सत्य का अनुसरण कैसे करें (3) भाग चार

3. सत्य और जीवन प्राप्त करने के लिए सत्य का अनुसरण करना और अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करना जरूरी है

कुछ लोग विनम्र, सहनशील और धैर्यवान दिखाई देते हैं; वे परिष्कार के साथ बोलते हैं और आकाश में चमकने वाली बिजली जैसी तेजी और जोश से और प्रभावशाली उपस्थिति के साथ काम करते हैं। उनकी मानवता बिल्कुल पूर्ण प्रतीत होती है और उनमें अगुआई करने वाले व्यक्ति की मानक चाल-ढाल होती है। लेकिन वे कोई भी सत्य बिल्कुल नहीं समझते, वे हर तरह की समस्या का समाधान करने के लिए धर्म-सिद्धांतों का इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं और कोई भी ठोस काम करने या कार्य-व्यवस्थाएँ लागू करने में असमर्थ होते हैं। क्या वे बेकार नहीं होते? ये लोग मानक फरीसी हैं। बाहरी तौर पर फरीसी बेदाग पोशाक पहने, गरिमामय और संतुलित होते हैं; वे सभ्य, शिष्टाचार में पारंगत, विनम्र, प्रेमपूर्ण, सहनशील और धैर्यवान होते हैं। उनका आचरण असाधारण रूप से उचित होता है और वे दूसरों से विशेष सौम्यता, विनम्रता और दीनता से बात करते हैं। तुम उनमें कोई भी कमी, खोट या दोष नहीं देख सकते। उनकी मानवता से आँकें तो, वे विशेष रूप से विश्वसनीय, अंतर्दृष्टि वाले, परिष्कृत और शालीन लगते हैं, बिल्कुल चीनी लोगों द्वारा बताए गए सुसंस्कृत और शिष्ट सज्जनों की तरह। उनकी मानवता पूर्ण दिखाई देती है और बाहरी तौर पर उनमें कोई दोष नहीं पाया जा सकता, लेकिन क्या वे परमेश्वर के इरादे समझते हैं? क्या वे तमाम तरह की चीजें करने के सिद्धांत समझते हैं? ये लोग हर सभा में घंटों बोल सकते हैं, और जो लोग सत्य नहीं समझते वे यह सोचकर उनकी सराहना में दंडवत हो जाते हैं कि वे बहुत वाक्पटुता से बोलते हैं और खुद को बहुत स्पष्ट और तार्किक ढंग से व्यक्त करते हैं। लेकिन जो लोग वाकई सत्य समझते हैं, वे इन व्यक्तियों को सुनने के बाद जान जाते हैं कि वे जो कुछ भी बोलते हैं वह सब धर्म-सिद्धांत होता है और वह लोगों की समस्याएँ लक्षित करके उनकी वास्तविक कठिनाइयाँ हल नहीं करता। ये व्यक्ति लोगों की वास्तविक कठिनाइयों की अवहेलना करते हैं और सिर्फ खोखले धर्म-सिद्धांतों का प्रचार करना और ऊँचे और खोखले सिद्धांतों के बारे में अंतहीन बातें करना जानते हैं। बोलने के बाद वे यह सोचकर खुद से बहुत प्रसन्न भी होते हैं कि वे सत्य समझते हैं और उनके पास सत्य वास्तविकता है। वास्तव में, वे सिर्फ अपनी मानवता को पूर्ण और शिष्ट दिखाने के लिए इसके बाहरी रूप को छद्मवेश देने का प्रयास करते हैं ताकि यह ऊँची और भव्य दिखाई दे। लेकिन उनका सार और उनके भ्रष्ट स्वभाव, जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, जरा भी नहीं बदले होते हैं। परमेश्वर के बारे में उनकी धारणाएँ, उसके प्रति उनका विद्रोह, परमेश्वर के बारे में उनकी गलतफहमियाँ, सतर्कता और संदेह, और खासकर परमेश्वर के प्रति उनकी अनुचित माँगें और अत्यधिक इच्छाएँ उनके पूरे मन को भर देती हैं। वे सत्य का अनुसरण बिल्कुल नहीं करते, न ही वे सत्य जरा भी स्वीकारते हैं। इसलिए, उनकी मानवता को “पूर्ण” कहना “पूर्ण” शब्द का नकारात्मक अर्थ में प्रयोग करना है, क्योंकि कोई भी मानवता पूर्ण नहीं होती; उनकी “पूर्णता” विशुद्ध रूप से दिखावा और छद्मवेश होती है। दोषरहित मानवता का अस्तित्व नहीं है; वह एक दिखावा है, उस पर विश्वास मत करो। कोई व्यक्ति बाहर से जितना अधिक पूर्ण दिखाई देता है, उतना