सत्य का अनुसरण कैसे करें (18) भाग तीन

कुछ लोग कहते हैं, “सेब और नाशपाती दोनों परमेश्वर द्वारा नियत मूल फल हैं। अगर दोनों की कलम लगाकर सेब-नाशपाती बना दी जाए, तो क्या वह नकारात्मक चीज होगी? हमें उसे खाना चाहिए या नहीं?” यह ऐसी चीज है जो रोजमर्रा की जिंदगी में सामने आ सकती है, है ना? मुझे बताओ, तुम्हें उसे खाना चाहिए या नहीं? अगर तुम उसे खाओगे तो क्या तुम्हें जहर चढ़ जाएगा? क्या उससे तुम्हें शारीरिक नुकसान होगा? क्या उससे तुम्हारी आयु पर असर पड़ेगा? क्या उससे इस बात पर असर पड़ेगा कि परमेश्वर तुम्हें कैसे देखता है? क्या उससे तुम्हारे परिणाम पर असर पड़ेगा? इस मामले को कैसे देखना चाहिए? यह इस बात की परीक्षा लेता है कि तुम सत्य सिद्धांत समझते हो या नहीं और क्या तुम समझते हो कि हमने पहले किस बारे में संगति की थी। अगर तुम सत्य के इस पहलू को समझते हो और तुमने इस बारे में सत्य सिद्धांत समझ लिए हैं, तो जब तुम असल जिंदगी में चीजों का सामना करोगे, तो तुम जान जाओगे कि अभ्यास कैसे करना है, तुम जान जाओगे कि कौन-से क्रियाकलाप सत्य का उल्लंघन करते हैं और कौन-से क्रियाकलाप सत्य कायम रखते हैं और सत्य सिद्धांतों के दायरे में हैं। क्या तुम्हें सेब-नाशपातियाँ खानी चाहिए? (नहीं।) क्या ऐसा है कि तुम उन्हें खाने की हिम्मत नहीं करोगे या उन्हें खाना ही नहीं चाहिए? (हम उन्हें खाने की हिम्मत नहीं करेंगे।) तुम लोग कहते हो कि तुम उन्हें खाने की हिम्मत नहीं करोगे, लेकिन क्या तुमने अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में उनमें से काफी सेब-नाशपातियाँ खाई नहीं हैं? और उन्हें खाने के बाद क्या हुआ? क्या तुम्हें शारीरिक रूप से नुकसान हुआ? पहले तो आओ, यह तय करते हैं कि सेब-नाशपाती एक सकारात्मक चीज है या नकारात्मक। तुम लोगों ने कहा कि इसे नहीं खाना चाहिए। इस कथन का निहितार्थ यह है कि सेब-नाशपाती एक नकारात्मक चीज है, इसलिए उसे नहीं खाना चाहिए। क्या तुम्हारा यही मतलब था? (हाँ।) तो क्या यह समझ सही है? क्या सेब-नाशपातियों का मामला इसी तरह से समझना चाहिए? अगर मैंने तुम लोगों को संगति के लिए यह उदाहरण नहीं दिया होता, तो तुम लोग सोचते कि सेब-नाशपातियाँ नहीं खानी चाहिए, उन्हें खाने से तुम्हारे अंदर जहर फैल जाएगा—ठीक वैसे ही जैसे हव्वा ने जब परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन कर अच्छे और बुरे के ज्ञान के पेड़ का फल खाया, तो शैतान ने उसे पाप करने के लिए बहकाया और वह शैतान के हाथों में ऐसे पड़ गई कि निकलना असंभव था। खासकर यह देखते हुए कि अब परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार का अहम क्षण है और समय बहुत कम बचा है, तुम सोचते हो कि तुम्हें सावधान रहना चाहिए और बिना सोचे-समझे चीजें नहीं खानी चाहिए, अगर तुम ऐसा करते हो, तो तुम सिद्धांतों का उल्लंघन कर सकते हो और प्रशासनिक आदेशों का भी उल्लंघन कर सकते हो, जिससे तुम्हें बचाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा और तब पछताना व्यर्थ होगा। तुम लोग इस मामले की असलियत नहीं जान सकते; तुम लोग इतनी छोटी-सी चीज से चकरा गए हो। तुम लोग सोचते हो कि सेब-नाशपातियाँ नहीं खानी चाहिए और तुम उन्हें खाने की हिम्मत नहीं करोगे, ऐसा करना सिद्धांतों का उल्लंघन करना और प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करना होगा, जो भयानक होगा! क्या तुम सब यही नहीं सोचते? तो, तुम्हें सेब-नाशपातियाँ खानी चाहिए या नहीं? (परमेश्वर, हमने अभी इस बारे में चर्चा की और हम सोचते हैं कि हम सेब-नाशपातियाँ खा सकते हैं, क्योंकि मनुष्य सेबों और नाशपातियों को सिर्फ बेहतर बना रहा है और उसने परमेश्वर द्वारा उनके लिए नियत कानून नहीं बदले हैं। इसलिए सेब-नाशपातियाँ खाने से प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन नहीं होता।) तुम लोगों की संगति के बाद तुम्हें कुछ स्पष्टता मिली है और अब तुम समझते हो कि सेब-नाशपाती के संबंध में परमेश्वर द्वारा नियत कानून मूल रूप से अपरिवर्तित रहे हैं, इसलिए तुम उसे खा सकते हो। तुम लोगों ने अभी जो कहा वह सही है; बस तुमने इसे स्पष्ट रूप से नहीं बताया। आओ, अभी इस सवाल पर चर्चा नहीं करते कि सेब-नाशपातियाँ खाई जा सकती हैं या नहीं; आओ, पहले इस बारे में बात करते हैं कि वे परमेश्वर द्वारा नियत कानूनों का उल्लंघन क्यों नहीं करतीं। सेब के पेड़ और नाशपाती के पेड़ दोनों परमेश्वर द्वारा सृजित पौधे हैं और लोग उन पर लगने वाले फल खा सकते हैं। जब इन दोनों पौधों की कलम एक-दूसरे पर लगाई जाती है या उनका पर-परागण किया जाता है, तो एक अलग तरह का फल पैदा होता है। चाहे यह अप्राकृतिक रूप से किया जाए या प्राकृतिक रूप से, मूल रूप से इस फल की उत्पत्ति, उसकी उत्तरजीविता का रूप और उसकी उत्तरजीविता के कानून और नियम वही