सत्य का अनुसरण कैसे करें (19) भाग पाँच

परमेश्वर द्वारा सृजित सभी चीजों की उत्तरजीविता के लिए और मानवजाति की उत्तरजीविता के लिए बनाई गई व्यवस्थाओं और नियमों के बीच संबंध

अब जब हमने मानव सभ्यता और संस्कृति पर चर्चा पूरी कर ली है, तो आगे हम परमेश्वर द्वारा सृजित इस मानवजाति की उत्तरजीविता और सभी चीजों के लिए परमेश्वर द्वारा बनाए गए जीवन जीने के नियमों और कानूनों के बीच संबंध के बारे में बात करेंगे। एक व्यापक परिप्रेक्ष्य से, परमेश्वर द्वारा बनाई गई दुनिया में पहाड़, नदियाँ, झीलें, जंगल, महासागर, धरती और रेगिस्तान हैं; साथ ही सूरज, चाँद, तारे, पृथ्वी पर मौजूद स्थान और वह ब्रह्मांड भी है जिसे लोग देख नहीं सकते। और एक सूक्ष्म परिप्रेक्ष्य से क्या है? छोटे-छोटे कण, हवा में मौजूद कण और अलग-अलग सूक्ष्मजीव हैं। चाहे व्यापक परिप्रेक्ष्य से देखा जाए या सूक्ष्म परिप्रेक्ष्य से, यह सब परमेश्वर की रचना है—परमेश्वर के हाथों और परमेश्वर के विचारों से सृजित रचना। परमेश्वर के सृजन के परिप्रेक्ष्य से, पृथ्वी और उस पर रहने वाली सभी सजीव चीजें पृथ्वी पर मानवजाति की उत्तरजीविता को बनाए रखने के उद्देश्य से मौजूद हैं और परमेश्वर पृथ्वी पर मौजूद लोगों में से उन सृजित इंसानों को प्राप्त करना चाहता है जिनको पाने की उसकी इच्छा है। इसलिए, सभी चीजों के लिए परमेश्वर द्वारा बनाए गए उत्तरजीविता के नियम और कानून मानव जीवन के लिए सबसे बुनियादी स्थितियाँ हैं। इसलिए, यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वे सकारात्मक चीजें हैं, है ना? (हाँ।) मानव जीवन की उत्तरजीविता के लिए सबसे बुनियादी स्थितियाँ क्या हैं? पानी, हवा, सूरज की रोशनी, भोजन—क्या ये चीजें परमेश्वर द्वारा बनाई गई हैं? (हाँ।) क्या वे सकारात्मक चीजें हैं? (हाँ।) तो फिर इन चीजों के अस्तित्व को सकारात्मक चीज क्यों कहा जाता है? इसका एक कारण है : इन चीजों का अस्तित्व सभी चीजों के लिए उत्तरजीविता के नियमों और कानूनों के अस्तित्व पर निर्भर करता है। सभी चीजों में उत्तरजीविता के कौन-से नियम और कानून हैं? चार ऋतुएँ; दिन और रात; हवा, पाला, बर्फ और बारिश—ये सभी नियम हैं। और क्या? तुम लोग भी कुछ सोचो। (सौर ऋतु-चक्र भी हैं।) सौर ऋतु-चक्र चार ऋतुओं में शामिल हैं। और क्या? चाँद का बढ़ना और घटना, ज्वार का उठना और गिरना। यह भी है, “बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है”—यह उत्तरजीविता का एक नियम और कानून है; यह कोई नकारात्मक चीज नहीं है। लोग “बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है” वाक्यांश का इस्तेमाल मानव संसार की गलाकाट प्रकृति का वर्णन करने के लिए करते हैं; यह एक सकारात्मक चीज की सामान्य परिघटना को लेकर उसे नकारात्मक चीज कहना है। सजीव चीजों की गतिविधि की भी कई पद्धतियाँ हैं। जरा सोचो कि उसमें क्या-क्या शामिल है। (क्या “ताकतवर कमजोर का शिकार करता है” को उत्तरजीविता का नियम माना जा सकता है?) नहीं, यह लोगों द्वारा इसे कहने का एक निंदात्मक तरीका है; यह “योग्यतम की उत्तरजीविता” होना चाहिए। (मुझे याद है परमेश्वर ने एक बार संगति की थी कि सभी चीजें एक-दूसरे को मजबूत करती हैं, एक-दूसरे को संतुलित करती हैं और एक साथ मौजूद रहती हैं। क्या यह सही है?) हाँ, यह गिना जाएगा। वे सभी एक-दूसरे को मजबूत करती हैं, एक-दूसरे को संतुलित करती हैं और एक साथ मौजूद रहती हैं—यह एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है। एक और उदाहरण है, “टिड्डा सिकाडा का शिकार करता है, पर इस बात से बेखबर रहकर कि ओरियल पक्षी उसके पीछे है”; यह कुछ हद तक चीजों के एक-दूसरे को मजबूत करने और संतुलित करने से संबंधित है। (क्या जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु भी इसमें शामिल है?) हाँ, यह है। “कौए अपनी बूढ़ी हो रहीं माँओं को खाना खिलाते हैं और मेमने अपनी माँओं का दूध पीने के लिए घुटने टेकते हैं,” जो एक स्तनपायी और एक पक्षी के बारे में है—यह पशु जगत की एक परिघटना है, यह प्रकृति का एक नियम है। वास्तव में सभी चीजों के लिए, उत्तरजीविता के कई नियम और कानून हैं : चार ऋतुओं का बदलना; हवा, पाला, बर्फ और बारिश का आना; दिन और रात का चक्र; चंद्रमा का बढ़ना और घटना; ज्वार का उठना और गिरना; सभी चीजों का एक दूसरे को मजबूत करना, संतुलित करना और एक साथ मौजूद रहना; साथ ही मनुष्यों और अन्य सभी जीवों का जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु, और