सत्य का अनुसरण कैसे करें (5) भाग तीन
चीजों को करने में जोरदार तरीके से शुरुआत करना लेकिन कमजोर तरीके से समाप्त करना
चीजों को जोरदार तरीके से शुरू करना लेकिन कमजोर तरीके से समाप्त करना—यह किस तरह के मुद्दे के तहत आता है? (व्यक्ति की मानवता का दोष है।) यह व्यक्ति की मानवता का दोष है। कुछ लोग किसी उपक्रम को शुरू करते समय उसके लिए अच्छी तरह से योजना बनाते हैं, कुछ बड़े कदम उठाते हैं, लोगों को इकट्ठा करते हैं, रिपोर्ट बनाते हैं, काम सौंपते हैं और यहाँ तक कि संकल्प के बड़े-बड़े बयान भी देते हैं, लेकिन जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते हैं, यह सब कुछ लुप्त हो जाता है और वे इस बारे में अनुवर्ती कार्रवाई, पर्यवेक्षण या निरीक्षण नहीं करते हैं कि क्या चल रहा है। अगर सत्य समझने वाला कोई व्यक्ति पर्यवेक्षण और मार्गदर्शन देने के लिए न हो तो उपक्रम धीरे-धीरे पूरी तरह से ठप हो सकता है या यहाँ तक कि अनचाहे नतीजे भी उत्पन्न हो सकते हैं जिससे कार्य पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो सकता है। ऐसे भी कुछ लोग हैं जो धर्म-सिद्धांतों को बहुत सुबोध और स्पष्ट रूप से बता सकते हैं, लेकिन जब वास्तव में चीजें करने की बात आती है तब उन्हें पता नहीं होता है कि आगे कैसे बढ़ना है और न ही उनके पास कोई ठोस योजना होती है। जब विशेष हालात या अप्रत्याशित स्थितियाँ प्रकट होती हैं तब उन्हें पता नहीं होता है कि उन्हें कैसे सँभालना है, वे न तो दूसरों के साथ संगति करते हैं और न ही अपने से ऊपर के लोगों से मदद माँगते हैं या सलाह लेते हैं। जब वे कोई चीज करना शुरू करते हैं तब वे आत्मविश्वासी लगते हैं, और ऐसी शानदार शुरुआत करते हैं मानो वे कोई महत्वपूर्ण चीज पूरी करने वाले हों, लेकिन जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते हैं, वे उत्साह खो देते हैं और भाग खड़े होते हैं—वे ऐसे गायब हो जाते हैं मानो गधे के सिर से सींग। जब कोई उनसे पूछता है, “अब तुम किस पर कार्य कर रहे हो? वह काम कैसा चल रहा है?” तब वे उत्तर देते हैं, “वह पूरा नहीं होने वाला है।” फिर भी वे समय पर यह रिपोर्ट करने में विफल रहते हैं कि वे चीजें पूरा नहीं करवा सकते हैं, इससे चीजें बिना किसी नतीजे के दो-तीन महीनों के लिए रुक जाती हैं। क्या यह गुस्सा दिलाने वाली बात नहीं है? (हाँ, है।) ऐसे लोग सच में घिनौने होते हैं! इस तरह के लोगों की चीजों को जोरदार तरीके से शुरू करना लेकिन कमजोर तरीके से समाप्त करने के अलावा एक और समस्या होती है : वे जो कुछ भी करते हैं उसे जितना ज्यादा करते हैं वह उत्तरोत्तर उतना ही ज्यादा अव्यवस्थित होता जाता है। हो सकता है कि शुरू में उनके पास कुछ दिमागी रूपरेखा, कुछ विचार और थोड़ी संरचना होती हो, लेकिन जैसे-जैसे वे जारी रखते हैं, उनके विचार उलझते जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि उन्होंने काम क्यों शुरू किया था या उन्हें क्या नतीजे हासिल करने थे। जब कोई उन्हें कुछ तलाश करने की सलाह देता है तब वे कहते हैं, “कुछ भी तलाश करने की जरूरत नहीं है। चलो, इसे इसी तरीके से करते रहें—बहरहाल, कोई भी बेकार नहीं बैठा है।” देखो, ये लोग बिजली की गड़गड़ाहट की तरह तेज रफ्तार से चीजें करना शुरू करते हैं। लेकिन जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते हैं, चीजें धीरे-धीरे मंद पड़कर पूरी बंद हो जाती हैं। यह सब बस गड़गड़ाहट है, बारिश बिल्कुल नहीं—कोई नतीजा नहीं निकलता है। अगर तुम काम के बारे में नहीं पूछते हो, उस पर अनुवर्ती कार्रवाई नहीं करते हो या उसका निरीक्षण नहीं करते हो तो वे इसे पूरा हुए बिना ही धीरे-धीरे ठप हो जाने देंगे, इसकी एक रिपोर्ट तक नहीं देंगे। शुरुआत में उन्होंने जो संकल्प व्यक्त किया था, वह कहाँ चला गया? उसे भुला दिया गया है। उन्होंने जो शुरुआती योजना लिखी थी, उसका क्या हुआ? उसका तो कोई नामोनिशान भी नहीं बचा है। और उन विचारों का क्या हुआ जो शुरू में उनके पास थे? वे नदारद हो गए हैं; उन्हें भुला दिया गया है। वे बस इसी किस्म के प्राणी हैं! जब तुम इस प्रकार के व्यक्ति का शुरुआती उत्साह देखते हो तब वह तुम्हें वास्तविक कर्मठ व्यक्ति लगता है। लेकिन असल में वह सरासर निकम्मा है; वह चीजों को व्यावहारिक ढंग से करने वाला व्यक्ति है ही नहीं; वह टिककर काम करने वाला व्यक्ति नहीं है। वह सिर्फ सुर्खियाँ बटोरने का इच्छुक है, लेकिन वह कष्ट नहीं सहना चाहता और जिम्मेदारी लेने से डरता है। वह जो कुछ भी करता है, वह अधूरा रह जाता है। ऐसे लोगों में किस तरह की मानवता होती है? (खराब मानवता।) मुझे बताओ, क्या इस तरह का व्यक्ति कुछ पूरा कर सकता है? (नहीं।) वह हमेशा जोरदार शुरुआत करता है, लेकिन अंत में कमजोर पड़ जाता है, और पूरी गड़बड़ के साथ समाप्त करता है—यही उसकी शैली है। चाहे वह कोई भी कर्तव्य कर रहा हो, वह काफी उत्साहपूर्वक, संगीत सुनते हुए और गुनगुनाते हुए शुरुआत करता है। लेकिन कुछ समय बाद वह दिलचस्पी खो देता है और बस कार्य को रोक देता है और छोड़कर चला जाता है। वह किस किस्म का प्राणी है? क्या ऐसे लोग घिनौने नहीं होते हैं? (हाँ।) वे बेतहाशा ऐसे काम हाथ में लेते हैं जिनके बारे में वे जानते हैं कि शायद वे उन्हें पूरा करने में