पौलुस के प्रकृति सार को कैसे पहचानें (भाग एक)

“सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है”—तुम लोगों ने परमेश्वर के वचनों के इस शीर्षक वाले खंड पर काफी लंबे समय तक संगति की है। इसमें किन मुद्दों पर चर्चा की गई है और इसका संबंध किन सत्यों से है? (इसका संबंध उस पथ से है जिस पर कोई व्यक्ति विश्वासी के रूप में चलता है।) इसकी विषय-वस्तु मुख्यतः पतरस और पौलुस द्वारा अपनाए गए पथों के इर्द-गिर्द घूमती है, क्या मैं सही कह रहा हूँ? इतने लंबे समय तक संगति करने के बाद मुझे विश्वास है कि तुम लोगों को इससे कुछ हासिल हुआ होगा—शायद बहुत-सी चीजें हासिल हुई होंगी। तुम लोगों को इस दौरान सुने गए उपदेशों के निचोड़ को संक्षेपित कर लेना चाहिए और फिर इसके मुख्य सूत्रों को सुलझाना चाहिए और विचार करने के इस तरीके तथा सारांशित की गई महत्वपूर्ण बातों और सूत्रों के अनुरूप अनुभव प्राप्त करना चाहिए। इससे तुम लोगों को मदद मिलेगी कि परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे करें, अपना कर्तव्य ठीक से कैसे निभाएँ और वास्तविक जीवन में अच्छी गवाही कैसे दें। मुझे आशा है कि जब तुम लोग संक्षेपित करने की प्रक्रिया पूरी कर लोगे तो तुम लोगों का जीवन प्रवेश और आध्यात्मिक कद काफी आगे बढ़ जाएगा। तो, जब तुम उन सत्य वास्तविकताओं का संक्षेपण करोगे जिन्हें तुमको उस अध्याय से समझना अपेक्षित था, तो तुम पौलुस के अनुभव से शुरू करोगे, या पतरस के अनुभव से? (पौलुस के।) क्यों? (पौलुस के विफल होने के कारणों के आधार पर अपने बारे में विचार करने से हमें पता चल सकेगा कि क्या हम पौलुस के पथ पर हैं। फिर, हम देखेंगे कि पतरस किस प्रकार के मार्ग पर था, ताकि हमारे पास अनुसरण के लिए एक लक्ष्य और दिशा हो।) वास्तव में, यह ऐसे ही होना चाहिए। पौलुस जिन-जिन हालात से गुजरा और जिस रास्ते पर चला, उससे सबक लो और अनुभवों का सारांश तैयार करो। समझो कि वह किस रास्ते पर था, कि परमेश्वर विश्वासियों से सही रास्ते पर ही चलने को क्यों कहता है, और सही रास्ता है क्या। यदि तुम सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चल सकते हो, तो तुम वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में और अपने कर्तव्य निर्वहन के दौरान परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए भटकाव से बच सकोगे। तुम परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ करने, चूक से गलत रास्ते पर पड़ने या पौलुस की तरह अंततः दंड का भागी बनने से भी बच सकोगे।

पौलुस के अनुभवों के प्रकाश में अब हम उसके द्वारा अपनाए गए मार्ग की विशेषताओं, परमेश्वर में उसके विश्वास करने के तरीके तथा उसने जिन लक्ष्यों और दिशा का अनुसरण किया उन्हें संक्षेप में प्रस्तुत करते हैं। हम सबसे पहले इन कोणों से पौलुस के चरित्र और स्वभाव पर नजर डालेंगे। पौलुस के जीवन और उसके साथ जो हुआ उसके बारे में कहानियों के आधार पर निर्णय करने पर हम पाते हैं कि अहंकार, आत्मतुष्टता, धोखेबाजी, सत्य से घृणा, दुष्टता और क्रूरता उसके स्वभाव के कुछ पक्ष हैं। लोग पौलुस के स्वभाव के चाहे जितने मुख्य पक्षों को देखने या सारांशित करने में सक्षम हों, यदि तुम उसके स्वभाव के केवल इन पहलुओं के बारे में बात करते हो तो तुम्हें शायद लगेगा कि यह काफी खोखला है। क्या मैं सही कह रहा हूँ? जब तुम लोग उसके स्वभाव के इन पहलुओं का उल्लेख करते हो, तो क्या उनका संबंध उसके लक्ष्यों, उसके जीवन की दिशा और एक विश्वासी के रूप में उसके द्वारा अपनाए गए रास्ते से होता है? जब तुम उसके अहंकार के बारे में बात करते हो, तो क्या तुम्हारे पास इस बात का समर्थन करने वाले कोई तथ्य होते हैं? तुम उसे अहंकारी क्यों मानते हो? तुम उसे धोखेबाज के रूप में क्यों देखते हो? क्या चीज उसे तुम्हारी दृष्टि में सत्य से घृणा करने वाला बनाती है? यदि तुम उसके स्वभाव के केवल इन पक्षों के सार का संक्षेपण करते हो और उसके लक्ष्यों, उसके जीवन की दिशा और एक विश्वासी के रूप में उसके द्वारा अपनाए गए रास्ते के बारे में बात नहीं करते, तो वे खोखले शब्द भर हैं और लोगों के लिए उनका कोई सकारात्मक या लाभकारी उपयोग नहीं होगा। बेहतर है कि पौलुस के अनुसरणों और उसके पथ के पीछे के परिप्रेक्ष्यों से कुछ कहा जाए। किसी व्यक्ति के सार को समझना कोई साधारण बात नहीं है। किसी व्यक्ति के प्रकृति सार का अनुमान तब नहीं किया जा सकता जब वह कुछ न कर रहा हो, या बस कुछ महत्वहीन चीजें कर रहा हो। तुम्हें देखना चाहिए कि ऐसे लोग नियमित रूप से खुद को कैसे उजागर करते हैं और उनके क्रियाकलापों के पीछे इरादा और प्रेरणा क्या है, यानी उनके प्रयासों, इच्छाओं और उनके द्वारा अपनाए गए मार्ग को देखो। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण पक्ष है यह देखना कि जब कोई व्यक्ति परमेश्वर द्वारा उसके लिए निर्मित किसी स्थिति का सामना करता है या जब परमेश्वर उसके लिए व्यक्तिगत रूप से कुछ करता है, जैसे कि उसका परीक्षण करना, उसका शोधन करना, उसकी काट-छाँट करना या व्यक्तिगत रूप से उसे रोशन करना और उसका मार्गदर्शन करना तो वह इसे कैसे संभालता है। परमेश्वर मुख्य रूप से इन्हीं पक्षों को देखता है। ये पक्ष किससे संबंधित हैं? ये उन सिद्धांतों से संबंधित हैं जिनके अनुसार कोई व्यक्ति काम करता है, जीवन जीता है, आचरण करता है और दुनिया के साथ सम्पर्क करता है तथा जिन लक्ष्यों और दिशा का अनुसरण करता है, जिस मार्ग पर चलता है, जिस तरह से जीता है, जिसके सहारे जीता है, और जो उसके अस्तित्व का आधार होता है। उनका संबंध इसी से है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि अगर हम इन सभी चीजों को छोड़ कर केवल पौलुस के प्रकृति सार के बारे में बात करते हैं, तो हम चाहे जितना भी कहें या कितनी ही व्यापकता से बात करें, वे सिर्फ खोखले शब्द होंगे। यदि हम पौलुस के सार का हर पक्ष देखना चाहें कि वह कौन है, और आज लोगों की मदद करना चाहें, या उन्हें एक दर्पण देना चाहें जिसमें वे खुद को देख सकें, तो हमें सबसे पहले पौलुस द्वारा अपनाए गए पथ, जिन लक्ष्यों की प्राप्ति का उसने प्रयास किया, और उसके अस्तित्व के आधार तथा परमेश्वर के प्रति उसके रवैये का सारांश निकालना होगा। यदि हम उसके स्वभाव के हर पहलू को इन कोणों से देखते हुए विश्लेषण करें, तो क्या हमारे पास कोई आधार नहीं होगा? इस तरह से संगति और संक्षेपण करना अंशतः इसलिए है कि तुम पौलुस को अधिक स्पष्ट रूप से देख सको, लेकिन यह मुख्यतः इसलिए है कि जब आज के लोग परमेश्वर के उद्धार और संप्रभुता का सामना करें तो वे जान सकें कि इन्हें कैसे ग्रहण करें, और यह कि उन्हें सत्य का अनुसरण कैसे करना चाहिए ताकि वे पौलुस के नक्शेकदम पर चलने से बच सकें और उसकी तरह दंड का भागी होने से बच सकें। यही सबसे कारगर तरीका है।

जब तुम पौलुस द्वारा स्वयं को प्रस्तुत करने के सभी तरीकों को देखते हो, तो तुम्हें उसका प्रकृति सार देखने में सक्षम होना चाहिए और यह निष्कर्ष निकालने में पूरी तरह सक्षम होना चाहिए कि उसकी दिशा, लक्ष्य, स्रोत और उसके अनुसरणों की प्रेरणा गलत थीं; वे चीजें परमेश्वर के प्रति विद्रोही और प्रतिरोधी थीं, परमेश्वर को नाराज करने वाली और ऐसी थीं जिनसे उसे बेहद घृणा थी। पौलुस द्वारा स्वयं को प्रस्तुत करने का पहला मुख्य तरीका क्या है? (उसने मुकुट के बदले में कड़ी मेहनत की और काम किया।) तुम लोगों ने उसे खुद को इस तरह प्रस्तुत करते हुए कहाँ देखा, या यह देखा कि वह इस स्थिति में था? (उसके शब्दों के माध्यम से।) उसकी “प्रसिद्ध कहावतों” के माध्यम से। आम तौर पर, प्रसिद्ध कहावतें सकारात्मक होती हैं और संकल्प, आशा और आकांक्षा रखने वाले लोगों के लिए सहायक और लाभदायक होती हैं; वे ऐसे लोगों को प्रोत्साहित और प्रेरित कर सकती हैं, लेकिन पौलुस के प्रसिद्ध कथनों का काम क्या था? उसके बहुत-से कथन थे। क्या तुम उसके ज्यादा प्रसिद्ध कथनों में से किसी एक का उल्लेख कर सकते हो? (“मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है” (2 तीमुथियुस 4:7-8)।) ये शब्द उसके प्रकृति सार के किस पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं? हमें इसे सत्य के अनुसार कैसे निरूपित करना चाहिए? (अभिमानी, आत्म-तुष्ट और परमेश्वर के साथ सौदा करने वाले के रूप में।) यह उसकी अहंकारी प्रकृति ही थी जिसने उसे ये शब्द कहने के लिए प्रेरित किया—यदि सारे प्रयासों के अंत में मुकुट न मिलना होता तो वह दौड़ में भाग नहीं लेता, काम नहीं करता या परमेश्वर में विश्वास भी नहीं करता। इतने सारे उपदेशों को सुनने के बाद लोगों को अब पौलुस द्वारा प्रकट की गई इस अभिव्यक्ति और स्थिति को पहचानने में सक्षम होना चाहिए, लेकिन क्या तुम इसे निरूपित कर सकते हो? जब हम “सारांश निकालना” कहते हैं तो हमारा मतलब किसी चीज को निरूपित करना होता है; किसी चीज को निरूपित करने के लिए तुम जिन शब्दों का उपयोग करते हो वे सच्ची समझ होते हैं। जब तुम किसी चीज को सटीक तरीके से निरूपित कर सकते हो तो यह साबित करता है कि तुम उस मामले को स्पष्ट रूप से देखते हो; जब तुम किसी चीज को निरूपित नहीं कर सकते और केवल दूसरे लोगों के निरूपणों की नकल करते हो तो यह साबित करता है कि तुम इसे सचमुच नहीं समझते हो। उस समय किस मानसिकता या स्थिति ने पौलुस को ये शब्द बोलने के लिए प्रेरित किया? उसने किस इरादे से ऐसा किया? इन शब्दों से तुम्हें उसके प्रयासों का क्या सार दिखता है? (आशीष पाना।) वह तेजी से भागा, खुद को खपाया और अपने को इतना अधिक समर्पित किया क्योंकि उसका इरादा था आशीष पाना। यह उसका प्रकृति सार था जो उसके हृदय के अंतःस्थल में रहता था। ठीक अभी, जब तुम सब लोग इस मुद्दे का विश्लेषण कर रहे थे, तो तुमने कहा कि पौलुस परमेश्वर के साथ सौदा कर रहा था। पौलुस का कौन-सा रवैया इसे दिखाता है? बिल्कुल अभी हम मुकुट पाने, आशीष पाने और परमेश्वर में विश्वास करने के प्रति पौलुस के सबसे सच्चे रवैये को संक्षेप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं; हम इसका संक्षेपण नहीं कर रहे हैं कि पौलुस परमेश्वर के साथ सौदा कर रहा था या नहीं और वह सच्चा विश्वासी था या नहीं। मुझे फिर से बताओ। (उसे सत्य से प्रेम नहीं था और उसका रवैया हिकारत भरा था।) यह कोई रवैया नहीं है; यह उसके स्वभाव का हिस्सा है। फिलहाल, हम उसके रवैये की बात कर रहे हैं। (वह लालची था।) यह उसके प्रकृति सार का एक पक्ष है, एकदम उसके आशीष पाने के इरादे और इच्छा की तरह। रवैया क्या होता है? उदाहरण के लिए, मैं कहूँ कि हर समय मसालेदार चीजें खाना पेट के लिए हानिकारक है, और कोई जवाब दे कि “मुझे पता है कि मसालेदार खाना खाना बुरा है, लेकिन मुझे मसालेदार खाना ही पसंद है! अगर मैं मसालेदार खाना नहीं खाऊँगा, तो क्या खा सकूँगा?” इस पर मैं जवाब देता हूँ, “तुम्हारे स्वास्थ्य की खातिर जब तक तुम कोई मसालेदार खाना नहीं खाओगे, मैं तुम्हें हर बार भोजन के समय कुछ और खाद्य सामग्री खरीदने के लिए पाँच डॉलर दूँगा।” फिर, वह सच में खुश हो जाता है और कहता है, “ठीक है, मैं मसालेदार खाना नहीं खाऊँगा!” एक सौदा हो गया है और वह उस पर कायम है। लेकिन वह खुद को मसालेदार खाना खाने से क्यों रोक सका? दरअसल, यह पैसे की वजह से हुआ। यदि मैं उसे धन न दूँ, तो वह अपने पर वश नहीं रख सकेगा; वह पहले की तरह ही मसालेदार खाना खाता रहेगा। उसने मसालेदार भोजन करना केवल इसलिए बंद कर दिया है क्योंकि इससे कुछ हासिल हो रहा है—पैसा। यही उसका रवैया है। यही बात उसके हृदय की गहराइयों में छिपी हुई है। क्या उसने मसालेदार भोजन करना इसलिए बंद कर दिया है क्योंकि वह सत्य का अभ्यास कर रहा है, जैसा उसे बताया गया है वैसा ही कर रहा है या परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए ऐसा कर रहा है? (नहीं।) नहीं, यह इनमें से किसी भी कारण से नहीं है। उसने स्वयं को मसालेदार भोजन करने से इसलिए नहीं रोका है क्योंकि वह सत्य का अभ्यास कर रहा है, या उसकी एक निगाह अपने स्वास्थ्य पर है; उसका रवैया बेपरवाही का और सतही है; वह इसे लेन-देन के रूप में देखता है और चापलूसी करने के लिए ऐसा कर रहा है। यदि वह अपने उद्देश्य को प्राप्त न कर सके और धन न मिले, तो वह अपनी मर्जी के खाने की ओर वापस चला जाएगा और पहले से भी ज्यादा मसालेदार भोजन खा सकता है। यह सबसे बढ़िया उदाहरण भले न हो, लेकिन जब हम इसकी तुलना पौलुस से करते हैं तो इसमें क्या समानताएँ दिखती हैं? (यह वैसा ही है जैसे पौलुस ने आशीष पाने के लिए प्रेरित होकर परमेश्वर के साथ एक सौदा किया।) पौलुस ने अच्छी लड़ाई लड़ने, दौड़ लगाने, काम करने, खुद को खपाने और यहाँ तक कि कलीसिया का सिंचन करने जैसे काम भी उन सिक्कों के रूप में किए जिनके बदले धार्मिकता का मुकुट और उस दिशा में जाने वाला पथ मिल सकता था। इसलिए, चाहे उसने कष्ट उठाया हो, खुद को खपाया हो, या दौड़ में भाग लिया हो, उसने चाहे जितना भी कष्ट सहा हो, धार्मिकता का मुकुट हासिल करना ही उसके दिमाग में एकमात्र लक्ष्य था। उसने धार्मिकता का मुकुट और आशीष पाने के लिए प्रयासरत होने को ही परमेश्वर में विश्वास करने के उचित उद्देश्य के रूप में लिया और कष्ट उठाने, खुद को खपाने, काम करने और दौड़ में भाग लेने को इस उद्देश्य की दिशा में जाने वाले पथों के रूप में माना। उसका सारा बाहरी अच्छा व्यवहार दिखावे के लिए था; उसने यह सब अंत में आशीष प्राप्त करने के बदले में किया। यह पौलुस के बड़े पापों में से पहला पाप है।

पौलुस ने जो कुछ भी कहा और किया, जो उसने प्रकट किया, उसके काम और जिस दौड़ में वह दौड़ा उसका इरादा और लक्ष्य, साथ ही इन दोनों चीजों के प्रति उसके रवैये के बारे में क्या कुछ ऐसा है जो सत्य के अनुरूप हो? (नहीं, ऐसा नहीं है।) उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो सत्य के अनुरूप हो, और उसने जो कुछ भी किया वह उसके मुताबिक नहीं था जो प्रभु यीशु ने लोगों से करने को कहा था, लेकिन क्या उसने इस पर विचार किया? (नहीं, उसने विचार नहीं किया।) उसने कभी इस पर विचार ही नहीं किया, न ही कोई तलाश की, तो फिर उसके पास यह मानने का क्या आधार था कि उसकी सोच सही थी? (उसकी धारणाएँ और कल्पनाएँ।) इसमें एक मसला है; उसने किसी चीज को अपना जीवन भर अनुसरण किए जाने वाला लक्ष्य कैसे बना लिया जिसकी उसने कल्पना की थी? क्या उसने कभी इस पर कोई विचार किया या खुद से पूछा था कि “क्या मैं जो सोच रहा हूँ वह सही है? मेरे अलावा दूसरे लोग तो ऐसा नहीं सोचते। क्या ये कोई समस्या है?” न केवल उसे ऐसे संदेह नहीं थे, बल्कि उसने अपने विचारों को पत्रों में लिखा और उन्हें सभी कलीसियाओं को भेजा, ताकि हर कोई उन्हें पढ़ सके। ऐसे व्यवहार की प्रकृति क्या है? इसमें एक समस्या है; उसने कभी यह सवाल क्यों नहीं किया कि क्या उसकी सोच सत्य के अनुरूप है, उसने कभी सत्य क्यों नहीं खोजा या इसकी तुलना प्रभु यीशु ने जो कहा है उससे क्यों नहीं की? इसके बजाय, उसने जो कल्पना की थी और जो उसे अपनी धारणाओं में सही लगा, उसे ही वह लक्ष्य माना जिसे प्राप्त करने का उसे प्रयास करना चाहिए। यहाँ समस्या क्या है? उसकी कल्पना और सोच के हिसाब से जो सही था उसे उसने सत्य माना और उसे प्राप्त करने योग्य लक्ष्य के रूप में अपनाया। क्या यह अत्यधिक अहंकारी और आत्म-तुष्ट होना नहीं है? क्या उसके हृदय में तब भी परमेश्वर के लिए स्थान था? क्या वह तब भी परमेश्वर के वचनों को सत्य मानने में सक्षम था? यदि वह परमेश्वर के वचनों को सत्य नहीं मान सकता था, तो परमेश्वर के प्रति उसका रवैया क्या होगा? क्या वह परमेश्वर भी बनना चाहता था? यदि ऐसा न होता, तो वह अपने विचारों और धारणाओं में कल्पित बातों को अनुसरण योग्य लक्ष्यों के रूप में नहीं देखता, न ही वह अपनी धारणाओं या कल्पनाओं का अनुसरण इस तरह करता जैसे वे सत्य ही हों। उसका मानना था कि उसने जो सोचा वह सत्य था, और कि वह सत्य और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप था। वह जिस बात को सही समझता था उसे ही उसने कलीसियाओं में भाई-बहनों के साथ साझा किया और उनके मन में यह बात बिठाई, जिससे हर कोई उसकी कही हास्यास्पद बातों का पालन करने लगा; उसने प्रभु यीशु के शब्दों को अपने शब्दों से बदल दिया, और अपने इन हास्यास्पद शब्दों का इस्तेमाल यह गवाही देने के लिए किया कि उसके लिए जीवित रहना मसीह होना है। क्या यह पौलुस का दूसरा बड़ा पाप नहीं है? यह समस्या अत्यंत गंभीर है!

