सत्य का अनुसरण कैसे करें (5) भाग चार
चीजें करते समय बारीकी बरतना और अतिसतर्क होना
लापरवाही मानवता का दोष है। तो फिर चीजें करते समय बारीकी बरतना और अतिसतर्क होना और साथ ही मूल, मुख्य बिंदुओं पर पकड़ बनाने में भी समर्थ होना, समस्याएँ कहाँ हैं यह पहचानने में और समस्याओं के सार की असलियत देखने में समर्थ होना—क्या यह मानवता का गुण है? (हाँ।) बारीकी से चीजें करने वाले लोगों का रवैया काफी हद तक उचित होता है; वे चीजें करने में काफी बारीकी बरतते हैं और लगन से काम करते हैं, वे खुद को शांत करने और जल्दबाजी नहीं करने में समर्थ होते हैं—यह मानवता का गुण है। वैसे तो मानवता के इस गुण वाला व्यक्ति पूर्णकालिक कार्य कर सकता है, लेकिन अगर वह चीजें करने में बहुत धीमा है और उसके कार्य की दक्षता अच्छी नहीं है तो नतीजे बहुत अच्छे नहीं होंगे। इसमें क्या शामिल है? इसमें काबिलियत शामिल है जो कि जन्मजात स्थितियों में से एक है। क्या तुम्हें लगता है कि जो कोई भी बारीकी बरतता है, वह आवश्यक रूप से अच्छा कार्य कर सकता है? यह नजरिया गलत है। कुछ लोग चीजें करने में बहुत ही ज्यादा बारीकी बरतते हैं, इतनी कि वे थोड़े विक्षिप्त-से लगने लगते हैं। उदाहरण के लिए, सब्जियाँ धोते समय वे पत्तों के आगे का हिस्सा धोते हैं और फिर पीछे का हिस्सा धोते हैं, हर पीले पत्ते को हटाते हैं और कीड़ों के बनाए हर छेद को काटकर अलग करते हैं, सुनिश्चित करते हैं कि सब्जियाँ पूरी तरह से साफ धुली हैं। चीजें करते समय बहुत बारीकी बरतना मानवता का गुण है, लेकिन अगर कोई सिद्धांतहीन होने की हद तक अत्यधिक बारीकी बरते और बहुत ही ज्यादा तुच्छ चीजें करे तब यह अनावश्यक और अदक्ष हो जाता है। यह खराब काबिलियत, चीजें पूरी करने में असमर्थ होना और कार्य की जिम्मेदारी उठाने में अक्षम होना दर्शाता है। कुछ लोग जो चीजों को करने में बारीकी बरतते हैं, उनकी सिद्धांतों पर पकड़ होती है, मूल, मुख्य बिंदुओं पर पकड़ होती है, वे तुरंत निर्णय लेकर शीघ्रता और फुर्ती से कार्य करते हैं और समस्याओं को तेजी से सुलझाने में समर्थ होते हैं—यह अच्छी काबिलियत होना है। चीजें करने में बारीकी बरतना चीजें करने में दक्ष होने के समान नहीं है और न ही यह चीजें करने में अच्छे नतीजे हासिल करने के समान है। इसका मतलब सिर्फ धैर्यपूर्वक ध्यान केंद्रित करके रखने में समर्थ होना, शांत रहना, जल्दबाजी नहीं करना, दिखावटी नहीं होना और लापरवाह नहीं होना है। यह ज्यादा से ज्यादा सिर्फ मानवता का एक गुण है और अच्छी काबिलियत तक नहीं पहुँचता है। कुछ लोग चीजें करने में काफी बारीकी बरतते हैं, वे काफी कर्तव्यनिष्ठ दिखते हैं और न तो जल्दबाजी करते हैं और न ही घबराते हैं, और वे बिल्कुल शांत रहते हैं। लेकिन वे मामले सँभालने में अदक्ष होते हैं, महत्व और तात्कालिकता के आधार पर चीजों को प्राथमिकता देने में असमर्थ होते हैं। वे किसी महत्वहीन काम को पकड़ लेते हैं और उस पर लगातार कार्य करते रहते हैं जिससे दूसरे लोग चिंतित और हताश हो जाते हैं और बेताबी से उन्हें एक तेज लात मारना चाहते हैं। वे बहुत धीरे-धीरे कार्य करते हैं जिसमें बिल्कुल भी दक्षता नहीं होती है—वे बस निकम्मे होते हैं! सामान्य उत्तरजीविता क्षमता वाला व्यक्ति उनसे दस-बीस गुना तेजी से कार्य करता है। वे चीजें बहुत ही धीरे-धीरे करते हैं और चाहे वे कितना भी करें, वे कोई विधि नहीं ढूँढ़ सकते हैं, सिद्धांत नहीं ढूँढ़ सकते हैं, उनमें हुनर नहीं होता है और दक्षता की कमी होती है। जिस काम को करने में एक घंटा लगना चाहिए उसे करने में उन्हें पूरा दिन लग सकता है, जिस काम को करने में एक दिन लगना चाहिए उसे करने में उन्हें पाँच दिन लग सकते हैं और जिस काम को करने में पाँच दिन लगने चाहिए उसे करने में उन्हें दस दिन लग सकते हैं, जिससे उन्हें देखकर तुम गुस्सा और हताशा दोनों महसूस करते हो। कुछ महिलाएँ मामले