सत्य का अनुसरण कैसे करें (4) भाग पाँच

उदाहरण 9 : स्वच्छता की परवाह न करना

कुछ लोग अविकसित देशों या परिवेशों में या खराब परिस्थितियों वाले परिवारों में पैदा होने के कारण अपने जीवन में चीजों पर विशेष ध्यान नहीं देते। हो सकता है वे भोजन की स्वच्छता को लेकर सतर्क न हों, हो सकता है वे एक ही वस्त्र बिना धोए लंबे समय तक पहनते हों, शायद उन्हें यह भी पता नहीं चलता कि उनके कपड़ों से पसीने की बदबू आ रही है। यह किस तरह की अभिव्यक्ति है? (यह व्यक्ति की जीवनशैली से जुड़ी आदतों की अभिव्यक्ति है।) यह जीवनशैली से जुड़ी आदतों का मामला है; यह स्वच्छता पर ज्यादा ध्यान न देना है। कुछ लोग अपना चेहरा और पैर धोने के लिए एक ही तौलिया इस्तेमाल करते हैं और फिर दिन में काम पर जाते समय पसीना पोंछने के लिए उसका इस्तेमाल करते हैं। कभी-कभी, अगर उन्हें कोई घायल दिखता है तो वे घाव ढकने के लिए भी उसी तौलिये का इस्तेमाल करते हैं। वे स्वच्छता पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देते। यह क्या समस्या है? इसका उस परिवार की स्थितियों से एक निश्चित संबंध है, जिसमें वे पैदा हुए थे। कुछ लोग अच्छी जीवन-स्थितियों वाले परिवारों से आते हैं, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति के पास कई तौलिये और नहाने के तौलिये होते हैं, जिनमें चेहरे के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले तौलियों और पैरों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले तौलियों के बीच स्पष्ट अंतर होता है। वे रोज नहाते हैं और अपना चेहरा धोते हैं, और तौलिये और नहाने के तौलिये भी रोज धोए जाते हैं, इसलिए ऐसा लगता है कि वे सफाई को लेकर बहुत सजग हैं। ऐसी आदतें कैसे बनती हैं? वे परिवार में एक निश्चित आर्थिक आधार और वित्तीय स्थितियों का नतीजा होती हैं, जो इन परिष्कृत जीवनशैली से जुड़ी आदतों को जन्म देती हैं। इससे व्यक्ति स्वच्छता के प्रति बहुत चौकस और सम्माननीय दिखाई देता है। ऊपर से ऐसा लगता है कि वे सफाई को लेकर बहुत सजग हैं, लेकिन असल में इन सबके पीछे वे जन्मजात स्थितियाँ हैं जो इन्हें जन्म देती हैं। तो कुछ लोग इन चीजों पर ध्यान क्यों नहीं देते? कुछ लोग प्राकृतिक रूप से ऐसे मामलों पर ज्यादा ध्यान देने की प्रवृत्ति नहीं रखते और अगर उनके पास साधन हों तो भी वे इन चीजों को बहुत गंभीरता से नहीं लेते—यह कोई महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है। जहाँ तक दूसरों का संबंध है, यह उनकी पारिवारिक स्थितियों और परिवेश के कारण होता है। सात-आठ लोगों के परिवार में सभी लोग अपना चेहरा और पैर धोने के लिए एक ही तौलिया इस्तेमाल कर सकते हैं और एक व्यक्ति के बाद दूसरा उसका इस्तेमाल कर सकता है। कुछ लोग तो अपने पैर धोए बिना ही बिस्तर पर चले जाते हैं और फिर भी अच्छी नींद लेते हैं। इससे उनके दैनिक जीवन या स्व-आचरण पर कोई असर नहीं पड़ता। जो लोग सफाई को लेकर बहुत सजग होते हैं, वे कह सकते हैं, “लेकिन तुम्हारे पैरों पर कीटाणु हैं—वे बहुत गंदे हैं!” जिस पर दूसरे जवाब दे सकते हैं, “पैर गंदे नहीं हैं; वे पूरे दिन ढके रहते हैं और बाहरी दुनिया के संपर्क में नहीं आते, इसलिए कोई कीटाणु नहीं होते, बस थोड़ा पैरों का पसीना होता है। लोगों को लगता है कि पैरों का पसीना गंदा होता है, लेकिन असल में ऐसा नहीं है। कुछ जगहों पर पैरों का इस्तेमाल खाना बनाने के लिए भी किया जाता है। कौन जानता है, बाजार से जो खाना तुम खरीदते हो, वह लोगों ने पैरों से आटा गूँधकर बनाया हो। तुम इसे नहीं देख सकते और खाना खा लेते हो—फिर भी तुम खुद को सफाई के मामले में इतना सजग समझते हो!” चाहे कोई व्यक्ति विशेष ध्यान दे या न दे, यह सब जीवनशैली से जुड़ी आदतें या जीने के तरीके हैं जिन्हें जन्मजात स्थितियों द्वारा आकार दिया जाता है। इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि वे कैसे आचरण करते हैं। तो किस तरह की अभिव्यक्तियों में व्यक्ति का आचरण शामिल होता है? उदाहरण के लिए, किसी खतरनाक स्थिति से सामना होने पर, बड़े लाल अजगर द्वारा पीछा किए जाने पर हर व्यक्ति तनावग्रस्त और डरा हुआ महसूस करता है और उसकी कुछ सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रियाएँ होंगी। लेकिन कुछ लोग कह सकते हैं, “चाहे हम सब अभी कितने भी तनावग्रस्त और डरे हुए क्यों न हों, हमें शांत रहना चाहिए और स्थिति की समस्याओं से निपटना चाहिए। हमें पहले अगुआओं और कार्यकर्ताओं और दूसरे क्षेत्रों के भाई-बहनों को बचाना चाहिए, ताकि वे जल्दी से निकल सकें।” लेकिन दूसरे लोग अलग तरह से सोच सकते हैं : “उन्हें बचाना चाहिए? और मेरा