सत्य का अनुसरण कैसे करें (7) भाग छह
लोगों की काबिलियत का मूल्यांकन करने में इस्तेमाल होने वाली विभिन्न क्षमताओं की इन विशिष्ट अभिव्यक्तियों के बारे में सुनने के बाद तुम अपना मूल्यांकन करते हो और पाते हो कि ज्यादा-से-ज्यादा तुममें बस औसत काबिलियत है, तुम अच्छी काबिलियत होने के स्तर तक नहीं पहुँचते हो। तो, वे कौन लोग हैं जो अच्छी काबिलियत के स्तर तक पहुँचते हैं? ये वे लोग हैं जिनका उपयोग पवित्र आत्मा द्वारा किया जाता है। अगर परमेश्वर तुम्हें अच्छी काबिलियत देता है तो तुम्हें वही जिम्मेदारी उठानी चाहिए जो अच्छी काबिलियत से मेल खाती हो। अगर तुम्हें ऐसी जिम्मेदारी उठाने की कोई जरूरत नहीं है तो यह ही काफी अच्छी बात है कि परमेश्वर ने तुम्हें औसत काबिलियत दी है—यह परमेश्वर का अनुग्रह है। अगर परमेश्वर तुम्हें औसत काबिलियत देता है तो तुम बहुत बड़ा कार्य नहीं कर सकते, इसलिए तुम घमंडी नहीं बन सकते। यह तुम्हारे लिए सुरक्षा है। तुम्हें दी गई औसत काबिलियत के चलते तुम्हारे पास ऐसी कोई पूँजी नहीं है जिससे तुम शेखी बघार सको और न ही तुम कोई बहुत बड़ा योगदान दे सकते हो। तुम्हें हमेशा यह सोचने की जरूरत है, “मेरी काबिलियत औसत है; मैं इस क्षेत्र में अच्छा नहीं हूँ और न ही उस क्षेत्र में। मुझे सावधान रहना चाहिए और अपना कर्तव्य करने में सत्य सिद्धांतों की तलाश करनी चाहिए।” जब तुम्हें लगता है कि तुममें सभी पहलुओं में कमी है, तब तुम और ज्यादा शिष्ट और नियमों का पालन करने वाले व्यक्ति बन जाते हो और ज्यादा शांत हो जाते हो। उदाहरण के लिए, चाहे तुम लोग कोई भी कार्य करते हो, चाहे तुम पर्यवेक्षक हो या कोई साधारण सदस्य, अगर एक खास अवधि के दौरान तुम्हारा कार्य अपेक्षाकृत सुचारू रूप से चलता है, कुछ नतीजे देता है और उपलब्धियाँ अपेक्षाकृत उत्कृष्ट हैं और तुम्हें ऊपरवाले से अभिपुष्टि मिलती है, तो तुम्हारी मानसिकता क्या होगी? (हम आत्म-संतुष्ट हो जाएँगे, यह महसूस करेंगे कि हम अच्छे हैं और अब आसानी से सत्य की तलाश नहीं करेंगे।) फिर तुम्हारे लिए नियमों का पालन करना और आचरण करने में व्यावहारिक बने रहना कठिन हो जाएगा। यह तुम्हारे लिए बहुत ही खतरनाक प्रलोभन है; यह अच्छा संकेत नहीं है। लेकिन चूँकि तुममें विभिन्न क्षमताओं की कमी है या तुम्हारी विभिन्न क्षमताओं में दोष हैं और कार्य करते समय तुम या तो एक पहलू पर विचार करने में विफल हो जाते हो या दूसरे पहलू का अनुमान लगाने में विफल हो जाते हो या उसे अनदेखा कर देते हो और भूल जाते हो या एक पहलू के लिहाज से काट-छाँट किए जाते हो या दूसरे पहलू में रुकावटों और झटकों का सामना करते हो, तुम अपने दिल की गहराइयों में लगातार खुद को यह चेतावनी देते हो : “मैं सक्षम नहीं हूँ। मेरी काबिलियत खराब है और मैं सत्य नहीं समझता। मैं सिद्धांत नहीं समझता।” इस तरह से तुम चीजें करने में बहुत सतर्क हो जाते हो, गलतियाँ करने और काट-छाँट किए जाने से बहुत डरते हो, गड़बड़ करने और बाधा डालने से बहुत डरते हो और कार्य में ऐसी खामियाँ पैदा करने से बहुत डरते हो जिनसे नुकसान होते हैं। क्योंकि विभिन्न पहलुओं में तुम्हारी क्षमताओं में कमी है या तुम्हारी सभी क्षमताएँ बहुत ही औसत हैं, इसलिए कार्य के लिए सक्षम होने की तुम्हारी योग्यता भी बहुत ही औसत है और तुम जो कार्य करते हो वह भी बहुत ही औसत है। इसलिए तुम्हें लगता है कि शेखी बघारने के लिए कुछ नहीं है—अगर तुम कड़ी मेहनत से हासिल होने वाले कुछ नतीजे प्राप्त करने में सफल हो जाते हो, तो भी तुम उन्हें सिर्फ बहुत कष्ट सहने और पर्दे के पीछे बहुत ज्यादा प्रयास करने के बाद ही प्राप्त करते हो। तुम दूसरों के सामने यह ढोंग करना चाहते हो कि तुम योग्य और काफी अच्छे हो, लेकिन अपने दिल में तुममें आत्मविश्वास की कमी है। तुम