विभिन्न जीवों की गतिविधि की पद्धतियाँ। कुछ जीव दिन में सोते हैं और रात में सक्रिय रहते हैं, जबकि अन्य दिन में सक्रिय रहते हैं और रात में सोते हैं, जैसे मनुष्य। कुछ जीव समूहों में रहते हैं, जबकि अन्य अकेले रहते हैं; उदाहरण के लिए, चीलें आमतौर पर अकेले उड़ती हैं, जबकि जंगली हंस झुंड में उड़ते हैं और वे सामाजिक प्राणी हैं। सजीव जगत में यह परिघटना भी है कि कौए अपनी बूढ़ी हो रहीं माँओं को खाना खिलाते हैं और मेमने अपनी माँओं का दूध पीने के लिए घुटने टेकते हैं। ये सभी चीजें विभिन्न प्रकार की परिघटनाएँ और अभिव्यक्तियाँ हैं जिन्हें वास्तविक जीवन में देखा और महसूस किया जा सकता है। इन सभी स्थूल और सूक्ष्म परिघटनाओं का घटना परमेश्वर द्वारा निर्धारित नियमों और कानूनों का पालन करता है। इन सभी नियमों और कानूनों की शुरुआत, मौजूदगी और निरंतरता एक ही उद्देश्य को पूरा करती है : मानवजाति की उत्तरजीविता के स्थान, इस पृथ्वी के सबसे बुनियादी जीवन परिवेश को बनाए रखना। इस सबसे बुनियादी जीवन परिवेश में, मानवजाति के पास पृथ्वी उस स्थान के रूप में है जिस पर वह उत्तरजीविता के लिए निर्भर है, जो उसे प्रजनन करना और जीवन जीना जारी रखने में सक्षम बनाती है। यह मानवजाति के लिए जरूरी पानी, हवा, सूरज की रोशनी और भोजन की भी लगातार आपूर्ति करती रहती है। इसी लगातार आपूर्ति की वजह से ही परमेश्वर द्वारा सृजित प्राणियों, मनुष्यों का भौतिक जीवन अस्तित्व में रह सकता है, वे बच्चे पैदा कर सकते हैं और लगातार बने रह सकते हैं; इसकी वजह से ही मनुष्यों को परमेश्वर के सामने आने और जब वह अपना प्रबंधन कार्य करता है, तब उसके उद्धार को स्वीकारने का अवसर मिलता है और वे ऐसे सृजित प्राणी बनते हैं जिन्हें परमेश्वर स्वीकार करता है। इसलिए, परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों में, चाहे किसी भी सजीव प्राणी का कोई भी रूप हो, चाहे उसकी उत्तरजीविता के नियम और कानून कुछ भी हों और चाहे उसका सभी दूसरी चीजों के साथ कैसा भी संबंध हो, संक्षेप में, वह परमेश्वर द्वारा बनाई गई व्यवस्थाओं और नियमों के बीच जीवित रहता है। यानी, हर सजीव प्राणी, परमेश्वर द्वारा सृजित होने के आधार पर, उसके द्वारा निर्धारित नियमों और कानूनों का पालन करता है और उनके बीच अपनी अनिवार्य भूमिका निभाता है। यह वह खाद्य श्रृंखला है जो परमेश्वर द्वारा मानवजाति के लिए निर्धारित नियमों और कानूनों के माध्यम से बनती है और यह खाद्य श्रृंखला मानवजाति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। खाद्य श्रृंखला के होने की पूर्व-शर्त यह है कि सभी चीजों को परमेश्वर द्वारा निर्धारित नियमों और कानूनों का पालन करना चाहिए। अगर वे इन नियमों और कानूनों को अनदेखा करती हैं और मनमानी करती हैं, तो इसका परिणाम यह होगा कि परमेश्वर द्वारा सृजित सभी चीजों के बीच मौजूद खाद्य श्रृंखला टूट जाएगी। एक बार जब यह खाद्य श्रृंखला टूट जाती है, तो पानी, हवा, सूरज की रोशनी और भोजन, जिस पर इंसान उत्तरजीविता के लिए निर्भर है, धीरे-धीरे या एक-एक करके अलग-अलग स्तर तक प्रभावित होंगे। इसलिए, परमेश्वर द्वारा सभी चीजों के लिए निर्धारित सभी नियमों और कानूनों का और परमेश्वर द्वारा सृजित हर सजीव प्राणी का खाद्य श्रृंखला पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। अगर सभी चीजों की उत्तरजीविता के किसी भी नियम में कोई समस्या आती है, तो इसका खाद्य श्रृंखला के अस्तित्व और निरंतरता पर श्रृंखलाबद्ध प्रभाव पड़ेगा; इसलिए इंसान के लिए आवश्यक बुनियादी पानी, हवा, सूरज की रोशनी और भोजन की उपलब्धता खतरे में पड़ जाएगी। इस तरह, खाद्य श्रृंखला इस बात का एक मुख्य स्रोत और महत्वपूर्ण सूचक है कि इंसान जीवित रह सकता है या नहीं। यह खाद्य श्रृंखला वास्तव में क्या है? खाद्य श्रृंखला में परमेश्वर की रचना शामिल है। परमेश्वर द्वारा सृजित सभी चीजों में, कुछ मूर्त चीजें हैं और कुछ अमूर्त चीजें भी हैं जो खुली आँखों से दिखाई नहीं देती हैं। इन मूर्त चीजों में पहाड़, नदियाँ, जंगल, मिट्टी, रेगिस्तान, उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव, सूरज, तारे और चंद्रमा, साथ ही अलग-अलग जानवर और पौधे वगैरह शामिल हैं। अमूर्त यानी न दिखने वाली चीजों में सूक्ष्मजीव, हवा, यहाँ तक कि सूरज की रोशनी में मौजूद पराबैंगनी किरणें, साथ ही इंसानों द्वारा पता लगाई गई चीजें—तथाकथित परमाणु और ऊर्जा, हवा और पानी में मौजूद न दिखने वाले