हर युग में पौलुस से मिलते-जुलते लोग रहे हैं तो हम पौलुस का उपयोग एक सबसे प्रातिनिधिक उदाहरण के रूप में क्यों करते हैं? क्योंकि वह बाइबल में दर्ज है और उसने जो पाखंड और भ्रांतियाँ कहीं उनका एवं स्वयं उसका सभी ईसाइयों पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। तुम कह सकते हो कि उसने जो नुकसान पहुँचाया वह बहुत बड़ा है। ऐसे बहुत-से लोग हैं जिन्हें उसने गुमराह किया और विष दिया है। उसने न केवल कई पीढ़ियों को विष दिया है, बल्कि वह विष बहुत गहरा है। कितना गहरा? (सभी ईसाई उसे एक आदर्श के रूप में देखते हैं और उसकी नकल करते हैं; वे उसके शब्दों का अभ्यास ऐसे करते हैं जैसे कि वे परमेश्वर के वचन हों।) यदि तुम मसीह के शब्दों और परमेश्वर के वचनों पर संगति करते हो, तो कोई भी इसे गंभीरता से नहीं लेता। लेकिन जब तुम पौलुस के शब्दों पर संगति करते हो, तो लोग तुरंत उठ बैठते हैं और ध्यान से सुनते हैं। इसका क्या अर्थ है? (कि वे पौलुस के साथ मसीह जैसा व्यवहार करते हैं।) जब लोग पौलुस के साथ मसीह जैसा व्यवहार करते हैं, तो उसने उनके दिलों में प्रभु यीशु मसीह का स्थान ले लिया होता है। क्या यह बहुत भारी पाप नहीं है? (बिल्कुल है।) पौलुस इतिहास का सबसे बड़ा मसीह-विरोधी है! उसके शब्दों का आशय अत्यंत स्पष्ट है; उसके लक्ष्य और उसका कपट स्पष्ट रूप से प्रदर्शित हैं; उसका सार अत्यधिक कपटी और दुर्भावनापूर्ण है। इसकी प्रकृति गंभीर समस्याग्रस्त है! इसीलिए मुझे इस प्रकरण को सामने लाना पड़ा और इसका गहन-विश्लेषण करना पड़ा। यदि मैं ऐसा नहीं करता तो लोग उससे गुमराह होते रहते। हालाँकि, अगर मैं पौलुस के मुद्दों का गहन-विश्लेषण करने जा रहा था, तो आज मुझे लोगों के लिए उसका बेहतर उपयोग करते हुए उसे इस बात के उदाहरण के तौर पर रखना था कि क्या नहीं करना चाहिए। अभी-अभी हमने पौलुस के दो पापों का सारांश प्रस्तुत किया है। पहला क्या था? (पौलुस ने काम करने और दौड़ लगाने को ऐसे सिक्कों के रूप में देखा, जिनके बदले वह मुकुट पा सकता था। उसने आशीष और मुकुट हासिल करने को ऐसे उचित लक्ष्य के रूप में देखा, जिसे पाने का उसे सतत प्रयास करना चाहिए।) यह सही है। पौलुस की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वह इन चीजों को ऐसा लक्ष्य मानता था जिन्हें पाने का उसे सतत प्रयास करना चाहिए। शुरू से यह ऐसा लेन-देन था जिसमें विद्रोहशीलता और दुष्ट प्रकृति शामिल थीं, लेकिन पौलुस इसे प्राप्त करने योग्य उचित लक्ष्य मानता था। यह सबसे गंभीर समस्या है। दूसरा पाप क्या था? (पौलुस अपनी कल्पनाओं और जिन चीजों को अपनी धारणाओं में सही समझता था, उन्हें सत्य मानता था। उसने कभी इस पर विचार नहीं किया और इसके बारे में खोज भी नहीं की; इसके बजाय उसने लोगों को गुमराह किया और भाई-बहनों से अपने शब्दों और बेतुके सिद्धांतों का पालन कराया, जिससे लोग उसे मसीह जैसा समझने लगे।) यह विशेष रूप से गंभीर मुद्दा है। इन मुद्दों का बिल्कुल ठीक-ठीक नोट बनाओ; जब हम उनका सारांश बनाने की प्रक्रिया पूरी कर लें तो तुम्हें उनसे अपनी तुलना करनी चाहिए। जब हम किसी विषय पर चर्चा करते हैं तो हमें पहले सत्य के उस विशेष पहलू के बारे में बात करनी चाहिए, फिर तुलना करनी चाहिए। पौलुस के स्वयं को प्रदर्शित करने के तरीके का गहन-विश्लेषण करना सभी के लिए एक चेतावनी है और यह लोगों को यह भी बताता है कि उन्हें सही मार्ग चुनना चाहिए, फिर अभ्यास का एक सटीक मार्ग खोजना चाहिए और पौलुस के पदचिह्नों पर चलने से बचना चाहिए। इस तरीके से यह पूरी तरह से प्रभावी है।

पौलुस का एक और गंभीर पाप है, और वह यह है कि उसने अपना काम पूरी तरह से अपनी मानसिक क्षमता, शैक्षणिक ज्ञान, धर्मशास्त्र संबंधी ज्ञान और सिद्धांत के आधार पर किया। यह ऐसी बात है जो उसके प्रकृति सार से संबंधित है। तुम लोगों को इसका सारांश प्रस्तुत करना चाहिए और फिर जाँच करनी चाहिए कि इन चीजों के प्रति उसका रवैया क्या है। यह एक बहुत ही अहम और महत्वपूर्ण पाप है और इसे लोगों को अवश्य समझना चाहिए। एक पल के लिए विचार करो कि इस पाप में पौलुस की कौन-सी अभिव्यक्तियाँ शामिल हैं; इन अभिव्यक्तियों के माध्यम से देखो कि उसका प्रकृति सार क्या है, और इस बात की स्पष्ट तस्वीर बनाओ कि वह अंदर से किस चीज को महत्व देता है तथा उसके लक्ष्य क्या हैं। उसके इरादे और लक्ष्य ही इस बात के मूल में हैं कि उसने गलत रास्ते पर चलना क्यों शुरू किया। ये तुम्हारे लिए स्पष्ट रूप से समझने वाली सबसे महत्वपूर्ण बातें हैं। पौलुस के पास क्या विशेष गुण थे? (पौलुस को व्यवस्था के युग से जुड़े बाइबल के बहुत सारे ज्ञान की अच्छी समझ थी।) उस समय केवल पुराना नियम ही अस्तित्व में था। पौलुस इन धर्मग्रंथों से परिचित था, और आज के धर्मशास्त्र संबंधी शिक्षकों, पादरियों, उपदेशकों और फादर की तरह उनके बारे में बहुत जानकार था। उसका धर्मशास्त्र संबंधी ज्ञान शायद आज के लोगों से भी अधिक व्यापक