सत्य का अनुसरण कैसे करें (18) भाग एक
उत्पत्तियों के आधार पर लोगों की तीन श्रेणियाँ
मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशेषताएँ
II. उचित-अनुचित का भेद पहचानना और यह जानना कि क्या सही है और क्या गलत
हाल ही में हमारी संगति की विषयवस्तु काफी खास रही है। इसमें लोगों की उत्पत्तियाँ, उनके सार और उनकी श्रेणियाँ शामिल रही हैं। हमने तीन तरह के लोगों की अभिव्यक्तियों पर चर्चा की है, जिनमें से हर एक की श्रेणी अलग है—जानवरों से पुनर्जन्म लेना, दानवों से पुनर्जन्म लेना और मानवों से पुनर्जन्म लेना। ज्यादातर लोगों के मामले में, इसका उनकी मनोदशा पर कुछ असर पड़ा है। इस पहलू को लेकर संगति सुनने के बाद तुममें से ज्यादातर लोग कैसा महसूस करते हैं? क्या तुममें से कोई ऐसा है जो इस विषयवस्तु को सुनने का अनिच्छुक है और कहता है, “ये मामले सत्य से जुड़े हुए नहीं लगते। क्या इन चीजों को जानने का कोई फायदा है?” जब नए विश्वासी ये शब्द सुनते हैं, तो क्या उनकी धारणाएँ विकसित करने की संभावना है? क्या उनके नकारात्मक और कमजोर होने की संभावना है? ये शब्द सुनने के बाद लोग चाहे कैसा भी महसूस करें—चाहे वे धारणाएँ विकसित कर लें या नकारात्मक और कमजोर हो जाएँ—हर हाल में इन शब्दों पर संगति करना लोगों के लिए फायदेमंद है। कम से कम यह लोगों को कुछ अंतर्दृष्टि और भेद पहचानने की क्षमता हासिल करने, आचरण करने के सही विचार और दृष्टिकोण समझने और आचरण करने के बुनियादी सिद्धांत समझने में समर्थ बनाता है। यह लोगों को इस संदर्भ में बहुत फायदा पहुँचाता है कि आचरण कैसे करें और कैसे जिएँ। खासकर, यह लोगों को यह जानने में मदद करता है कि सिद्धांतों के अनुसार दूसरों के साथ कैसे पेश आएँ। इस तरह, वे कई बेवकूफी भरी चीजें करने से बच पाएँगे और भटकाव में कम पड़ेंगे। हाल ही में हमारी संगति की विषयवस्तु में लोगों की उत्पत्ति और उनके अंदरूनी सार शामिल थे और हमने उनका समापन उन लोगों के लक्षणों के बारे में बात करके किया, जो सच्चे मानवों से पुनर्जन्म लेते हैं। सच्चे मानवों से पुनर्जन्म लेने वालों में मुख्य रूप से दो विशेषताएँ होती हैं। वे क्या हैं? (उचित-अनुचित का भेद पहचानना और यह जानना कि क्या सही है और क्या गलत।) ये दो मुख्य अभिव्यक्तियाँ और विशेषताएँ हैं जो व्यक्ति की मानवता में होनी चाहिए। मोटे तौर पर कहें तो इन्हें ही हम अक्सर जमीर और विवेक कहते हैं। हालाँकि लोग अक्सर यह भेद पहचानना नहीं जानते कि व्यक्ति में जमीर और विवेक है या नहीं, या व्यक्ति में सच में इन दोनों में से कोई एक है या नहीं, क्या उनका जमीर और विवेक सामान्य है या क्या यह वही जमीर और विवेक है जो सामान्य मानवता में होता है। जब लोग सामान्य मानवता के बारे में ये तथ्य नहीं समझते तो जमीर और विवेक के बारे में उनके विचार या उनकी समझ बहुत आम होती है, इसलिए हमने यह समझाने के लिए कि मानवीय जमीर और विवेक क्या है और यह पुष्टि करने के लिए कि व्यक्ति में मानवता है या नहीं, विशिष्ट अभिव्यक्तियों के दो पहलुओं का इस्तेमाल किया। पहला है उचित-अनुचित का भेद पहचानना और दूसरा है यह जानना कि क्या सही है और क्या गलत। हमने पहले भी इन दोनों पहलुओं पर दो बार संगति की। उचित-अनुचित का भेद पहचानना और यह जानना कि क्या सही है और क्या गलत, ये मानवता के गुण हैं, मानवता के जिए हुए पहलू हैं और मानवता के वे विशिष्ट प्रकाशन और अभिव्यक्तियाँ हैं जो मानवों में होती