भ्रष्‍ट स्‍वभाव केवल सत्य स्वीकार करके ही दूर किया जा सकता है (भाग दो)

लोगों द्वारा सत्य प्राप्त करने की प्रक्रिया वैसी ही है जैसे एक बहादुर योद्धा का युद्ध के मैदान में कदम रखना, जो किसी भी क्षण हर तरह के दुश्मनों से लड़ने के लिए तैयार रहता है। सत्य का अनुसरण करने वालों के शत्रु शैतान के विभिन्न भ्रष्ट स्वभाव हैं। ये लोग अपनी भ्रष्ट देह से लड़ रहे हैं; संक्षेप में, वे शैतान से युद्ध कर रहे हैं। और शैतान से लड़ने के लिए किस हथियार का इस्तेमाल किया जाता है? निस्संदेह, यह सत्य है, यह परमेश्वर के वचन का पालन करना है। शैतान को हराने के लिए, सत्य के किस पहलू का पहले अभ्यास करना चाहिए? यह परमेश्वर के प्रति, उसके वचन के प्रति, और सत्य के प्रति समर्पित होना है। यह वह पाठ है जिसमें शैतान से युद्ध करते समय सबसे पहले प्रवेश करना चाहिए। यदि तुम उन चीजों को परमेश्वर से स्वीकारने में असमर्थ हो जो तुम्हारे साथ होती हैं, तो तुम परमेश्वर के सामने समर्पण नहीं कर सकोगे, और इसलिए प्रार्थना करने या सत्य की खोज करने के लिए परमेश्वर के सामने खुद को शांतचित्त नहीं कर पाओगे। यदि तुम परमेश्वर से प्रार्थना नहीं कर सकते या सत्य नहीं खोज सकते तो तुम सत्य को नहीं समझोगे या परमेश्वर तुम्हारे लिए उन स्थितियों या उन लोगों, घटनाओं और चीजों का इंतजाम क्यों करेगा—तुम उलझन के दलदल में फँस जाओगे। यदि तुम सत्य की खोज नहीं कर सकते, तो तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव पर विजय नहीं पा सकते। अपने भ्रष्ट स्वभाव और अपनी भ्रष्ट देह को पराजित करके ही तुम आध्यात्मिक जगत के शैतान और दानवों को अपमानित कर सकते हो। शैतान से लड़ना मुख्‍य रूप से सत्य की खोज पर निर्भर करता है; यदि तुम सत्य नहीं समझते हो, तो तुम्हारे भीतर उत्पन्न होने वाली कोई भी समस्या या धारणा तुम्हें कमजोर और नकारात्मक बना सकती है। यदि तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव के खुलासों का कभी समाधान नहीं किया गया, तो तुम्हारे गिरने और असफल होने की संभावना है, और तब तुम्हारे लिए फिर से खड़ा होना कठिन होगा। कुछ लोग प्रलोभन के सामने लड़खड़ा जाते हैं, कुछ दर्दनाक बीमारी से सामना होने पर नकारात्मक हो जाते हैं, और कुछ परीक्षण किए जाने पर औंधे मुँह गिर जाते हैं। ये सत्य का अनुसरण न करने, और प्रकट किए गए भ्रष्ट स्वभाव को दूर करने के लिए सत्य की खोज न करने के परिणाम हैं। तुम लोगों को क्या लगता है : क्या शैतानी स्वभाव के कारण लोगों को बहुत परेशानी होती है? (बिल्कुल।) कितनी परेशानी होती है? (वे लोगों को परमेश्वर के सामने आने से रोकते हैं, और उन्हें परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में असमर्थ बना देते हैं।) यदि लोग परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करेंगे, तो फिर वे किस आधार पर जिएँगे? (वे शैतानी, भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार जिएँगे।) जब लोग शैतानी, भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार जीते हैं, तो वे अक्सर धारणाएँ प्रकट करते हैं और गरम-मिजाजी हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, यदि तुम कुछ गलत करते हो और कोई भाई या बहन तुम्‍हें उजागर करता है या तुम्‍हारी काट-छाँट करता है, तो तुम्‍हें परमेश्वर के प्रति कैसे समर्पण करना चाहिए और सत्य की खोज कैसे करनी चाहिए? यहाँ सीखने के लिए एक सबक है। शायद तुम यह सोचते हुए इस पर विचार करना शुरू करो : “वह व्यक्ति आम तौर पर मुझे नीची नजरों से देखता है, और इस बार उसे मेरे खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए कुछ मिल गया है। वह मुझे निशाना बना रहा है, इसलिए मैं भी अच्‍छा बनकर व्यवहार नहीं करने वाला। मुझसे कोई पंगा न ले!” क्या यह गरम-मिजाज होना नहीं है? (बिल्कुल है।) गरम-मिजाज होना क्या है? (इसका अर्थ है कि जब किसी व्यक्ति के हितों को ठेस पहुँचती है या उसकी प्रसिद्धि और लाभ को नुकसान पहुँचता है, और वह आवेग में आकर कुछ कहता या करता है, तो उसका शैतानी स्वभाव खुलकर सामने आ जाता है। यह गरम-मिजाजी के बारे में मेरी समझ है।) यह समझ मूल रूप से सही है। इसमें कोई और क्‍या जोड़ सकता है? (जब किसी व्यक्ति पर कोई मुसीबत पड़ती है, और वह सत्य की खोज करने के बजाय अपने स्‍वाभाविक भावों को उजागर कर देता है तो उसे गरम-मिजाज होना कहते हैं।) उसके द्वारा प्रयुक्‍त “स्वाभाविक” शब्द बहुत उपयुक्त है। लोगों के शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद, जब उनका सबसे स्वाभाविक, सबसे आदिम स्वभाव जो उनमें मूल रूप से होता है, उजागर हो जाता है, तो उसे गरम-मिजाजी कहते हैं। यह वह चीज है जो विचार, मानसिक प्रसंस्‍करण, सोच-विचार या प्रस्‍तुतीकरण से नहीं गुजरती, बल्कि बस फूट पड़ती है। यही गरम-मिजाजी है। भ्रष्ट स्वभावों के दायरे में जीने वाले लोग जो कुछ प्रकट करते हैं वह सब गरम-मिजाजी है। तो ऐसा क्यों है कि मनुष्य की प्रकृति से स्वाभाविक रूप से प्रकट होने वाली चीजें सत्य के अनुरूप नहीं हैं? लोग गरम-मिजाजी क्यों प्रकट करते हैं? इसका क्या कारण है? ऐसा मनुष्य की शैतानी प्रकृति के कारण होता है। मनुष्य का सहज स्वभाव गरम-मिजाजी का है। जब किसी व्यक्ति के हितों, घमंड या अभिमान को क्षति पहुँचती है, तब अगर वह सत्य को नहीं समझता या उसमें सत्य वास्तविकता नहीं होती, तो वह अपने भ्रष्ट स्वभाव को उस क्षति के प्रति अपने व्यवहार को निर्देशित करने देगा, और वह आवेगपूर्ण होगा और उतावलेपन से कार्य करेगा। तब वह जो अभिव्यक्त और प्रकट करता है, वह गरम-मिजाजी होता है। गरम-मिजाजी सकारात्मक चीज है या नकारात्मक? स्वाभाविक है कि वह एक नकारात्मक चीज है। व्यक्ति का गरम-मिजाजी से जीना कोई अच्छी बात नहीं है; यह आपदा ला सकता है। अगर व्यक्ति के साथ कुछ होने पर उसकी गरम-मिजाजी और भ्रष्टता उजागर हो जाती हैं, तो क्या वह सत्य की खोज करने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाला व्यक्ति होता है? जाहिर है, ऐसा व्यक्ति निश्चित रूप से परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं होता। जहाँ तक उन विभिन्न लोगों, घटनाओं, चीजों और परिवेशों की बात है जिनका इंतजाम परमेश्वर लोगों के लिए करता है, अगर व्यक्ति उन्हें परमेश्वर से स्वीकार नहीं कर पाता, बल्कि एक मानवीय तरीके से उनसे निपटता है और उनका समाधान करता है तो अंत में इसका क्या नतीजा होगा? (परमेश्वर उस व्यक्ति को ठुकरा देगा।) परमेश्वर उस व्यक्ति से घृणा करेगा, तो क्या वह लोगों के लिए जीवनोपयोगी होगा? (नहीं, वह नहीं होगा।) वह न केवल अपने जीवन में हारेगा, बल्कि दूसरों के विश्वास और आध्यात्मिक जीवन में भी कोई लाभ नहीं पहुँचा पाएगा। इससे भी बढ़कर, वह परमेश्वर का निरादर करेगा, जिसके कारण परमेश्वर उससे घृणा करेगा और उसे ठुकरा देगा। ऐसा व्यक्ति अपनी गवाही खो चुका होता है और वह जहाँ भी जाता है, उसका स्वागत नहीं किया जाता। अगर तुम परमेश्वर के घर के सदस्य होकर भी अपने कार्यों में हमेशा गरम-मिजाज रहते हो, हमेशा वह चीज प्रकट कर देते हो जो तुम में स्वाभाविक रूप से है, और हमेशा अपना भ्रष्ट स्वभाव प्रकट कर देते हो, मानवीय साधनों और भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव के साथ चीजें करते हो, तो अंतिम परिणाम यह होगा