सत्य का अनुसरण कैसे करें (18) भाग चार

हमने इस पहलू पर संगति करने के लिए कि परमेश्वर क्या नियत करता है, दो उदाहरणों का इस्तेमाल किया है। क्या यह मूल रूप से साफ-साफ समझा दिया गया है? (हाँ।) तो, क्या तुम लोग सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बीच फर्क कर सकते हो? क्या तुम सत्य के इस पहलू का इस्तेमाल उन विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों का मूल्यांकन करने के लिए कर सकते हो जिनका तुम सामना करते हो? अगर हमने इन दो उदाहरणों पर संगति नहीं की होती, तो क्या तुम लोग उन्हें मापने के लिए, जिन सकारात्मक चीजों को हमने आज परिभाषित किया है उनसे संबंधित सत्य के इस पहलू को लागू कर पाते? (मैं शायद आसान चीजों का भेद पहचान पाता, लेकिन मैं वे दो अपेक्षाकृत जटिल उदाहरण नहीं समझ पाता जिनके बारे में परमेश्वर ने बताया।) यह अच्छी बात है कि हमने इस पर संगति की, वरना तुम लोग सेब-नाशपाती जैसा स्वादिष्ट भोजन खाने से चूक जाते, है ना? (हाँ।) कुछ लोग जो नियमों का पालन करने में ज्यादा प्रवृत्त होते हैं, सेब-नाशपाती देखकर उसे खाना तो चाहते हैं, लेकिन यह सोचकर हिम्मत नहीं करते कि इसे खाने से परमेश्वर द्वारा नियत सिद्धांतों का उल्लंघन होगा और यह परमेश्वर के वचनों के खिलाफ होगा, इसलिए वे खुद को रोक लेते हैं और उसे नहीं खाते, और नतीजतन, वे इस स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ को खाने के बहुत सारे मौके चूक जाते हैं। लेकिन भेद पहचानने की क्षमता के अभाव में वे कुछ स्पष्टतया नकारात्मक चीजों की बहुत तारीफ करते हैं और उनका गहराई से अनुमोदन करते हैं और उन्हें अपने दिलों में स्वीकारते हैं। गैर-जैविक खाद्य पदार्थों के बारे में वे यह तक सोचते हैं, “गैर-जैविक खाद्य पदार्थ मानवजाति की भोजन की माँग बहुत हद तक पूरी करते हैं, और साथ ही, वे भूख से होने वाली मौतें कम करने में भी मदद कर सकते हैं। यह वाकई मानव विकास के इतिहास में मानवजाति के प्रति विज्ञान का एक बहुत बड़ा योगदान है! यह वास्तव में परमेश्वर द्वारा किया गया है; यह परमेश्वर ही है जिसने इस मामले को बढ़ावा दिया है।” इतना सरल कथन एक तथ्य उजागर करता है। कौन-सा तथ्य? यही कि तुम सत्य नहीं समझते। यह गौण है; यहाँ एक और भी ज्यादा गंभीर समस्या है, जो यह है कि तुमने ऐसे शब्द कहे हैं जो परमेश्वर के प्रति घोर विद्रोही और ईशनिंदात्मक हैं, और इससे परमेश्वर को घृणा और जुगुप्सा महसूस होती है। अगर ऐसी समस्या इतनी गंभीर हो जाती है कि तुम परमेश्वर के इरादों के खिलाफ जाते हो और जानबूझकर परमेश्वर का विरोध और उसकी निंदा करते हो, तो तुम अपने उद्धार की उम्मीद खो सकते हो और यह तुम्हारे गंतव्य पर बुरा असर डालेगा। इसलिए, सत्य समझना बहुत महत्वपूर्ण है। अगर हमने अपनी संगति में उदाहरणों का इस्तेमाल नहीं किया होता, तो तुममें से कुछ लोग शायद सोचते, “गैर-जैविक खाद्य पदार्थ वैज्ञानिक अनुसंधान का नतीजा हैं और विज्ञान का विकास मानवजाति के लिए योगदान देता है, इसलिए इस योगदान के परमेश्वर द्वारा नियत होने की ज्यादा संभावना है, इसके परमेश्वर द्वारा आयोजित होने की ज्यादा संभावना है।” इस तरह से संगति करने के बाद, क्या अब यह स्पष्ट है? क्या यह कथन सही है? (नहीं।) क्या व्यक्ति को चीजें इसी तरह समझनी चाहिए? (नहीं।) अगर कोई व्यक्ति यह कहता है, तो वह मुसीबत में है; यह घोर विद्रोह है! इससे पहले कि तुम्हें यह स्पष्ट समझ आ जाए कि चीजें असल में क्या हैं और उनका सार क्या है, उन्हें जल्दबाजी में परिभाषित मत करो, और उन चीजों को आसानी