ही अधिक तुम्हें उससे सावधान रहना चाहिए, उसे देखना चाहिए और उसका भेद पहचानना चाहिए। तुम उसका भेद कैसे पहचानते हो? उसके साथ ज्यादा मेलजोल करो, उससे ज्यादा बातचीत करो और देखो कि क्या वह खुद को समझता है। मान लो वह कहता है, “मैं राक्षस हूँ, मैं शैतान हूँ, मैं परमेश्वर का प्रतिरोध करता हूँ, मैं भ्रष्ट हूँ! मैं पापी हूँ, महापापी, परमेश्वर मुझसे प्रसन्न नहीं होता, परमेश्वर मुझसे घृणा करता है!” या, “मैं अंधा और मूर्ख हूँ, गरीब और दयनीय हूँ! मैं गंदा हूँ, मैं मैला हूँ!” क्या इन शब्दों में कोई वास्तविक तथ्य है? क्या कोई ठोस समझ है? (नहीं।) उसे अपने भ्रष्ट स्वभावों की जरा भी समझ नहीं है; वह इस तथ्य को स्वीकारता तक नहीं कि उसमें भ्रष्ट स्वभाव हैं। वह बस कुछ खोखले शब्द और कुछ धर्म-सिद्धांत बोलना सीखता है। ये खोखले शब्द और धर्म-सिद्धांत वह समझ नहीं होती, जो उसके द्वारा अपने हृदय की गहराइयों में महसूस या अनुभव की गई चीजों से आती है; ये सिर्फ अच्छे लगने वाले शब्द होते हैं, ये सब एक दिखावा होते हैं जिसे वह पेश कर रहा होता है। अगर तुम फिर उससे उसके अनुभवों के बारे में पूछो, कि उसने अपने भ्रष्ट स्वभावों को कैसे समझा, और वह किस तरह की काट-छाँट से गुजरा है और फिर अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करने के लिए उसने परमेश्वर के कौन-से वचन पढ़े हैं, तो वह ऐसे व्यवहार करता है मानो उसने तुम्हारी बात सुनी ही न हो, और वह फिर से ढेरों बेकार शब्द बोलता है : “मेरी काबिलियत खराब है, मैं पापी पैदा हुआ था, मैं गोबर के ढेर में पड़ा एक नीच व्यक्ति हूँ, मैं परमेश्वर के उद्धार के योग्य नहीं हूँ! मुझमें भ्रष्ट स्वभाव हैं, और मैं जहाँ भी हूँ, परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम नहीं हूँ; मुझे बस रुतबा रखना पसंद है।” अगर तुम उससे पूछो कि उसने कैसे इसका समाधान करने की कोशिश की है, तो वह अभी भी तुम्हें कोई अप्रासंगिक जवाब देगा : “लोगों के पास रुतबा नहीं होना चाहिए; एक बार उन्हें रुतबा मिला नहीं कि वे गए काम से। रुतबे का अनुसरण करना एक अत्यधिक इच्छा है। बस, सबसे कम महत्वपूर्ण व्यक्ति बनने की कोशिश करो, और चाहे कहीं भी जाओ, सबसे निचले स्टूल पर बैठो, सबसे कम दिखाई देने वाली जगह पर बैठो। लोगों को विनम्र होना चाहिए; इसे ही विनम्रता कहते हैं।” क्या वह किसी ठोस बदलाव से गुजरा है? क्या उसे कोई वास्तविक अनुभव हुआ है? (नहीं।) उसके पास इनमें से कुछ भी नहीं है। क्या उसे अपने भ्रष्ट स्वभावों की कोई समझ है? (नहीं।) उसे उनकी कोई समझ नहीं है। तो क्या वह सत्य या परमेश्वर के वचन स्वीकारता है? (नहीं।) जो लोग यह नहीं स्वीकारते कि उनमें भ्रष्ट स्वभाव हैं, वे कभी सत्य नहीं स्वीकारते। अगर वे सत्य स्वीकारते, तो वे अपने हर शब्द और कर्म की और भ्रष्टता के अपने खुलासों की जाँच करने के लिए परमेश्वर के वचनों को मानक की तरह इस्तेमाल करते। जब वे भ्रष्टता प्रकट करते तो वे आत्मचिंतन करते, खुद से पूछते कि अमुक संदर्भ में उन्होंने भ्रष्टता प्रकट क्यों की, और उस समय वे क्या सोच रहे थे और किस चीज के द्वारा शासित थे। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन से और उनसे तुलना करने से उन्हें पता चल जाता कि यह एक भ्रष्ट स्वभाव है और वे उतने पवित्र या शुद्ध नहीं हैं जितनी उन्होंने कल्पना की थी, अंततः यह पता चलता है कि उनमें भी कपट, स्वार्थपूर्ण इरादे, महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ हैं और वे ऐसे लोग बिल्कुल नहीं हैं जिनके पास सत्य वास्तविकता हो। क्या उन्हें ऐसे अनुभव हुए हैं? नहीं। उन्होंने बहुत शब्द कहे हैं, लेकिन एक भी तथ्य ऐसा नहीं है जो साबित करे कि वे स्वीकारते हैं कि उनमें भ्रष्ट स्वभाव हैं। वे कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास कर रहे हैं, फिर भी उन्हें सत्य का कोई अनुभव नहीं है। वे सिर्फ धर्म-सिद्धांत बोलते हैं, सिर्फ यह सोचते हैं कि अपनी मानवता की खामियों और दोषों को छिपाने के लिए कैसे एक मुखौटा लगाया जाए और खुद को कैसे सुशोभित किया जाए। वे झूठी आध्यात्मिकता के बाहरी व्यवहारों, क्रियाकलापों, चेहरे की अभिव्यक्तियों, मिजाज और चाल-ढाल से खुद को सुशोभित करते हैं, जबकि अपने भ्रष्ट स्वभावों को अपने भीतर कसकर, मजबूती से और सुरक्षित रूप से लपेटे रखते हैं। वे मनुष्य के भ्रष्ट स्वभावों के बारे में परमेश्वर द्वारा उजागर की गई विभिन्न समस्याओं या इन स्वभावों को उजागर करने के लिए परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए विभिन्न कथनों को जरा भी नहीं स्वीकारते, न ही उन पर ध्यान देते हैं और न ही उन्हें दिल से लगाते हैं; वे बस अपनी मानवता के बाहरी रूप पर ध्यान देते हैं। फिर अगर तुम उनसे परमेश्वर के वचनों की उनकी समझ के बारे में बात करने के लिए कहो, कि क्या उन्हें उसके ताड़ना और न्याय के वचनों, मनुष्य के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करने वाले उसके वचनों या परमेश्वर के स्वभाव के बारे में उसके वचनों की कोई सच्ची समझ या सराहना है, तो वे इन व्यावहारिक विषयों को टाल देते हैं और फिर से आध्यात्मिक धर्म-सिद्धांतों की धारा बहा देते हैं : “परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है, परमेश्वर के कर्म अद्भुत हैं! परमेश्वर स्तुति और गुणगान के योग्य है, परमेश्वर अद्वितीय है, परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य सर्वोच्च है!” लोग कहते हैं, “तो फिर अपने अनुभव के बारे में बात करो। किस मामले में तुमने परमेश्वर का स्वभाव और परमेश्वर की पवित्रता देखी?” वे उत्तर देते हैं, “परमेश्वर बहुत महान है, मनुष्य बहुत तुच्छ है, मनुष्य अयोग्य है! परमेश्वर की नजर में मनुष्य जमीन पर रहने वाली चींटियों से भी हीन है। परमेश्वर मनुष्य का उन्नयन करता है!” क्या उनके पास इस प्रकार की कोई समझ होती है? (नहीं।) उनके पास इस तरह की कोई समझ नहीं होती। यह किस तरह का व्यक्ति है? (एक पाखंडी फरीसी।) यह एक पाखंडी फरीसी है। वह सत्य जरा भी नहीं स्वीकारता; परमेश्वर के वचन और सत्य उसकी नजर में सिर्फ नारे और धर्म-सिद्धांत हैं। वह आम तौर पर परमेश्वर के वचन पढ़ता है, आध्यात्मिक भक्ति के नोट लिखता है, सभाओं में जाता है और परमेश्वर के वचनों का प्रार्थना-पाठ करता है—वह बिना एक भी प्रक्रिया चूके या कोई भी प्रक्रिया छोड़े ये सारी प्रक्रियाएँ करता है। तो परमेश्वर के इन वचनों को पढ़कर उसने क्या आत्मसात किया है? उसने क्या पाया है? वह परमेश्वर के वचन सत्य समझने के लिए नहीं पढ़ता, उसके वचनों से अपने भ्रष्ट स्वभावों, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं या अपने विकृत विचारों और दृष्टिकोणों की तुलना तो और भी नहीं करता, जिससे कि वह अपनी समस्याओं का समाधान कर सके और अपने अभ्यास में अनुगमन के लिए एक मार्ग पा सके। वह परमेश्वर के वचन खुद को धर्म-सिद्धांतों से सुसज्जित करने के लिए पढ़ता है, ताकि सभाओं