कि तुम दुष्टता करते हुए परमेश्वर का विरोध करोगे—और अगर तुम कभी पश्चात्ताप नहीं करते और सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर नहीं चल पाते तो तुम्हें बेनकाब करना और बाहर निकालना होगा। क्या शैतानी स्वभाव पर निर्भर होकर जीने और उसे दूर करने के लिए सत्य की खोज न करने की समस्या गंभीर नहीं है? समस्या का एक पहलू यह है कि व्यक्ति अपने जीवन में बढ़ता या बदलता नहीं; इसके अलावा, वह दूसरों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। वह कलीसिया में किसी भी अच्छे उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेगा, और समय आने पर वह कलीसिया और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए बड़ी मुसीबत लाएगा, उस बदबूदार मक्खी की तरह, जो खाने की मेज पर आगे-पीछे उड़कर घृणा और अरुचि उत्पन्न करती है। क्या तुम लोग ऐसा व्‍यक्ति बनना चाहते हो? (नहीं।) परमेश्वर को प्रसन्न करने और दूसरों को जीवनोपयोगी बनाने के लिए तुम्हें कैसे कार्य करना चाहिए? चाहे तुमने कैसा भी भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किया हो, सबसे पहले तुम्‍हें स्वयं को शांतचित्त करना होगा, तुरंत परमेश्वर से प्रार्थना करनी होगी और अपने भ्रष्ट स्वभाव दूर करने के लिए सत्य की खोज करनी होगी। तुम्‍हें अपनी इच्‍छा और गरम-मिजाजी के अनुसार भ्रष्‍टता प्रकट करना बिल्‍कुल जारी नहीं रखना चाहिए। तुम्हारे जीवन के हर दिन के हर मिनट के हर सेकंड में, तुम जो कुछ भी करते हो और जो कुछ भी सोचते हो, परमेश्वर तुम्हारी पड़ताल कर रहा है और देख रहा है। परमेश्वर क्या जाँच-परख कर रहा है? (जब किसी व्यक्ति का सामना उन लोगों, घटनाओं या चीजों से होता है जिनका इंतजाम परमेश्वर ने उसके लिए किया है तो वह क्या सोचता है और कैसे प्रतिक्रिया करता है।) यह सही है, और इन चीजों की जाँच-परख करने के पीछे परमेश्वर का उद्देश्य क्या है? (यह देखना कि क्या यह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर का भय मानता है और बुराई से दूर रहता है।) यह एक कारण है। मुख्य कारण क्या है? इस पर ध्यानपूर्वक विचार करो। (यह देखना कि क्या उनके पास सत्य की खोज करने और परमेश्वर के प्रति समर्पित होने वाला हृदय है।) चाहे वह परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना हो, या सत्य की खोज करना हो और परमेश्वर के प्रति समर्पित होने वाले हृदय का होना हो, ये सभी चीजें इस प्रश्न को स्पर्श करती हैं कि किसी व्यक्ति ने चलने के लिए कौन-सा मार्ग चुना है। परमेश्वर लगातार लोगों की पड़ताल क्यों कर रहा है? यह देखने के लिए कि तुम कैसे मार्ग पर चल रहे हो, तुम्हारे जीवन के लक्ष्य और दिशाएँ क्या हैं, तुमने सत्य का अनुसरण करने का मार्ग चुना है या पाखंडी फरीसियों का मार्ग। यह देखने के लिए कि तुम वास्तव में इनमें से किस रास्ते पर हो। यदि तुमने सही मार्ग चुना है, तो परमेश्वर तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, तुम्हें प्रबुद्ध करेगा, तुम्हें आपूर्ति करेगा और तुम्हें समर्थन देगा। यदि तुमने गलत रास्ता चुना है, तो यह दर्शाता है कि तुमने पूरी तरह से परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया है, इसलिए स्वाभाविक है कि वह तुम्हें त्याग देगा।