रहा होगा, लेकिन यह ज्ञान उसने इस दुनिया में जन्म लेने के बाद हासिल किया था। पौलुस के पास जन्म से क्या था? (उसकी जन्मजात योग्यताएँ।) पौलुस स्वाभाविक रूप से चतुर था, अच्छा वक्ता था, अपनी बात को अच्छी तरह से व्यक्त करता था, और सार्वजनिक रूप से बोलने में हिचकता नहीं था। आओ, अब हम उसकी जन्मजात योग्यताओं, प्रतिभाओं, बुद्धिमत्ता, क्षमताओं के साथ-साथ उसके द्वारा जीवन भर अर्जित किए गए ज्ञान के बारे में बात करने पर ध्यान केंद्रित करें। इस तथ्य का क्या मतलब है कि वह अच्छा वक्ता था? उसने स्वयं को किस प्रकार से प्रकट एवं प्रस्तुत किया? वह ऊँचे सिद्धांतों के बारे में बात करना पसंद करता था; वह लगातार गहन आध्यात्मिक धर्म-सिद्धांतों, सिद्धांतों और ज्ञान तथा अपने प्रसिद्ध ग्रंथों और लोगों द्वारा प्रायः उद्धृत कथनों के बारे में बात करता था। वह कौन-सा एक शब्द है जो पौलुस के शब्दों का सार प्रस्तुत करता है? (खोखला।) क्या खोखले शब्द लोगों के लिए रचनात्मक हैं? जब वे उन शब्दों को सुनते हैं, तो उन्हें साहस का अनुभव होता है, लेकिन थोड़ी देर बाद उनका उत्साह ठंडा पड़ जाता है। पौलुस जिन चीजों के बारे में बात करता था वे अस्पष्ट और भ्रम पैदा करने वाली थीं, जिन चीजों को तुम ठोस शब्दों में नहीं बता सकते। जिन सिद्धांतों के बारे में वह बात करता था, उनमें तुम्हें अभ्यास का कोई मार्ग या दिशा नहीं मिल सकती; तुमको ऐसा कुछ भी नहीं मिल सकता जिसे तुम सटीक तरीके से वास्तविक जीवन में लागू कर सको—चाहे सिद्धांत हों या आधार, कोई भी वास्तविक जीवन में लागू नहीं होता। इसीलिए मैं कहता हूँ कि वह जिन धार्मिक सिद्धांतों और आध्यात्मिक सिद्धांतों की बात करता था, वे खोखली और अव्यावहारिक बातें थीं। इन चीजों के बारे में बात करने में पौलुस का लक्ष्य क्या था? कुछ लोग कहते हैं, “वह हमेशा इन चीजों के बारे में बात करता था क्योंकि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों को जीतना चाहता था और यह चाहता था कि वे उसे आदर से देखें और उसे आदर्श मानें। वह प्रभु यीशु का स्थान लेना चाहता था और अधिक लोगों को पाना चाहता था। अगर उसने बहुत-से लोगों को पा लिया, तो क्या उसे आशीष नहीं मिलेगा?” क्या यही वह विषय है जिस पर हम आज बात करना चाहते हैं? (नहीं, ऐसा नहीं है।) यह किसी ऐसे व्यक्ति के लिए बेहद सामान्य बात है जिसकी काट-छाँट न की गई हो, जिस पर कोई फैसला न लिया गया हो या जिसकी ताड़ना न की गई हो, जो परीक्षणों या शुद्धिकरण से न गुजरा हो, जिसके पास उसके जैसे विशेष गुण हों और जिसका प्रकृति सार ऐसे मसीह विरोधी का हो जो इस तरह से दिखावा करता हो और उसके जैसे आचरण का प्रदर्शन करता हो। इसलिए हम इस मामले की गहराई में नहीं जाएँगे। हम किस बात की गहराई में जाने वाले हैं? उसकी इस समस्या के सार, उसके ऐसा करने के पीछे के मूल कारण और प्रेरणा, और किस चीज ने उसे इस तरह कार्य करने के लिए प्रेरित किया उसकी गहराई में जाएँगे। इससे फर्क नहीं पड़ता कि आज लोग उन सभी चीजों को धर्म-सिद्धांत, सिद्धांत, धर्मशास्त्र संबंधी ज्ञान, सहज प्रतिभा या चीजों की उसकी अपनी व्याख्या के रूप में देखेंगे या नहीं, आम तौर पर कहें तो, पौलुस की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वह मानवीय इच्छा से उत्पन्न चीजों को सत्य के रूप में ग्रहण करता था। इसीलिए उसमें लोगों को जीतने और उन्हें सिखाने के लिए इन धार्मिक सिद्धांतों का निर्णायक, साहसपूर्ण और खुला उपयोग करने की हिम्मत थी। यही समस्या का सार है। क्या यह एक गंभीर समस्या है? (हाँ, यह गंभीर समस्या है।) किन चीजों को वह सत्य मानता था? वह खूबियों के साथ पैदा हुआ था और साथ ही उसने जीवन भर ज्ञान अर्जित किया और धर्मशास्त्र संबंधी सिद्धांत सीखे थे। उसने धर्मशास्त्र संबंधी सिद्धांत शिक्षकों से सीखे, धर्मग्रंथों को पढ़कर सीखे और उसने जो समझा और कल्पना की उससे भी ज्ञान प्राप्त किया। उसने अपनी मानवीय समझ की धारणाओं और कल्पनाओं को सत्य माना, लेकिन यह सबसे गंभीर समस्या नहीं थी, एक समस्या इससे भी बड़ी थी। उसने उन बातों को सत्य माना, लेकिन क्या उसने उस समय सोचा था कि वे बातें सत्य थीं? क्या उसके पास ऐसी कोई अवधारणा थी कि सत्य है क्या? (नहीं, उसने ऐसा नहीं किया।) तो फिर वह उन चीजों को किस रूप में देखता था? (जीवन के रूप में।) उसने उन सभी चीजों को जीवन माना। उसे लगता था कि वह जितने अधिक उपदेश दे सकेगा, या जितनी ऊँची बातें करेगा, उसका जीवन उतना ही महान होगा। वह उन चीजों को जीवन मानता था। क्या यह गंभीर मामला है? (हाँ, यह गंभीर मामला है।) इसका क्या प्रभाव पड़ा? (इसका प्रभाव उसके द्वारा अपनाए गए मार्ग पर पड़ा।) यह इसका एक पक्ष है। और क्या? (वह सोचता था कि इन चीजों को प्राप्त कर लेने से उसका उद्धार हो जाएगा और वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकेगा।) इसका संबंध अभी भी आशीष प्राप्त करने से है; उसने सोचा कि उसका