सक्षम न हों, वे अपनी योग्यता प्रदर्शित करने, शेखी बघारने और बड़े-बड़े दावे करने का प्रयास करते हैं—क्या उन्हें अपनी क्षमताएँ नहीं पता हैं? अगर वे काम नहीं कर सकते या नतीजे नहीं दे सकते तो वे सीधे-सीधे क्यों नहीं कह देते? उन्हें चीजों में देरी नहीं करनी चाहिए! इसके बजाय वे चुप रहते हैं, तुम्हें धोखा देने का प्रयास करते हुए तुम्हारे कार्य को रोककर रखते हैं। क्या वे नीच चरित्र वाले नहीं हैं? (हाँ।) उनका चरित्र बहुत ही ज्यादा नीच है! क्या ऐसे लोगों को चीजें सँभालने का काम सौंपा जा सकता है? (नहीं।) क्या वे भरोसे के लायक हैं? (नहीं।) ऐसे लोग गैर-भरोसेमंद होते हैं। अगर वे तुम्हें जबान दें तो क्या तुम उन पर विश्वास करने की हिम्मत करोगे? (नहीं।) ये किस तरह के लोग हैं? क्या वे धोखेबाज नहीं हैं? (हाँ।) वैसे तो वे तुम्हें आर्थिक फायदे या यौन प्रयोजनों के लिए धोखा नहीं देते हैं, लेकिन उनका आचरण करने और चीजों को सँभालने का तरीका बहुत ही घिनौना और घृणास्पद होता है। तो इन लोगों के इतने घृणास्पद होने का मूल कारण क्या है? वे नीच चरित्र के होते हैं, अपने आचरण में अपनी जगह पर नहीं रहते हैं, डींगें हाँकना पसंद करते हैं, उस योग्यता का प्रदर्शन करना पसंद करते हैं जो उन्हें लगता है कि उनमें है, सुर्खियाँ बटोरना पसंद करते हैं और अपना दिखावा करना पसंद करते हैं। वे जो भी करते हैं उस पर कभी बने नहीं रहते हैं। साथ ही, वे खुद को ज्यादा आँकते हैं और अपने आध्यात्मिक कद और इस बात से बेखबर होते हैं कि वे किस तरह के काम सँभाल सकते हैं। फिर भी वे अपनी योग्यता प्रदर्शित करने का प्रयास करते हैं और बेधड़क कोई भी महत्वपूर्ण कार्य हाथ में ले लेते हैं। कार्य लेने के बाद भले ही वे उसे अच्छी तरह से न करें और बड़े मामलों में देरी करें, तो भी वे उदासीन रहते हैं; जब तक वे सुर्खियों में रहते हैं तब तक उनके लिए सब कुछ ठीक है। क्या वे घटिया, नीच लोग नहीं हैं? (हाँ।) तो फिर क्या इन लोगों में बहुत ही खराब मानवता नहीं होती है? (हाँ।) अगर तुम लोगों का सामना ऐसे व्यक्ति से होता है तो क्या तुम उसे बड़ी या महत्वपूर्ण चीजें सौंपने का साहस करोगे? (नहीं।) उदाहरण के लिए, अगर तुम्हें सुसमाचार का प्रचार करने के लिए बाहर जाना पड़ता है और तुम्हें अपने छोटे बच्चे का ध्यान रखने के लिए किसी की जरूरत है तो तुम्हें मदद करने के लिए किस तरह का व्यक्ति ढूँढ़ना चाहिए? क्या तुम ऐसे किसी व्यक्ति को चुनने की हिम्मत करोगे जिसे जिम्मेदारी का कोई बोध नहीं है, जो काम पूरा होने तक डटा नहीं रह सकता है और जो गैर-भरोसेमंद है? (नहीं।) क्यों नहीं? क्योंकि हो सकता है कि वह तुम्हारा बच्चा खो दे। अगर तुम उससे पूछते हो कि तुम्हारा बच्चा कैसे खो गया तो वह कहेगा, “मुझे नहीं पता। मुझे तो बस एक पल के लिए झपकी आ गई थी और बच्चा कहीं चला गया। तुम इसके लिए मुझे दोषी कैसे ठहरा सकते हो? बच्चे के पैर हैं और वह खुद चल-फिर सकता है—वह मुझसे बँधा हुआ तो नहीं था। तुम मुझे दोष नहीं दे सकते!” यहाँ तक कि वह जवाबदेही से भी जी चुराता है! क्या यह कोई बेशर्म बदमाश नहीं है? (हाँ।) जीवन-मरण के मामले ऐसे लोगों को बिल्कुल भी नहीं सौंपे जा सकते हैं। वे अपने आचरण से टिककर काम नहीं करते हैं और उनमें कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं होती है। जब समस्याएँ आती हैं तब उनमें बेशर्मी का सहारा लेने और चीजों को नकारने की धृष्टता होती है। वैसे तो चीजों को जोरदार तरीके से शुरू करना लेकिन कमजोर तरीके से समाप्त करना मानवता का सिर्फ एक दोष है, लेकिन यह विशेष दोष एक अत्यंत गंभीर मुद्दा है—यह सत्यनिष्ठा का मुद्दा है। कुछ लोग सुर्खियाँ बटोरना पसंद करते हैं और कामों को तत्परता से हाथ में ले लेते हैं, लेकिन वे जवाबदेही लेने की हिम्मत नहीं करते हैं। जैसे ही उनके सामने मुश्किलें आती हैं, वे तुरंत जवाबदेही से बच निकलते हैं और स्थिति से अपनी दूरी बना लेते हैं। वे पूरी तरह से गैर-जिम्मेदार होते हैं। वे विशेष रूप से टिककर काम करने वाले व्यक्ति भी नहीं होते हैं और जो भी करते हैं उस पर बने नहीं रह सकते हैं। जब हालात इस कदर बुरे हो जाते हैं तब यह मानवता का सिर्फ एक दोष नहीं रह जाता है—यह वास्तव में नीच चरित्र और खराब मानवता होने का मामला है। मैं क्यों कहता हूँ कि ऐसे लोगों की मानवता खराब होती है? वह इसलिए क्योंकि वे गैर-भरोसेमंद होते हैं—तुम उन्हें कोई भी चीज सौंपने की हिम्मत नहीं करोगे। तुम चाहे उन्हें कोई भी काम सौंप दो, वे आसानी से मान जाते हैं, लेकिन जैसे ही तुम पीछे मुड़ते हो, वे गायब हो जाते हैं और तुम्हें बिल्कुल नहीं पता होता कि वे क्या गुल खिला रहे हैं। हो सकता है कि कई दिन बीत जाने के बाद ही वे तुम्हें फिर से दिखाई दें। अगर तुम उनसे यह नहीं पूछते हो कि काम कैसे प्रगति कर रहा है तो वे तुम्हें वापस कोई रिपोर्ट नहीं देंगे, मानो कुछ हुआ ही न हो। वे किस किस्म के प्राणी हैं? वे सरासर गैर-जिम्मेदार लोग हैं! वे परीक्षा में भी असफल हो जाते हैं और ऐसी किसी छोटी-मोटी बात के लिए भी उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। तुम्हें क्या लगता है कि वे संभवतः और क्या पूरा कर सकते हैं? (कुछ भी नहीं।) अगर तुम उन्हें किसी बच्चे का ध्यान रखने