सत्य का अनुसरण कैसे करें (18) भाग पाँच

परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं

हमने “जो परमेश्वर द्वारा नियत है” के पहलू पर थोड़ी संगति की है। तो, क्या हमें “जो परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है” से संबंधित सत्य पर भी संगति नहीं करनी चाहिए? (हाँ।) क्या “जो परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है” और “जो परमेश्वर द्वारा सृजित है और जो परमेश्वर द्वारा नियत है” के बीच कोई सूक्ष्म अंतर है? (हाँ।) परमेश्वर की संप्रभुता में क्या शामिल है? अक्सर कहा जाता है कि परमेश्वर लोगों के भाग्य पर संप्रभु है। लोगों का भाग्य चाहे जैसा भी हो, क्या भाग्य का मामला अपने आप में एक सकारात्मक चीज है? (हाँ।) व्यक्ति का भाग्य कैसा भी हो, बाहर से वह अच्छा दिखे या बुरा, अगर वह परमेश्वर से आता है, परमेश्वर द्वारा नियत है या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है, तो वह एक सकारात्मक चीज है। तो यह कैसे तय किया जा सकता है कि लोगों का भाग्य सकारात्मक चीज है? लोगों का भाग्य हर तरह का होता है। बाहरी तौर पर, कुछ लोग सुखी जीवन जीते दिखते हैं जबकि दूसरे लोग दुख झेलते हैं; कुछ लोग जीवन भर समृद्ध रहते हैं जबकि दूसरों के लिए चीजें कभी सुचारु ढंग से नहीं होतीं; कुछ लोग अमीरी में रहते हैं जबकि दूसरे घोर गरीबी में; कुछ लोगों के खुशहाल, आनंदमय परिवार होते हैं जबकि दूसरों की शादियाँ दुखद होती हैं और बच्चे आज्ञाकारी नहीं होते; कुछ लोग जीवन भर अकेले रहते हैं जबकि दूसरे अपने बच्चों और पोते-पोतियों से घिरे रहने का आनंद लेते हैं; कुछ लोग जीवन भर बीमारी और पीड़ा से त्रस्त रहते हैं, बहुत कष्ट में जीते हैं जबकि दूसरे मजबूत और स्वस्थ होते हैं, सुखद, आजाद जीवन जीते हैं और आखिरकार परिपक्व होकर बुढ़ापे में शांति से चल बसते हैं। क्या ये विभिन्न प्रकार के लोगों के भाग्य नहीं हैं? (हाँ।) तो क्या भाग्य परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है? (वह परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है।) अपनी धारणाओं में लोग सोचते हैं, “चूँकि भाग्य परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है, इसलिए सभी लोगों के भाग्य अच्छे होने चाहिए। इतने सारे बुरे भाग्य क्यों हैं?” एक और भी हैरान करने वाला तथ्य यह है कि ज्यादातर लोगों का भाग्य वैसा नहीं होता जैसा वे चाहते हैं। देखो—कितने लोग हैं जो जीवन भर कोई कठिनाई नहीं झेलते, धन और रुतबे वाले परिवारों में पैदा होते हैं और उन पर चारों ओर से स्नेह बरसाया जाता है? ऐसे कितने लोग हैं? सिर्फ संभ्रांत परिवारों में पैदा हुए लोगों का ही ऐसा भाग्य होता है। दूसरे ज्यादातर लोग जीवन भर कष्ट उठाते हैं और अनगिनत कठिनाइयाँ झेलते हैं, हर कदम पर बाधाओं का सामना करते हैं—उनके लिए चीजें बहुत मुश्किल होती हैं और सुचारु रूप से बिल्कुल नहीं होतीं। हालाँकि सिद्धांततः तुम मानते हो कि लोगों के भाग्य परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं और परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं, फिर भी तुम अपने दिल से यह नहीं समझते : “अगर यह कहा जाए कि जो लोग कुलीन घर में पैदा होते हैं, उनके लिए अच्छा भाग्य होना एक सकारात्मक चीज है, तो धर्म-सिद्धांत के हिसाब से यह स्वीकार्य है। लेकिन 80 से 90 प्रतिशत लोगों के साथ चीजें सुचारु रूप से नहीं होतीं और वे जिंदगी भर दुख झेलते हैं—तो ऐसा कैसे हो सकता है कि ऐसे भाग्य भी सकारात्मक चीजें हैं और वे परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन भी हैं? यह कुछ हद तक अस्वीकार्य लगता है। नैतिक न्याय की भावना से हो या हमदर्दी से, ऐसे भाग्य सकारात्मक चीजों के रूप में वर्गीकृत नहीं किए जा सकते। यह बात समझ में नहीं आती। क्या ऐसा हो सकता है कि यह परिभाषा गलत हो? अगर यह वास्तव में गलत है तो जिन पर परमेश्वर संप्रभु है उनमें से लोगों के भाग्य वाला हिस्सा हटा देना चाहिए। लेकिन अगर इसे हटा दिया जाए, तो यह इस तथ्य से इनकार करना होगा कि परमेश्वर लोगों के भाग्य पर संप्रभु है। क्या यह बहुत ज्यादा विद्रोहात्मक नहीं होगा? लेकिन हमें इस तथ्य को कैसे समझना चाहिए कि परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं, और बुरे भाग्य भी सकारात्मक चीजें हैं?” लोग थोड़े हैरान हो जाते हैं। यह तुम लोगों के लिए एक मुश्किल सवाल है, है ना? (हाँ, है।) तो तुम लोग मुझे बताओ। देखें कौन इस मामले को स्पष्ट रूप से बता सकता है। (मुझे लगता है कि लोगों के मुश्किलों का सामना करने को बुरी चीज समझना गलत है। असल में, परमेश्वर किसी के लिए जो भी भाग्य नियत करता है, चाहे वह मुश्किलों से भरा हो या सुविधाओं से, वह उसके लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद होता है। खासकर दुख लोगों को गढ़ने में और भी ज्यादा सक्षम होता है। इसके अलावा, ये चीजें लोगों की आत्माओं के