सत्य का अनुसरण कैसे करें (5) भाग पाँच
वह जो ताकतवर लोगों की खुशामद करना पसंद करता है
एक और प्रकार का व्यक्ति होता है : वह जो ताकतवर लोगों की खुशामद करना पसंद करता है। क्या वे लोग जो ताकतवर लोगों की खुशामद करते हैं, अच्छे होते हैं या बुरे? (वे बुरे होते हैं।) वे किन तरीकों से बुरे होते हैं? इस तरह का व्यक्ति बेहद नकचढ़ा होता है। जब वह किसी रुतबे वाले व्यक्ति को देखता है तब वह उसकी खुशामद करने का लगातार हर प्रयास करता है; वह उससे बात करने की पहल करता है और उसे अपने दिल की सारी बातें बताता है, उसे भोजन परोसता है, उसके कपड़े धोता है और उसके लिए सफाई करता है। ऐसा कुछ भी नहीं है जो वह करने को तैयार न हो। अगर तुम्हारा कोई रुतबा नहीं है तो वह तुम्हें नहीं देखने का ढोंग करता है और अगर तुम उसके पास जाने की पहल करते हो तो जब वह तुम्हें देखता है तब उसके चेहरे की अभिव्यक्ति तुरंत कड़वाहट में बदल जाती है। क्या ऐसे लोग अच्छे होते हैं? इस तरह की समस्या किस पहलू के तहत आती है? (इस तरह का व्यक्ति निम्न चरित्र का होता है और उसमें खराब मानवता होती है।) उसकी मानवता बुरी होती है और चरित्र निम्न। उसकी मानवता किस हद तक बुरी होती है? (उसमें कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं होती है।) क्या जो लोग सक्रियता से ताकतवर लोगों की खुशामद करते हैं, वे अच्छे लोग होते हैं? (नहीं।) तो फिर ये किस तरह के लोग होते हैं? जो लोग ताकतवर लोगों की खुशामद करना पसंद करते हैं, उनका चरित्र कैसा होता है? एक ही व्यक्ति के साथ व्यवहार करते समय उनके दो अलग-अलग चेहरे होते हैं। वे दूसरे लोगों द्वारा उनकी असलियत देख लिए जाने से नहीं डरते हैं और यहाँ तक कि अपने इन पक्षों को मुक्त भाव से प्रदर्शित भी होने देते हैं। क्या इन लोगों में सत्यनिष्ठा या शर्म की कोई भावना होती है? (नहीं।) क्या इन लोगों को जिनमें सत्यनिष्ठा या शर्म की कोई भावना नहीं होती है, बुरे लोगों के रूप में श्रेणीबद्ध किया जा सकता है? (हाँ।) उन्हें बुरे लोगों के रूप में श्रेणीबद्ध क्यों किया जा सकता है? वे जिस तरीके से दूसरों से पेश आते हैं उसमें उनके दो अलग-अलग चेहरे होते हैं। आओ, इन दो अलग-अलग चेहरों की जड़ का विश्लेषण करें। ये लोग रुतबे को विशेष रूप से पसंद करते हैं और वे उन लोगों को पसंद करते हैं जिनके पास प्रतिष्ठा होती है और जो ताकतवर हैं। जब वे रुतबे वाले लोगों को देखते हैं तब वे बहुत मुस्कुराते हैं, पूरी तरह से आज्ञाकारी बन जाते हैं; वे बिना किसी संकोच के उनकी तारीफों के पुल बाँधते हैं और उनकी खुशामद करते हैं और बेशर्मी से उनकी चापलूसी करते हैं। चाहे उनका लक्ष्य उन लोगों का मिठू बनना हो या उनका कोई छिपा हुआ मकसद हो कि उन्हें महत्व दिया जाए और पदोन्नत किया जाए, दूसरों के प्रति उनका रवैया समस्यात्मक होता है और सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। तो फिर रुतबे वाले लोगों के प्रति वे इस तरह का रवैया क्यों रखते हैं? (अपने स्वार्थों की खातिर।) इससे साबित होता है कि वे रुतबे को विशेष रूप से पसंद करते हैं। रुतबा हासिल करने के लिए खुद उनमें क्षमता की कमी होती है या उनके पास योग्यताएँ, परिस्थितियाँ या अवसर नहीं होते हैं। लेकिन रुतबे वाले लोगों की खुशामद करके और उनके करीब आकर वे रुतबे की अपनी इच्छा पूरी करने में समर्थ होते हैं। इसलिए वे बिना किसी संकोच या शर्म के दूसरों की खुशामद कर सकते हैं और उनकी चापलूसी कर सकते हैं। उनका चरित्र काफी नीच होता है। वे इस बात की परवाह नहीं करते हैं कि रुतबे वाला व्यक्ति किस तरह का व्यक्ति है और न ही वे यह भेद पहचानते हैं कि इस व्यक्ति की मानवता अच्छी है या बुरी या क्या यह व्यक्ति बुरा है। जब तक इस व्यक्ति के पास रुतबा या पैसा है तब तक भले ही वह व्यक्ति बुरा व्यक्ति हो, वे फिर भी उसकी खुशामद करेंगे। क्या वे पूरी तरह से सिद्धांतहीन नहीं हैं? (हाँ, हैं।) उनके लिए, रुतबे वाले लोग जो भी कहते हैं वह सही और अच्छा होता है और वे जिस भी तरीके से बोलते हैं वह स्वीकार्य है। जब तक किसी के पास रुतबा होता है तब तक वे उस व्यक्ति से अच्छी तरह से पेश आते हैं। उनमें सिद्धांतों की पूरी कमी होती है और वे उस व्यक्ति के प्रति असामान्य रूप से अच्छे होते हैं। उनमें सत्यनिष्ठा या शर्म की सच में कोई भावना नहीं होती है जिसका जिक्र किया जा सके। वे इस बात की परवाह नहीं करते हैं कि दूसरे लोग उन्हें कैसे देखते हैं या उनका कैसे मूल्यांकन करते हैं। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि दूसरे उनके बारे में क्या सोचते हैं। वे मन ही मन सोचते हैं, “मुझे बस रुतबे वाले लोग अच्छे लगते हैं। मैं बस उनसे अच्छी तरह से पेश आना चाहता हूँ। रुतबा होने में क्या गलत है? तुम लोग जिनके पास कोई रुतबा नहीं है इस काबिल नहीं हो कि मैं तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार करूँ!” ऐसे लोगों के पास कोई सिद्धांत या गरिमा नहीं होती है। वे न तो इस बात की परवाह करते हैं कि दूसरे उन्हें किस नजर से देखते हैं और न ही इस बात की कि परमेश्वर उनका मूल्यांकन कैसे करता है। ये नीच चरित्र वाले लोग हैं। इस तरह से कार्य करने में उनका जमीर कुछ भी महसूस नहीं करता है और उनके विवेक में निर्णय का कोई मानक नहीं होता है। उनके पास कोई न्यूनतम मानक नहीं होता है और वे जिस तरीके से आचरण करते हैं उसमें वे बहुत कमजोर होते हैं। किसी रुतबे वाले व्यक्ति के सामने आने पर वे तुरंत सिमट जाते हैं, गिड़गिड़ाते हैं और गुलाम की तरह बन जाते हैं, उनके आज्ञाकारी मातहत का पद ले लेते हैं। जिस किसी के भी पास रुतबा होता है, वही उनका मालिक बन जाता है। क्या ऐसे लोगों में सत्यनिष्ठा या गरिमा होती है? (नहीं।) वे रुतबे वाले लोगों की सबसे घिनौनी चापलूसी करने में भी सक्षम होते हैं और वे ऐसा कितने भी लोगों के सामने करने की हिम्मत करते हैं। वे दूसरों के विचारों की या इस बात की परवाह नहीं करते हैं कि दूसरे लोग उन्हें कैसे देखते हैं और वे सिर्फ अपनी खुद की इच्छाएँ संतुष्ट करने का लक्ष्य रखते हैं। वे रुतबे वाले लोगों के साथ ऐसे ही व्यवहार करते हैं। लेकिन जब कोई रुतबे वाला व्यक्ति रुतबा खो देता है तब क्या होता है? फिर वे चेहरा बदल लेते हैं। तो फिर वे उस व्यक्ति से कैसे पेश आते हैं? (वे तुरंत उसे नजरअंदाज करना शुरू कर देते हैं।) उनके चेहरे पर तुरंत कालिमा छा जाती है और उनका रवैया पूरी तरह से बदल जाता है : “तुमने अपना रुतबा खो दिया है और फिर भी तुम चाहते हो कि मैं तुमसे अच्छी तरह से पेश आऊँ? सपने देखते रहो!” अगर जिस व्यक्ति ने रुतबा खो दिया है वह उनसे एक गिलास पानी उड़ेलने के लिए कहता है तो वे उसे नजरअंदाज कर देते हैं। अगर वह उनसे हाथ बटाने के लिए कहता है तो वे उसे नजरअंदाज कर देते हैं। अगर वह उनसे दिल खोलकर बातचीत करना चाहता है तो वे कहते हैं, “क्या तुम इस लायक हो? क्या तुम्हारे पास मुझसे बात करने के लिए योग्यताएँ हैं? तुम खुद को समझते क्या हो?” उनका स्वभाव कितना क्रूर है! क्या रुतबा न होना कोई अपराध है? क्या किसी व्यक्ति को उसके आधिकारिक पद से हटा दिए जाने के बाद वह बदल जाता है? क्या वह अब भी वही व्यक्ति नहीं है? ऐसा क्यों है कि अब वह ऐसे लोगों से बात करने के लायक नहीं है? ऐसे लोग उसका हाथ क्यों नहीं बटा सकते हैं? अगर कोई जानवर मुसीबत में हो जिसे मनुष्य की मदद की जरूरत है, तब भी लोगों को अपने जमीर के बोध से उसकी मदद करनी चाहिए, उसकी देखभाल करनी चाहिए और उसका ख्याल रखना चाहिए—तो फिर मनुष्य के लिए यह कितना ज्यादा होना चाहिए? फिर भी उनमें लेशमात्र भी मानवीय दया नहीं है। इन अभिव्यक्तियों के अलावा कुछ लोग इससे भी आगे बढ़ जाते हैं। वे मन ही मन सोचते हैं, “इससे पहले मैं तुमसे अच्छी तरह से पेश आता था क्योंकि तुम्हारे पास रुतबा था। अब जब तुमने अपना रुतबा खो दिया है तब भी क्या तुम मुझसे यह उम्मीद करते हो कि मैं तुम्हारा सम्मान करूँगा और तुम्हारी लाज रखूँगा, बातचीत के दौरान तुम्हें असहज स्थिति में डालने से बचूँगा और पहले की तरह तुम्हारे आदेशों का पालन करूँगा? नामुमकिन! तुम्हें तो शुक्रगुजार होना चाहिए कि मैं तुम्हें पैरों तले कुचल नहीं रहा हूँ!” आखिर ये किस तरह के प्राणी हैं? जब कोई मुश्किल में होता है तब ये न सिर्फ उसे नजरअंदाज करते हैं, बल्कि पीठ पीछे उसे पैरों तले कुचलते भी हैं, उस पर धौंस जमाने और दबाने के मौके ढूँढ़ते रहते