सत्य का अनुसरण कैसे करें (19) भाग दो
मानव सभ्यता और संस्कृति का गहन-विश्लेषण
“जो परमेश्वर द्वारा सृजित है,” इस विषय का दायरा बहुत बड़ा है, इसलिए हमें पहले कुछ उदाहरण देने होंगे और फिर उन पर एक-एक करके चर्चा करनी होगी। हमने अभी मच्छरों के बारे में बात की। यह कहना सही होगा कि किसी को भी मच्छर पसंद नहीं हैं या कोई भी उनके साथ अपनी इच्छा से रहना नहीं चाहता; इसके विपरीत, हर कोई मच्छरों से नफरत करता है और यहाँ तक कि अपनी पूरी जिंदगी में उन्हें कभी भी नहीं देखने की इच्छा रखता है। भले ही मच्छरों का मामला कोई बड़ा मामला नहीं है, लेकिन इसमें एक खास तरह की चीज शामिल है; इसमें परमेश्वर द्वारा सृजित लोगों, घटनाओं और चीजों में एक खास तरह की चीज की प्रकृति के बारे में लोगों की समझ भी शामिल है। बेशक, यहाँ मुख्य बात यह है कि इसमें लोगों का एक सत्य को जानना और समझना शामिल है; इसमें लोगों के जीवन में लोगों, घटनाओं और चीजों में एक खास तरह की चीज के साथ कैसा व्यवहार करना है, इसके अभ्यास के सिद्धांत भी शामिल हैं। इसलिए, भले ही मच्छर कोई बड़ा जीव नहीं है, लेकिन इसमें शामिल मामले छोटे नहीं हैं; लोगों के लिए उन्हें समझने और जानने की कोशिश करना सार्थक है। “जो परमेश्वर द्वारा सृजित है” की सामग्री में स्थूल और सूक्ष्म दोनों तरह के विषय शामिल हैं। अभी हमने सूक्ष्म पहलू की एक छोटी प्रजाति, मच्छर पर संक्षेप में संगति की। यह एक अपेक्षाकृत छोटा जीव है जिसे लोग खुली आँखों से देख सकते हैं; मच्छर से छोटी किसी भी चीज पर चर्चा करना सार्थक नहीं है। मच्छर एक ऐसा जीव है जिसके संपर्क में लोग अक्सर आते हैं, एक अपेक्षाकृत सूक्ष्म जीव जो खुली आँखों से दिखाई देता है। चूँकि यह मुद्दा सूक्ष्म स्तर का है, इसलिए हम इस पर बाद में चर्चा करेंगे। तो हमें सबसे पहले किस पहलू पर संगति करनी चाहिए? (स्थूल।) आओ, पहले स्थूल चीजों पर संगति करें। स्थूल चीजें बहुत-सी हैं। उनमें से जो लोगों के जीवन के सबसे करीब है या जिसके संपर्क में लोग आ सकते हैं, जिसे लोग महसूस कर सकते हैं, देख सकते हैं और जो हर किसी के लिए परिचित है—परमेश्वर द्वारा मनुष्य के जीने के लिए बनाए गए परिवेश में मौजूद वस्तुओं के अलावा—वह स्वयं मानवजाति है। जब मानवजाति की बात आती है, विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों में से, जिन्हें लोग देख सकते हैं, किनके बारे में बात करना सार्थक है? किन्हें समझना सार्थक है? मानव समाज की बात करें तो सबसे ज्यादा समझने लायक विषय तथाकथित मानव सभ्यता है। इस सभ्यता में शामिल मुख्य विषय अलग-अलग संस्कृतियाँ हैं। अलग-अलग संस्कृतियों का उदय विभिन्न समाजों की शिक्षा से होता है; विभिन्न समाजों की शिक्षा से अलग-अलग संस्कृतियाँ बनती हैं और इन अलग-अलग संस्कृतियों की पृष्ठभूमि में, अलग-अलग युगों में मानवजाति की तथाकथित सभ्यताएँ उभरी हैं। यही मानव सभ्यता का स्रोत और मूल है। पूर्वी समाज की अपनी सभ्यता है और बेशक उसकी अपनी तथाकथित संस्कृति भी है। इस संस्कृति का उदय पूर्वी समाज द्वारा अपने लोगों को शिक्षित करने के तरीके से होता है। इसी तरह, पश्चिमी समाज की भी अपनी तथाकथित सभ्यता है। पश्चिमी सभ्यता भी उसकी संस्कृति से आती है और उसकी संस्कृति का उदय भी पश्चिमी समाज की शिक्षा से होता है। कहने का मतलब यह है कि अलग-अलग युगों में पश्चिमी समाज की शिक्षा ने पश्चिमी संस्कृति को जन्म दिया है और ऐसी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में पश्चिमी सभ्यता धीरे-धीरे उभरी है, आकार लिया है और आज तक विकसित हुई है। चाहे पूर्वी संस्कृति हो या पश्चिमी संस्कृति, दोनों ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने-अपने संबंधित लोगों को इसी तरह शिक्षित करती रही हैं। अलग-अलग युगों में, उन्होंने लगातार एक-एक करके अगली पीढ़ी को शिक्षित और प्रभावित किया है और अलग-अलग युगों में इसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक फैलाया है; साथ ही, ये लगातार विकसित होती रही हैं और आगे बढ़ती रही हैं। इस तरह, पूर्वी और पश्चिमी संस्कृतियों