से स्वीकार या पसंद मत करो जिनका वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्करण किया गया हो। खासकर उन चीजों के संबंध में तुम्हें सख्ती से सावधान रहना चाहिए जो बुरी प्रवृत्तियों में पूजनीय और लोकप्रिय हैं और ज्यादातर लोगों को पसंद हैं—परमेश्वर के वचनों और सत्य के अनुसार उनका भेद पहचानो और उन्हें बिल्कुल भी स्वीकार मत करो। कुछ लोग कहते हैं, “हमारी काबिलियत कम है। जब हम देखते हैं कि ऑनलाइन तरह-तरह की जानकारियाँ फैल रही हैं, तो हमें लगता है कि यह एक सामाजिक प्रवृत्ति है और गलत नहीं हो सकती। इसे देखने के बाद हमारे दिलों पर इसका असर पड़ता है। अगर हम शून्य में रहते, तो हम गुमराह न होते।” क्या यह कथन सही है? (नहीं।) तुम असली दुनिया में, वर्तमान समाज में रहते हो, और तुम अनिवार्य रूप से कई अजीब आवाजें और अजीब कहावतें और सिद्धांत सुनोगे। ये तर्क अनिवार्य रूप से तुम्हारे दिलों में प्रवेश करेंगे, जहाँ वे असर डालेंगे और तुम्हारे विचार बदल देंगे। लोग सोचते हैं कि जब तक वे इस समाज में रहते हैं, जब तक वे लोगों के बीच रहते हैं, तब तक वे न चाहते हुए भी प्रभावित होंगे, जब तक कि वे पहाड़ों और जंगलों में गहराई में न रहें या खुद को एक छोटे-से कमरे में बंद न कर लें, इन चीजों के बारे में न तो सुनें, न देखें और न ही सोचें, उस स्थिति में ही उनके दिल साफ रहेंगे। क्या यह दृष्टिकोण सही है? (नहीं।) जाहिर है, नहीं। तो यह समस्या कैसे हल की जा सकती है? तुम्हें सत्य का अनुसरण करना चाहिए और सत्य समझना चाहिए। अगर तुम्हें सत्य के सभी पहलुओं की स्पष्ट समझ है, तो इन चीजों का सामना करने पर तुम्हें पता चल जाएगा कि उनका अंतर्निहित सार क्या है। तुम जल्दी से सकारात्मक या नकारात्मक चीजों के रूप में उनका भेद पहचान पाओगे और उन्हें परिभाषित कर पाओगे, और—जमीर और विवेक होने के आधार पर—तुम जल्दी से सकारात्मक चीजों को स्वीकार लोगे और नकारात्मक चीजों का विरोध करोगे या उन्हें अस्वीकार कर दोगे, उनकी आलोचना करोगे और उनकी निंदा करोगे। इस तरह, तुम सुरक्षित रहोगे और असहाय महसूस नहीं करोगे, और न ही तुम्हें इतना चिंतित होने या डरा हुआ महसूस करने की जरूरत होगी। क्यों? क्योंकि परमेश्वर के वचनों को अपना आधार बनाने से तुममें सकारात्मक और नकारात्मक चीजों का भेद पहचानने की मूलभूत क्षमता होगी, विभिन्न सकारात्मक और नकारात्मक चीजों पर तुम्हारे विचार और मत परमेश्वर के वचनों पर आधारित होंगे, और तुम यह तय कर पाओगे कि वे सकारात्मक चीजें हैं या नकारात्मक; इसलिए यह मामला कि तुम्हें क्या करना चाहिए, बहुत आसान होगा। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ, है।)

क्या तुम लोग समझते हो कि हमने अभी-अभी किस बारे में संगति की? अगर हमने इस पर इस तरह से संगति नहीं की होती, तो क्या तुम लोग इसे समझ पाते? (नहीं।) तो अगर तुम कुछ और साल अनुभव करो, तो क्या तुम सकारात्मक और नकारात्मक चीजों का भेद पहचान पाओगे? (सत्य के बिना हम इन चीजों का भेद नहीं पहचान सकते; कभी-कभी तो हम नकारात्मक चीजों की सराहना और समर्थन तक कर देते हैं। इसलिए, ऐसा नहीं है कि ज्यादा वर्षों का अनुभव होने से हम भेद पहचानने में समर्थ हो जाते हैं।) क्या इन मामलों में रहस्य शामिल हैं? (नहीं, इनमें रहस्य शामिल नहीं हैं।) अगर इनमें रहस्य शामिल नहीं हैं, तो लोग इन्हें समझते क्यों नहीं हैं? क्या ये बाहरी मामले हैं? (हाँ।) अगर ये सिर्फ बाहरी मामले होते, तो इन्हें समझना आसान होना चाहिए था, लेकिन असल में, इन मामलों में कुछ सत्य और विभिन्न चीजों के बारे