सँभालने में सुस्त होती हैं। यह अच्छी तरह से जानते हुए कि उन्हें किसी काम को सँभालने के लिए जल्द ही बाहर जाना पड़ेगा, वे फिर भी अपने बाल धोने पर अड़ जाती हैं। अपने बाल धोने में वे कोई विधि नहीं ढूँढ़ सकती हैं। अपने सारे बाल एक झटके में धोने के बजाय वे हर लट एक-एक करके धोती हैं और आधे घंटे बाद भी उनका काम पूरा नहीं हुआ होता है। क्या वे पागल नहीं हैं? बाल धोने के कारण वे उचित मामलों में देरी कर देती हैं। मामले जितने ज्यादा जरूरी होते हैं, उन्हें उतनी ही कम तात्कालिकता महसूस होती है और वे यहाँ तक कि उन मामूली मामलों पर ध्यान केंद्रित करती हैं और बिना कोई चिंता या परेशानी महसूस किए महत्वपूर्ण मामलों में देरी करती हैं। अगर तुम उनसे आग्रह करते हो तो उनके पास बहानों का ढेर भी होता है : “मैं ऐसे ही इन उचित चीजों को अधूरा कैसे छोड़ सकती हूँ?” जब तुम ऐसे लोगों को देखते हो तब तुम मन में क्या सोचते हो? तुम बुरी तरह से उन्हें लात मारना चाहोगे। क्या ऐसे लोग लात खाने लायक नहीं हैं? (हाँ।) ऐसे लोगों के लिए भले ही करने के लिए कार्य हो, फिर भी वह उनसे करवाने की कोई जरूरत नहीं है। वे बहुत ही ज्यादा धीरे-धीरे कार्य करते हैं और बहुत ही ज्यादा अनाड़ी होते हैं! जब तुम ऐसे लोगों को देखते हो, जो कछुए की रफ्तार से चीजें करते हैं, तब क्या तुम चिंतित होते हो? (हाँ।) वे कहते हैं, “मैं अपने कार्य में बारीकी बरतता हूँ!” मैं कहता हूँ, “तुम्हारे इतनी बारीकी बरतने का क्या फायदा? दूसरे लोग तुमसे कम बारीकी तो नहीं बरतते हैं, लेकिन वे तुमसे ज्यादा कार्य करते हैं और तुमसे बेहतर तरीके से करते हैं। क्या तुम्हारे बारीकी बरतने से नतीजे हासिल हो सकते हैं? यही मुख्य बात है। अगर तुम चीजें करने में बारीकी बरतते हो और दक्षता और अच्छे नतीजे भी हासिल करते हो तो उस बारीकी बरतने का मूल्य है। लेकिन अगर तुम चीजें करने में सिर्फ बारीकी बरतते हो और अंत में न तो नतीजे हासिल करते हो और न ही दक्षता तो क्या यह फायदेमंद है? यह बेकार है!” कुछ लोग कपड़े बनाने में अत्यंत बारीकी बरतते हैं, लेकिन वे कभी भी सही आकार के कपड़े नहीं बना सकते हैं। वे सटीकता से यह निर्णय नहीं ले सकते हैं कि ये कपड़े पहनने वाले पर जँचेंगे या नहीं, वे यह नहीं बता सकते हैं कि बाँहें बहुत ही ज्यादा लंबी हैं या बहुत ही ज्यादा छोटी या कपड़े बहुत ही ज्यादा तंग हैं या बहुत ही ज्यादा ढीले, उन्हें कफ की मानक चौड़ाई का पता नहीं होता है और उन्हें यह नहीं पता होता है कि कॉलर उपयुक्त है या नहीं। ऐसे लोगों द्वारा बनाए गए कपड़े निश्चित रूप से मानक स्तर के नहीं होंगे। अगर कोई व्यक्ति बारीकी भी बरतता है और सिद्धांतनिष्ठ भी है तो यह सही मायने में मानवता का गुण है। लेकिन अगर कोई सिर्फ बारीकी बरतता है और उसका कोई सिद्धांत नहीं है, वह मुख्य बिंदुओं पर पकड़ बनाने में असमर्थ है, हमेशा मामूली मामलों पर हंगामा करता है और उन पर व्यर्थ ही चिंता करता रहता है तो यह परेशानी वाली बात है। ज्यादातर लोग “बारीकी बरतना” शब्द को आमतौर पर सकारात्मक शब्द मानते हैं, लेकिन बारीकी बरतने के सभी उदाहरण गुण नहीं होते हैं। यह परिस्थिति पर निर्भर करता है। कुछ लोग बिना किसी सिद्धांत के अंधे तरीके से बारीकी बरतते हैं। यह बारीकी बरतना नहीं बल्कि विक्षिप्त होना और मुख्य बिंदुओं पर पकड़ बनाने में असमर्थ होना है; यह खराब काबिलियत दर्शाता है और यह चीजें करने का हुनर ढूँढ़ पाने में असमर्थ होना और सिद्धांतों पर पकड़ बनाने में असमर्थ होना है। इसलिए, मेरी नजर में वैसे तो अभिव्यक्ति या चीजें करने के एक तरीके के रूप में बारीकी बरतना मानवता का गुण है, लेकिन तुम्हें व्यक्ति की काबिलियत को भी देखने की जरूरत है। अगर काबिलियत का ध्यान नहीं रखा जाता है तो फिर चीजें करने में बारीकी बरतने का रवैया रखना फिर भी अच्छा है। अगर व्यक्ति में चीजें करने में काबिलियत और दक्षता दोनों हैं और वह सिद्धांतों का पालन कर सकता है और इसके अलावा वह बारीकी भी बरतता है तो यह बारीकी बरतना सचमुच सोने पर सुहागा है और सही मायने में मानवता का गुण है।