हैं। वे किस तरह के लोग हैं? (वे बुरे लोग हैं।) बुरे लोगों के रूप में उनका असली चेहरा इसी तरह से प्रकट होता है, है ना? रुतबे वाले लोगों के प्रति ये आज्ञाकारी मातहतों जैसा व्यवहार करते हैं, सटीक और उचित व्यवहार करते हैं और मुस्कुराहट के साथ उनका अभिवादन करते हैं। वे चापलूसी से दूसरों के साथ सहमत होने में माहिर होते हैं। अगर कोई अधिकारी कहता है कि चाँद पर आलू उगाए जा सकते हैं तो वे भी बोल पड़ेंगे, “चाँद पर उगाए गए आलू वाकई बहुत स्वादिष्ट होते हैं!” लेकिन जब वह अधिकारी अपना रुतबा खो देता है तब उनका रवैया पूरी तरह से बदल जाता है। अब वह पूर्व अधिकारी चाहे कुछ भी कहे, अगर वह सही भी हो तो भी वे उसकी बात नहीं मानेंगे। भले ही इस पूर्व अधिकारी में सच्ची समझ हो, वे उसे नजरअंदाज कर देते हैं और उसे स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं और उन्हें वह सिर्फ अप्रिय ही लगता है। अपने दिलों में वे सोचते हैं, “तुम्हारा कोई रुतबा नहीं है, इसलिए तुम्हारी कही कोई भी बात मायने नहीं रखती है। भले ही तुम जो कहते हो वह सही हो, तो भी उसका क्या फायदा है? भले ही तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता हो, तो भी मैं तुम्हें पसंद नहीं करता। मुझे बस बिना रुतबे वाले लोगों को पैरों तले कुचलने में मजा आता है—अगर मैंने उन्हें पैरों तले नहीं कुचला तो यह मौका बरबाद करना होगा!” वे किस किस्म के प्राणी हैं? अगर तुम्हारा कोई रुतबा नहीं है तो तुम उन्हें अप्रिय लगते हो। तुम उनके साथ चाहे कितनी भी अच्छी तरह से पेश आओ, यह बेकार है। तुम चाहे उन्हें अपने समान स्तर पर रखो और उनसे सिद्धांतों के अनुसार पेश आओ, इससे तुम्हारे प्रति उनका रवैया नहीं बदल सकता है। क्या ऐसे लोगों में मानवता होती है? (नहीं।) उनमें मानवता की कमी की अभिव्यक्ति क्या है? क्या यह क्रूरता नहीं है? (हाँ।) जो लोग ताकतवर लोगों की खुशामद करना पसंद करते हैं, उनका स्वभाव अत्यंत क्रूर होता है और मुझे बस ऐसे लोग बेहद घिनौने लगते हैं। ऐसे लोगों की नजर में जब तुम्हारे पास रुतबा होता है तब तुम्हारी सारी कमियाँ और दोष तुम्हारे गुणों और मजबूत पक्षों के रूप में देखे जाते हैं। लेकिन जब तुम्हारे पास कोई रुतबा नहीं होता है तब तुम्हारे सारे गुण और मजबूत पक्ष कमियों और दोषों के रूप में देखे जाते हैं। तुम्हारी कही कोई भी बात मायने नहीं रखती है और उन्हें तुम्हारे बारे में हर चीज अप्रिय लगती है। वे हमेशा तुम पर धौंस जमाना, तुम्हें पैरों तले कुचलना और दबाना चाहते हैं। वे क्रूर स्वभाव वाले होते हैं, है ना? (हाँ।) वे बिना रुतबे वाले लोगों पर जैसे चाहें वैसे धौंस जमाते हैं। उन्हें लगता है कि सीधे-साधे लोगों पर धौंस नहीं जमाना पाप है। भले ही तुमने उन्हें उकसाया न हो, फिर भी वे सक्रियता से तुम्हारी गलतियाँ ढूँढ निकालेंगे, तुम पर धौंस जमाएँगे और तुम्हें पैरों तले कुचल देंगे, घोर तिरस्कार से तुम्हें नीची नजर से देखेंगे। यह ऐसा है मानो कोई रुतबा नहीं होना पाप हो, जो तुम्हें जीने या उनकी मौजूदगी में रहने के अयोग्य बनाता है; मानो अगर तुम्हारे पास कोई रुतबा न हो तो तुम खुद अपने लिए मुसीबत ले आए हो और बदकिस्मती के लायक हो। वे किस किस्म के प्राणी हैं? क्या ऐसे लोगों को कलीसिया में रहने की अनुमति देनी चाहिए? (नहीं।) क्या ऐसे लोगों को जो ताकतवर लोगों की खुशामद करना विशेष रूप से पसंद करते हैं अगुआ चुना जा सकता है? (नहीं।) क्यों नहीं? वे रुतबे वाले लोगों के साथ ठीक इसी तरह से व्यवहार करते हैं—अगर खुद उन्हें रुतबा हासिल हो जाए तो क्या वे तानाशाह नहीं बन जाएँगे, खुद को सर्वोच्च नहीं बना लेंगे? यह विनाशकारी होगा! वे परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं, कलीसिया के प्रशासनिक आदेशों और भाई-बहनों के सुझावों को नजरअंदाज करेंगे और यहाँ तक कि बिना रुतबे वाले लोगों को भी दबाएँगे चाहे उन्होंने कुछ भी कहा या किया हो। वे कलीसिया को बरबाद कर देंगे। ऐसे लोगों में ताकत की अत्यधिक तेज इच्छा होती है और एक बार जब उन्हें वह चीज मिल जाती है जो वे चाहते हैं तब होने वाले नतीजों की कल्पना करना असंभव है। जो लोग ताकतवर लोगों की खुशामद करते हैं, वे