का काम सौंपते हो तो समस्याएँ किसी भी पल खड़ी हो सकती हैं। हो सकता है कि बच्चा गिर जाए और उसे चोट लग जाए, वह कुछ ऐसा खा ले जो उसे नहीं खाना चाहिए या हो सकता है कि बाहर खेलने जाते समय वह भटक जाए या बुरे लोग उसका अपहरण कर लें—ये सभी संभावित परिणाम हैं। क्योंकि वे गैर-जिम्मेदार और अत्यंत नीच चरित्र के होते हैं और वे जो भी करते हैं उसमें जमीर की किसी सीमा का पालन नहीं करते हैं और सिर्फ अपनी स्वार्थी इच्छाएँ पूरी करने के लिए कार्य करते हैं और बाकी सब कुछ अनदेखा कर देते हैं। जब तुम उन्हें कोई काम सौंपते हो तब उन्हें लगता है कि मना करने से तुम्हें शर्मिंदा होना पड़ सकता है; अपने अभिमान को ध्यान में रखते हुए और अपनी शान की संतुष्टि के लिए वे मान तो जाते हैं, लेकिन बाद में वे किसी भी तरह की कोई जवाबदेही नहीं लेते हैं। वे डींगें हाँकते हैं जबकि काम अच्छी तरह से पूरा करने में विफल हो जाते हैं। गैर-भरोसेमंद होने का यही मतलब है। क्या ऐसे लोग अच्छे होते हैं? (नहीं।) क्या ऐसे लोग जो चीजों को जोरदार तरीके से शुरू करते हैं लेकिन कमजोर तरीके से समाप्त करते हैं, अगुआ के रूप में चुने जा सकते हैं? (नहीं।) क्यों नहीं? (क्योंकि वे परमेश्वर के घर के कार्य को नुकसान पहुँचा सकते हैं।) बिल्कुल। जब वे बोलते हैं और वादे करते हैं तब ऐसा लगता है कि उनमें वह सब कुछ करने का दम है और लोग उन लोगों पर भरोसा करने को तैयार होते हैं जो डींगें हाँक सकते हैं। लेकिन जब वास्तव में चीजें करने की बात आती है तब उनके क्रियाकलापों का कोई निश्चित पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता। अगर वे गड़बड़ कर देते हैं तो भी वे तुम्हें इसकी सूचना नहीं देंगे; और अगर कोई समस्या खड़ी हो जाती है तो वे तुम्हें इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं देंगे कि क्या हुआ। तुम बेसब्री से उम्मीद करते हो कि वे चीजें अच्छी तरह से सँभाल लेंगे, लेकिन वे अंत में इसे गड़बड़ कर देते हैं और इस बारे में पूरी तरह से उदासीन भी होते हैं, और तुमने उन्हें जो काम सौंपा था उसे गंभीर मामले के रूप में बिल्कुल नहीं लेते हैं। अपने क्रियाकलापों में उनका टिककर काम न करने के प्रति झुकाव रहता है। उनमें से कुछ लोग तो पूरी तरह से अपनी रुचि, शौक और जिज्ञासा के आधार पर कार्य करते हैं; उनमें से कुछ लोग ध्यान आकर्षित करना पसंद करते हैं और सिर्फ ध्यान आकर्षित करने और दिखाई देने के लिए ही चीजें करते हैं। ऐसे लोग अधीर और गैर-जिम्मेदार होते हैं और वे व्यावहारिक ढंग से चीजें करने में अक्षम होते हैं। यह काफी परेशान करने वाली बात है। इसमें अभी तक इस बात का जिक्र नहीं किया है कि क्या उनमें आध्यात्मिक समझ है, क्या वे सत्य स्वीकार सकते हैं, क्या वे आज्ञाकारी होते हैं या क्या वे सत्य का अनुसरण करने वाले लोग होते हैं—इसमें अभी तक इन पहलुओं का जिक्र नहीं किया है। पूरी तरह से उनकी मानवता के लिहाज से ऐसे लोग गैर-भरोसेमंद होते हैं। क्या ऐसे लोगों को अगुआओं के रूप में चुना जा सकता है? (नहीं।) जिन लोगों की मानवता मानक स्तर की नहीं है वे विकास तक के लिए योग्य नहीं हैं। क्यों नहीं? क्योंकि उनका चरित्र बहुत ही ज्यादा निम्न होता है—उनमें मूलभूत सत्यनिष्ठा और गरिमा तक की कमी होती है। इसलिए वे न तो अगुआ बनने के योग्य होते हैं और न ही अगुआ के रूप में विकसित किए जाने के योग्य होते हैं।
चीजें करने में सतर्कता बरतना
चलो, अब हम चीजें करने में सतर्क रहने पर चर्चा करें। यह किस तरह की अभिव्यक्ति है? (यह मानवता का गुण है।) चीजें करने में सतर्क रहना, अविचारी नहीं होना और जब मामले उत्पन्न हों तब उनसे शांति से पेश आना और सत्य की तलाश करना—यह मानवता का गुण है। इस बुरे समाज में जटिल पृष्ठभूमि वाले लोगों के विभिन्न समूहों के बीच तुम्हें विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों के आविर्भाव के प्रति सतर्क रहने की जरूरत है। यहाँ तक कि जब तुम परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य कर रहे होते हो तब भी तुम्हारे सामने आने वाली विभिन्न चीजों के बीच कुछ जटिल परिस्थितियाँ होती हैं और तुम्हें उनसे सतर्कता से पेश आना चाहिए। उदाहरण के लिए, अपना कर्तव्य करते समय जब तुम्हारा सामना विघ्न डालने वाले कुकर्मियों से होता है तब तुम्हें सबसे पहले भेद पहचानना सीखना चाहिए और फिर सत्य सिद्धांतों के अनुसार स्थिति से पेश आना चाहिए। अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हें यही रवैया रखना चाहिए। चीजें करने में सतर्क रहने में क्या शामिल है? इसमें व्यक्ति का विवेक शामिल है। जब तुम्हारे सामने ऐसे मामले आते हैं जिनकी तुम असलियत नहीं देख सकते हो तब तुम्हें सतर्क रहने की जरूरत है। अगर तुम कुछ सत्य समझते भी हो तो भी जब तुम कुछ विशेष मामलों का अंतर्निहित सार और मूल कारण नहीं समझ सकते हो तब क्या तुम्हें सतर्क रहने की जरूरत है? (हाँ।) ऐसी स्थितियों में तो तुमसे सतर्क रहने की और भी ज्यादा अपेक्षा की जाती है। सतर्क रहना रूढ़िवादी होना या छोटे कदम उठाना नहीं है और न ही यह कार्य करने की हिम्मत नहीं करना या जिम्मेदारी लेने से डरना है—इसका मतलब ये चीजें नहीं हैं। यहाँ जिस सतर्कता की बात की गई है, उसका मतलब मानवता का