ऐसे लोग हैं जो हमेशा शब्दों और धर्म-सिद्धांतों का उपदेश देते हैं और अपने हर काम में सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचाने वाले काम भी करते हैं, लेकिन फिर क्यों नहीं उन्हें धिक्कारा या अनुशासित किया जाता? कुछ लोग इस मुद्दे को नहीं समझ पाते। मैं तुम लोगों को बताता हूँ, परमेश्वर पहले ही ऐसे लोगों से उम्मीद छोड़ चुका है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई व्यक्ति कितने वर्षों से विश्वासी रहा है, यदि परमेश्वर उसे त्यागने का फैसला करता है, तो यह एक अत्यंत गंभीर मामला है! परमेश्वर लोगों से जिस तरह के मार्ग पर चलने की अपेक्षा करता है, उसको लेकर उसका इरादा और इच्छा क्या है? जब परमेश्वर लोगों के लिए कुछ खास स्थितियों का इंतजाम करता है तो क्या वह उनसे आशा करता है कि वे समर्पण या विद्रोह करेंगे? क्या वह आशा करता है कि वे सत्य को खोजेंगे और हासिल करेंगे या उसे अनदेखा करेंगे और एक ठहराव पर आ जाएँगे? इसके प्रति परमेश्वर का रवैया क्या है? वह लोगों से क्या उम्मीद करता है? वह आशा करता है कि लोग समर्पण कर सकेंगे और बिना नकारात्मक हुए, ढीले पड़े या उसके कार्य को अनदेखा किए उसमें सक्रिय सहयोग करने में सक्षम होंगे। कुछ लोग अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन होते हैं : जब उन्हें कोई कार्य सौंपा जाता है, तो वे उसे वैसे ही करेंगे जैसा वे उचित समझते हैं, लेकिन वे सत्य या परमेश्वर के इरादे खोजने की कोशिश नहीं करेंगे। उन्हें लगता है कि इस दृष्टिकोण में कुछ भी गलत नहीं है—चूँकि वे किसी प्रशासनिक आदेश का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं, परमेश्वर को नाराज नहीं कर रहे हैं, या कलीसिया के कार्य में गड़बड़ नहीं कर रहे और बाधा नहीं डाल रहे हैं, और अभी भी अपना कर्तव्य निभा रहे हैं, उन्हें लगता है कि उनकी निंदा नहीं की जाएगी। तुम इस तरह के रवैये के बारे में क्या सोचते हो? (यह अच्छा नहीं है। यह एक नकारात्मक, निष्क्रिय, उदासीन रवैया है, जिससे परमेश्वर घृणा करता है।) उदासीन रवैया क्या होता है? परमेश्वर उससे घृणा क्यों करता है? ऐसे रवैये का सार क्या होता है? (मैं इस बारे में अपना थोड़ा-सा अनुभव साझा कर सकता हूँ। हाल ही में, अपना कर्तव्य करते समय, मैं अपनी इच्छा के अनुसार काम कर रहा था और सिद्धांतों का उल्लंघन कर रहा था। काट-छाँट किए जाने के बाद, मैंने आत्म-चिंतन नहीं किया, और परमेश्वर को गलत समझते हुए उसके प्रति रक्षात्मक हो गया। मेरा दिल परमेश्वर के लिए बंद हो गया था, मैं उसके पास नहीं जाना चाहता था, और मैंने उससे प्रार्थना नहीं की। उस दौरान मेरा रवैया उदासीन था, और उसने मुझे नकारात्मक, निष्क्रिय और दयनीय बना दिया। एक बार जब मेरा दिल परमेश्वर के लिए बंद हो गया, तो ऐसा लगने लगा जैसे मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ ढह गया हो और मैं दयनीय महसूस करने लगा। बाहर से, ऐसा लगता था कि मैं किसी तरह का स्पष्ट विद्रोही व्यवहार किए बिना अपना कर्तव्य निभा रहा था, लेकिन मुझे पवित्र आत्मा से प्रबोधन नहीं मिला और मेरी परमेश्वर के साथ सक्रिय रूप से सहयोग करने की कोई मानसिकता नहीं रही। इस उदासीन, नकारात्मक और प्रेरणा-विहीन रवैये को बनाए रखना खुद को धीरे-धीरे मारने जैसा था। परमेश्वर से विमुख लोग उस वृक्ष के समान होते हैं जिसकी जड़ें मर चुकी हों। जीने के लिए आवश्यक सामग्री की आपूर्ति न होने से शाखाएँ और पत्तियाँ धीरे-धीरे मुरझाती जाती हैं, जब तक कि पूरा पेड़ मर नहीं जाता।) बहुत अच्छी तरह समझाया। शायद अधिकांश लोग इसी अवस्था में हैं : जो कुछ भी उनसे कहा जाता है, वे उसे बिना कोई परेशानी पैदा किए, बिना कुछ बुरा किए, या बिना चीजों में बाधा डाले करते हैं—वे बस उदासीन होते हैं। परमेश्वर इस प्रकार के रवैये से घृणा क्यों करता है? इस तरह के रवैये से क्या सार नजर आता है? यह नकारात्मक और प्रतिरोधी है और सत्य को नकारना है। क्या तुम लोग यह कहोगे कि पहले परमेश्वर लोगों को त्यागता है या फिर