पुनर्जन्म से जुड़ी हैं। शायद अपने पिछले जन्म में बुरे काम करने के कारण या पिछले जन्म में लिए गए किसी कर्ज के कारण व्यक्ति को उसे चुकाने के लिए इस जन्म में दुख झेलना चाहिए। यह सब परमेश्वर के विधान और व्यवस्था के अधीन है।) तो इसमें सकारात्मक चीज क्या है? क्या तुम इसे स्पष्ट रूप से बता सकते हो? (नहीं।) देखो, अगर कोई वास्तव में तुमसे इसके बारे में पूछे, तो तुम इसे स्पष्ट रूप से नहीं बता पाओगे; तुम यहीं अटक जाओगे। अगर तुम इसे गंभीरता से नहीं लेते, तो तुम इसे बस जाने दोगे, लेकिन इससे तुम्हारे द्वारा इस सत्य को स्वीकारने पर असर पड़ेगा कि “परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं”, इससे यह वर्गीकृत करने के लिए कि कौन-सी चीजें सकारात्मक हैं, तुम्हारे द्वारा इस सत्य का इस्तेमाल करने पर असर पड़ेगा, इससे तुम्हारे द्वारा किसी भी सकारात्मक चीज को स्वीकारने और पहचानने पर असर पड़ेगा, और इससे “जो परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है” के दायरे में आने वाली सभी चीजों के प्रति तुम्हारे रवैये पर भी असर पड़ेगा, जिसमें, बेशक, यह शामिल है कि तुम उन्हें स्वीकारते हो या उनकी निंदा करते हो—यह मुद्दा बहुत गंभीर है। अगर तुम भाग्य के मामले की असलियत नहीं जान सकते, तो तुम्हारे द्वारा इसे एक नकारात्मक चीज मानने और इसे ऐसे ही वर्गीकृत करने की संभावना है। लेकिन लोगों के भाग्य परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं और परमेश्वर द्वारा नियत हैं। अगर तुम लोगों के भाग्य को, जिस पर परमेश्वर संप्रभु है और जिसे परमेश्वर ने नियत किया है, नकारात्मक चीजों के रूप में वर्गीकृत करते हो, तो इस मामले की प्रकृति क्या है? (परमेश्वर की ईशनिंदा।) यह परमेश्वर की निंदा करना और परमेश्वर की ईशनिंदा करना है। इंसानी शब्दावली में इसका मतलब है “तुमने बहुत बड़ा पाप किया है, इसलिए तुरंत जाकर अपने पाप स्वीकार करो!” हम इस बारे में और ज्यादा कुछ नहीं कहेंगे।

हमने अभी-अभी “परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं” विषय पर संगति की और हमने लोगों के भाग्य का जिक्र किया। हालाँकि इस विषयवस्तु का दायरा बहुत बड़ा है, लेकिन यह बहुत विशिष्ट भी है; यह हर व्यक्ति और पूरी मानवजाति के जीवन से जुड़ा है। लोगों के भाग्य विभिन्न प्रकार के होते हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों के भाग्य, जैसा कि लोग देखते हैं या खुद अनुभव करते हैं, एक शब्द में बताए जा सकते हैं : अभागा। “अभागे” का मतलब है कि व्यक्ति का भाग्य मुश्किलों और निराशाओं से भरा है; ऐसा व्यक्ति बहुत कठिन जिंदगी जीता है और ज्यादातर समय चीजें उसकी मर्जी के मुताबिक नहीं होतीं। चाहे किसी को अच्छे अनुभव हों या बुरे, चाहे वे कुछ भी देखें या महसूस करें, एक बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हालाँकि ज्यादातर लोगों को अपना भाग्य वैसा नहीं लगता जैसा वे चाहते हैं, फिर भी हर व्यक्ति का भाग्य परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है। इससे कभी इनकार नहीं किया जाना चाहिए। चूँकि लोगों के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता ने ऐसी वास्तविकता उत्पन्न की है जिसे स्वीकारना लोगों के लिए मुश्किल है, इसलिए इस बात पर संगति करना जरूरी है कि लोगों के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता के सिद्धांत और उसकी जड़ क्या है, और लोगों के भाग्य पर संप्रभुता रखने के पीछे परमेश्वर का क्या मकसद है—यानी, परमेश्वर इस तरह से लोगों के भाग्य पर संप्रभुता क्यों रखता है और वह लोगों के लिए ऐसे भाग्य की व्यवस्था क्यों करता है। आओ, पहले यह देखते हैं कि लोगों के भाग्य पर संप्रभुता रखने के पीछे परमेश्वर का क्या मकसद है। क्या लोग इस दुनिया में खानापूर्ति करने या अपना समय गँवाने के लिए आते हैं? (दोनों के लिए ही नहीं आते।) लोगों के भाग्य की व्यवस्था करने के पीछे परमेश्वर का मकसद यह नहीं है कि वे दुनिया में बस चलती-फिरती लाशों की तरह घूमें और बस हो गया। बल्कि, यह है कि लोग देह में रहें और जीवन का अनुभव करें, और विभिन्न अवधियों में हर तरह के जीवन परिवेश से और साथ ही विभिन्न परिस्थितियों से भी गुजरें। जीवन का अनुभव करने की बात करें तो, मनुष्य की देह में एक खासियत है : अगर कोई व्यक्ति बिना किसी मुश्किल दौर, कठिनाई, रुकावट या नाकामी के आरामदायक परिवेश में रहता है, तो उसके लिए बढ़ना और परिपक्व होना आसान नहीं होता। यह एक ऐसे पौधे की तरह है जो ग्रीनहाउस में बिना हवा और धूप का सामना किए बढ़ता है; उसका जीवन बहुत कमजोर होता है, क्योंकि उसके लिए प्रकृति से विभिन्न पोषक तत्व लेना आसान नहीं होता। कड़ी धूप और मजबूत हवाओं का सामना करने पर उसका टूटना और असमय मर जाना बहुत आसान होता है, और फिर उसका जीवन जारी नहीं रह सकता। इसलिए, मनुष्य की देह की प्रकृति और प्रवृत्ति के हिसाब से मानवजाति को