कुछ पोषक तत्व वगैरह शामिल हैं। ये सभी स्थूल, मूर्त चीजें, साथ ही सूक्ष्मजीव, धूप और हवा जैसी चीजों में मौजूद पदार्थ जिन्हें लोग नहीं देख सकते—ये सभी चीजें मिलकर इंसान की उत्तरजीविता के लिए अनिवार्य जीवन परिवेश बनाती हैं। अगर इस जीवन परिवेश में कोई समस्या आती है, तो इंसान की उत्तरजीविता और उसके भविष्य को चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा और खतरा पैदा हो जाएगा। इसलिए, सभी चीजों की उत्तरजीविता के नियम और कानून खाद्य श्रृंखला को बनाए रखने के लिए जरूरी एक बुनियादी शर्त है; वहीं खाद्य श्रृंखला का होना इंसान की उत्तरजीविता के लिए एक बुनियादी शर्त है। इस तरह, चाहे वे व्यवस्थाएँ और नियम हों, खाद्य श्रृंखला हो या पानी, हवा, सूरज की रोशनी और भोजन हो, अगर इनमें से किसी में भी कोई समस्या आती है, तो इसका असर निश्चित रूप से इंसान की उत्तरजीविता पर पड़ेगा—यानी, इसका असर इस सृजित प्राणी, इंसान के भौतिक जीवन के अस्तित्व पर पड़ेगा। इसलिए, परमेश्वर के लिए, सभी चीजों की उत्तरजीविता के नियमों और कानूनों, खाद्य श्रृंखला, पानी, हवा, सूरज की रोशनी और भोजन में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए; इन सभी को बनाए रखना, सहेजा जाना और एक व्यवस्थित तरीके से चलते रहना जरूरी है—केवल इसी तरीके से इंसान जीवित रह पाएगा और उसका भौतिक जीवन कायम रहेगा।

मानवजाति की सतत उत्तरजीविता में कौन-सा विषय शामिल है? सभी चीजों के लिए उत्तरजीविता के नियमों और कानूनों में व्यापक पहलू—जैसे दिन और रात और चार ऋतुएँ—अनिवार्य हैं। इनमें मूल रूप से ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे लोग अपनी कल्पनाओं के अनुसार बुरा समझते हों। जब पेड़ों, फूलों और पौधों जैसी विभिन्न सजीव चीजों की बात आती है, तब लोग उनके बारे में कोई धारणा नहीं बनाते क्योंकि उनका लोगों पर किसी भी तरह का घातक प्रभाव नहीं पड़ता। हालाँकि, खाद्य श्रृंखला में कुछ जहरीली और हानिकारक चीजें होती हैं; जैसे मच्छर, जिनके इंसान के शरीर पर कुछ नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं। ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें लोग अपनी धारणाओं के अनुसार नापसंद करते हैं—खासकर कुछ अत्यंत विषैले जीव; जैसे कुछ साँप, बिच्छू और कनखजूरे। तो परमेश्वर ने इन विषैली चीजों को क्यों बनाया? उन्हें बनाने के पीछे उसका क्या उद्देश्य था? वे खाद्य श्रृंखला में क्या भूमिका निभाती हैं? यह बात अहम है। भले ही उनके स्वरूप या उनकी प्रकृति को देखकर या दूसरे जीवों में उनके जीवन के कुछ लक्षणों को देखकर, ऐसा लगता है कि वे कोई सकारात्मक भूमिका नहीं निभातीं, फिर भी उन्हें सकारात्मक चीजें क्यों कहा जाता है? इसे खाद्य श्रृंखला के संदर्भ में समझाया जाना चाहिए। हम जीव विज्ञान नहीं पढ़ रहे हैं—हम वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य से चीजों पर चर्चा नहीं करेंगे, बल्कि इसे ऐसे जीवों के सृजन में परमेश्वर के इरादे के परिप्रेक्ष्य से देखेंगे। एक बात तो यह है कि परमेश्वर ने उनकी उत्तरजीविता सुनिश्चित करने के लिए उन्हें एक अनोखा हुनर दिया, जिससे वे इस तरह से अपना जीवन सुरक्षित रख सकें। दूसरी बात, वे खाद्य श्रृंखला में भी एक खास भूमिका निभाती हैं—उनकी उत्तरजीविता का तरीका और जो विष वे अपने शरीर से निकालती हैं, वह दूसरे जीवों के लिए आवश्यक पोषक तत्व या भोजन के स्रोत प्रदान कर सकता है। इसके अलावा, वे जीवाणु के संचरण, प्रजनन, उत्पत्ति और विकास के लिए और पूरे जीवमंडल में वंशाणुओं के संचरण के लिए आवश्यक स्थितियाँ भी प्रदान करती हैं और इस संबंध में एक खास भूमिका निभाती हैं। केवल इन जीवों के अस्तित्व से ही जीवमंडल आनुवंशिक संतुलन और जीवाणु संबंधी विविधता के मामले में संतुलन बनाए रख सकता है, जिससे विभिन्न प्रकार के जीवाणु संतुलन में रहते हैं। उदाहरण के लिए, मच्छर और मक्खियों को ही ले लो। वे कुछ परजीवियों को खाते हैं और कुछ जीवाणु भी संचरित करते हैं। हम अधिक गहराई में नहीं जाएँगे; यह बस एक आसान-सी अवधारणा है। संक्षेप में, कुछ खास जीव मानवजाति के लिए कुछ खास उद्देश्य पूरे करते हैं और खाद्य श्रृंखला में भी एक अनिवार्य भूमिका निभाते हैं। यह अनिवार्य भूमिका खाद्य श्रृंखला के अस्तित्व को बनाए रखती है। सभी चीजें केवल तभी जीवित बची रह सकती हैं और व्यवस्थित ढंग से चल सकती हैं जब यह खाद्य श्रृंखला मौजूद हो और नष्ट न हो। क्योंकि सभी चीजों का