क्या? अगर अंत में मैं बच नहीं पाया तो क्या होगा? मुझे पहले भागना होगा! जो पहले भागेगा, वह पकड़ा नहीं जाएगा और सजा या यातना नहीं पाएगा।” देखो, खतरे से सामना होने पर, हालाँकि सभी में डर की एक ही जैसी सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रिया होती है, कुछ लोग दूसरों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं और अपने जीवन की सुरक्षा को पृष्ठभूमि में रखते हैं—ऐसे लोग प्रेम और दयालुता दिखाते हैं। लेकिन दूसरे लोग पहले अपने बारे में सोचते हैं, दूसरों के बारे में सोचे बिना भाग जाते हैं—यह स्वार्थ है। असल में, अपनी मानवता के जमीर के अर्थ में, क्या यह दूसरा समूह जानता है कि उन्हें पहले अगुआओं और कार्यकर्ताओं और दूसरे क्षेत्रों के भाई-बहनों की रक्षा करनी चाहिए? औचित्य के संदर्भ में, क्या वे इसे समझते हैं? (हाँ।) जब हर व्यक्ति इस औचित्य को समान रूप से समझता है और उसमें सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रियाएँ होती हैं तो लोग अपनी अभिव्यक्तियों के संबंध में भिन्न होते हैं। यह व्यक्तियों के बीच मानवता में अंतर दर्शाता है। कुछ लोग स्वार्थी और नीच होते हैं, सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं और दूसरों को नजरअंदाज करते हैं, जबकि अन्य दयालु होते हैं, दूसरों के प्रति निस्स्वार्थ और विचारशील होने में सक्षम होते हैं, उनकी सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं और स्वार्थपूर्ण तरीके से कार्य नहीं करते। क्या यह मानवता के विभिन्न प्रकार दर्शाता है? (हाँ।) इससे अंतर स्पष्ट हो जाता है। तो इन दो अलग-अलग प्रकार की मानवता वाले लोगों में से किस तरह का व्यक्ति सत्य स्वीकारने और अपना भ्रष्ट स्वभाव त्याग देने में सक्षम होता है? (अच्छी मानवता वाला व्यक्ति सत्य स्वीकारने और आसानी से अपना भ्रष्ट स्वभाव त्याग देने में सक्षम होता है।) स्वार्थी लोगों के बारे में क्या कहना है? (उनके लिए सत्य का अभ्यास करना आसान नहीं है; अगर वे उसे समझते हों तो भी वे उसे अभ्यास में नहीं ला सकते, इसलिए उनके लिए अपना भ्रष्ट स्वभाव त्याग देना कठिन है।) बिल्कुल। इसलिए, हालाँकि हर व्यक्ति भ्रष्ट स्वभाव प्रकट कर सकता है, लेकिन अगर लोगों की मानवता अलग-अलग है तो वे इस मामले में भी भिन्न होंगे कि वे अपना भ्रष्ट स्वभाव त्याग सकते हैं या नहीं। जब लोगों में अलग-अलग तरह की मानवता होती है तो वे एक ही स्थिति पर अलग-अलग रवैयों और तरीकों से प्रतिक्रिया करते हैं। यह निर्धारित करता है कि व्यक्ति अंततः सत्य और सकारात्मक चीजें स्वीकार सकता है या नहीं, सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चल सकता है या नहीं और अपना भ्रष्ट स्वभाव त्याग सकता है या नहीं। व्यक्ति की मानवता महत्वपूर्ण है, है न? खतरे का सामना करने पर हर व्यक्ति की कुछ सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रियाएँ होंगी—वे सभी डर, घबराहट और आतंक महसूस करते हैं, वे अनिश्चित होते हैं, मृत्यु से डरते हैं और भाग जाना चाहते हैं। ऐसी विकट परिस्थिति में अच्छी और दयालु मानवता वाला इंसान पहले अगुआओं और कार्यकर्ताओं और दूसरे क्षेत्रों के भाई-बहनों की सुरक्षा के बारे में सोचेगा—पहले वह दूसरों की सुरक्षा के बारे में सोचता है। हालाँकि उसमें भी सहजवृत्तिजन्य प्रतिक्रियाएँ होती हैं—भय, घबराहट, आतंक—और प्राकृतिक रूप से उसमें आत्म-सुरक्षा की प्रवृत्ति भी होती है, लेकिन जिस तरह वह स्थिति सँभालता है, वह पहले अपनी सुरक्षा करने के लिए नहीं बल्कि पहले दूसरों की सुरक्षा करने के लिए होता है। दयालु मानवता वाला इंसान इसी तरह से आचरण करता है। और स्वार्थी व्यक्ति जिस तरह से आचरण करता है, उसके बारे में क्या कहना है? वह दूसरों के बारे में सोच सकता है, लेकिन उनकी सुरक्षा नहीं करता—वह पहले अपनी सुरक्षा करता है। इसलिए दयालु मानवता वाले लोगों में, जो दूसरों से सहानुभूति रख सकते हैं और उनकी रक्षा कर सकते हैं, सत्य स्वीकारने की संभावना होती है। उनकी मानवता का जमीर और विवेक सत्य स्वीकारने और अपना भ्रष्ट स्वभाव त्याग देने के लिए आवश्यक स्थितियों के अनुरूप होते हैं। जहाँ तक स्वार्थी किस्म के व्यक्ति का संबंध है, अगर वह सत्य समझता हो तो भी वह न तो उसे स्वीकारता है और न ही उसका अभ्यास करता है। खतरे से सामना होने पर उसकी मानवता आत्म-सुरक्षा और स्वार्थ अभिव्यक्त करती है। इसलिए उसके द्वारा अभिव्यक्त मानवता से आँकने पर यह स्पष्ट है कि उसमें सत्य स्वीकारने और अपना भ्रष्ट स्वभाव त्याग देने के लिए आवश्यक मूलभूत स्थितियाँ नहीं होतीं। इसका मतलब यह है कि ऐसी परिस्थितियों में