, उसे ही इसे साफ करना चाहिए; कुछ भी हो, मैं इसे साफ नहीं करूँगा!” तुमने वह काम करने से इनकार कर दिया जो तुम्हें करना चाहिए था और यहाँ तक कि तुमने विकृत तर्क का भी इस्तेमाल किया। क्या सामान्य मानवता वाले व्यक्ति को चीजें इसी तरह से सँभालनी चाहिए? अगर यह वह काम है जो तुम्हें करना चाहिए, तो क्या तुम्हें नहीं चाहिए कि तुम ऐसा न कहो? तुम ऐसा कहने में समर्थ हो, क्या इसका मतलब यह नहीं है कि तुम नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत? मना करने और यह काम न करने के लिए तुमने यह कहते हुए अपना निजी गुस्सा भी निकाला कि तुमने इसे गंदा नहीं किया, न ही तुमने चीजें खरीदीं, इसलिए तुम उसे साफ नहीं करोगे। ऐसा करने से बचने के लिए तुम बहाने बनाने लगे और विकृत तर्क का इस्तेमाल करने लगे। क्या तुम्हारा तर्क बहुत विकृत नहीं है? तुम ऐसा विकृत तर्क अपने मुँह से निकाल सके, और तुमने ऐसा निर्लज्ज आत्म-निश्चितता से, यहाँ तक कि दबंगई से भी किया। ऐसा व्यक्ति नहीं जानता कि क्या सही है और क्या गलत, है ना? उसमें मानवता नहीं होती, है ना? (हाँ।) ऐसा नहीं है कि मेरी यह पहचान और दर्जा है और तुमने मुझे निशाना बनाया, इसलिए मैंने तुम्हारा इस तरह चरित्र-चित्रण किया है। अगर किसी और ने तुमसे ऐसा करने के लिए कहा होता और तुमने मना कर दिया होता और बहस करने की कोशिश की होती तो भी, एक दर्शक के रूप में, मैं तब भी इसी तरह से तुम्हारा मूल्यांकन करता, क्योंकि तुमने जो कहा वह मानवता के अनुरूप नहीं है, वह गलत है, वह विकृत तर्क है, वह अपसिद्धांत और भ्रांति है। तुमने नहीं सोचा कि यह गलत है, यहाँ तक कि तुमने उसे ठोस तर्क माना; यह ये दिखाने के लिए पर्याप्त है कि तुम्हारी मानवता के अंदर क्या है। तुम उस समय इसे रोक नहीं सके और बोल पड़े। यह एक प्राकृतिक प्रकाशन है और प्राकृतिक प्रकाशन व्यक्ति की मानवता और सार दर्शाता है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह व्यक्ति का सार दर्शाता है? तुम्हारा ऐसे विचार और दृष्टिकोण रखना कोई अस्थायी चीज नहीं है और वे मेरे द्वारा कही गई किसी चीज से उत्प्रेरित नहीं हुए थे; बल्कि ये वे विचार और दृष्टिकोण हैं जिन्हें तुम लंबे समय से, कई दिनों और महीनों से सोचते आ रहे हो—इसके अलावा, चूँकि कुछ चीजें तुम्हें पसंद नहीं आईं, इसलिए तुमने धारणाएँ विकसित कर लीं, तुम्हारा दिल असंतोष और अवज्ञा से भर गया। एक पल के लिए तुम्हारा नियंत्रण छूट गया और तुम्हारे दिल में जो था वह उजागर हो गया। क्या उजागर हुआ? यही कि तुममें जमीर और विवेक नहीं है और तुम्हारी मानवता बहुत बुरी, बहुत भयावह है। अगर तुम उपर्युक्त व्यक्ति से सत्य स्वीकारने के लिए कहते, तो वह ऐसा न कर सकता। अगर तुम उससे उसके भ्रष्ट स्वभाव जानने के लिए कहते, तो उसके लिए यह और भी कम संभव होता। जिस व्यक्ति में मानवता नहीं होती, वह जानवर के समान स्तर का होता है। ऐसा नहीं है कि उसने अनजाने में मेरे साथ कुछ गलत किया या मुझसे कुछ भ्रांतिपूर्ण कहा, इसलिए मैंने उसका इस तरह चरित्र-चित्रण किया है; मैंने ऐसा इसलिए किया है क्योंकि उसने जो किया, उसकी प्रकृति ऐसी ही है। उसका इस तरह चरित्र-चित्रण करना अनुचित या अन्यायपूर्ण नहीं है। अगर उसने इन शब्दों से किसी और को निशाना