दिखावा करना पसंद करना
आओ, हम एक और अभिव्यक्ति के बारे में बात करें : दिखावा करना पसंद करना। यह किस तरह के मुद्दे के तहत आता है? (भ्रष्ट स्वभाव।) उदाहरण के लिए, कुछ लोग बहुत जल्दी-जल्दी टाइप करते हैं। दूसरों को यह दिखाने के लिए कि उनमें यह खूबी है, वे कीबोर्ड पर जानबूझकर जोर-जोर से उँगलियाँ दे मारते हैं, मानो कह रहे हों, “जरा मेरी टाइपिंग की लय तो सुनो, तुम्हें पता चल जाएगा कि मैं कितनी तेजी से टाइप करता हूँ!” कुछ लोग विश्वविद्यालय से स्नातक होते हैं, इसलिए वे आदतन ऐसी चीजें कहते हैं, “जब हम विश्वविद्यालय में थे,” “हमारे विश्वविद्यालय के प्रोफेसर,” “हमारे विश्वविद्यालय का कैम्पस” वगैरह-वगैरह। यह किस तरह की अभिव्यक्ति है? (दिखावा करना।) इसे दिखावा करना कहते हैं। कुछ लोग नई कार खरीदते हैं और डरते हैं कि दूसरों को पता नहीं चलेगा कि यह एक महँगा मशहूर ब्रांड है। कार से बाहर निकलने के बाद वे वहाँ से चले नहीं जाते हैं, बल्कि एक पल वे यह देख रहे होते हैं कि कहीं खिड़कियों पर उँगलियों के निशान तो नहीं हैं और अगले पल वे यह देख रहे होते हैं कि पेंट पर खरोंचें तो नहीं हैं। वे कार के आसपास क्यों चक्कर लगाते रहते हैं? यह सिर्फ दूसरों को यह बताने के लिए है कि यह कार उनकी है। यह किस तरह की अभिव्यक्ति है? (दिखावा करना।) कुछ लोगों के पास उच्च श्रेणी का फोन होता है। वे दूसरों को फोन दिखाने के लिए उसकी बैटरी खत्म हो जाने पर भी कॉल पर होने का नाटक करते हैं। इसे क्या कहते हैं? (दिखावा करना।) वे दिखावा क्यों करते हैं? क्या यहाँ मिथ्याभिमान काम नहीं कर रहा है? कुछ लोग मिंक कोट पहनते हैं और बहुत गर्म कमरे में दाखिल होने के बाद भी वे उसे उतारते नहीं हैं। जब कोई उनसे पूछता है, “क्या तुम्हें गर्मी नहीं लग रही है?” तब वे उत्तर देते हैं, “नहीं। मैंने मिंक पहना हुआ है—यह बहुत गर्म है!” वे मान लेते हैं कि दूसरों को इसके बारे में कुछ नहीं पता! उसे उतारते समय वे सुनिश्चित करते हैं कि वे लेबल का दिखावा करें, लोगों के सामने उसका प्रदर्शन करें : “यह कोट न सिर्फ मिंक है, बल्कि फलाँ नाम के एक उच्च श्रेणी के डिजाइनर ब्रांड का भी है। तुम्हें तो उसके बारे में पता तक नहीं!” अगर दूसरों को पता ही नहीं है तो फिर तुम क्या दिखावा कर रहे हो? क्या यह दिखावा करना बेकार नहीं है? कुछ लोग तो मेरे सामने खुद की नुमाइश करते फिरते हैं, कहते हैं, “तुमने डक डाउन जैकेट पहनी है? तुम्हें मिंक कोट पहनना चाहिए—यह बहुत गर्म है!” मैं कहता हूँ, “यह गर्म तो है, लेकिन वह कोट बहुत भारी है!” वे मिंक कोट पहनते हैं और मेरे सामने खुद की नुमाइश भी करते फिरते हैं। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोग जो दिखावा करना पसंद करते हैं, उथले नहीं होते हैं? अपनी मानवता के लिहाज से उनमें दो समस्याएँ होती हैं। एक तो यह कि वे विशेष रूप से सतही होते हैं। जब बाहरी संपत्ति और भौतिक चीजों की बात आती है, जैसे कि वे जो खाना खाते हैं, जो कपड़े पहनते हैं और जिन चीजों का उपयोग करते हैं, तब वे उन सभी का दिखावा करना चाहते हैं। वे दिखावा करने की इच्छा को दबा नहीं पाते हैं और हमेशा दूसरों के सामने इन चीजों का प्रदर्शन करना चाहते हैं, दूसरों को यह बताना चाहते हैं कि वे जो कपड़े पहनते हैं और जिन चीजों का उपयोग करते हैं, वे सभी उच्च श्रेणी के और अनोखे हैं। अगर दूसरे जानते हैं तो क्या फर्क पड़ता है? भले ही दूसरे इसे देखें और उनके बारे में अच्छी राय न बनाएँ, तो भी वे इसका दिखावा करते हैं। क्या यह उथला नहीं है? (हाँ।) वे उथले और बचकाने हैं—दिखावा करना पसंद करने वाले लोगों की यह दूसरी समस्या है। मुझे बताओ, उस तरह से दिखावा करने से उन्हें क्या हासिल हो सकता है? क्या यह बस अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाने के लिए है? क्या यह जरूरी है? क्या यह अनावश्यक नहीं है? (हाँ।) 