में दूसरों को व्याख्यान दे सके और पाठ पढ़ा सके। वह जो कुछ भी कहता है वह हर बार अलग होता है, और वह लंबे समय तक लगातार बात कर सकता है, अलग-अलग लोगों के साथ संगति करने के लिए परमेश्वर के अलग-अलग वचनों का चयन कर सकता है, जिसका उद्देश्य दूसरों से अपना सम्मान और अपनी आराधना करवाना होता है। कुछ लोग अपना भेष बदलने में खासे माहिर होते हैं—वे कितने घिनौने हो सकते हैं? जब वे मेरे कहे वचन सुनते हैं और उन्हें उपयोगी पाते हैं, तो उन्हें याद कर लेते हैं और फिर सभाओं में दिखावा करने के मौके ढूँढ़ते हैं। खास तौर पर, जब वे नए विश्वासियों के समूह में होते हैं—ऐसे लोग जिन्होंने ज्यादा धर्मोपदेश नहीं सुने होते और जिन्हें परमेश्वर के वचन याद नहीं रहते, भले ही उन्होंने कुछ वचन पढ़े हों—तो वे इस मौके का फायदा उठाते हैं और उन नए लोगों के बीच दिखावा करने और शान दिखाने लगते हैं। उन्हें सुनने के बाद हर कोई सोचता है, “इस व्यक्ति को पवित्र आत्मा ने प्रबुद्ध किया है, यह आध्यात्मिक है।” दूसरों का सम्मान और आराधना पाने हेतु शान दिखाने के लिए ऐसे साधन इस्तेमाल करना—क्या यह घृणित नहीं है? क्या यह लोगों को गुमराह करना नहीं है? (हाँ, है।) यह लोगों को गुमराह करना है।

अगर तुम जीवन भर सत्य सिद्धांतों की खोज करते हो और परमेश्वर के वचन अपने भ्रष्ट स्वभावों और अपने भीतर की उन चीजों का समाधान करने के आधार के रूप में खोजते हो जो सत्य के अनुरूप नहीं हैं, तो अंत में तुम निश्चित रूप से उद्धार प्राप्त करने वाले व्यक्ति होगे। लेकिन मान लो तुम जीवन भर अपनी मानवता की खामियों और दोषों का समाधान करने पर अपने प्रयास केंद्रित करते हो और उनका समाधान करने के लिए मार्ग खोजते हो, खुद को किसी भी खामी और दोष से मुक्त करने के लिए सभी प्रकार के तरीके आजमाते हो, ताकि तुम ऐसे व्यक्ति बन सको जो बाकी लोगों से अलग, पूर्ण और दोषरहित हो। कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं, “मैं एक शुद्ध व्यक्ति, एक उच्च और महान व्यक्ति बनना चाहता हूँ, ऐसा व्यक्ति जो समस्त सामान्य मानवता से परे हो।” मैं तुम्हें बता दूँ : ऐसा करके तुम असफल हो गए हो! चाहे तुम अपनी मानवता के किसी भी दोष या कमी का समाधान करने का प्रयास करो, इसका तुम्हारे उद्धार से कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करने के लिए सत्य का अनुसरण नहीं कर रहे हो। अगर तुम अपनी मानवता के दोषों और खामियों का समाधान कर लेते हो, तो ज्यादा से ज्यादा इसका बस इतना मतलब है कि बाहर से तुममें मानवता का कोई दोष दिखाई नहीं दे सकता, और ऊपरी तौर पर तुम पूर्ण और परिष्कृत दिखाई देते हो। इस तथ्य को छोड़ो कि तुम्हारी मानवता के दोष और खामियाँ बदलना मूलतः असंभव हैं, अगर उन्हें बदल भी दिया जाए, तो भी तुम्हारे कहीं बड़े दोष और खामियाँ—तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव—अभी भी तुम्हारे भीतर छिपे रहते हैं! जितना ज्यादा तुम दिखावा करोगे और दोषों से रहित एक पूर्ण मानवता का अनुसरण करोगे, उतने ही ज्यादा तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव तुम्हें गहराई से और कसकर उलझाएँगे और बाँधेंगे, जिससे तुम और भी ज्यादा अहंकारी, धोखेबाज, दुष्ट और दुराग्रही बन जाओगे। और इसका परिणाम क्या होता है? यह तुम्हें सत्य से और सत्य के अनुसरण के मार्ग से और दूर कर देता है। अंततः हटाया जाना ही तुम्हारा परिणाम होगा और तुम समाप्त हो जाओगे। सिर्फ इसलिए कि तुम बाहरी