जानते हो कि चाहे तुम जो भी करो, तुम उसे अच्छी तरह से नहीं कर सकते और अब भी इसे जाँचने के लिए तुम्हें ऊपरवाले की जरूरत होती है। कुछ चीजों में जब तुम्हें काट-छाँट किए जाने का सामना करना पड़ता है, सिर्फ तभी तुम्हें यह एहसास होता है कि तुम कहाँ गलत हो और तुम देख पाते हो कि तुम्हारी काबिलियत वास्तव में कितनी खराब है। इस तरह से तुम घमंडी बनने में समर्थ नहीं होगे। यानी, हमेशा तुम्हारे आस-पास कोई ऐसा अच्छी काबिलियत वाला व्यक्ति होगा जो तुमसे श्रेष्ठ है और तुम्हें रोकने के लिए हमेशा सत्य और परमेश्वर के अपेक्षित मानक मौजूद होंगे। तुम्हें लगता है, “मैं जो थोड़ा-सा कार्य पूरा कर पाया हूँ, वह सिर्फ इसलिए हो पाया है क्योंकि ऊपरवाले ने इसकी जाँच की और इसे तय किया; यह सिर्फ इसलिए पूरा हुआ क्योंकि ऊपरवाले ने बार-बार इसकी जाँच की, इसे देखा और इसे सही किया। मेरे पास शेखी बघारने के लिए कुछ नहीं है।” अगली बार जब तुम कुछ करते हो, तब भी तुम अपने कौशल का दिखावा करने के बारे में सोचते हो, लेकिन फिर भी तुम इसे अच्छी तरह से करने में विफल हो जाते हो और कभी भी दूसरों से अलग नहीं दिख पाते हो। ठीक इसलिए क्योंकि तुम्हारी काबिलियत और क्षमताएँ सीमित हैं, तुम्हारे कर्तव्य करने के प्रभाव हमेशा औसत होते हैं, हमेशा उस स्तर या मानक तक पहुँचने में विफल रहते हैं जिसे तुम आदर्श मानते हो। इसलिए तुम्हें अनजाने में लगातार यह एहसास होता है कि तुम किसी भी तरह से अलग से दिखने वाले, बेहतर या असाधारण व्यक्ति नहीं हो। धीरे-धीरे तुम्हें यह समझ आने लगता है कि तुम्हारी काबिलियत उतनी अच्छी नहीं है जितनी तुमने कल्पना की थी, बल्कि यह बहुत ही आम है। यह लगातार बढ़ने वाली प्रक्रिया आत्म-ज्ञान प्राप्त करने में तुम्हारे लिए बहुत ही उपयोगी है—तुम व्यावहारिक तरीके से कुछ असफलताओं और रुकावटों का अनुभव करते हो और आंतरिक रूप से चिंतन करने के बाद तुम अपने स्तर, क्षमताओं और काबिलियत का आकलन करने में ज्यादा सटीक हो जाते हो। तुम यह ज्यादा-से-ज्यादा जानने लगते हो कि तुम अच्छी काबिलियत वाले व्यक्ति नहीं हो, हालाँकि हो सकता है कि तुम्हारे पास कुछ शक्तियाँ और प्रतिभाएँ हों, राय बनाने के लिए थोड़ी-सी क्षमता हो या कभी-कभी तुम्हारे पास कुछ विचार या योजनाएँ होती हों, फिर भी तुम सत्य सिद्धांतों से दूर हो, तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं और सत्य के मानकों से दूर हो और सत्य वास्तविकता को प्राप्त करने के मानक से तो और भी दूर हो—अनजाने में तुम्हारे मन में अपने बारे में ये राय और आकलन होते हैं। अपने बारे में राय बनाने और अपना आकलन करने की प्रक्रिया में तुम्हारा आत्म-ज्ञान ज्यादा-से-ज्यादा सटीक होता जाएगा और तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों और भ्रष्टता के खुलासे लगातार कम होते जाएँगे, वे ज्यादा सीमित और नियंत्रित होते जाएँगे। यकीनन, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों को नियंत्रित किया जाना लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य क्या है? लक्ष्य यह है कि जैसे-जैसे तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव नियंत्रित किए जाते हैं, वैसे-वैसे धीरे-धीरे तुम सत्य की तलाश करना और शिष्ट तरीके से आचरण करना सीख जाते हो, हमेशा बड़ी-बड़ी बातें करने या अपने कौशल का प्रदर्शन करने का प्रयास नहीं करते हो, हमेशा बेहतरीन या सबसे ताकतवर बनने की होड़ नहीं करते हो और हमेशा खुद को साबित करने का प्रयास नहीं करते हो। जबकि यह जागरूकता लगातार तुम्हारे दिल में अपनी गहरी छाप छोड़ती रहेगी, तुम सोचोगे, “मुझे यह तलाश करनी होगी कि ऐसा करने के सत्य सिद्धांत क्या हैं और परमेश्वर इस बारे में क्या कहता है।” यह जागरूकता धीरे-धीरे तुम्हारे