एक गुण है। सतर्कता की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? यह तब है जब कोई चीज करते समय तुम पहले सत्य सिद्धांतों की तलाश करते हो और फिर उस काम या उस कार्य के लिए अभ्यास के विशिष्ट चरणों, अभ्यास के विशिष्ट मार्ग और इच्छित परिणामों की तलाश करते हो। यानी तुम एक सावधान और सतर्क दिल के साथ महत्वपूर्ण मामलों और अपने खुद के कर्तव्य से पेश आते हो। यकीनन कुछ लोग तब भी विशेष रूप से सतर्क रहते हैं जब वे उन विभिन्न मुद्दों से पेश आते हैं जो उनके दैनिक जीवन में उनके सामने आते हैं; वे लापरवाह नहीं बल्कि बेहद सतर्क हैं। यह कोई बुरी चीज नहीं है; इसे मानवता का गुण भी कहा जा सकता है, उसकी त्रुटि नहीं। सतर्कता को मानवता का गुण कहा जा सकता है; सतर्क रवैया रखने से लोगों को सिर्फ लाभ ही होता है और इससे लोग बिल्कुल किसी भी तरीके से न तो बाधित होंगे और न बँधेंगे। अगर किसी मामले के उत्पन्न होने पर तुम बोलने की हिम्मत नहीं करते हो, अगर तुम कुछ भी करने या किसी से मेलजोल रखने की हिम्मत नहीं करते हो—अगर तुम्हें किसी गिरते हुए पत्ते के तुम्हारे सिर से टकरा जाने का डर है—तो यह अत्यधिक सतर्कता है। हर समय अपनी ही छोटी-सी दुनिया में रहना, अपने दिन बहुत ही ज्यादा चौकस ढंग से गुजारना—क्या यही सतर्कता है? (नहीं।) इस बात से डरना कि अगर तुम खरीदारी करने गए तो तुम्हें ठग लिया जाएगा, इस बात से डरना कि अगर तुमने कोई दुकान खोली तो तुम पैसे गँवा बैठोगे, इस बात से डरना कि अगर तुमने घर खरीदा तो वह कलंकित संपत्ति निकल आएगी, इस बात से डरना कि अगर तुमने कंप्यूटर खरीदा तो उसमें वायरस होंगे—अत्यधिक भय से इतना ज्यादा बँधे रहना कि तुम कुछ भी करने की हिम्मत न करो और तुम्हें एक कदम उठाना भी मुश्किल लगे—ये निश्चित रूप से उस तरह की सतर्कता की अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं जिसकी हम यहाँ बात कर रहे हैं। ये अभिव्यक्तियाँ बताती हैं कि व्यक्ति जाहिल, निकम्मा, दब्बू, अपरिपक्व और स्वतंत्र रूप से जीने की क्षमता से रहित है। ये खराब काबिलियत की अभिव्यक्तियाँ हैं। यानी जब ऐसे व्यक्तियों का सामना इस बुरे समाज और लोगों के जटिल समूहों से होता है तब उनके पास किसी भी तरह का कोई भी जवाबी उपाय नहीं होता है। वे हमेशा चिंतित, भयभीत और इतने डरे-डरे रहते हैं कि सहमकर पीछे हट जाते हैं और आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं करते हैं। या तो उन्हें ठगे जाने और धोखा दिए जाने का डर होता है या उन्हें नुकसान पहुँचाए जाने या कत्ल किए जाने का डर होता है। वे किसी से मेलजोल रखने या कोई भी मामला सँभालने की हिम्मत नहीं करते हैं। जब वे कार्य करने जाते हैं तब उन्हें डर रहता है कि उन्हें उनकी मजदूरी का भुगतान नहीं किया जाएगा। कुछ महिलाएँ बुरा सलूक किए जाने के डर से नौकरी करने तक की हिम्मत नहीं करती हैं। कुछ लोग तो घर से बाहर निकलने तक की हिम्मत नहीं करते हैं, वे डरते हैं कि उनका सामना बुरे लोगों से हो जाएगा और वे डरते हैं कि अगर वे चीजें खरीदेंगे तो वे उनसे लूट ली जाएँगी। संक्षेप में, वे हर चीज से डरते हैं। क्या यह अत्यधिक सतर्क होना नहीं है? यह अत्यधिक चौकस होना है। क्या वे पागल नहीं हैं? कुछ लोगों की इस तरह की मानसिकता होती है, वे दिन भर किसी न किसी बात की चिंता करते रहते हैं और नतीजा यह होता है कि वे कोई भी मामला सँभालने या लोगों से मिलने के लिए बाहर जाने की हिम्मत नहीं करते हैं और वे सिर्फ घर पर ही रह सकते हैं। वे किस तरह के व्यक्ति हैं? (पागल हैं।) वे पागल हैं; वे असामान्य हैं, वे गैर-मनुष्य हैं। आकलन करने की क्षमता की कमी होना, वे जो भी करते हैं उसमें कोई सिद्धांत या न्यूनतम मानक नहीं रखना, इस तरह के लोग पुनर्जन्म लिए हुए जानवर हैं, उनमें सामान्य मानवता नहीं होती है और उनका अत्यधिक चौकस रहना सतर्कता नहीं है। सतर्कता का क्या मतलब है? सतर्कता का मतलब है चीजों को नपे-तुले, व्यवस्थित और नियमों का पालन करने वाले ढंग से करना और इसी सिद्धांत के आधार पर काफी सख्ती से कार्य करना और जब चीजें हों तब शांत रहना, जल्दबाज, बेतहाशा या आवेगशील न होना और सत्य सिद्धांतों की तलाश करने और बुद्धिमानी भरे तरीके तलाश करने में समर्थ होना। इसे ही सतर्कता कहते हैं और सिर्फ यही सतर्कता मानवता का गुण है।
डींगें हाँकना और शेखी बघारना पसंद करना
डींगें हाँकना और शेखी बघारना पसंद करना—ऐसे लोग बहुत हैं। यह भी बुरे समाज का चलन है। बहुत-से लोग बढ़ा-चढ़ाकर बोलते हैं, बिना सोचे-समझे मनगढ़ंत बातें बनाते हैं और लगातार ऊँची आवाज में बेसिरपैर की बातें करते रहते हैं। वे जो कहते हैं वह तथ्यों के बिल्कुल अनुरूप नहीं होता है और वे बहुत ज्यादा हवा-हवाई बातें करते हैं। वे अभी भी खुद को सक्षम मानते हैं, उनमें सत्यनिष्ठा और शर्म की कोई भावना नहीं होती है। क्या ऐसे लोग भरोसे के लायक हैं? (नहीं।) क्या ऐसे लोगों में सत्यनिष्ठा या गरिमा होती है? (नहीं।) ऐसे लोगों में सत्यनिष्ठा और गरिमा नहीं होती है, वे सम्मान के लायक नहीं होते हैं और भरोसेमंद नहीं होते हैं। तो फिर क्या उन्हें महत्वपूर्ण मामलों को सँभालने का काम सौंपा जा सकता है? (नहीं।) तो शेखी बघारना पसंद करना किस तरह की समस्या है? (यह व्यक्ति की मानवता