विशेष रूप से क्रूर होते हैं और विशेष रूप से नीच चरित्र वाले होते हैं। उनके भ्रष्ट स्वभाव की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? (क्रूरता।) दुष्टता, क्रूरता और सत्य से विमुखता। विशेष रूप से दुष्टता यह है कि किस तरह से वे एक ही व्यक्ति से पेश आने के लिए दो पूरी तरह से अलग-अलग चेहरों का उपयोग करते हैं और बेहद जल्दी बदल जाते हैं। क्या यह दुष्ट नहीं है? (हाँ।) भले ही बिना रुतबे वाले लोग उन्हें न उकसाएँ, फिर भी वे उन पर हमला करने, उन पर धौंस जमाने और उन्हें रौंद डालने की पहल करेंगे। क्या यह क्रूर नहीं है? (हाँ।) चाहे दूसरे व्यक्ति के पास रुतबा हो या न हो, वे सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं कर सकते हैं या उनसे निष्पक्षता से पेश नहीं आ सकते हैं। जब तुम उनसे कहते हो, “परमेश्वर के घर में सत्य के पास शक्ति होती है और लोगों से निष्पक्षता से पेश आया जाता है” तब क्या वे इसे स्वीकारते हैं? (नहीं।) यह बात बस एक कान में प्रवेश करती है और दूसरे से निकल जाती है, और वे सोचते हैं, “यह कैसी निष्पक्षता है? लोग या तो ऊँचे होते हैं या नीचे, कुलीन होते हैं या नीच। रुतबे वाले लोग कुलीन होते हैं; रुतबे से रहित लोग बेकार कचरा होते हैं!” लोगों को देखने और उनसे पेश आने का उनका तर्क और सिद्धांत यही है। वे सत्य सिद्धांतों को स्वीकार नहीं करते हैं और अब भी अपना विकृत तर्क बोलते हैं। क्या वे सत्य से विमुख नहीं हैं? (हाँ।) वे सांसारिक आचरण के अपने खुद के तर्क और सिद्धांतों का उपयोग करते हुए और सांसारिक व्यवहार पर अपने स्वयं के परिप्रेक्ष्यों का उपयोग करते हुए, रुतबे और शक्ति के साथ पेश आते हैं, और इन मामलों को सँभालने के लिए लोगों से कैसे पेश आना है इसके लिए परमेश्वर के घर की अपेक्षाओं और सिद्धांतों की जगह सांसारिक आचरण के अपने खुद के सिद्धांतों और विधियों का उपयोग करते हैं। क्या यह सत्य को स्वीकार नहीं करना, सत्य का खुलेआम विरोध करना नहीं है? वे अपने दिलों में सोचते हैं, “अगर तुम्हारे पास रुतबा है तो मेरे दिल में तुम्हीं बॉस हो।” उनके दिलों में परमेश्वर और सत्य के लिए कोई जगह नहीं होती है। यह किस तरह का स्वभाव है? इतना दबंग होना और इतना मूर्खतापूर्वक जिद्दी होना—क्या यह सत्य नहीं स्वीकार करना नहीं है? क्या यह सत्य से विमुख होना नहीं है? (हाँ।) यह बिल्कुल ऐसा ही स्वभाव है। अकेले अपनी मानवता के लिहाज से ऐसे लोग नीच चरित्र वाले होते हैं, सरासर घिनौने होते हैं और मेलजोल रखने के लायक नहीं होते हैं। लेकिन उनके स्वभाव के लिहाज से यह सिर्फ इस बात का मामला नहीं है कि वे मेलजोल रखने लायक हैं या नहीं। ये लोग क्रूर, दुष्ट स्वभाव वाले होते हैं और ये उद्धार के लक्ष्य नहीं हैं। इन सभी को सज़ा दी जाएगी और ये मर जाएँगे; इनके कर्म मौत की सज़ा के योग्य अपराध हैं। ये लोग ताकतवर लोगों की आँख मूँदकर खुशामद करते हैं और गोद में बैठने वाले कुत्तों जैसा ताबेदार व्यवहार प्रदर्शित करते हैं, जो कि घिनौना है। कलीसियाई अगुआओं के रूप में ऐसे लोग खतरा हैं। अगर तुम लोग ऐसे लोगों को कलीसियाई अगुआ चुनते हो तो तुम लोगों पर विपत्ति आएगी। कुछ जिला अगुआ मूर्ख होने और लोगों की असलियत देखने में असमर्थ होने के कारण इस प्रकार के लोगों को कलीसियाई अगुआ के लिए उम्मीदवार भी नामित कर देते हैं जिसके फलस्वरूप कलीसिया के भाई-बहन धोखा खा जाते हैं। इस प्रकार के लोग, जो दूसरों के तलवे चाटने और ताकतवर लोगों की खुशामद करने में अच्छे होते हैं, और जो बाहर से बहुत जोशपूर्ण दिखते हैं और अगुआओं की हर बात मानते हैं, वे आसानी से उम्मीदवारों के रूप में चुन लिए जाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि कुछ अगुआ और कार्यकर्ता उन लोगों को पसंद करते हैं जो उनके तलवे चाटते हैं और चापलूस होते हैं और वे उन नतीजों की असलियत नहीं देख पाते हैं जो इस प्रकार का पाखंडी व्यक्ति एक बार अगुआ बनते ही कलीसिया पर लेकर आएगा। अक्सर जब ऐसे लोग चुन लिए जाते हैं और उन्हें रुतबा हासिल हो जाता है तब उनका द्वेषपूर्ण पक्ष तुरंत बाहर आ जाता है और वे कलीसिया में बाधा डालना शुरू कर देते हैं। जिन अगुआओं ने उन्हें चुना था वे जब यह