में लोगों के दृष्टिकोण भी शामिल हैं। जब किसी चीज में चीजों के बारे में दृष्टिकोण, और मुद्दों का सार और प्रकृति शामिल होती है तो उसमें सत्य शामिल होता है और जब उसमें सत्य शामिल होता है तो तुम लोग उसकी असलियत नहीं जान सकते और भ्रमित हो जाते हो। तो, क्या तुम लोगों को लगता है कि इस तरह से संगति करना जरूरी है? (हाँ, लगता है।) उम्मीद है, इस संगति को सुनने के बाद तुम अपना ध्यान केवल मामलों पर केंद्रित नहीं करोगे या विनियमों का पालन करना नहीं सीखोगे, बल्कि संगति के जरिये तुम सत्य और परमेश्वर के इरादे समझ पाओगे, सकारात्मक और नकारात्मक चीजें क्या हैं इसका भेद पहचान पाओगे और सत्य के संदर्भ में प्रगति करोगे और चीजों का भेद पहचानने की तुम्हारी क्षमता सुधरेगी। इसका मतलब होगा कि तुमने कुछ हासिल किया है। सकारात्मक चीज़ों के बारे में—हर वह चीज़ जो परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन आने वाली चीज़ों के दायरे में आती है—क्या तुम लोग हमारे द्वारा पहले दो विशेष उदाहरण दिए जाने के बाद अब उन सभी का भेद पहचानने में समर्थ हो? या ऐसा है कि तुम सिर्फ एक ही तरह की चीजों का भेद पहचान सकते हो और अभी भी उन चीजों का भेद पहचानने में असमर्थ हो जो इन दो उदाहरणों से अलग हैं? (मैं शायद कुछ हद तक एक ही तरह की चीजों का भेद पहचान सकता हूँ, और उन विभिन्न चीजों का भी जो अपेक्षाकृत सरल हैं, लेकिन मैं अभी भी उन चीजों का भेद स्पष्ट रूप से नहीं पहचान सकता जो बहुत जटिल हैं।) यह एक तथ्य है, है ना? अगर तुम अभी भी भेद नहीं पहचान सकते, तो तुम लोगों को एक सिद्धांत समझना चाहिए। पहले, यह देखो कि क्या कोई खास चीज उस प्रकार्य के खिलाफ जाती है जो परमेश्वर द्वारा सृजित किए अनुसार उसका प्रकार्य होना चाहिए या क्या वह अपने अस्तित्व के उस महत्व के खिलाफ जाती है जो परमेश्वर ने नियत किया था; देखो कि क्या वह इस पहलू के खिलाफ जाती है। अगर जाती है, तो वह एक नकारात्मक चीज है। अगर वह परमेश्वर के सृजन और विधान के खिलाफ नहीं जाती, लेकिन उसके अस्तित्व के रूप और उसके अस्तित्व के मूल्य के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि उसका लोगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है या नकारात्मक—वह लोगों के जीवन में सिर्फ कुछ मकसद पूरे करती है और कुछ सुविधा देती है, कुछ फायदे देती है लेकिन कोई नुकसान नहीं पहुँचाती, मतलब वह परमेश्वर द्वारा सृजित मानवजाति की उत्तरजीविता के रूप और उसके सामान्य जीवन को नष्ट नहीं करती या उसमें बाधा नहीं डालती, न ही वह कोई प्रतिकूल नतीजे लाती है, और उसका अस्तित्व मानवजाति के लिए सार्थक नहीं माना जा सकता और लोग उसके बिना भी ठीक से रह सकते हैं—तो उसे सकारात्मक या नकारात्मक चीज नहीं माना जा सकता। वह उस श्रेणी में नहीं आती; वह सिर्फ एक तरह की चीज या पदार्थ है, इसलिए हम उसे सकारात्मक या नकारात्मक के रूप में परिभाषित नहीं करेंगे। उदाहरण के लिए, घोड़ा-गाड़ी परिवहन का एक साधन है। उसे घोड़ा खींचता है, जो परमेश्वर द्वारा सृजित और नियत एक जीवित प्राणी है। घोड़े द्वारा खींची जाने वाली गाड़ी मनुष्य द्वारा निर्मित है, परमेश्वर द्वारा सृजित नहीं; वह मनुष्य द्वारा परमेश्वर की दी हुई उत्तरजीविता की क्षमता से बनाया गया एक उपकरण है। वह सामान ढो सकती है और लोगों को विभिन्न जगहों पर ले जा सकती है, जिससे लोगों की जिंदगी और यात्रा ज्यादा सुविधाजनक हो जाती है। तो, क्या तुम लोगों को लगता है कि मनुष्य-निर्मित घोड़ा-गाड़ी सकारात्मक चीज है या नकारात्मक? क्या घोड़ा-गाड़ी में