सत्य का अनुसरण कैसे करें (9) भाग पाँच
दयालुता
अगली अभिव्यक्ति दयालुता है। यह अभिव्यक्ति मानवता का एक गुण है। इतनी सारी चर्चा करने के बाद अंत में हम मानवता के एक गुण पर आ पहुँचे हैं; सही मायने में मानवता के बहुत-से गुण नहीं हैं। दयालुता मानवता का एक प्रकार का गुण है। चूँकि यह एक गुण है, इसलिए हमें इसके बारे में विस्तार से बात करनी पड़ेगी क्योंकि ज्यादातर लोगों में मानवता के उन इने-गिने गुणों की अभिव्यक्तियाँ नहीं होती हैं जो लोगों में पाए जा सकते हैं। तो आओ, हम एक नजर डालें; दयालुता के गुण कहाँ निहित होते हैं? (दयालुता का मतलब है कि कोई व्यक्ति अपेक्षाकृत सच्चा है। जब वह चीजें सँभालता है तो दूसरे लोग अपेक्षाकृत आश्वस्त महसूस करते हैं। वह खुद को सौंपे गए काम अच्छी तरह से सँभालने के लिए दायित्व उठाता है।) (दयालु लोगों में अपेक्षाकृत अच्छा नैतिक आचरण होता है, वे दूसरों का ध्यान रखते हैं और दूसरों की तरफ से सोचते हैं।) दूसरों की तरफ से सोचना—यह एक महान शैली है! ऐसे लोग महान होते हैं, लेकिन क्या दयालुता इतनी महान है? (नहीं।) दयालुता का केवल यह मतलब है कि व्यक्ति के विचार इतने जटिल नहीं हैं; वे अपेक्षाकृत सरल हैं, कपटी नहीं हैं; ये लोग उदार होते हैं, दूसरों के प्रति कठोर नहीं होते हैं और दूसरों से संबंध बनाते समय व्यक्तिगत फायदों और नुकसानों का हिसाब नहीं लगाते हैं। अगर कोई उनका अपमान करता है तो वे कुछ देर के लिए परेशान हो जाते हैं, लेकिन फिर वे सोचते हैं, “इसे भूल जाओ” और मामले को जाने देते हैं। अगर किसी व्यक्ति पर लंबे समय से उनका उधार है और उसने अब तक पैसे नहीं चुकाए हैं तो वे इस पर विचार करते हैं : “उससे भुगतान करने का आग्रह करना शर्मनाक होगा। इसके अलावा, वह मुश्किल परिस्थिति में है और उस समय मेरी आर्थिक स्थिति उससे बेहतर थी। तो मैंने उसे उधार दे दिया, बस। मैं इसे बस गरीबों की मदद करना मानूँगा।” देखा तुमने, उनके विचार अपेक्षाकृत उदार और सहनशील हैं। उदाहरण के लिए, जब दूसरे लोग उन्हें गलत समझते हैं, तो वे बुरा नहीं मानते और अपनी सफाई पेश नहीं करते। जब दूसरे लोग उनके बारे में राय बनाते हैं और उन्हें बेवकूफ कहते हैं तो वे परवाह नहीं करते। अपना कर्तव्य करते समय उन्हें ऐसा महसूस नहीं होता है कि यह थकाऊ है और वे वे चीजें करते हैं जिन्हें दूसरे लोग करने को तैयार नहीं होते हैं। कोई उनका मजाक उड़ाता है, कहता है, “बाकी सभी लोग आराम कर रहे हैं तो तुम अभी भी काम क्यों कर रहे हो?” वे जवाब देते हैं, “जरा-सा और काम करने में क्या नुकसान है? इससे मुझे थकान नहीं होती है। क्या काम करना वाकई किसी को थका सकता है? अगर दूसरे लोग इसे नहीं करते हैं तो उन्हें रहने दो। चूँकि मैं इसे कर सकता हूँ इसलिए मैं बस जरा-सा और करूँगा।” वे ऐसे मामलों को लेकर ज्यादा परेशान नहीं होते हैं और कार्य करने के लिए कार्रवाई करते हैं। वे फायदों और नुकसानों को लेकर ज्यादा परेशान नहीं होते हैं और न ही वे प्रतिष्ठा या रुतबे को लेकर ज्यादा परेशान होते हैं। यहाँ तक कि जब वे खुद नुकसान सहते हैं तो वे इसका जिक्र नहीं करते हैं। जब दूसरे लोगों के सामने मुश्किलें आती हैं तो वे मदद करने की पहल करते हैं। उनकी सहायता में उनका अपना इरादा और उद्देश्य नहीं होता है और अगर दूसरे लोग उनके एहसान का बदला चुकाना चाहते हैं तो उन्हें लगता है कि थोड़ी-सी मदद करना कोई बड़ी बात नहीं है और यह कुछ ऐसा है जो उन्हें करना चाहिए। दूसरे लोगों की मदद करने के बाद अगर वे लोग उनकी सराहना न भी करें, तो भी वे ऐसी चीजों को लेकर ज्यादा परेशान नहीं होते हैं। जब दूसरों की मदद करने का समय आता है तो वे फिर भी मदद करते हैं। क्या ऐसे लोग बहुत सारे हैं? (बहुत सारे नहीं हैं।) ऐसे लोग बहुत सारे नहीं हैं। भले ही वे दयालु हों, लेकिन वे जिस तरीके से आचरण करते हैं उसकी कुछ सीमाएँ होती हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग हमेशा ऐसे व्यक्ति का फायदा उठाना चाहते हैं, उसे बेवकूफ समझते हैं। फायदा उठाने के बाद वे उसे फुसलाने के लिए कुछ सुखद बातें कहते हैं और कुछ समय बाद वे फिर से उसका फायदा उठाते हैं। जब दयालु व्यक्ति देखता है कि यह कभी खत्म नहीं होगा, तो वह परवाह नहीं करता, उनके साथ बहस और तर्क-वितर्क नहीं करता है। वह अपने दिल में जानता है कि ऐसे लोग अच्छे नहीं होते हैं और मेलजोल रखने के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं, इसलिए वह तब से उन्हें अनदेखा कर देता है। लेकिन वह पीठ पीछे उनके बारे में राय नहीं बनाता। ज्यादा-से-ज्यादा जब कोई इस किस्म के व्यक्ति के बारे में उससे पूछता है तो वह कहता है, “उस व्यक्ति को बस छोटे-मोटे फायदे उठाना अच्छा लगता है।” वह बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताता और न ही वह आवेगशीलता से लोगों के बारे में राय बनाता है; वह बस मौजूदा मामले के बारे में बोलता है। दयालु लोगों की मानवता वाकई काफी अच्छी होती है। उनका गुण यह है कि वे चीजों को लेकर ज्यादा परेशान नहीं होते हैं। वे चाहे कुछ भी करें, वे आवेगशीलता, मनोभावों या भावनाओं के आधार पर कार्य नहीं करते हैं; वे सिर्फ वही करते हैं जो लोगों को करना चाहिए और वही जिम्मेदारियाँ पूरी करते