देखते हैं कि उन्होंने जिन लोगों को चुना वे बुरे लोग हैं, तब उन्हें पछतावा होता है, लेकिन वे उन नतीजों को ठीक नहीं कर सकते हैं जो उनके क्रियाकलाप कलीसिया पर लेकर आए हैं। यह पूरी तरह से अगुआओं और कार्यकर्ताओं के भ्रष्ट स्वभावों और बिना सिद्धांतों के कार्य करने का नतीजा है। जो लोग रुतबे और शक्ति का सम्मान करते हैं, वे सत्य से प्रेम करने वाले लोग नहीं होते हैं। वे ऐसे किसी भी व्यक्ति की खुशामद करते हैं जिसके पास रुतबा होता है और जब भी वे अगुआओं और कार्यकर्ताओं को देखते हैं तब वे चापलूसी भरी मुस्कान ओढ़ लेते हैं। कुछ अगुआ इस प्रलोभन का सामना नहीं कर पाते हैं; जब वे चापलूसी भरी मुस्कान वाले लोगों को देखते हैं तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता और वे अपनी खुद की सक्षमता दिखाने के लिए उन्हें पदोन्नत करना चाहते हैं। दरअसल जब वे लोग उनकी चापलूसी करते हैं और उन्हें चापलूसी भरी मुस्कान देते हैं तब उनके भयावह मकसद होते हैं, लेकिन ये अगुआ सोचते हैं कि वे लोग सच में अच्छे हैं। एक बार जब वे लोग अगुआ बन जाते हैं तब वे किसी के प्रति समर्पण नहीं करते हैं और उन्हीं अगुआओं को नजरअंदाज कर देते हैं जिन्होंने उन्हें पदोन्नत किया था। सिर्फ तब जाकर उन अगुआओं को एहसास होता है कि ये लोग अच्छे नहीं हैं और उन्होंने गलत लोगों को पदोन्नत किया। ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए? क्या इस स्थिति को ठीक नहीं करना चाहिए? (हाँ।) इसे कैसे ठीक करना चाहिए? (इन लोगों को तुरंत उजागर कर देना चाहिए और फिर बर्खास्त कर देना चाहिए।) ये लोग वास्तविक कार्य नहीं कर सकते हैं; ये बस भ्रमित लोग हैं जो सिर्फ उन लोगों की खुशामद करना और उनकी चापलूसी करना जानते हैं जिनके पास शक्ति है। अगुआओं को उन्हें तुरंत बर्खास्त कर देना चाहिए और इस बात का पछतावा करना चाहिए कि उस समय वे आँखों और दिल दोनों से अंधे थे और लोगों का भेद पहचानने में असमर्थ थे, इसलिए उन्होंने गलत लोगों को चुन लिया। अब परिस्थिति को तुरंत ठीक करने का अभी भी समय है। क्या अब तुम ऐसे लोगों की असलियत देखने में समर्थ हो जो ताकतवर लोगों की खुशामद करते हैं? (हाँ।) ऐसे लोग किसी भी तरह से अच्छे नहीं होते हैं।
असाधारण याददाश्त होना
चलो, अब हम उन अभिव्यक्तियों के बारे में बात करें जिनमें जन्मजात स्थितियाँ शामिल हैं। असाधारण याददाश्त होना—यह अभिव्यक्ति किस पहलू के तहत आती है? (जन्मजात स्थितियों के।) विशेष रूप से अच्छी याददाश्त होना, चीजों को सटीकता से याद रखना, लेखों, परमेश्वर के वचनों के अंशों, भजनों या किसी कार्य-व्यवस्था को विशेष रूप से स्पष्टता और सटीकता से याद रखना—इसे किस पहलू के तहत आना चाहिए? (अच्छी काबिलियत के—जो कि जन्मजात स्थिति है।) यह जन्मजात स्थिति है। जहाँ तक यह प्रश्न है कि यह जन्मजात स्थितियों के किस विशिष्ट पहलू से संबंधित है, तो मुझे लगता है कि इसे काबिलियत के तहत नहीं आना चाहिए। अगर यह सिर्फ अच्छी याददाश्त होना, चीजों को याद रखने में समर्थ होना, बहुत सारी चीजें याद रखना, सटीकता से याद रखना और चीजों को दृढ़ता से याद रखना है तो यह ज्यादा-से-ज्यादा जन्मजात खूबियों, प्रतिभाओं और क्षमताओं की श्रेणी में आता है। जहाँ तक यह प्रश्न है कि व्यक्ति की काबिलियत अच्छी है या नहीं, तो यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी बोध क्षमता कैसी है। अगर किसी के पास असाधारण रूप से अच्छी याददाश्त है, जो गीत के बोल के किसी हिस्से को, ज्ञान और धर्म-सिद्धांत के किसी खंड को या किसी व्यावसायिक कौशल को विशेष रूप से अच्छी तरह से, विशेष रूप से जल्दी से और विशेष रूप से दृढ़ता से याद कर सकता है, लेकिन वह जो याद करता है वह सिर्फ कुछ निर्देशात्मक और कड़ी चीजें होती हैं जिनमें सत्य सिद्धांत शामिल नहीं हैं और जिन्हें वास्तविक जीवन या कार्य में लागू या कार्यान्वित नहीं किया जा सकता है—अगर उसके पास सिर्फ अच्छी याददाश्त ही है—तो यह सिर्फ उसकी जन्मजात स्थितियों के भीतर एक खूबी और क्षमता है, यह उसकी काबिलियत के स्तर तक नहीं बढ़ती है। जैसा कि हमने पहले चर्चा की, काबिलियत क्या है? (चीजें करने में दक्षता और प्रभावशीलता।) अगर तुम्हारे