रहते हैं जो परमेश्वर द्वारा मूल रूप से नियत किए गए थे। अगर मनुष्य अप्राकृतिक रूप से सेब के पेड़ और नाशपाती के पेड़ की शाखाओं की कलम एक-दूसरे पर लगाए तो भी, यह उनकी उत्तरजीविता के मूल कानूनों और नियमों, उनके मूल जीवन-रूपों के आधार पर ही होता है कि दोनों की साझा जीवन-विशेषताओं वाला एक फल पैदा होता है। यह फल सेब-नाशपाती कहलाता है। मनुष्य एक अलग तरह का फल पैदा करने के लिए दो पौधों की कलम एक-दूसरे पर लगाने के लिए सिर्फ अपनी उत्तरजीविता की क्षमता और अपने सोचने का तरीका, अपनी बुद्धिमत्ता और चतुराई इस्तेमाल करता है, लेकिन यह फल, सेब-नाशपाती, परमेश्वर ने जो नियत किया है उसके दायरे से बाहर नहीं जाता। यह एक पहलू है। दूसरी ओर, इंसानी दखल के बिना भी, अगर सेब और नाशपाती के पेड़ एक ही जंगल में साथ-साथ उगते हैं, तो क्या वे पर-परागण से बच सकते हैं? एकदम प्राकृतिक परिस्थितियों में, जब फूल खिलने का मौसम आता है, उनमें पर-परागण हो जाएगा और जमीन के नीचे उनकी जड़ें भी आपस में गुँथ जाएँगी। चाहे पराग मधुमक्खियों से फैले या हवा और वायु-संचरण से, सेब और नाशपातियाँ एक-दूसरे के पोषक तत्त्व ले लेंगी और सेब-नाशपाती फल एकदम प्राकृतिक तरीके से पैदा हो जाएगा। तो क्या तुम अब भी कह सकते हो कि यह सेब-नाशपाती मनुष्य-निर्मित है? (नहीं।) यह एक जीवित चीज है जो परमेश्वर द्वारा नियत प्राकृतिक परिवेश में प्राकृतिक रूप से उगती है; यह ऐसी चीज है जो परमेश्वर द्वारा स्वीकृत दायरे में है, इसलिए यह सेब-नाशपाती कोई कानून नहीं तोड़ती। चाहे इसमें सेब की विशेषताएँ हों या नाशपाती की, संक्षेप में यह कोई नकारात्मक चीज नहीं है; यह अभी भी एक तरह का फल है जो परमेश्वर ने मनुष्य के लिए बनाया है। तुम अपनी चिंताएँ एक तरफ रखकर इसे खा सकते हो—इससे तुम्हें निश्चित रूप से कोई शारीरिक नुकसान नहीं होगा। हालाँकि, जब मैंने अभी-अभी मनुष्य द्वारा सेब और नाशपाती की टहनियों की अप्राकृतिक रूप से कलम लगाने का जिक्र किया था, तो तुम लोग यह निश्चित नहीं कर सके कि सेब-नाशपाती सकारात्मक चीज है या नकारात्मक, और तुम यह सोचकर इसे खाने की हिम्मत न करते, “सेब सेब है, उसमें नाशपाती के आनुवंशिक गुण नहीं होते, और नाशपाती नाशपाती है, उसमें सेब के घटक नहीं होते; निश्चित रूप से सिर्फ इन्हें ही खाया जा सकता है!” क्या चीजों को समझने का यह तरीका विकृत नहीं है? (हाँ, है।) यह विकृत है। विभिन्न जीवित चीजें एक ही जगह पर एक-साथ रहती हैं; उनका एक-दूसरे को प्रभावित करना और एक-दूसरे की जरूरतें पूरी करना, अपनी कमजोरियों की भरपाई करने के लिए एक-दूसरे की खूबियों का इस्तेमाल करना अपरिहार्य है। इसके अंदर कई विवरण और रहस्य हैं। संक्षेप में, इन सबका उद्भव, अस्तित्व और प्रभाव परमेश्वर द्वारा सृजित मानवजाति के जीवित रहने के लिए है। यही सकारात्मक चीजों के अस्तित्व का मूल्य और महत्व है; अंततः यह मनुष्य की सामान्य उत्तरजीविता और मनुष्य का प्रजनन और निरंतरता बनाए रखने के लिए है। क्या यह मामला अब स्पष्ट है? (हाँ।)

इसके बाद आओ, एक और मामले पर चर्चा करते हैं जिसका सामना लोग अक्सर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में करते हैं। देखो और सोचो कि इसका भेद कैसे पहचानना चाहिए और इसे कैसे लेना चाहिए। इंसानों की खाने की जरूरत पूरी करने के लिए लोगों ने गैर-जैविक अनाजों का अविष्कार किया, विभिन्न बीजों और फलों के आनुवंशिक गुण संशोधित करके पैदावार बढ़ाई। शुरू में मकसद असल में कीड़े और बीमारियाँ कम करना, ज्यादा कीटनाशक इस्तेमाल नहीं करना और इस तरह मेहनत घटाकर और कीड़ों और बीमारियों का दखल रोककर इंसानों की जरूरत वाले विभिन्न पौधे उगाना और साथ ही इंसानों की खाने की जरूरत पूरी करने के लिए पैदावार बढ़ाना था, जिसके परिणामस्वरूप ऐसा उत्पाद बना। यह उत्पाद क्या कहलाता है? गैर-जैविक खाद्य पदार्थ। गैर-जैविक खाद्य पदार्थों के आविर्भाव ने इंसानों की भोजन की जरूरत काफी हद तक पूरी कर दी है। लोगों का मानना है कि जैविक खाद्य पदार्थों की पैदावार कम होती है और उससे इंसानों की जरूरतें पूरी नहीं हो सकतीं। गैर-जैविक अनाजों के आविर्भाव के बाद से अनाजों की पैदावार बहुत बढ़ गई है, लोगों की आमदनी भी बढ़ी है और बहुत-से लोगों की भूख की समस्या हल हो गई है। इस तरह, इंसान “किस्मत से” गैर-जैविक खाना खा पा रहे हैं। तो, गैर-जैविक खाद्य पदार्थ सकारात्मक चीज हैं या नकारात्मक चीज? वे “परमेश्वर ने जो नियत किया है” उसके सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं या नहीं? क्या गैर-जैविक खाद्य पदार्थ खाने चाहिए? गैर-जैविक खाद्य पदार्थों के बारे में तुम लोगों के क्या दृष्टिकोण और मत हैं? तुम जैविक और गैर-जैविक खाद्य पदार्थों की सकारात्मकता और नकारात्मकता को कैसे परिभाषित करते हो? (जैविक खाद्य पदार्थ प्राकृतिक