और सभ्यताओं ने धीरे-धीरे आकार लिया है और विकसित हुई हैं, धीरे-धीरे लोगों द्वारा पहचानी और स्वीकारी गई हैं, धीरे-धीरे पूर्वी और पश्चिमी समाजों में आकार लेकर स्थापित हुई हैं। इससे पूर्व और पश्चिम की मुख्यधारा की संस्कृतियों और सभ्यताओं का निर्माण हुआ है। पूर्व की अपनी मुख्यधारा की संस्कृति और सभ्यता है, उसी तरह पश्चिम की भी अपनी मुख्यधारा की संस्कृति और सभ्यता है। पूर्वी और पश्चिमी समाजों ने सार, स्वरूप और मानवजाति पर अपने प्रभाव के मामले में अलग-अलग संस्कृतियों और सभ्यताओं का निर्माण किया है। चाहे पूर्वी संस्कृति हो या पश्चिमी संस्कृति, दोनों का लोगों के जीवन, अस्तित्व, विचारों और दृष्टिकोणों पर एक अमिट, अप्रतिरोध्य या अपूरणीय प्रभाव पड़ा है। चूँकि हम पूर्वी और पश्चिमी संस्कृतियों के बारे में बात कर रहे हैं, इसलिए निश्चित रूप से उनमें भिन्नताएँ हैं। पूर्वी संस्कृति के अपने प्राथमिक विचार और दृष्टिकोण हैं जिन्हें वह महत्व देती है, जबकि पश्चिमी संस्कृति की अपनी विशेषताएँ, प्राथमिक विचार और दृष्टिकोण हैं जिन्हें वह महत्व देती है। तो पूर्वी संस्कृति किस चीज को महत्व देती है? पूर्वी संस्कृति मुख्य रूप से क्या सिखाती है? अधिकांश लोग इस पहलू को ठीक से नहीं समझते। तुममें से कुछ लोग पूरी तरह हैरान हो सकते हैं : “तुम इस दृष्टिकोण से सकारात्मक चीजों के बारे में क्यों बात कर रहे हो?” कई स्थूल चीजों में स्वाभाविक रूप से कई अमूर्त घटक होते हैं। भले ही तुम लोग अभी तक इस पहलू को नहीं समझते, लेकिन अगर तुम ध्यान से सुनोगे, तो समझ जाओगे।
आओ, पहले पूर्वी संस्कृति के बारे में बात करते हैं। पूर्वी संस्कृति किस बात को महत्व देती है? इसका सार क्या है? लोगों पर इसका क्या प्रभाव है? पूर्वी संस्कृति की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं जिन्हें तुमने व्यक्तिगत रूप से महसूस किया है या जिन्हें तुमने लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने के सूक्ष्म प्रभाव के जरिए देखा, समझा या एहसास किया और सीखा है? जब हम संस्कृति की बात करते हैं, इसका संबंध शिक्षा से होता है। चाहे वह शिक्षा परिवारों से मिले, स्कूल से मिले या समाज से, इन सबका संबंध संस्कृति से है; यह किसी राष्ट्र या लोगों के किसी खास समूह की शिक्षा से संबंधित है। शिक्षा एक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि बनाती है—यह निश्चित है। क्या तुम लोग जानते हो कि पूर्वी संस्कृति किस तरह की शिक्षा को महत्व देती है? (पूर्वी संस्कृति परंपरा को बहुत महत्व देती है।) तो परंपरा का सार क्या है? “परंपरा” एक अवधारणा है। इस अवधारणा में कौन-सी विशिष्ट बातें शामिल हैं? इसमें ये अपेक्षाएँ शामिल हैं कि तुम्हें कैसे सोचना चाहिए, तुम्हें क्या करना चाहिए और तुम्हें किस दिशा में और किस लक्ष्य की ओर खुद को आगे बढ़ाना चाहिए। यही इसकी शिक्षा का विशिष्ट सार है। पूर्वी समाज जिस शिक्षा को महत्व देता है, वह सामाजिक नैतिक शिक्षा है और इस सामाजिक नैतिक शिक्षा में भी विशिष्ट बातें शामिल हैं। उदाहरण के लिए, पूर्वी समाज में अक्सर प्रचारित की जाने वाली एक वैचारिक प्रवृत्ति है दूसरों को मनाने के लिए सूझ-बूझ का उपयोग करना। क्या यह उनमें से एक है? (हाँ।) बल से पहले शालीनता, शालीनता से दूसरों के सामने झुकना और “प्रधानमंत्री का दिल इतना बड़ा होता है कि उसमें एक नाव चल जाए” भी उनमें हैं। इसके अलावा, “सामंजस्य एक निधि है; धीरज एक गुण है,” और “समझौते से संघर्ष को सुलझाना आसान हो जाएगा” भी हैं। और क्या? “सज्जन के बदला लेने में देर क्या और सबेर क्या,” “जहाँ जीवन है वहाँ आशा है,” “एक महान व्यक्ति जानता है कि कब झुकना है और कब खुद को साबित करना है” और “एक सच्चे इंसान की महत्वाकांक्षा दूरगामी होती है।” और क्या? (क्या “संतानोचित धर्मनिष्ठा का गुण सबसे ऊपर रखना चाहिए” को भी गिना जाएगा?) उसे भी गिना जाएगा। साथ ही, “जब कोई दोस्त दूर से आता है तो कितना आनंद होता है” भी है, जो मेहमाननवाजी से संबंधित है। और क्या? (“मैं अपने दोस्त के लिए गोली भी खा