जहाँ सत्य का अभ्यास करना आवश्यक होता है, उसका जमीर और विवेक अपना काम करना बंद कर देते हैं। वह अपने जमीर और विवेक के खिलाफ काम करता है। वह सत्य खोजना और सही चीजें करना नहीं चुनता जो उसे करना चाहिए, इसके बजाय वह अपने जमीर और विवेक के खिलाफ जाना चुनता है, यहाँ तक कि नैतिक न्याय और सत्य के खिलाफ जाता है, अपनी स्वार्थपूर्ण इच्छाएँ और अपने हितों की जरूरतें पूर्ण रूप से पूरी करता है ताकि वह खुद को बचा सके और अपने तमाम हित सुरक्षित रख सके। इसलिए ऐसे व्यक्ति के लिए सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर या उद्धार के मार्ग पर चलना आसान नहीं होगा। इसका निहितार्थ यह है कि उसका भ्रष्ट स्वभाव उतार फेंकना बहुत कठिन है। इसे कुछ सावधानी से कहें तो, यह कहने के बजाय कि वह अपना भ्रष्ट स्वभाव त्याग देने में असमर्थ है, हम कहेंगे कि उसके लिए ऐसा करना बहुत कठिन है। तो अब इस मुद्दे को देखते हुए, व्यक्ति अपना भ्रष्ट स्वभाव त्यागकर उद्धार प्राप्त कर सकता है या नहीं, क्या यह पूरी तरह से उसकी जन्मजात स्थितियों पर निर्भर करता है? (नहीं।) यह किस पर निर्भर करता है? (उसकी मानवता पर।) यह उसके चरित्र पर निर्भर करता है और इस बात पर भी कि जब वह विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करता है तो उसकी मानवता का जमीर और विवेक काम कर सकते हैं या नहीं। दूसरे शब्दों में, यह इस बात पर निर्भर करता है कि जब चीजें होती हैं तो वह अपने जमीर और विवेक के अनुसार कार्य करता है या नहीं। अगर व्यक्ति अपने जमीर और विवेक के निर्देशन में कार्य करता है तो वह सकारात्मक चीजें और सत्य चुनेगा। लेकिन अगर वह अपने जमीर और विवेक के खिलाफ कार्य करता है तो चाहे वह कितना भी सत्य समझता हो या उसकी काबिलियत उच्च हो या निम्न, वह नैतिक न्याय के खिलाफ जाएगा, सत्य सिद्धांतों के खिलाफ जाएगा, यहाँ तक कि अपनी मानवता भी खो देगा। इससे तुम्हें क्या स्पष्ट होता है? क्या मानवता महत्वपूर्ण है? (हाँ।) चाहे जो भी स्थिति हो, अगर व्यक्ति अपने जमीर और विवेक के खिलाफ और नैतिक न्याय के विरुद्ध कार्य करता है, जब भी ये उसके हितों से संबंधित हों, तो वह अपनी मानवता खो देगा। वह अपने हित निरापद और सुरक्षित रखने के लिए कुछ भी करेगा। इसलिए किसी स्थिति से सामना होने पर वह अपने जमीर और विवेक के अनुसार कार्य करना नहीं चुनेगा। इसके बजाय वह अपने हितों की खातिर उनके खिलाफ जाएगा, अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए अपनी ईमानदारी और गरिमा का त्याग करेगा। इसे इस परिप्रेक्ष्य से देखें तो, ऐसे लोग आम तौर पर चाहे कितना भी अच्छा व्यवहार करें, वे अपने हितों का ही अनुसरण करते हैं—उनका भ्रष्ट स्वभाव उतार फेंकना बहुत मुश्किल है। वे सत्य नहीं स्वीकारते—क्षण जितना ज्यादा नाजुक होता है और जितना ज्यादा वे वास्तविकता का सामना करते हैं, उतना ही ज्यादा वे अपने जमीर, विवेक और सत्य के खिलाफ जाना चुनते हैं; और क्षण जितना ज्यादा नाजुक होता है, उतना ही ज्यादा वे सत्य से विमुख होने का अपना भ्रष्ट स्वभाव और उतनी ही ज्यादा अपनी स्वार्थपूर्ण, नीच मानवता प्रकट करते हैं। इसलिए, ऐसे व्यक्ति के लिए अपना भ्रष्ट स्वभाव उतार फेंकना बहुत कठिन है। अब तक, क्या यह स्पष्ट हो गया है कि भ्रष्ट स्वभाव उतार फेंकने के लिए व्यक्ति की मानवता एक मूलभूत स्थिति है? व्यक्ति में किस तरह की मानवता है, इससे निर्धारित होता है कि वह अंततः अपना भ्रष्ट स्वभाव त्याग सकता है या नहीं, वह अंततः सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चल सकता है या नहीं और वह अंततः उद्धार प्राप्त कर सकता है या नहीं।

उदाहरण 10 : प्राकृतिक रूप से अल्पभाषी होना

कुछ लोग सौम्य और सहनशील व्यक्तित्व के साथ प्राकृतिक रूप से अल्पभाषी होते हैं। वे शायद ही कभी किसी बात का बतंगड़ बनाते हैं या दूसरों से विवाद करते हैं, न ही वे बहुत ज्यादा शोरगुल मचाते हैं। उनकी वाणी दिखावटी नहीं होती और उनकी आवाज नरम होती है। बाहरी तौर पर वे बहुत सौम्य दिखाई देते हैं और व्यवस्थित तरीके से और बिना हड़बड़ी के काम करते हैं। यहाँ तक कि कुछ शर्मीले लोग भी होते हैं जो दूसरों के साथ ज्यादा मौखिक संवाद करना पसंद नहीं करते और लोगों के साथ ज्यादा मिलने-जुलने के लिए तैयार नहीं होते। जहाँ भी वे जाते हैं, वहाँ मूलभूत रूप से उनकी मौजूदगी का कोई एहसास नहीं होता। ये अभिव्यक्तियाँ किस तरह के मुद्दे से संबंधित हैं? (यह उनके व्यक्तित्व से जुड़ा मुद्दा है।) यह उनके जन्मजात व्यक्तित्व से जुड़ा मुद्दा है। इन लोगों का व्यक्तित्व बाहर से ऐसा होता है और अंदर से उनके विचार भी बहुत सरल होते हैं। वे