तौर पर पूर्ण हो या एक पवित्र व्यक्ति प्रतीत होते हो, परमेश्वर द्वारा इसे कोई अपवाद मानने और तुम्हें बचाने की कोई संभावना नहीं है। इसके विपरीत, जितना ज्यादा तुम एक दोषरहित पूर्ण मानवता का अनुसरण करोगे, परमेश्वर तुमसे उतनी ही ज्यादा घृणा करेगा और तुम पर कार्य नहीं करेगा। लेकिन कुछ लोग भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करने के कारण अक्सर पछतावा और दुःख महसूस करते हैं। पछतावा महसूस करते हुए वे सत्य का अनुसरण करने का संकल्प विकसित करते हैं, वे सत्य प्राप्त करने के लिए कष्ट सहने और कीमत चुकाने में सक्षम होते हैं, वे प्रतिदिन परमेश्वर के वचन पढ़ने में लगे रहते हैं और सभी मामलों में परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं और सत्य खोजते हैं। इस तरह वे सत्य के बारे में उत्तरोत्तर स्पष्ट होते जाते हैं, धीरे-धीरे वे कुछ प्रवेश, लाभ प्राप्त करते हैं और सत्य के सभी पहलुओं के संबंध में वास्तविक जीवन जीते हैं। अंततः, जब उनका सामना सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों से होता है, तो उनके पास अनुरूपी सत्य सिद्धांत होते हैं जिनका अभ्यास करना और जिन्हें सुरक्षित रखना होता है। कई वर्षों के अनुभव के बाद, परमेश्वर की ताड़ना और न्याय, काट-छाँट के जरिये और सत्य के अनुसरण में चुकाई गई कीमत के जरिये भी, वे धीरे-धीरे सत्य को अपने भीतर अपने जीवन के रूप में प्राप्त कर लेते हैं। उनके उद्धार की आशा और भी बढ़ जाती है और उनके द्वारा परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह और विश्वासघात करने की संभावना और भी कम हो जाती है। हालाँकि उनकी मानवता के दोष और खामियाँ और उनकी अंतर्निहित स्थितियाँ मूलतः अपरिवर्तित रहती हैं, फिर भी उनके भ्रष्ट स्वभाव लगातार कम होते जाते हैं, वे परमेश्वर का प्रतिरोध और उसके विरुद्ध विद्रोह कम बार करते हैं, वे परमेश्वर द्वारा अधिकाधिक पसंद किए जाने लगते हैं, दूसरों का अधिकाधिक आध्यात्मिक उन्नयन करने लगते हैं और उपयोग के लिए अधिकाधिक उपयुक्त होते जाते हैं। अगर ऐसे लोग इसी मार्ग पर चलते रहें, तो वे निश्चित रूप से वो लोग होंगे जो उद्धार प्राप्त करते हैं; यही वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर का कार्य बचाना चाहता है। अपने आस-पास के लोगों को देखो। देखो कि कौन हमेशा अपनी बाहरी छवि पर, अपनी मानवता के दोषों, खामियों और कमजोरियों पर लगातार मेहनत करता रहता है, दूसरों से सम्मान, सराहना और आराधना पाने और लोगों के दिलों में रुतबा बनाने के लिए खुद को सजाने और भेष बदलने की पूरी कोशिश करता है—इस प्रकार के लोग फरीसी होते हैं। फरीसियों का एक ही अंतिम परिणाम होता है : चूहे के साथ नष्ट होना। इसलिए मैं कहता हूँ कि इस प्रकार के लोग समाप्त हो जाते हैं और उन्हें हटा दिया जाता है।

शुरू से लेकर अंत तक, परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य लोगों की मानवता में दोषों और खामियों को बदलना नहीं है, बल्कि सिर्फ सामान्य मानवता वाले जमीर और विवेक को बहाल करना है। परमेश्वर लोगों के भ्रष्ट स्वभाव बदलना चाहता है। बेशक, परमेश्वर अक्सर लोगों के भ्रष्ट स्वभावों से छुटकारा पाने और इस प्रकार उन्हें उद्धार प्राप्त करने में सक्षम बनाने की बात भी करता है। तो सामान्य मानवता की बहाली किस नींव पर निर्मित होती है? वह लोगों द्वारा अपने भ्रष्ट स्वभाव त्याग देने की नींव पर निर्मित होती है। लोगों की सामान्य मानवता