ग्रीनहाउस के फूलों की तरह नहीं होना चाहिए जो हवा और बारिश का अनुभव नहीं करते, बल्कि उसे इंसानी दुनिया की विभिन्न नाकामियाँ, कठिन दौर और निराशाएँ सहनी चाहिए। ऐसे जीवन परिवेश में मानवजाति अपनी परमेश्वर-प्रदत्त स्वतंत्र इच्छा और विचारों का इस्तेमाल करेगी, और वह—हर संभव तरीके से, स्वतंत्र रूप से, दृढ़ता से और बिना किसी कठिनाई के डर के—आगे बढ़ती रहेगी और जीती रहेगी। इससे लोगों के जीवन और उत्तरजीविता के लिए विभिन्न प्रवृत्तियाँ उद्दीप्त होंगी, और लोग स्वतंत्र रूप से जीने और हर परिवेश का और साथ ही अपने आसपास के सभी लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करने के लिए अपनी उत्तरजीविता के लिए परमेश्वर-प्रदत्त प्रवृत्ति का उपयोग करने में समर्थ होंगे। एक तो, मनुष्य की देह की वस्तुनिष्ठ प्रवृत्ति के परिप्रेक्ष्य से, लोगों को उत्तरजीविता की इच्छा पैदा करने के लिए इस परिवेश के उद्दीपन और प्रेरणा की आवश्यकता होती है, ताकि वे दृढ़ता के साथ जी सकें। ऊपर से, इस तरह जीना मुश्किल लगता है, लेकिन इस परिवेश के उद्दीपन और आघातों के बीच लोगों में उत्तरजीविता की एक मजबूत इच्छा विकसित होती है, और इसलिए वे आगे बढ़ते रहेंगे और धीरे-धीरे परिपक्व हो जाएँगे, धीरे-धीरे दूसरों के साथ रहना सीख लेंगे और कम नाजुक होंगे, इसके बजाय उनमें दृढ़ता, सहनशक्ति और लगन होगी, और वे किसी भी कठिनाई से निर्भय रहने में समर्थ होंगे। यह लोगों के भाग्य की व्यवस्था करने में परमेश्वर का शुरुआती मकसद है; यह लोगों के भाग्य की मूल अवधारणा है जिसकी उनके देह की प्रवृत्ति के मूल रूप के आधार पर अभिकल्पना की गई है। यह एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि—इस मूल अवधारणा के आधार पर—जब लोग इस दुनिया में अपनी यात्रा करते हैं, बचपन से बुढ़ापे तक, धीरे-धीरे बड़े होने की प्रक्रिया में, वे जीवन की घटनाओं का अनुभव करते हैं, जीवन का अनुभव प्राप्त करते हैं और जीवन में विभिन्न कठिनाइयों का सामना करने के लिए कुछ सिद्धांत और मार्ग प्राप्त करते हैं। इस तरह, लोग धीरे-धीरे परिपक्व होते हैं और स्वर्ग और पृथ्वी के बीच, और दूसरे लोगों के बीच, स्वतंत्र रूप से रहने में उत्तरोत्तर सक्षम होते जाते हैं। वे बहुत नाजुक नहीं होंगे, और थोड़े-से आघात या असफलता से सामना होने पर—हतोत्साहित या हताश महसूस नहीं करेंगे—या यह तक महसूस नहीं करेंगे कि जीने में कोई उम्मीद बाकी नहीं है। बल्कि, विभिन्न कठिन परिस्थितियों का अनुभव करने के बाद वे जिंदगी और मौत को सही तरीके से देखने में उत्तरोत्तर सक्षम होते जाएँगे, और यह समझने में उत्तरोत्तर सक्षम होते जाएँगे कि वे कौन-से कर्तव्य हैं जो उन्हें जीवन में निभाने चाहिए और उन्हें सबसे ज्यादा किस चीज की जरूरत है, और इस तरह, वे जीवन में उत्तरोत्तर आराम महसूस करेंगे। इस प्रक्रिया में लोग धीरे-धीरे परिपक्व होते हैं; यानी, वे धीरे-धीरे उस बिंदु पर पहुँच जाते हैं जहाँ उन्हें मुश्किलों और खतरे से डर नहीं लगता, मौत से डर नहीं लगता, और किसी कठिनाई से डर नहीं लगता। पहले, जब लोग छोटे होते हैं तो वे कुछ अप्रिय और दिल को चुभने वाली बातें सुनकर या थोड़ी-सी मुश्किल होने या आघात लगने पर रोते हैं और सो नहीं पाते, और उन्हें लगता है कि जीने में कोई उम्मीद बाकी नहीं है। धीरे-धीरे, वे उस बिंदु पर पहुँच जाते हैं जहाँ दिल को चुभने वाली बातें सुनने और मुश्किलों का सामना करने पर उनके दिलों में एक निश्चित मात्रा में प्रतिरक्षा और प्रतिरोध आ जाता है और उन्हें अब ऐसा नहीं लगता कि जीने में कोई अर्थ नहीं है, न ही वे मौत के बारे में सोचते हैं। बाद में, जब वे और ज्यादा दिल को चुभने वाली बातें सुनते हैं और आघात और असफलताओं का सामना करते हैं, तो वे बिना ज्यादा प्रभावित हुए उन्हें अपने दिलों में सह सकते हैं और महसूस करते हैं कि लोगों के लिए जीवन में इन चीजों का अनुभव करना बहुत सामान्य है, और अपनी जिंदगी जीने के लिए उन्हें अब दूसरों के दिलासे, प्रोत्साहन या मदद की जरूरत नहीं पड़ती। इस तरह, क्या लोगों में धीरे-धीरे और ज्यादा हिम्मत नहीं आती? लोगों में स्वतंत्र रूप से जीवित बचे रहने का सामर्थ्य होता है और स्वतंत्र रूप से जीवित बचे रहने की प्रेरणा भी होती है। हर किसी को युवा और नासमझ होने के चरण से गुजरना पड़ता है। चालीस-पचास साल की उम्र के बाद ही वे धीरे-धीरे परिपक्वता की अवस्था में पहुँचते हैं और वयस्क बनते हैं। भले ही किसी ने परिवार न बसाया हो, करियर न बनाया हो, या वह माता या पिता न बना हो, लेकिन जीवन में उसने जो कुछ झेला है, जो बातें वह कहता है, और जीवन के प्रति, जीने के प्रति, उन मुश्किलों के प्रति जिनका वह सामना करता है, और उन चीजों के प्रति जो उसकी इच्छा के अनुसार होती हैं या नहीं होतीं, उनके प्रति उसके एहसासों, समझ और रवैये से आँकने पर तुम पाओगे कि वह व्यक्ति बड़ा और परिपक्व हो गया है। यह सब किसकी बदौलत है? यह उन विभिन्न