हैं जो लोगों को पूरी करनी चाहिए। सामान्य पारस्परिक संबंधों के दायरे में वे वही करते हैं जो उन्हें करना चाहिए; वे जो कुछ भी कर सकते हैं उसे करने का भरसक प्रयास करते हैं, दूसरों की मदद करने के लिए भरसक प्रयास करते हैं और वे ऐसा सच्चाई और गंभीरता से करते हैं। उनमें से कुछ लोग किसी इनाम के लिए प्रयास तक नहीं करते हैं, वे सोचते हैं, “मैं बस मदद कर रहा हूँ। तुम्हें ऐसा महसूस करने की जरूरत नहीं है कि तुम पर मेरे बहुत-से एहसान हैं और सिर्फ इसलिए क्योंकि तुम पर मेरा यह जरा-सा एहसान है तुम्हें ऐसा महसूस करने की जरूरत नहीं है कि तुम मेरा एहसान कभी नहीं उतार सकते, और तुम्हें मेरे सामने हमेशा खुशामदी और अत्यधिक सम्मानजनक व्यवहार करने की जरूरत नहीं है। यह फिजूल है।” ऐसे व्यक्तियों में सबसे अच्छी मानवता होती है। वे धोखेबाज नहीं होते हैं और न ही दूसरों के प्रति कठोर होते हैं। उनके दिल गर्मजोशी से भरे होते हैं और उनकी मानवता का एक दयालु पक्ष होता है। वे जो कुछ भी करने में सक्षम होते हैं उसे करते हैं, व्यक्तिगत फायदों और नुकसानों को लेकर ज्यादा परेशान नहीं होते हैं और उन्हें इनामों की ज्यादा परवाह नहीं होती है। यह मानवता का एक गुण है। अपने आस-पास नजर दौड़ाओ और देखो कि किसमें ऐसे गुण हैं। अगर किसी व्यक्ति का चरित्र ऐसा है तो उसे भ्रष्ट मानवजाति के बीच एक अच्छा व्यक्ति, एक शालीन व्यक्ति माना जा सकता है। वह चीजों को लेकर ज्यादा परेशान नहीं होता है, वह धोखेबाज नहीं होता है, दूसरों के प्रति कठोर नहीं होता है और मुनाफे की इच्छा किए बगैर दूसरों की मदद करता है। वह दूसरों के प्रति विशेष रूप से सहनशील होता है और अपने स्व-आचरण में बहुत उदार होता है। बहुत उदार होने का क्या मतलब है? इसका मतलब है छोटी-छोटी बातों को लेकर लगातार परेशान नहीं रहना और जब दूसरे उसका फायदा उठाएँ तो उनके प्रति नाराजगी नहीं रखना। इसे उदार होना कहते हैं और यह मानवता का एक प्रधान गुण है। दयालुता भी एक गुण है और उसी तरह उदारता भी एक गुण है। यह उन लोगों से अलग है जो तुच्छ होते हैं, जिनमें संदेह करने की प्रवृत्ति होती है, जो संवेदनशील और जिद्दी होते हैं—ये लोग छोटी-छोटी बातों को लेकर लगातार परेशान रहते हैं, उनकी नाक पर गुस्सा चढ़ा रहता है, वे गुस्से से फूल जाते हैं, वे डरावने भावशून्य चेहरे वाले होते हैं, वे खुद से बात करने वाले हर व्यक्ति को अनदेखा कर देते हैं और वे कुछ भी नहीं सोचते सिवाय इसके कि दूसरों से कैसे बदला लिया जाए। इनमें से कोई भी चीज ऐसी नहीं है जो सामान्य लोगों में होनी चाहिए। दयालु लोगों के विचारों में वे जटिल मामले नहीं होते हैं और न ही उनमें दूसरों के बारे में संदेहजनक विचार होते हैं। उनके दिल में सब कुछ वही होता है जो सामान्य लोगों में होना चाहिए; यह विशेष रूप से मानवता के जमीर और विवेक और साथ ही मानवता में न्याय की भावना और दयालुता के मानक के अनुरूप है। जब तुम उनसे मेलजोल रखते हो तो तुम बहुत आराम महसूस करते हो और तुम्हें लगता है कि चीजें बहुत सरल हैं—परेशानी वाले मामले बहुत सारे नहीं हैं और तुम्हें किसी भी चीज से चौकस रहने की जरूरत नहीं है। तुम्हें उनके विचारों के बारे में अटकलें लगाने की या अंधेरे में तीर चलाने की जरूरत नहीं होती है। अगर तुम उन्हें गलती से ठेस पहुँचा भी देते हो तो भी तुम्हें किसी दुष्परिणाम के बारे में फिक्र करने की जरूरत नहीं होती है—यकीनन तुम्हें कोई दुष्परिणाम भुगतने की भी जरूरत नहीं होती है। यह संभव है कि जब तुम्हें गुस्सा आए तो तुम आवेगपूर्ण हो जाओ और चिल्लाकर उन्हें कुछ कठोर शब्द कह दो और उस समय वे भी तुमसे झगड़ा और बहस कर लें, लेकिन बहस के बाद वे कोई वैर-भाव नहीं रखेंगे और न ही तुम्हारे खिलाफ कोई साजिश रचेंगे या तुमसे बदला लेंगे। तुम्हें इस बात की फिक्र करने की जरूरत नहीं है कि अगर उन्हें रुतबा मिल गया तो वे तुम्हारे लिए चीजें मुश्किल बना देंगे या तुम्हारी मामूली-सी गलतियों पर तुम्हें टोकेंगे और न ही तुम्हें इस बात की फिक्र करने की जरूरत है कि वे बगैर किसी कारण के तुम्हें निशाना बनाएँगे। उनमें ऐसी कोई बात होती ही नहीं है—वे बस इतने सरल होते हैं। उस पल से वे अपने मन में तुम्हारे खिलाफ बिल्कुल कोई बुरी राय बनाकर नहीं रखेंगे। जब एक बार मामला खत्म हो गया तो वह खत्म हो गया। उसके बाद जब वे तुमसे बात करते हैं, वे अब भी तुमसे सामान्य ढंग से पेश आते हैं। भले ही वे उस समय गुस्से में थे और उन्होंने तुमसे झगड़ा किया, फिर भी बाद में वे तुम्हारे खिलाफ मन में कोई नाराजगी नहीं रखते हैं। उन्हें पता है कि तुमने सिर्फ कुछ गुस्से वाले शब्द कह दिए और वे इसे समझ सकते हैं : “ऐसा कौन है जो गुस्से में कुछ कठोर शब्द नहीं कह जाता? यह जानबूझकर नहीं किया गया था। इसके अलावा, हर किसी में भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, हर किसी के ऐसे समय आते हैं जब उसका मिजाज खराब होता है और हर किसी में आवेगशीलता होती है। उसके बाद, जब तक हर कोई शांत हो जाता है, अपनी गलतियाँ मान लेता है और इस तथ्य पर चिंतन करता है कि उसने भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किए और वह सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने में विफल रहा, तब तक कोई बात नहीं।” वे तुम्हें माफ कर देंगे, वे उन कुकर्मियों की तरह नहीं हैं जो तुम्हें लगातार सताते रहते हैं और तब तक नहीं रुकते जब तक कि वे तुम्हें तबाह न कर दें। आमतौर पर दयालु लोगों में बदला लेने वाला दिल नहीं होता है। अगर तुम कोई ऐसी चीज करते हो जो उन्हें अपमानित करती है तो वे कभी-कभी तुमसे नफरत कर सकते हैं, लेकिन वे मानवता की नैतिकता का उल्लंघन बिल्कुल नहीं करेंगे और तुम्हें यातनाएँ देने के लिए घिनौने साधनों का उपयोग नहीं करेंगे। भले ही उनमें भ्रष्ट स्वभाव हों और हो सकता है कि वे उन भ्रष्ट स्वभावों के आधार पर कुछ चीजें कह दें या कर दें—जैसे कि अतीत में तुम्हारे द्वारा की गई गलतियों का जिक्र करना या तुम्हारी काट-छाँट करना—लेकिन वे अचानक कहीं से मनगढ़ंत बातें नहीं बनाएँगे या तुम पर धावा बोलने या तुमसे बदला लेने के लिए अपनी शक्ति का उपयोग नहीं करेंगे। भले ही वे तुम पर वार करना या तुमसे बदला लेना चाहते हों और उनमें इस तरह का भ्रष्ट स्वभाव हो, लेकिन क्योंकि उनकी मानवता में दयालुता का गुण होता है इसलिए जब वे बदला लेना चाहेंगे तो भी वे संयमित रहेंगे और चीजों को उचित सीमाओं में रखने में समर्थ होंगे। अगर शक्ति वाला कोई भ्रष्ट इंसान अब भी यह स्तर प्राप्त कर सकता है तो यह पहले से ही काफी सराहनीय है। ज्यादातर लोग, अगर उनमें यह गुण न हो तो वे संयम की यह सीमा भी प्राप्त करने में असमर्थ होते हैं और दूसरों पर धावा बोलने और उनसे बदला लेने से नहीं रुक पाते हैं।
दयालुता की अभिव्यक्ति या प्रकाशन मानवता का एक गुण है। मानवता का यह गुण काफी हद तक लोगों को सीमित या प्रेरित करेगा जिससे जब उनका भ्रष्ट स्वभाव प्रकट होगा तब वे एक निश्चित हद तक नियंत्रण और संयम प्राप्त करने में समर्थ होंगे। अगर ऐसा दयालु व्यक्ति कोई ऐसा व्यक्ति है जिसमें आध्यात्मिक समझ है, जो सत्य समझ सकता है और सत्य स्वीकार सकता है, तो उसकी मानवता का यह गुण उसे लोगों और चीजों को देखते समय, आचरण करते समय और कार्य करते समय सत्य सिद्धांतों का और सख्ती से पालन करने में समर्थ बना सकता है, है ना? (हाँ।) दूसरी तरफ, धूर्त व्यक्ति कहीं ज्यादा मक्कार होता है और दयालु व्यक्ति से अलग होता है। कुछ बुरा करने के बाद वह न सिर्फ आत्म-चिंतन नहीं करता है, बल्कि अपने गलत कर्मों को और तेज भी कर देता है और इस पर अंत तक अमल करता है। यह उसे एक दानव में बदल देता है, जो कि उन सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है जिनके अनुसार दयालु व्यक्ति कार्य करता है। उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति दयालु है और उसमें मानवता का यह गुण है, तो तुमसे बहस करते समय वह तथ्यों के आधार पर बात करेगा। वह बढ़ा-चढ़ाकर बातें नहीं करेगा, तुम्हारे बारे में हवा-हवाई कुछ नकारात्मक चीजें नहीं गढ़ेगा, या सिर्फ इसलिए तुम्हें बदनाम और तुम्हारी सत्यनिष्ठा का अपमान नहीं करेगा क्योंकि वह तुमसे नाराज है। वह ऐसी चीजें बिल्कुल नहीं करेगा। तुमसे बहस करते समय वह घमंडी या क्रूर स्वभाव प्रकट कर सकता है, लेकिन वह जो शब्द कहता है वे उसके जमीर, विवेक और दयालु मानवता से पूरी तरह से संयमित होते हैं। इस तरह से, एक निश्चित स्तर पर, तुम्हें पहुँचाए गए नुकसान की तीव्रता कम हो जाती है। लेकिन कुकर्मियों में मानवता का दयालु पहलू नहीं होता है। कुकर्मी कैसे झगड़ते हैं? “तुम फूहड़ हो, एक वेश्या हो! मैं तुम्हारे पूर्वजों की आठ पीढ़ियों का अपमान करता हूँ और तुम्हारे पूर्वजों की आठ पीढ़ियों को शाप देता हूँ!” वे सभी प्रकार की कठोर और दुर्भावनापूर्ण चीजें कहेंगे। कुकर्मी ऐसे ही होते हैं—उनका चरित्र नीच होता है। नीच चरित्र वाले कुछ लोग अपनी गालियों को तथ्यों पर आधारित नहीं करते हैं। वे उन्हें तथ्यों पर आधारित क्यों नहीं करते हैं? क्योंकि उनमें जमीर नहीं होता है और वे जमीर के मानक पूरे नहीं करते हैं। जब वे दूसरों का अपमान करते हैं, तो वे अपने जमीर द्वारा सीमित नहीं होते हैं। वे बेतहाशा गालियाँ देते हैं, उनके मन में जो भी अपशब्द आते हैं, वे उन्हें कह देते हैं। जो भी शब्द उनकी नफरत को बाहर निकाल सकें, तुम्हारे दिल को गहराई से चोट पहुँचा सकें और तुम्हें गुस्से से पागल कर सकें—वे वही शब्द कहेंगे। उनकी गालियाँ वाकई तुम्हें इतना गुस्सा दिला सकती हैं कि तुम गुस्से से मर जाओ। ऐसे लोगों के दिलों में कोई दया नहीं होती है और वे द्वेष से भरे होते हैं। कुकर्मी जो प्रकट करते हैं, वह मुख्य रूप से घमंड और क्रूरता, ये दो प्रकार के स्वभाव होते हैं। सारतः, वे जिन शब्दों की बौछार करते हैं, उनमें शाप निहित होते हैं, वे शैतान के द्वेष से भरे होते हैं और उनमें पर्याप्त विनाशकारी शक्ति होती है; यहाँ तक कि वे शाप देने के सबसे दुर्भावनापूर्ण शब्दों की भी बौछार कर सकते हैं। अगर तुममें मानवता है या अगर तुम्हारी मानवता दयालु है तो तुम ऐसी गालियाँ नहीं दे सकते; इसके अलावा, तुम हवा-हवाई चीजें नहीं गढ़ सकते। वह इसलिए क्योंकि तुममें जमीर की भावना है, तुममें तार्किकता है और तुम्हारे जमीर में नेकदिल और दयालु होने का पहलू तुम पर बहुत संयम और नियंत्रण रखता है जिससे ऐसी गालियाँ देना तुम्हारे लिए असंभव हो जाता है। जब कोई तुम्हारा