होते हैं और वे परमेश्वर द्वारा नियत हैं। वे सकारात्मक चीज हैं। गैर-जैविक खाद्य पदार्थ वैज्ञानिक प्रसंस्करण और आनुवंशिक संशोधन से पैदा किए जाते हैं। वे परमेश्वर के बनाए मूल नियमों के खिलाफ हैं। इसलिए गैर-जैविक खाद्य पदार्थ नकारात्मक चीज हैं।) (गैर-जैविक खाद्य पदार्थों में मूल आनुवंशिक गुण क्षतिग्रस्त हो जाते हैं और वे परमेश्वर के बनाए कानूनों के खिलाफ हैं। इसके अलावा, गैर-जैविक खाद्य पदार्थों में भोजन का मूल पोषण-मूल्य नष्ट हो जाता है; उसे खाने से लोगों की सेहत को कोई फायदा नहीं होता। आजकल ऐसे बहुत सारे लोगों में, जो कई सालों से गैर-जैविक खाद्य पदार्थ खा रहे हैं, सेहत से जुड़ी समस्याएँ व्यापक रूप से दिखाई देती हैं, इसलिए मुझे लगता है कि अगर हालात इजाजत दें, तो हमें इस बात की भरसक कोशिश करनी चाहिए कि उन्हें नहीं खाएँ। लेकिन आज के समाज में ज्यादातर खाद्य पदार्थ गैर-जैविक हैं, इसलिए जीवित बचे रहने के लिए हमें निश्चित रूप से गैर-जैविक खाद्य पदार्थ खाने पड़ते हैं।) तुम लोगों ने जो कुछ भी कहा है, वह सब सिद्धांतों के अनुरूप है और उसके मुख्य बिंदु सही हैं, लेकिन यह बहुत सरलीकृत है और कुछ विवरण ऐसे हैं जो स्पष्ट रूप से नहीं बताए गए हैं। कुछ लोग कहते हैं, “गैर-जैविक खाद्य पदार्थ और जैविक खाद्य पदार्थ बाहर से एक-से दिखते हैं और उनका स्वाद कमोबेश एक-सा ही होता है। गैर-जैविक खाद्य पदार्थ बुनियादी रूप से भोजन के परमेश्वर द्वारा नियत मूल रूपों से कोई अलग नहीं हैं। कुछ गैर-जैविक खाद्य पदार्थ तो जैविक खाद्य पदार्थों से बेहतर दिखते हैं और उनकी पैदावार भी जैविक खाद्य पदार्थों से ज्यादा होती है और स्वाद भी जरूरी नहीं कि जैविक खाद्य पदार्थों से बहुत ज्यादा खराब हो। तो फिर जैविक खाद्य पदार्थ सकारात्मक चीज और गैर-जैविक खाद्य पदार्थ नकारात्मक चीज क्यों हैं?” हालाँकि तुम लोगों ने अभी-अभी कहा कि तुम निश्चित हो कि जैविक खाद्य पदार्थ सकारात्मक चीज हैं और गैर-जैविक खाद्य पदार्थ नकारात्मक चीज हैं, लेकिन तुम लोग यह नहीं समझते कि उनमें इस तरह से अंतर क्यों किया जाता है; तुम लोग अभी भी यहाँ विवरण नहीं समझते। एक महत्वपूर्ण बिंदु है जो तुम्हें जानना चाहिए : ऐसा क्यों है कि बाहर से एक-सी दिखने वाली दो चीजों में से एक सकारात्मक चीज है और दूसरी नकारात्मक चीज? कुछ लोग कहते हैं, “ऐसा इसलिए है क्योंकि गैर-जैविक खाद्य पदार्थों का वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्करण किया जाता है और विज्ञान ने उसे नुकसान पहुँचा दिया है।” क्या यह कथन सही है? सिद्धांत के अनुसार यह सही है। ऐसा लगता है कि यही मामला है। लेकिन सुनने के बाद भी लोगों को समझ नहीं आता। तो, उनके सार के अनुसार जैविक और गैर-जैविक खाद्य पदार्थों में क्या फर्क है जो उन्हें क्रमशः सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के रूप में परिभाषित करने देता है? यह परिभाषा किस पर आधारित है? परमेश्वर इसे कैसे देखता है? इसमें सत्य क्या है? इससे हम मुद्दे के सार तक पहुँचते हैं।

जैविक चीजें परमेश्वर से आती हैं। वे वही हैं जो परमेश्वर ने बनाई हैं और मनुष्य ने उन्हें “जैविक” नाम दिया है। अभी हम “जैविक” शब्द की उत्पत्ति या स्रोत पर या इस बात पर कि लोगों ने इसे ऐसा नाम क्यों दिया, ध्यान नहीं देते। हमें अभी भी इसे परमेश्वर द्वारा सृजित और नियत करने के परिप्रेक्ष्य से देखने की जरूरत है। परमेश्वर द्वारा सृजित और नियत करने में एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण बिंदु है, वह यह कि जब परमेश्वर ने एक बीज बनाया तो उसने उसमें वे सभी पोषक तत्त्व और घटक डाले जो उसमें होने चाहिए, साथ ही उसके प्रकार्य भी डाले। बीज में कौन-सी चीजें डाली गईं, यह तय करने के सिद्धांतों का क्या आधार है? वे मानव शरीर की जरूरतों पर, मानव शरीर के आंतरिक अंगों के कार्यों की ग्रहणशीलता और इन अंगों के लिए आवश्यक पोषण संबंधी घटकों पर आधारित थे। चूँकि ऐसे बीज से उगाए गए खाद्य पदार्थ इंसानों के खाने के लिए हैं, तो खाए जाने के बाद यह भोजन मानव-शरीर पर क्या प्रभाव डालेगा और इंसान अपने सामान्य शारीरिक विकास और उत्तरजीविता को बनाए रखने तथा अपने शरीर का जीवन लंबा करने के लिए इससे कौन-कौन से पोषक तत्त्व अवशोषित कर सकते हैं, ये सभी बातें परमेश्वर को किसी बीज या किसी प्रकार के खाद्य पदार्थ की सृष्टि करते समय ध्यान में रखनी होती हैं। यह सिर्फ यूँ ही मिट्टी में उग सकने वाला बीज बनाना और उसे वैसे ही छोड़ देना नहीं है, नहीं, परमेश्वर ने इस पर सोचा है। ऐसे बीज की त्वचा, गूदे और अंकुर का मानव शरीर पर क्या प्रभाव पड़ेगा, ये चीजें क्या परिणाम प्राप्त कर सकती हैं, मानव शरीर को क्या चाहिए, और ऐसा भोजन खाकर इंसानों को इसमें से कौन-से पोषक तत्त्व अवशोषित करने चाहिए, ये सभी