लूँगा” और “दूसरों पर वह मत थोपो जो तुम अपने लिए नहीं चाहते।”) पूर्वी शिक्षा में इन सभी अवधारणाओं के जरिए जो प्रभाव हासिल करने का इरादा होता है वह यह है कि लोग सामाजिक नैतिकता को महत्व दें; ये अवधारणाएँ लोगों को सिखाती हैं कि उन्हें समाज में शिष्टाचार के किन नियमों का पालन करना चाहिए और ये लोगों को इस तथाकथित शिष्टाचार को व्यक्ति के चरित्र के प्रतीक के रूप में मानने के लिए प्रेरित करती हैं। पूर्वी शिक्षा लोगों के व्यवहार का नियमन करने के लिए इन चीजों का इस्तेमाल करती है। अगर कोई व्यक्ति समाज में स्थापित होना चाहता है, तो उसे सबसे पहले यह पक्का करना होगा कि वह सभी मामलों में दूसरों से सराहना, उच्च सम्मान और आदर प्राप्त करे। मानवता के ऐसे गुणों वाले नैतिक चरित्र को प्राप्त करने पर ही किसी व्यक्ति को सच में एक अच्छा इंसान माना जा सकता है। ऐसी शिक्षा प्राप्त करने के बाद, लोग तथाकथित नैतिक चरित्र के बारे में इन विचारों का उपयोग खुद को बाधित करने के लिए करते हैं और इन अपेक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करते हैं। यह पूर्वी शिक्षा लोगों को बाहरी तौर पर शिष्टाचार का पालन करना सिखाती है, ताकि वे शालीन, अच्छे व्यवहार वाले लोग, उत्तम नैतिक चरित्र वाले लोग दिखें। जहाँ तक यह बात है कि लोग अंदर से क्या सोच रहे हैं, मानवता की जो भी जरूरतें, कामनाएँ या यहाँ तक कि महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ उनके पास हैं, उन सभी को दबा दिया जाना चाहिए और उनके दिलों में गहराई से दफन कर दिया जाना चाहिए, ताकि वे उजागर न हों। हमने पहले भी पूर्वी शिक्षा के इस पहलू पर काफी संगति की है। वैचारिक शिक्षा की इन सभी अवधारणाओं की प्रकृति क्या है? क्या वे मानवता की जरूरतों के अनुरूप हैं? क्या वे मानवता के सार के अनुरूप हैं? (नहीं।) ठीक इसी वजह से कि इस पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा के तहत लोगों द्वारा जिया गया और प्रकट किया गया व्यवहार लोगों के सार और उनकी मानवता की जरूरतों के बिल्कुल विपरीत है, इससे एक बात पूरी तरह से साबित होती है : यह पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा जिन विभिन्न विचारों की हिमायत करती है वे लोगों की वास्तविक स्थितियों और उनकी मानवता के भीतर वास्तव में मौजूद चीजों के खिलाफ जाते हैं। लोगों की वास्तविक समस्याओं को छिपाने और उन्हें समाज में अधिक सम्मानजनक तरीके से जीने देने, अधिक श्रेष्ठ और दूसरों की स्वीकृति के अधिक योग्य दिखने के लिए, यह सामाजिक नैतिक शिक्षा पूर्वी समाज में अस्तित्व में आई। इस प्रकार, यह कहा जाना चाहिए कि इस तरह के संदर्भ में शिक्षा दिखावे की शिक्षा है। इस दिखावे की शिक्षा का सार या अभिप्रेत प्रभाव, हर व्यक्ति को यह सलाह देना है कि वे दूसरों के सामने अपना असली चेहरा उजागर न करें—चाहे उनका चरित्र कैसा भी हो और उनकी पृष्ठभूमि कुछ भी हो, उन्हें खुद को छिपाना और मुखौटा लगाना सीखना चाहिए, ताकि वे दूसरों के सामने अधिक गरिमा और गौरव के साथ रह सकें, आत्म-सम्मान के साथ रह सकें और इस तरह से जी सकें कि उन्हें समादर और स्वीकृति मिले।
दिखावे वाली इस पूर्वी शिक्षा के संदर्भ में, पूरब के लोगों ने क्या सीखा है? उन्होंने दबना और सहना सीखा है। पूर्वी वैचारिक शिक्षा ने पूरब के लोगों की मानवता के अंदर एक खास गुण पैदा किया है और इस गुण का परिणाम—चाहे सोच के स्तर पर देखा जाए या व्यवहार के मामले में—यह है कि यह लोगों को सिखाता है कि कैसे दबना और सहना है। विशिष्ट तौर पर, किसी भी सामाजिक दौर में, किसी भी शासक वर्ग के अधीन और किसी भी जीवन परिवेश में, सभी तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना होने पर, लोगों को सीखना चाहिए कि कैसे दबना और सहना है और अपनी सच्ची भावनाओं और विचारों को प्रकट नहीं करना है। इसे “दबना और सहना” कहना तो बात को अच्छा बनाकर कहना है; असल में यह दिखावा है। और लोग इस दिखावे के लिए किस चीज का इस्तेमाल करते हैं? वे खुद को छिपाने के लिए पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा या पूर्वी संस्कृति से लिए गए अलग-अलग विचारों, दृष्टिकोणों, स्व-आचरण की युक्तियों और सांसारिक आचरण के फलसफों का इस्तेमाल करते हैं, ताकि बाहर से वे शालीन, अच्छे व्यवहार वाले लोग, सत्यनिष्ठा और गरिमा से युक्त उत्तम नैतिक चरित्र वाले लोग दिखें, जो दूसरों का उच्च सम्मान, स्वीकृति और समादर हासिल करने में सक्षम हों। यह लोगों पर पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा का प्रभाव है; इसका मुख्य प्रभाव यह है कि लोग आखिर में दबना और सहना सीख जाते हैं। “दबना और सहना” शब्द में लोगों को सभी चीजें सहने की अपेक्षा करना, दूसरों को मनाने के लिए सूझ-बूझ का उपयोग करना और लोगों से व्यवहार करते समय बल का सहारा लेने से पहले शालीन बनना, दूसरों के साथ अत्यधिक दयालुता से पेश आने की कोशिश करना शामिल है। यह ऐसा है जैसे वे खास तौर पर बहुत उदार हैं, उनमें दया और सहनशीलता वाला दिल है; वे खुद को खास तौर पर महान और श्रेष्ठ दिखाते हैं, यहाँ तक कि इंसानी नैतिकता की ऊँचाई से सभी चीजों को तुच्छ समझते हैं। इसलिए, इस पूर्वी सांस्कृतिक संदर्भ में, पूरब के लोगों का सांस्कृतिक जीवन मूल रूप से इन विचारों और अवधारणाओं से भरा हुआ है। साथ ही, इस संस्कृति का इस्तेमाल अगली पीढ़ी को लगातार शिक्षित और प्रभावित करने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, फिल्म और टेलीविजन नाटकों में, कुछ विचारों को अक्सर बढ़ावा दिया जाता है, जिनमें से एक है, “महान शूरवीर अपने देश और लोगों के लिए अपनी भूमिका निभाते हैं।” लोगों के मन में एक महान शूरवीर नायक की छवि क्या है? मार्शल आर्ट फिल्मों में तुम देखते हो कि ज्यादातर महान शूरवीर नायक आकर्षक और सुसंस्कृत होते हैं, सिर पर बाँस की टोपी पहने होते हैं और कमर में तलवार या कटार होती है। वे भावहीन और निस्वार्थ होते हैं; दुनिया, आम लोगों और सभी जीवों को अपने दिल में रखते हैं; वे न्याय को कायम रखते हुए, अच्छे काम करते हुए और पुण्य कमाते हुए घूमते हैं। जब वे अन्याय देखते हैं, तब मदद के लिए अपनी तलवारें निकाल लेते हैं, जरूरत पड़ने पर कार्रवाई करते हैं। यह लोगों के मन में एक महान शूरवीर नायक की छवि है और यही वह मूल्य भी है जो ऐसे किरदारों का लोगों के मन में होता है। फिल्म और टेलीविजन नाटकों में ऐसे किरदार गढ़ने का कारण यह है कि पूरब के सभी लोगों के दिलों में समाज और मानवजाति के प्रति ऐसी ही चाहत होती है। वे चाहते हैं कि ऐसे लोग समाज या जीवन में मौजूद हों, ताकि उन्हें खुद दबने और सहने की जरूरत न पड़े, वे इस सामाजिक संस्कृति से बंधे और जकड़े न रहें। लोगों की ठीक इसी जरूरत के कारण कुछ साहित्यिक और कलात्मक रचनाओं में ऐसे किरदार लगातार गढ़े जाते हैं। यह सांस्कृतिक प्रचार की जरूरतों को पूरा करता है और यह दर्शकों की जरूरतों को भी पूरा करता है। आम लोग समाज में बहुत लंबे समय से और बहुत दर्दनाक तरीके से दबते और सहते रहे हैं; उन्हें एक रास्ता चाहिए, लेकिन उनके पास कोई रास्ता नहीं है। वे केवल इन साहित्यिक और कलात्मक रचनाओं में गढ़े गए नायक किरदारों और महान शूरवीरों में ही संतुष्टि पा सकते हैं। इसलिए, फिल्म और टेलीविजन की ऐसी रचनाएँ और ऐसे किरदार जनता द्वारा स्वीकारे जाते हैं और उनकी प्रशंसा की जाती है। जब जनता देखती है कि फिल्मों और टेलीविजन नाटकों में इन महान शूरवीर नायकों के धार्मिक कर्म—या अन्याय देखकर मदद के लिए तलवारें निकालने के उनके कृत्य—उनकी मनोवैज्ञानिक जरूरतों से पूरी तरह मेल खाते हैं, तब वे सभी ताली बजाते हैं और जय-जयकार करते हैं, चिल्लाते हैं, “तुम्हारे साथ यही होना चाहिए! बुराई करने का यही नतीजा मिलता है! लोगों को नुकसान पहुँचाने का यही नतीजा मिलता है!” उनकी जय-जयकार दबने और सहने के उस दर्द को दर्शाती है जिसका पूरब के लोग अपने दैनिक जीवन में अनुभव करते हैं; साथ ही, यह समाज और शासक वर्ग से उनके द्वारा सहन किए जाने वाले भारी, बहुस्तरीय दबाव और बड़े नुकसान को भी दर्शाती है। इसलिए, मनोरंजन की ऐसी रचनाओं का आम लोग दिल से स्वागत करते हैं, उन्हें स्वीकृति देते हैं और उनकी चाहत रखते हैं।