जीवन जितना महान होगा, उसके स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने और स्वर्गारोहण की संभावना उतनी ही अधिक होगी। “स्वर्गारोहण” कहने का दूसरा तरीका क्या है? (परमेश्वर के साथ शासन करना और शक्ति सम्पन्न होना।) स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने का उसका उद्देश्य परमेश्वर के साथ शासन करना और सत्ता का संचालन करना था, लेकिन यह उसका अंतिम लक्ष्य नहीं था, उसका एक और भी लक्ष्य था। वह इस बारे में बात करता था। उसने इसे कैसे व्यक्त किया है? (“क्योंकि मेरे लिये जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है” (फिलिप्पियों 1:21)।) उसने कहा कि उसके लिए जीना मसीह है, और मरना लाभ है। इसका अर्थ क्या है? कि वह मरने के बाद परमेश्वर बन जाएगा? उसकी महत्वाकांक्षा सीमाहीन है! उसकी समस्या बहुत गंभीर है! तो, क्या पौलुस के मामले का गहन-विश्लेषण करना हमारे लिए गलत है? बिल्कुल नहीं। उसे अपनी खूबियों और प्राप्त किए गए ज्ञान को कभी भी जीवन नहीं मानना चाहिए था। यह उसका तीसरा बड़ा पाप है। तुम इन तीन पापों में से किसी एक में पौलुस की प्रकृति का सार देख सकते हो। प्रत्येक पाप में उसके प्रकृति सार के लक्षण उजागर होते हैं; कुछ भी न छिपा है, न छूटा है। उन सभी में उसका प्रकृति सार प्रदर्शित होता है।

आगे हम पौलुस की सबसे महत्वपूर्ण और गंभीर समस्याओं पर नजर डालेंगे, जो उसका सबसे अधिक प्रतिनिधित्व करती हैं। पौलुस ने जो पत्र लिखे उनमें वह अक्सर किन शब्दों का प्रयोग करता था? देखो कि बाइबल का मूल पाठ क्या कहता है, फिर हम इसका विश्लेषण और विच्छेदन करेंगे और देखेंगे कि वास्तव में उसके मन में क्या था और परमेश्वर क्यों उससे सख्त नफरत और घृणा करता था। पौलुस जैसे प्रसिद्ध और शुरुआती कलीसियों के काम में सहायक रहे व्यक्ति को अंत में दंडित क्यों होना पड़ा? परमेश्वर ने अपने मन में पौलुस का मूल्यांकन कैसे किया? परमेश्वर ने उसे कैसे देखा? परमेश्वर ने उसका मूल्यांकन इस तरीके से क्यों किया, और जो निर्णय सुनाया वह क्यों सुनाया? परमेश्वर ने अंततः किस आधार पर पौलुस को निरूपित किया और उसका परिणाम निर्धारित किया? इन सभी चीजों की सूची बनाओ ताकि लोग उन तथ्यों को देख सकें कि उसने किस प्रकार परमेश्वर का प्रतिरोध किया, ताकि वे यह न सोचें कि उसे गलत तरीके से सजा दी गई थी। जब लोग सत्य को नहीं समझते, तो इस बात की सबसे ज्यादा संभावना होती है कि वे बाहरी दिखावे के आधार पर लोगों को परिभाषित करें। लोगों के पास दूसरों के बाहरी स्वरूप के अनुसार उन्हें परिभाषित करने का क्या आधार है? अंशतः यह पारंपरिक संस्कृति और सामाजिक शिक्षाओं के कारण होता है। इसका एक दूसरा हिस्सा है घरेलू शिक्षा, सरल और केवल सही-गलत समझने वाली सोच, और सही-गलत संबंधी विचार तथा अवधारणाएँ। इसका एक और हिस्सा स्कूली शिक्षा है। ये सभी चीजें मिलकर पूरी तरह शैतानी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करती हैं। शैतान द्वारा लोगों के मन में ये बातें बैठाने का परिणाम यह हुआ कि लोग अपनी धारणाओं और पसंदगियों के अनुसार इसे अच्छा, उसे बुरा, इसे सही और उसे गलत के रूप में निरूपित करते हैं। लोगों के इन सभी निरूपणों का आधार क्या है? वास्तव में, वे शैतानी सिद्धांतों और फलसफों पर आधारित हैं; लोगों के पास ये जो आधार हैं वे परमेश्वर या सत्य से बिल्कुल नहीं आए हैं। यही कारण है कि भ्रष्ट मनुष्य किसी व्यक्ति या घटना का निरूपण चाहे जैसे भी करें वे गलत होते हैं—इसका सत्य से कोई संबंध नहीं होता और यह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं होता है; इसका परमेश्वर या उसके वचनों से कोई लेना-देना नहीं होता। परमेश्वर अपने स्वभाव और सार के अनुसार लोगों और घटनाओं के बारे में फैसले देता है। परमेश्वर का स्वभाव और सार क्या है? वह है सत्य। सत्य सभी सकारात्मक चीजों की अभिव्यक्ति है, और सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता है। परमेश्वर सभी चीजों, और सभी लोगों, घटनाओं और लोग जिन चीजों के संपर्क में आते हैं, उनके बारे में सत्य के अनुसार फैसला सुनाता है। परमेश्वर लोगों के बारे में अपने फैसले उनके प्रकृति-सार, उनके क्रियाकलापों को प्रेरित करने वाली चीजों, जिस पथ पर वे चलते हैं, और सकारात्मक चीजों एवं सत्य के प्रति उनके रवैये के आधार पर करता है। यह परमेश्वर के निष्कर्षों का आधार होता है। सभी घटनाओं और चीजों पर परमेश्वर के फैसले सत्य पर आधारित होते हैं। सभी घटनाओं और चीजों को निरूपित करने के लिए शैतान का क्या आधार होता है? (उसका अपना तर्क।) शैतानी फलसफे और तर्क, जो सत्य के बिल्कुल विपरीत हैं। सारी मानवता शैतान द्वारा भ्रष्ट की गई है। मनुष्य के पास सत्य नहीं है; वे शैतान का प्रतिनिधित्व करते हैं और उसे साकार करते हैं। वे सभी चीजों को शैतानी फलसफों और तर्क के अनुसार निरूपित करते हैं। इसलिए जब वे चीजों का निरूपण करते हैं तो