मुश्किलों, निराशाओं, यहाँ तक कि उन आघातों और नाकामियों की बदौलत है जो परमेश्वर द्वारा नियत किए अनुसार लोगों के भाग्य में आती हैं। इसलिए, इस परिप्रेक्ष्य से, इसमें कोई शक नहीं कि लोगों के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता एक सकारात्मक चीज है और लोगों को यह सत्य पूरी तरह से स्वीकारना चाहिए। क्या यहाँ यह कहा जा सकता है कि लोगों के भाग्य पर अपनी संप्रभुता में परमेश्वर के सच में बहुत श्रम-साध्य इरादे होते हैं? (हाँ।) चाहे कोई परमेश्वर में विश्वास करे या न करे, जैसे-जैसे लोग जन्म से लेकर बड़े होकर परिपक्वता तक पहुँचते हैं, तो अच्छी काबिलियत वाले लोग समझ के इस बिंदु पर भी पहुँच जाते हैं कि वे भाग्य के अधीन हैं, और परमेश्वर को खोजने के बिंदु पर भी पहुँच जाते हैं। इस तथ्य से आँकने पर, क्या लोगों के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता का मूल इरादा एक सकारात्मक चीज नहीं है? (हाँ, है।) देखो, जब मैं यह कहता हूँ, तो तुम सब लोग सिर हिलाते हो और स्वीकार करते हो कि यह एक सकारात्मक चीज है। ऐसा क्यों है? क्योंकि जो मैं कह रहा हूँ वह एक तथ्य है, और मैंने इस मामले का सार स्पष्ट रूप से बताया है, और तुम लोगों ने भी इसका अनुभव किया है, है ना? (हाँ।) मनुष्य को वास्तव में उस भाग्य से फायदा हुआ है जो परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है। तुम्हारी पृष्ठभूमि कुछ भी हो, या तुम कहीं से भी आए हो, और तुम इस समाज में कोई भी भूमिका निभाते हो, संक्षेप में, जब तक तुम परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन रहते हो, तुम्हें परमेश्वर से फायदे मिले हैं। कुछ लोग कहते हैं, “यह सही नहीं है। परमेश्वर को अपने चुने हुए लोगों के भाग्य पर, मनुष्यों के भाग्य पर संप्रभु होना ही चाहिए। परमेश्वर उन लोगों के भाग्य पर संप्रभु नहीं है जो दानवों या जानवरों से पुनर्जन्म लिए हुए हैं।” क्या यह कथन सही है? (नहीं।) जो कोई भी चीज सृजित प्राणी है, वह परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है। अगर वह एक सृजित प्राणी है, तो उसका एक भाग्य है। तुम एक सृजित प्राणी हो, इसलिए तुम्हारा भाग्य है। परमेश्वर ने तुम्हारे लिए एक भाग्य की व्यवस्था की है, इसलिए तुम्हारा भाग्य कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे तुमने चुना हो, न ही वह कोई ऐसी चीज है जिसे तुमने सृजित किया हो; वह परमेश्वर की संप्रभुता से आता है। इसलिए, चाहे तुम कोई भी भूमिका निभाते हो, चाहे तुमने मनुष्य से पुनर्जन्म लिया हो या जानवर या दानव से, चूँकि तुम अब मनुष्य जाति के सदस्य हो, इसलिए तुम्हारा निश्चित रूप से एक भाग्य है, और तुम्हारा भाग्य निश्चित रूप से परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है। इस बिंदु के आधार पर, क्या लोगों के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता एक सकारात्मक चीज नहीं है? (हाँ, है।) हम ऐसा क्यों कहते हैं कि लोगों के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता एक सकारात्मक चीज है? इसलिए कि परमेश्वर किसी भी सृजित प्राणी के लिए जिस भाग्य की व्यवस्था करता है, उसके पीछे उसके श्रमसाध्य इरादे होते हैं; यह सब इसलिए है ताकि मनुष्य इस दुनिया में परमेश्वर की दी हुई विभिन्न जन्मजात स्थितियों के साथ सामान्य रूप से और व्यवस्थित तरीके से जी सके। परमेश्वर किसी भी व्यक्ति के साथ नाइंसाफी नहीं करता। जैसा कि कहा जाता है, सूरज अच्छे और बुरे दोनों पर चमकता है। यही परमेश्वर की संप्रभुता है। वरना, हम यह क्यों कहेंगे कि सिर्फ परमेश्वर ही मानवजाति का स्रष्टा है और सिर्फ परमेश्वर ही मानवजाति पर संप्रभु है? क्योंकि परमेश्वर यही करता है, परमेश्वर में यह क्षमता है, और उसके पास यह सार और यह अधिकार है। यह बिंदु यह स्पष्ट करता है—लोगों के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता एक सकारात्मक चीज है और इसे न तो नकारा जा सकता है और न ही इस पर शक किया जा सकता है। यानी, मनुष्य के दैहिक जीवन के नियमों को देखते हुए, कठिनाइयों और कठिन दौरों के जिस भाग्य की परमेश्वर लोगों के लिए व्यवस्था करता है, वह उन्हें धीरे-धीरे परिपक्व बनने और इस जिंदगी का सफर सुचारु रूप से पूरा करने में मदद कर सकता है। इस परिप्रेक्ष्य से परमेश्वर की संप्रभुता एक सकारात्मक चीज है।