पहले लोग परमेश्वर को त्यागते हैं? (पहले लोग ऐसा करते हैं।) यदि तुम पहले परमेश्वर को त्यागते हो तो तुम्हारा हृदय परमेश्वर के लिए बंद हो जाता है जो एक गंभीर समस्या है। “बंद होना” तो बात कहने का एक तरीका है। वास्तव में जो हो रहा है वह यह है कि लोग परमेश्वर को अपने हृदयों से बाहर करके अपने हृदयों को सीलबंद कर रहे हैं, जिसका अर्थ है : “अब मुझे तुम्हारी जरूरत नहीं है। मैं तुमसे सभी संबंध तोड़ रहा हूँ, और हमारे बीच सभी संपर्क खत्म कर रहा हूँ।” जब एक सृजित प्राणी का अपने सृष्टिकर्ता के प्रति ऐसा रवैया होता है, तो परमेश्वर इससे कैसे निपटता है? उसका रवैया क्या होता है? जब वह लोगों को ऐसी अवस्था में देखता है, तो उसे क्या महसूस होता है, खुशी, घृणा, या दुःख? सबसे पहले, उसे दुःख महसूस होता है। जब वह देखता है कि लोग अत्‍यंत जड़ और सत्य स्वीकारने के पूरी तरह अनिच्छुक हो गए हैं, तो परमेश्वर निराश होता है, और फिर वह उनसे घृणा करता है। जब किसी व्यक्ति का हृदय परमेश्वर के लिए सीलबंद हो जाए, तो परमेश्वर इसके लिए क्या करेगा? (परमेश्वर कुछ ऐसी स्थितियाँ खड़ी करेगा जिससे व्यक्ति उसके इरादे समझ सके और उसके लिए अपना हृदय खोल दे।) हाँ, यह परमेश्वर के सक्रिय तरीकों में से एक है, वह कभी-कभी ऐसा करता है, लेकिन कभी-कभी वह ऐसा नहीं करता है। कभी-कभी, वह अपना चेहरा छिपा लेगा और अपने समय की प्रतीक्षा करेगा, प्रतीक्षा करेगा कि तुम उसके लिए अपना हृदय खोलो। जब तुम उसे अपने हृदय में प्रवेश दे दोगे और सत्य स्वीकारने में सक्षम होगे, तो वह तुम पर दया बनाए रखेगा और तुम्‍हें प्रबुद्ध करेगा। लेकिन सामान्य तौर पर यदि तुम ऐसा रवैया रखते हो कि तुम्हारा दिल परमेश्वर के लिए पूरी तरह से बंद हो, तुम उसके साथ सामान्य संबंध नकार रहे हो, उसके साथ कोई भी संपर्क स्वीकार नहीं कर रहे हो तो तुम अपने ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता को और उसके मार्गदर्शन को नकार रहे हो। यह उसे अपने परमेश्वर के रूप में स्वीकार न करने के समान है और वैसा ही है जैसे तुम उसे अपना प्रभु नहीं बनाना चाहते हो। यदि तुम उसे अपने परमेश्वर और प्रभु के रूप में नकारते हो, तो भी क्या वह तुम पर कार्य कर सकता है? (नहीं।) तब वह केवल इतना ही कर सकता है कि तुम्हें छोड़ दे। जब तुम समझ जाते हो कि क्या हुआ है, और अपने तरीकों की गलती का एहसास करते हो, और पश्‍चात्ताप करना जान जाते हो, तभी तुम पर परमेश्वर का कार्य फिर से शुरू हो सकता है। इसलिए, ऐसा उदासीन रवैया सामने आने पर परमेश्वर निश्चित रूप से कार्य नहीं करेगा, वह ऐसे लोगों को अलग कर देगा। क्या तुम लोगों को इसका कोई अनुभव है? ऐसी स्थिति शांतिपूर्ण और आनंदमय है, या असहनीय और दयनीय? (असहनीय और दयनीय।) कितनी दयनीय? (यह एक चलती-फिरती लाश होने जैसा है। यह एक जंगली जानवर जैसा विचारहीन, आत्महीन अस्तित्व है।) यदि किसी के हृदय में परमेश्वर नहीं है, तो उसका हृदय खाली है; यह उसमें आत्मा न होने के समान ही है। क्या इसका मतलब यह नहीं है कि वह एक आत्मा-विहीन मृत व्यक्ति बन गया है? कितनी भयानक बात है! कोई व्यक्ति कहीं भी और कभी भी परमेश्वर के साथ विश्वासघात कर सकता है। थोड़ी-सी असावधानी से वह अपने हृदय में परमेश्वर को नकार सकता है, जिसके बाद उसकी स्थिति तुरंत बदल जाती है : उसकी आत्मा का स्तर तुरंत गिर जाता है, और वह परमेश्वर की उपस्थिति को महसूस नहीं करता, और परमेश्वर पर उसकी निर्भरता और उसके साथ उसका संबंध गायब ही हो जाता है, बिल्कुल उस हृदय की तरह जिसने धड़कना बंद कर दिया हो। यह एक खतरनाक स्थिति है। ऐसी स्थिति का क्या किया जा सकता है? तुम्हें सही रवैया