इस पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा से पैदा हुए दबाव और सहनशीलता ने ही पूरब के लोगों को उनकी सोच और मानवता के मामले में अधिकतम संभव सीमा तक बाँध दिया है और सीमित कर दिया है, जिससे उनकी मानवता और सोच बहुत विकृत हो गई है। यह विकृति कैसे अभिव्यक्त होती है? यह इस तथ्य में अभिव्यक्त होती है कि हर कोई अपने मन में अधिकारियों और अमीरों के लिए नफरत पालता है; जब वे कुछ अन्याय देखते हैं, तब उन्हें अंदर से नफरत महसूस होती है और वे तुरंत इसे शासक वर्ग या अमीरों से जोड़ देते हैं, यह महसूस करते हुए कि उनका सारा दर्द उन्हीं की वजह से है। यह एक पहलू है। इसके अलावा, क्योंकि पूरब की सामाजिक नैतिक शिक्षा लोगों में दबने और सहन करने वाला चरित्र पैदा करती है, इसलिए पूरब के लोगों के विचार काफी हद तक बंधे हुए और जकड़े हुए हैं। पश्चिमी लोगों की तुलना में, पूरब के लोगों के लिए सोच के स्तर पर स्वतंत्र सोच या विचारों की स्वतंत्रता हासिल करना मुश्किल है; यानी, वे मुक्त भाव से, स्वायत्त रूप से और स्वतंत्र रूप से सोचने और तर्क करने में समर्थ नहीं हैं। इसलिए, पूरब के सामाजिक परिवेश में बच्चों से लेकर बड़ों तक हर किसी में गुलामी का गुण होता है; उनके लिए किसी समस्या के बारे में स्वतंत्र रूप से सोचना या सिद्धांतों और योजनाओं के अनुसार स्वतंत्र रूप से कोई काम पूरा करना मुश्किल होता है। एक और पहलू यह है कि पूरब के लोगों का दबाव और सहनशीलता उन्हें समाज, मानवजाति और हर सामाजिक वर्ग के प्रति शत्रुतापूर्ण बना देती है। इससे उनमें अपनी मानवता के संदर्भ में अपेक्षाकृत धूर्तता का गुण भी विकसित हो गया है, जिसे एक तरह का घटियापन कहा जा सकता है। क्योंकि यह दुनिया इतनी अन्यायपूर्ण है, लोगों को समाज, अपने काम के परिवेश और अपने परिवारों से अलग-अलग दबावों और बंधनों का सामना करना पड़ता है और इसका नतीजा यह होता है कि उनकी मानवता की सामान्य जरूरतें—उनकी सामान्य भावनात्मक और भौतिक जरूरतें—उचित या निष्पक्ष रूप से पूरी नहीं हो पाती हैं। इस तरह, हर कोई अपने जीवन के प्रति लापरवाह, निंदक या दुनिया से ऊबा हुआ रवैया रखता है। यह रवैया पूरब के लोगों को महसूस कराता है कि जीने की उम्मीद बहुत कम है; उन्हें जीने की कोई प्रेरणा महसूस नहीं होती और वे जो भी करते हैं उसमें उनका दिल नहीं लगता। इस तरह, वे दुनिया से निपटने के लिए एक चालाक और धूर्त रवैया अपना लेते हैं और इस चालाकी और धूर्तता को “घटियापन” कहा जा सकता है। इस “घटियापन” का क्या मतलब है? इसका मतलब है हर काम में लापरवाह रवैया अपनाना। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों का अपना कर्तव्य निभाने के प्रति रवैया यह होता है कि वे मनमाने ढंग से काम करते हैं—अगर उनका मन करता है, तो वे थोड़ा काम करते हैं; अगर उनका मन नहीं करता है, तो काम नहीं करते। जब उनके काम में थोड़ा भी दबाव आता है तब वे शिकायत करते हैं कि यह कितना मुश्किल है, और वे आराम करना चाहते हैं। अगर तुम उनके साथ सत्य पर संगति करते हो और उन्हें बताते हो कि इस तरह वे काम में देरी करेंगे, तो वे कहते हैं, “जो भी हो। मुझे अभी आराम करने का मन है। मैं थोड़ी देर मजे करना चाहता हूँ!” वे जो भी करते हैं उसमें उनका रवैया गंभीर और जिम्मेदार नहीं होता। चाहे वह काम की बात हो, उनके दैनिक जीवन की बात हो या यहाँ तक कि उनके पूरे जीवन और उनकी आस्था की बात हो, वे भ्रमित होते हैं, उनका रवैया गंभीर नहीं होता और वे लापरवाह रवैया अपनाते हैं। वे जहाँ भी जाते हैं, सीधे घुस जाना चाहते हैं। जब वे बाधाओं का सामना करते हैं, तब उन्हें बिल्कुल भी फर्क नहीं पड़ता; वे यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि उन्हें विनियमित किया जाए और वे आजादी का आनंद लेना चाहते हैं। अगर उन्हें आजादी मिलती है, तो वे लापरवाही से बुरे कर्म करते हैं; अगर वे अपनी आजादी खो देते हैं, तो हर किसी के बारे में और हर चीज के बारे में शिकायत करते हैं। उनका रवैया ऐसा ही होता है। क्या यह घटियापन नहीं है? (हाँ।) यही वह अनूठा चरित्र