अपमान करता है तब तुम्हें गुस्सा आता है और तुम उनके पूर्वजों की आठ पीढ़ियों का अपमान करना चाहते हो और उन्हें शाप देना चाहते हो, यह कहना चाहते हो कि उन्हें नरक में जाना चाहिए, लेकिन तुम इस पर विचार करते हो : “मुझे उन्हें शाप देने का क्या अधिकार है? मैं परमेश्वर नहीं हूँ और मेरा फैसला अंतिम नहीं होता।” तुम भी उन्हें अश्लील शब्दों से अपमानित करना चाहते हो लेकिन तुम इस पर विचार करते हो : “अगर मैंने अश्लील शब्दों का उपयोग किया तो मुझे भी तो घिनौना महसूस होगा—तो फिर मेरे आस-पास के लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि मुझमें कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं है? क्या मैं झगड़ालू औरत की तरह कार्य नहीं कर रहा होऊँगा? मैं उस तरह का व्यक्ति नहीं बनूँगा।” तुम उनका अपमान करने के लिए खुद को तैयार ही नहीं कर सकते। इसलिए काफी हद तक तुम्हारी बोली संयमित रहती है और तुम जो शब्द कहने के लिए खुद को तैयार कर सकते हो वे बहुत सीमित होते हैं। ज्यादा-से-ज्यादा तुम शायद यह कह सकते हो, “तुम शैतान हो, तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव गंभीर है, तुम उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते और परमेश्वर तुम्हें पसंद नहीं करता।” तुम ज्यादा-से-ज्यादा शायद ऐसी कुछ चीजें कह सकते हो, लेकिन फिर तुम इस पर विचार करते हो : “परमेश्वर किसी को नापसंद करता है या नहीं, यह तय करना मेरा काम नहीं है” और इसलिए ऐसा कहते समय तुममें आत्मविश्वास नहीं होता है। जब कोई तुम्हारा अपमान करता है और तुम्हें शाप देता है, तुम्हें नरक के अठारहवें स्तर पर जाने के लिए कहता है, तब तुम मन ही मन सोचते हो : “किसी को शाप देना, उसे नरक के अठारहवें स्तर पर जाने के लिए कहना—ये शब्द बहुत ही ज्यादा कठोर हैं! मैं ऐसा कुछ नहीं कह सकता। मुझे अपने शब्द और कोमल रखने चाहिए!” तुम ये विचार रखने में क्यों समर्थ हो? क्योंकि तुम्हारी मानवता में जो मौजूद है वह कुकर्मियों की मानवता से अलग है। अगर तुम दयालु और नेकदिल हो और तुममें जमीर और विवेक है, तो तुम जो शब्द कहोगे वे बहुत तर्कसंगत होंगे। तुम अपने जमीर की सीमा में कुछ गुस्से वाले शब्द कह सकते हो या तुम्हारे मुँह से कुछ गंदे शब्द निकल सकते हैं, लेकिन उन्हें कहने के बाद तुम खुद ही बहुत क्रोधित हो जाते हो और तुमने दूसरे व्यक्ति को वाकई ठेस नहीं पहुँचाई होती है—तुम्हारे शब्दों में विनाशकारी शक्ति नहीं होती है। कुकर्मी जितना ज्यादा दूसरों का अपमान करते हैं, उतने ही ज्यादा वे खुश होते हैं, जबकि तुम जितना ज्यादा दूसरों का अपमान करते हो, उतने ही ज्यादा क्रोधित हो जाते हो—तुम मन ही मन सोचते हो : “इसे भूल जाओ, ऐसे घिनौने चरित्र और कुकर्मी के स्तर तक गिरना बेकार और निरर्थक है। मैं अब उससे और झगड़ा नहीं करूँगा।” किसी कुकर्मी से बहस करना उतना ही बुरी तरह बेअसर है जितना कि शैतान के साथ सत्य के बारे में बात करने का प्रयास करना। उसके साथ चीजों को लेकर बहस करने या ज्यादा परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है। बस भविष्य में ऐसे लोगों से दूर रहो। क्या तुम उन्हें नुकसान पहुँचाने के बारे में सोचोगे? क्या तुम उनसे बदला लेने के बारे में सोचोगे और उन्हें सबक सिखाने का अवसर ढूँढ़ोगे? तुम्हारे पास उतना बेरहम दिल नहीं है। तुम बस खुद से यही कहते रहते हो, “इसे भूल जाओ। उसकी दी हुई कुछ गालियों के कारण मेरा कोई नुकसान नहीं हुआ है; मैं इस बात को लेकर उससे ज्यादा परेशान नहीं होऊँगा।” कुछ लोग यह कहकर खुद को दिलासा भी देते हैं, “जो भी हो, परमेश्वर ने मुझे शाप नहीं दिया है। उस व्यक्ति के शापों का कोई असर नहीं होता है।” दरअसल, क्योंकि तुममें जमीर और विवेक है और तुम अपनी मानवता में दयालु और नेकदिल हो, इसलिए तुम वे गालियाँ नहीं दे सकते। वे तुम्हें गंदी और हीन लगती हैं। अगर वे शब्द तुम्हारे मुँह से बाहर आते तो तुम्हें लगता कि वे तुम्हारे जमीर के खिलाफ हैं। खासतौर पर जब मनगढ़ंत या निराधार मामलों की बात आती है तो तुम उन्हें और भी नहीं कह सकते। उन्हें कहने में असमर्थ होना तुम्हारे लिए एक बचाव है। उनके शब्दों में महत्वपूर्ण विनाशकारी शक्ति होती है और उन्होंने तुम्हें नुकसान पहुँचाया है—यह उनका बुरा कर्म है। यह बुरा कर्म कैसे हुआ? यह इसलिए हुआ क्योंकि उनकी मानवता में नीच गुण निहित हैं। जब तुम्हारे साथ उनके टकराव या विवाद होते हैं तो उनका भ्रष्ट स्वभाव बेहद बढ़ जाता है और वे तुम्हें बिना किसी रोक-टोक के शाप दे सकते हैं। उनमें इस प्रकार का बुरा चरित्र होता है इसलिए जाहिर है वे भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं। दूसरी तरफ, अगर तुम एक ऐसे दयालु और नेकदिल व्यक्ति हो जिसमें जमीर, विवेक और मानवता है, तो इस तरह की परिस्थिति में न सिर्फ तुम अपना भ्रष्ट स्वभाव बाहर नहीं निकालोगे, बल्कि तुम्हारी मानवता भी तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव के प्रकाशन पर काफी हद तक अंकुश लगाएगी। यह तुम्हारे लिए बेहद फायदेमंद है। ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि तुमने एक नुकसान सहा है, तुम कमजोर स्थिति में हो और किसी झगड़े में उन्हें नहीं हरा सकते जिससे तुम्हारी जगहँसाई होती है। दरअसल, तुम्हारी मानवता ने तुम्हारी रक्षा की है और तुम्हें बुरे कर्म करने से रोका है, उन चीजों को करने से रोका है जिन्हें परमेश्वर पसंद नहीं करता है या उन शब्दों को कहने से रोका है जो परमेश्वर को अच्छे नहीं लगते हैं। इस तरह से, क्या इससे कुछ हद तक तुम्हारी रक्षा नहीं हुई है? (हाँ।) मानवता के इस गुण ने तुम्हारी बहुत हद तक रक्षा की है और आगे तुम्हारे द्वारा भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते समय तुम्हें उन चीजों को करने से रोका है जिन्हें परमेश्वर पसंद नहीं करता है या जिनसे वह नफरत करता है या उन शब्दों को कहने से रोका है जिनसे परमेश्वर नफरत करता है और जिनकी निंदा करता है। वैसे तो इसे अच्छे कर्म के रूप में नहीं गिना जाता, लेकिन कम-से-कम तुमने बुरा कर्म तो नहीं किया है। तुमने इस परिस्थिति में जो किया उसकी निंदा नहीं की जाएगी और इसके लिए तुम्हें सज़ा नहीं दी जाएगी। इसके विपरीत, कुकर्मियों की न सिर्फ निंदा की जाएगी, बल्कि वे अपने बुरे चरित्र के अधीन होकर जो चीजें करते हैं उनके लिए उन्हें सज़ा भी दी जाएगी। उन्हें नतीजे भुगतने होंगे और जिम्मेदारी उठानी होगी। इसलिए, जो लोग अपनी मानवता में विभिन्न गुण रखते हैं, वे कुछ मामलों में अपनी प्रतिष्ठा, रुतबा और गरिमा खो सकते हैं और खासतौर से अपने विवेक के समर्थन में बहस करने की पहल करने का अवसर खो सकते हैं, लेकिन यह नुकसान सहना नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, “अगर यह नुकसान सहना नहीं है तो क्या इसका मतलब यह है कि यह फायदा उठाना है?” इसे नुकसान सहने या फायदा उठाने के लिहाज से नहीं मापा जा सकता। तो इसे कैसे मापा जाना चाहिए? इसे ऐसे मापा जाना चाहिए : किसी परिस्थिति में नुकसान सहना कोई मायने नहीं रखता; महत्वपूर्ण चीज यह है कि तुम इससे लाभ प्राप्त कर सकते हो। इस परिस्थिति में तुम्हारी मानवता के गुणों ने तुम्हारे व्यवहार का बचाव किया है, तुम्हें बुरे कर्म करने से रोका है और यह सुनिश्चित किया है कि परमेश्वर तुम्हारी निंदा न करे। क्या यह लाभ प्राप्त करना नहीं है? बुरे कर्म करने के नतीजतन अब तुम संभवतः सज़ा नहीं भुगत सकते। क्या यह तुम्हारे लिए अच्छी चीज नहीं है? (हाँ।) भले ही यह कोई ऐसा अच्छा कर्म न हो जिसे तुमने सक्रियता से किया हो और न ही यह सत्य सिद्धांतों का सक्रियता से पालन करने का कोई क्रियाकलाप हो, लेकिन अपनी मानवता में गुण होने की रूपरेखा में तुमने कुछ ऐसा किया है जो सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं करता है। इस तरह से तुम सुरक्षित हो। वैसे तो इसे याद नहीं रखा जाएगा लेकिन कम-से-कम इसकी निंदा तो नहीं की जाएगी। और इसलिए तुम्हें कोई जिम्मेदारी उठाने या सज़ा भुगतने की जरूरत नहीं है। क्या यह अच्छी बात नहीं है? (हाँ।) परमेश्वर का अनुसरण करने की प्रक्रिया में, तुम जो करते हो भले ही वह सत्य के अनुरूप हो या न हो और चाहे परमेश्वर इसे कैसे भी देखे, कम-से-कम तुम्हारा जमीर तो साफ रहता है। अगर परमेश्वर इसे याद नहीं रखे तो भी तुम्हें कम-से-कम परमेश्वर द्वारा निंदा किए जाने या परमेश्वर द्वारा नफरत किए जाने से तो बचना चाहिए। यह सबसे मूलभूत सिद्धांत है जिसका तुम्हें पालन करना चाहिए। क्या मानवता के गुण लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण नहीं हैं? (हाँ।) इसलिए सिर्फ इस कारण से लगातार अनिच्छुक महसूस मत करो कि तुम सोचते हो कि मानवता के कुछ गुण होने से तुम लोगों के बीच कम लोकप्रिय हो जाते हो, तुम हमेशा फायदा उठाने या लाभ प्राप्त करने से चूक जाओगे और दूसरे लोग सारे फायदे ले लेंगे जबकि तुम्हें हमेशा नुकसान सहना होगा। नुकसान सहने में इतना क्या बुरा है? कम-से-कम तुम उसी चीज का आनंद ले रहे हो जो परमेश्वर ने तुम्हें मूल रूप से दी है और तुमने दूसरों की चीज नहीं ली है। अगर तुम फायदा उठाते हो तो यह सही नहीं है—इसका मतलब यह है कि तुमने दूसरों के हिस्से का लिया है। अगर तुम वह लेते हो जो तुम्हारा नहीं है तो परमेश्वर तुम्हारी निंदा करेगा। लोगों को ऐसी चीजें नहीं करनी चाहिए जिनकी परमेश्वर निंदा करता है। कुछ लोग कहते हैं, “मुझे नहीं पता कि मुझे ऐसे किस तरह के क्रियाकलाप करने चाहिए जिन्हें परमेश्वर याद रखेगा।” लेकिन क्या तुम्हें यह पता है कि परमेश्वर किन क्रियाकलापों की निंदा करता है? अगर तुम्हें पता है तो कम-से-कम तुम्हें इस सीमा का पालन करना चाहिए : ऐसी चीजें मत करो जिनकी परमेश्वर निंदा करता है। क्या तुम समझ गए हो? (हाँ।) अब जबकि हमने इन मामलों पर और चर्चा कर ली है, तुम्हें समझ आ जाना चाहिए।