लोगों के भाग्य का एक और पहलू देखें तो, बहुत-से लोग मुश्किल, निराशा भरी जिंदगी जीते हैं। ऐसा प्रतीत नहीं होता कि उन्होंने कुछ बुरा किया है, लेकिन ऐसा लगता है कि उन्हें सजा मिल रही है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग जवानी में अपना पिता, अधेड़ उम्र में अपना पति और बुढ़ापे में अपने बेटे खो देते हैं, उनके परिवार मौत से उजड़ जाते हैं। कुछ लोगों के साथ दुर्घटनाएँ हो जाती हैं, जैसे कार-दुर्घटना या वायुयान-दुर्घटना। कुछ लोग विकलांग होते हैं : कुछ अंधे होते हैं, कुछ बहरे होते हैं और कुछ के हाथ-पैर नहीं होते। कुछ लोग धोखा खाकर बहुत ज्यादा गरीब हो जाते हैं और दूसरे लोग अपनी पूरी जिंदगी कर्ज चुकाने में बिता देते हैं। जब लोगों के साथ ये विभिन्न दुर्भाग्यपूर्ण चीजें घटती हैं, तो बहुत-से लोग कहते हैं, “स्वर्ग अन्यायी है। ऐसा नहीं लगता कि स्वर्ग को यह करना चाहिए। अगर परमेश्वर लोगों के भाग्य पर संप्रभु है, तो वह उन्हें इतना दुखी कैसे बना सकता है? वह निर्दोष लोगों को ऐसे आघात कैसे झेलने दे सकता है और ऐसी बदकिस्मती का सामना कैसे करने दे सकता है?” अगर लोग इसे सृष्टिकर्ता के लोगों का भाग्य नियत करने के मूल इरादे के परिप्रेक्ष्य से देखें, तो मानवजाति के लिए सृष्टिकर्ता के इरादे बहुत श्रमसाध्य हैं और लोगों के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता एक सकारात्मक चीज है। लेकिन जब लोगों के भाग्य में कुछ खास चीजें होती हैं जो मानवता के जमीर के परिप्रेक्ष्य से दुखद लगती हैं, तब लोग समझ नहीं पाते कि लोगों के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता एक सकारात्मक चीज क्यों है और वे समझ नहीं पाते कि क्या हो रहा है। बहुत-से लोग मानते हैं कि सृष्टिकर्ता द्वारा लोगों के भाग्य की व्यवस्था में कुछ गलत पहलू हैं और उन्हें यह कहना सही नहीं लगता कि परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं। इसलिए कुछ लोगों ने एक आम कहावत बनाई है : “जो पुल बनाते हैं और सड़कों की मरम्मत करते हैं वे अंततः अंधे हो जाते हैं, जबकि अनेक दुष्कर्म करने वालों को बड़े परिवार होने का आशीष मिलता है।” कुछ लोग कहते हैं, “यह गलत है। पुल बनाना और सड़कों की मरम्मत करना पुण्य संचित करना और अच्छा काम करना है। जो लोग ऐसा करते हैं, उनके बड़े परिवार होने चाहिए और वे बहुत अमीर होने चाहिए। वे अंधे कैसे हो सकते हैं? क्या ऐसा हो सकता है कि ऐसा भाग्य भी परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हो और वह एक सकारात्मक चीज भी हो? यह समझ में नहीं आता!” अगर लोग सत्य नहीं समझते और उन्हें परमेश्वर का ज्ञान नहीं होता तो वे वास्तव में इन चीजों का पता नहीं लगा सकते या इन्हें समझ नहीं सकते। गैर-विश्वासी हमेशा कहते हैं, “स्वर्ग जीवित चीजों को सँजोता है।” इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि अगर परमेश्वर है, अगर स्वर्ग है तो परमेश्वर को अपनी प्रजा की देखभाल करनी चाहिए। अगर वह सृष्टिकर्ता है तो उसे अपने सृजित प्राणियों की देखभाल करनी चाहिए और उनके साथ दयालुता से पेश आना चाहिए; उसे उन्हें ये दर्द नहीं सहने देने चाहिए। जैसा कि लोग इसे देखते हैं, अगर मनुष्य शैतान और दानवों की शक्ति के अधीन रहता, तो यह समझा जा सकता था कि हो सकता है उसे ये दर्द सहने पड़ें, लेकिन चूँकि मनुष्य परमेश्वर के प्रभुत्व और परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन रहता है, इसलिए उसे ये दर्द नहीं सहने चाहिए। खासकर जब ऐसे भाग्य के परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन होने की बात आती है, तब लोग यह समझने में और भी ज्यादा असमर्थ हो जाते हैं कि क्या हो रहा है। अगर लोग सत्य नहीं समझते तो उनके लिए यह पहचानना बहुत मुश्किल होता है कि हर उस चीज के पीछे कोई मतलब होता है जिस पर परमेश्वर संप्रभुता रखता है और जिसकी वह व्यवस्था करता है; वे कुछ चीजें समझ नहीं सकते और इन खास स्थितियों में अटक जाते हैं। अगर किसी के पास परमेश्वर का थोड़ा भी भय मानने वाला दिल हो, तो वह कहेगा, “अगर हम इस मामले को समझा नहीं सकते तो चलो इसके बारे में बात नहीं करते, हमें अपनी मर्जी से इसकी आलोचना नहीं करनी चाहिए।” उसे थोड़ा विवेक रखने वाला माना जा सकता है। कुछ लोगों में कोई जमीर या विवेक नहीं होता, परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होना तो दूर की बात है। वे ढीठ होते हैं और जब उनका सामना ऐसी चीजों से होता है जो उनकी मर्जी के मुताबिक नहीं होतीं, तो उनमें लापरवाही से आलोचना करने की हिम्मत होती है, “हम्म! लोग कहते हैं कि स्वर्ग जीवित चीजों को सँजोता है, तो फिर कुछ लोग जो काफी अच्छे मालूम होते हैं, कम उम्र में ही क्यों मर जाते हैं? और वे हिंसापूर्ण मौत मरते हैं और अपने पीछे ढेर सारे बच्चे छोड़ जाते हैं। यह बहुत दयनीय, बहुत दुखद है! और लोग फिर भी दावा करते हैं कि परमेश्वर की संप्रभुता एक सकारात्मक चीज है। अगर लोगों का ऐसा दुखद भाग्य होना परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है, तो परमेश्वर धार्मिक नहीं है!” ये लोग परमेश्वर की आलोचना इतनी लापरवाही से करते हैं। लोगों के भाग्य निस्संदेह परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं। इस पर कभी भी सवाल नहीं उठाया जा सकता या इसे कभी भी नकारा नहीं जा सकता। यह कथन कि “लोगों के भाग्य परमेश्वर के हाथों में हैं” हर समय सही है और हर समय तथ्य है, क्योंकि लोगों