दूसरों के साथ अपेक्षाकृत अच्छे होते हैं, दूसरों के साथ अपेक्षाकृत ठीक से मिलते-जुलते हैं, दूसरों का फायदा नहीं उठाते और जब दूसरों से उपकार या मदद लेते हैं तो उसका बदला चुकाते हैं और अपने दिल में दूसरों की दयालुता याद भी रखते हैं। बाहरी तौर पर ऐसा लगता है कि इन लोगों में अच्छी मानवता है : वे मनुष्यों और जानवरों दोनों को ही नुकसान नहीं पहुँचाते; वे दूसरों के प्रति सहनशील, संवेदनशील होते हैं और दूसरों के साथ किसी बात पर झगड़ा नहीं करते; वे विवादों में नहीं उलझते, न ही वे दूसरों के बारे में गपशप करते हैं; वे लोगों की पीठ पीछे उनकी आलोचना नहीं करते और कभी दूसरों पर अग्रसक्रिय रूप से हमला नहीं करते या उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाते; जब कोई मुश्किल में होता है तो अगर वे मदद कर सकते हों तो कभी मना नहीं करते और बदले में कुछ नहीं माँगते। ज्यादातर लोग कहेंगे कि ये व्यक्ति काफी मस्तमौला हैं। तो क्या बाहरी तौर पर ऐसा लगता है कि इन लोगों में अच्छी मानवता होती है? (हाँ।) लेकिन एक अवसर पर परमेश्वर का घर उनसे पूछता है कि चीजें कैसी चल रही हैं : “तुम लोगों की कलीसिया के अगुआओं का काम कैसा है? भाई-बहन उनके बारे में क्या सोचते हैं? क्या इस अवधि के दौरान सुसमाचार के काम के कोई नतीजे मिले हैं? क्या किसी ने कलीसिया के कार्य में गड़बड़ की है या बाधा डाली है?” वे इस पर विचार करते हैं : “ये मुझसे इस बारे में क्यों पूछ रहे हैं? ये कहना क्या चाहते हैं? क्या इनका तात्पर्य यह है कि मुझे कहना चाहिए कि अगुआ अच्छा काम नहीं कर रहे? क्या ये हमारे अगुआओं को बरखास्त करना चाहते हैं? ये कुरेद-कुरेदकर मेरे मुँह से शब्द निकलवाने और मुझसे पुष्टि प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। खैर, मैं कुछ नहीं कहने वाला। अगर किसी दिन अगुआओं को बरखास्त कर दिया गया और उन्हें पता चला कि मैंने उनकी समस्याओं की रिपोर्ट की थी तो क्या वे मेरे प्रति द्वेष नहीं पाल लेंगे?” इसलिए वे जवाब देते हैं, “अगुआ फिलहाल बहुत अच्छा काम कर रहे हैं; मैंने कोई समस्या नहीं देखी।” वे बस इतना ही कहते हैं। जब उनसे दोबारा पूछा जाता है, “तुमने वाकई कोई समस्या नहीं देखी?” तो वे जवाब देते हैं, “फलाँ-फलाँ बहन से पूछो, वह अक्सर अगुआओं से बातचीत करती है। वे अक्सर मिलते-जुलते हैं और वह उन्हें अच्छी तरह से जानती है। मैं उन्हें उतनी अच्छी तरह से नहीं जानता।” लेकिन असल में वे मन में सोचते हैं : “अगर मुझे पता हो तो भी मैं कुछ नहीं कह सकता। अगर मैं बोला और बाद में अगुआओं को बरखास्त कर दिया गया तो क्या वे मेरे प्रति द्वेष नहीं पाल लेंगे? अगर वे बरखास्त नहीं किए गए तो भी अगर उन्हें पता चला कि मैंने उनके बारे में कुछ बुरा कहा है तो क्या वे मेरे लिए समस्याएँ खड़ी नहीं कर देंगे? क्या वे मुझे सताएँगे नहीं? क्या मेरा कर्तव्य छीन नहीं लिया जाएगा? मैं कुछ नहीं कह सकता!” यह किस तरह की अभिव्यक्ति है? (यह धोखेबाजी की अभिव्यक्ति है।) और यह किस तरह की समस्या से संबंधित है? एक भ्रष्ट स्वभाव से। ऐसे व्यक्ति बाहरी तौर पर प्राकृतिक रूप से अच्छे व्यक्तित्व और अच्छी मानवता वाले लगते हैं, लेकिन जब भी दूसरों का मूल्यांकन करने या समस्याओं की रिपोर्ट करने की बात आती है तो वे दावा करते हैं कि वे उनके बारे में नहीं जानते, कहते हैं कि वे थोड़े समय से ही विश्वासी हैं और सत्य नहीं समझते, वे इतने मूर्ख हैं कि चीजों की असलियत नहीं जानते। चाहे वे किसी की भी समस्याएँ देखें, वे कभी इसकी रिपोर्ट नहीं करते या इसके बारे में नहीं बोलते। जब कोई व्यक्ति अगुआओं की पीठ पीछे उनकी आलोचना करता है या अपना कर्तव्य लापरवाही से निभाता है तो वे ऐसा दिखावा करते हैं कि उन्होंने उसे नहीं देखा या उन्हें इस बारे में कुछ नहीं पता और वे कभी कुछ रिपोर्ट नहीं करते। जब अगुआ पूछते हैं, “तुमने फलाँ व्यक्ति के साथ बहुत समय बिताया है; उसका कर्तव्य-निर्वहन आम तौर पर कैसा होता है? क्या वह कठिनाई सहने और कीमत चुकाने में सक्षम है?” तो वे जवाब देते हैं, “अरे, मैं देखता हूँ कि वह सुबह बहुत जल्दी उठ जाता है और रात में बहुत देर से सोता है।” असल में वे बहुत पहले ही देख चुके होते हैं कि यह व्यक्ति अक्सर गैर-विश्वासी दुनिया के वीडियो देखता है और अपना कर्तव्य निभाने में कोई कीमत नहीं चुकाता, लेकिन वे सच नहीं बोलते; वे सभी के साथ हमेशा एक सतही सामंजस्य बनाए रखते हैं। बाहरी तौर पर उनका जन्मजात व्यक्तित्व ठीक लगता है और उनकी मानवता भी अच्छी लगती है, लेकिन अच्छी मानवता के इस दिखावे के पीछे क्या छिपा होता है? वे खुशामदी होते हैं; ऐसे खुशामदी