ऊर्जा की खपत होती है? क्या वह धुआँ छोड़ती है और हवा को प्रदूषित करती है? (नहीं।) घोड़ा-गाड़ी लोगों के जीवन और उत्तरजीविता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालती, और वह लोगों का जीवन थोड़ा और सुविधाजनक भी बनाती है। लेकिन अगर वह न होती, तो लोग पैदल भी यात्रा कर सकते थे जो बस थोड़ी धीमी होती; ऐसा नहीं है कि लोग उसके बिना जीवित नहीं रह पाते। यह ऐसी चीज है जो अनिवार्य नहीं है। तो, क्या यह चीज सकारात्मक चीज है या नकारात्मक? (मेरी समझ से यह नकारात्मक चीज नहीं है, लेकिन यह सकारात्मक चीज भी नहीं है; इसे सकारात्मक या नकारात्मक नहीं कहा जा सकता।) यह मनुष्य के हाथों से बनी है और इसे सकारात्मक या नकारात्मक नहीं कहा जा सकता। अगर तुम इस बात पर चर्चा करो कि घोड़ा-गाड़ी सकारात्मक चीज है या नकारात्मक, तो यह तिल का ताड़ बनाने और बाल की खाल निकालने जैसा होगा।

कुछ लोग कहते हैं, “पेड़ परमेश्वर द्वारा सृजित और नियत हैं और उनके उत्तरजीविता के नियम और अस्तित्व के स्वरूप परमेश्वर से आते हैं, इसलिए वे सकारात्मक चीजें हैं। तो, अगर कोई पेड़ काट दिया जाता है और उसे लकड़ी में संसाधित कर दिया जाता है, तो वह सकारात्मक चीज है या नकारात्मक?” लकड़ियाँ मनुष्य की रोजमर्रा की जरूरतों के लिए कुछ सुविधाएँ प्रदान करती हैं, जैसे कि इनका इस्तेमाल मेज-कुर्सियों जैसे विभिन्न प्रकार के फर्नीचर बनाने में किया जाता है और उसे खाना पकाने के लिए जलाया भी जा सकता है। यह एक पौधे से एक चीज में रूपांतरित हो जाता है। यह सकारात्मक चीज है या नकारात्मक? (इसे न तो सकारात्मक कहा जा सकता है और न ही नकारात्मक।) यह सही है, अब तुम समझते हो, तुम समझ गए हो। केवल वही चीजें सकारात्मक चीजें हैं जो इस सिद्धांत—परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन—के दायरे में आती हैं। जो भी चीज इस सिद्धांत का उल्लंघन करती है, वह एक नकारात्मक चीज है। इन दो श्रेणियों से बाहर की चीजों के बारे में अगर तुम चर्चा करते हो कि वे सकारात्मक हैं या नकारात्मक, तो यह मूल रूप से ऐसा है जैसे तुम बाल की खाल निकाल रहे हो, तिल का ताड़ बना रहे हो और अपने सही काम पर ध्यान नहीं दे रहे हो। उदाहरण के लिए, कुछ लोग पूछते हैं, “इंसानों द्वारा बनाए गए परदे सकारात्मक चीज हैं या नकारात्मक?” कुछ लोग कहते हैं, “यह कपड़े के स्रोत पर निर्भर करता है। अगर परदे बिना रँगाई या ब्लीचिंग के और बिना कोई रसायन मिलाए, संसाधित कच्चे कपास से बने हैं, तो वह सकारात्मक चीज है। अगर उन्हें रँगा गया है, ब्लीच किया गया है और उन पर छपाई की गई है या उनमें कुछ रसायन मिलाए गए हैं, तो वे नकारात्मक चीज हैं। नकारात्मक चीजें वे हैं जिन्हें हमें हटा और ठुकरा देना चाहिए, इसलिए हम उनका इस्तेमाल नहीं कर सकते। केवल इसी तरह हम परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों का पालन कर रहे होते हैं और सकारात्मक चीजों और सत्य से प्रेम करने वाले लोग बन रहे होते हैं। इसलिए हम हर उस चीज की निंदा करते हैं जो कपास का उत्पाद नहीं है और हम हर उस चीज की निंदा करते हैं जो प्राकृतिक स्रोत से नहीं आती।” वे कौन-सी चीजें हैं जो प्राकृतिक स्रोत से आती हैं? कपास, रेशम और लिनन भी। इन व्यक्तियों के मतानुसार, इन कुछ चीजों के अलावा और कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे लोग पहन सकें—अगर तुम सिद्धांतों का उल्लंघन करने से बचना चाहते हो और सकारात्मक चीजों से प्रेम करने और नकारात्मक चीजें अस्वीकार करने में समर्थ होना चाहते हो, तो तुम्हें ये चीजें ही