के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता एक सकारात्मक चीज है और यह बात किसी भी समय नहीं बदलेगी। तो फिर लोग ऐसी दुखद स्थितियों का सामना क्यों करते हैं? एक चीज है जिसके बारे में लोग नहीं जानते, या वे उसे धर्म-सिद्धांत के तौर पर समझते हैं लेकिन उसे स्पष्ट रूप से बता नहीं सकते, और वह यह है कि हर व्यक्ति के भाग्य का कारण और प्रभाव होता है। तुम्हारा भाग्य कैसा है और इस जीवन में तुम क्या चीजें सहोगे, ये तुम्हारे पिछले जन्म के प्रभाव हो सकते हैं और ये अगले जन्म में कारण भी बन सकते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा गैर-विश्वासी लोग कहते हैं, “जो बोओगे वही काटोगे।” अपने पिछले जीवन में तुमने कुछ कारण और प्रभाव बोए होंगे—अगर परमेश्वर तुम्हारे लिए इस जीवन में मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लेने और मानवजाति का सदस्य बनने की व्यवस्था करता है, तो तुम्हें उन कारणों और प्रभावों की कीमत चुकानी होगी जो तुमने बोए थे; तुम्हें उनकी भरपाई करनी होगी। तुम उनकी भरपाई करोगे या नहीं और तुम्हें करनी चाहिए या नहीं, यह तय करना तुम्हारे हाथ में नहीं है। कोई भी ऐसा व्यक्ति, जिसने बुरा काम किया है, सजा स्वीकारने का इच्छुक नहीं होता। सिर्फ सृष्टिकर्ता ही इस मामले की व्यवस्था कर सकता है, उसी के पास यह अधिकार है, और बेशक, उसी के पास यह सामर्थ्य है। तो ऐसा करने में सृष्टिकर्ता का क्या सिद्धांत है? यह अच्छे को पुरस्कृत करना और बुरे को दंडित करना है। हालाँकि मनुष्य परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं समझता, परमेश्वर को नहीं जानता और परमेश्वर की संप्रभुता के मूल तत्व और सिद्धांत नहीं समझता, लेकिन क्योंकि परमेश्वर में धार्मिक स्वभाव है और सृष्टिकर्ता के तौर पर अपनी पहचान के कारण उसने मानवजाति और सभी चीजों के लिए स्वर्गिक नियम और व्यवस्थाएँ बनाई हैं। ये स्वर्गिक नियम और कानून किस पर आधारित हैं? ये परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव और परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य पर आधारित हैं। इन स्वर्गिक नियमों और कानूनों की स्थापना मानव जगत में एक परिघटना के रूप में परिलक्षित होती है, और वह है मनुष्यों का पुनर्जन्म। मनुष्य के पुनर्जन्म की प्रक्रिया अक्सर सीधे तौर पर कारण और प्रभाव से जुड़ी होती है और यह कारण-कार्य संबंध लोगों के भाग्य में कुछ खास चीजों में प्रतिबिंबित और अभिव्यक्त होता है। इसके अलावा, मनुष्य के पुनर्जन्म की प्रक्रिया में लोग परमेश्वर के पुरस्कार और साथ ही परमेश्वर के दंड भी पाते हैं। परमेश्वर बुराई करने वालों को दंड देता है; यानी, वह उनका हर तरह के दुर्भाग्यों और दुर्घटनाओं से और हर तरह की सजाओं से भी सामना करवाता है जिन्हें लोग अनुचित और अविवेकपूर्ण मानते हैं। इनमें से कुछ सजाएँ तो मनुष्य की नजर में बहुत दुखद होती हैं, लेकिन इस बात की एक पृष्ठभूमि होती है कि यह दुखद स्थिति उनके साथ क्यों घटित हुई। यह कोई ऐसी चीज नहीं है जो परमेश्वर ने उन पर बिना किसी वजह के थोप दी हो, बल्कि यह वह सजा है जो उन्हें इसलिए भुगतनी चाहिए क्योंकि उन्होंने असंख्य दुष्कर्म किए हैं। जब लोग इस मामले के पूरे विवरण की असलियत नहीं जान सकते, तब वे बकवास करते हैं और स्वर्ग और परमेश्वर के बारे में शिकायत करते हैं, जो बहुत बेवकूफी है। तो उन लोगों के साथ क्या स्थिति है जो परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हैं? चूँकि उन्होंने अपने पिछले जीवन में पुण्य जमा किया और बहुत सारी अच्छी चीजें कीं—ऐसी बहुत-सी चीजें जिनसे मानवजाति को फायदा हुआ और ऐसी बहुत-सी चीजें जिनसे उन्हें परमेश्वर के स्वर्गिक नियमों और कानूनों के अनुसार सजा नहीं सुनाई गई बल्कि पुरस्कार मिले, इसलिए वे इस जीवन में कई आशीषों का आनंद लेते हैं। मैं तुम्हें एक उदाहरण देता हूँ। मान लो, एक औरत एक खुशहाल परिवार में पैदा हुई है—हालाँकि वह परिवार बहुत अमीर नहीं है, लेकिन उसमें बहुत सारे लड़के हैं और कोई लड़की नहीं है, और परमेश्वर उसके इसी परिवार में पैदा होने की व्यवस्था करता है। जैसे ही यह बच्ची पैदा होती है, वह पूरे परिवार की आँखों का तारा बन जाती है—इतनी प्यारी कि वे उसे नुकसान पहुँचने के डर से उसके पास साँस लेने तक से डरते हैं। बच्ची सुंदर, स्मार्ट और प्यारी है और उसके माता-पिता और बड़े-बुजुर्ग सभी उसे पसंद करते हैं। उसकी पूरी जिंदगी आराम से गुजरती है। वह चाहे कुछ भी करे या किसी भी मुश्किल का सामना करे, हमेशा अच्छे लोग उसकी मदद के लिए मौजूद रहते हैं और उसकी सारी मुश्किलें आसानी से हल हो जाती हैं। उसे कोई चिंता-फिक्र नहीं होती और वह एक आरामदेह, खुशहाल जिंदगी जीती है। वह सच में धन्य है! यहाँ क्या हो रहा है? क्या सृष्टिकर्ता कुछ लोगों के प्रति पक्षपाती है? (नहीं।) तो फिर कुछ लोग इतने बड़े आशीषों का आनंद क्यों ले पाते हैं? स्वर्गिक नियमों और कानूनों में यह