1980 और 1990 के दशक में अगर किसी के चमड़े के जूतों के तल्ले असमान रूप से घिस जाते थे तो वह उस पर लोहे की प्लेट ठोक लेता था जिससे चलने पर तेज आवाज होती थी। कुछ लोगों को तो नए-नवेले चमड़े के जूते पहनने से पहले ही उन पर लोहे की प्लेट सिर्फ इसलिए ठोकनी पड़ती थी ताकि वे दूसरों को बता सकें कि उनके पास एक जोड़ी चमड़े के जूते हैं। यह उन्हें आत्मविश्वास देता था और उन्हें आनंद का एहसास दिलाता था। वे मानते थे, “दूसरों का ध्यान आकर्षित करना अच्छी बात है। यह साबित करता है कि मुझमें आकर्षण है और मेरा अस्तित्व मान्य है। इसलिए मुझे अपने प्रधान गुणों, मजबूत पक्षों और जिन अच्छी चीजों का मैं मालिक हूँ उन्हें सबके साथ साझा करना होगा।” क्या यह सच में साझा करना है? इसे अपनी शान दिखाना कहते हैं। क्या इस दुनिया में ऐसे काफी सारे लोग नहीं हैं जो अपनी शान दिखाना पसंद करते हैं? (हाँ।) सभी लोगों को लगता है कि यह बिल्कुल सामान्य है, है ना? ऐसे लोगों का न तो कोई तिरस्कार करता है और न ही कोई उन्हें अजीब नजरों से देखता है क्योंकि दुनिया ऐसे लोगों से भरी पड़ी है जो हर तरह के भौतिक और आर्थिक सुखों और रुतबे के सुखों के प्रति जुनूनी हैं। इसलिए, यह दुनिया इन चीजों का गुणगान करती है। परमेश्वर के घर में ऐसे लोगों के प्रति दूसरे लोग वितृष्णा और तिरस्कार महसूस करते हैं। क्यों? जो लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, वे नींव रखने की शुरुआत से लेकर धीरे-धीरे सत्य और मानव होने का मूल्य और अर्थ समझने तक भौतिक सुखों और दुनिया की कुछ सतही चीजों की कम परवाह करने लगते हैं। बाहरी संपत्ति के पीछे भागने की उनकी आंतरिक प्रेरणा कम हो जाती है, उनके अनुसरण के लक्ष्य और दिशा बदल जाते हैं और उनकी आंतरिक दुनिया की जरूरतें बदल जाती हैं। वे भौतिक जरूरतों के बारे में भिन्न परिप्रेक्ष्य बना लेते हैं, उन्हें महसूस होता है कि ऐसी सब चीजें खोखली हैं और उनके दिलों की जरूरतें पूरी नहीं कर सकती हैं। इसलिए हर तरह की चीजों का दिखावा करने और उनकी शान दिखाने की उनकी प्रवृत्ति कम हो जाती है। ऐसी कुछ चीजें क्या हैं जिनका परमेश्वर में विश्वास रखने वाले लोग शायद ज्यादा-से-ज्यादा दिखावा कर सकते हैं या जिनकी शान दिखा सकते हैं? वे शायद अपने कौशलों या खूबियों जैसी चीजों की शान दिखा सकते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग जिन्हें गाना गाना पसंद है, हमेशा दूसरों को अपनी आवाज सुनाना चाहते हैं। वे कहते हैं, “जरा सुनो तो सही, मेरी आवाज कितनी अच्छी है!” वे डरते हैं कि दूसरों को पता नहीं चलेगा कि वे अच्छा गाते हैं और वे इस संबंध में लगातार अपना दिखावा करना चाहते हैं। संक्षेप में, दिखावा करना पसंद करना मानवता का दोष है। यह मानवता में अपरिपक्वता, बचकानेपन और उथलेपन की अभिव्यक्ति है। जब लोग सिर्फ कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत ही समझते हैं और उन्होंने सही मायने में सत्य प्राप्त नहीं किया होता है या सत्य वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया होता है तब उनके द्वारा दिखावा करना पसंद करने का दोष प्रदर्शित किए जाने की बहुत संभावना होती है और मानवता के इस दोष पर काबू पाना आसान नहीं होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग सत्य प्राप्त करने से पहले जिन चीजों का दिखावा कर सकते हैं और जिनकी शान दिखा सकते हैं वही उनके जीने की पूँजी और आत्म-आश्वासन हैं। तुम्हें अपने स्व-आचरण पर विश्वास और तुम्हारे पास चीजें करने में प्रेरणा इसलिए होती है क्योंकि तुम जीने के लिए रूप-रंग, आभा, खूबियों, शिक्षा के स्तरों, योग्यताओं या पेशेवर कौशलों जैसी