ज्यादातर लोगों की मानवता में दयालुता का गुण नदारद रहता है। लेकिन अगर किसी के पास सही मायने में यह गुण है तो वह भ्रष्ट मानवजाति में सही मायने में एक अच्छा व्यक्ति है—ऐसे लोग बहुत दुर्लभ हैं। अगर तुममें सही मायने में यह गुण है, तो परमेश्वर तुम्हें आशीष देगा, परमेश्वर हर मोड़ पर तुम पर अनुग्रह बरसाएगा। मानवीय शब्दों में इसका मतलब है कि हर मोड़ पर परमेश्वर तुम्हारी देखभाल करेगा। वह कैसे तुम्हारी देखभाल करता है? तुम्हारे लिए परमेश्वर की देखभाल यह है कि भले ही तुम हमेशा दूसरों के बारे में सोचते हो, अपने हित छोड़ देते हो और दूसरे लोग तुम्हारा फायदा उठाते हों लेकिन वे परमेश्वर का आशीष प्राप्त नहीं कर सकते हैं। वे सिर्फ दूसरों का फायदा उठाकर जी सकते हैं और उन्हें अगले जीवन में इसका प्रतिफल चुकाना पड़ेगा। लेकिन तुम परमेश्वर के आशीषों से जीते हो। वैसे तो दूसरे लोग तुम्हारा फायदा उठा सकते हैं लेकिन वास्तव में तुम कुछ भी नहीं खोते। मुझे बताओ, क्या यह अच्छा है? (हाँ।) देखा तुमने, बाहर से ऐसा लगता है कि दयालु लोग हमेशा नुकसान सहते हैं। लोग उन्हें सरल और निष्कपट के रूप में देखते हैं, इसलिए बोलते और कार्य करते समय वे हमेशा उनका फायदा उठाते हैं, उनके साथ बेवकूफों की तरह पेश आते हैं, उन्हें डराते-धमकाते हैं, उनसे पैसे और लाभ दोनों ऐंठते हैं और उनकी बहुत सारी संपत्ति जब्त कर लेते हैं। लेकिन क्या तुम्हें दयालु लोगों के पास किसी चीज की कमी दिखाई देती है? उन्हें किसी चीज की कमी नहीं होती। उन्हें हर चीज भरपूर मात्रा में प्रदान की जाती है। चीजें करते समय उनके पास बुद्धिमत्ता और बुद्धिमानी होती है और वे चिंता नहीं करते हैं। परमेश्वर का घर उन्हें जो भी कर्तव्य सौंपता है उससे संबंधित फायदों और नुकसानों को लेकर वे ज्यादा परेशान नहीं होते हैं और न ही वे लड़ते या होड़ करते हैं। वे बस वही करते हैं जो उन्हें करने के लिए कहा जाता है। काम चाहे जो भी हो, वे मुश्किल से ही कभी गलतियाँ करते हैं। अगर कभी-कभार मामूली समस्याएँ या छोटी-मोटी गलतियाँ हो भी जाएँ, तो वे जानबूझकर नहीं की गई होती हैं। वे जो भी करते हैं उसमें अपने दिल लगा देते हैं, वे अपने जमीर और विवेक के मामले में न्यूनतम आधाररेखा को पार कर जाते हैं और परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार सकते हैं। इसलिए ऐसे लोग परमेश्वर का आशीष प्राप्त कर सकते हैं। चूँकि तुम्हें मालूम है कि दयालुता मानवता का एक गुण है तो क्या तुम्हें अपने आत्म-आचरण में इसकी तरफ भरसक प्रयास करना चाहिए? (हाँ।) मामूली मुद्दों की परवाह मत करो और ऐसे व्यक्ति की तरह मत बनो जो इतना चिड़चिड़ा हो कि कोई भी उसके पास जाने या उसे उकसाने की हिम्मत नहीं करता—उस तरह के व्यक्ति मत बनो। अगर दूसरे लोग तुम्हारा थोड़ा-सा फायदा उठाते हैं तो हमेशा ऐसा मत सोचो कि वे तुम्हें डरा-धमका रहे हैं। थोड़ा अधिक सरल और ज्यादा निष्कपट होने में इतना क्या बुरा है? कुछ लोग बहुत ही ज्यादा चालाक होते हैं और हमेशा यह साबित करना चाहते हैं कि वे बेवकूफ नहीं हैं और कहते हैं, “मुझे बेवकूफ मत समझो। मेरे पास दिमाग है! मैं देख सकता हूँ कि कौन मुझे पसंद नहीं करता है या मेरे साथ खराब तरीके से पेश आता है। मैं बता सकता हूँ कि कौन मुझे नीची नजर से देखता है और किसके शब्दों में ताने या छिपे हुए शूल भरे होते हैं।” ऐसी चीजें देखने और सुनने में समर्थ होना बेकार है। यह सिर्फ तुच्छ चतुराई और चालाकी है। यह जरा-सी चालाकी होने का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे पास बुद्धिमानी है या तुम वाकई होशियार हो। इसके विपरीत, लोग तुम्हें नीची नजर से देखेंगे क्योंकि जानवरों में भी इस तरह की चालाकी और तुच्छ विचार होते हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? जिन लोगों का जानवरों के साथ नजदीकी संपर्क रहता है वे सभी यह बात जानते हैं : यहाँ तक कि छोटे जानवरों के बारे में जब तुम सुखद या अप्रिय बातें कहते हो, तो वे भी इसे समझ सकते हैं। उदाहरण के लिए, अगर कोई कुत्ता तुम्हें अप्रिय बातें कहते सुन ले तो वह तुरंत दुखी हो जाएगा, जबकि अगर तुम कुछ सुखद बातें कहते हो तो वह उसे भी समझ सकता है। अगर लोग खुद को मापने के लिए हमेशा ऐसी चीजों का उपयोग करते हैं जो छोटे जानवरों के पास भी होती हैं तो क्या यह उनके मनुष्य होने की विशेषता को नीचा नहीं कर देता है? सृजित मानवजाति को मापने का मानक नीचे लाकर तुम अपना मूल्य घटा रहे हो। हमेशा ऐसी चीजें मत कहो, “मुझे बेवकूफ मत समझो और मुझसे तीन वर्ष के बच्चे की तरह मत पेश आओ। अगर तुम मुझे मकई की रोटी दोगे तो मैं निश्चित रूप से उसे नहीं खाऊँगा; इसके बजाय मेरे लिए पकौड़े लेकर आओ। किसे नहीं पता कि पकौड़े लजीज होते हैं?” तुम बेवकूफ नहीं हो, इसे साबित करने का प्रयास करने के लिए ऐसे बेवकूफी भरे शब्दों का उपयोग मत करो। अगर तुम सही मायने में बेवकूफ नहीं हो तो मानवता के मानकों को पूरा करने का भरसक प्रयास करो। लोगों के जमीर और विवेक में क्या मौजूद होना चाहिए, मानवता के गुणों की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं, मानवता की कमियों और खराब चरित्र की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं—इन पहलुओं पर संगति करो और इन्हें समझो। लोगों में अपनी मानवता में क्या होना चाहिए और सृजित मानवजाति में क्या होना चाहिए, इस बारे में जरा-सी संगति करो, फिर उनकी तरफ भरसक प्रयास करो और उन्हें अपने पास रखने के लिए कड़ी मेहनत करो। क्या इससे तुम्हारा व्यक्तिगत मूल्य नहीं बढ़ जाएगा? क्या लगातार अपनी बुद्धिमत्ता की तुलना तीन वर्ष के बच्चे की बुद्धिमत्ता से करके तुम कभी कहीं पहुँच पाओगे? क्या इस तरीके से तुम कभी बड़े हो सकते हो? एक तीन वर्ष का बच्चा कहता है, “मैं प्लास्टिक की बोतल से दूध पी सकता हूँ” और तुम