चीजें परमेश्वर को ध्यान में रखनी होती हैं। चूँकि परमेश्वर इन चीजों पर विचार करता है, इसलिए जब वह ऐसा बीज बनाता है तो उसे इसे इंसानों की जरूरत के पोषण संबंधी अनुपातों के अनुसार बनाना होता है, और इस तरह यह बीज परमेश्वर के विचारों में अस्तित्व में आता है। यह बीज के पोषण संबंधी घटकों और संरचना के परिप्रेक्ष्य से इंसानों पर उसके प्रभाव को देखना है; यह एक पहलू है जिस पर परमेश्वर इस बीज को बनाते समय विचार करता है। इसके अलावा, परमेश्वर ऐसे बीज या फल का आकार और आकृति, उसके अंकुरण के समय की अवधि, उसकी उत्तरजीविता का रूप, मिट्टी का प्रकार जिसमें वह उगने के लिए उपयुक्त है, किस तरह की मिट्टी में वह कितने पोषक तत्त्व अवशोषित करता है, इंसान उसे खाकर उसमें से कितने पोषक तत्त्व अवशोषित कर सकते हैं, और इसी तरह की अन्य चीजें भी ध्यान में रखता है। ये सभी विवरण ऐसी चीजें हैं जिन पर परमेश्वर को विचार करना होता है। कोई बीज बनाते समय परमेश्वर जिन विभिन्न कारकों पर विचार करता है, वे अंततः एक ही बिंदु पर आते हैं और वह है मनुष्य का सामान्य शारीरिक विकास और उत्तरजीविता हासिल करने के लिए उसकी भोजन की जरूरत पूरी करना। यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। एक अन्य बिंदु भी महत्वपूर्ण है। अगर किसी बीज में जीवन-शक्ति नहीं है और वह रेत के कण या पत्थर की तरह बेजान चीज है जो मिट्टी में बोने पर अंकुरित नहीं हो सकता, तो इसका मतलब है कि लोगों के इस भोजन को एक बार खाने के बाद यह दोबारा उपलब्ध नहीं होगा। ऐसा बीज मनुष्य की भोजन की जरूरत पूरी करने से बहुत दूर है। इसलिए, इसमें जो घटक होने चाहिए, जैसे कि इसका छिलका और भीतरी गिरी, उनके अलावा इस बीज में अंकुर भी होना चाहिए। बेशक, यह अंकुर शायद सभी बीजों में मौजूद जीवन का लक्षण न हो। संक्षेप में, छिलके और भीतरी गिरी के अलावा इस बीज में जीवन-शक्ति होनी चाहिए। इंसानी भाषा में इसे जीवन-शक्ति कहा जाता है, लेकिन परमेश्वर की शब्दावली में इसका मतलब है कि इस बीज में जीवन होना चाहिए। “जीवन होने” का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि यह प्रजनन जारी रख सकता है; अंकुरित होकर और बढ़कर यह फल देने में समर्थ होना चाहिए। बीज को अंकुरित होकर, बढ़कर और फूल देकर और ज्यादा फल पैदा करने में समर्थ होना चाहिए और बीज की ही तरह उसके फलों में भी जीवन-शक्ति होनी चाहिए और उन्हें प्रजनन कर और ज्यादा फल देने में समर्थ होना चाहिए, क्योंकि इसी तरह वह मनुष्य की भोजन की जरूरत अनंत रूप से पूरी कर सकता है। परमेश्वर द्वारा बीज सृजित और नियत करने के पीछे ये दो सबसे बुनियादी और सबसे महत्वपूर्ण चीजें हैं : एक तो उसमें मौजूद विभिन्न पोषक तत्त्व और उसके प्रकार्य, और दूसरा यह कि इस बीज में जीवन-शक्ति होनी चाहिए, यानी यह बीज जीवित होना चाहिए। इंसानी शब्दावली में, अगर कोई चीज “जीवित” है तो उसे “जैविक” कहा जाता है। इस जैविक खाद्य पदार्थ में, जब से परमेश्वर ने इसे बनाया है, असल में जीवन है। अगर तुम इसे मिट्टी में दबा दो और पानी और खाद डालो तो यह अंकुरित होगा, बढ़ेगा, फूल देगा और फिर फल देगा और इसके हर फल का वही प्रकार्य होगा जो इसका है। यही प्रकार्यात्मकता लगातार मनुष्य की भोजन की जरूरत पूरी करती है, मनुष्य की भौतिक उत्तरजीविता बनाए रखती है और मनुष्य का प्रजनन और निरंतरता कायम रखती है। इसके अलावा, यह बीज मिट्टी में मिल जाता है और फल देता है, और ये फल—बीज की ही तरह—मनुष्य को प्रदान करने के लिए और फल देते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रजनन करने और फलने-फूलने की उसी प्रक्रिया से गुजरते हैं। इस तरह मनुष्य को भोजन की अनंत आपूर्ति होती रहती है। भोजन की आपूर्ति के साथ, भोजन के स्रोत के साथ मनुष्य का भौतिक जीवन और उत्तरजीविता अनंत रूप से जारी रहती है और वह कभी बिना भोजन के नहीं रहेगा। इस तथ्य से यह देखा जा सकता है कि मनुष्य के आज तक जीवित बचे रहने में परमेश्वर द्वारा बनाए गए विभिन्न बीजों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मनुष्य के लिए ऐसा योगदान देने में उनके समर्थ होने का मूल परमेश्वर का सृजन और परमेश्वर का विधान है। लेकिन अगर बीज के लिए परमेश्वर द्वारा नियत दो सबसे जरूरी चीजें नष्ट हो जाएँ—एक तो बीज के पोषक तत्त्व और प्रकार्य और दूसरा उसकी मूल जीवन-शक्ति—अगर ये दोनों चीजें खत्म हो जाएँ, तो जब बीज मिट्टी में गिरेगा, तो वह न अंकुरित होगा, न बढ़ेगा, न फूल देगा और न ही फल देगा। वह सिर्फ मिट्टी में गायब हो जाएगा और तभी से इंसानों के भोजन का स्रोत खो जाएगा। तब मनुष्य किस चीज का सामना करेगा? (मौत का।) वह भूख, अकाल और फिर मौत का सामना करेगा और वह बच्चे पैदा करके अपनी नस्ल आगे नहीं बढ़ा पाएगा। यह एक पहलू है और यह बहुत गंभीर है। दूसरा पहलू यह है कि जब