है जो पूरब के लोगों ने पूरब के सामाजिक परिवेश में विकसित किया है। कुछ लोग दबने और सहने में भी माहिर होते हैं; वे कुछ भी सह सकते हैं और काफी लंबे समय तक ऐसा कर सकते हैं। उनमें असाधारण सहनशीलता और कठिनाइयों से उबरने की क्षमता होती है, वे किसी भी कठिनाई को सह सकते हैं, किसी भी परिवेश में जीवित रह सकते हैं, किसी भी परिवेश में मुस्कुरा सकते हैं और तब भी रात को सोने का समय होने पर बिना एक भी आंसू बहाए सो सकते हैं। उदाहरण के लिए, जब बाढ़ आती है और कुछ लोगों के घर, खेत और मवेशी सब डूब जाते हैं, तो वे ज्यादा दर्द में नहीं दिखते। वे केवल बाढ़ में कीमती चीजें उठाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, अमीर बनने की योजना बनाते हैं। दूसरे उन्हें चेतावनी देते हैं, “इस तरह चीजें उठाते हुए अपनी जान जोखिम में डालना सुरक्षित नहीं है!” वे जवाब देते हैं, “बाढ़ आना अमीर बनने का एक सही अवसर है। ऐसा अवसर मुश्किल से मिलता है!” दूसरे कहते हैं, “हमारे खेत डूब गए हैं, हमारा सारा अनाज पानी में बह गया है, सरकार कोई राहत नहीं दे रही है और कोई मदद करने नहीं आ रहा है। हम कैसे जिएँगे? इस दुनिया में जीवन बहुत मुश्किल है। इससे अच्छा तो हम मर ही जाएँ!” लेकिन वे कहते हैं, “जब आपदा आती है, तो तुम्हें खुद पर भरोसा करना होता है। स्वर्ग हमेशा मनुष्य के लिए एक रास्ता छोड़ेगा। बाढ़ आना अमीर बनने का एक शानदार अवसर है। यह बिना पूँजी के किया जाने वाला और बहुत अधिक मुनाफा देने वाला कारोबार है। भले ही हमने कुछ चीजें खो दी हों, हम कुछ दूसरी चीजें वापस हासिल कर लेंगे—इससे नुकसान की भरपाई अच्छे से हो जाएगी और शायद थोड़ा मुनाफा भी हो जाए!” तुम देखो, आम लोगों को आपदा आने और नुकसान होने पर दर्द होता है, लेकिन पूरब के लोगों में ऐसे “शूरवीर लोग” भी होते हैं—उन पर चाहे कोई भी आपदा आए, वे धारा के साथ चल सकते हैं और अमीर होने के अवसर भी ढूँढ़ सकते हैं। वे परेशान नहीं होते और न ही दुखी महसूस करते हैं; अगर सरकार उन्हें राहत नहीं देती है या उनकी समस्याएँ हल नहीं करती है, तो भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। यह कुछ ऐसा है जैसे इतनी सारी आपदाएँ झेलने के बाद उन्हें इसकी आदत हो गई है। क्या चीनी समाज ऐसा ही नहीं है? तो चीनी समाज में इस तरह की शिक्षा को देखते हुए, लोग जिन साहित्यिक और कलात्मक रचनाओं में अपना खाली समय व्यतीत करते हैं या जिस तरह से वे आराम करते हैं, वे ज्यादातर खुद को नीचा दिखाने और खुद का मजाक उड़ाने के तरीके होते हैं। इस तरह चीनी लोग अपना मनोरंजन करते हैं और अपने दिलों में बने हुए दबाव से थोड़ी राहत पाते हैं। लेकिन बाद में, दैनिक जीवन में वे पहले की तरह दिखावा करते रहते हैं और दबते और सहन करते रहते हैं। सरकार उनके साथ कैसा भी व्यवहार करे, आम लोगों को इस तरह के व्यवहार की आदत-सी हो गई है। जब तक वे भूखे नहीं मरते, वे संतुष्ट महसूस करते हैं; जब तक मौत के आसन्न होने का खतरा न हो, वे विद्रोह करने के बारे में नहीं सोचते। आम लोगों ने ऐसी बातों को मान लिया है: “बुरा जीवन भी अच्छी मृत्यु से बेहतर है; स्वर्ग हमेशा मनुष्य के लिए एक रास्ता छोड़ेगा। चलो बस ऐसे ही जीते हैं! मानवाधिकार? लोकतंत्र? ये तो फिजूल इच्छाएँ हैं। हम चीनी लोग इसी दुर्भाग्य के साथ पैदा हुए हैं। जब तक हम जीवित रह सकते हैं, बस वही काफी है!” क्या यह हद से ज्यादा मंदबुद्धि और सुन्न होना नहीं है? क्या उनमें इंसान के तौर पर कोई गरिमा बची है? (नहीं।) यह एक काफी दयनीय स्थिति है।