का दोष है।) यह मानवता का दोष है, लेकिन तुम्हें इस व्यक्ति की मानवता को भी देखना होगा—क्या उसकी मानवता बुरी है और क्या वह व्यक्ति सकारात्मक चीजों को स्वीकार सकता है। अगर वह सिर्फ घटिया है और कई वर्षों से अपने पारिवारिक जीवन या सामाजिक परिवेश के प्रभाव में आकर उसे शेखी बघारना और डींगें हाँकना पसंद करने, गैर-जिम्मेदाराना ढंग से और नतीजों पर विचार किए बिना बोलने की बुरी आदत पड़ गई है तो यह उसकी मानवता का सिर्फ एक दोष है। वह बुरा नहीं है; वह बस बहुत ही ज्यादा घटिया होने के स्तर पर है। अगर ऐसा व्यक्ति शेखी बघारने के अलावा दूसरों से मेलजोल रखते समय रोब झाड़ने वाले और क्रूर तरीके से व्यवहार भी करता है और डींगें हाँकने और शेखी बघारने का उसका मकसद दूसरों को दबाना और जिन चीजों की वह शेखी बघारता है और जिन्हें बढ़ा-चढ़ाकर कहता है उन्हें उन चीजों से बेहतर और ऊँचा दिखाना जो दूसरों ने की हैं या दूसरों के पास हैं तो अब यह उसके घटिया होने की समस्या नहीं रही है। यह किस तरह की समस्या है? (यह बुरी मानवता की समस्या है।) यह बुरी मानवता की समस्या है। तो क्या इसमें कोई भ्रष्ट स्वभाव शामिल है? (हाँ।) किस तरह का भ्रष्ट स्वभाव? (क्रूर स्वभाव।) वह घमंडी और क्रूर स्वभाव वाला है। कुछ लोग शेखी बघारना महज इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि वे बहुत ही ज्यादा घटिया होते हैं। यह उनकी रहन-सहन की आदतों और जीवनयापन के परिवेश के कारण होता है। वे बस समझते ही नहीं हैं कि सच्चाई से बोलने, दिल से बोलने, वास्तविक स्थितियों पर चर्चा करने या जीवन और उचित मामलों पर बात करने का क्या मतलब है। उनमें इस जागरूकता की कमी होती है। ऐसी शिक्षा उनके पारिवारिक और स्कूली परिवेश में गैर-मौजूद है और जब वे समाज में प्रवेश करते हैं तो उसके बाद तो यह और भी ज्यादा गैर-मौजूद हो जाती है। नतीजतन, उनका जन्मजात घटियापन बहुत गंभीर होता है। वे छिछोरे होते हैं और उनमें उचित चाल-ढाल की कमी होती है और वे बस दिखावा करने और दूसरों से अपने बारे में ऊँची राय बनवाने के लिए डींगें हाँकना और शेखी बघारना पसंद करते हैं। अपने दिलों में उनकी कोई दूसरी महत्वाकांक्षा, इच्छा या जरूरत नहीं होती है। अगर वे सिर्फ यही अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करते हैं तो यह सिर्फ घटियापन है; यह उनकी मानवता का दोष है। लेकिन अगर उनकी शेखी बघारने का कोई लक्ष्य है और शेखी बघारने के जरिए वे खुद को बहुत ही सक्षम और असाधारण रूप से समर्थ और साथ ही आम लोगों से बेहतर, अलग और बहुत ऊँचे लोगों के रूप में पेश करते हैं तो अब यह घटिया होने की समस्या नहीं रह जाती है। उनका शेखी बघारना पसंद करना एक विशिष्ट सोच से निर्देशित होता है, जो रुतबे, महत्वाकांक्षा और इच्छा की लालसा से संचालित होता है। वे शेखी बघारने का उपयोग दूसरों को दबाने और प्रभावित करने के लिए करते हैं, दूसरों को खुद से कमतर और यह महसूस करवाने के लिए करते हैं कि वे उनके जितने अच्छे नहीं हैं, ताकि दूसरे उनके प्रति सम्मानपूर्ण रहें और उनकी आज्ञा का पालन करें। यही उनकी मानवता की बुराई है। उनका शेखी बघारना पसंद करना मजबूत स्थिति हासिल करने के लिए होता है : “जो कुछ भी तुम्हारे पास है वह मेरे पास भी है। जो कुछ भी तुम कर सकते हो वह मैं भी कर सकता हूँ। जो कुछ भी तुम जानते हो वह मैं भी जानता हूँ। जो कुछ भी तुमने देखा है वह मैंने भी देखा है। मैं तुमसे कमतर नहीं हूँ!” ऐसा भी होता है कि अगर तुमने कोई विशेष खाना खाया हो तो जाहिर तौर पर उसे कभी नहीं खाने के बावजूद वे दावा करेंगे कि उन्होंने खाया है—और इतना ही नहीं, वे कहेंगे कि उन्होंने उसे ज्यादा खाया है और जो खाना उन्होंने खाया वह तुम्हारे खाने से बेहतर था। वे उन बातों की भी शेखी बघारेंगे जो हुई ही नहीं। उनके शेखी बघारने का क्या मकसद है? वे तुम्हें मात देना चाहते हैं, तुमसे मुकाबला करना चाहते हैं और तुम्हें यह महसूस करवाना चाहते हैं कि वे तुमसे बेहतर हैं, कि वे हर मामले में तुम्हारे जितने ही अच्छे हैं। वे महत्वाकांक्षा और इच्छा से संचालित होते हैं। तो क्या ऐसी महत्वाकांक्षा और इच्छा से संचालित मानवता की अभिव्यक्ति सिर्फ घटियापन है या यह बुरी मानवता है? (यह बुरी मानवता है।) क्या यहाँ कोई भ्रष्ट स्वभाव शामिल है? (हाँ।) महत्वाकांक्षा और इच्छा से प्रेरित होना—यह भ्रष्ट स्वभाव है। किस तरह का भ्रष्ट स्वभाव है? (घमंड और क्रूरता।) बिल्कुल। यहाँ ये दो प्रकार के भ्रष्ट स्वभाव हैं : घमंड और क्रूरता। इसके अतिरिक्त, इसमें जरा-सी दुष्टता भी होती है। यानी तुम जो भी कहते हो उस पर वे अपने दिलों में हमेशा विचार करते हैं, हमेशा उसमें से कोई न कोई मतलब निकालने का प्रयास करते हैं और हमेशा उससे दुष्ट विचारों और चरम खयालों के साथ पेश आते हैं। उदाहरण के लिए, अगर तुम कहते हो, “मेरे परिवार के पास टोयोटा कार है; यह एक जापानी कार है,” तो वे कहते हैं, “जापानी कारें अच्छी नहीं होती हैं। जर्मन कारें बेहतर होती हैं। मैं जो जर्मन कार चलाता था, उसका न सिर्फ प्रदर्शन बेहतरीन था बल्कि वह दस साल से भी ज्यादा समय बिना खराब हुए चलती रही—वह तुम्हारी कार से कहीं बेहतर थी!” उन्हें तुमसे बेहतर होना ही पड़ेगा। तुम कहते हो, “मैंने हाई स्कूल तक