पहननी चाहिए, क्योंकि केवल यही चीजें परमेश्वर द्वारा सृजित अपने मूल रूप में हैं। क्या यह दृष्टिकोण सही है? (नहीं।) कुछ लोग कहेंगे, “तो इस दृष्टिकोण के अनुसार जो कोई भी वैज्ञानिक तरीके से संसाधित कपड़े पहनता है, वह सकारात्मक चीजों से प्रेम करने वाला व्यक्ति नहीं है, वह सत्य का अभ्यास करने वाला व्यक्ति नहीं है, बल्कि वह भेद पहचानने की क्षमता से रहित और सिद्धांतों से रहित व्यक्ति है, एक ऐसा व्यक्ति जो अत्यधिक विद्रोही है और जिससे परमेश्वर नफरत करता है, और ऐसा व्यक्ति खत्म है!” क्या यह कथन सही है? (नहीं, यह तिल का ताड़ बनाना है।) ऐसे लोगों के शब्दों के पीछे गुप्त अभिप्राय होते हैं और वे दूसरों की निंदा तक कर सकते हैं, बात का बतंगड़ बना सकते हैं। वे किस तरह के लोग हैं? (ऐसे लोग जो नियमों का पालन करते हैं और जिन्हें कोई आध्यात्मिक समझ नहीं होती।) वे बेतुके लोग हैं, बेतुके प्रकार के। ये पाखंड और भ्रांतियाँ व्यक्त करके वे तिल का ताड़ बना देते हैं और मौजूदा विषयों का इस्तेमाल करके अपनी राय जाहिर करते हैं। उनके मन इन पाखंडों और भ्रांतियों से भरे रहते हैं और वे इन्हें लगातार उगलते रहते हैं, लेकिन जब तुम उनसे सत्य से जुड़ी किसी चीज पर संगति करने के लिए कहते हो, तो उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं होता। जब तुम उनसे इस बात पर संगति करने के लिए कहते हो कि सकारात्मक चीजें क्या हैं, तो वे ये पाखंड और भ्रांतियाँ बोलते हैं। क्या तुम्हें यह घिनौना नहीं लगता? बहुत-सी चीजें परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन स्थित सकारात्मक चीजों से जुड़ी नहीं होतीं। सच पूछो तो, वे परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन वाले सिद्धांत का उल्लंघन नहीं करतीं और उनके अस्तित्व के स्वरूप मनुष्य की रोजी-रोटी और उत्तरजीविता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालते या उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाते। इसलिए, जब तुम बोलो तो जमीर और विवेक रखना और तिल का ताड़ न बनाना या मनमाने ढंग से निंदा न करना सबसे अच्छा है। परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन के दायरे में आने वाली चीजें हमारी संगति के लायक हैं और हमारी स्वीकृति, समझ, अनुपालना करने, सँजोने और सुरक्षा के लायक हैं। इनके अलावा, जो चीजें इस दायरे में नहीं आतीं, उनके मामले में सबसे अच्छा है कि तिल का ताड़ मत बनाओ और उन्हें संगति के लिए बड़े मुद्दे मत समझो, उन पर बड़े उत्साह से संगति मत करो और यहाँ तक कि अनेक सभाओं में उन पर बहुत गंभीरता से संगति मत करो। यह नहीं करना चाहिए। अक्सर बेतुके लोग, ऐसे लोग जिनमें आध्यात्मिक समझ नहीं होती, बुरे लोग, मसीह-विरोधी और दानव दिखावा करने के लिए, लोगों को यह दिखाने के लिए कि वे कितने चतुर हैं, ये चीजें करना पसंद करते हैं। जिन लोगों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती, वे सोचते हैं कि यह सत्य पर संगति करना है, और भले ही उन्हें कोई आत्मिक उन्नयन न मिले, फिर भी वे सहने और सुनने के लिए बाध्य महसूस करते हैं। असल में, उन लोगों की तमाम बातें पाखंड और भ्रांतियाँ होती हैं और उनका उन सकारात्मक चीजों के विषय से कोई लेना-देना नहीं होता जिनके बारे में मैं बात कर रहा हूँ। इसलिए, अगर तुम ऐसे लोगों को ऐसे विषय और तर्क उठाते हुए सुनो जो सकारात्मक चीजों से नहीं जुड़े हैं, तो तुम सुनने से मना कर सकते हो। अगर तुम सत्य समझते हो और तुममें भेद पहचानने की क्षमता है, तो तुम उनका खंडन कर सकते हो और