लोग, जो किसी को नाराज नहीं करते, कभी किसी को नुकसान नहीं पहुँचाते, कभी दूसरों का फायदा नहीं उठाते और कभी दुश्मन नहीं बनाते। उनके आचरण का सिद्धांत क्या होता है? (किसी को नाराज न करना।) वे किसी को नाराज नहीं करते, किसी को नुकसान नहीं पहुँचाते और सिर्फ खुद को बचाना चाहते हैं। क्या यह धूर्त होना है? (हाँ।) यहाँ तक कि जब कोई यह कहते हुए ईमानदारी से उनके साथ संगति करता है, “हमने अपने कर्तव्य निभाते हुए एक-साथ सबसे ज्यादा समय बिताया है। कृपया मुझमें जो भी समस्याएँ तुम्हें दिखती हैं, मुझे बताओ। मैं उन्हें स्वीकारकर बदलने का वादा करता हूँ। कृपया इस संबंध में अभ्यास के सिद्धांतों के बारे में मेरे साथ संगति भी करो”—यहाँ तक कि जब दूसरा व्यक्ति इतना ईमानदार होता है, तब भी वे सच नहीं बताते। इसके बजाय वे झूठे मन से कहते हैं, “तुम मुझसे बहुत बेहतर हो। असल में तुम लोगों में से किसी को भी इसका एहसास नहीं है, लेकिन मैं वास्तव में कमजोर हूँ। मैं नकारात्मक हो जाता हूँ और मैं विद्रोही भी हूँ।” चाहे दूसरे उनसे कितनी भी ईमानदारी से पूछें, वे फिर भी कुछ नहीं कहेंगे। वे किसी को भी नाराज करने से बिल्कुल इनकार करते हैं और कभी एक भी सच्चा बयान नहीं देते। वे किसी से भी सच नहीं बोलेंगे, सब-कुछ अपने दिल में दबाए रखेंगे। इससे यह देखा जा सकता है कि ऐसा नहीं है कि उनके कोई विचार नहीं होते, क्योंकि वे रोबोट नहीं हैं और शून्य में नहीं रहते। अलग-अलग लोगों और मामलों के बारे में उनकी राय होती अवश्य है, लेकिन वे उसे कभी व्यक्त नहीं करते या किसी से साझा नहीं करते या किसी को बताते नहीं। वे हर चीज अपने तक ही रखते हैं, अंशतः इसलिए क्योंकि वे नहीं चाहते कि दूसरे उनकी असलियत जानें और अंशतः इसलिए क्योंकि वे किसी को नाराज नहीं करना चाहते। तो उनके आचरण का सिद्धांत क्या होता है? क्या उनका कोई सिद्धांत नहीं होता? (हाँ, नहीं होता।) उनका कोई सिद्धांत नहीं होता। वे कभी सत्य नहीं खोजते या सिद्धांतों को कायम नहीं रखते। वे सिर्फ अपना बचाव और सुरक्षा करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। जब तक उन्हें चोट नहीं पहुँचती, तब तक वे इस बात की परवाह नहीं करते कि परमेश्वर क्या अपेक्षा करता है। उनके आचरण में कोई सिद्धांत या सीमाएँ नहीं होतीं और वे किसी को नाराज नहीं करते—वे सिर्फ खुशामदी होते हैं। इसलिए दूसरों की नजर में वे अच्छे लोग भी माने जाते हैं, क्योंकि जो लोग उनसे मिलते-जुलते हैं, उन्हें अक्सर उनकी मदद मिलती है और जब भी दूसरे उनसे कुछ माँगते हैं तो वे कभी मना नहीं करते, जिससे लोगों को लगता है कि वे अच्छे इंसान हैं। लेकिन अगर तुम उनके आचरण के सिद्धांतों की बारीकी से जाँच करो तो तुम पाओगे कि उनके आचरण का कोई सिद्धांत नहीं है। जब भ्रष्ट स्वभावों से संबंधित समस्याओं की बात आती है तो क्या वे उन्हें हल करने के लिए सत्य खोजेंगे? क्या वे सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करेंगे? (नहीं।) उत्तर निश्चित रूप से नहीं है। ये लोग यह मानते हुए अपनी व्यक्तिपरक समझ पर अड़े रहते हैं कि उनमें अच्छी मानवता और दयालु हृदय है। उन्हें लगता है कि वे कभी दूसरों के प्रति दुर्भावना नहीं रखते, या कम से कम, दूसरों को सक्रिय रूप से नुकसान नहीं पहुँचाएँगे या उनके हितों को क्षतिग्रस्त नहीं करेंगे। जब भी दूसरे कोई अनुरोध करते हैं या उन्हें किसी चीज की दरकार होती है, तो वे हमेशा आशा के अनुकूल उत्तर देते हैं। अपनी समझ में, वे मानते हैं कि किसी को नाराज न करना या नुकसान न पहुँचाना उन्हें अच्छा इंसान बनाता है। किसी को दुश्मन न बनाकर वे सोचते हैं कि वे खुद को किसी खतरनाक स्थिति में नहीं डालेंगे और कोई उन्हें दुश्मन नहीं समझेगा। इस तरह वे चोट नहीं खाएँगे और सुरक्षित रहेंगे। वे जिस तरह आचरण करते हैं, उसमें उनका क्या लक्ष्य होता है? उनका एकमात्र उद्देश्य आत्म-सुरक्षा होता है; उनके लिए उस जगह रहना पर्याप्त है जिसे वे सबसे आरामदायक और सुरक्षित आश्रय और सुविधाजनक क्षेत्र मानते हैं। वे अपने आचरण या उसकी दिशा के सिद्धांत और सीमाएँ बदलने का कोई इरादा नहीं रखते और निश्चित रूप से उनका अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्याग देने का कोई इरादा नहीं होता। ये खुशामदी और परेशानी से बचने वाले लोग होते हैं। दूसरे लोग सत्य सिद्धांतों के बारे में या व्यक्ति के आचरण की सीमाओं और सिद्धांतों के बारे में चाहे कैसे भी संगति करें, ये अपने आचरण करने का तरीका नहीं बदलेंगे। तो क्या इन लोगों में अच्छी मानवता होती है? (नहीं।) क्या ये लोग सत्य स्वीकार सकते हैं या सिद्धांतों को बनाए रख सकते हैं? (नहीं।) वे