पास अच्छी याददाश्त है और अच्छी काबिलियत भी है तो तुममें किस प्रकार की अभिव्यक्तियाँ और विशेषताएँ होनी चाहिए? वह यह है कि तुम्हारे द्वारा सुनी जाने वाली चीजों के संबंध में, सटीकता से याद रखने में समर्थ होने के आधार पर, तुम मुख्य बिंदुओं पर भी पकड़ बना सकते हो, सिद्धांत ढूँढ़ सकते हो, अभ्यास का मार्ग और कार्यान्वयन की योजना ढूँढ़ सकते हो और फिर वास्तविक जीवन और कार्य में इन्हें वास्तव में लागू कर सकते हो, चीजों को दक्षता और प्रभावशीलता से कर सकते हो। इसका मतलब है कि तुमने परमेश्वर के जिन वचनों और सत्य सिद्धांतों को याद किया है वे सैद्धांतिक स्तर पर नहीं रह जाते हैं, बल्कि तुम्हारे कर्तव्य के निर्वहन में कार्यान्वित होते हैं और तुम्हारी सत्य वास्तविकता बन जाते हैं जिससे कार्य में ऐसे नतीजे उत्पन्न होते हैं जिन्हें लोग देख सकते हैं और कार्य की दक्षता में सुधार होता है। यह सिर्फ अच्छी याददाश्त होना ही नहीं बल्कि अच्छी काबिलियत होना भी है। ऐसी बात नहीं है कि अच्छी याददाश्त होना अच्छी काबिलियत होने के समान है। बल्कि, बोध क्षमता होना, जब तुम्हारे साथ चीजें होती हैं तब सत्य की तलाश करने और सत्य का अभ्यास करने के सिद्धांतों को ढूँढ़ने में समर्थ होना और बिना किसी विचलन के कार्य को कार्यान्वित करना और ऐसा सटीकता से, जल्दी से और प्रभावशीलता से करना—सिर्फ यही अच्छी काबिलियत होना है। अच्छी काबिलियत कुछ धर्म-सिद्धांतों को समझने और फिर उनमें से ढेरों को बोल देने में समर्थ होने के बारे में नहीं है। बल्कि यह कुछ सत्य सिद्धांतों को समझने और उन पर पकड़ बनाने और फिर अपने कार्य और कर्तव्य में लचीले ढंग से उनको लागू करने, उन्हें अपने वास्तविक जीवन का हिस्सा बनाने और उन्हें सिद्धांत से वास्तविकता में बदलने में समर्थ होने के बारे में है जो सत्य सिद्धांत को लोगों पर प्रभाव डालने और नतीजे हासिल करने की अनुमति देता है जिससे लोगों को लाभ और सुविधाएँ मिलती हैं। काबिलियत होने का यही मतलब है। अगर तुम शब्दों और धर्म-सिद्धांतों को समझने के स्तर पर ही अटक जाते हो और कार्य को कार्यान्वित नहीं कर सकते हो और तुम सिद्धांत या साधन नहीं ढूँढ़ सकते हो—यानी अगर सत्य सिद्धांत का यह पहलू तुम्हारे लिए हमेशा बस एक सिद्धांत बनकर रह जाता है और तुम्हारे पास इसे वास्तविकता में बदलने का कोई तरीका, कोई विधि और कोई मार्ग नहीं होता है—तो इसका यही मतलब है कि तुममें कोई काबिलियत नहीं है या तुममें खराब काबिलियत है। तुम्हारी याददाश्त चाहे कितनी भी अच्छी हो, अगर वह सामान्य लोगों की याददाश्त से बढ़कर लगभग असाधारण क्षमता वाली होने की हद तक भी पहुँच जाती हो तो भी इसका मतलब यह नहीं है कि तुममें अच्छी काबिलियत है। अच्छी काबिलियत का क्या मतलब है? काबिलियत का मूल्यांकन कैसे किया जाता है? (इसका फैसला इस बात से किया जाता है कि व्यक्ति कार्य के सिद्धांतों को समझ सकता है या नहीं और नतीजे हासिल करने के लिए उन सिद्धांतों को उचित ढंग से कार्यान्वित कर सकता है या नहीं।) इसका फैसला दक्षता और प्रभावशीलता से होता है, है ना? (हाँ।) कुछ लोग कार्य-व्यवस्थाओं को जल्दी से और सटीकता से याद कर सकते हैं और वे उन्हें सैद्धांतिक रूप से भी समझ सकते हैं। हालाँकि जब कार्यान्वयन की बात आती है तब अगर कोई उनसे पूछता है, “यह कार्य कैसे किया जाना चाहिए? क्या तुम्हारे पास कोई विचार, योजना या चरण है?” तो वे उत्तर देते हैं, “नहीं, मुझे नहीं पता कि इसे कैसे करना है।” यह काबिलियत होना नहीं है। ज्यादा-से-ज्यादा यह किसी एक क्षेत्र में सिर्फ एक खूबी है। मुझे याद है कि जब हमने पहली बार इस विषय पर संगति की थी तब हमने इस मुद्दे पर चर्चा की थी। शायद तुम लोग भूल गए हो और इस बार तुमने फिर से असाधारण याददाश्त को काबिलियत के तहत श्रेणीबद्ध कर दिया। हमेशा व्यक्ति की खूबियों और प्रतिभाओं को गलत समझना और हमेशा किसी विशेष खूबी या प्रतिभा को अच्छी काबिलियत के तहत श्रेणीबद्ध करना एक गंभीर त्रुटि है। अगर यह समस्या सुलझ जाती है और तुम लोग समझ जाते हो कि खूबी क्या है, प्रतिभा या क्षमता क्या है और सच्ची काबिलियत क्या है तो यह लोगों का भेद पहचानने में और तुम्हारे अपने जीवन विकास