किसी बीज का अप्राकृतिक तरीके से प्रसंस्करण किया जाता है, तब उसके पोषक तत्त्व बहुत कम हो जाते हैं, मूल रूप से कई तरह के पोषक तत्त्व होने के बजाय अब सिर्फ थोड़ी मात्रा में रह जाते हैं। इसके अलावा, उसके प्रकार्य भी बदल जाते हैं। उदाहरण के लिए, एक खास तरह का खाद्य पदार्थ पहले दिमाग को पोषण देता था, शारीरिक ताकत बढ़ाता था और लोगों को जीवन-शक्ति देता था, लेकिन अब, अप्राकृतिक प्रसंस्करण से गुजरने के बाद, ये प्रकार्य बहुत कम हो गए हैं या पूरी तरह खत्म ही हो गए हैं। अगर कोई व्यक्ति ऐसा खाद्य पदार्थ बहुत ज्यादा मात्रा में खाता है, तो भी उसे शारीरिक थकान महसूस होती है, उसकी सोच धीमी हो जाती है और याददाश्त में गिरावट आ जाती है। हालाँकि वह बूढ़ा नहीं होता, लेकिन बूढ़े जैसा लगने लगता है। उसके पैरों में भारीपन महसूस होता है, शरीर अकड़ जाता है और त्वचा बूढ़ी लगने लगती है। वह शारीरिक रूप से बड़ा हो गया दिखता है, लेकिन अंदर से वह जैविक खाद्य पदार्थ खाने वालों से अलग महसूस करता है। अगर खाद्य पदार्थों के मूल प्रकार्य कमजोर पड़ जाते हैं या खत्म ही हो जाते हैं, तो खाए जाने के बाद वे लोगों के शरीर को न केवल कोई फायदा नहीं पहुँचाते, बल्कि उन पर कई बुरे असर भी डालते हैं। शरीर के लिए जरूरी विभिन्न पोषक तत्त्व समय पर नहीं मिल पाते, और साथ ही, शरीर के कई प्रकार्य धीरे-धीरे खराब होने लगते हैं और खत्म हो जाते हैं। प्राकृतिक नतीजे के तौर पर इस दुष्चक्र के कारण लोगों की सोच धीमी हो जाती है और उनमें कुछ चरम व्यवहार या विचार भी विकसित हो सकते हैं। ऐसी अभिव्यक्तियाँ गैर-जैविक खाद्य पदार्थों से लोगों पर पड़ने वाले कुछ बुरे असर और नतीजे हैं। गैर-जैविक खाद्य पदार्थ उन घटकों को खो चुके हैं, जो परमेश्वर द्वारा बनाए जाने के अनुसार उनमें होने चाहिए थे और वे अपना मूल प्रकार्य भी खो चुके हैं। वे परमेश्वर द्वारा सृजित और नियत मूल चीजों से अलग हैं। वे सब अप्राकृतिक तरीके से प्रसंस्करण करके बदल दिए गए हैं।

हालाँकि लोग मानवजाति की भोजन की माँग पूरी करने के लिए गैर-जैविक खाद्य पदार्थ सृजित करते हैं, लेकिन ऐसे खाद्य पदार्थ मनुष्य की सेहत और प्रजनन के लिए तमाम तरह के प्रतिकूल कारक पेश करते हैं, जो मानवजाति की वंश-वृद्धि और उत्तरजीविता पर असर डालते हैं। इसलिए, तुम्हें गैर-जैविक खाद्य पदार्थों का भेद पहचानना चाहिए। हजारों सालों से मानवजाति जैविक खाद्य पदार्थों का आनंद लेती आ रही है। हम क्यों कहते हैं कि जैविक खाद्य पदार्थ एक सकारात्मक चीज हैं, जबकि गैर-जैविक खाद्य पदार्थ एक नकारात्मक चीज हैं? सबसे बड़ा फर्क क्या है? मूल बिंदु क्या है? मूल बिंदु यह है कि जैविक खाद्य पदार्थ मानवजाति के लिए परमेश्वर तैयार करता है; वे परमेश्वर द्वारा नियत हैं। उनमें परमेश्वर के बनाए हुए मूल घटक और प्रकार्य होते हैं, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनमें वह जीवन-शक्ति होती है जो परमेश्वर ने उन्हें दी है, जबकि गैर-जैविक खाद्य पदार्थ वे मूल घटक और प्रकार्य खो चुके होते हैं और उनमें परमेश्वर का दिया हुआ जीवन भी नहीं होता। चूँकि उनमें परमेश्वर द्वारा नियत ये दो सबसे महत्वपूर्ण चीजें नहीं होतीं, इसलिए वे परमेश्वर द्वारा सृजित और नियत सकारात्मक चीजों के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं। गैर-जैविक भोजन एक ऐसी चीज है जिसका इंसानी विज्ञान ने प्रसंस्करण किया है, उसे नुकसान पहुँचाया है और बदल दिया है, और अब उसमें सकारात्मक चीज की विशेषताएँ नहीं हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनमें परमेश्वर द्वारा सृजित और नियत सकारात्मक चीजों के घटक और उनका सार नहीं है, और इसके बजाय वे परमेश्वर द्वारा सृजित और नियत सकारात्मक चीजों के प्रकार्यों और सार के खिलाफ जाते हैं। सकारात्मक चीजों के प्रकार्यों और सार के खिलाफ जाने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि जब परमेश्वर ने एक निश्चित बीज बनाया, तब उसका प्रकार्य मानवजाति के लिए था, वह मानवजाति की सेवा करने और उसे लाभ पहुँचाने के लिए था और मानवजाति की सामान्य शारीरिक जरूरतें पूरी करने और उत्तरजीविता कायम रखने के लिए था, जबकि गैर-जैविक खाद्य पदार्थ मानवजाति की सामान्य उत्तरजीविता को नुकसान पहुँचाते हैं और उसे बाधित करते हैं, और साथ ही लोगों के सामान्य जीवन और उत्तरजीविता के लिए कई ऐसे नकारात्मक प्रभाव और नतीजे लाते हैं जिन्हें पलटा नहीं जा सकता। इसलिए गैर-जैविक खाद्य पदार्थों को नकारात्मक चीज कहना बिल्कुल भी गलत नहीं है। है ना? (हाँ।) क्या यह मुद्दा अब स्पष्ट है? (हाँ।) जैविक खाद्य पदार्थ सकारात्मक चीज क्यों हैं, जबकि गैर-जैविक खाद्य पदार्थ नकारात्मक चीज हैं? मोटे तौर पर कहें तो, जैविक खाद्य पदार्थ परमेश्वर से आते हैं, मानवता को लाभ पहुँचाते