पास नहीं किया,” वे कहते हैं, “मैंने तो हाई स्कूल पास किया है। तुम मुझसे जलते हो, है ना?” वास्तव में, उन्होंने मिडिल स्कूल भी पास नहीं किया, फिर भी वे तुमसे बेहतर होना चाहते हैं। उन्हें यह महसूस करना अच्छा लगता है कि दूसरे उनसे जलते हैं, उनके बारे में अच्छी राय रखते हैं और उनका सम्मान करते हैं। देखो, वे दूसरों से जो जानकारी प्राप्त करते हैं, उसके प्रति उनकी प्रतिक्रिया हमेशा दुष्ट और चरम होती है। उनमें सामान्य मानवता की सोच की कमी है। सामान्य व्यक्ति यह सुनने पर कि किसी और के पास कोई अच्छी चीज है कह सकता है, “यह तो बढ़िया है कि तुम्हारे पास यह है। क्या तुम मुझे इसकी विशिष्ट सुविधाओं और फायदों के बारे में बता सकते हो? मैं इसके बारे में और जानना चाहूँगा।” सामान्य मानवता वाला व्यक्ति इस तरीके से प्रतिक्रिया देगा। लेकिन जो लोग शेखी बघारना पसंद करते हैं, उनमें सामान्य मानवता नहीं होती है। वे सोचते हैं, “वह चीज तुम्हारे पास है तो मेरे पास क्यों नहीं होनी चाहिए? अगर वह मेरे पास नहीं है तो भी मुझे यह कहना ही पड़ेगा कि वह मेरे पास है और इससे भी ज्यादा मुझे यह कहना ही पड़ेगा कि मेरे वाली तुम्हारे वाली से बेहतर है!” अगर तुमने उनसे उसे निकालकर दिखाने के लिए कहा तो वे कहेंगे, “मैं तुम्हें वह देखने नहीं दूँगा!” जबकि वास्तव में उनके पास वह चीज है ही नहीं। क्या यह दुष्ट है? (हाँ।) दूसरे शब्दों में, जब उनके साथ कुछ होता है या जब वे कोई जानकारी देखते हैं या प्राप्त करते हैं तब उनकी प्रतिक्रिया हमेशा चरम, मानवता से असंगत और दुष्ट होती है, इसलिए उनके स्वभाव में कुछ दुष्टता भी होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो जब तुम उनसे सामान्य रूप से बातचीत या संगति करते हो और तुम्हें लगता है कि तुमने ऐसा कुछ नहीं कहा जो औचित्य रहित मानसिक प्रतिक्रिया का कारण बन सकता है तब उनका मन पहले से ही अनेक विचारों से भरा होता है। वे पहले से ही तुमसे जलते हैं, तुम्हारे प्रति अवज्ञापूर्ण और द्वेषपूर्ण होते हैं और साथ ही वे तुम्हें दबाना भी चाहते हैं। उनका मन इन्हीं चीजों से भरा होता है। क्या तुम यह नहीं कहोगे कि यह दुष्ट है? (हाँ।) दुष्ट लोग शुद्ध नहीं होते हैं। उनके द्वारा प्रकट किए गए ज्यादातर हाव-भाव, शब्द और क्रियाकलाप सामान्य मानवता के जमीर और विवेक से मेल नहीं खाते हैं। यह संभव है कि उनके शब्दों में कुछ आक्रामकता हो; आक्रामकता मौजूद होने के अलावा उनके कुछ शब्द झूठे भी हो सकते हैं और कुछ डींगें भी हो सकती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके भीतर दुष्ट विचार होते हैं और इन दुष्ट विचारों से अभिप्रेरित होकर वे जो शब्द बोलते हैं वे सभी झूठ होते हैं, सभी शैतान और दानवों से उत्पन्न हुए होते हैं। ऐसे लोगों में कोई मानवता नहीं होती है; वे गैर-मनुष्य होते हैं। जो लोग शेखी बघारना और डींगें हाँकना पसंद करते हैं, उन्हें दो प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है। उनका उनकी मानवता के सार के आधार पर निरूपण किया जाना चाहिए। यानी यह फैसला करने के लिए कि उनमें क्या समस्या है यह देखा जाना चाहिए कि क्या वे घटिया हैं और क्या उनकी मानवता बुरी है। अगर उनमें बुरी मानवता है और वे बहुत ही ज्यादा घटिया हैं, बहुत-से बुरे कर्म करने में सक्षम हैं तो वे अच्छे लोग नहीं हैं और उनका कुकर्मियों के रूप में निरूपण किया जाना चाहिए। हालाँकि अगर वे सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और उनमें थोड़ा घटियापन है, लेकिन वे खुद को कोई बुरी चीज करने के लिए तैयार नहीं कर सकते हैं, अभी भी उनमें कुछ जमीर और विवेक है और वे कुछ अच्छी चीजें भी कर सकते हैं तो फिर वे अभी भी अच्छी मानवता वाले लोग माने जा सकते हैं। यह कोई बड़ी बात नहीं है और अगर उनकी काबिलियत अच्छी है तो उन्हें पर्यवेक्षक, अगुआ या कार्यकर्ता भी चुना जा सकता है। भले ही इन दोनों प्रकारों के सभी लोग डींगें हाँकते हों और शेखी बघारना पसंद करते हों, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उनकी मानवता अच्छी है या बुरी। अगर वे सिर्फ घटिया हैं तो यह उनकी मानवता का दोष है और इसमें भ्रष्ट स्वभाव शामिल नहीं है। लेकिन अगर शेखी बघारने के पीछे उनका कोई इरादा और महत्वाकांक्षा है तो यह बुरी मानवता का संकेत है और इसमें भ्रष्ट स्वभाव शामिल है। उनकी मानवता के लिहाज से यह बुराई है; इसमें जो भ्रष्ट स्वभाव शामिल हैं वे घमंड, दुष्टता या क्रूरता हैं। इसमें खराब चरित्र और भ्रष्ट स्वभाव दोनों शामिल हैं, है ना? (हाँ।)
लापरवाही