हैं। इन दो पहलुओं—उचित-अनुचित का भेद पहचानना और यह जानना कि क्या सही है और क्या गलत—के लिए मैंने तदनुसार कुछ वास्तविक उदाहरण सूचीबद्ध किए और इन दो पहलुओं के अंदर लोगों की कुछ विशिष्ट अभिव्यक्तियों पर चर्चा की और तुमसे यह भेद पहचानने के लिए कहा कि वे मानवता होने की अभिव्यक्तियाँ हैं या नहीं और जिनमें वे हैं, वे ऐसे लोग हैं या नहीं जो उचित-अनुचित का भेद पहचान सकते हैं और यह जानते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। उचित-अनुचित का भेद पहचानने के बारे में हमने कुछ मामलों पर संगति की ताकि यह गहन-विश्लेषण कर सकें कि लोग सकारात्मक और नकारात्मक चीजों को कैसे लेते हैं और हमने इस पर भी संगति की कि नकारात्मक चीजों और मानवेतर अभिव्यक्तियों का भेद कैसे पहचानें। हालाँकि मैंने तुम्हें यह बताने के लिए और ज्यादा विशिष्ट उदाहरण नहीं दिए कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं, फिर भी लोगों के दैनिक जीवन में सकारात्मक चीजों के प्रति उनकी कुछ अभिव्यक्तियों का गहन-विश्लेषण और उन्हें उजागर करके मैंने दिखाया कि व्यक्ति को सकारात्मक चीजों के साथ कैसे पेश आना चाहिए और उनके प्रति क्या रवैया रखना चाहिए। मैंने नकारात्मक चीजों के प्रति लोगों के रवैयों और अभिव्यक्तियों को उजागर करने के लिए भी कुछ उदाहरण दिए, ताकि तुम यह भेद पहचानना सीख सको कि इन नकारात्मक चरित्रों के रवैयों और अभिव्यक्तियों की प्रकृति क्या है, उनकी मानवता सच्ची मानवता है या नहीं और उनकी मानवता का सार क्या है। अपनी पिछली दो संगतियों में हमने विशिष्ट रूप से यह नहीं बताया कि सकारात्मक और नकारात्मक चीजें क्या हैं, लेकिन उजागर किए गए तथ्यों से आँकते हुए, क्या अब तुम्हें सकारात्मक और नकारात्मक चीजों को परिभाषित करने में समर्थ नहीं होना चाहिए? संगति सुनने के बाद क्या तुम लोगों ने यह पता लगाने की कोशिश की है कि सकारात्मक और नकारात्मक चीजें असल में क्या हैं? संगति की इस विशिष्ट विषयवस्तु को सुनने के बाद अगर तुम्हारे दिल में एक परिभाषा है और तुम यह जानते हो कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं और इस बारे में सत्य समझते हो, तो तुम जान जाओगे कि सकारात्मक और नकारात्मक चीजों का भेद कैसे पहचानना है और उनके साथ कैसे पेश आना है, है ना? (हाँ।)
ग. सकारात्मक चीजों और नकारात्मक चीजों का भेद कैसे पहचानें
सकारात्मक चीजों की परिभाषा
सकारात्मक चीजें क्या हैं? क्या यह ऐसा मुद्दा नहीं है जिसे समझना चाहिए? शायद तुम लोग सकारात्मक चीजों के कुछ उदाहरण दे सको, जैसे कि परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव, परमेश्वर की मनोहरता, परमेश्वर का कार्य, मनुष्य के लिए परमेश्वर के इरादे, मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाएँ, साथ ही वे सभी सत्य जो परमेश्वर ने मानवजाति के सामने व्यक्त किए हैं, सत्य के अंदर मौजूद हर विस्तृत और विशिष्ट सत्य सिद्धांत—ये सभी सकारात्मक चीजें हैं। तुम लोग सकारात्मक चीजों के कुछ विशिष्ट उदाहरण दे सकते हो, तो क्या तुम नकारात्मक चीजों के कुछ विशिष्ट उदाहरण दे सकते हो? क्या परंपरागत संस्कृति एक नकारात्मक चीज है? (हाँ।) क्या बुरी प्रवृत्तियाँ नकारात्मक चीजें हैं? (हाँ।) क्या अधिकारी बनने के पीछे भागना एक नकारात्मक चीज है? (हाँ।) क्या बहुत ज्यादा दौलत के पीछे भागना एक नकारात्मक चीज है? (हाँ।) ये सभी नकारात्मक चीजें हैं। इनके