निर्दिष्ट है कि एक खास तरह के व्यक्ति को, जिसने ऐसी चीजें की हैं जो मानवजाति के लिए फायदेमंद हैं, पुरस्कार दिया जाना चाहिए, और हो सकता है वह लड़की ऐसी ही हो। सृष्टिकर्ता से पुरस्कार पाकर वह मानव जगत में इतने बड़े आशीषों का आनंद लेती है। उसे कभी भोजन और कपड़ों की चिंता नहीं करनी पड़ती; वह जहाँ भी जाती है, वहाँ अच्छे लोग उसकी मदद के लिए होते हैं, और वह जहाँ भी जाती है, वहाँ लोग उसे पसंद करते हैं। यहाँ तक कि जब वह चालीस या पचास साल की हो जाती है और उसके बच्चे बड़े हो जाते हैं, तब भी उसके माता-पिता उसे अपनी आँखों का तारा समझते हैं; जब भी उनके पास कुछ अच्छा होता है, वे उसे उसके लिए बचाकर रखते हैं। दूसरे लोग उसे इतने बड़े आशीषों का आनंद लेते देखकर जलते हैं और कुछ लोगों को लगता है कि यह गलत है क्योंकि वे ऐसे आशीषों का आनंद नहीं ले सकते। अगर तुम भी सृष्टिकर्ता द्वारा व्यवस्थित ऐसे भाग्य का आनंद लेना चाहते हो और उसके जैसे भाग्य और आशीषों का आनंद लेना चाहते हो, तो तुम्हें भी ज्यादा पुण्य संचित करना चाहिए और ज्यादा अच्छे काम करने चाहिए, और तुम्हें वे चीजें भी ज्यादा करनी चाहिए जो स्वर्ग द्वारा पुण्य संचित करने और अच्छे काम करने के रूप में निर्दिष्ट की गई हैं—तब तुम भी ऐसे आशीषों का आनंद ले पाओगे। यह परिघटना, यह तथ्य लोगों को क्या बताता है? मानव जगत में किसी व्यक्ति का भाग्य कैसा भी हो—चाहे वह आशीषों का आनंद ले या दुर्घटनाओं का सामना करे, चाहे उसकी पूरी जिंदगी सुचारु हो या वह बहुत दुखों और आपदाओं का सामना करे—इसका उसके पिछले और मौजूदा जीवन से एक खास रिश्ता होता है। आखिरकार, उसका भाग्य क्या है, यह परमेश्वर द्वारा निर्धारित स्वर्गिक नियमों और कानूनों से जुड़ा है। उसने पिछले जीवन में जो कुछ भी किया, अगर वह स्वर्गिक नियमों और व्यवस्थाओं के प्रावधानों के अनुरूप था जिसके परिणामस्वरूप उसे पुरस्कार मिला, तो लोगों की नजर में, इस जीवन में उसका भाग्य शानदार, सुगम और बहुत अच्छा हो सकता है। अगर उसने पिछले जीवन में जो किया, उससे कई स्वर्गिक कानूनों का उल्लंघन हुआ और वह परमेश्वर द्वारा निर्धारित स्वर्गिक नियमों और कानूनों के उन प्रावधानों से मेल खाने वाला हुआ जिनका नतीजा सजा होती है, तो परमेश्वर उसके लिए जिस भाग्य की व्यवस्था करता है वह लोगों की नजर में यह होगा कि वह एक बहुत ही दुखद, दयनीय जीवन जिएगा, मानो यह जीवन उसके यहाँ आकर अपने पिछले कर्ज चुकाने के लिए ही हो। वह कभी अच्छे भोजन या वस्त्रों का आनंद नहीं लेता, और कोई उसे पसंद नहीं करता या उसकी परवाह नहीं करता। उसे लगता है कि यह उसके खराब भाग्य के कारण है कि वह इस जीवन में इतना दुख झेल रहा है। जब तक वह परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता, तब तक वह यह नहीं समझता कि व्यक्ति का पूरा जीवन परमेश्वर द्वारा नियत होता है। जब वह यह जान लेता है कि परमेश्वर चीजों को नियत करता है, तो उसके लिए परमेश्वर के सामने समर्पण करना आसान हो जाता है और वह बहुत ज्यादा आज्ञाकारी बन जाता है और फिर अपने भाग्य से नहीं लड़ता। पहले वह अंदर से अवज्ञाकारी महसूस करता था : “मैंने क्या बुरा किया है? इस जीवन में मेरा जमीर साफ है। मैंने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया। मुझे ऐसे भाग्य का सामना क्यों करना पड़ा? स्वर्ग निष्पक्ष नहीं है!” परमेश्वर का कार्य स्वीकारने के बाद वह समझता है : “यह परमेश्वर की धार्मिकता है। परमेश्वर ने मुझे इन चीजों के जरिए अपने सामने आने के लिए बाध्य किया है!” इस तरह सोचना भी सही है, और यह एक तथ्य है। लेकिन यह भी एक तथ्य है कि लोगों को जो सजा मिलती है वह परमेश्वर की संप्रभुता से आती है। यह सब—कारण और कार्य का चक्र, बुरे को सजा और अच्छे को पुरस्कार देना, और स्वर्गिक नियम और कानून—आखिरकार किस पर निर्भर करता है? इन सबके पीछे परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव है; परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही इन सबके ऊपर संप्रभु है। इसलिए जब लोगों के भाग्य में ऐसी तमाम तरह की चीजें आती हैं जो लोगों की धारणाओं, रुचियों या इच्छाओं के अनुरूप नहीं होतीं, तब भी लोगों के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता का मामला एक सकारात्मक चीज बना रहता है। क्या यह बात समझ में आती है? (हाँ।) अपनी मानवीय दयालुता के कारण जब तुम लोगों को दुख सहते देखते हो, तब तुम सोचते हो, “वह व्यक्ति कितना दयनीय है! मैं किसी को दुख सहते हुए नहीं देख सकता और मैं बुरे लोगों को दूसरों को परेशान करते हुए नहीं देख सकता।” कुछ लोग इस जीवन में हमेशा परेशान किए जाते हैं। इसका क्या कारण है? ऐसा इसलिए है क्योंकि अपने पिछले जीवन में उन्होंने हमेशा लोगों को परेशान किया और काफी लोगों को नुकसान पहुँचाया, इसलिए इस जीवन में उन्हें खुद परेशान किया जाता है। अगर तुम हमेशा लोगों को परेशान करते हो, तो आखिर में तुम्हें