के धीरे-धीरे बहाल होने का अर्थ है कि उनके जमीर में भावना आ जाती है, उनका विवेक उत्तरोत्तर सामान्य होता जाता है और वे सामान्य मानवता के परिप्रेक्ष्य से सही चीजें करने और सही शब्द कहने में सक्षम हो जाते हैं; वे विघ्न-बाधाएँ पैदा नहीं करते, उनकी वाणी और कार्य आवेगपूर्ण, अंधे या उतावले नहीं होते, बल्कि पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों पर आधारित होते हैं, उनका विवेक विशेष रूप से सामान्य होता है और उनकी मानवता विशेष रूप से ईमानदार और दयालु होती है। तो किस आधार पर ये चीजें प्राप्त की जा सकती हैं और बहाली के इस स्तर तक पहुँचा जा सकता है? यह लोगों के भ्रष्ट स्वभाव बदल जाने के आधार पर, लोगों द्वारा सत्य का अभ्यास करने और परमेश्वर का न्याय और ताड़ना स्वीकार कर अपने भ्रष्ट स्वभाव त्यागने पर प्राप्त होता है। लेकिन अगर तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव बदले या त्यागे नहीं जाते, तो भले ही तुम्हारी मानवता अपेक्षाकृत अच्छी हो और तुममें कुछ जमीर और विवेक हों, सत्य को अपना जीवन बनाए बिना तुम्हारे जमीर और विवेक प्रभार ग्रहण नहीं कर सकते और तुम अभी भी अक्सर अपने भ्रष्ट स्वभावों द्वारा ऐसी चीजें करने के लिए प्रभावित किए जाओगे, उकसाए और भड़काए जाओगे जो तुम्हारे जमीर और विवेक के विरुद्ध जाती हैं। इसलिए, अगर तुममें न्याय की थोड़ी-सी भावना हो तो भी वह सिर्फ एक प्रकार की इच्छा और संकल्प मात्र होता है। तुममें सिर्फ थोड़ी-सी दयालु मानवता है, लेकिन चूँकि तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव तुम्हारा जीवन हैं और तुम्हें भीतर से नियंत्रित करते हैं, इसलिए तुम सिर्फ बुराई नहीं करना और दूसरों को धोखा देने और नुकसान पहुँचाने की पहल नहीं करना ही हासिल कर सकते हो, जो पहले ही काफी अच्छा है। दूसरे शब्दों में, तुम सिर्फ यह सुनिश्चित कर सकते हो कि जब तुम्हारे निजी हित प्रभावित न हों तब तुम बुराई न करो, और जैसे ही तुम्हारे निजी हित प्रभावित होंगे, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव तुम्हारे जमीर और विवेक को दबाने के लिए उभर आएँगे, तुमसे तुम्हारे हितों और अधिकारों की रक्षा करवाएँगे, और इस प्रकार तुम्हारे लिए जमीर और विवेक को प्रभार लेने देना बहुत मुश्किल हो जाएगा। ऐसा क्यों है? इसलिए कि सत्य तुम्हारा जीवन नहीं है; बल्कि शैतान के भ्रष्ट स्वभाव तुम्हारा जीवन हैं। इसलिए, तुम अपनी मानवता वाला थोड़ा-सा जमीर या विवेक तभी प्रकट कर सकते हो जब तुम्हारे हितों को कोई नुकसान नहीं पहुँच रहा हो। जैसे ही तुम्हारे हितों को नुकसान पहुँचता है या खतरा होता है, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव तुरंत तुम्हारे जमीर और विवेक को दबाने के लिए उभर आएँगे, जिससे तुम वे चीजें करोगे जो जमीर और विवेक के विरुद्ध होती हैं—अर्थात् वे चीजें जो नैतिकता और नैतिक न्याय के विरुद्ध होती हैं—यहाँ तक कि तुम कुछ भी करने में सक्षम हो सकते हो। बेशक, यह कहा जा सकता है कि ये सभी क्रियाकलाप सत्य के विरुद्ध होते हैं; यह अपरिहार्य है। इसलिए व्यक्ति जिसे जीता है वह उसकी मानवता की स्थितियों पर नहीं, बल्कि उसके आंतरिक जीवन सार पर निर्भर करता है। अगर वास्तव में सत्य उसका जीवन होता है, तो उसके जीवन में सत्य, परमेश्वर के वचन और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग निहित होता है। तब सामान्य मानवता वाले उसके जमीर और विवेक इष्टतम स्थिति में