में लाभदायक होगा। कम-से-कम यह तुम्हारे अहंकारी स्वभाव पर थोड़ी लगाम लगाने में तुम्हारी मदद कर सकता है ताकि तुम गलती से अब और यह विश्वास न करो कि तुममें श्रेष्ठ काबिलियत बस इसलिए है क्योंकि तुम अच्छा गा या नाच सकते हो। तो क्या तुम इस मामले का अब भी इसी तरीके से मूल्यांकन कर सकते हो? (नहीं।) तो फिर जो लोग गा सकते हैं, उनमें अच्छी काबिलियत होने के लिए वास्तव में क्या होना चाहिए? (उनमें बोध क्षमता होनी चाहिए, उन्हें यह पता होना चाहिए कि किस तरीके से किया गया गायन सिद्धांतों के अनुरूप है और उनमें अनुभूति क्षमता भी होनी चाहिए।) अनुभूति क्षमता बहुत ही जरूरी है। देखो, ये सभी लोग संगीत के कुछ सिद्धांत जानते हैं, लेकिन उनके गायन के प्रभाव में अंतर होता है। कुछ लोग अनुभव कर सकते हैं और गायन के लिए एक मार्ग तलाश सकते हैं। वे विभिन्न लोगों के विभिन्न गीतों, विभिन्न धुनों और विभिन्न गायन शैलियों को सुनते हैं और कौन-सी गायन तकनीकें भावुक करने वाली और आनंददायक हैं इस बात के लिए कान लगाकर सुनते हैं। उन्हें इस प्रक्रिया से एक खास अनुभूति मिलती है और फिर वे उस अनुभूति के आधार पर खोजबीन करना और प्रशिक्षण लेना जारी रखते हैं। कुछ समय बाद उन्हें लगता है कि उनके गायन में सुधार हुआ है और दूसरे लोग इसे सुनने को तैयार होते हैं। धीरे-धीरे वे इसकी तुलना सिद्धांतों से करते हैं और पुष्टि करते हैं कि अभ्यास का यह मार्ग सही है। वे अपने गायन के तरीके को बदलने और अपनी पिछली गलत गायन विधियों को ठीक करने के लिए अभ्यास के मार्ग का पता लगाने में समर्थ होते हैं। फिर वे अपने द्वारा बनाए गए अच्छे, सही, सकारात्मक तत्वों को आगे अपने गायन में कार्यान्वित और लागू कर सकते हैं। वे बूझ सकते हैं कि गायन का कौन-सा तरीका सही है और कौन-सा गलत और किस तरीके का गायन अच्छी अनुभूति और किस तरीके का गायन बुरी अनुभूति उत्पन्न करता है। यह अच्छी काबिलियत होना है। अगर उनके पास सिर्फ सैद्धांतिक ज्ञान है और वे सिद्धांत को अपने वास्तविक गायन से नहीं जोड़ सकते हैं और उनकी समझ विकृत है तो उनकी काबिलियत अच्छी नहीं है। ऐसे कुछ लोगों को देखो जो गाते हैं—जब दूसरे उन्हें ध्यान दिलाते हैं कि वे कृत्रिम स्वर का उपयोग कर रहे हैं तब वे इसे स्वीकार सकते हैं और एक-दो वर्ष के प्रशिक्षण के बाद इसे सुधार सकते हैं। वैसे तो वे अभी तक गायन में बहुत निपुण नहीं हुए हैं, फिर भी वे पहले से ही अपने मौलिक स्वर और असली आवाज में गा रहे होते हैं। दूसरी तरफ, कुछ लोग कृत्रिम आवाज में गाते हैं और यह बात उन्हें सुनने वाले हर व्यक्ति को स्पष्ट होती है, फिर भी उन्हें लगता है कि वे अपनी असली आवाज में, अपने मौलिक स्वर और आवाज में गा रहे हैं, वे इस अंतर का भेद पहचानने में असमर्थ होते हैं। यह काबिलियत की गैर-मौजूदगी, अनुभूति क्षमता की गैर-मौजूदगी और चीजों को बूझने में असमर्थता को दर्शाता है। काबिलियत और खूबी में यही अंतर है। अगर तुम गायन में प्रतिभाशाली हो तो यह तुम्हारी खूबी है; यह जन्मजात स्थिति है। लेकिन क्या तुम अच्छा गा सकते हो और इस क्षेत्र और इस पेशे के सार, सिद्धांतों और मुख्य तकनीकों को बूझ सकते हो, यह तुम्हारी काबिलियत का मामला है। अगर तुम सार, मुख्य तकनीकों और सिद्धांतों को बूझ सकते हो तो तुम गायक, एक माहिर गवैये बन सकते हो। अगर तुम्हें गायन में आनंद आता है, तुम इसे जल्दी सीख लेते हो और सुर, लय और स्वर के उतार-चढ़ाव में सटीकता से महारत हासिल कर लेते हो तो इसे सिर्फ जन्मजात खूबी और इस विशेष पेशेवर कौशल में अच्छा होना कहा जा सकता है। लेकिन अपनी औसत और सीमित काबिलियत के कारण तुम हमेशा इसमें सिर्फ अच्छे होने की सीमा के भीतर ही बने रहोगे। तुम मुख्य तकनीकों में महारत हासिल करने के स्तर तक पहुँचने में असमर्थ होगे और तुम एक सच्चे गायक और माहिर गवैये बनने में असमर्थ होगे। यह तुम्हारी काबिलियत द्वारा लगाई गई सीमा है। अच्छी काबिलियत वाले लोगों में विकास की संभावनाएँ और गुंजाइश होती है जबकि औसत या खराब काबिलियत वाले लोगों में विकास की कोई संभावना या गुंजाइश नहीं होती है। इसलिए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारी खूबियाँ किस क्षेत्र में