इसका यह फल मिलता है कि तुम्हें खुद परेशान होना पड़ता है। यह सृष्टिकर्ता की धार्मिकता है। इस तरह आचरण करके तुमने स्वर्गिक नियमों का उल्लंघन किया, इसलिए तुम्हें कीमत चुकानी होगी और पिछले जीवन में किए गए बुरे कामों के लिए पीड़ा और यातना सहनी होगी। यह परमेश्वर की धार्मिकता है और तुम इससे बच नहीं सकते। इसलिए, यह तथ्य कि लोगों के लिए तमाम तरह के भाग्य हैं, यह उत्तरोत्तर स्पष्ट कर देता है कि परमेश्वर द्वारा निर्धारित स्वर्गिक नियम और कानून कोई व्यक्ति नहीं बदल सकता, और कोई भी इसका अपवाद नहीं है। मानवजाति के लिए सृष्टिकर्ता की कभी दैहिक भावनाएँ नहीं रही हैं और बेशक, सृष्टिकर्ता का सार कोई दैहिक भावनाएँ न रखना है। उसमें सिर्फ एक धार्मिक स्वभाव है। परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह, इंसानी भाषा में, तर्कसंगत और धार्मिक होता है। तो इसे सत्य के परिप्रेक्ष्य से कैसे देखा जाना चाहिए? यह परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव है—ये सब सकारात्मक चीजें हैं। लोगों को इसे परमेश्वर से स्वीकारना चाहिए और परमेश्वर की कोई ऐसी आलोचना या मूल्यांकन नहीं करना चाहिए जो वास्तविकता के अनुरूप न हो या सत्य के अनुसार न हो। अगर तुम इंसानी परिप्रेक्ष्य से कुछ लोगों के प्रति सहानुभूति रखते हो और उन पर दया करते हो तो भी, परमेश्वर के ऐसे अनुयायी के तौर पर जो कुछ सत्य समझता है, तुम्हें परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की प्रशंसा करनी चाहिए और तुम्हें परमेश्वर की संप्रभुता की भी प्रशंसा करनी चाहिए। यह बहुत अच्छा है कि परमेश्वर इस तरह से संप्रभु है! चूँकि परमेश्वर इस तरह से लोगों के भाग्य पर संप्रभु है, इसीलिए मानवजाति आज तक एक व्यवस्थित तरीके से जीवित रह पाई है। अगर शैतान लोगों के भाग्य पर संप्रभु होता, तो मानवजाति बहुत पहले ही अराजकता में डूब गई होती और उसके लिए आज तक जीवित रहना असंभव होता। देखो दानव का राज्य कैसा है; परमेश्वर की संप्रभुता के बिना मानव जगत दानव के राज्य जैसा ही होगा। दानव का राज्य क्या है? इसका सबसे यथार्थ उदाहरण सीसीपी के तानाशाही शासन में होने वाले आंतरिक संघर्ष हैं—जो खुलेआम और गुप्त दोनों तरह से होते हैं—जो खून-खराबे और जानलेवा इरादों से भरे होते हैं। यही दानव का राज्य है। क्या सीसीपी के तानाशाही शासन की आंतरिक स्थिति अराजक नहीं है? लोग अक्सर गायब हो जाते हैं और जब उनकी साफ तौर पर हत्या कर दी जाती है तब भी कोई इसके बारे में घोषणा करने की हिम्मत नहीं करता। यह दानव के राज्य की अराजकता है और यह आज की बुरी दुनिया की अराजकता भी है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि लोगों के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता एक सकारात्मक चीज है। चाहे लोगों के भाग्य अभिकल्पित करने में परमेश्वर के मूल इरादे के परिप्रेक्ष्य से देखें या परमेश्वर द्वारा स्थापित स्वर्गिक नियमों और कानूनों द्वारा प्रस्तुत लोगों के भाग्य के नतीजों के परिप्रेक्ष्य से, यह संपूर्ण निश्चितता के साथ कहा जाना चाहिए कि लोगों के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता एक सकारात्मक चीज है, नकारात्मक नहीं। अगर तुम्हारे मन में इस सत्य के बारे में धारणाएँ हैं, तो तुम अपनी धारणाओं का समाधान करने के लिए परमेश्वर के वचनों में सत्य खोज सकते हो, लेकिन तुम अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर यह नहीं कह सकते, “परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन लोगों के भाग्य हमेशा उनके लिए अच्छे और फायदेमंद होने चाहिए। परमेश्वर की संप्रभुता की वजह से कुछ लोगों के साथ चीजें इतनी बुरी क्यों होती हैं? यह परमेश्वर की संप्रभुता नहीं होनी चाहिए, है ना?” तुम्हें ऐसी चीज कभी नहीं कहनी चाहिए। ऐसा अत्यधिक विद्रोहात्मक और ईशनिंदात्मक कथन तुम्हारे मुँह से कभी नहीं निकलना चाहिए। आज से तुम्हें यह सत्य स्वीकारना चाहिए और इसकी पुष्टि करनी चाहिए कि “लोगों के भाग्य परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं और परमेश्वर की संप्रभुता एक सकारात्मक चीज है।” इस पर शक मत करो। लोगों के जो भाग्य तुम अपनी आँखों से देखते हो या अनुभव करते हो, वे चाहे कैसे भी तुम्हारी धारणाओं से टकराते हों, या अगर तुम्हें लगता है कि वे अमानवीय हैं तो भी, तुम्हें यह विश्वास करना चाहिए और इसकी पुष्टि करनी चाहिए कि लोगों के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता वास्तविक है और वह एक सकारात्मक चीज है। इस बात पर शक नहीं किया जा सकता। क्या इस सत्य पर स्पष्ट रूप से संगति कर ली गई है? (हाँ।) यह परमेश्वर को जानने में एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है और यह हल हो गया है, है ना? (हाँ।) तो आज के लिए अपनी संगति हम यहीं खत्म करते हैं। अलविदा!

6 अप्रैल 2024

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