उन्हें रोक सकते हो। तुम उन्हें कैसे रोकोगे? तुम कहोगे, “ठीक है, चुप रहो! तुम जिन चीजों के बारे में बात कर रहे हो, वे सत्य से जुड़ी नहीं हैं और न ही वे सकारात्मक चीजों से जुड़ी हैं। तुम जो कह रहे हो वे दानवी बातें हैं और कोई उन्हें सुनना नहीं चाहता। यहाँ सबको परेशान मत करो और सबके अपना कर्तव्य निभाने में दखल मत दो!” अगर उनके शब्दों के पीछे कोई गुप्त अभिप्राय है और वे मनमाने ढंग से निंदा करते हैं और कोई सकारात्मक असर नहीं रखते, तो तुम लोगों को खड़े होकर उन्हें गड़बड़ियाँ उत्पन्न करने से रोकना चाहिए, साथ ही उन्हें उजागर भी करना चाहिए ताकि हर व्यक्ति भेद पहचानने की क्षमता प्राप्त कर ले। सुनने के बाद हर कोई समझ जाएगा कि उनके शब्द पाखंड और भ्रांतियाँ हैं जिनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, वे नुक्ताचीनी कर रहे हैं, बाल की खाल निकाल रहे हैं, लोगों को गुमराह कर रहे हैं, शब्द और धर्म-सिद्धांत बोल रहे हैं और बड़े-बड़े विचार झाड़ रहे हैं, और उनके गुप्त अभिप्राय हैं और वे मुसीबत खड़ी करना चाहते हैं, और इसलिए उन्हें रोका और चुप कराया जाना चाहिए। मान लो उस समय मौजूद ज्यादातर लोग ऐसे भ्रमित लोग हैं जिनमें बुरे लोगों और दानवों का भेद पहचानने की क्षमता नहीं है और वे नहीं बता सकते कि वे भ्रांतियाँ फैला रहे हैं और लोगों को गुमराह कर रहे हैं। जब ये भ्रमित व्यक्ति और वे बुरे लोग और दानव एक-साथ इकट्ठे होते हैं, तो वे सब ऐसे हिल-मिल जाते हैं जैसे एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हों। परमेश्वर के वचन सुनने के बाद वे न केवल सत्य स्वीकार नहीं करते, बल्कि आडंबरपूर्ण शब्दों और बड़ी-बड़ी लेकिन खोखली बातों से कुछ भ्रांतियाँ भी फैलाते हैं। ऐसे में, तुम खड़े होकर चुपचाप जा सकते हो, कोई विचार व्यक्त करने की जरूरत नहीं। दानवों को दिखावा करने दो और ढोंग रचने दो। उनसे बहस मत करो, ताकि तुम्हारा मन परेशान न हो और तुम्हारे कर्तव्य पर असर न पड़े। क्यों? क्योंकि दानव हमेशा दानव होता है; जानवर हमेशा जानवर होता है। उनमें कोई तार्किकता नहीं होती, वे उचित-अनुचित का भेद नहीं पहचान सकते, और वे नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत; तुम चाहे कैसे भी संगति करो, उनके लिए सत्य समझना नामुमकिन है। दानव हमेशा शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलेंगे, नारे लगाएँगे और बड़ी-बड़ी लेकिन खोखली बातें करेंगे, जबकि जानवरों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग—आत्माविहीन लोग—भेद पहचानने की क्षमता बिल्कुल नहीं रखते। जहाँ भी शैतान और दानव बाधा डालते हैं, वे उनका अनुगमन करेंगे और उस गड़बड़ी में शामिल हो जाएँगे। अगर तुम उन्हें भेद पहचानना सिखाओ, तो वे सीख नहीं सकते। जो लोग सत्य समझते हैं, सिर्फ उन्हीं में चतुराई और बुद्धिमत्ता होती है, और वे मुसीबत देखकर छिप जाएँगे। वे किसी दानव को बाधा डालते देख उसका भेद पहचानने में समर्थ होंगे और उस बाधा में शामिल नहीं होंगे, क्योंकि वे बुराई से दूर रहना जानते हैं। जहाँ भी दानव दिखावा करते हैं, जहाँ भी जानवर इकट्ठे होते हैं, उस जगह गंदगी और अव्यवस्था की दुर्गंध आएगी। वे सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं और इकट्ठे होना पसंद करते हैं। कुछ बेतुकी और घटिया बातें चाहे कोई भी कहे, वे सुनना पसंद करते हैं और यहाँ तक कि वे बड़े मजे से उन बातों को दोहराते भी हैं। क्या यह दानवों का जमावड़ा नहीं है? अगर तुम एक चतुर व्यक्ति हो तो ऐसी स्थिति देखकर तुम्हें तुरंत दूर हो जाना