रहेंगे और कार्य करने में सक्षम होंगे, जिससे वह सत्य का अभ्यास और सिद्धांतों के अनुसार क्रियाकलाप कर सकेगा। लेकिन अगर व्यक्ति का जीवन सार उसके भ्रष्ट स्वभाव हैं, तो उसके जमीर और विवेक निम्नतम मानक तक घट जाते हैं, अर्थात् सिर्फ इतना है कि वे मानवता की निम्नतम सीमा से नीचे नहीं आते। निम्नतम सीमा क्या है? “अगर मुझ पर आक्रमण न किया जाए तो मैं आक्रमण नहीं करूँगा; अगर मुझ पर आक्रमण किया जाता है तो मैं निश्चित रूप से पलटवार करूँगा”; “दाँत के बदले दाँत, आँख के बदले आँख”; “जैसे को तैसा।” और क्या? “नकली सज्जन बनने से बेहतर है सच्चा खलनायक बनना।” यह कई गैर-विश्वासियों के आचरण की निम्नतम सीमा है। एक गैर-विश्वासी के लिए इस तरह से अभ्यास कर पाना पहले ही काफी अच्छा है। इससे तुम लोगों ने क्या समझा है? अगर तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते तो तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव त्यागे नहीं जाएँगे, तुम्हारा जीवन सार नहीं बदलेगा, और अगर तुम्हारा जीवन सार नहीं बदलता तो सामान्य मानवता के तुम्हारे जमीर और विवेक सार में बहाल नहीं होंगे और रूप में सिर्फ मानवता की निम्नतम सीमा से नीचे नहीं जाएँगे। लेकिन अगर तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव त्याग दिए गए हैं और तुम्हारे जीवन का सार बदल गया है, तो तुम्हारी सामान्य मानवता के जमीर और विवेक एक निश्चित सीमा तक इष्टतम और उन्नत हो जाएँगे। यहाँ “इष्टतम” और “उन्नत” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि तुम्हारे जमीर और विवेक सामान्य रूप से कार्य करने लगते हैं—ऐसा नहीं होता कि वे सिर्फ निम्नतम सीमा पार नहीं करते, बल्कि वे सत्य का अभ्यास करने के मानक तक पहुँच जाते हैं। गैर-विश्वासियों के बीच तथाकथित अच्छे लोग बस थोड़ा जमीर और विवेक प्रदर्शित करते हैं, स्पष्ट रूप से बुरे क्रियाकलाप नहीं करते और नैतिक न्याय की निम्नतम सीमा पार नहीं करते। यह पहले ही काफी अच्छा है; वे बहुत अच्छे लोग माने जा सकते हैं। लेकिन जिन लोगों का जीवन सत्य है, वे इससे भी आगे जाते हैं; उनमें सही-गलत का भेद पहचानने की योग्यता होती है और वे विभिन्न प्रकार का सही-गलत पहचान सकते हैं और विभिन्न प्रकार के लोगों की पहचान कर सकते हैं। तो उनका आधार क्या होता है? उनका आधार सत्य सिद्धांत होते हैं। उनके पास सत्य सिद्धांत होते हैं—क्या यह जमीर और विवेक के मानक से कहीं ज्यादा ऊँचा नहीं है? (हाँ, है।) चूँकि वे सत्य समझते हैं और सत्य उनका जीवन होता है, और जिस आधार से वे विभिन्न मामलों की पहचान करते हैं वह साधारण भ्रष्ट लोगों के मानक से कहीं ज्यादा ऊँचा होता है, इसलिए जटिल मामलों का सामना करते समय वे सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते रहेंगे। सत्य सिद्धांतों को समझने के बाद उनका मन भ्रमित नहीं होगा और उनकी सोच स्पष्ट होगी। स्पष्ट का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है तर्कसंगत। उनके सामने आने वाले मामले कितने भी जटिल हों, अभ्यास के लिए उनके हृदय में सत्य सिद्धांत अंकित होते हैं; उन्होंने सटीकता और गहनता से सत्य समझ लिया होता है और वह पहले ही उनका जीवन बन चुका होता है। तमाम तरह के जटिल लोगों, घटनाओं और चीजों से सामना होने पर उनके पास एक बुनियादी मानदंड होता है, जो सत्य सिद्धांतों का पालन करना है। ये सत्य सिद्धांत उन्हें विभिन्न जटिल चीजों के सार की असलियत जानने और समस्या की वास्तविकता