वे किन निष्कर्षों पर पहुँचते हैं? ऐसे निष्कर्ष जो ठीक सत्य के साथ टकराव लिए होते हैं और उसके विपरीत होते हैं। क्या तुम लोगों को वे शब्द मिले जिन्हें पौलुस अपने पत्रों में अक्सर इस्तेमाल करता था? उन्हें पढ़ो। (“पौलुस की ओर से जो परमेश्वर की इच्छा से यीशु मसीह का प्रेरित होने के लिये बुलाया गया” (1 कुरिन्थियों 1:1)।) देखा? पौलुस परमेश्वर और मसीह को किस क्रम में रखता है : “पौलुस की ओर से जो परमेश्वर की इच्छा से यीशु मसीह का प्रेरित होने के लिये बुलाया गया।” इस श्रेणी में पौलुस का स्थान कहाँ है? (तीसरा।) पौलुस के मन में, नंबर एक पर कौन है? (परमेश्वर।) और नंबर दो? (प्रभु यीशु।) यीशु मसीह। तीसरा कौन है? (स्वयं पौलुस।) वह स्वयं है। “पौलुस की ओर से जो परमेश्वर की इच्छा से यीशु मसीह का प्रेरित होने के लिये बुलाया गया।” पौलुस इस वाक्यांश का अक्सर उपयोग करता था, और इस वाक्यांश में बहुत सारी सूचनाएँ हैं। पहला, हम जानते हैं कि पौलुस प्रभु यीशु मसीह का एक प्रेरित है। तो, पौलुस के परिप्रेक्ष्य से प्रभु यीशु मसीह कौन है? वह मनुष्य का पुत्र है और स्वर्ग में परमेश्वर के बाद दूसरा है। भले ही पौलुस ने प्रभु यीशु मसीह को स्वामी कहा या प्रभु कहा, उसके परिप्रेक्ष्य से पृथ्वी पर मसीह परमेश्वर नहीं था, बल्कि एक व्यक्ति था जो लोगों को सिखा सकता था और उनसे अपना अनुसरण करवा सकता था। ऐसे व्यक्ति के प्रेरित के रूप में पौलुस का क्या काम था? सुसमाचार का प्रचार करना, कलीसियों में जाना, धर्मोपदेश देना और पत्र लिखना। उसका मानना था कि वह ये काम प्रभु यीशु मसीह की ओर से कर रहा था। अपने मन में उसने सोचा, “जहाँ तुम नहीं जा सकोगे, वहाँ जाकर मैं तुम्हारी मदद करूँगा और जिन जगहों पर तुम नहीं जाना चाहते, वहाँ मैं तुम्हारी ओर से नजर रखूँगा।” प्रेरित के बारे में पौलुस की अवधारणा यह थी। उसके दिमाग में क्रम संबंधी धारणा यह थी कि वह और प्रभु यीशु दोनों सामान्य लोग हैं। वह स्वयं को और प्रभु यीशु मसीह को एक समान मनुष्य मानता था। उसके मन में उन दोनों के पदों के बीच सार रूप में कोई अंतर नहीं था, न ही उनकी पहचान में कोई अंतर था और उनके सेवा-दायित्वों में अंतर की तो बात ही नहीं थी। केवल उनके नाम, उम्र, पारिवारिक परिस्थितियों और पृष्ठभूमियों में अंतर था और उनकी बाहरी खूबियाँ और ज्ञान अलग-अलग थे। पौलुस के मन में था कि वह हर तरह से प्रभु यीशु मसीह के समान था और उसे मनुष्य का पुत्र भी कहा जा सकता था। प्रभु यीशु मसीह के बाद उसके दूसरे नंबर पर होने का एकमात्र कारण यह था कि वह प्रभु यीशु का प्रेरित था; वह प्रभु यीशु मसीह की शक्ति का प्रयोग करता था, और प्रभु यीशु मसीह उसे कलीसियों के दौरे पर और कलीसियाई कामों के लिए भेजता था। एक प्रेरित के रूप में पौलुस इसे ही अपनी स्थिति और पहचान मानता था—उसने इसकी इसी तरह व्याख्या की। इसके अलावा, वाक्यांश “पौलुस की ओर से जो यीशु मसीह का प्रेरित होने के लिये बुलाया गया” में महत्वपूर्ण शब्द है “बुलाया गया।” इस शब्द से हम पौलुस की मानसिकता को देख सकते हैं। उसने छह शब्दों “परमेश्वर की इच्छा से ... बुलाया गया” का उपयोग क्यों किया? उसने यह नहीं सोचा कि उसे प्रभु यीशु मसीह ने अपना प्रेरित बनने के लिए बुलाया था; उसने सोचा, “प्रभु यीशु मसीह के पास मुझे कोई काम करने का आदेश देने की सामर्थ्य नहीं है। मैं वह नहीं कर रहा जो उसने आदेश दिया था; मैं उसके लिए कुछ नहीं कर रहा हूँ, बल्कि मैं स्वर्ग में स्थित परमेश्वर की इच्छा के कारण ये चीजें कर रहा हूँ। मैं प्रभु यीशु मसीह के ही समान हूँ।” इससे एक और बात का संकेत मिलता है—पौलुस ने सोचा कि प्रभु यीशु मसीह उसी की तरह मनुष्य का पुत्र है। ये छह शब्द “परमेश्वर की इच्छा से ... बुलाया गया” बताते हैं कि पौलुस अपने हृदय की गहराई में कैसे प्रभु यीशु मसीह की पहचान को नकारता था और उस पर संदेह करता था। पौलुस ने कहा कि वह परमेश्वर की इच्छा से प्रभु यीशु मसीह का प्रेरित था, जो परमेश्वर ने उससे कहा था, उसे परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत और स्थापित किया गया था और वह प्रभु यीशु मसीह का प्रेरित बना क्योंकि परमेश्वर ने उसे बुलाया और ऐसी इच्छा की। पौलुस के मन में उसके और प्रभु यीशु मसीह के बीच यही रिश्ता था। परंतु, यह भी इसका सबसे खराब अंश नहीं है। सबसे खराब अंश क्या है? यह कि पौलुस ने सोचा कि वह परमेश्वर की इच्छा से प्रभु यीशु मसीह का प्रेरित है, न कि प्रभु यीशु मसीह की इच्छा से, कि उसे जिसने बुलाया था वह प्रभु यीशु नहीं था, बल्कि स्वर्ग में स्थित परमेश्वर ने उससे ऐसा करवाया था। उसने सोचा कि किसी के पास उसे प्रभु यीशु मसीह का प्रेरित बनाने की सामर्थ्य या योग्यता नहीं थी; कि केवल स्वर्ग में स्थित परमेश्वर के पास ही वह सामर्थ्य थी; और उसे सीधे स्वर्ग में बैठे परमेश्वर द्वारा निर्देशित किया जा रहा था। तो, यह क्या दर्शाता है? पौलुस हृदय की गहराई से मानता