चाहिए और उनके साथ मेलजोल नहीं रखना चाहिए। तुम्हें उनके साथ मेलजोल क्यों नहीं रखना चाहिए? तुम्हें उनसे बहस क्यों नहीं करनी चाहिए? इसलिए कि तुम सत्य के बारे में चाहे कैसे भी संगति करो, वे उसे नहीं स्वीकारेंगे; तुम चाहे कितने भी शब्द कहो, सब बेकार जाएँगे। जो लोग शैतान और दानवों के हैं वे सत्य बिल्कुल भी नहीं स्वीकारते, और जिनका जानवरों से पुनर्जन्म हुआ है वे सत्य समझ नहीं पाते, इसलिए तुम चाहे कितना भी कहो, सब बेकार है। क्या वे परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं? क्या वे परमेश्वर के वचन समझ सकते हैं? क्या उन्होंने कभी सत्य खोजा है? वे मेरे कहे वचन तक नहीं स्वीकारते, तो क्या तुम्हारे सुझाए कुछ शब्द उनकी बात का खंडन कर सकते हैं? क्या वे उनका मन बदल सकते हैं? क्या वे तुम्हारे शब्द स्वीकार सकते हैं? इसलिए, मूर्खतापूर्ण चीजें मत करो। चुपचाप चले जाना ही समझदारी है। अगर तुम किसी दानव से पूछो, “तुम सत्य का अभ्यास क्यों नहीं करते? तुम हमेशा झूठ क्यों बोलते और कपट क्यों करते हो?” तो दानव बेशर्मी से तुम्हें गलत साबित करेगा; वह बहस करेगा और अपना बचाव करने के लिए विकृत तर्क देगा, और बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करेगा कि वह झूठ बोल रहा है और कपट कर रहा है। अगर तुम जानवरों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों से पूछो कि वे हमेशा विनियमों का पालन क्यों करते हैं, तो वे भी अपना बचाव करने के लिए विकृत तर्क देंगे और कहेंगे कि वे सत्य का अभ्यास कर रहे हैं। ऐसी स्थिति का सामना करने पर तुम्हें स्पष्ट रूप से देखने में समर्थ होना चाहिए कि दानव और जानवरों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग सत्य बिल्कुल भी नहीं स्वीकारते, इसलिए तुम्हें उनके साथ संगति करना बंद कर देना चाहिए और मूर्खतापूर्ण चीजें करना बंद कर देना चाहिए। तुम चाहे कितने भी शब्द कहो या कितनी भी चीजें करो, तुम उनका प्रकृति सार नहीं बदल सकते, इसलिए कितनी भी बातें करो, कोई फायदा नहीं होगा। तुम्हें सत्य पर संगति उन लोगों के साथ करनी चाहिए जो सत्य स्वीकार सकते हैं। सिर्फ ऐसे लोग ही सत्य आसानी से स्वीकार सकते हैं—सिर्फ उन्हीं के साथ तुम सामान्य बातचीत कर सकते हो। दानवों के साथ और जानवरों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों के साथ तुम चाहे कितने भी सत्य पर संगति करो या कितना भी काम करो, सब बेकार है। उस क्षण तुम उनका इस हद तक खंडन करने में समर्थ हो सकते हो कि वे कुछ बोल न पाएँ और उन्हें लग सकता है कि तुमने जो कहा वह सही है, लेकिन बाद में वे अपनी बात से मुकर जाएँगे और यहाँ तक कि वे तुम्हें गलत साबित करने और शर्मिंदा महसूस कराने के लिए कुछ शब्द भी तैयार कर लेंगे। देखो, जो लोग दानव हैं, क्या वे सत्य स्वीकार सकते हैं? (नहीं।) बिल्कुल नहीं। जो लोग दानव हैं और जिन्होंने जानवरों से पुनर्जन्म लिया है, वे सत्य बिल्कुल नहीं स्वीकारते। अगर वे किसी खास पल उसे स्वीकारते भी हैं, तो भी यह सिर्फ जबानी जमा-खर्च होता है, और बाद में वे अपनी बात से मुकर जाएँगे। तो, क्या तुम उनके साथ सत्य पर संगति करके कोई परिणाम हासिल कर सकते हो? तुम उन्हें बदलना चाहते हो ताकि उनमें जमीर और विवेक आए और उन्हें पता चले कि वे सत्य नहीं समझते और उन्हें सत्य स्वीकारना और उसका अभ्यास करना चाहिए—यह विचार और यह मकसद ही गलत है; तुममें ये कभी नहीं होने चाहिए। क्या अब तुम समझते हो? (हाँ।)