दिल की गहराइयों में अपनी जड़ें जमा लेगी और परमेश्वर के वचन और सत्य की तुम्हारी तलाश, मान्यता और स्वीकृति लगातार बढ़ती जाएगी, जो तुम्हारे लिए बचाए जाने की उम्मीद दर्शाती है। जितना ज्यादा तुम सत्य स्वीकार कर पाओगे, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव खुद को उतना ही कम प्रकट करेंगे; इससे भी बेहतर परिणाम यह होगा कि तुम्हारे पास अभ्यास के मानक के रूप में परमेश्वर के वचन का उपयोग करने के ज्यादा अवसर होंगे। क्या यह धीरे-धीरे उद्धार के मार्ग पर चल पड़ना नहीं है? क्या यह अच्छी बात नहीं है? (हाँ।) लेकिन अगर तुम्हारी सभी क्षमताएँ बेहतर और परिपूर्ण हैं और लोगों के बीच असाधारण हैं, तो क्या फिर भी तुम मामलों को सँभालते हुए और अपने कर्तव्य करते हुए सत्य की तलाश कर सकते हो? यह कहना मुश्किल है। सभी क्षेत्रों में असाधारण क्षमताओं वाले व्यक्ति के लिए शांत हृदय या विनम्र रवैये के साथ परमेश्वर के सामने आना, खुद को जानना, अपने दोषों और भ्रष्ट स्वभावों को जानना और सत्य की तलाश करने, सत्य स्वीकारने और फिर सत्य का अभ्यास करने की हद तक पहुँच जाना बहुत ही कठिन है। ऐसा करना काफी कठिन है, है ना? (हाँ, है।)
लोगों में औसत काबिलियत होने में परमेश्वर के अच्छे इरादे निहित होते हैं; लोगों में बहुत खराब काबिलियत होने में भी परमेश्वर के अच्छे इरादे निहित होते हैं। तुम्हें बचाने की चाह में परमेश्वर तुम्हें अत्यधिक अच्छी काबिलियत नहीं देता है। ऐसा क्यों है? परमेश्वर लोगों को विभिन्न जन्मजात स्थितियाँ देता है, जैसे कि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, रंग-रूप, सहज प्रवृत्ति, व्यक्तित्व और विभिन्न जीवन क्षमताएँ। यहाँ तक कि परमेश्वर लोगों को कुछ विशेष शक्तियाँ, रुचियाँ और शौक भी देता है और कुछ लोगों को विशेष गुण भी देता है। यह पर्याप्त है। ये तुम्हारी व्यक्तिगत उत्तरजीविता को बनाए रखने के लिए पर्याप्त हैं। इनके साथ तुम्हारे पास स्वतंत्र रूप से जीने की क्षमता और स्थितियाँ होती हैं और एक खास स्तर की काबिलियत के आधार पर तुम परमेश्वर के वचन स्वीकार सकते हो, अलग-अलग हदों तक अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ सकते हो और बचाया जाना हासिल कर सकते हो। यही कारण है कि परमेश्वर लोगों को अत्यधिक ऊँची काबिलियत नहीं देता है। परमेश्वर लोगों को बेहद अच्छी काबिलियत नहीं देता है। एक तो ऐसा इसलिए है ताकि लोग इस बुनियादी शर्त के होते हुए विनम्र बने रह सकें और खुद को साधारण, औसत तथा भ्रष्ट स्वभाव वाले लोग मानने के आधार पर खुशी-खुशी परमेश्वर का कार्य और परमेश्वर का उद्धार स्वीकार कर सकें। सिर्फ इसी तरह से लोगों के पास परमेश्वर के वचन स्वीकार करने की बुनियादी शर्त होती है। दूसरी बात यह है कि अगर लोगों में बहुत अच्छी काबिलियत या असाधारण रूप से तेज दिमाग हों, सभी पहलुओं में बहुत मजबूत क्षमताएँ हों, सभी असाधारण हों, दुनिया में उनके लिए सब कुछ सुचारु रूप से चल रहा हो—वे व्यापार में बहुत पैसा कमा रहे हों, उनके विशेष रूप से सुचारु राजनीतिक करियर हों, वे सभी परिस्थितियों में सहजता से कार्य कर रहे हों, खुद को पानी में मछली की तरह महसूस कर रहे हों—तो ऐसे लोग आसानी से परमेश्वर के सामने आने और परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करने में समर्थ नहीं होते हैं, है ना? (सही कहा।) परमेश्वर द्वारा बचाए जाने वालों में से ज्यादातर लोग दुनिया में या समाज के लोगों के बीच ऊँचे पदों पर नहीं होते हैं। चूँकि उनकी काबिलियत और क्षमताएँ औसत या यहाँ तक कि कम होती हैं और वे दुनिया में लोकप्रियता या सफलता पाने के लिए जूझते रहते हैं, उन्हें हमेशा लगता है कि दुनिया बेरंग और अन्यायी है; इसलिए उन्हें आस्था की जरूरत होती है और अंत में वे