एक-दूसरे से रिश्ता होता है, जिसमें वे एक-दूसरे को मजबूत करती हैं, एक-दूसरे का प्रतिरोध करती हैं और साथ-साथ मौजूद रहती हैं; इसलिए खाद्य श्रृंखला टूटनी नहीं चाहिए। खाद्य श्रृंखला में अलग-अलग जीवित चीजों के अस्तित्व का संतुलन बनाए रखा जाना चाहिए और उनके रहने की जगह और अस्तित्व को बनाए रखना चाहिए। इसलिए, परमेश्वर द्वारा सभी चीजों के लिए बनाए गए उत्तरजीविता के नियम और कानून बहुत महत्वपूर्ण हैं। केवल परमेश्वर द्वारा सभी चीजों के लिए बनाए गए उत्तरजीविता के नियमों और कानूनों का होना ही खाद्य श्रृंखला की निरंतरता को पक्का कर सकता है और यह गारंटी दे सकता है कि यह टूटेगी नहीं। खाद्य श्रृंखला का अस्तित्व, निरंतरता और सुरक्षा इस बात की मूल गारंटी है कि लोगों को पानी, हवा, धूप और भोजन मिल पाएगा। जब लोगों के पास यह मूल गारंटी होगी, केवल तभी उनका भौतिक जीवन बना रह पाएगा; तभी वे इस धरती पर, ऐसे जीवन परिवेश में प्रजनन कर पाएँगे और जीवित रह पाएँगे। केवल इसी तरह से मानवजाति के पास भविष्य हो सकता है और उम्मीद हो सकती है।

परमेश्वर द्वारा सृजित सभी चीजों के लिए व्यवहार के सिद्धांत

चार ऋतुओं, दिन-रात और हवा, पाला, बर्फ और बारिश द्वारा पालन किए जाने वाले नियम और कानून—वे चीजें जो परमेश्वर द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों के तहत मौजूद हैं—साथ ही जिस स्वरूप में वे दिखाई देती हैं, हर तरह से परमेश्वर द्वारा बनाई गई सकारात्मक चीजें हैं। जहाँ तक विभिन्न जीवों की बात है—चाहे उनके स्वरूप कुछ भी हों, उनकी उत्तरजीविता के तरीके या उनके शिकार करने या भोजन प्राप्त करने के तरीके—संक्षेप में, जब तक वे परमेश्वर द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों के तहत जीते हैं और जब तक वे परमेश्वर द्वारा बनाई गई खाद्य श्रृंखला का एक आवश्यक, अनिवार्य हिस्सा हैं, तब तक वे परमेश्वर से आने वाली सकारात्मक चीजें हैं। लोगों को अपने नजरियों और प्राथमिकताओं के आधार पर उनके बारे में राय नहीं बनानी चाहिए। कोई कह सकता है, “तो क्या मच्छर और मक्खियाँ भी सकारात्मक चीजें हैं? विषैले साँपों, कनखजूरों और बिच्छुओं के बारे में क्या कहोगे? और खासकर मेंढक, जो इतने बदसूरत होते हैं—क्या वे भी सकारात्मक चीजें हैं?” इसे कहने का सही तरीका क्या है? परमेश्वर की बनाई इन प्रजातियों द्वारा निभाई जाने वाली भूमिकाएँ और वे नियम और कानून जिनका वे पालन करती हैं, वे सभी सकारात्मक चीजें हैं। और उनके भौतिक स्वरूप और रूप-रंग के बारे में क्या कहोगे—क्या वे सकारात्मक चीजें हैं? अगर तुम्हें वाकई कहना ही पड़े तो तुम उन्हें सकारात्मक चीजें कह सकते हो, लेकिन वे नकारात्मक चीजें नहीं हैं। कम से कम, उनके द्वारा पालन किए जाने वाले नियमों, इन जीवों की भूमिकाओं और खाद्य शृंखला में उनकी आवश्यकता के संदर्भ में, वे सकारात्मक चीजों के रूप में मौजूद हैं। क्या यह कहने का सही तरीका नहीं है? (हाँ, है।) सटीक तौर पर कहें तो क्योंकि ऐसे जीव परमेश्वर द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों का पालन करते हैं और परमेश्वर द्वारा उनके लिए तय की गई जिम्मेदारियों और मिशन को पूरा करते हैं—क्योंकि वे अपने मिशन को पूरा करते हैं, चाहे वह जीवाणु फैलाना हो या अलग-अलग सूक्ष्मजीवों के प्रजनन संतुलन को कायम रखना हो—उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिकाओं और परमेश्वर द्वारा उनके सृजन के महत्व और उद्देश्य के संदर्भ में देखें, तो उनका अस्तित्व मात्र ही एक सकारात्मक चीज है। अगर हम कहें कि मच्छर अपने आप में एक सकारात्मक चीज है, तो इसे समझना या स्वीकारना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। हालाँकि, परमेश्वर के इसे बनाने के इरादों, उन नियमों और कानूनों जिनका यह पालन करता है और खाद्य श्रृंखला में इसकी भूमिका को देखते हुए यह अपरिहार्य है—और इसलिए यह एक सकारात्मक चीज है। कुछ लोग कहते हैं, “चूँकि मच्छर सकारात्मक चीजें हैं, तो क्या इसका मतलब है कि हमें उन्हें स्वीकारना होगा और हमें उन्हें मारना नहीं चाहिए?” अगर कोई मच्छर तुम्हें काटने वाला है, तो तुम्हें उसे मार देना चाहिए। अगर तुम खाना खा रहे हो और कोई मक्खी तुम्हारे आस-पास भिनभिना रही है, तो तुम उसे भगा सकते हो या मार सकते हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि एक या दो मच्छरों या मक्खियों के कम होने से खाद्य श्रृंखला में कोई समस्या नहीं होगी और न ही इससे इन जीवों