आओ, सकारात्मक चीजों के विषय पर वापस आते हैं। सकारात्मक चीजों का दायरा जो परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है उसकी श्रेणी में आने के रूप में परिभाषित किया जाता है। हम चाहे जिस भी चीज से निपट रहे हों, हमें विचार करना चाहिए, “क्या यह परमेश्वर द्वारा सृजित है? यह परमेश्वर के विधान से कैसे जुड़ी है?” अगर इसे परमेश्वर ने सृजित नहीं किया और इसका परमेश्वर के विधान से कोई लेना-देना नहीं है, तो हमें इसके साथ सावधानी से पेश आना चाहिए। अगर हम अभी भी दुनिया की प्रवृत्तियों का अनुगमन करते हैं और उनकी तारीफ के पुल बाँधते हैं, तो क्या यह बेवकूफी नहीं है? अगर कोई चीज परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन होने के दायरे में नहीं है, तो उसे न तो सकारात्मक चीज कहा जा सकता है और न ही नकारात्मक, इसलिए उस पर चर्चा करने का कोई मतलब नहीं है। अगर तुम फिर भी उस पर चर्चा करते हो, तो क्या इसलिए कि तुम उसे एक सकारात्मक चीज के रूप में स्वीकारना चाहते हो? या इसलिए कि तुम उसका एक नकारात्मक चीज के रूप में चरित्र-चित्रण करना चाहते हो और उसे अस्वीकार करना चाहते हो? उसे स्वीकारने या अस्वीकार करने से तुम्हारे जीवन और तुम्हारे आचरण में क्या फायदा होगा? क्या यह सत्य की तुम्हारी स्वीकृति के लिए फायदेमंद है? अगर कोई फायदा नहीं है, तो उसे संगति और चर्चा का विषय समझने का कोई मतलब नहीं है; यह बेवकूफी होगी और बेवकूफी भरी चीजें करना होगा, है ना? (हाँ।) उदाहरण के लिए, घोड़ागाड़ियाँ, कपड़े, बिस्तर और कुर्सियाँ, जिनके बारे में हमने अभी बात की—अगर तुम हमेशा तिल का ताड़ बनाते हो और उन पर चर्चा करना चाहते हो : “यह एक सकारात्मक चीज है या नकारात्मक? हमें इसे स्वीकार करना चाहिए या अस्वीकार? क्या हमें इसे सँजोना चाहिए या इसे नीची नजर से देखना चाहिए? इसके साथ पेश आने का सही तरीका क्या है?” तो यह विकृत होने की अभिव्यक्ति है। जो लोग विकृतियों की ओर प्रवृत्त होते हैं, वे महत्वपूर्ण बिंदु नहीं समझ सकते; वे हमेशा स्वरूपों, धर्म-सिद्धांतों और विनियमों पर मेहनत करते हैं और कभी नहीं समझते कि सत्य पर मेहनत कैसे करनी है। चूँकि बहुत-सी चीजों में सकारात्मक और नकारात्मक चीजों का मामला शामिल नहीं होता, इसलिए उन पर संगति करने की कोई जरूरत नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे न तो सकारात्मक चीजें हैं और न ही नकारात्मक चीजें, इसलिए उनका तुम्हारे जीवन प्रवेश और उस जीवन मार्ग पर जिस पर तुम चलते हो, मामूली असर पड़ता है, इसलिए तुम्हें उनकी गहराई में जाने की जरूरत नहीं है। अगर तुम उनका इस्तेमाल कर सकते हो तो करो, और अगर नहीं करते हो तो भी ठीक है। अगर कुछ रसायन वाले उत्पाद हैं जो लोगों की सेहत पर असर डालते हैं, और उनकी गंध या रासायनिक घटक लोगों के शरीर को कुछ नुकसान पहुँचाते हैं, तो तुम्हें उनसे दूर रहने का तरीका ढूँढ़ना चाहिए, और ऐसी रोजमर्रा की चीजों का इस्तेमाल जितना हो सके कम करना चाहिए या बिल्कुल नहीं करना चाहिए। इस तरह, तुम उनसे होने वाला नुकसान खत्म या कम कर सकते हो। इन नुकसानों से पूरी तरह बचना तो नामुमकिन होगा, लेकिन अगर वे फिलहाल तुम्हारे जीवन को नुकसान नहीं पहुँचाते, तुम्हें अल्पावधि में बीमार नहीं करते और परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास और उसका अनुगमन करने पर या अपना कर्तव्य निभाने और सत्य के अनुसरण पर असर नहीं डालते, तो यह काफी है, क्योंकि असली परिवेश ऐसा ही है। क्या यह सिद्धांत अब स्पष्ट है? (हाँ।)

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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