हैं और उसकी सेवा करते हैं, और मनुष्य के जीवन और उत्तरजीविता में योगदान करते हैं; वे मनुष्य के जीवन और उत्तरजीविता के लिए ऐसा प्रकार्य करते हैं जो कोई नहीं कर सकता—वे जो भूमिका निभाते हैं उसे कोई नहीं निभा सकता। लेकिन क्या गैर-जैविक खाद्य पदार्थ मनुष्य की सेहत के लिए फायदेमंद हैं? (नहीं।) बिल्कुल उलटा : वे मनुष्य की सेहत के लिए फायदेमंद नहीं हैं; बल्कि वे मनुष्य की सेहत को नुकसान पहुँचाते हैं और मनुष्यों के भौतिक जीवन और उत्तरजीविता के लिए बहुत पीड़ा और परेशानी लाते हैं। उदाहरण के लिए, वे शरीर में कई तरह की दिक्कतें पैदा करते हैं, जैसे रक्त-संचार धीमा होना, अंगों में अकड़न होना, पैरों में भारीपन होना और चक्कर आना, और उनसे कई बीमारियाँ समय से पहले ही शुरू हो जाती हैं और भभक उठती हैं; लोगों की एलर्जी संबंधी प्रतिक्रियाएँ भी उत्तरोत्तर गंभीर होती जा रही हैं। विभिन्न स्तरों की प्रतिकूल प्रतिक्रियाएँ त्वचा से लेकर आंतरिक अंगों तक कई चीजों को प्रभावित करती हैं। ये वे विभिन्न परेशानियाँ और पीड़ाएँ हैं जो गैर-जैविक खाद्य पदार्थ मानवजाति के भौतिक जीवन और उत्तरजीविता के लिए लाते हैं। चूँकि मानव शरीर परमेश्वर ने बनाया है, इसलिए सिर्फ परमेश्वर ही उसकी संरचना और जरूरतें सर्वोत्तम ढंग से समझता है। इसलिए परमेश्वर ने मानव शरीर की संरचना और जरूरतों के आधार पर मानवजाति के लिए तमाम तरह के खाद्य पदार्थ बनाए। दक्षिण से उत्तर तक, पूरब से पश्चिम तक परमेश्वर ने विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ बनाए जो स्थानीय लोगों के जीवन और उत्तरजीविता के लिए हितकर हैं। परमेश्वर द्वारा बनाए गए सभी खाद्य पदार्थों के मूल रूप मनुष्य के जीवन और उत्तरजीविता के लिए जरूरी भोजन-स्रोत उपलब्ध कराने के लिए हैं; मनुष्यों के भौतिक जीवन और उत्तरजीविता के लिए वे सब जरूरी हैं। यानी, व्यक्ति के शरीर को जीना और बने रहना है तो यह परमेश्वर द्वारा सृजित इन पौधों के बिना नहीं हो सकता। जब तक ये पौधे और बीज परमेश्वर से आते हैं, तब तक वे अपने मूल रूप में होते हैं, उनमें परमेश्वर द्वारा सृजित जरूरी प्रकार्य और घटक होते हैं, साथ ही उनमें परमेश्वर द्वारा दी गई जीवन-शक्ति भी होती है। बीज चाहे कहीं भी हो—भले ही वह चट्टानों की दरारों में गिर जाए जहाँ मिट्टी नहीं होती—अगर उसमें जीवन-शक्ति है तो वह सामान्य रूप से अंकुरित हो सकता है, बढ़ सकता है और पक सकता है और, और ज्यादा बीज पैदा कर सकता है। केवल इसी तरह के ज्यादा व्यापक परिवेश में, जहाँ सभी चीजें प्रजनन करती हैं और जीवित रहती हैं, लोग अपने शरीर के लिए भोजन का स्रोत पा सकते हैं, लगातार विभिन्न गतिविधियों में संलग्न हो सकते हैं और प्रजनन कर सकते हैं और जीते रह सकते हैं। अगर विभिन्न पौधे और बीज परमेश्वर द्वारा सृजित अपने मूल प्रकार्य खो देते हैं, तो यह मानवजाति को भोजन से वंचित करने और मानवजाति का भोजन-स्रोत छीन लेने के बराबर है। भले ही लोग कुछ ऐसे खाद्य पदार्थ बना लें और पैदा कर लें जो अपने मूल रूप में नहीं हैं और जो अस्थायी रूप से उनकी भूख मिटा सकते हैं, फिर भी चूँकि प्रसंस्करण से गुजरने के बाद खाद्य पदार्थों के मूल रूप बदल जाते हैं और वे अपने मूल प्रकार्य छोड़ देते हैं, इसलिए उन्हें खाने के बाद लोगों के भौतिक प्रकार्य और इंद्रिय अनुभूतियाँ भी तदनुसार बदल जाती हैं। समय के साथ लोगों के शरीर भी कुछ प्रतिकूल प्रतिक्रियाएँ अनुभव करेंगे; उन्हें कुछ बीमारियाँ और पीड़ाएँ हो जाएँगी, और इसके कुछ गंभीर नतीजे तक हो सकते हैं। यह मानवजाति के लिए खाद्य पदार्थ बनाने के पीछे परमेश्वर के मूल इरादे के खिलाफ है और यह उत्तरजीविता के उन कानूनों और नियमों के भी खिलाफ है जो परमेश्वर ने मानवजाति के लिए नियत किए थे। इसलिए, चाहे तुम इसे कैसे भी देखो, अगर कोई चीज किसी जीवित चीज के सृजन के पीछे परमेश्वर के मूल इरादे और परमेश्वर द्वारा नियत कानूनों और नियमों के खिलाफ जाती है, तो उसने वह प्रकार्य जिसके साथ परमेश्वर ने उसे बनाया था और वह भूमिका जो उसे निभानी चाहिए, साथ ही वह जीवन-शक्ति जो परमेश्वर ने उसे दी थी, खो दी है और इसलिए उसका सार बदल गया है। गैर-जैविक खाद्य पदार्थों का उद्भव खाद्य पदार्थों के सृजन के पीछे परमेश्वर के मूल इरादे के खिलाफ है; जब वैज्ञानिक खाद्य पदार्थों के बीजों का वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्करण करते हैं और उन्हें बदलते हैं, तब इससे खाद्य पदार्थों का सार बदल जाता है। इस तरह, गैर-जैविक खाद्य पदार्थ एक नकारात्मक चीज हैं। भले ही उनका रंग-रूप ज्यादा जीवंत और सुंदर हो जाए या वे आकार में बड़े हो जाएँ या उनकी मात्रा बढ़ जाए—चाहे वे कैसे भी बदलें, अगर वे उनके सृजन के पीछे परमेश्वर के मूल इरादे के खिलाफ जाते हैं और परमेश्वर द्वारा दिए गए अपने प्रकार्य और जीवन-शक्ति खो देते हैं, तो वे एक नकारात्मक चीज हैं। यह बिना किसी संदेह के निश्चित है। चाहे वह कुछ भी हो, और चाहे उसका उद्भव किसी भी समय या किसी के भी करने से सामने आया हो, अगर उसे परमेश्वर ने सृजित या नियत नहीं किया, बल्कि वह परमेश्वर के सृजन और विधान के खिलाफ जाता है, तो वह एक नकारात्मक चीज है। क्या यह मामला अब स्पष्ट है? (हाँ।)