रखने और परमेश्वर से तुरंत प्रार्थना करने और पश्चात्ताप करने की आवश्यकता है। यदि कोई व्यक्ति हमेशा नकारात्मक और प्रतिरोधी अवस्था में रहता है, एक ऐसी अवस्था जिसमें उसे परमेश्वर ने पूरी तरह से त्याग दिया है और अब वह उस तक नहीं पहुँच सकता, तो यह खतरनाक है! क्या तुम लोगों ने महसूस किया है कि इस खतरे के क्या अवांछनीय परिणाम हो सकते हैं? यह केवल किसी को हो सकने वाले नुकसानों की बात नहीं है—इसके और क्या परिणाम हो सकते हैं? (वह बुरी आत्माओं के वश में हो सकता है।) यह एक परिणाम है। और भी कई संभावनाएँ हैं। (वह कोई गंभीर रूप से बुरा कार्य कर सकता है और परमेश्वर उसे प्रकट कर हटा सकता है।) यह भी संभव है। और कुछ? (परमेश्वर के साथ उसके संबंधों में और भी ज्यादा दूरी आ सकती है।) अब, यदि यह स्थिति बनी रहती है, तो क्या तुम्हें लगता है कि वह व्यक्ति अंततः परमेश्वर में अब और विश्वास न करने पर विचार करेगा? (वह ऐसा करेगा।) क्या यह भयानक नहीं है? (यह है।) यदि किसी व्यक्ति में अपने विश्वास को त्यागने की यह दुष्ट इच्छा है, तो यह सबसे भयानक बात है, क्योंकि उसने पहले ही अपने दिल में परमेश्वर को धोखा दे दिया है, और परमेश्वर ऐसे व्यक्ति को नहीं बचाएगा।

एक विश्वासी होने के नाते, व्यक्ति को परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध बनाकर रखना चाहिए; यह बहुत महत्वपूर्ण है। जब किसी व्यक्ति का परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध होता है, तो वह अच्छी अवस्था में होता है; जब उसकी अवस्था खराब होती है तो परमेश्वर के साथ उसका संबंध भी सामान्य नहीं होगा। कोई व्यक्ति अच्छी अवस्था में है या बुरी अवस्था में, इस आधार पर उसका हृदय पूरी तरह से दो अलग स्थितियों में होगा। जब कोई व्यक्ति अच्छी अवस्था में होता है, तो उसे अपने हृदय में एक विशेष ताकत महसूस होगी, एक ऐसी ताकत जो उसे कभी शादी न करने, कितनी भी पीड़ा सहने के बावजूद अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करने और अंत तक, मरते दम तक, परमेश्वर के प्रति वफादार रहने के लिए प्रेरित करती है। ऐसा संकल्प कैसे आता है? (यह लोगों में मौजूद एक प्रकार के उत्साह से आता है।) क्या ऐसा उत्साह परमेश्वर को स्वीकार्य होता है? इस प्रकार का संकल्प सकारात्मक चीज है या नकारात्मक? (सकारात्मक।) क्या परमेश्वर को सकारात्मक चीजें स्वीकार्य हैं? (बिल्कुल।) परमेश्वर लोगों के हृदयों की पड़ताल करता है। वह पड़ताल करता है कि लोग अपने हृदय की गहराई में क्या सोचते हैं और वहाँ उनकी क्या अवस्था है। इसलिए, जब तुम अपने हृदय में इस प्रकार की इच्छा और संकल्प व्यक्त करते हो, तो परमेश्वर उसकी भी पड़ताल करता है। यह संकल्प कहाँ से आता है? क्या यह किसी व्यक्ति की स्वाभाविकता और गरम-मिजाजी से आता है? (नहीं, यह पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा लोगों में डाला जाता है।) यह सही है। जब लोग सही अवस्था में रहते हैं, तो पवित्र आत्मा उन्हें इस प्रकार की शक्ति देता है, जिससे वे यह संकल्प कर पाते हैं। यह एक सकारात्मक चीज है, और यह लोगों को उनके सहयोग और बलिदान के कारण पवित्र आत्मा द्वारा प्रदान की जाती है। क्या लोगों में इस तरह की आस्था कभी अपने आप आती है? बेशक नहीं, है ना? जब लोगों के पास सहयोग करने का थोड़ा-सा भी संकल्प होता है, तो पवित्र आत्मा उन्हें ऐसी शक्तिशाली प्रेरणा देता है! इससे अब तुम क्या समझते हो? (लोगों को परमेश्वर के साथ रहना चाहिए। परमेश्वर के बिना, केवल मृत्यु है।) “लोगों को परमेश्वर के साथ रहना चाहिए,” यह सच है। यह अनुभव से प्राप्त ज्ञान है। यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना हृदय खोलते हो, यदि तुम्हारे पास वह थोड़ा-सा संकल्प है, और परमेश्वर से प्रार्थना करते समय अपने हृदय को खोलने में सक्षम हो, तो वह तुम्हें यह शक्ति प्रदान करेगा। यह शक्ति पूरे जीवन बनी रहेगी और तुम्हें ऐसा गहन संकल्प करने और यह कहने की क्षमता देगी, “मैं अपना पूरा जीवन परमेश्वर को अर्पित करता हूँ, मैं अपना सारा जीवन उसके लिए खुद को खपाने और उसी के लिए जीने में लगा दूँगा!” यह एक तथ्य है; लोग इसी तरह सोचते हैं, और यही करना चाहते हैं। लेकिन, अगर कोई परमेश्वर का अनुसरण करता है और अपने मन, अपने विचारों, और अपनी काबिलियत और गुणों पर भरोसा करते हुए अपना कर्तव्य निभाता है, तो उसके पास कितनी ताकत होगी? यदि तुम में सत्य का अनुसरण करने का संकल्प नहीं है तो तुम चाहे कितनी भी मेहनत कर लो, इसे हासिल नहीं कर सकते। यह आंतरिक शक्ति मनुष्य द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती; यह परमेश्वर द्वारा दी जाती है। लोग इस ताकत को कैसे खो देते हैं? इसका क्या कारण है? जब परमेश्वर उनके हृदयों में नहीं रहता, तो यह शक्ति लुप्त हो जाती है। जब लोगों के पास यह शक्ति होती है, तो यह पवित्र आत्मा का कार्य होता है, यह लोगों को परमेश्वर द्वारा दी गई शक्ति होती है—यह सब परमेश्वर का कार्य है। यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के लिए सीलबंद है, यदि तुम परमेश्वर को “ना” कहते हो, और तुम अपने जीवन पर उसकी संप्रभुता और योजना को और साथ ही उन सभी परिवेशों, लोगों, घटनाओं और चीजों को भी नकारते हो, जिनकी व्यवस्था उसने तुम्हारे चारों ओर की है, तब तुम में सत्य का अनुसरण करने का मन भी नहीं होगा। परमेश्वर को खो देना इतना ही भयानक होता है; यह एक तथ्य है। जिन्होंने परमेश्वर को खो दिया, वे कुछ भी नहीं हैं। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के लिए अपना हृदय सीलबंद कर देता है तो उसमें परमेश्वर पर विश्वास न करने के विचार भी आ सकते हैं जिसे वह किसी भी समय और किसी भी जगह प्रकट कर सकता है। इसमें सबसे भयानक बात यह है कि उसके ये विचार और भी मजबूत बनते जाएँगे, इस हद तक कि वह उन सब चीजों के लिए पश्चात्ताप करेगा जो भी उसने छोड़ीं और खपाई हैं और अपने उस संकल्प के लिए जो कभी उसके पास था और उस पीड़ा के लिए जो उसने भोगी थी, वह पश्चात्ताप करेगा। उसकी स्थिति पहले से बिल्कुल अलग हो जाएगी, जैसे वह कोई बिल्कुल ही अलग व्यक्ति हो। यह कैसे होता है? यदि कोई व्यक्ति उन लोगों, घटनाओं, चीजों और परिवेशों के प्रति समर्पण कर सकता है जिसकी परमेश्वर ने उसके लिए योजना बनाई है तो वह एक शांतिपूर्ण और आनंदमय जीवन जी सकता है। यदि वह हमेशा उन लोगों, घटनाओं और चीजों से बचने की कोशिश करता है जिनकी परमेश्वर ने उसके लिए योजना बनाई है और अपने उन परिवेशों के प्रति समर्पित होने के लिए अनिच्‍छुक रहता है जिन पर परमेश्वर संप्रभु है तो इससे क्या स्थिति बनेगी? (दयनीयता और अंधकार।) वह अंधकार, दुख, व्याकुलता, निरंतर चिंता और उदासी अनुभव करेगा। क्या यह भारी अंतर नहीं है? (यह है।) जब लोग अच्छी अवस्था में रहते हैं, तो यह ठीक परमेश्वर के सामने स्वर्ग में रहने जैसा है। जब वे खराब अवस्था में होते हैं, तो उनकी स्थिति और भी अंधकारमय हो जाती है, और परमेश्वर उनकी पहुँच से बाहर हो जाता है। अंधकारमय स्थिति में रहना नरक में रहने से अलग नहीं है। क्या तुम लोगों ने कभी नरक की पीड़ा को महसूस किया है? यह सुखद होती है या असहनीय? (असहनीय।) तुम एक वाक्य में इसका वर्णन कैसे करोगे? (यह मौत से भी बदतर है।) हाँ, यह मौत से भी बदतर है। जीने से मरना कहीं अधिक सुखद होगा, यह अत्यंत कष्‍टप्रद है। तुमने इसे बहुत अच्छी तरह से कहा है; यह स्थिति ऐसी ही है।