सत्य सिद्धांतों को क्यों नहीं बनाए रख सकते? क्योंकि अपने दिमाग में आचरण करने का उनका मानक खुशामदी होना है। जब किसी ऐसे मामले की बात आती है जिसमें कोई राय रखने या कोई रुख अपनाने की जरूरत होती है तो वे चुप रहते हैं, उदासीन रवैया बनाए रखते हैं और दखल न देने का नजरिया अपनाते हैं, बेपरवाह और अलग रहते हैं मानो इसका उनसे कोई संबंध न हो। नतीजतन, उनके आचरण और क्रियाकलाप करने के तरीके में कोई धार नहीं होती; वे धूर्त लोग हैं। वे अपने आस-पास के लोगों और घटनाओं की परवाह नहीं करते। चाहे किसी परिवेश में या किसी व्यक्ति के साथ समस्याएँ कितनी भी महत्वपूर्ण हों, उन्हें उनकी परवाह करने, उनके बारे में पूछताछ करने या उनके बारे में जानने में कोई दिलचस्पी नहीं होती। वे मानते हैं कि जब तक वे इसमें शामिल नहीं हैं, तब तक चिंतित होने की कोई जरूरत नहीं। इसके लिए एक कहावत है, कैसी है यह? “श्रेय की लालसा नहीं, पर दोष से दूरी भली।” यह भी एक सिद्धांत है जिसके अनुसार खुशामदी लोग आचरण करते हैं। ऐसे लोगों के भ्रष्ट स्वभावों की क्या विशेषताएँ होती हैं? धोखेबाजी, दुष्टता, हठधर्मिता, सत्य स्वीकारने से इनकार करना—उनमें भ्रष्ट स्वभावों की लगभग सभी विशेषताएँ होती हैं। बाहरी तौर पर हो सकता है वे बुरा काम न करते हों और शायद ही कभी अपराध करते हों, लेकिन अगर तुम उन सिद्धांतों और तरीकों का निरीक्षण करो जिनसे वे आचरण करते हैं तो सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह होती है कि वे कभी सत्य सिद्धांतों को कायम नहीं रखते और जिस तरह वे आचरण करते हैं उसकी कोई सीमा नहीं होती। यहाँ तक कि जब कोई उनका अपमान करता है या उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाता है, तो वे इसे सहन कर हँसी में उड़ा सकते हैं, कभी अपने आंतरिक विचार प्रकट या अभिव्यक्त नहीं करते। बाहर से वे बहुत सहनशील, दयालु मानवता वाले लगते हैं और हमला करने या बदला लेने का कोई इरादा नहीं दिखाते। लेकिन, ऐसा नहीं है कि उनके कोई विचार नहीं होते—वे तुम्हारी करनी याद रखते हैं और सही समय पर सामने आकर अपनी रक्षा और बचाव करते हैं और तुम पर ऐसा पलटवार करते हैं जिस पर शायद तुम्हारा ध्यान भी न जाए। वे सत्य सिद्धांतों को कायम नहीं रखते; जिस तरह वे आचरण करते हैं, उसमें सिद्धांत और सीमाएँ सिर्फ अपने हितों, सुरक्षा और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए होती हैं। ऐसे लोगों को दुष्ट के रूप में वर्णित करना और हठधर्मी, धोखेबाज और सत्य से विमुख के रूप में वर्णित करना सही है। कुछ लोग कह सकते हैं, “उन्होंने दूसरों के हितों को नुकसान नहीं पहुँचाया है या कोई बुरा काम नहीं किया है, फिर तुम कैसे कह सकते हो कि उनमें भ्रष्ट स्वभाव हैं? तुम्हारे यह कहने का आधार क्या है?” जब यह बात आती है कि वे लोगों और चीजों को कैसे देखते हैं और कैसे आचरण और क्रियाकलाप करते हैं, तो यह उनके विचारों, दृष्टिकोणों और रवैयों पर आधारित होता है। क्या तुम लोगों ने इसे देखा है? (हम अब इसे देखते हैं।) तुम इसे पहले क्यों नहीं देख पाए? उनकी किस चीज ने तुम्हें गुमराह किया? (हमें लगा कि वे अपनी कथनी और करनी में, और जिस तरह वे दूसरों के साथ मिलते-जुलते और सहयोग करते हैं उसमें काफी मस्तमौला हैं और किसी को चोट नहीं पहुँचाते, इसलिए हमने मान लिया कि उनमें अच्छी मानवता है। हम उनके बाहरी मुखौटे से गुमराह हो गए।) बाहरी तौर पर एक सौम्य व्यक्तित्व होने और कभी लोगों पर हमला नहीं करने और जानवरों को चोट नहीं पहुँचाने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति में अच्छी मानवता है। मानवता के किस तरह के प्रकाशन असल में अच्छी मानवता दर्शाते हैं? (एक चीज है दूसरों को नुकसान न पहुँचाना या उनका फायदा न उठाना। इसके अलावा, खतरा पैदा होने पर अपनी सुरक्षा के बारे में न सोचकर व्यक्ति का पहला विचार अगुआओं और कार्यकर्ताओं और साथ ही सत्य का अनुसरण करने वाले भाई-बहनों की रक्षा करने का होना और हर स्थिति में परमेश्वर के घर के हितों को पहले रखने में सक्षम होना। ये सब अच्छी मानवता की अभिव्यक्तियाँ हैं।) दयालु, प्रेमपूर्ण, धैर्यवान और सहनशील होना, दूसरों के प्रति सम्मानपूर्ण होना, दूसरों का खयाल रखने के लिए तैयार रहना, लोगों का नाजायज फायदा न उठाना, अपेक्षाकृत ईमानदार होना और साथ ही विनम्र, शालीन होना और दबंग न होना : मानवता के ये गुण होना, साथ ही सत्य सिद्धांतों को बनाए रखने और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने की क्षमता भी होना—यह अच्छी मानवता है। अगर किसी में बाहरी तौर पर सहिष्णुता, धैर्य, दयालुता, दूसरों का फायदा न