के अपने मिशन को पूरा करने पर कोई प्रभाव पड़ेगा। अगर ऐसा कोई जीव अपना मिशन पूरा करना चाहता है, तो उसे ऐसा करने के लिए सही जगह ढूँढ़नी चाहिए। इंसानों के जीवन परिवेशों में उसकी जरूरत नहीं है, इसलिए बस उसे भगा दो और बात खत्म करो—उसके साथ शांति से सह-अस्तित्व में रहो। अगर वह तुम्हारे साथ शांति से सह-अस्तित्व में नहीं रहता और तुम्हें परेशान करता रहता है, तो उसे भगा देना या मार डालना ठीक है। इसे सूझ-बूझ भरा प्रबंधन और सही व्यवहार कहते हैं। कुछ लोग कहते हैं, “मच्छर मुझे हमेशा परेशान करते हैं और बहुत काटते हैं। क्या मैं उन्हें कोस सकता हूँ?” इसकी जरूरत नहीं है। तुम बस उन्हें मार सकते हो। उन्हें मारना तुम्हारे अधिकार क्षेत्र में है; यह पूरी तरह से इस सिद्धांत के अनुरूप है कि इंसान—सभी चीजों का प्रबंधक—सभी चीजों के साथ कैसे व्यवहार करे। उदाहरण के लिए, अगर कोई विषैला साँप तुम्हारे घर में घुस आता है और तुम देखते हो कि यह उसकी जगह नहीं है, तो बस उसे जंगल में भगा दो। अगर वह तुम्हें काट ले और विष फैल जाए, तो तुम्हें तुरंत इलाज का तरीका ढूँढ़ना होगा। तुम्हें बदला लेने और मार डालने के लिए उसे ढूँढ़ने की जरूरत नहीं है। अगर वह तुम्हें फिर से नुकसान पहुँचाए, तो क्या यह और भी अधिक मुसीबत की बात नहीं होगी? इसलिए, उसके साथ जैसे को तैसा मत करो; बस उससे बचने का तरीका सीखो। इस मामले से सबक सीखने में समर्थ होना ही एक बुद्धिमान व्यक्ति का काम होगा। हमने अभी जिन तीन सिद्धांतों के बारे में बात की, वे क्या थे? (पहला, पक्का करना कि यह एक सकारात्मक चीज है। दूसरा, अगर वह तुम्हारे पास आता है और तुम उससे निपटना नहीं चाहते, तो बस उससे दूर ही रहो—उसे पास मत आने दो और उसे तुम्हें परेशान मत करने दो। तीसरा, उसके प्रति सही दृष्टिकोण रखो। उससे घृणा या नफरत मत करो। इसके बजाय, उसे स्वीकारो और मानो और फिर उसे समझदारी से प्रबंधित करो।) उसे समझदारी से प्रबंधित करो और उसके साथ सही व्यवहार करो। परमेश्वर के बारे में शिकायत मत करो या यह राय मत बनाओ कि परमेश्वर ने उसे बनाकर गलती की या संभवतः उसने कोई गलती की होगी, सिर्फ इसलिए कि उसने तुम्हें परेशान किया है या कभी-कभी तुम्हारे लिए कुछ मुसीबत खड़ी की है या तुम्हें काट लिया है और विष फैल गया है—इस तरह से देखना गलत है। ऐसा हो सकता है कि तुमने उसे अच्छे से संभाला न हो या हो सकता है कि वह गलती से तुम्हारे घर में घुस गया हो और तुम्हें परेशान किया हो। लेकिन अगर तुम उससे नरमी से पेश आते हो, यह कहते हुए, “तुम गलत रास्ते पर आ गए हो, यह तुम्हारा घर नहीं है। अगर तुम्हारा मेरे प्रति कोई बुरा इरादा नहीं है, तो मैं तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा। वहाँ चले जाओ जहाँ तुम्हें होना चाहिए” और वह देखता है कि तुम उसे नुकसान नहीं पहुँचाओगे, तो वह मुड़कर अपने आप चला जाएगा। तुम उससे कहते हो, “अलविदा। जब तक हम फिर न मिलें! इस बार हमारी मुलाकात होनी ही थी। अगर हमारा फिर से मिलना हुआ, तो भी मैं तुम्हें फिर से जाने दूँगा।” यह सुनकर, वह सोचेगा, “इंसान बहुत अच्छे होते हैं। वे सच में जानते हैं कि हमें कैसे संभालना है। उनमें कोई द्वेष नहीं है।” जब तक तुम उसे नुकसान नहीं पहुँचाते, वह भी तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाएगा। कुछ जानवर लोगों को नुकसान पहुँचाते हैं क्योंकि लोग हमेशा उन्हें नुकसान पहुँचाते हैं; वे लोगों से दुश्मनी पालने के बाद ही उन्हें नुकसान पहुँचाते हैं; ऐसा वे लोगों की बेवकूफी और क्रूरता की वजह से करते हैं। ऐसे जीवों के मन में, स्वाभाविक रूप से इंसानों के प्रति कोई दुश्मनी या नफरत नहीं होती। देखो, जब नूह ने जहाज बनाया, तो किसी भी जानवर ने किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया, नूह जानवरों के साथ संवाद भी कर सकता था और उन्हें प्रशिक्षित भी कर सकता था। उस समय, इंसान और जानवर एक-दूसरे के दोस्त थे। बाद में, इंसान अधिक से अधिक भ्रष्ट होते गए और बेहद क्रूर बन गए, हमेशा जानवरों के मांस के लिए उनका शिकार करना चाहते थे; इसलिए इंसानों और विभिन्न जानवरों के बीच दुश्मनी बढ़ गई। मांसाहारी जानवरों को जैसे ही इंसान की गंध आती है, उन्हें लगता है कि स्वादिष्ट खाना परोसा गया है और वे पेट भरकर खाना चाहते हैं। इसकी जिम्मेदारी किस पर है? यह पूरी तरह से मानवजाति की बेहद क्रूरता की वजह से हुआ। क्या तुम समझे? (हाँ।)