बनाया होता, तो भी अगर मैं देखता, तो उसे इसी तरह आँकता। यह एक वस्तुनिष्ठ, निष्पक्ष कथन है। वह ऐसी बेतुकी चीजें कह सका, ऐसा हास्यास्पद तर्क बोल सका, और उसका ऐसा करना एक प्राकृतिक प्रकाशन था। मुझे बताओ, क्या यह उसके प्रकृति सार का उजागर होना नहीं है? क्या यह उसकी सच्ची मानवता का उजागर होना नहीं है? इसने उसे बेनकाब कर दिया है। इसने क्या प्रकट किया है? इसने प्रकट किया है कि उसमें कोई मानवता नहीं है। मानवता से रहित लोग नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत, और वे किसी भी विकृत तर्क और अपसिद्धांत का सहारा ले सकते हैं, ये चीजें इतने निर्लज्ज आत्मविश्वास के साथ कह सकते हैं। बोलने के बाद वे कभी नहीं जानते कि उनके शब्द गलत हैं और वे कभी स्वीकार नहीं करते कि उनके शब्दों में क्या गलत था। वे कभी आत्म-चिंतन नहीं करते या काट-छाँट स्वीकार नहीं करते, और अंत में, वे क्या कहते हैं? “मैंने यह जानबूझकर नहीं कहा। क्या यह बस ऐसा नहीं था कि क्रोध के क्षण में यह बात मेरे मुँह से निकल गई?” क्या यह जानबूझकर कहा जाना जरूरी भी है? तुम पहले ही इसे प्राकृतिक रूप से प्रकट कर चुके हो और तुम्हारी मानवता कैसी है यह पहले ही उजागर हो चुका है। यह तथ्य कि तुम बिना सोचे-विचारे इसे कह सकते हो, यह साबित करता है कि ये शब्द तुम्हारे दिल में लंबे समय से घर किए हुए हैं और जब तुम इस तरह के परिवेश का सामना करते हो, तब ये प्राकृतिक रूप से प्रकट हो जाते हैं। यह तुम्हारे चरित्र को पूरी तरह से दर्शा सकता है। अगर तुमने इसे कहने से पहले इसके बारे में सोचा होता, तो जरूरी नहीं कि यह सच हो और यह एक दिखावा भी हो सकता है, जबकि यह तुम्हारे चरित्र को और ज्यादा उजागर करता है। जिन लोगों में मानवता नहीं होती, वे नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत और वे सही और गलत को उलट-पुलट भी देते हैं और विकृत तर्क को इस तरह व्यक्त करते हैं मानो वह ठोस तर्क हो। चाहे तुम उनके सामने तथ्य और तर्क कैसे भी पेश करो, वे स्वीकार ही नहीं करेंगे कि उन्होंने कोई गलती की है। “मैं गलत कैसे हो सकता हूँ? तुम लोग ही गलत हो! तुम लोग मुझे तुच्छ समझते हो, तुम देखते हो कि मैं दब्बू हूँ, मुझमें कोई गुण नहीं है और समाज में मेरा कोई प्रभाव या रुतबा नहीं है, और तुम मुझे धौंस देते हो!” वे ढेरों विकृत तर्क और अपसिद्धांत उगलते हैं, लेकिन कभी अपने द्वारा की गई गलत चीजों और अपने द्वारा बोले गए विकृत तर्क की प्रकृति नहीं बताते। चाहे वे कितनी भी गलत चीजें करें, वे उन्हें स्वीकार नहीं करते। क्या सामान्य मानवता वाले व्यक्ति में इस तरह की अभिव्यक्ति होगी? हमें उन लोगों का जिक्र तक करने की जरूरत नहीं है जिनका जमीर और विवेक बहुत मजबूत होता है—थोड़े-से भी जमीर और विवेक वाला व्यक्ति निश्चित रूप से यह समझेगा कि लोग अपने जीवनकाल में कई गलतियाँ करते हैं। खास तौर पर, कुछ लोग कुछ ऐसी चीजें कह या कर देते हैं जो उन्हें कहनी या करनी नहीं चाहिए और फिर जीवन भर पछताते रहते हैं और व्यथित महसूस करते हैं, अपने जमीर में अपने आप को दोष देते हैं और आत्म-ग्लानि महसूस करते हैं। जैसे-जैसे वे अधिक संवेदनशीलता और परिपक्वता की उम्र की ओर बढ़ते हैं, वे यह अधिकाधिक जानने लगते हैं कि कौन-से शब्द कहने