अलावा? (मैं बस इतना ही सोच सकता हूँ।) तुम लोग अपने दिलों में इन चीजों के बारे में कभी सोचते ही नहीं; तुम हमेशा अन्यत्र खोए रहते हो। और फिर भी, तुम लोगों को अक्सर लगता है कि कई सालों तक परमेश्वर में विश्वास करने और अपना कर्तव्य निभाने के बाद, परमेश्वर के बहुत सारे वचन खाने-पीने के बाद तुम बहुत सारा सत्य समझ गए हो। तो फिर, जब विशिष्ट मामलों की बात आती है तो तुम्हारा कोई दृष्टिकोण क्यों नहीं होता? तुमने जो कुछ भी समझा है, वह सब कहाँ चला गया? अगर तुमसे यह कहा जाए कि जिन सत्यों को तुम समझते हो उनका इस्तेमाल करके किसी मुद्दे के सार का गहन-विश्लेषण करो और उसके सार को स्पष्ट रूप से समझाओ, और इस तरह लोगों को उसमें शामिल सत्य और परमेश्वर के इरादे समझने में मदद करो, ताकि वे न सिर्फ नकारात्मक चीजों का भेद पहचान सकें, बल्कि यह भी जान सकें कि इससे जुड़ी सकारात्मक चीजें और सत्य सिद्धांत क्या हैं, तो तुम कुछ नहीं बता पाते, तुम नहीं जानते कि क्या कहना है। क्या यह सत्य न समझने की अभिव्यक्ति नहीं है? (हाँ, है।) तो फिर तुम लोग आम तौर पर जिन समझ-बूझों के बारे में बात करते हो, वे सब क्या हैं? (शब्द और धर्म-सिद्धांत।) वे सब शब्द और धर्म-सिद्धांत हैं। कुछ लोग जब आध्यात्मिक भक्ति के नोट्स लिखते हैं तब उनके विचार झरने की तरह बहते हैं, और वे ऐसे लिखते हैं मानो दैवीय शक्ति ने उनका मार्गदर्शन किया हो; वे बहुत ही संरचित तरीके से लिखते हैं और इस हद तक भावविभोर हो जाते हैं कि उनकी आँखें भर आती हैं और उनके चेहरे पर आँसू बहने लगते हैं। लेकिन, जब उनसे कहा जाता है कि उन्होंने जो लिखा है, उसे विभिन्न लोगों का भेद पहचानने, विभिन्न चीजों की असलियत जानने और विभिन्न समस्याएँ हल करने के लिए असल जिंदगी में लागू करें, तो वे ऐसा करने में अक्षम रहते हैं। वे बहुत सारे धर्म-सिद्धांत समझते हैं, लेकिन सत्य नहीं समझते। नतीजतन, वे जिस भी मामले का सामना करते हैं, उसकी असलियत नहीं जान सकते और जो समस्या उन्हें पता चलती है उसे हल नहीं कर सकते। उनके इतने सारे धर्म-सिद्धांत समझने का क्या फायदा? जो लोग सत्य नहीं समझते, वे कितने दयनीय होते हैं! वे घमंडी और आत्मतुष्ट लोग कई धर्म-सिद्धांत समझते हैं, फिर भी कोई असली समस्या हल नहीं कर सकते। यह बहुत दयनीय है। चलो, हम वापस मुद्दे पर आते हैं और इस बात पर अपनी संगति जारी रखते हैं कि सकारात्मक चीजें क्या हैं। सत्य का यह पहलू स्पष्ट किया जाना जरूरी है। अगर हम एक सामान्य कथन बोलें और कहें, “परमेश्वर से आने वाली हर चीज एक सकारात्मक चीज है,” तो क्या ये शब्द सही हैं? (हाँ।) “परमेश्वर से आने वाली हर चीज एक सकारात्मक चीज है” एक सत्य है, लेकिन अगर तुम यह नहीं समझते कि यह कथन विशिष्ट रूप से किसे संदर्भित करता है या इसके अंदर का सत्य किसे संदर्भित करता है, तो तुम जो समझते हो वह सिर्फ धर्म-सिद्धांत है। अगर तुम कई मामलों में इस कथन का अनुभव करते हो और इसकी सच्ची समझ रखते हो और अपना दृष्टिकोण साबित करने के लिए कुछ विवरण भी दे सकते हो, तो तुम्हारे दृष्टिकोण का आधार परमेश्वर के वचन हैं और यह साबित करता है कि तुम कुछ सत्य समझते हो। बहुत-से लोग कहते हैं, “परमेश्वर से आने वाली हर चीज एक सकारात्मक चीज है।” सैद्धांतिक रूप से यह कथन सही है और यह सत्य का एक पहलू भी है। तो, विशिष्ट रूप से, सकारात्मक चीजें क्या हैं? “परमेश्वर से आने वाली हर चीज एक सकारात्मक चीज है” के लिए एक विशिष्ट