परमेश्वर के सामने आते हैं और परमेश्वर के घर में प्रवेश करते हैं। लोगों को चुनते समय परमेश्वर की यह एक बुनियादी शर्त है। तुममें सिर्फ इसी जरूरत के साथ परमेश्वर का उद्धार स्वीकारने की इच्छा हो सकती है। अगर हर दृष्टि से तुम्हारी स्थितियाँ बहुत अच्छी हैं और दुनिया में उद्यम करने के लिए उपयुक्त हैं और तुम हमेशा अपने लिए नाम कमाना चाहते हो तो तुममें परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करने की इच्छा नहीं होगी और न ही तुम्हारे पास परमेश्वर का उद्धार प्राप्त करने का अवसर होगा। भले ही तुम्हारी काबिलियत औसत या खराब हो, फिर भी तुम अविश्वासियों की तुलना में कहीं ज्यादा धन्य हो क्योंकि तुम्हारे पास परमेश्वर द्वारा बचाए जाने का अवसर है। इसलिए खराब काबिलियत होना तुम्हारा दोष नहीं है और न ही यह तुम्हारे द्वारा भ्रष्ट स्वभाव छोड़ देने और उद्धार प्राप्त करने में कोई रुकावट है। अंतिम विश्लेषण में, तुम्हें यह काबिलियत परमेश्वर ने ही दी है। तुम्हारे पास बस उतना ही है जितना परमेश्वर ने तुम्हें दिया है। अगर परमेश्वर तुम्हें अच्छी काबिलियत देता है तो तुम्हारे पास अच्छी काबिलियत होती है। अगर परमेश्वर तुम्हें औसत काबिलियत देता है तो तुम्हारी काबिलियत औसत होती है। अगर परमेश्वर तुम्हें खराब काबिलियत देता है तो तुम्हारी काबिलियत खराब होती है। जब तुम यह बात समझ जाते हो तो तुम्हें इसे परमेश्वर से स्वीकार लेना चाहिए और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने में समर्थ हो जाना चाहिए। कौन-सा सत्य समर्पण करने का आधार बनता है? यह कि परमेश्वर द्वारा की गई ऐसी व्यवस्थाओं में उसके अच्छे इरादे होते हैं; परमेश्वर अत्यंत विचारशील है और लोगों को परमेश्वर की इन व्यवस्थाओं को लेकर शिकायत नहीं करनी चाहिए और परमेश्वर के हृदय को गलत नहीं समझना चाहिए। परमेश्वर तुम्हारी अच्छी काबिलियत के कारण तुम्हारा सम्मान नहीं करेगा और न ही वह तुम्हारी खराब काबिलियत के कारण तुम्हारा तिरस्कार करेगा या तुमसे नफरत करेगा। परमेश्वर किस चीज से नफरत करता है? परमेश्वर जिस चीज से नफरत करता है वह है लोगों का सत्य से प्रेम न करना या इसे स्वीकार न करना, लोगों का सत्य समझना लेकिन उसका अभ्यास न करना, वह कार्य न करना जिसे करने में वे सक्षम हैं, अपने कर्तव्यों में अपना सर्वस्व न दे पाना, फिर भी हमेशा असंयत इच्छाएँ रखना, हमेशा रुतबे की चाहत रखना, हमेशा पद के लिए होड़ करना और हमेशा परमेश्वर से माँगें करते रहना। यही बात परमेश्वर को घिनौनी और घृणित लगती है। तुममें शुरू से ही खराब काबिलियत है या कोई काबिलियत ही नहीं है, तुम कोई भी कार्य करने में असमर्थ हो और फिर भी तुम हमेशा अगुआ बनना चाहते हो; तुम हमेशा पद और सत्ता के लिए होड़ करते हो और हमेशा चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हें एक निश्चित उत्तर दे, तुम्हें बताए कि भविष्य में तुम राज्य में प्रवेश कर सकते हो, आशीषें प्राप्त कर सकते हो और एक अच्छा गंतव्य पा सकते हो। परमेश्वर द्वारा तुम्हारा चुना जाना पहले से ही एक बहुत बड़ा उन्नयन है, फिर भी तुम उँगली पकड़ाए जाने पर बाँह पकड़ना चाहते हो। परमेश्वर ने तुम्हें वह दिया है जो तुम्हें मिलना चाहिए और तुम पहले से ही परमेश्वर से बहुत कुछ प्राप्त कर चुके हो, फिर भी तुम अनुचित माँगें करते हो। परमेश्वर इसी से नफरत करता है। तुम्हारी काबिलियत बहुत खराब है या तुम मानव बुद्धि के स्तर तक भी नहीं पहुँचते हो, फिर भी परमेश्वर ने तुम्हारे साथ एक जानवर जैसा व्यवहार नहीं किया है, बल्कि वह अब भी तुम्हें एक मनुष्य मानता है। इसलिए तुम्हें वही करना चाहिए जो एक मनुष्य को करना चाहिए, वही कहना चाहिए जो एक मनुष्य को कहना चाहिए और जो कुछ भी परमेश्वर ने तुम्हें दिया है उसे परमेश्वर से आ रहा मानकर स्वीकार करना चाहिए। तुम जो भी कर्तव्य कर सकते हो, उसे करो। परमेश्वर को निराश मत करो। उँगली पकड़ाए जाने पर बाँह पकड़ने की इच्छा मत रखो क्योंकि परमेश्वर तुम्हारे साथ एक मनुष्य जैसा व्यवहार करता है, यह मत कहो, “चूँकि परमेश्वर मुझे एक मनुष्य मानता है, उसे मुझे बेहतर काबिलियत देनी चाहिए, मुझे टीम प्रमुख, पर्यवेक्षक या अगुआ बनने देना चाहिए। यह सबसे अच्छा होता अगर वह ऐसी व्यवस्था करता कि मुझे कोई थकाऊ कार्य नहीं करना पड़ता, परमेश्वर का घर मुफ्त में मेरा भरण-पोषण करता और मुझे प्रयास करने या थकान सहने की जरूरत नहीं पड़ती, मुझे वह करने की अनुमति देता जो मैं करना चाहता हूँ।” ये सभी अनुचित माँगें हैं। ये वे अभिव्यक्तियाँ या अनुरोध नहीं हैं जो किसी सृजित प्राणी के पास होने चाहिए या उसे प्रस्तुत करने चाहिए। परमेश्वर ने तुम्हारे साथ तुम्हारी कमजोर काबिलियत के अनुसार व्यवहार नहीं किया है, बल्कि तुम्हें चुना है और तुम्हें अपना कर्तव्य करने का अवसर दिया है। यह परमेश्वर का उन्नयन है। तुम्हें उँगली पकड़ाए जाने पर बाँह पकड़ने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए और परमेश्वर से अनुचित माँगें नहीं करनी चाहिए। बल्कि तुम्हें परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए और परमेश्वर के प्रेम का बदला चुकाने के लिए अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। परमेश्वर की तुमसे यही अपेक्षा है। तुम्हारी काबिलियत खराब है, लेकिन परमेश्वर ने अच्छी काबिलियत वाले लोगों के मानकों के अनुसार तुमसे अपेक्षाएँ नहीं रखी हैं। तुममें काबिलियत और बुद्धि की कमी है, लेकिन परमेश्वर ने यह अपेक्षा नहीं की है कि तुम उन मानकों को प्राप्त करो जिन तक अच्छी काबिलियत वाले लोग पहुँच सकते हैं। तुम जो कुछ भी करने में समर्थ हो, बस वही करो। परमेश्वर मछली को जमीन पर रहने के लिए मजबूर नहीं करता है। बात बस इतनी है कि तुममें हमेशा असंयत इच्छाएँ होती हैं और तुम हमेशा एक साधारण व्यक्ति, कम काबिलियत वाला औसत व्यक्ति बनने के अनिच्छुक रहते हो; बात यह है कि तुम ऐसे श्रमसाध्य कार्य नहीं करना चाहते हो जो तुम्हें सुर्खियों में नहीं लाते हैं और अपना कर्तव्य करने में तुम हमेशा कष्ट को नापसंद करते हो और थकान से कतराते हो, इस बारे में नखरेबाजी करते हो और चुनते हो कि क्या करना है; तुम हमेशा मनमौजी होते हो और तुम्हारे पास हमेशा अपनी योजनाएँ और प्राथमिकताएँ होती हैं—ऐसा नहीं है कि परमेश्वर ने तुम्हारे साथ अन्याय किया है। तो लोगों को अपनी काबिलियत सही तरीके से कैसे देखनी चाहिए? एक बात यह है कि परमेश्वर तुम्हें जो भी काबिलियत देता है, तुम्हें उसे परमेश्वर से स्वीकार करना चाहिए और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करना चाहिए। यह सबसे बुनियादी विचार और नजरिया है जो लोगों के पास होना चाहिए। यह नजरिया सही है और यह किसी भी परिस्थिति में बना रहता है। यह सत्य सिद्धांत ही है जो अटल रहता है, चाहे चीजें कैसे भी क्यों न बदलें। दूसरी बात यह है कि चाहे तुम्हारी काबिलियत अच्छी हो, औसत हो, खराब हो या गैर-मौजूद हो, तुम्हें वह कार्य करना चाहिए जिसे तुम्हारी काबिलियत हासिल कर सकती है। तुम्हें न तो खुद को रोककर रखना चाहिए और न ही दूसरों से अलग दिखने का प्रयास करना चाहिए। चाहे तुम्हारी काबिलियत अच्छी हो या औसत, तुम सिर्फ वही चीजें कर सकते हो जो तुम्हारी काबिलियत और क्षमता के दायरे में आती हैं; शेखी बघारने के लिए कुछ नहीं है—यह वही है जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है; तुम्हें इसे अर्पित कर देना चाहिए। तुम्हारा पूरा अस्तित्व, तुम्हारी साँस, तुम्हारी जन्मजात स्थितियाँ और तुम्हारी काबिलियत के सभी पहलुओं में तुम्हारी क्षमताएँ परमेश्वर द्वारा दी गई हैं। जिन विभिन्न सत्य सिद्धांतों को तुम अब समझते हो, वे भी परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए हैं। परमेश्वर के कार्य के बिना और परमेश्वर द्वारा लोगों को प्रदान की गई विभिन्न जन्मजात स्थितियों के बिना मनुष्य मुट्ठी भर धूल के सिवाय कुछ भी नहीं है। इसलिए, लोगों के पास शेखी बघारने के लिए कुछ नहीं है। यह दूसरा पहलू है। यहाँ एक और पहलू है : चाहे तुम्हारी काबिलियत औसत हो, खराब हो या गैर-मौजूद हो, तुम्हें इसे सही ढंग से सँभालना चाहिए। सबसे पहले, यह पहचानो कि तुम्हारी काबिलियत किस स्तर की है और फिर अपनी जन्मजात काबिलियत के आधार पर वह करो जो तुम्हें करना चाहिए। हमेशा अपनी क्षमताओं से परे जाने और ऐसी चीजें करने का प्रयास मत करो जिन्हें तुम पूरा नहीं कर सकते, हमेशा लोगों या परमेश्वर के सामने खुद को साबित करने का प्रयास मत करो। तुम कुछ भी साबित नहीं कर सकते। तुम इस तरह से जितना ज्यादा खुद को साबित करने का प्रयास करते हो, उतना ही यह साबित होता है कि तुम्हारी काबिलियत खराब है, तुम अपने खुद का माप नहीं जानते हो और उतना ही यह साबित होता है कि तुम सूझ-बूझ से परे हो और तुम्हारे पास बुरी तरह से भ्रष्ट स्वभाव है। हर प्रकार से अपनी काबिलियत को बदलने या हर दृष्टि से अपनी क्षमताओं में सुधार करने का प्रयास मत करो, बल्कि अपनी जन्मजात काबिलियत और क्षमताओं को सटीकता से पहचानो और उनका सही ढंग से उपयोग करो। अगर तुम्हें यह पता लग जाता है कि तुममें कहाँ कमी है तो जल्दी से उन क्षेत्रों का अध्ययन करो जिनमें तुम कम समय में प्रगति हासिल कर सकते हो ताकि तुम इन क्षेत्रों के लिए भरपाई कर सको। जो क्षेत्र तुम्हारी पहुँच से बाहर हैं, उनके लिए जबरदस्ती मत करो। अपनी वास्तविक स्थिति के अनुसार कार्य करो; अपनी खुद की काबिलियत और क्षमताओं के आधार पर चीजें करो। अंतिम सिद्धांत है परमेश्वर के वचन, मनुष्यों के लिए परमेश्वर की अपेक्षाओं और सत्य सिद्धांतों के अनुसार अपना कर्तव्य करना। तुम्हारी काबिलियत का स्तर चाहे जो भी हो, तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने और अपने कर्तव्य निभाने के अलग-अलग स्तर हासिल कर सकते हो; तुम परमेश्वर के मानक पूरे कर सकते हो या उन पर खरे उतर सकते हो। ये सत्य सिद्धांत बिल्कुल भी खोखली बातें नहीं हैं; वे बिल्कुल भी मानवता से परे नहीं हैं। वे सभी सृजित मानवजाति के भ्रष्ट स्वभावों, सहज प्रवृत्तियों और विभिन्न क्षमताओं और काबिलियतों के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए अभ्यास के मार्ग हैं। इसलिए चाहे तुम्हारी काबिलियत कुछ भी हो, चाहे तुम्हारी क्षमताएँ किसी भी पहलू से अपर्याप्त या दोषपूर्ण हों, यह कोई समस्या नहीं है; अगर तुम सही मायने में सत्य समझते हो और सत्य का अभ्यास करने को तैयार हो, तो आगे बढ़ने का एक मार्ग जरूर होगा। काबिलियत और क्षमताओं के कुछ पहलुओं में किसी व्यक्ति के दोष उसके सत्य के अभ्यास में बिल्कुल भी बाधा नहीं बनते हैं। अगर तुम्हारी आकलन करने की क्षमता या किसी दूसरी क्षमता में कमी है, तो तुम और तलाश कर सकते हो और ज्यादा संगति कर सकते हो—सत्य समझने वाले लोगों से निर्देश और सुझाव माँगो। जब तुम अभ्यास के सिद्धांतों और मार्गों को समझते हो और उनकी सारी जानकारी रखते हो, तो तुम्हें उन्हें अपने आध्यात्मिक कद के आधार पर अपने पूरे प्रयास के साथ अभ्यास में लाना चाहिए। स्वीकार करना और अभ्यास करना—तुम्हें यही करना चाहिए। क्या मेरे इस तरह से संगति करने से तुम्हें समझने में मदद मिलती है? (हम थोड़ा-सा ज्यादा समझते हैं।)
परमेश्वर लोगों में सभी प्रकार की काबिलियत होना क्यों पूर्वनियत करता है? परमेश्वर लोगों को परिपूर्ण काबिलियत क्यों नहीं देता है? इस संबंध में परमेश्वर के इरादे क्या हैं और लोगों को इसके प्रति सही तरीके से कैसे पेश आना चाहिए, इस बारे में हमने कितने पहलुओं पर संगति की है? आओ हम उन्हें संक्षेप में प्रस्तुत करें। पहला पहलू परमेश्वर से इसे स्वीकार करना है। यह सबसे बुनियादी विचार और नजरिया है जो लोगों के पास होना चाहिए। दूसरा पहलू यह पहचानना और आकलन करना है कि तुम्हारी काबिलियत क्या है और अपनी काबिलियत और क्षमता के आधार पर कार्य करना और अपना कर्तव्य करना है। ऐसी चीजें करने का प्रयास मत करो जो तुम्हारी काबिलियत और क्षमता से बढ़कर हों। तुम जो कर सकते हो, उसे निष्ठा से और व्यावहारिक तरीके से करो और उसे अच्छे तरीके से करो। जो तुम नहीं कर सकते हो, उसके लिए अपने साथ जबरदस्ती मत करो। तीसरा पहलू क्या है? (हमें हमेशा अपनी काबिलियत बदलने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। भले ही हमारी काबिलियत औसत हो, खराब हो या ना के बराबर भी हो, फिर भी हमें इसे सही तरीके से सँभालना चाहिए। हमें हमेशा परमेश्वर के सामने खुद को साबित करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए कि हमारी काबिलियत अच्छी है। यह अनुचित है।) सही कहा। अपनी काबिलियत से सही तरीके से पेश आओ। शिकायत मत करो। परमेश्वर ने तुम्हें जितना भी दिया है, वह तुमसे उतना ही माँगेगा। परमेश्वर ने तुम्हें जो नहीं दिया है, वह तुमसे उसकी माँग नहीं करता है। उदाहरण के लिए, अगर परमेश्वर ने तुम्हें औसत या खराब काबिलियत दी है तो वह तुमसे अगुआ, टीम प्रमुख या पर्यवेक्षक बनने की अपेक्षा नहीं करता है। लेकिन अगर परमेश्वर ने तुम्हें वाक्पटुता, खुद को व्यक्त करने की क्षमता या कोई खास गुण दिया है और वह तुमसे इस गुण से संबंधित कार्य करने की अपेक्षा करता है तो तुम्हें इसे अच्छे तरीके से करना चाहिए। परमेश्वर ने तुम्हें जो स्थितियाँ दी हैं, उनके अनुसार अपेक्षाएँ पूरी करने में विफल मत होओ। तुम्हें परमेश्वर के वरदान के योग्य होना चाहिए, इसका पूरा उपयोग करना चाहिए और इसे अच्छी तरह से लागू करना चाहिए, इसे सकारात्मक चीजों पर लागू करना चाहिए और ऐसे मूल्यवान कार्य नतीजे उत्पन्न करने चाहिए जो मानवजाति को लाभ पहुँचाते हों। यह बहुत ही बढ़िया होगा, है ना? (हाँ।) इसके अलावा, तुम्हें यह पता होना चाहिए कि लोगों को विभिन्न काबिलियतें देने में परमेश्वर के अच्छे इरादे हैं। उसने तुम्हें अत्यधिक अच्छी काबिलियत ठीक इसलिए नहीं दी है क्योंकि परमेश्वर तुम्हें बचाना चाहता है। इसमें परमेश्वर का श्रमसाध्य इरादा निहित है। परमेश्वर द्वारा तुम्हें औसत या खराब काबिलियत देना तुम्हारे लिए सुरक्षा है। अगर लोगों में बहुत ही अच्छी या असाधारण काबिलियत होती तो उनके लिए दुनिया और शैतान के पीछे-पीछे चलना आसान होता और वे आसानी से परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते। दुनिया के विभिन्न उद्योगों और क्षेत्रों में असाधारण लोगों को देखो—वे किस तरह के लोग हैं? वे सभी शातिर षड्यंत्रकारी हैं, देहधारी दानव हैं। अगर तुम उन्हें परमेश्वर में विश्वास रखने के लिए कहते हो तो वे सोचते हैं, “परमेश्वर में विश्वास रखने से कुछ नहीं मिलता—सिर्फ अक्षम लोग ही परमेश्वर में विश्वास रखते हैं!” अत्यधिक अच्छी काबिलियत, महान क्षमताओं और उन्नत युक्तियों वाले लोगों को शैतान कैदी बना लेता है। वे पूरी तरह से अपने भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार और पूरी तरह से दुनिया के लिए जीते हैं। ऐसे सभी लोग देहधारी दानव हैं। मुझे बताओ, क्या परमेश्वर ऐसे लोगों को बचाता है? (नहीं।) तो क्या तुम लोग देहधारी दानव बनने को तैयार हो या तुम एक साधारण व्यक्ति, एक ऐसा व्यक्ति बनने को तैयार हो जो खराब काबिलियत वाला है, लेकिन जो परमेश्वर का उद्धार प्राप्त कर सकता है? (हम साधारण लोग बनने को तैयार हैं।) इन दो प्रकार के लोगों में से कौन धन्य है? जो लोग दुनिया में फलते-फूलते हैं, विशिष्टता की ऊँचाइयों तक पहुँचते हैं, जिनके पास प्रसिद्धि होती है, जो उच्च अधिकारी या दौलतमंद लोग बनते हैं, जिनके पास वह सब कुछ होता है जो वे चाहते हैं और खर्च करने के लिए असीम धन होता है—क्या तुम लोग ऐसे लोग बनने को तैयार हो या तुम परमेश्वर के सामने आने और औसत काबिलियत वाले सीधे-सादे, साधारण लोग बनने को तैयार हो? तुम क्या चुनते हो? (सीधे-सादे, साधारण लोग बनना।) अगर तुम औसत काबिलियत वाले सीधे-सादे, साधारण व्यक्ति बनना चुनते हो, जो इस जीवन में अच्छे भौतिक जीवन का आनंद लेना पसंद नहीं करता है, प्रसिद्धि की ऊँचाइयों तक नहीं पहुँचना चाहता है, इस दुनिया में उपस्थिति की कोई भावना नहीं रखता है और सभी के द्वारा नीची नजर से देखा जाता है, इस प्रकार का व्यक्ति बनना पसंद करता है और परमेश्वर द्वारा लोगों को दिए जाने वाले उद्धार का अवसर सँजोना या प्राप्त करना पसंद करता है—अगर तुम्हारी यह पसंद है, अगर तुम बचाए जाना चुनते हो और इस दुनिया का अनुसरण न करना चुनते हो और अपने दिल में तुम इस दुनिया के नहीं बल्कि परमेश्वर के होना चाहते हो तो तुम्हें उस काबिलियत का तिरस्कार नहीं करना चाहिए जो परमेश्वर ने तुम्हें दी है। अगर तुम्हारी काबिलियत बहुत खराब हो या परमेश्वर ने तुम्हें कोई काबिलियत नहीं दी हो, तो भी तुम्हें इस सच्चाई को खुशी-खुशी स्वीकार करना चाहिए और परमेश्वर द्वारा तुम्हें दी गई विभिन्न क्षमताओं की जन्मजात स्थितियों के साथ एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करना चाहिए। दूसरा पहलू यह है कि भले ही परमेश्वर लोगों को जो काबिलियत देता है वह बहुत अच्छी न हो—सिर्फ साधारण लोगों की काबिलियत हो—और वह उन्हें सभी पहलुओं में जो क्षमताएँ देता है वे औसत या यहाँ तक कि खराब हों, फिर भी परमेश्वर जो सबसे बुनियादी सत्य लोगों को सिखाता है जिनका उन्हें अभ्यास करना चाहिए उन्हें अब भी प्राप्त किया जा सकता है अगर वे उनका अभ्यास करने में अपना दिल लगाने को तैयार हैं। भले ही तुम्हारी काबिलियत बहुत खराब हो और तुम्हारी समझने की क्षमता, चीजों को स्वीकार करने की क्षमता, आकलन करने की क्षमता और चीजों को पहचानने की क्षमता बहुत खराब हों या यहाँ तक कि गैर-मौजूद हों, फिर भी जब तक तुममें सबसे बुनियादी मानवता और सूझ-बूझ है, तब तक परमेश्वर द्वारा तुम्हें सौंपे गए कार्य पूरे किए जा सकते हैं और अच्छी तरह से किए जा सकते हैं। इसके अलावा, परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के जिस सबसे बुनियादी तरीके की परमेश्वर लोगों से अपेक्षा करता है, वह कुछ ऐसी चीज है जिसका तुम अनुसरण कर सकते हो; यह कुछ ऐसी चीज है जिसे तुम प्राप्त कर सकते हो। इसलिए परमेश्वर ने कभी भी तुम्हें बहुत अच्छी काबिलियत देने का इरादा नहीं रखा है। अगर परमेश्वर ने तुम्हें अच्छी काबिलियत और कुछ विशेष क्षमताएँ दी होतीं, जिससे तुम दुनिया में देहधारी दानव बनने में सक्षम होते तो परमेश्वर तुम्हें नहीं बचाता। क्या अब तुम लोग इस मामले के संबंध में परमेश्वर के दिल को समझ सकते हो? (हाँ।) अगर तुम परमेश्वर के दिल को समझ सकते हो तो यह अच्छा है; तुम यह सत्य समझोगे और अपनी काबिलियत को सही ढंग से देखोगे; इस संबंध में कोई और कठिनाई नहीं होगी। यहाँ से लोगों को बस वही करना चाहिए जो उन्हें करना चाहिए। भले ही यह सिर्फ एक नौकरी हो, फिर भी इसे अच्छी तरह से करने में अपना दिल और प्रयास लगा दो और परमेश्वर की तुमसे जो अपेक्षाएँ हैं उन पर खरा उतरने में विफल मत होओ। क्या तुम समझ रहे हो? (हाँ।) इस विषय पर आज की संगति के लिए बस इतना ही। अलविदा!
11 नवंबर 2023
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?