चाहिए और कौन-सी चीजें करनी चाहिए, और कौन-से शब्द नहीं कहने चाहिए और कौन-सी चीजें नहीं करनी चाहिए। उनका जमीर और विवेक उनके व्यवहार और विचारों को निरंतर नियमित करते रहेंगे। विशेषकर अगर कोई व्यक्ति सत्य स्वीकार सकता है तो उसके द्वारा कुछ सत्य स्वीकारने के बाद उसका जमीर और विवेक सकारात्मक दिशा में विकसित होंगे और उसके द्वारा कभी कहे गए गलत शब्द, उसके द्वारा कभी व्यक्त किए गए भ्रामक दृष्टिकोण और उसके द्वारा कभी की गई गलत चीजें धीरे-धीरे उसके मन में आती रहेंगी। वह निरंतर उन पर चिंतन, सोच-विचार और मनन करेगा और फिर परमेश्वर के वचन खोजेगा और परमेश्वर के वचनों से अपनी तुलना करेगा और उसे उत्तरोत्तर यह महसूस होगा कि वह बस एक साधारण व्यक्ति है, उसने कई गलतियाँ की हैं और कई गलत शब्द कहे हैं, वह कई भ्रामक विचार और दृष्टिकोण रखता है और उसने अतीत में कई मूर्खतापूर्ण, अज्ञानतापूर्ण और बेवकूफी भरी चीजें और ऐसी चीजें की हैं जो लोगों को घृणित लगती हैं। परमेश्वर के वचनों और सत्य के स्तर से देखे बिना और सिर्फ उस समझ से देखते हुए जो व्यक्ति ने कई वर्षों के अनुभव से प्राप्त की है, वह अपनी मानवता में इन समस्याओं, इन गलतियों और अपराधों से लगातार सीख ले सकता है। यह सामान्य है और ये वे अनुभव और लाभ हैं जो मानवता वाले ऐसे व्यक्ति में, जो यह जानता है कि क्या सही है और क्या गलत, एक निश्चित आयु तक पहुँचने और कुछ सत्य स्वीकारने के बाद अंततः होने चाहिए। लेकिन जो लोग नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत, अगर वे साठ-सत्तर साल तक भी जीवित रहें, तो भी ऐसे ही मूर्ख, अज्ञानी और जिद्दी रहते हैं और वे नहीं बदलेंगे। अगर तुम ऐसे लोगों से बदलने की उम्मीद करते हो, तो तुम आकाश-कुसुम देखने की उम्मीद भी करते होगे। ऐसा कभी नहीं होगा। ऐसे लोग कभी नहीं बदलेंगे, क्योंकि वे यह तक नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत। अगर तुम किसी ऐसे व्यक्ति से, जो नहीं जानता कि क्या सही है और क्या गलत, सत्य स्वीकारने के लिए कहो, तो यह उसके लिए चीजें मुश्किल करना हो जाएगा, क्योंकि यह उसके वश से एकदम परे है, और वह नहीं जानता कि सत्य क्या है। उसके लिए सत्य स्वीकारना असंभव है। यह किसी वर्णांध व्यक्ति से चित्र बनाने के लिए कहने जैसा होगा। क्या वह सामान्य रंगों से चित्र बना पाएगा? (नहीं।) अगर तुम किसी तान-बधिर व्यक्ति से गाने के लिए कहो, तो वह हमेशा सुर से बाहर ही रहेगा। चाहे वह कैसे भी गाए, वह सुर में नहीं गा सकता, फिर भी उसे लगता है कि उसका गायन सुर में है और दूसरे सुर से बाहर हैं। उसके माप का मानक सही नहीं है, इसलिए वह कभी नहीं जान पाएगा कि क्या सही है और क्या गलत। क्या अब तुम समझते हो? (हाँ।)

यह विषयवस्तु, जिस पर संगति की गई है, लोगों को क्या तथ्य बताती है? यह उन्हें बताती है कि मानवता से रहित लोगों में जमीर और विवेक जैसी मूलभूत पूर्वापेक्षा नहीं होती, इसलिए उनके पास अपनी मानवता मापने और नियमित करने का कोई बुनियादी मानक नहीं होता। नतीजतन, उनकी अभिव्यक्तियाँ उन लोगों को बहुत अजीब लगती हैं जिनमें जमीर और विवेक होता है। वे हमेशा विकृत तर्क और अपसिद्धांत व्यक्त करते रहते हैं और निराधार विचार व्यक्त करते रहते हैं। तुम समझ नहीं पाते