कहते हो, “मैं काँच की बोतल से पी सकता हूँ और मुझे अपने हाथ जलने का डर नहीं लगता।” तीन वर्ष का बच्चा कहता है, “मैं जूते पहनते समय बाएँ और दाएँ में अंतर कर सकता हूँ” और तुम कहते हो, “मैं स्वेटर पहनते समय सामने और पीछे वाले हिस्से में अंतर कर सकता हूँ। क्या तुम ऐसा कर सकते हो?” क्या इस तरह से तुम कभी कहीं पहुँच पाओगे? अगर तुम्हारी बुद्धिमत्ता, चरित्र और वे विभिन्न क्षमताएँ जो तुम्हारी मानवता में होनी चाहिए, वे एक तीन वर्ष के बच्चे या नाबालिग के चरण पर ही अटकी रहेंगी तो तुम्हारे लिए एक परिपक्व व्यक्ति बनना या दूसरों से तुम्हारे साथ एक वयस्क की तरह व्यवहार करवाना मुश्किल होगा। तुम दूसरे लोगों से तुम्हारे साथ एक वयस्क की तरह व्यवहार कैसे करवा सकते हो? तुम्हें वे चीजें करनी होंगी जो वयस्कों को करनी चाहिए और वे चीजें करनी होंगी जो सृजित मनुष्यों को करनी चाहिए। तुममें वह मानवता होनी चाहिए जो सृजित मनुष्यों में होनी चाहिए। इस मानवता में कम-से-कम क्या होना चाहिए? जमीर, विवेक, और अच्छे चरित्र के विभिन्न पहलू। इस तरह से अपनी मानवता के दोषों और समस्याओं के लिहाज से धीरे-धीरे तुम सुधर जाओगे और प्रगति करोगे। फिर सत्य में प्रवेश करना काफी आसान हो जाएगा और कम बाधाएँ होंगी।
मानवता में दयालुता का गुण काफी दुर्लभ है और यह ज्यादातर लोगों के पास नहीं होता है। तो कोई व्यक्ति इस गुण को कैसे प्राप्त कर सकता है? जब तुम कोई भी सत्य नहीं समझते हो तो मानवता का यह गुण अपने पास रखना और ऐसा व्यक्ति बनना बहुत मुश्किल है। लेकिन एक बार जब तुम कुछ सत्य समझ जाओगे तो तुम्हारे पास ऐसा व्यक्ति बनने का मार्ग होगा और तुम्हारे पास इसे प्राप्त करने की उम्मीद होगी। जहाँ तक यह प्रश्न है कि क्या तुम इसे प्राप्त कर सकते हो और अंत में नतीजे हासिल कर सकते हो, तो यह बात इस पर निर्भर करती है कि क्या तुम सत्य प्राप्त कर सकते हो और क्या तुम्हारे पास जीवन प्रवेश हो सकता है। यह गुण प्राप्त करने के लिए किस तरह से अभ्यास करना चाहिए? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई तुम्हारे साथ क्या करता है या तुमसे क्या कहता है, उससे आवेगशीलता या भावनाओं के आधार पर मत पेश आओ। यह विश्लेषण मत करो कि तुम्हारे प्रति उसके क्या इरादे हैं, उसने व्यक्तिगत रूप से तुम्हें कितना नुकसान पहुँचाया है या उसने तुम्हारी प्रतिष्ठा को कितना धूमिल किया है। अपने मन, मानव इच्छा, या सांसारिक आचरण के फलसफों के आधार पर इनमें से किसी भी मामले से पेश मत आओ। तो तुम्हें उनसे कैसे पेश आना चाहिए? परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों के आधार पर सभी चीजों से पेश आओ। यह सुनिश्चित करने का भरसक प्रयास करो कि हर परिवेश में और हर व्यक्ति का सामना करते समय, चाहे तुम उससे बात कर रहे हो, उससे मेलजोल रख रहे हो या कोई विशिष्ट मामला सँभाल रहे हो, तुम सत्य सिद्धांतों की तलाश करो और उनके अनुसार कार्य करो। पेश आने के इस तरीके का तुम्हारी मानवता पर काफी हद तक अनुकूलन प्रभाव पड़ेगा। यानी यह तुम्हारी मानवता के जमीर और विवेक को एक निश्चित मात्रा में समर्थन प्रदान करेगा, जो तुम्हें न्याय की भावना विकसित करने में मदद करेगा और तुम्हें लोगों और चीजों को सही स्थिति और परिप्रेक्ष्य से देखने में सक्षम बनाएगा। इसे ही अनुकूलन कहते हैं। अनुकूलन अपनी मूल रूप से खराब मानवता को अच्छा बनाना, सामान्य बनाना होता है। तो तुम्हारी मूल रूप से खराब मानवता कहाँ से उत्पन्न हुई? यह भ्रष्ट स्वभावों के प्रभाव और नियंत्रण से उत्पन्न हुई। अब अगर तुम परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों के आधार पर आचरण और कार्य करते हो, तो जब तुम कार्य करते हो, तो तुम्हारी मानवता परमेश्वर के वचनों और सत्य से काफी हद तक प्रभावित होगी। इसी प्रभाव को अनुकूलन कहते हैं। यकीनन इस अनुकूलन का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारी मानवता बदल जाएगी और तुम्हारा चरित्र एक अकेली घटना से महान बन जाएगा। इसके बजाय यह कार्य करने के लिए परमेश्वर के वचनों और सत्य को अपनी कसौटी, शैली और कार्य करने की दिशा मानकर, लंबे समय तक अभ्यास करने और अनुभव करने से आता है, जिस दौरान तुम सत्य को अधिकाधिक समझते जाओगे और सिद्धांतों के प्रति अधिकाधिक दृढ़ता के साथ मामले सँभालोगे। इस तरह से तुम्हारी मानवता धीरे-धीरे बदल जाएगी और एक सकारात्मक दिशा में विकसित होगी। तुममें जमीर की भावना का उत्तरोत्तर विकास होगा, तुम उत्तरोत्तर दयालु बनते जाओगे और तुममें उत्तरोत्तर न्याय की भावना आती जाएगी। तुम्हारा विवेक उत्तरोत्तर सामान्य होता जाएगा और तुम अब और आवेगशीलता के आधार पर कार्य नहीं करोगे या आवेगी नहीं बनोगे। इस प्रकार, काफी हद तक, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव पर तुम्हारी मानवता का जो अंकुश है वह उत्तरोत्तर मजबूत होता जाएगा। मानवता की ऐसी स्थिति की नींव पर तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों के प्रकाशनों पर अंकुश उत्तरोत्तर मजबूत होता जाएगा और अधिक शक्तिशाली होता जाएगा। इस प्रकार, भ्रष्ट स्वभावों के तुम्हारे प्रकाशन उत्तरोत्तर कम होते जाएँगे और उनकी मात्रा उत्तरोत्तर उथली होती जाएगी। तुम्हारे