अब जबकि गैर-जैविक खाद्य पदार्थों के नकारात्मक होने के मामले पर स्पष्ट रूप से संगति की जा चुकी है, तो एक और मुद्दा है जिस पर संगति करने की जरूरत है। कुछ लोग पूछते हैं, “चूँकि गैर-जैविक खाद्य पदार्थ नकारात्मक चीजें हैं जो परमेश्वर के सृजन और विधान के खिलाफ हैं, तो हमें उनके साथ कैसे पेश आना चाहिए? क्या हमें उन्हें खाना चाहिए? क्या हमें उन्हें नहीं खाना चाहिए या सिर्फ थोड़ी मात्रा में खाना चाहिए? अभ्यास का सही तरीका क्या है?” तुममें से कुछ लोगों ने अभी बताया, “आज समाज में ज्यादातर खाद्य पदार्थ गैर-जैविक हैं और अगर तुम जैविक खाद्य पदार्थ खरीदना चाहो तो वे आसानी से नहीं मिलते—कुछ देशों और इलाकों में तो तुम उन्हें ज्यादा कीमत देकर भी नहीं खरीद सकते। भले ही हम जैविक खाद्य पदार्थों के फायदे और गैर-जैविक खाद्य पदार्थों के नुकसान जानते हों, फिर भी हम कर ही क्या सकते हैं?” व्यापक परिवेश ऐसा ही है। यह शैतान की दुनिया है और यह लोगों को परमेश्वर द्वारा सृजित जीवन-शक्ति से संपन्न खाद्य पदार्थ खाने से रोकती है। कुछ लोग कहते हैं, “हम जानते हैं कि गैर-जैविक खाद्य पदार्थ हमारे शरीर के लिए हानिकारक हैं, लेकिन हमारे पास जैविक खाद्य पदार्थ खाने के लिए संसाधन नहीं हैं। हमें क्या करना चाहिए? क्या हमें भूखे मर जाना चाहिए?” तुम भूखे नहीं मर सकते। जीने के लिए तुम्हें अभी भी गैर-जैविक खाद्य पदार्थ खाने होंगे। भले ही उन्हें खाना शरीर के लिए हानिकारक हो, फिर भी यह भूखे मरने से बेहतर है। भले ही तुम ऐसी मुश्किल के साथ जीते रहो, जब तक तुम मरते नहीं और अपना कर्तव्य निभा सकते हो, आखिरी पल तक डटे रहते हो और बीमार होने पर भी उद्धार पा लेते हो, तो तुमने इस दुनिया पर विजय हासिल कर ली है और शैतान को जीत लिया है। दूसरे लोग कहते हैं, “चूँकि गैर-जैविक खाद्य पदार्थ लोगों के लिए बहुत हानिकारक हैं और उनके प्रभाव पलटे नहीं जा सकते, इसलिए मैं उन्हें बिल्कुल नहीं खाऊँगा। मैं अपने आँगन में कुछ जैविक खाद्य पदार्थ उगाने का तरीका ढूँढूँगा।” अगर तुम्हारे पास साधन हैं, तो बेशक यह अच्छा है। लेकिन अगर तुम्हारे घर में आँगन न हो और तुम सब्जियाँ और अनाज न उगा सको, और तुम एक साधारण व्यक्ति हो जो जैविक खाद्य पदार्थ नहीं खरीद सकता, तो? तो तुम सिर्फ गैर-जैविक खाद्य पदार्थ ही खा सकते हो। कुछ लोग कहते हैं, “अगर मैं गैर-जैविक खाद्य पदार्थ खाता हूँ, तो मैं कम से कम कुछ साल तो जिंदा रहूँगा और जल्दी नहीं मरूँगा। अगर मुझे इससे कुछ अजीब बीमारियाँ हो जाएँ, तो भी इस बारे में कुछ नहीं किया जा सकता।” क्या तुम लोग तमाम तरह की अजीब बीमारियाँ होने और अपना जीवन-काल छोटा होने से डरते हो? (हाँ।) इस बारे में क्या किया जाना चाहिए? कुछ लोग कहते हैं, “तब हम बस आख़िरी विकल्प ही अपना सकते हैं—जो मिल सके, उसी से काम चला लें। जिंदा रहने के लिए हमारे पास गैर-जैविक खाद्य पदार्थ खाने के अलावा कोई और चारा नहीं है।” क्या यह सिद्धांत सही है? (हाँ।) क्या यह वाकई सही है? तुम लोग यह भेद नहीं पहचान सकते कि यह सही है या गलत। क्या यह जो मिल सके, उसी में काम चलाना और कोई दूसरा चारा न होना है? यह जो मिल सके, उसी में काम चलाना नहीं है, न ही कोई और चारा नहीं होना है। बल्कि यह आस्था से जीना है। क्या परमेश्वर के वचनों से एक पंक्ति नहीं है? “जब तक तुम्हारी एक भी साँस बाकी है, परमेश्वर तुम्हें मरने नहीं देगा।” लोगों का जीवन परमेश्वर के हाथों में है। कोई व्यक्ति कितने समय तक जीता है और उसकी शारीरिक स्थिति परमेश्वर के विधान पर निर्भर है, इस पर नहीं कि वह क्या खाता है। लोगों के लिए गैर-जैविक खाद्य पदार्थों के बारे में सही विचार और दृष्टिकोण रखना और उनका भेद पहचानना ही काफी है। लेकिन लोगों को मौजूदा वस्तुनिष्ठ परिवेश के साथ सही तरीके से पेश आना चाहिए। अगर तुम्हारे पास अपना भोजन उगाने के लिए वित्तीय साधन या परिवेशगत स्थितियाँ नहीं हैं, तो जो उपलब्ध है वही खाओ। तो क्या तुम बीमार पड़ने या मरने के बारे में चिंता करोगे? चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। क्यों? हमारे दिलों में हमारे सहारे और आधार के रूप में परमेश्वर के वचनों का सत्य है : “मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा,” और “जब तक तुम्हारी एक भी साँस बाकी है, परमेश्वर तुम्हें मरने नहीं देगा।” व्यक्ति का जीवन, शारीरिक स्थिति और उम्र, सब परमेश्वर के हाथों में