कि आखिर हो क्या रहा है। अब तुम्हें उत्तर मिल गया है, है ना? (हाँ।) अगर ऐसा व्यक्ति उस बिंदु तक पहुँच जाता है जहाँ उसके साथ निभाना असंभव हो जाता है, तो फिर तुम्हें उसके साथ नहीं जुड़ना चाहिए। अगर वह अभी इस बिंदु तक नहीं पहुँचा है और तुम अभी भी उसके साथ ठीक-ठाक निभा सकते हो, तो उससे जितना कम हो सके, बोलने और बातचीत करने का प्रयास करो, ताकि तुम झुँझलाहट से बच सको। अभी तमाम कार्यक्षेत्रों में काम का भारी बोझ है और कई कार्य ऐसे हैं जिनमें ऊर्जा की जरूरत होती है। कुछ लोगों को लगता है कि वे बहुत व्यस्त हैं और उनके पास इन अपसिद्धांतों और भ्रांतियों पर ध्यान देने का समय नहीं है। यह दृष्टिकोण भी गलत है, क्योंकि यह भेद पहचानने की क्षमता की प्राप्ति में सहायक नहीं है। जब तुम कोई अपसिद्धांत या भ्रांति सुनते हो और महसूस करते हो कि उसमें कुछ गड़बड़ है, तो तुम्हें उसे नोट कर लेना चाहिए। उसके बाद सत्य खोजो ताकि तुम उसका भेद स्पष्ट रूप से पहचान सको और जान सको कि इस भ्रांति में क्या गलत है। अगर तुम इस प्रकार प्रशिक्षण और अभ्यास करते हो, तो तुम्हें भेद पहचानना आ जाएगा। लेकिन ऐसे व्यक्ति के दृष्टिकोण सही करने के लिए उसके साथ सत्य पर संगति करने की कोई जरूरत नहीं, क्योंकि वह इसे समझ ही नहीं सकता। यह उस व्यक्ति के समान है जो पेड़ से अंडा गिरता हुआ देखता है और फिर कहता है कि अंडे पेड़ों पर उगते हैं। असल में पेड़ पर एक मुर्गी बैठी अंडा दे रही थी। उसने मुर्गी को नहीं, सिर्फ अंडे को गिरते हुए देखा, इसलिए वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा। तुम उससे चाहे जो भी कहो, वह समझ नहीं पाता और जिद करता है कि अंडे पेड़ों पर उगते हैं। क्या यह मूर्खतापूर्ण नहीं है? (हाँ।) क्या तुम ऐसे व्यक्ति को समझा सकते हो? (नहीं।) अगर तुम उसे नहीं समझा सकते, तो फिर कुछ मत कहो। अपना समय बर्बाद मत करो। इन वर्षों में मैंने बहुत-से बेतुके लोग देखे हैं। इनमें से ज्यादातर लोग काफी उत्साही होते हैं; वे कुछ कर्तव्य निभा सकते हैं और बहुत ज्यादा विश्वासघाती या बुरे नहीं होते। इसलिए मैं उनसे यूँ ही कुछ कह देता हूँ और परिणाम क्या होता है? अगर मैं सत्य के कुछ शब्द कहता हूँ तो वे उनकी समझ से परे होते हैं। अगर मैं बाहरी मामलों के बारे में बात करता हूँ, तो वे सुनना बर्दाश्त नहीं कर सकते। इसलिए मैं अब इन लोगों से कुछ नहीं कहना चाहता, क्योंकि इनसे बात करना बहुत थका देने वाला है और मेरे पास करने को बहुत काम है, चर्चा करने के लिए बहुत सारे उपयुक्त विषय हैं। मैं तमाम उपयुक्त विषयों को पूरा भी नहीं कर पाता, फिर मुझमें इन लोगों पर ध्यान देने लायक अतिरिक्त मानसिक ऊर्जा कैसे हो सकती है? अब जबकि सत्य पर इस हद तक संगति हो चुकी है, तो बहुत-सी चीजें स्पष्ट हो गई हैं, असली तथ्य सामने आ गए हैं और विभिन्न प्रकार के लोगों की सचमुच उनकी किस्म के अनुसार छँटाई की जाएगी। जहाँ तक ऐसे बेतुके व्यक्ति का संबंध है, उसे बस छाँट दिया जाए और बस इतना ही काफी है। हमारे पास उससे बहस करने या उसके भ्रामक दृष्टिकोण सही करने का समय नहीं है, है ना? (हाँ।) तो चलो, आज के लिए अपनी संगति यहीं समाप्त करते हैं। अलविदा!

16 मार्च 2024

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