चाहे व्यापक परिप्रेक्ष्य से देखा जाए या सूक्ष्म परिप्रेक्ष्य से, परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजें निश्चित रूप से सकारात्मक चीजें हैं। चाहे उन्हें बनाने के पीछे परमेश्वर के मूल इरादों के संदर्भ में देखा जाए या उनके लिए परमेश्वर द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों के संदर्भ में देखा जाए या अंततः हासिल किए गए उद्देश्य और प्रभाव के संदर्भ में देखा जाए, वे सभी मानवजाति के लिए अस्तित्व में हैं; उन्हें सभी चीजों के प्रबंधकों के रूप में अपनी भूमिका में मनुष्यों के लिए डिजाइन किया और बनाया गया है। इस प्रकार, परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों के स्वरूप या रंग-रूप चाहे जैसे भी हों या लोगों पर उनका अस्थायी प्रभाव कैसा भी हो, लोगों को उनके साथ सही तरीके से व्यवहार करना चाहिए, उन्हें सही तरीके से प्रबंधित करना चाहिए और समझना चाहिए और उन्हें परमेश्वर से आया मानकर स्वीकारना चाहिए—यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। सबसे पहले, लोगों को यह यकीन होना चाहिए कि जब तक कोई चीज परमेश्वर द्वारा बनाई गई है—चाहे वह अच्छी हो या बुरी, सुंदर हो या कुरूप; भले ही उसका स्वरूप कैसा भी हो; और इसके अलावा, चाहे मानव देह पर उसका अस्थायी प्रभाव कैसा भी हो—संक्षेप में, जब तक वह परमेश्वर से आती है और परमेश्वर के हाथ से बनाई गई है, तब तक वह मानवजाति की मौलिक उत्तरजीविता में कुछ योगदान देती है। इसके आधार पर, लोगों को परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों को परमेश्वर से आया मानकर स्वीकारना चाहिए और मनमाने ढंग से या एकपक्षीय रूप से अपने नजरियों और प्राथमिकताओं के आधार पर यह चुनाव नहीं करना चाहिए कि उनकी निंदा करें या उन्हें स्वीकार करें। इसके बजाय, उन्हें एक सृजित प्राणी के परिप्रेक्ष्य से उन्हें समझना चाहिए, उन्हें प्रबंधित करना और उनके साथ सही तरीके से व्यवहार करना सीखना चाहिए और—इससे भी बेहतर—उनके साथ सही ढंग से घुलना-मिलना और संपर्क रखना सीखना चाहिए। यही वह जिम्मेदारी और दायित्व है जिसे लोगों यानी परमेश्वर द्वारा बनाई गई इस धरती के मालिकों और इस दुनिया के प्रबंधकों को पूरा करना चाहिए। यही वह भूमिका है जो लोगों को अन्य सभी जीवों के बीच निभानी चाहिए और यह एक ऐसा सिद्धांत भी है जिसका लोगों को मानवता के दृष्टिकोण से सबसे अधिक पालन करना चाहिए। अगर तुम्हें परमेश्वर द्वारा बनाई गई कुछ चीजें पसंद नहीं हैं, तो तुम उनसे दूर रह सकते हो। अगर तुम्हें वे पसंद हैं, तो तुम उनके साथ घनिष्ठता से मिलजुल सकते हो और उनके बारे में जानने और उन्हें प्रबंधित करने के लिए उनके पास जा सकते हो—या और भी बेहतर होगा उनके जीवन परिवेश की रक्षा करो, उनके साथ दयालुता से पेश आओ, उन्हें रहने के लिए पर्याप्त जगह दो, उनके उत्तरजीविता के अधिकार की रक्षा करो और उसे ठीक से बनाए रखो। वास्तव में, सभी चीजें मनुष्यों की तुलना में कमजोर हैं। भले ही परमेश्वर ने सभी चीजों को उत्तरजीविता के हुनर और सहज प्रवृत्तियाँ दी हैं, लेकिन मनुष्यों के अलावा कोई भी प्रजाति औजार और हथियार नहीं बना सकती; उनमें से किसी के पास भी परमेश्वर द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों को खत्म करने की शक्ति नहीं है और न ही वे ऐसा करने की पहल करते हैं। केवल इंसानों में ही विभिन्न प्रकार के जीवों और सभी चीजों के प्रति—अपनी मानसिकता में भी और अपनी माँगों में भी—अंतहीन लालच होता है। साथ ही, केवल इंसान ही वैज्ञानिक शोध करते हैं, रसायन बनाते हैं और उत्तरजीविता के लिए या बेहतर जीवन के लिए तरह-तरह के औजार और हथियार बनाते हैं। और केवल इंसान ही शैक्षिक ज्ञान सीख सकते हैं और अलग-अलग जीवों के जीवन परिवेशों पर शोध कर सकते हैं या उन्हें बदल सकते हैं। लेकिन, विभिन्न जानवरों और जीवों की उत्तरजीविता, और खाद्य श्रृंखला के नियमों के संबंध में इंसानों ने जो कुछ भी किया है, वह फायदेमंद नहीं बल्कि अधिकतर विनाशकारी और गड़बड़ करने वाला रहा है। तो आखिर में, केवल इंसान ही एक-दूसरे को मारने और अपने मूल जीवन परिवेश को नष्ट करने के लिए हथियार बना सकते हैं। केवल इंसान ही उद्योग, खासकर रसायन उद्योग विकसित करते हैं, सभी तरह के हानिकारक पदार्थ बनाते हैं जो उस धरती को नुकसान पहुँचाते हैं और नष्ट करते हैं जिस पर इंसान रहते हैं—जो उनके जीवित बचे रहने के लिए एकमात्र घर है। और केवल इंसानों ने ही अपनी उत्तरजीविता के लिए जरूरी बुनियादी पानी, हवा, सूरज की