चलो, एक और अभिव्यक्ति पर चर्चा करें : लापरवाही। व्यक्ति जो भी चीज करता है उसमें लापरवाह होना—यह किस पहलू के तहत आता है? (व्यक्ति की मानवता का दोष है।) ऐसे लोग हर चीज एक मोटे और सामान्य तरीके से देखते हैं, मुख्य बिंदुओं पर पकड़ बनाने में असमर्थ होते हैं। वे जो भी करते हैं वह असावधानी से भरा होता है। वे पाठ आधारित कार्य या दस्तावेज प्रबंधन जैसे सूक्ष्म कार्य नहीं कर सकते हैं। वे ऐसे काम भी नहीं कर सकते हैं जिनमें सटीकता की जरूरत होती है। कपड़े बनाते समय कभी-कभी वे पैंट की टाँगों को उस जगह सिल देते हैं जहाँ बाँहें होनी चाहिए, कभी-कभी लंबी बाँहों को छोटी कर देते हैं या 26 इंच की कमर को 24 इंच की बना देते हैं। वे कपड़े या तो बहुत ही ज्यादा बड़े या बहुत ही ज्यादा छोटे बना देते हैं। वे चाहे जो भी करें, वे हमेशा इतने लापरवाह, इतने बेपरवाह और इतने अनाड़ी होते हैं कि किसी भी चीज को अच्छी तरह से नहीं कर पाते हैं। आखिर वे कितने लापरवाह हो सकते हैं? किसी काम से बाहर जाते समय वे उन चीजों तक को साथ ले जाना भूल सकते हैं जो उन्हें साथ लेकर जानी चाहिए। उदाहरण के लिए, किसी मुकदमे के लिए वकील से मिलने जाते समय वे अपना पहचान पत्र और वकील द्वारा अनुरोध किया गया सबूत लाना भूल जाते हैं। वे बहुत-सी चीजें पीछे छोड़ जाते हैं। कभी-कभी उन्हें यह भी पता नहीं होता है कि उन्होंने अपना जरूरी सामान कहाँ रखा है और वे याद रखने का प्रयास भी नहीं करते हैं। नतीजतन, वे अक्सर चीजें खो देते हैं और उन्हें भूल जाते हैं और वे जो चीजें करते हैं वे और उनका दैनिक जीवन पूरा गड़बड़ होता है। ऐसे लोग अपने कार्य या अपने कर्तव्य से जिस तरीके से पेश आते हैं उसमें कभी गंभीर नहीं होते हैं। वे जो कुछ भी करते हैं वह हमेशा जल्दबाजी में और असावधानी से किया हुआ होता है—वे जो कुछ भी देखते हैं उसके बारे में हमेशा केवल एक मोटा-मोटा अनुमान ही लगा पाते हैं, वे जो शब्द सुनते हैं उनके बारे में हमेशा सिर्फ एक मोटी-मोटी समझ ही बना पाते हैं, वे हमेशा सिर्फ मोटे तौर पर और सामान्य शब्दों में ही चीजें कहते हैं और अपनी याददाश्त में चीजों की सिर्फ एक मोटी रूपरेखा ही बनाकर रखते हैं। नतीजतन वे महत्वपूर्ण या गोपनीय कार्य सँभालने में असमर्थ होते हैं; वे ऐसे कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं हैं। अगर उनकी लापरवाही सिर्फ उनके निजी जीवन या व्यक्तिगत स्वच्छता से जुड़ी है और इससे दूसरे लोगों या किसी महत्वपूर्ण मामले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है तो यह सिर्फ उनकी मानवता का एक दोष है—जो भी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं उनके लिए बस वे खुद जवाबदेही ले सकते हैं, और कुछ नहीं। लेकिन अगर इसमें कर्तव्य, महत्वपूर्ण कार्य, किसी की किस्मत और संभावनाएँ, किसी का रुकना या छोड़कर जाना आदि शामिल हो तो फिर ऐसे लोग ऐसे मामले सँभालने के लिए अनुपयुक्त होते हैं क्योंकि वे बहुत ही ज्यादा लापरवाह होते हैं। एक बात तो यह है कि वे इन मामलों में बारीकी से काम नहीं करते हैं; वे इन पर बस एक मोटी नजर डालते हैं, वे इतने आलसी होते हैं कि इन्हें सँभालने के लिए अपने दिमाग का उपयोग नहीं करते हैं या अपनी सोच और ऊर्जा नहीं लगाते हैं। दूसरी बात यह है कि चीजें करने की उनकी शैली और दृष्टिकोण हमेशा ही जल्दबाजी और असावधानी से भरे होते हैं और वे अक्सर चीजें खो देते हैं और भूल जाते हैं। अगर इसमें सिर्फ उनका निजी जीवन शामिल है तो यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। लेकिन अगर इसमें जरूरी कार्य या गोपनीय मामले शामिल हैं तो वे चीजें गड़बड़ कर सकते हैं या किसी बड़ी आपदा का कारण भी बन सकते हैं। उदाहरण के लिए, किसी को तुरंत पेरिस जाना है, लेकिन अपनी लापरवाही के कारण वह रोम जाने वाले हवाई जहाज का टिकट खरीद लेता है। यहाँ तक कि वह बहुत खुश होकर कहता है, “आज मैंने जो टिकट खरीदा, वह बहुत ही सस्ता था!” दूसरे लोग टिकट देखते हैं और कहते हैं, “यकीनन यह सस्ता है—तुम्हें तो पेरिस जाना था, तुमने रोम जाने का टिकट क्यों खरीदा?” यह तो लापरवाही की हद हो गई! ऐसे लोग हर चीज को उपेक्षापूर्ण और बेपरवाह रवैये से देखते हैं। वे किसी चीज के बारे में एक मोटा अंदाजा लगाने के लिए उस पर बस एक नजर डालते हैं और बात वहीं समाप्त हो जाती है। उनका इसी तरह का गैर-जिम्मेदाराना रवैया होता है। बेशक, इस रवैये की विशेषता यह भी है कि लोग किसी भी चीज में दिल नहीं लगाना चाहते और आलसी होते हैं—वे इतने आलसी होते हैं कि किसी भी चीज में दिल नहीं लगाते हैं, अपने दिमाग का उपयोग नहीं करते हैं या किसी भी मामले को सँभालते समय विचार नहीं करते हैं। ऐसे लापरवाह लोग महत्वपूर्ण कार्य के लिए अनुपयुक्त होते हैं, विशेष रूप से ऐसे कार्य जिनमें पाठ आधारित कार्य शामिल होते हैं, दस्तावेज प्रबंधन या गोपनीय व्यावसायिक कौशल से जुड़े कार्य। तो फिर, अगर ऐसे लोग अगुआ बन जाते हैं तो क्या वे काम कर सकते हैं? (नहीं। उनका कार्य कभी उचित रूप से नहीं होता है; उसे हमेशा मोटे तौर पर और व्यापक रूपरेखा में किया जाता है और उसे हमेशा अधूरा छोड़ दिया जाता है। वे वास्तविक कार्य नहीं कर सकते हैं।) ऐसे लोगों के कार्य में बारीकियों की कमी होती है; वे हमेशा जल्दबाजी और असावधानी से कार्य करते हैं, चीजों को सतही, बेपरवाह ढंग से सँभालते हैं। उनके शब्द भी हमेशा अस्पष्ट होते हैं और उनका “मोटे तौर पर”, “शायद”, “संभावित” या “संभवतः” जैसे शब्दों का प्रयोग करने के प्रति झुकाव होता है। ऐसे लोग कुछ भी पूरा नहीं कर सकते हैं। परमेश्वर के घर के कार्य की बहुत-सी मदों जैसे कि प्रशासनिक कार्य, कार्मिक कार्य, कलीसियाई जीवन से संबंधित कार्य और सुसमाचार कार्य में विशिष्ट विवरण शामिल होते हैं। विस्तृत कार्य सामने आने पर ऐसे लापरवाह लोगों को सिरदर्द होने लगता है, वे उलझन में पड़ जाते हैं और घुटन महसूस करते हैं; वे ऐसे विस्तृत कार्य में शामिल