पूरब में बनी अधिकांश साहित्यिक और कलात्मक रचनाएँ पश्चिम की रचनाओं से इस मामले में बहुत अलग हैं कि वे क्या प्रतिबिंबित करती हैं और किस चीज की हिमायत करती हैं। हालाँकि पूर्वी साहित्यिक और कलात्मक रचनाएँ कुछ सामाजिक अन्यायों को अवश्य प्रतिबिंबित करती हैं, लेकिन यह वह सोच नहीं है जिसकी निर्देशक या पटकथा लेखक सच में हिमायत करते हैं, और यह दर्शकों की कुछ जरूरतों को संतुष्ट करने के लिए नहीं किया जाता है। वे इन रचनाओं में वास्तव में किस चीज की हिमायत करते हैं? वे अभी भी पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा की हिमायत करते हैं। इसकी मुख्य अभिव्यक्तियाँ देशभक्ति की भावनाएँ हैं, इस बात की हिमायत करना है कि लोगों को अपने देश से प्यार करना चाहिए, अपने देश और लोगों की चिंता करनी चाहिए, “दूरगामी महत्वाकांक्षाओं वाला सच्चे इंसान” बनना चाहिए, अन्याय देखने पर मदद के लिए तलवार निकालनी चाहिए और दोस्त के लिए गोली भी खा लेनी चाहिए। वे और किस चीज की हिमायत करते हैं? “समझौते से संघर्ष को सुलझाना आसान हो जाएगा” और “सज्जन के बदला लेने में देर क्या और सबेर क्या।” जिस मानवता का वे समर्थन करते हैं, वह असल में खोखली है; यह बस लोगों की कल्पनाएँ और अनुमान हैं। वे सिर्फ शासक वर्ग के शासन की स्थिरता की खातिर इसका समर्थन करते हैं, ताकि लोग बिना किसी प्रतिरोध की अनुमति के, हमेशा शासक वर्ग के लिए बोझ ढोने वाले जानवरों की तरह गुलामी करते रहें। इन खोखले विचारों का इस्तेमाल लोगों को सुन्न करने और गुमराह करने के लिए, उनकी मनोरंजन की जरूरत और उनके दिलों की अस्थायी जरूरतों को संतुष्ट करने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, मार्शल आर्ट वाले उपन्यासों या फिल्म और टेलीविजन नाटकों में किस चीज की हिमायत की जाती है? शूरवीरता की भावना की, एक महान शूरवीर नायक बनने की, जो अमीरों को लूटकर गरीबों की मदद करता है और दूसरों की मदद के लिए अपनी तलवार निकालता है। तथाकथित महान शूरवीर नायक इस कहावत में दिखता है, “महान शूरवीर अपने देश और लोगों के लिए अपनी भूमिका निभाते हैं।” शूरवीरता की भावना को बढ़ावा देने से आम लोग न केवल ऐसे किरदारों की प्रशंसा करते हैं, बल्कि इस तरह का इंसान बनने की इच्छा भी रखते हैं और उसका अनुसरण करते हैं। पूर्वी साहित्यिक और कलात्मक रचनाओं में और किस चीज की हिमायत की जाती है? वे नायक बनने की हिमायत करती हैं: देश के लिए, राष्ट्र के लिए और किसी क्षेत्र और उसके लोगों की भलाई के लिए अपने दिल और दिमाग को खपाने, राष्ट्र के महान उद्देश्य के लिए अपनी जवानी और जीवन बलिदान करने की हिमायत करती हैं। संक्षेप में, पूर्वी—और खासकर चीनी—सामाजिक परिवेश में बनी मार्शल आर्ट हस्तियों की ये जीवनियाँ और किंवदंतियाँ, चाहे वे पारंपरिक हों या आधुनिक, काल्पनिक हों या असली ऐतिहासिक हस्तियों और घटनाओं पर आधारित हों, सभी लोगों को निस्वार्थता और आत्म-त्याग के लिए प्रयास करना सिखाती हैं। वे सभी इसे अपना मूल विषय और मुख्य शिक्षा मानती हैं, जिसका लक्ष्य लोगों में उत्तम सामाजिक नैतिक मूल्य पैदा करना है। निस्वार्थता और आत्म-त्याग का मतलब है खुद का कोई अस्तित्व नहीं होना; वे इस बात की हिमायत करती हैं कि समग्र हित व्यक्तिगत हित से पहले आता है, अपना देश अपने परिवार से पहले आता है और केवल इसी तरह से कोई व्यक्ति अच्छा जीवन जी सकता है। यही सोच वे लोगों में डालती हैं। यानी, वे तुम्हें स्वार्थी नहीं बनना, सिर्फ अपने बारे में नहीं सोचना, अपने जीवन, अपनी उत्तरजीविता या खुद से जुड़ी किसी भी चीज के लिए कोई त्याग या प्रयास नहीं करना और यहाँ तक कि इन चीजों के लिए किसी भी तरह से संघर्ष नहीं करना सिखाती हैं। इसके बजाय, तुम्हें अपने देश के लिए, समाज के लिए, मानवजाति के लिए और राष्ट्र के महान उद्देश्य के लिए खुद को बलिदान करना और योगदान देना है। इन शिक्षाओं को सामूहिक रूप से दिखावे की शिक्षा कहा जाता है। यह तथाकथित दिखावे की शिक्षा गैर-यथार्थवादी है और मानवता की जरूरतों के अनुरूप नहीं है; लोगों की मानवता की जरूरतों, उनकी सहज प्रवृत्ति और जीने के उनके मौलिक अधिकार को छीनकर, यह लोगों को देश और राष्ट्र के लिए, एक खोखले, बेमतलब के उद्देश्य के लिए निरर्थक त्याग करने को मजबूर करती है। आत्म-त्याग का यह गुण पूरी तरह से कुछ ऐसा है जिसे पूर्वी समाज ने लोगों की मानवता में जबरन डाला है। “जबरन डालने” का मतलब है कि यह कुछ ऐसा नहीं है जो मानवता से स्वाभाविक रूप से पैदा होता है, यह मानवता की सहज प्रवृत्ति का हिस्सा नहीं है, यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे सहज प्रवृत्ति हासिल कर