रोशनी और भोजन को प्रदूषित और खराब किया है। इसका मतलब है कि इंसानों ने खुद ही अपनी उत्तरजीविता के रास्ते को बरबाद किया है; यह दूसरे जीवों की वजह से नहीं हुआ। इसलिए, सभी चीजों के मालिक होने के नाते, सृजित इंसानों को सभी जीवों सहित सभी चीजों को प्रबंधित करने की भूमिका ठीक से कैसे निभानी चाहिए, यह बात बहुत महत्वपूर्ण है। अगर इंसान वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल करके हथियार या तरह-तरह के औजार बनाते रहेंगे या रसायन बनाते रहेंगे, तो यह खुद उनके लिए या दूसरे जीवों के लिए विनाशकारी आपदा लाएगा। यानी, इंसानों ने खुद अपने हाथों से सभी चीजों की उत्तरजीविता के नियमों और कानूनों को रौंद दिया है और खुद ही खाद्य श्रृंखला को भी नष्ट कर दिया है। बेशक, इंसानों ने खुद ही उस धरती को बरबाद किया है जिस पर वे जीवित बचे रहने के लिए निर्भर हैं। यह बहुत दुखद है। इन सभी परिणामों के लिए कौन दोषी है? (लोग।) यह परमेश्वर द्वारा बनाई गई सकारात्मक चीजों को लोगों द्वारा बरबाद करने और नष्ट करने की वजह से है। आखिर में, लोग जो बोते हैं वही काटते हैं। अगर शुरू से ही लोग परमेश्वर की बनाई सभी चीजों की अलग-अलग भूमिकाओं को जान पाते, अलग-अलग जीवों का सम्मान कर पाते, उन्हें संजोते और उनकी परवाह कर पाते, सभी चीजों की उत्तरजीविता के लिए परमेश्वर द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों का पालन कर पाते और पृथ्वी के मूल पर्यावरण की रक्षा कर पाते, जिस पर वे जीवित बचे रहने के लिए निर्भर हैं, तो मानवजाति आज इस मुकाम पर नहीं पहुँचती। इसलिए, परमेश्वर की सभी रचनाओं के सकारात्मक चीजें होने के विषय में, लोगों को यह समझना चाहिए कि परमेश्वर ने सभी चीजों के लिए जो उत्तरजीविता के नियम और कानून बनाए हैं, उनका क्या महत्व है; साथ ही, लोगों को उनका पालन क्यों करना चाहिए और कैसे करना चाहिए। साथ ही, लोगों को यह भी जानना चाहिए कि इन सब को बनाने के पीछे परमेश्वर का उद्देश्य मानवजाति की भलाई है; इसलिए उन्हें इन्हें संजोना चाहिए और इनकी रक्षा करनी चाहिए। अगर तुम इन सबका महत्व नहीं समझ पाते हो, तो कम से कम इन्हें सकारात्मक चीज मानो; एक अनिवार्य, बेहद जरूरी सकारात्मक चीज मानो जिस पर तुम्हारी उत्तरजीविता निर्भर करती है; इसे संजोओ, इसकी परवाह करो और इसे प्रबंधित करो। तुम्हें इसके साथ सही तरीके से व्यवहार करना चाहिए और मालिक के तौर पर अपनी क्षमता और भूमिका में इसकी रक्षा करनी चाहिए। केवल इसी तरीके से मानवजाति के पास भविष्य और उम्मीद हो सकती है और वह खुशी-खुशी जीना जारी रख पाएगी, है ना? (हाँ।)

क्या अब परमेश्वर की बनाई सभी चीजों के सकारात्मक होने का विषय अधिक स्पष्ट हो गया है? (हाँ।) आओ, आखिरी बार परमेश्वर द्वारा बनाई गई विभिन्न चीजों और जीवों के साथ सही तरीके से पेश आने के तरीके की पुष्टि करते हैं। अब उन तीन सिद्धांतों को दोहराओ जिन पर हमने अभी-अभी चर्चा की। (पहला, जब तक कोई चीज परमेश्वर द्वारा परिभाषित सकारात्मक चीजों के दायरे में है, हमें अपने दिल में पक्का यकीन होना चाहिए कि यह परमेश्वर की ओर से आई है, यह एक सकारात्मक चीज है और परमेश्वर द्वारा इसे बनाए जाने के पीछे कोई उद्देश्य है; ताकि लोग इससे कुछ सबक सीख सकें। दूसरा, इस यकीन के आधार पर कि यह एक सकारात्मक चीज है, अगर हमें यह पसंद नहीं है या हम इसके संपर्क में नहीं आना चाहते, तो हम इसे अनदेखा कर सकते हैं। अगर यह हमारे जीवन में दखल देती है, तो हम इसे दूर भगा सकते हैं या इससे दूर रह सकते हैं; हमें इससे कुछ सबक भी सीखना चाहिए और इस पर थोड़ा ध्यान भी देना चाहिए। आखिर में, अगर यह परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है, तो हमें इससे नफरत या घृणा नहीं करनी चाहिए, बल्कि इसे सही रवैये के साथ स्वीकारना चाहिए और इसे मानना चाहिए और इसे सूझ-बूझ से प्रबंधित करना चाहिए।) इसे सूझ-बूझ से प्रबंधित करना बहुत महत्वपूर्ण है। अगर इंसान धरती पर परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों को प्रबंधित करना नहीं जानते, तो इसका उनकी उत्तरजीविता पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है। अगर खाद्य श्रृंखला के नियम और उसका अस्तित्व खत्म हो जाते हैं, तो मानवजाति की उत्तरजीविता खतरे में पड़ जाएगी। क्या वर्तमान में मानवजाति ऐसे ही जीवन परिवेश में नहीं जी रही है? (हाँ।) मानवजाति ने बड़े पैमाने पर उद्योग विकसित किया है, जिससे अपशिष्ट गैसें, गंदा पानी