उठाना, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, दूसरों की देखभाल करना जैसे मानवता के गुण हैं, लेकिन परमेश्वर के घर के हितों की बात आने पर वह आसानी से उन्हें दूसरों को सौंप देता है, यहाँ तक कि सक्रिय रूप से उनके साथ गद्दारी भी करता है तो क्या उसमें अच्छी मानवता है? (नहीं।) इसका मतलब है कि उसकी मानवता अच्छी नहीं है। अच्छी मानवता कैसे मापी जाती है? न्यूनतम अपेक्षा क्या है? (कम से कम, परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने में सक्षम होना।) परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने में सक्षम होना; और फिर, इस आधार पर दूसरों के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग करने में सक्षम होना, दयालु और सहनशील होना, दूसरों का फायदा न उठाना, और धैर्यवान होने और दूसरों की कमजोरियों को समझने में सक्षम होना, दूसरों के प्रति संवेदनशील होना, प्रेमपूर्ण होना, दूसरों की मदद और समर्थन करने में सक्षम होना और जो लोग कमजोर हैं उनकी देखभाल करना आदि—ये सब अच्छी मानवता की विशेषताएँ हैं। इसके विपरीत, स्वार्थ, नीचता, लालच, दूसरों के साथ कठोर और अत्यधिक मतलबी होना, गपशप करना और लोगों पर अत्याचार करना पसंद करना, उच्छृंखल, आडंबरी, विशेष रूप से सतही, दुष्ट, लंपट, निर्लज्ज होना और शर्म की भावना न होना—ये किस तरह की अभिव्यक्तियाँ हैं? (ये बुरी मानवता की अभिव्यक्तियाँ हैं।) क्या ये अभिव्यक्तियाँ होने पर भी व्यक्ति परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा कर सकता है? (नहीं।) अच्छी मानवता की अभिव्यक्तियाँ होने के साथ-साथ परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने की क्षमता होना—यही वास्तव में अच्छी मानवता है।

उदाहरण 11 : दयालु दिखना लेकिन भेंटों की बरबादी करना

कुछ लोग बाहर से बहुत दयालु दिखाई देते हैं; वे दूसरों के साथ धैर्यवान और सहनशील होते हैं और उनमें अच्छी मानवता की तमाम विशेषताएँ होती हैं। लेकिन जब कलीसिया के कार्य, परमेश्वर के चढ़ावे या परमेश्वर के घर के हितों की बात आती है तो वे इन सबके साथ गद्दारी करने में सक्षम हैं। क्या तुम लोग कहोगे कि ऐसे व्यक्ति में अच्छी मानवता होती है? (नहीं।) उदाहरण के लिए, भाई-बहनों के लिए चीजें खरीदते समय कुछ लोग ऐसी चीजें चुनते हैं जिनकी गुणवत्ता अच्छी हो, कीमत कम हो और जो व्यावहारिक हों। लेकिन जब चीजें खरीदने के लिए चढ़ावे खर्च करने की बात आती है तो वे महँगी चीजें चुनते हैं। चाहे वह सिर्फ एक ट्रैक्टर ही हो, वे नेविगेशन वाला ट्रैक्टर तक खरीदना चाहेंगे। चाहे वे कुछ भी खरीद रहे हों, वे हमेशा किसी सस्ती चीज पर विचार करने से इनकार करते हुए सबसे अच्छे, सबसे महँगे और हाई-टेक विकल्प ही चुनते हैं। आम तौर पर वे दूसरों के साथ सामान्य रूप से मिल-जुलकर रहते दिखते हैं; वे लोगों का फायदा नहीं उठाते, काफी सहनशील होते हैं और हर तरह से दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं। लेकिन जब चढ़ावे खर्च करने की बात आती है तो उनका निर्दयी पक्ष उभर आता है और उनका भयावह चेहरा सामने आ जाता है। क्या उन्हें अच्छी मानवता वाला माना जा सकता है? (नहीं।) क्या उनकी अच्छी मानवता वास्तव में सच्ची होती है? यह सिर्फ दिखावा और ढोंग है, यह सब मुखौटा है। जब वास्तव में परमेश्वर के घर के हितों से जुड़े मामलों की बात आती है, खासकर जब चढ़ावे खर्च करने की बात आती है तो उनका लालच उभर आता है और उनका भयावह चेहरा, शैतानी मुख और क्रूर चाल-ढाल प्रकट हो जाती है। क्या यह अच्छी मानवता है? (नहीं।) उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति वचन देह में प्रकट होता है के कॉपीराइट के लिए आवेदन करता है और कहता है : “अगर हम एक संगठन के रूप में कलीसिया के नाम से आवेदन करते हैं तो इससे बहुत सारा पैसा बचेगा। लेकिन अगर हम देहधारी मसीह के नाम से आवेदन करते हैं तो इसमें बहुत ज्यादा खर्च होगा। हमें इस पर पैसे बचाने चाहिए; चढ़ावे लापरवाही से खर्च नहीं किए जाने चाहिए!” क्या यह कथन सही है? क्या उनके पास ऐसा महत्वपूर्ण मामला सँभालने के लिए सिद्धांत हैं? आखिर ये शब्द किसके द्वारा व्यक्त किए गए थे, परमेश्वर द्वारा या कलीसिया द्वारा? (ये परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए थे।) तो कॉपीराइट किसका होना चाहिए? वह परमेश्वर का होना ज्यादा उचित है या कलीसिया का? (यह परमेश्वर का होना ज्यादा उचित है।) यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। ऐसे महत्वपूर्ण मामले में पैसे बचाने पर ध्यान केंद्रित करने के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं? क्या समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं? दुष्परिणाम अकल्पनीय हो सकते हैं! अगर तुम परमेश्वर के घर के हितों की उपेक्षा करते हो और सिर्फ पैसे बचाने पर विचार करते हो तो यह तुम्हें किस तरह का व्यक्ति बनाता है? क्या ऐसे लोगों में जमीर या मानवता होती है? (उनमें कोई मानवता नहीं होती।) चाहे ऐसे लोग बाहर से कितने भी दयालु या सहनशील दिखें, क्या उनमें वास्तव में मानवता होती है? (नहीं।) कलीसिया में भोजन, पेय और दैनिक जरूरतों के तमाम खर्च पूरी तरह से परमेश्वर के चढ़ावों से पूरे होते हैं। क्या मैंने कभी इन खर्चों के बारे में तुम लोगों के साथ क्षुद्रता बरती है? एकमात्र अपेक्षा यह है कि तुम लोग बर्बादी करने से बचो, लेकिन क्या मैंने कभी तुम लोगों के सामान्य खर्चों की जाँच की है? (नहीं।) सभी पहलुओं में मैं तुम लोगों का ध्यान रखता रहा हूँ और मैंने कभी तुम्हारे खर्चों की जाँच नहीं की, फिर भी तुम लोग उलटकर मेरे साथ हिसाब-किताब करने लगते हो। क्या यह मानवता की कमी नहीं है? (हाँ, है।) मानवता से रहित कोई व्यक्ति लोगों के प्रति चाहे कितना भी दयालु या सहनशील दिखे, यह सिर्फ मुखौटा होता है। जब वास्तव में ऐसे क्षण आते हैं जब जमीर और विवेक काम में आने चाहिए, तो वे पूरी तरह से मानवता से रहित के रूप में प्रकट होते हैं। क्या वे इंसान भी होते हैं? (नहीं।) उन्हें इंसान नहीं कहा जा सकता। जब मैं खरीदारी करता हूँ तो मैं भी सावधानीपूर्वक और मितव्ययिता से खरीदारी करता हूँ, यह विचार करते हुए कि कब वस्तुओं पर छूट मिलती है और उन्हें खरीदने के उपयुक्त तरीके क्या हैं, और अगर कोई चीज व्यावहारिक, उपयुक्त और उचित मूल्य की होती है तो मैं उसे खरीदता हूँ। लेकिन मैं लापरवाही से खरीदारी नहीं करता, मैं बेकार की चीजों पर पैसे खर्च नहीं करता। लेकिन कुछ ऐसे खर्च होते हैं जिन्हें टाला नहीं जा सकता और जिन्हें करना ही चाहिए, और उन मामलों में मैं सिद्धांतों के अनुसार खर्च करता हूँ। मैं अपने भोजन, कपड़े और दैनिक जरूरतों के मामले में भी मितव्ययिता बरतने की कोशिश करता हूँ। ऐसा नहीं है कि मैं अपनी पसंद की कोई भी चीज खरीद लेता हूँ; मुझे अपनी खरीददारियों पर ध्यानपूर्वक विचार करना पड़ता है। देखो, मैं सादे, उचित और गरिमापूर्ण तरीके से कपड़े पहनता हूँ। मेरा खर्च सिद्धांतों के अनुसार होता है : मैं वही खरीदता हूँ जो आवश्यक और व्यावहारिक होता है और जो ऐसा नहीं होता मैं उसे नहीं खरीदता। पैसों की बरबादी या अपव्यय मत करो; वह पैसा खर्च मत करो जो खर्च नहीं किया जाना चाहिए; जहाँ बचत करनी चाहिए वहाँ बचत करो और अनावश्यक खर्चों से बचो—ये सिद्धांत हैं। लेकिन जब मानवता से रहित कुछ लोग परमेश्वर के चढ़ावे खर्च करने का अवसर पाते हैं तो उनकी आँखें चौड़ी हो जाती हैं। जब तक इसमें लोगों के भोजन, कपड़े, आवास या परिवहन पर खर्च करना शामिल होता है, वे कार्रवाई करने के लिए दौड़ पड़ते हैं। खासकर जब दूसरों के लिए कपड़े खरीदने या जीवन-यापन के खर्चे बाँटने की बात आती है तो वे अति उत्साही और बहुत उदार हो जाते हैं। अपने दिल में वे सोचते हैं, “अरे, यह मेरा पैसा खर्च नहीं हो रहा। यह परमेश्वर का पैसा खर्च हो रहा है और इससे मुझे अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने में मदद मिलती है तो खर्च क्यों न करूँ?” इसलिए वे इस अवसर का लाभ उठाकर फिजूलखर्ची करते हैं। उनके दिल में बुरे इरादे होते हैं, वे परमेश्वर के घर को नुकसान पहुँचाने के अलावा कुछ नहीं चाहते! लेकिन अगर यह उनका पैसा होता तो वे हर चीज का हिसाब लगाते, जरूरत से ज्यादा एक पैसा भी खर्च करने से इनकार कर देते। चाहे वे आम तौर पर कितने भी दयालु दिखें, ऐसे लोगों में अच्छी मानवता नहीं होती। मेरे विचार से, परमेश्वर के चढ़ावों के प्रति उनका रवैया बहुत-कुछ कहता है। यह तथ्य कि वे चढ़ावों की बरबादी कर सकते हैं और उनमें परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय बिल्कुल नहीं होता, कम से कम यह दिखाता है कि वे दयालु नहीं हैं, वे नीच हैं और उनमें खराब मानवता है। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ, ऐसा है।)

व्यक्ति की जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों से संबंधित कई अभिव्यक्तियाँ होती हैं। हमने आज उनके एक हिस्से पर सरसरी तौर पर चर्चा की है; अन्य अभिव्यक्तियाँ होने की भी संभावना है, जिन्हें हम भावी संगतियों में शामिल कर सकते हैं। आओ, आज अपनी संगति यहीं समाप्त करें। अलविदा!

23 सितंबर 2023

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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