है। कोई व्यक्ति बीमार पड़ता है या नहीं, कब बीमार पड़ता है और कब मरता है—यह सब परमेश्वर के हाथों में है। चिंता करने या डरने की कोई जरूरत नहीं है। अगर तुम्हें जैविक खाद्य पदार्थ नहीं मिल सकते और तुम सिर्फ गैर-जैविक खाद्य पदार्थ ही खा सकते हो, तो शांति से वही खाओ। जो कुछ उपलब्ध है वही खाओ। कुछ लोग कहते हैं, “अगर तुमने कहा कि गैर-जैविक खाद्य पदार्थ एक नकारात्मक चीज हैं, तो तुम हमें उन्हें शांति से खाने के लिए क्यों कह रहे हो?” अगर तुम खाओगे नहीं तो जी कैसे पाओगे? अगर तुम बहुत थोड़ा खाते हो, तो क्या तुम्हारे शरीर को वास्तव में वह सब मिल सकता है जिसकी उसे जरूरत है? गैर-विश्वासी अब यह भी कहते हैं कि गैर-जैविक खाद्य पदार्थ जैविक खाद्य पदार्थों से बहुत कम पौष्टिक होते हैं; भले ही तुम बहुत ज्यादा खाओ, लेकिन उनसे ज्यादा पोषण नहीं मिलता। यह भी एक तथ्य है। एक बिंदु और है जो वे नहीं जानते : जैविक खाद्य पदार्थों में पोषण-घटकों का अनुपात सही होता है। खाए जाने के बाद वे अच्छा स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए तुम्हारे शरीर को कई पोषक तत्व उत्पन्न करने में मदद करेंगे, रक्त-संचार बढ़ाएँगे और तुम्हारे अंदर अपने मूल प्रकार्य करेंगे। लेकिन गैर-जैविक खाद्य पदार्थों में पोषण-घटकों की कमी होती है, इसलिए तुम्हारा शरीर अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए पोषक-तत्वों का संश्लेषण करने में उनका इस्तेमाल नहीं कर सकता। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गैर-जैविक खाद्य पदार्थों में जीवन-शक्ति नहीं होती और उनमें कई पोषण-घटकों का अभाव होता है; वे तुम्हें स्वस्थ नहीं बना सकते। दस-बीस साल उन्हें खाने के बाद लोगों को तरह-तरह के रोग और अजीब बीमारियाँ हो जाएँगी, और कुछ लोग बच्चे पैदा करने की क्षमता तक खो देंगे। ऐसे नतीजे बहुत गंभीर होते हैं। इसीलिए कुछ लोगों को लगता है, “मैंने बहुत सारा भोजन और सब्जियाँ खाई हैं, इसलिए मुझमें पोषण की कमी नहीं होनी चाहिए। लेकिन मुझे पूरे शरीर में कमजोरी क्यों महसूस होती है?” जैविक और गैर-जैविक खाद्य पदार्थों में यही फर्क है; असल में तुमने इसे पहले ही महसूस कर लिया है। तुम्हें यह एहसास क्यों होता है? वह इसलिए कि गैर-जैविक खाद्य पदार्थों में कोई जीवन-शक्ति नहीं होती। तुम उन्हें बहुत मात्रा में खाते हो, लेकिन उनसे ज्यादा पोषण नहीं मिलता, इसलिए तुम शारीरिक रूप से कमजोर और ऊर्जाहीन महसूस करते हो। लेकिन फिर भी तुम्हें खाना तो पड़ेगा ही; अगर तुम नहीं खाओगे, तो तुम भूखे रहोगे और काम नहीं कर पाओगे या जिंदा नहीं रह पाओगे। लोगों को मूर्खतापूर्ण चीजें नहीं करनी चाहिए, न ही उन्हें अतियों पर जाना चाहिए। उन्हें हर चीज परमेश्वर के वचनों के अनुसार लेनी चाहिए और सभी चीजों में सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए। लोगों को यह चीज स्पष्ट होनी चाहिए और उन्हें इसे समझना चाहिए। संक्षेप में, इन सबका निचोड़ यह निकलता है कि लोगों को गैर-जैविक खाद्य पदार्थों के साथ कैसे पेश आना चाहिए। गैर-जैविक खाद्य पदार्थों से होने वाले नकारात्मक प्रभाव और उसके बाद के असर समझने के बाद, लोगों को उनसे बेबस नहीं होना चाहिए, न ही उन्हें चिंता करनी चाहिए या डरना चाहिए, क्योंकि सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है। लोगों का जीवन और उनके बारे में हर चीज परमेश्वर के हाथों में है, परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अधीन है। है ना? (हाँ।) अगर तुम इसे इस तरह समझते हो, तो तुम्हारे विचार और दृष्टिकोण सही हैं। यह सब सुनने के बाद, क्या तुम लोगों के दिल उज्ज्वल और मुक्त महसूस करते हैं? (हाँ।) यह एक असल जिंदगी का मुद्दा है जिसे लोगों को देखना चाहिए। अगर तुम इस मामले की असलियत नहीं जान सकते, तो तुम बहुत मूर्ख हो। गैर-जैविक खाद्य पदार्थ खाना है या नहीं, इस बारे में हमने अभी अभ्यास के कई सिद्धांतों पर चर्चा की। तुम्हें अपने वस्तुनिष्ठ परिवेश और वास्तविक स्थितियों के आधार पर इसके साथ तदनुसार ही पेश आना चाहिए। संक्षेप में, तुम्हें सभी चीजों को परमेश्वर के वचनों के अनुसार देखना चाहिए और तुम्हें परमेश्वर के वचनों के अनुसार ही क्रियाकलाप भी करने चाहिए। जब तक तुम्हारा मकसद अपनी सामान्य भौतिक उत्तरजीविता और प्रकार्य सुनिश्चित करना है ताकि तुम अपना कर्तव्य सामान्य रूप से निभा सको, परमेश्वर का अनुगमन करने के मार्ग से भटक न सको, और अपना कर्तव्य निभा सको और सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चल सको, तब तक तुम जो कर रहे हो वह सही है। यह इस पहलू पर हमारी संगति की विषयवस्तु है कि परमेश्वर क्या नियत करता है।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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