चीजों पर भरोसा करते हो। इसलिए, ज्यादातर लोग दिखावा करना पसंद करने की कमी को अलग-अलग हदों तक प्रदर्शित करते हैं और इस पर काबू पाना आसान नहीं है, इसके खिलाफ विद्रोह करना आसान नहीं है। जब लोग सत्य समझते हैं और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करते हैं, उनका एक निश्चित आध्यात्मिक कद होता है और वे सत्य से असंबंधित चीजों की कम परवाह करते हैं, तब वे समझने लगते हैं कि दिखावा करने या शान दिखाने की कोई जरूरत नहीं है और ये चीजें न तो यह दर्शाती हैं कि व्यक्ति में मानवता है और न ही यह कि व्यक्ति का आध्यात्मिक कद है; और यकीनन इससे भी ज्यादा यह कि वे यह नहीं दर्शाती हैं कि व्यक्ति को बचा लिया गया है या वह सत्य और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में समर्थ है। इसलिए, कुछ लोग जो दिखावा करना पसंद करते थे, जैसे-जैसे वे सत्य समझते जाते हैं और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करते जाते हैं, उनकी यह इच्छा धीरे-धीरे कम होती जाती है और मानवता के इस दोष पर अनजाने में काबू पा लिया जाता है और यह गायब हो जाता है। उदाहरण के लिए, किसी ऐसे व्यक्ति को लो जिसने थोड़ी-सी महँगी टी-शर्ट पहनी है। जब वह अचानक थोड़ी-सी गंदी हो जाती है तब वह बहुत चिंतित हो उठता है। कोई और उससे कहता है, “तुम इतने चिंतित क्यों हो? अगर तुम इसे धो लो तो क्या यह ठीक नहीं हो जाएगी?” वह उत्तर देता है, “तुम्हें पता है इस शर्ट की कीमत 200 युआन है?” वह दूसरों को बताने के लिए कीमत का जिक्र करने पर जोर देता है; सिर्फ तभी वह संतुष्ट महसूस करता है। अगर वह व्यक्ति सत्य समझता है तो जब ऐसे मामले दोबारा उसके सामने आएँगे तो वह उनसे सही ढंग से पेश आएगा। वह कीमत का जिक्र नहीं करेगा और इस मौके पर उसका मिथ्याभिमान कुछ हद तक सीमित हो जाएगा। क्या इससे यह नहीं दिखेगा कि उसकी मानवता अपेक्षाकृत परिपक्व हो गई है और अब वह उतनी उथली या बचकानी नहीं रही? (हाँ।) उसका दिखावा करना पसंद करना, उसकी मानवता का यह दोष—इस पर इस तरह काबू पा लिया जाएगा।
गरीबों का तिरस्कार करना और अमीरों की तरफदारी करना
अगली अभिव्यक्ति गरीबों का तिरस्कार करना और अमीरों की तरफदारी करना है। कुछ लोग जब किसी दौलतमंद व्यक्ति को देखते हैं तब तुरंत उसकी खुशामद करने लगते हैं, ऐसी चीजें कहते हैं, “तुम्हारी त्वचा बहुत अच्छी है। तुम अच्छे दिख रहे हो। तुम इतने कुलीन हो कि तुम्हारी थूक की कीमत भी हम गरीबों से ज्यादा है!” अमीर लोगों और प्रतिष्ठा और रुतबे वाले लोगों से बात करते समय वे विशेष रूप से नम्र होते हैं। लेकिन जब वे किसी किसान को देखते हैं तब वे हमेशा उसका मजाक उड़ाना चाहते हैं और उनके शब्द, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, उसे नीचा दिखाते हैं। गरीबों और अमीरों के प्रति उनके रवैये पूरी तरह से भिन्न होते हैं। वे अमीरों की जरूरतें पूरी करने को तैयार रहते हैं, खुशी से उनके गुलाम बनने की हद तक भी। लेकिन गरीबों के साथ यह एक भिन्न कहानी है—जब गरीब लोग मुश्किलों का सामना करते हैं और मदद माँगते हैं तब वे उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। निम्न प्रतिष्ठा और निम्न सामाजिक रुतबे वाले लोगों के साथ उनका व्यवहार उच्च सामाजिक रुतबे वाले लोगों के साथ उनके व्यवहार से बिल्कुल भिन्न होता है। यह गरीबों का तिरस्कार करना और अमीरों की तरफदारी करना है। यह किस तरह की समस्या है? (मानवता का दोष है।) क्या यह मानवता का दोष है? मानवता के भीतर यह किस तरह की समस्या है? (नीच चरित्र वाला होना।) यह मानवता के भीतर चरित्र की समस्या है—नीच चरित्र वाला होना। जब वे अमीर लोगों को देखते हैं तब वे आज्ञाकारी मातहत बन जाते हैं और अत्यधिक दासतापूर्ण ढंग से कार्य करते हैं। जब वे गरीब लोगों को देखते हैं तब वे ऐसे कार्य करना चाहते हैं मानो वे मालिक हों। वे किस किस्म के प्राणी हैं? लोगों के साथ इस तरीके से पेश आना दर्शाता है कि उनका कोई सिद्धांत नहीं होता है! गरीब लोगों के पास बस पैसों की थोड़ी-सी कमी होती है और उनके जीवनयापन की स्थितियाँ थोड़ी बदतर होती हैं—उन्होंने तुम्हें कैसे नाराज किया है? क्या गरीब लोगों में अनिवार्य रूप से बुरी मानवता होती है? क्या अमीर लोगों में अनिवार्य रूप से अच्छी मानवता होती है? जो लोग गरीबों का तिरस्कार करते हैं और अमीरों की तरफदारी करते हैं, क्या वे दूसरों को सत्य सिद्धांतों के आधार पर मापते और देखते हैं? स्पष्ट रूप से, नहीं। उनका मानना है कि जिसके पास पैसा है वह कुलीन और महान है, और जो गरीब है वह नीच और कमतर है। लोगों को मापने का उनका मानक पैसा है। क्या ऐसे लोग अच्छे लोग होते हैं? उनकी मानवता कैसी होती है? (उनकी मानवता बुरी होती है।) जब वे किसी अमीर व्यक्ति को देखते हैं तब वे खुशामदी मुस्कान ओढ़ लेते हैं; जब वे किसी गरीब व्यक्ति को देखते हैं तब उनका चेहरा तुरंत काला पड़ जाता है—उनका चेहरा कितनी जल्दी बदल जाता है! वे अमीर व्यक्ति के लिए शौच का भगोना तक उठाने को तैयार होते हैं, लेकिन गरीब व्यक्ति के लिए एक गिलास पानी तक उड़ेलने को तैयार नहीं होते। वे किस तरह के प्राणी हैं? क्या वे नीच चरित्र वाले नहीं हैं? (हाँ।) क्या ऐसे लोगों का अगुआ होना अच्छा है? (नहीं।) क्यों नहीं? वे किन तरीकों से अगुआ की भूमिका के लिए अनुपयुक्त हैं? (लोगों से पेश आने के तरीके में उनका कोई सिद्धांत नहीं होता है और उनके द्वारा लोगों का चयन और उपयोग सत्य सिद्धांतों पर आधारित नहीं होता है बल्कि इस बात पर आधारित होता है कि व्यक्ति के पास सामाजिक रुतबा और पैसा है या नहीं। अगर वे अगुआ बन जाते हैं तो वे रुतबे और पैसे वाले लोगों को पदोन्नत करेंगे। अगर जिन लोगों को पदोन्नत किया जाता है, वे बुरे लोग हों तो कलीसिया में बुरे लोगों के पास शक्ति होगी और वह एक आपदा होगी।) ऐसे लोग अगुआ बनने के लिए उपयुक्त नहीं हैं। एक बात तो यह है कि वे नीच चरित्र के होते हैं और वे जो भी करते हैं उसमें जमीर का कोई मानक नहीं होता है। दूसरी बात यह है कि अगर उन्हें अगुआ बना दिया जाए तो वे कलीसिया को समाज जैसा कुछ बना देंगे—वे जिस कलीसिया की अगुआई करेंगे, वह एक सामाजिक समूह बन जाएगी। वे उन लोगों को पदोन्नत करेंगे जो दौलतमंद और प्रभावशाली हैं, जिनके पास प्रतिष्ठा, रुतबा और जान-पहचान है और जो समाज में फलते-फूलते हैं और वे उन्हें टीम अगुआ और पर्यवेक्षक बना देंगे, जबकि वे उन किसानों, गरीबों और उन लोगों को पैरों तले रौंद डालेंगे जो कम पढ़े-लिखे हैं और मीठे-मीठे शब्द बोलने में अच्छे नहीं हैं, जिनमें अच्छी मानवता है, जिनमें काबिलियत है और जो सत्य का अनुसरण करते हैं, लेकिन निम्न सामाजिक रुतबे के हैं। क्या इससे कलीसिया ठीक समाज जैसी नहीं बन जाएगी? क्या अंतर रह जाएगा? क्या समाज में जो लोग दौलतमंद होते हैं और जिनके पास रुतबा होता है उन्हीं के पास शक्ति नहीं होती है? क्या जिन लोगों के पास प्रतिष्ठा, जान-पहचान, शक्ति और प्रभाव होता है उन्हीं के पास रुतबा नहीं होता है और वही समाज के सभी स्तरों, क्षेत्रों और समूहों में सुर्खियाँ नहीं बटोरते हैं? अगर परमेश्वर का घर समाज जैसा हो जाए तो क्या वह तब भी परमेश्वर का घर ही रहेगा? वह तब परमेश्वर का घर नहीं रहेगा और उसे कलीसिया नहीं कहा जा सकेगा—वह एक सामाजिक समूह होगा। गरीबों का तिरस्कार और अमीरों की तरफदारी करने वाले लोगों के अगुआ बनने का नतीजा बिल्कुल यही होता है। ऐसे लोग किसी भी रुतबे वाले व्यक्ति के गुलाम बन जाते हैं। मुझे बताओ, क्या गुलामों की तरह कार्य करने वाले लोगों के कोई सिद्धांत होते हैं? क्या उनके स्व-आचरण में सीमाएँ होती हैं? (नहीं।) ऐसे लोगों के स्व-आचरण में कोई सिद्धांत या सीमाएँ नहीं होती हैं। खतरनाक परिवेश का सामना करने पर वे यहूदा बन सकते हैं। अगर उनके देश का पतन हो जाए तो वे गद्दार बन जाएँगे। अगर वे सरकारी अगुआ बन जाएँ तो वे देशद्रोही बन जाएँगे। वे बिल्कुल इसी तरह के प्राणी हैं! इसलिए वे अगुआ बनने के लिए उपयुक्त नहीं हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे वास्तविक कार्य नहीं करेंगे और भाई-बहनों को नुकसान पहुँचाएँगे, उन सभी को पैरों तले रौंद डालेंगे जो सही मायने में सत्य का अनुसरण करते हैं और जिनमें मानवता है, जबकि वे उन लोगों को पदोन्नत करेंगे जो बुरी मानवता वाले हैं, जो समाज में रुतबा रखते हैं और प्रतिष्ठित और प्रभावशाली हैं; यह लोगों को पदोन्नत करने के लिए परमेश्वर के घर के सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है। अगर ऐसे लोग परमेश्वर के घर में राज करें और शक्ति रखें तो क्या कलीसिया का कार्य सुचारू और निर्बाध रूप से चल सकेगा? (नहीं।) कलीसिया का कार्य और परमेश्वर के चुने हुए लोग इन लोगों के हाथों बर्बाद हो जाएँगे। ये लोग एक-दूसरे के साथ सांठगाँठ करेंगे, एक-दूसरे का उपयोग करेंगे और एक-दूसरे को सहारा देंगे। जो भाई-बहन सत्य का अनुसरण करते हैं उन्हें हाशिए पर डाल दिया जाएगा और अलग कर दिया जाएगा—यहाँ तक कि हो सकता है कि उन सभी को बी समूहों में डाल दिया जाए या हटा दिया जाए जिससे उनके लिए कोई रास्ता नहीं बचेगा। क्या यही बात नहीं हो सकती है? (हाँ।) इन लोगों के बीच रिश्ते कैसे हैं? जब वे इकट्ठे होते हैं तब एक-दूसरे को यार बुलाते हैं, एक-दूसरे के गले में बाँहें डालते हैं और समाज में अपने गौरवशाली इतिहास की शेखी बघारते हैं, इस बारे में बात करते हैं कि वे एक-दूसरे के लिए क्या कर सकते हैं और फिर पूछते हैं कि दूसरा उनके लिए क्या कर सकता है, एक-दूसरे का उपयोग करते हैं। ये लोग समाज के लोगों से किसी भी तरह से कैसे भिन्न हैं? जब वे इकट्ठे होते हैं तब वे परमेश्वर के वचन को खाते और पीते नहीं हैं, सत्य के बारे में संगति नहीं करते हैं, अपनी व्यक्तिगत अनुभवजन्य समझ के बारे में संगति नहीं करते हैं, खुद को जानने के बारे में बात नहीं करते हैं और अपने भ्रष्ट स्वभावों का गहन-विश्लेषण नहीं करते हैं। इसके बजाय वे सिर्फ इस बारे में बात करते हैं कि समाज में उनके लिए चीजें कितनी सफल रही हैं, उन्होंने क्या चीजें कीं जिससे वे सुर्खियों में आ गए, उनके गौरवशाली इतिहास, उन्होंने किन अधिकारियों के साथ शराब पी और खाना खाया, किन अधिकारियों की खुशामद की—वे बस इन्हीं चीजों के बारे में बात करते हैं। क्या ये लोग परमेश्वर में विश्वासी हैं? वे रुतबे, पृष्ठभूमि, क्षमताओं और साधनों को लेकर एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं और साथ ही एक-दूसरे के साथ सांठगाँठ भी करते हैं और एक-दूसरे का उपयोग भी करते हैं—उनके रिश्ते ऐसे होते हैं। अगर तुम कोई आम व्यक्ति या किसान हो जो उनके लिए कुछ नहीं कर सकता है तो वे तुम्हें बेकार व्यक्ति के रूप में देखते हैं, एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो उनके ध्यान में आने के बिल्कुल लायक नहीं है, और तुम्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है। जब वे इकट्ठे होते हैं तो किस बारे में बातें करते हैं? वे इस पर चर्चा करते हैं कि कपड़ों के किस ब्रांड ने बाजार में नया आइटम पेश किया है, बाजार में कौन-सी नई कार आई है, किसने कई कैरेट का हीरा खरीदा, किसकी संपत्ति नीलाम हुई, किसके स्टॉक गिरे या चढ़े, किसकी कंपनी सार्वजनिक हुई, किसने सरकारी अधिकारियों को रिझाने की कोशिश की, किसने किस गिरोह के साथ सांठगाँठ की, किसने कितने उपहार दिए और किसी काम को करवाने के लिए कितना पैसा खर्च किया—ये सब यही चीजें हैं। मुझे बताओ, क्या यह घिनौना नहीं है? अगर वे कलीसिया में हमेशा इन चीजों के बारे में बातें करते रहेंगे तो क्या कलीसियाई जीवन और कलीसिया के कार्य में उनके द्वारा व्यवधान नहीं पड़ेगा और वे बर्बाद नहीं हो जाएँगे? मुझे