और विषैले पदार्थ निकलते हैं जिन्होंने नदियों, झीलों और यहाँ तक कि भूजल को भी प्रदूषित कर दिया है। अब पीने के लिए साफ पानी नहीं है; लोग बस कुछ पुनर्चक्रित पानी पी सकते हैं जिसे कृत्रिम तरीके से संसाधित किया गया है, जो हालाँकि विषैला नहीं है, लेकिन उसमें पोषक तत्व बहुत कम हैं। नदियों, झीलों और समुद्रों की मछलियाँ भी प्रदूषित हो गई हैं और वे अस्वस्थ हैं। ऐसा कोई भोजन ढूँढ़ना आसान नहीं है जो दूषित न हो। क्या मानवजाति खुद को भारी मुश्किल में नहीं डाल रही है? क्या यह इंसान की वजह से ही नहीं हुआ है? न केवल पीने का पानी प्रदूषित है, बल्कि हवा भी खराब है; हवा में बहुत सारे हानिकारक पदार्थ हैं और अब अगर तुम साफ हवा में साँस लेना भी चाहो, तो यह बहुत मुश्किल है—कभी-कभी लोगों को वायरस से बचने के लिए मास्क भी पहनना पड़ता है। हवा की गुणवत्ता बेहद खराब है, लोग हर तरह का खाना खाने में सावधानी बरत रहे हैं और अब लोगों को सभी तरह की बीमारियाँ हो रही हैं, कुछ युवाओं को कैंसर या मधुमेह भी हो रहा है। इन सब परिणामों का कारण कौन है? (लोग।) यह सब लोगों की वजह से हुआ है। इस तरह लोगों ने उस धरती को प्रबंधित किया है जिसे परमेश्वर ने उनके लिए बनाया था, खुद को इतना प्रताड़ित किया है कि वे ठीक से खा-पी भी नहीं सकते, फिर भी बहुत खुश महसूस करते हैं। परमेश्वर को छोड़ने का यही नतीजा होता है; खुशी नाम की कोई चीज नहीं है। लोगों के लिए अब एकमात्र रास्ता यह है कि वे सृष्टिकर्ता के उद्धार को स्वीकारें, सत्य का अनुसरण करें और परमेश्वर का भय मानने के रास्ते पर चलें। केवल इसी तरह से तुम बचाए जा सकते हो, तुम्हें जीने की उम्मीद मिल सकती है और तुम नई मानवजाति का हिस्सा बन सकते हो। यह इतना आसान है; कोई दूसरा रास्ता नहीं है। पूरब के लोगों को लगता है कि पश्चिमी सभ्यता श्रेष्ठ है और पश्चिम के लोगों के पास जरूर कोई रास्ता होगा। क्या उनके पास कोई रास्ता है? (नहीं।) पूरब के लोगों को लगता है कि उन्होंने बहुत कष्ट झेला है, गहरी नफरत पाली है, बहुत अधिक कठिनाइयाँ सही हैं और उन्हें पश्चिम के लोगों द्वारा बचाया जाना चाहिए। वे हमेशा पश्चिम को स्वर्ग समझते हैं, पश्चिम में जाना स्वर्ग में जाना है, वे पश्चिम में स्वतंत्र और खुश रहेंगे। लेकिन पश्चिम के लोगों को नहीं लगता कि वे बहुत खुश हैं। वे कहते हैं, “भले ही हमारा जीवन पूरब के लोगों की तुलना में थोड़ा अधिक समृद्ध है, लेकिन हम शायद ही अधिक खुश हैं।” जब तक तुम इस धरती पर मौजूद एक इंसान हो, मानवजाति का हिस्सा हो, तब तक तुम्हें इस धरती पर कोई खुशी नहीं है, क्योंकि इस धरती पर रहते हुए तुम जो कुछ भी स्वीकारते हो, वह शैतान से आता है। चाहे वह इंसानी सोच और दृष्टिकोण हो या उत्तरजीविता के नियम, चाहे वह पूर्वी शिक्षा हो या पश्चिमी शिक्षा, ऐसी कोई एक चीज नहीं है जो तुम्हें एक सच्चे मनुष्य की छवि जीने दे; ऐसी कोई सामाजिक शिक्षा या सोच या दृष्टिकोण नहीं है जो तुम्हें एक सृजित प्राणी के तौर पर इंसानों की दुनिया में खुद को स्थापित करने दे। क्योंकि यह मानवजाति शैतान की शक्ति के अधीन रहती है और शैतान द्वारा नियंत्रित होती है, इसलिए लोगों के लिए जीने का एकमात्र तरीका परमेश्वर के उद्धार को स्वीकारना, परमेश्वर से आने वाले सभी सत्यों को स्वीकारना, परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करना और उद्धार पाना है। केवल तभी मानवजाति सच में एक ऐसी दुनिया में लौट सकती है जहाँ सभी चीजों के लिए उत्तरजीविता के नियम और कानून स्वतंत्र रूप से काम कर सकें, और सच में एक संपूर्ण खाद्य श्रृंखला वाली दुनिया में रह सकती है—केवल इसी तरह से मानवजाति सच में सभी चीजों के प्रबंधक की भूमिका निभा सकती है और इस भूमिका की जिम्मेदारियों को पूरा कर सकती है। इसके अलावा, मानवजाति के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। यही मानवजाति के लिए एकमात्र रास्ता है, वह एकमात्र रास्ता जो मानवजाति के लिए उम्मीद और खुशी ला सकता है। क्या तुम समझ गए? (हाँ।) एक बार जब तुम समझ जाओगे, तो तुम्हारे पास एक रास्ता होगा। बस इसी दिशा में, इसी लक्ष्य की ओर प्रयास करते रहो और अनुसरण करते रहो। पीछे मुड़कर मत देखो, हार मत मानो और कभी रुको नहीं!

आओ, आज के लिए हमारी संगति यहीं समाप्त करते हैं। अलविदा!

14 अप्रैल 2024

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

संबंधित सामग्री

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें