सत्य का अनुसरण कैसे करें (9) भाग दो

संवेदनशीलता

चलो, आगे हम संवेदनशीलता के बारे में बात करते हैं। आओ, इसे श्रेणीबद्ध करने के लिए सबसे आसान तरीके का उपयोग करें और उन्मूलन पद्धति से शुरू करें। क्या संवेदनशीलता कोई जन्मजात स्थिति है? (नहीं।) तो क्या यह कोई भ्रष्ट स्वभाव है? (नहीं।) अगर किसी में संवेदनशीलता की अभिव्यक्ति है तो क्या यह किसी भ्रष्ट स्वभाव का प्रकाशन है? (नहीं।) संवेदनशीलता का मतलब किसी निश्चित प्रकार का खाना खाने के बाद खुजली होना या कोई निश्चित गंध सूंघने के बाद छींक आना और आंसू आना नहीं है; इसका मतलब पराग से एलर्जी, मूंगफली से एलर्जी या परिरक्षकों या रासायनिक यौगिकों से होने वाली कोई एलर्जी नहीं है—इसका मतलब शारीरिक संवेदनशीलता नहीं है। शारीरिक संवेदनशीलता का मतलब संवेदनशील गठन होना है जिसमें कुछ बाहरी नुकसानदायक गंध या पदार्थों से शुरू होने वाली एलर्जी संबंधी प्रतिक्रियाओं की प्रवृत्ति होती है—यही शारीरिक संवेदनशीलता है। शारीरिक संवेदनशीलता व्यक्ति की जन्मजात स्थितियों में से बस एक सहज प्रवृत्ति है—यह व्यक्ति के जन्मजात गठन का हिस्सा है। लेकिन यहाँ जिस संवेदनशीलता की चर्चा हो रही है उसका यह मतलब नहीं है। जन्मजात स्थितियों की संभावना को खारिज करने के बाद, और यह विचार करते हुए कि इस प्रकार की संवेदनशीलता आमतौर पर किसी भ्रष्ट स्वभाव के स्तर तक नहीं बढ़ती है—मतलब कि इसमें भ्रष्ट स्वभाव का कोई विशिष्ट प्रकाशन नहीं है—तो यह संवेदनशीलता किस तरह की समस्या है? (यह मानवता की समस्या है।) क्या यह मानवता की योग्यता है या कमी है? (यह मानवता की कमी है।) यह स्पष्ट रूप से मानवता की कमी है—अगर तुम इसे भी नहीं देख पाते हो तो तुम बेहद जाहिल हो। क्या संवेदनशील होना अच्छा है या नहीं? चूँकि यह मानवता की कमी है, इसलिए यह निश्चित रूप से अच्छा नहीं है। संवेदनशीलता का क्या मतलब है? इसे तुम लोग अपने शब्दों में कहो। (अतिसंवेदनशील मन होना।) क्या अतिसंवेदनशील मन होना कोई मानसिक बीमारी है? मुझे बताओ, क्या लोगों की नसें आमतौर पर अतिसंवेदनशील हो जाती हैं? नसें मनुष्य की मांसपेशियों के ऊतकों के भीतर होती हैं और बाहरी हवा, धूल या दूसरे पदार्थों के संपर्क में नहीं आती हैं—तो ये अतिसंवेदनशील कैसे हो सकती हैं? अगर कोई व्यक्ति हमेशा संवेदनशील है तो क्या यह उसके विचारों की कोई समस्या नहीं है? अगर उसके विचारों में कोई समस्या है तो क्या इसका मतलब है कि उसके मन में कोई समस्या है? (हाँ।) मन की समस्या उसके विचारों द्वारा निर्देशित होती है और अगर यह उसके विचारों द्वारा निर्देशित होती है तो यह उसकी मानवता से संबंधित समस्या है। जब बात किसी की नजर, शब्द या वाक्यांश के चयन की आती है या जब वह किसी परिवेश का या एक प्रकार की स्थिति का सामना करता है, तो वह इसकी अति-व्याख्या करता है, इसे खुद से जोड़ लेता है और फिर चिंता, अवसाद, उदासी और निराशा की भावनाओं में डूब जाता है और कभी-कभी नकारात्मकता में भी डूब जाता है या—इससे भी बदतर—बदला लेने, शत्रुता वगैरह की नकारात्मक अभिव्यक्तियाँ दिखाता है। ये अभिव्यक्तियाँ पूरी तरह से साबित करती हैं कि संवेदनशीलता मानवता का एक तरह का दोष है। दोष का मतलब है कि अगर तुममें इस तरह की समस्या है तो तुम्हारे द्वारा प्रकट की गई मानवता असामान्य है। यह समस्या चाहे तुम्हारे विचारों के कारण हुई हो, या चाहे मानसिक दशा, विवेक या किसी लिहाज से विशिष्ट धारणाओं और नजरियों के कारण हुई हो, जो भी हो, यह एक ऐसा दोष है जो तुम्हारी मानवता में निहित है। इसके कारण तुम्हारे द्वारा प्रकट की गई मानवता असामान्य बन जाती है, यह सामान्य मानवता की तार्किकता और जमीर के अनुरूप नहीं रहती है और सामान्य मानवता के सोचने के तरीकों द्वारा उत्पन्न विचारों और दृष्टिकोणों के अनुरूप नहीं रहती है या उस रवैये के अनुरूप नहीं रहती है जो दूसरों से मिलते-जुलते समय और मामले सँभालते समय व्यक्ति का होना चाहिए। संक्षेप में, मानवता के इस पहलू में जो प्रकट किया जाता है वह वास्तव में एक असामान्य मानसिक दशा है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग इसलिए अतिसंवेदनशील हो जाते हैं क्योंकि कोई अनजाने में उन पर सरसरी नजर डाल देता है—वे यह मान लेते हैं कि वह व्यक्ति उन्हें नीची नजर से देखता है, वे दुखी हो जाते हैं और यहाँ तक कि इससे परेशान होकर रोने भी लगते हैं। मुझे बताओ, क्या यह असामान्य मानसिक दशा नहीं है? क्या यह कोई मानसिक बीमारी नहीं है? क्या मैं जो कह रहा हूँ वह बिल्कुल ठीक है? (हाँ।) सटीक शब्दों में कहें तो, मानवता की यह अभिव्यक्ति एक मानसिक बीमारी है। दूसरे लोग उनके साथ कुछ नहीं करते हैं फिर भी वे कई दिनों तक बेकाबू होकर रोते रहते हैं और इससे उबर नहीं पाते हैं। यह मानवता का एक दोष है। जब तुम्हारे आस-पास इस प्रकार के लोग होते हैं तो तुम्हें खासतौर पर लगता है कि तुम्हारा दम घोंटा जा रहा है और तुम्हें प्रतिबंधित किया जा रहा है, तुम्हें नहीं पता होता कि कब तुम उनसे मुसीबत मोल ले लोगे या अपने लिए समस्याएँ खड़ी कर लोगे और उनके सामने बोलते समय तुम्हें बेहद सावधान रहना पड़ता है, बार-बार अपने शब्दों पर गौर करना पड़ता है : “अगर मैंने यह शब्द कहा तो क्या वे सोचेंगे कि मैं उन्हें नीची नजर से देख रहा हूँ? अगर मैंने उनसे बात नहीं की तो क्या वे सोचेंगे कि मेरी उनके बारे में एक निश्चित राय है? अगर मैं उनसे कुछ शब्द कहूँ तो क्या वे सोचेंगे कि मेरा कोई गुप्त मकसद है? कार्य करने का उचित तरीका आखिर क्या है?” अंत में तुम एक निष्कर्ष पर पहुँचते हो : इस प्रकार के लोग मानसिक रूप से बीमार होते हैं बस—वे सच में परेशानी पैदा करने वाले होते हैं! तुम चाहे उनके पास किसी भी तरीके से पेश आओ, यह कभी भी सही नहीं होता है; तुम चाहे कुछ भी कहो या कुछ भी करो, वे इसे कभी भी सही तरीके से नहीं लेते हैं। उनकी मानवता खासतौर से असामान्य होती है। ऐसे लोगों के साथ लंबा समय बिताने के बाद तुम बस उनसे दूर रहना और बचना चाहते हो, तुम आगे उनसे कोई संपर्क नहीं रखना चाहते हो। इस किस्म के लोगों में सामान्य मानवता की सोच नहीं होती है—वे मानसिक रूप से बीमार होते हैं। संवेदनशीलता का मतलब ये अभिव्यक्तियाँ हैं; यह मानवता का एक दोष है। हालाँकि यह मानवता का एक दोष है, लेकिन यह किसी भ्रष्ट स्वभाव से कम जटिल नहीं है। अगर किसी में मानवता का कोई दोष या समस्या है तो जब वे दूसरों से जुड़ते हैं तब कई परेशानियाँ उठ खड़ी होती हैं; उनके साथ घुल-मिलकर रहना मुश्किल होता है और उन्हें सुधारना भी मुश्किल होता है। यह मानवता की एक अभिव्यक्ति है।

जिद्दीपन

चलो, एक और अभिव्यक्ति के बारे में बात करें—जिद्दीपन। यह किस तरह की समस्या है? (यह मानवता का एक दोष है।) आओ, सबसे पहले हम जन्मजात स्थितियों को बाहर करें—जिद्दीपन निश्चित रूप से कोई जन्मजात स्थिति नहीं है, यह परमेश्वर द्वारा नहीं दिया गया है। इसके अलावा, जिद्दीपन किसी भ्रष्ट स्वभाव के स्तर तक नहीं बढ़ता है। इसलिए, यह मानवता का एक दोष है। जिद्दीपन की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? क्या जिद्दीपन और बेतुकेपन के बीच कोई निश्चित पारस्परिक संबंध है? (कुछ तो है।) एक निश्चित हद तक पारस्परिक संबंध है। तो, जिद्दीपन की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? एक उदाहरण दो। किस तरह के लोगों में जिद्दी होने की प्रवृत्ति होती है? कौन-से शब्द और क्रियाकलाप जिद्दीपन की अभिव्यक्तियाँ हैं? (जिद्दी लोग कुछ निश्चित लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करने पर अड़ जाते हैं।) चीजों में ही उलझकर रह जाना एक पहलू है। एक उदाहरण दो—वे किस तरह के मामलों में उलझकर रह जाते हैं? (जब कोई उनकी समस्याओं की ओर उनका ध्यान दिलाता है, तो वे बहाने बनाना और भ्रामक तर्क का उपयोग करना पसंद करते हैं। वे अपना बचाव करने के लिए हमेशा किसी वाक्यांश या चुनिंदा शब्दों से चिपके रहते हैं और सत्य स्वीकारने या काट-छाँट किया जाना स्वीकारने से इनकार कर देते हैं। वे खुद को सही ठहराने के लिए अपने तर्क पर जोर देते रहते हैं और अपने कार्यों के पीछे के कारणों को समझाते रहते हैं।) जब दूसरे लोग उनकी काट-छाँट करते हैं या सत्य सिद्धांतों के बारे में उनके साथ संगति करते हैं तो वे इसे स्वीकार नहीं करते हैं। बल्कि वे लगातार अपने बहानों और औचित्यों पर जोर देते रहते हैं और अपनी गलतियों को बिल्कुल भी माने बिना यह दावा करते हैं कि उनके इरादे सही हैं। यह उलझकर रह जाने की एक अभिव्यक्ति है। कुछ लोग बेतहाशा गलत कर्म करते हैं और उन्हें बर्खास्त कर दिया जाता है, लेकिन वे आत्म-चिंतन नहीं करते हैं। बल्कि वे कहते हैं, “जो भी हो, परमेश्वर मुझे पसंद नहीं करता और मैं ऐसा व्यक्ति नहीं हूँ जो सत्य से प्रेम करता हो, तो बात यहीं समाप्त हो जाती है—ऊपर की तरफ प्रयास करने का कोई मतलब नहीं है।” कोई उन्हें सलाह देता है, “तुम्हें इतना नकारात्मक नहीं होना चाहिए। तुम्हारी काबिलियत तुम्हें सत्य समझने की अनुमति देती है—तुम्हें ऊपर की तरफ प्रयास करना चाहिए!” वे उत्तर देते हैं, “अगर परमेश्वर ने नियत कर दिया है कि तुम्हें अच्छा गंतव्य नहीं मिलेगा, तो भले ही तुम ऊपर की तरफ प्रयास करो, यह बेकार है। चाहे तुम कितना भी प्रयास करो या इसे कितनी भी अच्छी तरह से करो, यह बेकार ही है।” वे अपने दिलों में परमेश्वर को लगातार गलत समझते रहते हैं और उसका विरोध करते रहते हैं। दूसरे लोग चाहे कुछ भी कहें, वे इसे स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम जो कहते हो वह उनकी दशा से कितने करीब से मेल खाता है या उन्हें सकारात्मक दिशा में मुड़ने और कुछ विकास प्राप्त करने में कितनी मदद कर सकता है, वे फिर भी इसे स्वीकार नहीं करते हैं। उन्हें पक्का यकीन है कि उनके अपने विचार सही हैं। क्या यह जिद्दीपन की अभिव्यक्ति है? (हाँ।) वे एकनिष्ठता और दृढ़ता से मानते हैं : “परमेश्वर मुझे पसंद नहीं करता है। चाहे मैं कुछ भी करूँ, परमेश्वर मुझ पर अनुग्रह नहीं दिखाएगा—परमेश्वर ने मुझे एक तरफ रख दिया है। मुझे मालूम है कि मैं सत्य से प्रेम करने वाला व्यक्ति नहीं हूँ, इसलिए ऊपर की तरफ प्रयास करने का कोई मतलब नहीं है। अगर मैं कोई भी कर्तव्य कर पाऊँ, तो मैं उसे बस थोड़ा-सा करूँगा। अगर मुझे मजदूर कहा जाता है, तो यही सही। जो भी हो, मैं बस साथ चलूँगा। जब तक उम्मीद की एक किरण बाकी है तब तक मैं छोड़कर नहीं जाऊँगा।” दरअसल, उनकी काबिलियत और दूसरी विभिन्न स्थितियों के आधार पर उन्हें इतना नकारात्मक नहीं होना चाहिए—वे अब भी कुछ कीमती चीजें करने में सक्षम हैं और अपने कर्तव्य करने में कुछ नतीजे प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन अपने जिद्दीपन के कारण वे ऊपर की तरफ प्रयास करने से इनकार कर देते हैं, रास्ता नहीं बदलते हैं और पश्चात्ताप नहीं करते हैं; वे अपने दिलों में मानते हैं कि परमेश्वर उन पर अनुग्रह नहीं दिखाएगा। दूसरों को अलग-अलग मात्रा में प्रकाश और प्रबोधन मिलते हैं और बार-बार उन्हें परमेश्वर द्वारा कुछ अनुग्रह दिखाया जाता है लेकिन वे इसे महसूस नहीं कर पाते हैं, इसलिए वे अपने दिलों में परमेश्वर के प्रति कुछ नाराजगी रखते हैं। क्या यह जिद्दीपन है? (हाँ।) कुछ लोग सोचते हैं, “जिन लोगों को परमेश्वर के घर में पदोन्नत और विकसित किया जाता है, वे सब वही होते हैं जो बोलने में निपुण हैं, जिनके पास गुण और विशेष कौशल हैं और जो खुद को पेश करने में अच्छे हैं। हमारे जैसे लोग जो खुद को पेश करना नहीं जानते हैं और जिनमें वाक्पटुता नहीं होती है, परमेश्वर के घर द्वारा नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। परमेश्वर हमें कोई अवसर नहीं देता है। भले ही हमारे पास प्रतिभाएँ हों, यह बेकार है। भले ही हमारे पास काबिलियत और बोध क्षमता हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता—हमें फिर भी एक तरफ खड़ा रहना पड़ेगा। खासकर चूँकि हम गरीब पृष्ठभूमि से आते हैं, औसत रूप-रंग वाले हैं और नहीं जानते कि अच्छे कपड़े कैसे पहनते हैं, इसलिए हम कभी भी कहीं भी अलग से दिखाई नहीं देंगे। हमारा पूरा जीवन बस ऐसा ही रहेगा—न तो दुनिया में हमारा कोई रुतबा होगा और न ही परमेश्वर के घर में हमारा कोई रुतबा होगा।” क्या यह जिद्दीपन की अभिव्यक्ति है? (हाँ।) इन दोनों उदाहरणों से क्या तुम लोग स्पष्ट रूप से समझा सकते हो कि जिद्दीपन क्या है? (अड़ियल ढंग से अपने विचारों पर अड़े रहना और किसी की भी बात सुनने से इनकार करना।) (अपनी बात पर अड़े रहना।) बोलचाल की भाषा में इसे अपनी बात पर अड़े रहना कहा जाता है, लेकिन इसके सभी रूप जिद्दीपन नहीं होते हैं—यह इस बात पर निर्भर करता है कि वे जिस दृढ़ राय पर अड़े हुए हैं वह सही है या नहीं। अगर व्यक्ति जिस दृढ़ राय पर अड़ा हुआ है वह सही है, तो यह फिर भी स्वीकार्य है। उदाहरण के लिए, अगर कोई अपनी दृढ़ राय पर अड़ा रहता है और कहता है, “चाहे कोई भी समय हो, व्यक्ति को जमीर से कार्य करना चाहिए,” तो यह राय अपेक्षाकृत सकारात्मक है। लेकिन अगर वह जिस दृढ़ राय पर अड़ा हुआ है वह गलत है और तथ्यों के अनुरूप नहीं है और फिर भी वह इसे छोड़ने से इनकार करता है और कोई भी व्यक्ति उसे अपने विचार और दृष्टिकोण बदलने के लिए राजी नहीं कर पाता है चाहे वह कुछ भी कहे, तो फिर यह जिद्दीपन है। जिद्दीपन समझने का एक विकृत तरीका है—यह तब होता है जब लोग विकृत विचारों और दृष्टिकोणों को हठपूर्वक पकड़कर रखते हैं। यह मानवता या आम समझ के अनुरूप नहीं होता है और यह परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप तो बिल्कुल नहीं होता है; यकीनन इसका सत्य से भी कोई लेना-देना नहीं होता है। जिद्दीपन का मतलब है अपनी मानवता की आवेगशीलता और भावनाओं के नियंत्रण में विकृत विचारों और दृष्टिकोणों पर डटे रहना। इस तरह की अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करने वाले लोग जिद्दी लोग होते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग काट-छाँट किया जाना स्वीकार करने और खुद को जानने लगने के बाद यह महसूस करते हैं कि वे इस मामले में गलत थे और उन्हें पश्चात्ताप करना चाहिए। वे इसे एक अपराध के रूप में देखते हैं और मानते हैं कि काट-छाँट किया जाना सही था, खुशकिस्मती से काट-छाँट सही समय पर की गई और इसके बगैर एक बड़ी गलती हो जाती। लेकिन जिद्दी लोग इस तरीके से नहीं सोचते हैं। वे कहते हैं, “मेरी काट-छाँट करना मुझे नीचा दिखाना है—यह मुझे परेशान करना है क्योंकि मैं उन्हें अप्रिय लगता हूँ। हो सकता है कि मैंने किसी गड़बड़ी वाली परिस्थिति में कदम रख दिया और बदकिस्मती का शिकार हो गया। वे बस गुस्से में थे और उनके पास अपनी भड़ास निकालने का कोई रास्ता नहीं था, इसलिए उन्होंने मेरी काट-छाँट करके मुझ पर अपनी भड़ास निकाली।” दूसरे लोग कहते हैं, “तुम जैसा सोचते हो यह वैसा नहीं है। तुम यह जाँच क्यों नहीं करते कि तुमने क्या गलत किया? क्या तुमने वह मामला सिद्धांतों के अनुसार सँभाला? क्या तुमने सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन किया?” वे इन चीजों की जाँच नहीं करते हैं। बल्कि वे भावनाओं और आवेगशीलता से मामलों का विश्लेषण करते हैं, उन्हें समझते हैं और उनसे पेश आते हैं। संक्षेप में, जिद्दी लोग ज्यादातर मामलों में सकारात्मक चीजें या सत्य स्वीकार नहीं करते हैं—यहाँ तक कि वे सकारात्मक विचार और दृष्टिकोण भी स्वीकार नहीं करते हैं। चाहे उनके साथ कुछ भी घट जाए या वे किसी भी परिवेश का सामना करें, वे इसे जिद्दी तरीके से सँभालते हैं और पूरे यकीन से इस पर अड़े रहते हैं। यहाँ तक कि जब तुम उनके साथ सत्य की संगति करते हो, तो वे इसे स्वीकार नहीं करते हैं और मानते हैं कि वे जिस चीज को पकड़कर रखते हैं वह पूरी तरह से तथ्यों के अनुरूप होती है। वे अक्सर क्या कहते हैं? “तुम जो सुनते हो वह भरोसा करने लायक नहीं है; सिर्फ जो तुम देखते हो वही वास्तविक है। मैं जो देखता हूँ वही तथ्य हैं। भले ही तुम जो कहते हो वह सत्य हो, लेकिन अगर तुमने इसे नहीं देखा है तो तुम्हें इस पर बोलने का कोई हक नहीं है।” वे मानते हैं कि वे जो देखते हैं वही तथ्य हैं और वास्तव में ये तथ्य सतह पर जैसे दिखाई देते हैं वे वैसे ही होते हैं। जब तुम सत्य के बारे में बात करते हो, तो यह बेकार है—उनकी नजर में सत्य सिर्फ एक मुखौटा है, सिर्फ एक दिखावा है, सिर्फ सुखद लगने वाले शब्द हैं। इसलिए वे इसे स्वीकार नहीं करते हैं। वे आँख मूँदकर यह विश्वास करते हैं, “मैं जो कह रहा हूँ वह सच है—यह झूठ नहीं है—क्योंकि मैंने तथ्यों की सच्चाई देखी। मैंने तथ्यों के होने की प्रक्रिया देखी।” उदाहरण के लिए, जब कोई जिद्दी व्यक्ति किसी ऐसे दंपति को बहस करते देखता है जिसमें पति-पत्नी दोनों तलाक लेने के बारे में चिल्ला रहे होते हैं, तो वह यह निष्कर्ष निकाल लेता है कि वे निश्चित रूप से तलाक ले लेंगे। दूसरे लोग कहते हैं, “सिर्फ इसलिए कि तुमने उन्हें तलाक के बारे में बहस करते देखा, इसका अवश्य ही यह मतलब नहीं है कि वे वाकई तलाक लेना चाहते हैं। लोग गुस्से में रूखे शब्द बोल देते हैं। दरअसल, यह दंपति आमतौर पर बहुत प्रेम से रहता है—उनके रिश्ते की नींव मजबूत है। भले ही वे जीवनभर एक-दूसरे से बहस करते रहे हों, पर वे एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते। इस पत्नी ने किसी ऐसे व्यक्ति को जो इस स्थिति के बारे में जानता है, बताया कि उनके लिए तलाक लेना नामुमकिन है। इसलिए, इन तथ्यों और उनके सामान्य रहन-सहन के आधार पर वे संभवतः तलाक नहीं लेंगे।” जिद्दी व्यक्ति इस बात पर विश्वास नहीं करता। बाद में वह पता करने जाता है और देखता है कि उस दंपति ने वाकई तलाक नहीं लिया है, लेकिन वह फिर भी अड़ियल ढंग से यही मानता है, “उन्होंने सिर्फ ऊपर से तलाक नहीं लिया है; निजी तौर पर वे पहले ही गुप्त रूप से तलाक ले चुके हैं। उन्होंने सिर्फ बच्चों की खातिर इसे सबके सामने प्रकट नहीं किया है।” देखा तुमने, वह अब भी इस मामले से अड़ियल ढंग से चिपका हुआ है। वह सिर्फ अपनी आँखों देखी चीजों पर और अपने निर्णय पर विश्वास करता है और इस बात पर हठपूर्वक अड़ा रहता है कि उसका निर्णय, उसके विचार और दृष्टिकोण सही हैं। भले ही तथ्य उस तरह के न हों या समस्या का सार और मूल उस तरह के न हों, फिर भी वह उसे ऐसा ही मानता है। सभी मामलों की उसकी समझ सिर्फ उसके अपने पूर्वाग्रहों, आवेगशीलता और भावनाओं पर निर्भर करती है—वह तथ्यों की प्रकृति या समस्या के मूल के आधार पर निर्णय नहीं लेता है। भले ही स्थिति बदल जाए, लेकिन उसके समझने का तरीका और उसके विचार और दृष्टिकोण पहले जैसे ही बने रहते हैं। ये जिद्दी लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं।

जब जिद्दी लोग विशिष्ट समस्याओं का सामना करते हैं तो समस्याओं को सँभालने के उनके तरीके में और उनके द्वारा प्रकट किए जाने वाले स्वभाव में एक भ्रष्ट स्वभाव शामिल होता है। जिद्दीपन मानवता का एक बड़ा दोष है। यकीनन यह चरित्र या सत्यनिष्ठा के स्तर तक नहीं पहुँचता है—यह सिर्फ उस रवैये, विचार और दृष्टिकोण से संबंधित है जिससे वे दूसरों से मिलते-जुलते हैं और मामले सँभालते हैं। अगर कोई व्यक्ति जिद्दी है तो यह बात यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि उसकी मानवता में कोई दोष है। जब यह दोष किसी विशिष्ट मामले में प्रकट होता है तो वह जो प्रकट करता है वह अब सिर्फ मानवता का दोष नहीं रह जाता है। अगर किसी निश्चित परिस्थिति में वह अड़ियल ढंग से अपनी विकृत समझ और दृष्टिकोणों पर जोर देता है, यह मानता है कि ये सत्य के अनुरूप हैं और चाहे कोई भी उसके साथ सत्य की संगति करे, वह इसे अपना नहीं पाता है—और यहाँ तक कि कुछ जिद्दी क्रियाकलाप और कथन भी तैयार कर लेता है—तो अब यह सिर्फ उसकी मानवता की समस्या नहीं रह जाती है। यह पहले से ही उसके स्वभाव की समस्या होने के स्तर तक बढ़ चुका है—यह किसी भ्रष्ट स्वभाव के स्तर तक बढ़ चुका है। उदाहरण के लिए, जब काट-छाँट किया जाना स्वीकारने की बात आती है, तो अगर वह चीजें करने में सिद्धांतों का उल्लंघन करता है और बेतहाशा गलत कर्म करता है, तो उसे काट-छाँट किया जाना स्वीकार लेना चाहिए। भले ही वह काट-छाँट किया जाना स्वीकार न करे, लेकिन उसे अनुरूप सज़ा और ताड़ना फिर भी स्वीकार लेनी चाहिए। लेकिन इसे सही ढंग से समझने के बजाय वह अपनी बदकिस्मती की शिकायत करता है और कहता है, “मैं बस एक बुरी परिस्थिति में फँस गया। मेरी काट-छाँट करने वाला व्यक्ति बस गुस्से में था और उसके पास अपना गुस्सा निकालने की कोई जगह नहीं थी—यह बस ऐसा हुआ कि उसे मेरा यह मामला मिल गया, इसलिए उसने मेरी काट-छाँट कर दी।” काट-छाँट किए जाने के प्रति उसका विचार, दृष्टिकोण और रवैया भ्रष्ट स्वभाव का प्रकाशन है। यह किस तरह का भ्रष्ट स्वभाव है? (अड़ियलपन और सत्य से विमुख होना।) सत्य से विमुख होना और अड़ियलपन। लोगों और चीजों के संबंध में उसके विचार और दृष्टिकोण उसकी मानवता के जिद्दीपन के तहत आते हैं, लेकिन इन जिद्दी विचारों और दृष्टिकोणों को जन्म देने वाले भ्रष्ट स्वभाव अड़ियलपन और सत्य से विमुख होना हैं। यह समस्या के सार को गंभीर बना देता है—ऐसे लोग छद्म-विश्वासी होते हैं। जिद्दीपन मानवता का एक दोष है। इसमें शामिल भ्रष्ट स्वभावों की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? अड़ियलपन और सत्य से विमुख होना—यह इसे भ्रष्ट स्वभावों के स्तर तक ले आता है। तुम लोगों को इससे क्या दिखाई देता है? मानवता में कुछ ऐसे दोष जिनमें लोगों के वे विचार, दृष्टिकोण और रवैये शामिल हैं जिनसे वे आचरण करते हैं और कार्य करते हैं, भ्रष्ट स्वभावों तक आगे बढ़ सकते हैं। उदाहरण के लिए, हकलाना मानवता का एक दोष है। हकलाने वाला व्यक्ति हकलाएगा चाहे वह कुछ भी कहे। हकलाना अपने आप में कोई भ्रष्ट स्वभाव नहीं है और यह किसी भ्रष्ट स्वभाव के स्तर तक नहीं पहुँचता है। लेकिन अगर हकलाकर बोले गए शब्दों में निश्चित विचार निहित हैं और ये विचार किसी भ्रष्ट स्वभाव के नियंत्रण में उत्पन्न होते हैं, तो चाहे वह व्यक्ति स्वाभाविक रूप से हकलाता हो या नहीं, उसके शब्दों के पीछे के विचार एक भ्रष्ट स्वभाव को दर्शाते हैं। हकलाना बोलने की समस्या है—इसका किसी भ्रष्ट स्वभाव से कोई संबंध नहीं है। लेकिन हकलाकर बोलने के तरीके का उपयोग करने के पीछे के विचार और दृष्टिकोण किसी भ्रष्ट स्वभाव द्वारा शुरू या उत्पन्न किए जाते हैं। तो देखा तुमने, जब मानवता के दोष में जन्मजात स्थितियाँ शामिल होती हैं तो इसका किसी भ्रष्ट स्वभाव से कोई संबंध नहीं होता है। लेकिन जब मानवता के दोष में व्यक्ति के चरित्र के घिनौने, विकृत या नकारात्मक तत्व शामिल होते हैं तो इसमें एक भ्रष्ट स्वभाव जरूर शामिल होता है। तुम समझ गए? (हाँ।)

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