बताओ, क्या ऐसे लोगों को अगुआ चुना जा सकता है? (नहीं।) वे अवसरवादी हैं। जब तुम लोगों को कलीसिया में ऐसे लोगों का पता लग जाता है तब तुम्हें उन्हें उजागर कर देना चाहिए और उन्हें दूर कर देना चाहिए—परमेश्वर का घर ऐसे लोगों को रोककर नहीं रखता है। परमेश्वर के घर में अवसरवादी लोग बस बेतरतीब ढंग से जीने और चालाकी से आशीष पाने के लिए मौजूद रहते हैं। वे सत्य बिल्कुल स्वीकार नहीं करते हैं और कोई भी सकारात्मक चीज स्वीकार नहीं करते हैं। इसके अलावा ये लोग बिना किसी ईमानदारी के अपना कर्तव्य करते हैं; वे खुद को बिल्कुल भी खपाना नहीं चाहते हैं और सिर्फ फायदे हासिल करना चाहते हैं। अगर कोई फायदे नहीं हैं तो वे कुछ भी नहीं करेंगे। जहाँ भाई-बहन अपने कर्तव्य करने और लगन से कार्य करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वहीं ये लोग अपने कर्तव्यों को नजरअंदाज कर देते हैं और खुद को निजी मामलों में व्यस्त कर लेते हैं, यहाँ तक कि खाने-पीने और मौज-मस्ती में भी लिप्त रहते हैं। वे अक्सर ऑनलाइन भी जाते हैं और उन चीजों के बारे में जानकारी हासिल करने में बहुत सारा समय बिताते हैं जो उन्हें सबसे ज्यादा पसंद हैं या जिन्हें वे सबसे ज्यादा चाहते हैं, जैसे कि फैशन, सौंदर्य, केशसज्जा और उच्च श्रेणी के स्वास्थ्य उत्पाद। वे जहाँ भी जाते हैं, वहीं धौंस जमाते हैं और दूसरों को धोखा देते हैं; वे अपनी तरह के लोगों की तलाश करते हैं और जब उन्हें अपने जैसा कोई मिल जाता है तब वे तुरंत उससे घुल-मिल जाते हैं। वे सच्चे भाई-बहनों के साथ मिलजुलकर नहीं रह सकते हैं और कलीसिया में वे असंगत और गैर-मनुष्य होते हैं। जब तुम्हें ऐसे लोग दिखाई दें तो तुम्हें उनसे दूर रहना चाहिए। इसके अलावा, अगर ज्यादातर लोगों या तुम्हारे अगुआओं में भेद पहचानने की क्षमता नहीं है और वे अब भी उन्हें सच्चा विश्वासी भाई या बहन मानते हैं तो तुम्हें उन्हें उजागर करने और दूर कर देने के लिए आगे आना होगा। अब तुम्हें समझ आया? ऐसे लोगों को दूर क्यों किया जाना चाहिए? (क्योंकि ऐसे लोग कलीसिया में आसानी से विघ्न डालते हैं, नकारात्मक परिवेश लेकर आते हैं और दूसरों को अपना कर्तव्य करने और सत्य का अनुसरण करने में प्रभावित कर सकते हैं।) बिल्कुल, वे कलीसिया का परिवेश बिगाड़ देते हैं। वे खुद सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं और दूसरों को भी प्रभावित करते हैं, उन्हें रोककर रखते हैं। एक डॉलर कीमत के कार्य के लिए वे मजदूरी में दस डॉलर माँगते हैं। ऐसे लोगों का उपयोग करना कुत्ते पालने जितना भी सार्थक नहीं है। कम-से-कम कुत्ता घर की रखवाली तो कर सकता है और अपने मालिक के प्रति वफादार हो सकता है! वह पर्दे के पीछे से कोई धूर्त चालें नहीं चलता है और तुम्हें बाद में उसके द्वारा कोई मुसीबत खड़ी किए जाने की चिंता नहीं करनी पड़ती है। अगर कलीसिया ऐसे लोगों को अनुमति दे दे जो गरीबों का तिरस्कार करते हैं और अमीरों की तरफदारी करते हैं तो क्या नतीजे होंगे? क्या वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों की मदद कर सकेंगे? क्या वे दूसरों के लिए लाभदायक हो सकेंगे? (नहीं।) एक बार जब वे बेनकाब हो जाते हैं और दूसरे लोग उनकी असलियत देख लेते हैं तो उन्हें दूर कर दिया जाना चाहिए। अगर उन्हें रहने की अनुमति दे दी जाती है तो वे सिर्फ गड़बड़ करेंगे और बाधा डालेंगे, सिर्फ मुसीबत खड़ी करेंगे और कलीसिया पर सिर्फ विपत्ति लाएँगे। अगर तुम तब तक प्रतीक्षा करोगे जब तक कि वे किसी बड़ी आपदा का कारण नहीं बन जाते और बाद में बस गड़बड़ी को साफ कर दोगे तो यह बहुत परेशानी वाली बात हो जाएगी। हम परेशानी नहीं चाहते हैं; हम खुद को चिंता से बचाए रखना पसंद करेंगे। ऐसे बहुत-से काम और कर्तव्य हैं जो लोगों को करने चाहिए—इन परेशानियों को बुलावा मत भेजो।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?