परमेश्वर के दैनिक वचन : मंज़िलें और परिणाम | अंश 604

सभी कलीसियाओं में समागम में विध्वंसकारी सदस्य होते हैं; उन सभी में ऐसे सदस्य होते हैं जो परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं। ये लोग शैतान का छ्द्म वेष हैं जो परमेश्वर के परिवार में घुस गए हैं। ऐसे लोग छ्द्म वेष धारण करने में विशेष रूप से अच्छे होते हैं; मेरे समक्ष विनीत भाव से आकर, नमन करते हुए, नत-मस्तक होते हैं, खुजली वाले कुत्ते की तरह व्यवहार करते हैं, अपने उद्देश्य को पाने के लिये अपना "सर्वस्व" न्योछावर करते हैं, लेकिन जब भाइयों और बहनों से सामना होता है, तो वे अपना कुरूप पक्ष प्रकट कर देते हैं। जब वे ऐसे लोगों को देखते हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं तो वे उन पर आक्रमण कर देते हैं, उन्हें एक ओर कर देते हैं; और जब वे ऐसे लोगों को देखते हैं जो उनसे भी अधिक भयंकर हैं, तो फिर उनकी चाटुकारिता करने लगते हैं, उनके आगे गिड़गिड़ाने लगते हैं। कलीसिया के भीतर वे आततायियों की तरह व्यवहार करते हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि ऐसे "स्थानीय गुण्डे", और ऐसे "पालतू कुत्ते" अधिसंख्य कलीसियाओं में मौजूद हैं। ऐसे लोग मिलकर आस-पास मुखबिरी करते हैं, आँखे झपका कर और गुप्त संकेतों से एक-दूसरे को इशारे करते हैं, और इनमें से कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता है। जिस किसी में भी सबसे अधिक विष होता है वह "प्रमुख राक्षस" होता है, और जिसकी भी सबसे अधिक प्रतिष्ठा होती है, वह इनकी अगुवाई करता है और इनका परचम बुलंद रखता है। ऐसे लोग कलीसिया में उपद्रव मचाते हैं, नकारात्मकता फैलाते हुए, मौत का तांडव करते हैं, मनमर्जी करते हैं, जो चाहे बकते हैं; किसी की भी इन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती है, ये शैतानी स्वभावों से भरे होते हैं। जैसे ही ये लोग व्यवधान पैदा करते हैं वैसे ही कलीसिया में मौत की घुटन छा जाती है। कलीसिया के भीतर के जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं वे एक ओर फेंक दिए जाते हैं और वे अपना भरसक प्रयास करने की योग्यता को गँवा देते हैं, जबकि जो कलीसिया में परेशानियाँ खड़ी करते हैं और जिनसे मौत पसरती हैं वे कलीसिया में उपद्रव मचाते फिरते हैं। इस तरह की कोई भी कलीसिया बस शैतान के कब्ज़े में है; और इसका सम्राट इब्लीस ही है। यदि समागम के सदस्य उठ खड़े नहीं होते हैं और उन प्रमुख राक्षसों को बाहर नहीं करते हैं, तो वे भी देर-सवेर बर्बाद हो जाएँगे। अब से, ऐसी कलीसियाओं के ख़िलाफ़ उपाय अवश्य किए जाने चाहिए। यदि ऐसी कलीसिया के समागम के सदस्य, जो थोड़ा सा सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हैं, इसकी खोज करने में संलग्न नहीं होते हैं, तो उस कलीसिया पर पाबंदी लगा दी जानी चाहिए। यदि कलीसिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक है, ऐसा कोई नहीं है जो परमेश्वर की गवाही दे सकता हो, तो उस कलीसिया को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए और अन्य कलीसियाओं के साथ उनके सम्बंध विच्छेद कर दिये जाने चाहिए। इसे दफ़्न कर मृत्यु देना कहते हैं; इसे शैतान को बहिष्कृत करना कहते हैं। यदि कोई कलीसिया कई स्थानीय गुण्डों, और साथ ही कुछ छोटी-मोटी "मक्खियों" से युक्त जिनमें विवेक का पूर्णतः अभाव है जो उनके आसपास अनुसरण करती हैं, और यदि समागम के सदस्य, सत्य देख लेने के बाद भी, इन गुण्डों की जकड़न और हेरफेर से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं, तो उन सभी मूर्खों का अंत में सफाया कर दिया जायेगा। यद्यपि इन छोटी-छोटी मक्खियों ने कुछ खौफ़नाक न किया हो, लेकिन ये और ज़्यादा धूर्त, और ज़्यादा मक्कार और कपटी होती हैं, और इस तरह के हर एक को हटा दिया जाएगा। एक भी नहीं बचेगा! जो शैतान से संबंधित हैं, वे शैतान के पास लौट जाएँगे, जबकि जो परमेश्वर से संबंधित हैं, वे निश्चित रूप से सत्य की खोज में चले जाएँगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होता है। उन सभी को नष्ट हो जाने दो जो शैतान का अनुसरण करते हैं! इन लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जायेगा। जो सत्य के खोजी हैं, उनका भरण-पोषण होने दो और वे अपने हृदयों की तृप्ति तक परमेश्वर के वचनों में आनंद प्राप्त करें। परमेश्वर धार्मिक है; और वह किसी के प्रति भी पक्षपात नहीं करता है। यदि तू एक इब्लीस है, तो तू सत्य का अभ्यास करने में अक्षम है; और यदि तू कोई ऐसा है जो सत्य की खोज करता है, तो यह निश्चित है कि तू शैतान का बंदी नहीं बनेगा—इसमें किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी

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