व्याख्या होनी चाहिए। तो, कौन-सी चीजें सकारात्मक चीजें हैं? परमेश्वर से आने वाली हर चीज एक सकारात्मक चीज है : परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं। क्या यह व्याख्या सही है? क्या यह इसे विशिष्ट बनाती है? (हाँ।) इस तरह यह कथन कि “परमेश्वर से आने वाली हर चीज एक सकारात्मक चीज है” सिर्फ सिद्धांत के स्तर पर नहीं रहता, बल्कि एक सत्य सिद्धांत बन जाता है। क्या इसे इस तरह से कहना स्पष्ट है? (हाँ।) तो फिर सकारात्मक चीजों को परिभाषित करने वाला यह वाक्य पढ़ो। (परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं।) यह वाक्य पढ़ने के बाद तुम्हें कैसा महसूस होता है? क्या तुम्हारे दिलों में सकारात्मक चीजों की परिभाषा या दायरा स्पष्ट होना शुरू हो गया है? (हाँ।) तो इसे फिर से पढ़ो। (परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं।) जब तुम लोग सत्य के वचन पढ़ते हो, तो तुम्हें उन्हें धीरे-धीरे पढ़ना और उन पर ध्यान से विचार करना सीखना चाहिए। तुम्हें उन्हें सही लय में पढ़ना सीखना चाहिए, उन्हें समझने लायक गति से गंभीरता और श्रद्धा से पढ़ना चाहिए, ताकि हर किसी के द्वारा उन्हें सुन लेने के बाद हर शब्द और वाक्य उनके दिलों में उत्कीर्ण हो जाए और गहरा असर छोड़े और तब से यह कथन परमेश्वर के वचनों का आधार और मापदंड बन जाए जिससे वे किसी निश्चित प्रकार की चीज को अंदर से माप सकें। यह कितना अच्छा होगा। इसे फिर से पढ़ो। (परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं।) यह अभी भी थोड़ा तेज था। मुझे बताओ, परमेश्वर के वचन पढ़ते समय क्या तुम्हें गंभीर और साथ ही पवित्र भी नहीं होना चाहिए? (हाँ।) अगर तुम परमेश्वर के वचन किसी गैर-विश्वासी के लेख की तरह हलके-फुलके ढंग से और तेजी से पढ़ोगे, तो सुनने वालों को कैसा लगेगा? (उन्हें कोई पवित्रता महसूस नहीं होगी।) तो, परमेश्वर के वचन पवित्रता के साथ पढ़ने के लिए तुम्हें उन्हें कैसे पढ़ना चाहिए? उन्हें पढ़ने की गति कैसी होनी चाहिए? (हमें उन्हें गंभीरता से और कर्तव्यनिष्ठा से, एक-एक शब्द करके, गुंजायमान और सशक्त तरीके से पढ़ना चाहिए।) सही है। तो इसे फिर से पढ़ो और इसे गुंजायमान और सशक्त बनाने की कोशिश करो। (परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं।) अब जबकि यह वाक्य कई बार पढ़ा जा चुका है, तुम्हें यह याद हो गया होगा, है ना? (हाँ।) यह वाक्य तीन चीजों पर जोर देता है। पहली चीज क्या है? (जो परमेश्वर द्वारा सृजित है।) दूसरी चीज क्या है? (जो परमेश्वर द्वारा नियत है।) और तीसरी चीज क्या है? (जो परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है।) और ये सभी चीजें क्या हैं? (ये सभी सकारात्मक चीजें हैं।) तुम्हें यह याद हो गया है, है ना? (हाँ।) सत्य को कंठस्थ करना और अपने दिल में उत्कीर्ण कर लेना सभी सत्य सिद्धांत समझने, सभी तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों का भेद पहचानने और उनके प्रति सही सैद्धांतिक स्थिति और दृष्टिकोण रखने, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सत्य सिद्धांतों के अनुसार सही मार्ग चुनने और अभ्यास करने में समर्थ होने के लिए बेहद फायदेमंद है।
परमेश्वर द्वारा सृजित सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं
हमने अभी इस बारे में बात की कि सकारात्मक चीजें क्या हैं। परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन होने के दायरे में आने वाली सभी चीजें और घटनाएँ सकारात्मक चीजें हैं। ऐसे में, सकारात्मक चीजों की एक बड़ी संख्या है। पहले तो, परमेश्वर द्वारा सृजित सभी तरह की जीवित और निर्जीव चीजें सकारात्मक चीजें हैं। जीवित चीजें वे जीवन-रूप हैं जो क्रियाकलाप करने में सक्षम हैं, जो सांस ले सकती हैं और जिनमें जीवन-शक्ति होती है। उनकी जीवन-संरचना कैसी भी हो या उनके जीवन के कानून और नियम कुछ भी हों, अगर वे परमेश्वर द्वारा सृजित हैं, अगर वे परमेश्वर से आती हैं तो वे सकारात्मक चीजें हैं। भले ही तुम उन्हें पसंद न करो, भले ही वे तुम्हारी धारणाओं से मेल न खाती हों और भले ही वे लोगों के लिए फायदेमंद न हों या उन्हें नुकसान तक पहुँचा सकती हों, अगर वे परमेश्वर द्वारा बनाई गई हैं और उसके द्वारा नियत हैं तो वे सकारात्मक चीजें हैं। लेकिन कुछ लोग इस बारे में धारणाएँ रखते हैं। वे मानते हैं कि बुरे जानवर और वे जानवर जो लोगों को नुकसान पहुँचा सकते हैं—जैसे लोमड़ियाँ, भेड़िये या आदमखोर जानवर—वे सकारात्मक चीजें नहीं बल्कि नकारात्मक चीजें हैं। यह दृष्टिकोण परमेश्वर की इच्छाओं के खिलाफ है और पूरी तरह से और बिल्कुल गलत है। असल में, जो कुछ भी परमेश्वर ने बनाया है, अगर वह उसकी निंदा नहीं करता तो वह एक सकारात्मक चीज है। लोगों को उसके साथ पक्षपात नहीं करना चाहिए, न उन्हें उसकी निंदा करनी चाहिए और न ही घिनौना लगने की वजह से उसे मारना या उससे निपटने के लिए किसी अन्य क्रूर तरीके का सहारा लेना चाहिए। लोगों को उसे प्राकृतिक तरीके से रहने देना चाहिए। भले ही तुम उसकी रक्षा न करो, फिर भी तुम्हें उसे जीवित बचे रहने के लिए जगह देनी चाहिए और तुम्हें उसे नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए, क्योंकि वह परमेश्वर से आता है। यही रवैया लोगों को परमेश्वर द्वारा बनाए गए सभी विभिन्न प्राणियों के प्रति रखना चाहिए। अगर कोई चीज परमेश्वर द्वारा बनाई गई है तो चाहे तुम उसे पसंद करो या न करो, चाहे वह सुंदर हो या कुरूप, वह चाहे तुम्हारे प्रति मित्रवत हो या तुम्हारे लिए खतरा पैदा करे, चाहे वह नंगी आँखों से दिखाई न दे या चाहे तुम उसे देख सको, चाहे उसका तुम्हारे जीवन पर कोई असर हो या न हो या मानव-अस्तित्व के साथ उसका जो भी संबंध हो, तुम्हें उसे और ऐसी सभी चीजों को समान महत्व देना चाहिए, उनके साथ सिद्धांतों के अनुसार पेश आना चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए; उन्हें जीवित बचे रहने के लिए जगह देनी चाहिए, उनके जीवित बचे रहने के तरीकों और उनके जीवित बचे रहने के नियमों का सम्मान करना चाहिए और उनकी तमाम गतिविधियों का भी सम्मान करना चाहिए। तुम्हें उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए। कम से कम, तुम्हें इन प्राणियों के साथ सह-अस्तित्व में रहने में समर्थ होना चाहिए और एक-दूसरे के मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। यह ऐसी चीज है जिसे लोगों को समझना और गहराई से बूझना चाहिए और बेशक, इससे भी बढ़कर यह वह सिद्धांत है जिसका पालन व्यक्ति को विभिन्न प्राणियों के साथ पेश आने के तरीके में करना चाहिए; व्यक्ति को उनके साथ मनुष्य की इच्छा से आने वाली धारणाओं या यहाँ तक कि गर्ममिजाजी के साथ बिल्कुल पेश नहीं आना चाहिए। परमेश्वर द्वारा सृजित सभी चीजों से जुड़े मामलों पर हमारी संगति यहीं समाप्त होती है।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?