होने के अनिच्छुक होते हैं। उनका ऐसा आलसी रवैया होता है, इसलिए जब कार्य करने की बात आती है तब वे हमेशा सोचते हैं, “काम को बस मोटा-मोटा निपटा देना ठीक है; आखिर यह कार्य-व्यवस्थाओं में जो कहा गया है उसके पर्याप्त करीब है।” वे हमेशा यह “पर्याप्त करीब होना ठीक है” वाला रवैया बनाए रखते हैं—क्या इस तरह से कार्य अच्छी तरह से किया जा सकता है? (नहीं।) जब वे लोगों का आकलन करते हैं तब वे उसे भी मोटे तौर पर करते हैं—वे अगुआओं और कार्यकर्ताओं का आकलन मोटे तौर पर करते हैं और वे हर टीम के पर्यवेक्षकों का आकलन भी मोटे तौर पर करते हैं। जब कोई पूछता है, “उस पर्यवेक्षक को परमेश्वर में विश्वास रखते हुए कितना समय हो गया है?” तब वे उत्तर देते हैं, “लगता है तीन वर्ष से ज्यादा हो गए हैं।” लेकिन जिस व्यक्ति को परमेश्वर में विश्वास रखते हुए तीन वर्ष हो गए हैं, हो सकता है कि उसने अभी तक कोई आधार तक स्थापित न किया हो—क्या ऐसा व्यक्ति पर्यवेक्षक के रूप में भरोसेमंद हो सकता है? लापरवाह लोग इसकी असलियत देख ही नहीं पाते हैं। इसीलिए उनकी बातों में हमेशा “मोटे तौर पर”, “संभावित”, “शायद”, “संभवतः” और “लगता है” जैसे पदों की भरमार होती है; वे कभी भी सटीक शब्दों का प्रयोग करते ही नहीं हैं। जब कोई पूछता है, “क्या परमेश्वर में विश्वास रखते हुए कभी उसने अगुआ के रूप में सेवा की है?” तब वे उत्तर देते हैं, “लगता है उसने नहीं की है क्योंकि मैंने उसे इसका जिक्र करते नहीं सुना है।” देखो, वे कभी भी किसी भी चीज से सावधानीपूर्वक और सूक्ष्मता से पेश नहीं आते हैं। अगर तुम विवरण के लिए उन पर जोर डालते हो तो वे बस भावनाओं और धारणाओं पर भरोसा करते हैं। वे यह नहीं कहते हैं, “मैं तुरंत जाकर इस बारे में पूछूँगा और पुष्टि करूँगा।” वे बस इससे सावधानीपूर्वक और सूक्ष्मता से पेश नहीं आते हैं। हर चीज में जब तक यह “मोटे तौर पर सही” या “काफी करीब” है तब तक वे इसे ठीक मानते हैं। कुछ लोग कहते हैं, “व्यक्ति को इतनी सूक्ष्मता से क्यों जीना पड़ेगा?” हालाँकि एक लिहाज से यह सच है—दैहिक जीवन से संबंधित मामलों के लिए तुम थोड़े मोटे तौर पर कार्य कर सकते हो—लेकिन जब बात कलीसियाई कार्य की आती है तब तुम मोटे तौर पर कार्य नहीं कर सकते। मोटे तौर पर कार्य करने से उसके नतीजे प्रभावित होते हैं। कभी भी कार्य की किसी भी मद में अच्छे नतीजे सिर्फ विशिष्ट नियोजन, व्यवस्थाओं, अनुवर्ती कार्रवाइयों, पर्यवेक्षण और आग्रह के कारण ही हासिल होते हैं। अगर कार्य को मोटे तौर पर, जल्दबाजी में किया जाता है तो कोई भी कार्य कभी भी नतीजे नहीं दे सकता है। इसलिए, लापरवाही व्यक्ति की मानवता का दोष है और ऐसे लापरवाह लोग महत्वपूर्ण कार्य के लिए योग्य नहीं होते हैं; विशेष रूप से, वे अगुआओं और कार्यकर्ताओं का कार्य करने के लिए योग्य नहीं होते हैं। चाहे मामला कुछ भी हो, ऐसे लोग हमेशा सिर्फ मोटी रूपरेखा सुनते हैं और फिर मान लेते हैं कि वे उसे समझते हैं। उदाहरण के लिए, कलीसियाएँ स्थापित करने के कार्य में कलीसिया कैसे स्थापित की जाए, एक कलीसिया स्थापित करने के लिए कितने लोगों की जरूरत है, कितनी कलीसियाओं से एक जिला बनता है, कितने जिलों से एक क्षेत्र बनता है—परमेश्वर के घर की कार्य व्यवस्थाओं में इन सभी के लिए विशिष्ट नियम हैं और साथ ही विशेष हालातों के लिए अतिरिक्त विशिष्ट नियम भी हैं। लेकिन लापरवाह लोग न तो इन नियमों की तलाश करते हैं और न ही इनके बारे में जानने का प्रयास करते हैं, फिर भी वे यह जानने का दावा करते हैं कि आगे कैसे बढ़ना है। जब उनसे विवरण प्रदान करने के लिए कहा जाता है तब वे उत्तर देते हैं, “यह तो बस कलीसियाएँ स्थापित करना है। जैसे ही एक निश्चित संख्या में लोग हो जाते हैं, कलीसिया स्थापित कर दी जाती है।” लेकिन जब उनसे पूछा जाता है, “इसे विशिष्ट रूप से कैसे स्थापित किया जाना चाहिए?” तब वे विवरण नहीं जानते हैं और विवरण प्रदान नहीं कर सकते हैं। अगर वे नए अगुआ हैं और अभी उन्हें नहीं पता है कि कलीसिया कैसे स्थापित की जाती है तो यह बात समझ में आती है। समस्या यह है कि उन्हें पता नहीं है, लेकिन वे इसके बारे में सावधान भी नहीं हैं और इसका अध्ययन नहीं करते हैं और न ही इसकी तलाश करते हैं। क्या ऐसे लोग कलीसियाई कार्य अच्छी तरह से कर सकते हैं? (नहीं।) ऐसे लोगों के लिए हमारे पास सिर्फ दो शब्द हैं—“इस्तीफा दो!” वे अगुआई कार्य के लिए उपयुक्त नहीं हैं। ऐसा कोई कार्य नहीं है जो लोगों से जुड़े कार्य से ज्यादा पेचीदा हो। अगर तुम्हारे पास सतर्क और जिम्मेदार दिल की कमी है और तुम्हारा काम मोटे तौर पर होता है और सूक्ष्मता से नहीं किया जाता है तो चाहे तुम्हारी काबिलियत कितनी भी अच्छी हो, तुम फिर भी उस भूमिका के लिए उपयुक्त नहीं होगे। बहुत ज्यादा लापरवाह होना, हर चीज को मोटे तौर पर करना, सिर्फ रूपरेखा पर ध्यान केंद्रित करना, सिर्फ औपचारिकताएँ निभाने पर ध्यान केंद्रित करना, विवरणों पर ध्यान केंद्रित नहीं करना, चीजों से सावधानीपूर्वक और सूक्ष्मता से पेश आना नहीं जानना—इसका मतलब है कि तुम अगुआओं और कार्यकर्ताओं के कार्य के लिए बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं हो। समझे? (हाँ।)
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?