समझने में सक्षम बनाते हैं; वे ये चीजें पहचान सकते हैं। यही उनकी तार्किकता है। क्या यह तार्किकता सामान्य लोगों की तार्किकता से ऊँची नहीं है? (हाँ।) तो इस स्तर पर पहुँचकर क्या उनकी तार्किकता उन्नत और इष्टतम नहीं हो गई है? (हाँ।) परमेश्वर इसी तरह की सामान्य मानवता चाहता है; परमेश्वर भ्रमित लोग नहीं चाहता। कुछ लोग कहते हैं, “मैं निष्कपट और कायर हूँ, और मुझे हमेशा धौंस दी जाती है,” जबकि दूसरे लोग कहते हैं, “मेरी काबिलियत वास्तव में खराब है और मुझमें कोई योग्यता या प्रतिभा नहीं है।” परमेश्वर कहता है कि ये चीजें महत्वपूर्ण नहीं हैं, महत्वपूर्ण यह है कि क्या तुम सत्य सिद्धांत समझते हो। अगर तुम सत्य सिद्धांत समझते हो और एक ईमानदार व्यक्ति होने के मानकों और सिद्धांतों के अनुसार बोलते हो और क्रियाकलाप करते हो, तो भले ही गैर-विश्वासी तुम्हें मूर्ख कहकर तुम्हारा मजाक उड़ाएँ, यह सच्ची मूर्खता नहीं है। क्यों? वह इसलिए कि एक बार जब तुम सत्य सिद्धांतों को समझ लेते हो, तो तुम्हारा विवेक सुदृढ़, इष्टतम, साधारण लोगों से ऊँचा हो जाता है। जब तुम किसी भी मामले का सामना करते हो, तब तुम भ्रमित नहीं होते; तुम्हारे पास उसे सँभालने के आधार के रूप में सही सिद्धांत, दृढ़ रुख और लक्ष्य होते हैं। तुम्हारा मन साफ और तुम्हारे विचार स्पष्ट होते हैं। तुम वे सिद्धांत और मानक पूरे करने का प्रयास करते हुए क्रियाकलाप करते हो, और तुम निश्चित रूप से परमेश्वर के इरादों के विरुद्ध नहीं जाते; तुम निश्चित रूप से उसके इरादों के अनुरूप क्रियाकलाप करते हो। तुम्हारे द्वारा मामला सँभाल लेने के बाद, चाहे उस समय लोगों ने उसकी असलियत जानी हो या नहीं, एक बार जब पर्याप्त समय बीत जाता है और लोग समझ जाते हैं, तो वे सब पूरी तरह से आश्वस्त हो जाएँगे और जान जाएँगे कि तुमने उसे जिस तरह से सँभाला, वह अत्यंत लाभकारी था। तो ऐसा प्रभाव प्राप्त करने का मूल कारण क्या है? वह यह है कि तुम्हारे पास तुम्हारे जीवन के रूप में सत्य है। तभी तुम्हारी तार्किकता तुम्हें किसी व्यक्ति और वस्तु के बारे में सटीक निर्णय लेने, उसका सटीक चरित्र चित्रण करने और उसके बारे में सटीक निष्कर्ष निकालने में सक्षम बना सकती है, साथ ही अभ्यास के सटीक सिद्धांतों और बेशक, लोगों की सहायता और मार्गदर्शन के लिए सटीक सिद्धांतों को अपनाने में भी तुम्हें सक्षम बना सकती है। तब क्या तुम्हारी तार्किकता उन्नत और इष्टतम नहीं हो जाती? सामान्य मानवता ऐसी तार्किकता कहाँ से प्राप्त करती है? (सत्य से।) परमेश्वर वही मानवता चाहता है, जिन लोगों का जीवन सत्य है। शायद तुम मूर्ख, निष्कपट, कायर और अक्षम हो, हो सकता है कि तुम अलोकप्रिय हो और दुनिया में लोगों द्वारा धमकाए जाते हो, लेकिन इनमें से कोई भी चीज मायने नहीं रखती; यह वह चीज नहीं है जिसे परमेश्वर देखता है। शायद तुम दुनिया में बहुत सक्षम हो, लोगों को पढ़ने, रुझानों का भेद पहचानने और हवा के अनुसार अपनी पाल व्यवस्थित करने में विशेष रूप से कुशल हो, लेकिन यह भी बेकार है; यह तुम्हारी तार्किकता सुदृढ़ होने के बराबर नहीं है। जब तुम सत्य स्वीकार लेते हो, सत्य समझ लेते हो और सभी सत्यों पर पकड़ बना लेते हो, उनका अभ्यास कर लेते हो और उनका अनुभव प्राप्त कर लेते हो और सत्य तुम्हारा जीवन बन जाता है, तभी विभिन्न मामलों के संबंध में तुम्हारी पहचान, निर्णय और फैसला लेना सटीक हो सकता है।

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