सकती है और यह कुछ ऐसा भी नहीं है जिसे किसी की सहज स्वतंत्र इच्छा या व्यक्तिपरक इच्छा हासिल करना चाहेगी। बल्कि यह कुछ ऐसा है जिसे शासक वर्ग या समाजशास्त्री लोगों के मन में जबरन डालते हैं, उन्हें ऐसे सामाजिक दायित्वों और जिम्मेदारियों को स्वीकारने के लिए गुमराह या मजबूर करते हैं और फिर उन्हें तथाकथित “महान नैतिक चरित्र” के विशाल बैनर तले शिक्षित करते हैं, जिससे वे आजाद होने की ताकत खो देते हैं और कोशिश करने से भी डरते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि अगर तुम इस शिक्षा से आजाद हो जाते हो या इससे बाहर निकल जाते हो, अगर तुम इस शिक्षा को नहीं स्वीकारते हो, तो तुम पूरे समाज और पूरे राष्ट्र के दुश्मन बन जाते हो—तुम घोर विद्रोही, अमानवीय और एक अजीब इंसान बन जाते हो और तुम्हें ऐसे जीवन परिवेश का सामना करना पड़ेगा जिसमें तुम अकेले पड़ जाओगे। इसलिए, भले ही लोग अपने दिलों में कुछ असंतोष महसूस करें, भले ही वे इस समाज और इस तरह की शिक्षा से नफरत करें, उनमें इससे आजाद होने की न तो ताकत है और न ही हिम्मत; इसे “ना” कहने की हिम्मत तो और भी नहीं है। वे बस मन मसोसकर इसे सह सकते हैं—उनमें प्रतिरोध करने की शक्ति नहीं है और वे बस चुपचाप इसे सह सकते हैं। अगर तुम सहन नहीं करते हो, तो बड़े पैमाने पर, समाज तुम्हें बुरा-भला कहेगा और तुम्हें ठुकरा देगा; और छोटे पैमाने पर, तुम्हारा परिवार और परिजन तुम्हें ठुकरा देंगे, तुमसे दूरी बना लेंगे और तुम्हें अलग-थलग कर देंगे, यहाँ तक कि तुम्हें अत्यंत विद्रोही कहकर तुम्हारी निंदा करेंगे। आओ, एक उदाहरण देखते हैं। मान लो कि जब तुम बच्चे थे, तो तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें यह सिखाया: “जब तुम बाहर जाओ और बड़ों को देखो, तो उनका अभिवादन करना। हमसे छोटे लोगों को ‘अंकल’ या ‘आंटी’ कहना और बुजुर्गों को ‘दादाजी’ या ‘दादीजी’ कहना। जब कोई तुम्हें कुछ दे, तो तुम्हें ‘धन्यवाद’ कहना है। अगर कोई दूसरा बच्चा तुम्हें मारे, तो तुम्हें इसे सहन करना होगा; पलटवार तभी करना जब तुम वास्तव में और सहन नहीं कर सको। तुम्हें बहुत ज्यादा संयम दिखाना होगा।” और एक दिन, तुम बाहर गए और किसी को देखा, लेकिन क्योंकि तुम शर्मीले थे, इसलिए तुमने उनका अभिवादन करने की हिम्मत नहीं की। तुम्हारे माता-पिता को लगा कि उनकी बेइज्जती हुई है, इसलिए जब तुम घर आए तो उन्होंने तुम्हें अनुशासित किया और तब से जब भी तुम किसी को देखते हो तो जल्दी से अभिवादन करते हो। मार खाने से बचने के लिए, चाहे तुम्हें कितनी भी शर्म महसूस हो या अंदर से तुम कितने भी अनिच्छुक हो, फिर भी तुम्हें अपनी इच्छा के खिलाफ जाकर लोगों का अभिवादन करना पड़ा। ऐसे परिवेश में बड़े होकर, सब कुछ सहन करने के अलावा कोई चारा नहीं होता। इतनी मामूली-सी बात में भी तुम्हें यही करना पड़ता है; चाहे घर पर हो या समाज में, तुम बस यही कर सकते हो। अगर तुम्हें असहज महसूस होता है और तुम एक बार अपनी मनमानी करना चाहते हो, समाज के बुरा-भला कहने की तो बात ही छोड़ो—तुम्हारा परिवार और माता-पिता भी तुम्हें नसीहत देंगे और डाँटेंगे। बड़े होने के बाद, तुम्हें एहसास होता है कि लोगों का अभिवादन करना इज्जत बचाने और समाज में अपनी जगह बनाना आसान करने की खातिर होता है। लेकिन जब तुम बच्चे थे, तुम इसे समझ नहीं पाते थे, फिर भी तुम्हें यही करना पड़ता था। अगर तुम ऐसा नहीं करते, तो तुम्हें अनुशासित किया जाता और कभी-कभी तुम्हारे माता-पिता दूसरों के सामने तुम्हें डाँटते या मारते भी थे, जिसे तुम जीवन भर कभी नहीं भूलोगे। इसलिए, व्यापक सामाजिक संदर्भ में, तुम इस शिक्षा को सिर्फ तथाकथित “उत्तम नैतिक चरित्र” के रूप में ही स्वीकार सकते हो। इसे स्वीकारने के परिणामों की परवाह किए बिना, इस बात की परवाह किए बिना कि यह आखिर में तुम्हारी मानवता को कैसे प्रभावित करती है और इस बात की परवाह किए बिना कि यह तुममें मानवता के कैसे चरित्र या गुण विकसित करती है—आखिर में, तुम्हें अकेले ही इन परिणामों को भुगतना होगा।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?