हैं, अगर तुम्हारी काबिलियत खराब है तो तुम अनिवार्यतः अपनी काबिलियत द्वारा सीमित रहोगे। तुम किसी क्षेत्र में चाहे कितने भी प्रतिभाशाली हो, तुम्हें वह चाहे कितना भी पसंद हो या तुम्हारी रुचि चाहे कितनी भी ज्यादा हो, अपनी खराब काबिलियत के कारण तुम्हारे विकास की कोई संभावना नहीं रहेगी क्योंकि तुम अपनी काबिलियत से आगे नहीं बढ़ सकते। तुम समझ रहे हो? (हाँ।) अब जब मैंने यह कह दिया है तब क्या तुम लोग गायन में आत्मविश्वास खो दोगे? मैं तो बस अभी के मामले पर बात कर रहा हूँ, काबिलियत और खूबियों के बीच के अंतर के बारे में संगति करने के लिए उदाहरण के रूप में तुम लोगों की एक खूबी का उपयोग कर रहा हूँ। लेकिन परमेश्वर का घर तुम लोगों से सच्चे माहिर गवैये बनने, किसी उच्च स्तर की सटीकता से गाना गाने, एक विशेष गायन शैली विकसित करने या गायन में बड़ी सफलता हासिल करने की अपेक्षा नहीं करता है। इनकी जरूरत नहीं है। बस अपनी मौजूदा काबिलियत और खूबियों का अच्छा उपयोग करो—यह ठीक है। जब तक सच्ची भावनाओं और ईमानदारी की अभिव्यक्ति मौजूद है तब तक वह पर्याप्त है। अब सिर्फ इसलिए निराश मत हो या हार मत मानो क्योंकि मैंने कहा कि तुममें से कुछ लोगों में खराब काबिलियत है या बहुत औसत काबिलियत है जिसके विकास की ज्यादा गुंजाइश नहीं है। यह अनावश्यक है। क्या तुम लोग निराश होगे? (नहीं।) तुम्हें इस मामले को सही ढंग से देखना चाहिए। अगर मैं तुम्हारी परिस्थितियों का उदाहरण के रूप में उपयोग नहीं करता तो शायद तुम लोगों को यह समझ नहीं आता, तुम लोगों को पूरी समझ नहीं मिल पाती और मैं जो कुछ भी कहता, उसे तुम दिल पर नहीं लेते। तुम लोगों को पूरी तरह से समझने में मदद करने के लिए मुझे कुछ उदाहरण देने ही पड़े ताकि सभी के पास बेहतर समझ हो सके। इस तरीके से काबिलियत और खूबियों के बीच के अंतर की तुम लोगों की समझ भी ज्यादा सटीक हो जाएगी। क्या तुम लोगों को इस तरीके की संगति से आपत्ति है? (नहीं, हमें आपत्ति नहीं है।) यह अच्छी बात है कि तुम्हें आपत्ति नहीं है। इसे सही ढंग से देखो। जैसे तुम्हें अभ्यास करना चाहिए वैसे अभ्यास करो। इसमें अपना दिल लगा देना और एक अच्छे लक्ष्य और दिशा की तरफ अभ्यास करना प्रगति नहीं करने या अपने पुराने तरीकों से चिपके रहने से हमेशा बेहतर होगा। भले ही तुम्हारी काबिलियत सीमित या खराब हो, तुम्हें फिर भी अभ्यास करने का प्रयास करने और अपनी सीमित काबिलियत के दायरे में अधिकतम हासिल करने के लिए मेहनत करने की जरूरत है। हमें अपने पूरे दिल और हमारे भरसक प्रयास समर्पित करने होंगे, जिम्मेदारी और निष्ठा के रवैये से इस कर्तव्य को करना होगा और इस कार्य को पूरा करना होगा। तुम्हें अभ्यास के इसी सिद्धांत का पालन करना चाहिए। तुम्हें सिर्फ इसलिए नकारात्मक नहीं हो जाना चाहिए या हार नहीं मान लेनी चाहिए क्योंकि तुम्हारी खूबी में विकास की कोई संभावना नहीं है और तुम भविष्य में सुर्खियाँ बटोरने में समर्थ नहीं होगे। यह स्वीकार्य नहीं है और यह स्पष्ट रूप से वह सत्य सिद्धांत नहीं है जिसका तुम्हें इस मामले के साथ पेश आने में पालन करना चाहिए। तुम समझ रहे हो? (हाँ।)
इन तीनों क्षेत्रों—जन्मजात स्थितियाँ, मानवता और भ्रष्ट स्वभाव—के भीतर ऐसे बहुत-से विशिष्ट विवरण हैं जिन्हें समझने की जरूरत है। क्या इन मामलों पर संगति करना हमारे लिए जरूरी है? (हाँ।) कई पहलुओं के बारे में लोगों के पास सिर्फ सतही समझ होती है और वे उन्हें स्पष्ट रूप से नहीं समझा सकते हैं। हो सकता है कि उनमें कुछ खूबियाँ हों और फिर वे सोचें कि वे नेक चरित्र वाले हैं, वे खुद को सम्माननीय और भ्रष्ट स्वभावों से मुक्त, अच्छी मानवता और उच्च काबिलियत वाला मानें। यह सब कुछ लोगों की इन विभिन्न मुद्दों का स्पष्ट रूप से भेद पहचानने में असमर्थता से उत्पन्न होता है। इन मुद्दों में जितने ज्यादा विवरण शामिल होते हैं, संगति करने के लिए उतनी ही ज्यादा चीजें होती हैं; इसे सिर्फ एक-दो सत्रों में समाप्त नहीं किया जा सकता है, बल्कि इसके लिए कई संगतियों की जरूरत होती है। तो ठीक है, आज के लिए यह संगति हम यहीं समाप्त करेंगे। अलविदा!
14 अक्टूबर 2023
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