द्वारा किए जाने वाले क्रियाकलाप या तुम्हारे द्वारा प्रकट किए जाने वाले दृष्टिकोण उत्तरोत्तर सकारात्मक चीजों और सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होते जाएँगे। इस तरह की परिघटना, इस तरह का प्रकाशन यह दर्शाता है कि व्यक्ति का जीवन परिवर्तन से गुजर रहा है। विशेष रूप से, अगर तुम सत्य को कसौटी मानकर परमेश्वर के वचनों के अनुसार लोगों और चीजों को देखते हो, आचरण करते हो और कार्य करते हो, तो तुम्हारी मानवता उत्तरोत्तर सामान्य होती जाएगी और भ्रष्ट स्वभावों के तुम्हारे प्रकाशन उत्तरोत्तर कम होते जाएँगे। धीरे-धीरे तुम अपना भ्रष्ट स्वभाव छोड़ दोगे। यह एक सकारात्मक चक्र है। लेकिन अगर तुम शैतान के तर्क के अनुसार लोगों और चीजों को देखते हो, आचरण करते हो और कार्य करते हो, तो यह काफी हद तक तुम्हारी मानवता को मैला कर देगा और उसे धीरे-धीरे नष्ट कर देगा। तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव उत्तरोत्तर बढ़ता जाएगा और उत्तरोत्तर तेज होता जाएगा। यह एक दुष्चक्र है। परमेश्वर के वचनों के अनुसार लोगों और चीजों को देखना, आचरण करना और कार्य करना एक सकारात्मक चक्र है। शैतान के तर्क के अनुसार लोगों और चीजों को देखना, आचरण करना और कार्य करना तुम्हें सिर्फ एक दुष्चक्र के जीवन और परिवेश में अनंत काल तक घुमाता रहेगा, जिससे तुम कभी भी छूट नहीं पाओगे। अगर तुम सकारात्मक चक्र में प्रवेश करना चाहते हो तो पेश आने का सबसे सरल और सबसे सीधा तरीका यह है कि तुम अपनी मानवता की कमियों और अपनी भ्रष्टता के प्रकाशनों से शुरू करते हुए आत्म-चिंतन करना और खुद को समझना शुरू करो, परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों को आधार मानकर उपयोग करते हुए अपने भ्रष्ट स्वभाव हल करो और इस प्रकार सत्य का अभ्यास करने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम बनने का परिणाम प्राप्त करो। इस तरह से तुम्हारा जीवन एक सकारात्मक चक्र में प्रवेश करेगा, तुम्हारी मानवता उत्तरोत्तर सामान्य होती जाएगी और तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव धीरे-धीरे परिवर्तित होते जाएँगे और तुम उन्हें छोड़ दोगे। यह जीवन प्रवेश की प्रक्रिया है और लोगों के लिए अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ देने और उद्धार प्राप्त करने के लिए भी जरूरी प्रक्रिया है। यकीनन यह भी प्रवेश का एक मार्ग है। मानवता की कमियाँ और दोष और साथ ही नीच चरित्र और ईमानदारी की कमी की समस्याएँ जिन पर हमने चर्चा की है—अगर तुम खुद में इन समस्याओं की पहचान करते हो, तो तुम्हें उन्हें हल करने के लिए सत्य की तलाश करनी चाहिए। फिर, उन्हें परमेश्वर के वचनों और सत्य का अभ्यास करके बदल दो। इस तरह से तुम एक सकारात्मक चक्र में प्रवेश करोगे। अंत में, तुम जो प्राप्त करते हो वह न सिर्फ मानवता का परिवर्तन है, बल्कि तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ देना भी है। तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों की नींव जिस पर तुम जीवित रहने के लिए भरोसा करते हो परिवर्तित हो जाएगी। इस तरह से अभ्यास करना तुम्हें उद्धार प्राप्त करने की उम्मीद देता है। लेकिन अगर तुम इस तरह से सत्य की तलाश नहीं करते हो या सत्य का अभ्यास नहीं करते हो और तुम अपने दिल में सोचते हो, “तुम कहते हो कि मैं तुच्छ हूँ, मेरी मानवता में कमियाँ और दोष हैं, जैसे कि जिद्दी होना, बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला होना और संदेह करने की प्रवृत्ति वाला होना। खैर, मैं बस ऐसा ही हूँ और मैं इसी तरीके से जीऊँगा। मैं नहीं बदलूँगा। तुम्हें जो पसंद हो कहो! बहरहाल, मैं बस नुकसान सहना नहीं चाहता। जब तक मैं फायदा उठा सकता हूँ, मैं ठीक हूँ!”—अगर यही तुम्हारे विचार और दृष्टिकोण हैं तो अफसोस की बात है कि तुम एक दुष्चक्र के खौफनाक चक्कर में फँस जाओगे जिससे बाहर निकलने में तुम हमेशा के लिए असमर्थ रहोगे। अंतिम नतीजा क्या होगा? यह वह होगा जिसे तुम शायद देखना नहीं चाहते : तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव हमेशा के लिए तुम्हारा जीवन बन जाएँगे। वे जीवनभर के लिए तुम्हें कसकर बाँध देंगे, तुम्हारे विचारों और आत्मा की गहराई में गहरी जड़ें जमा लेंगे और तुम्हारे लिए उन्हें छोड़ देना असंभव हो जाएगा। उन्हें छोड़ देना असंभव हो जाने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि तुम्हारे पास उद्धार प्राप्त करने की कोई उम्मीद नहीं है और परमेश्वर द्वारा मानवजाति के लिए तैयार किए गए गंतव्य में तुम्हारा कोई हिस्सा नहीं है। यही नतीजा है। अगर तुम यह नतीजा नहीं देखना चाहते तो मैंने जो मार्ग बताया है उसमें प्रवेश करना और उस पर अभ्यास करना शुरू कर दो और एक सकारात्मक चक्र प्राप्त करो; और अंत में तुम निश्चित रूप से परिणाम प्राप्त कर लोगे। तुम समझ रहे हो? (हाँ।)
वैसे तो हमने आज की संगति में बहुत-से अलग-अलग विषय शामिल नहीं किए, लेकिन हमने बहुत सारी सामग्री पर चर्चा की। तो आओ, हम आज की संगति यहीं समाप्त करें। हम बाद में दूसरे विषयों और सामग्री पर संगति करना जारी रखेंगे। अलविदा!
2 दिसंबर 2023
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?