लोगों की तमाम कठिनाइयाँ, और उनकी तमाम नकारात्मकताएँ और कमजोरियाँ, सीधे तौर पर उनके भ्रष्ट स्वभावों से संबंधित हैं। यदि उनके भ्रष्ट स्वभावों को दूर किया जा सकता है, तो यह कहा जा सकता है कि उनकी आस्था संबंधी सभी कठिनाइयाँ कमोबेश हल हो जाएँगी : उन्हें सत्य की खोज करने से कोई नहीं रोकेगा, वे सत्य का अभ्यास करने में किसी भी कठिनाई का सामना नहीं करेंगे, और उन्हें परमेश्वर के प्रति समर्पित होने से कोई नहीं रोकेगा। इसलिए, अपने भ्रष्ट स्वभावों को दूर करना महत्वपूर्ण है। परमेश्वर का लोगों से सत्य का अनुसरण करने और ईमानदार रहने के लिए कहना भ्रष्ट स्वभावों को दूर करने और स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने से संबंधित है। सत्य की खोज का लक्ष्य भ्रष्ट स्वभाव की समस्या का समाधान करना है, और सत्य का अनुसरण स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने के लिए किया जाता है। तो कोई सत्य की तलाश कैसे करता है? कोई सत्य को कैसे प्राप्त कर सकता है? मैंने थोड़ी देर पहले क्या कहा था? (आस्था रखो कि परमेश्वर हर चीज पर संप्रभु है और उस परिवेश के प्रति समर्पण करो जो उसने खड़ा किया है।) हाँ, आस्था रखो, समर्पण करो, सबक सीखने की कोशिश करो, सत्य खोजो और परमेश्वर द्वारा खड़े किए गए परिवेश में अपने कर्तव्य पर अडिग रहो। यदि तुम परमेश्वर द्वारा खड़े किए गए परिवेश से सबक सीख सकते हो तो क्या तुम्हारे लिए समर्पण करना आसान नहीं होगा? (ऐसा होगा।) जब तुम सत्य की तलाश करते हो और अपने सबक सीखते हो, तो क्या यह सच नहीं है कि तुम भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करने से बचोगे और अपना गरम-मिजाज उजागर करने से खुद को रोकोगे? इस प्रक्रिया के दौरान, क्या तुम उन लोगों, घटनाओं, और चीजों से निपटने के लिए मानवीय तरीकों और मानवीय सोच का उपयोग करने से नहीं बचोगे जिनका इंतजाम परमेश्वर ने तुम्हारे लिए किया है? इस तरह, क्या तुम सामान्य अवस्था में नहीं रहोगे? और जब तुम सामान्य अवस्था में होते हो, तो क्या तुम निरंतर परमेश्वर के सामने नहीं रह पाओगे? तब तुम सुरक्षित रहोगे। यदि तुम अक्सर परमेश्वर के सामने आ सकते हो, लगातार उसके सामने रह सकते हो, उसके द्वारा तुम्हारे लिए खड़े किए गए परिवेश में बार-बार उसके इरादे तलाश कर सकते हो और सभी लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति समर्पण कर सकते हो जिनका इंतजाम उसने किया है तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर की नजरों के सामने और उसकी देखरेख में नहीं रह रहे होगे? (हाँ।) जब तुम्हारा भाग्य परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन होगा और उसकी निगरानी में होगा और उसके द्वारा प्रबंधित किया जाएगा, जब तुम हर दिन परमेश्वर की सुरक्षा का आनंद लोगे तो क्या तुम सबसे खुश व्यक्ति नहीं होगे? (सही कहा।) इस विषय पर हमारी संगति यहीं समाप्त होती है। आगे, तुम सभी इस पर एक साथ संगति कर सकते हो और इसके बारे में अपनी समझ को सारांशित कर साझा कर सकते हो। पता लगाओ कि एक सुखी जीवन कैसे जीना है और कैसे अय्यूब की तरह परमेश्वर की स्वीकृति अर्जित करनी है, ताकि परमेश्वर तुम्‍हें अपने हृदय में धारण करे और कहे कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिससे वह प्रेम करता है; अय्यूब की तरह जीवन में सही रास्ते पर कदम रखना सीखो, जो कि परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का रास्ता है।

25 जनवरी 2017

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