था कि स्वर्ग में परमेश्वर नंबर एक और वह खुद नंबर दो था। तो उसने प्रभु यीशु को किस स्थान पर रखा? (अपने समकक्ष स्थिति में।) यही समस्या है। अपनी जबान से उसने घोषणा की कि प्रभु यीशु ही मसीह था, लेकिन उसने यह नहीं पहचाना कि मसीह का सार परमेश्वर का सार था; वह मसीह और परमेश्वर के बीच के संबंध को नहीं समझता था। यह समझ की कमी ही थी जिससे इतनी गंभीर समस्या पैदा हुई। यह किस तरीके से गंभीर समस्या थी? (उसने यह नहीं स्वीकारा कि प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर था। उसने प्रभु यीशु को नकार दिया था।) हाँ, यह वास्तव में बहुत गंभीर बात है। उसने इस बात से इनकार किया कि प्रभु यीशु मसीह देहधारी परमेश्वर था, कि जब प्रभु यीशु मसीह स्वर्ग से पृथ्वी पर आया तो वह परमेश्वर की देह था, और यह कि प्रभु यीशु परमेश्वर का देहधारी स्वरूप था। क्या यह ऐसा संकेत नहीं करता कि पौलुस ने पृथ्वी पर परमेश्वर के अस्तित्व से इनकार किया? (हाँ, ऐसा ही है।) यदि उसने पृथ्वी पर परमेश्वर के अस्तित्व से इनकार किया, तो क्या वह प्रभु यीशु के वचनों को स्वीकार कर सकता था? (नहीं, वह नहीं कर सकता था।) यदि उसने उसके वचनों को माना ही नहीं तो क्या वह उसे स्वीकार कर सकता था? (नहीं, वह नहीं कर सकता था।) उसने प्रभु यीशु मसीह के वचनों, उसकी शिक्षाओं या पहचान को स्वीकार नहीं किया, तो क्या वह प्रभु यीशु मसीह के कार्यों को स्वीकार कर सकता था? (नहीं, वह नहीं कर सकता था।) उसने प्रभु यीशु मसीह द्वारा किए गए कार्य को या इस तथ्य को स्वीकार नहीं किया कि प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर था, फिर भी यह सबसे बुरा अंश नहीं था। सबसे बुरा अंश क्या था? दो हजार साल पहले, प्रभु यीशु सबसे बड़ा कार्य करने के लिए पृथ्वी पर आया—अनुग्रह के युग में छुटकारा दिलाने के कार्य के लिए, जहाँ उसने देहधारण किया और पापी देह की छवि बन गया और समस्त मानवजाति के लिए पाप बलि के रूप में सूली पर चढ़ा दिया गया। क्या ये कोई बड़ा काम था? (हाँ, यह बड़ा काम था।) यह समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाने का काम था और यह स्वयं परमेश्वर द्वारा किया गया था, फिर भी पौलुस ने हठपूर्वक इसका खंडन किया। उसने इस बात से इनकार किया कि प्रभु यीशु ने छुटकारा दिलाने का जो कार्य किया था वह स्वयं परमेश्वर द्वारा किया गया था, जो इस तथ्य से इनकार करना था कि परमेश्वर ने पहले ही छुटकारा देने का कार्य पूरा कर लिया था। क्या यह गंभीर समस्या है? यह अत्यंत गंभीर है! पौलुस ने न केवल प्रभु यीशु मसीह के सूली पर चढ़ने के तथ्य को समझने की कोशिश नहीं की, बल्कि उसने इसे स्वीकार भी नहीं किया और इसे स्वीकार न करने का मतलब इसे नकारना है। उसने यह स्वीकार नहीं किया कि वह परमेश्वर ही था जिसे सूली पर चढ़ाया गया और उसने समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाया, न ही उसने यह स्वीकार किया कि परमेश्वर ने समस्त मानवजाति के लिए पाप बलि के रूप में कार्य किया। इससे संकेत मिलता है कि उसने यह स्वीकार नहीं किया कि परमेश्वर द्वारा अपना कार्य करने के बाद समस्त मानवजाति को छुटकारा मिल गया था, या कि उनके पाप क्षमा कर दिए गए थे। साथ ही, उसने सोचा कि उसके पाप क्षमा नहीं किए गए हैं। उसने इस तथ्य को स्वीकार ही नहीं किया कि प्रभु यीशु ने मानवजाति को छुटकारा दिलाया है। उसके दृष्टिकोण से, वह सब कुछ मिटा दिया गया था। यह सबसे गंभीर मुद्दा है। अभी-अभी मैंने उल्लेख किया कि पौलुस पिछले दो हजार वर्षों में सबसे बड़ा मसीह-विरोधी था; इस तथ्य का खुलासा पहले ही हो चुका है। यदि ये तथ्य बाइबल में दर्ज नहीं किए गए होते और परमेश्वर ने कहा होता कि पौलुस ने परमेश्वर की अवहेलना की थी और वह मसीह-विरोधी था, तो क्या लोग इस पर विश्वास करते? बिल्कुल नहीं करते। शुक्र है कि बाइबल ने पौलुस के पत्रों का लेखा-जोखा रखा, और उन पत्रों में तथ्यात्मक प्रमाण हैं; अन्यथा, मैं जो कह रहा हूँ उसके पक्ष में कुछ भी नहीं होगा और शायद तुम लोग इसे स्वीकार न करो। अब, जब हम पौलुस के शब्दों को निकाल कर उन्हें पढ़ते हैं, तो क्या पता चलता है कि प्रभु यीशु द्वारा कही गई सभी बातों को पौलुस कैसे देखता था? वह सोचता था कि प्रभु यीशु की कही बातें उसके अपने एक भी धार्मिक सिद्धांत के बराबर नहीं हैं। इसलिए, प्रभु यीशु के इस दुनिया से चले जाने के बाद यूँ तो पौलुस ने धर्मप्रचार किया, कार्य किया, उपदेश दिए और कलीसियाओं की चरवाही की, लेकिन उसने कभी भी प्रभु यीशु के वचनों का उपदेश नहीं दिया, उनका अभ्यास या अनुभव करने की तो बात ही दूर है। इसके बजाय, उसने पुराने नियम के बारे में अपनी समझ का प्रचार किया, जो कालातीत हो चुकी थी और खोखले शब्द ही थी। पिछले दो हजार वर्षों से जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं वे बाइबल के अनुरूप ऐसा करते हैं, और वे जो कुछ भी स्वीकार करते हैं वे पौलुस के खोखले सिद्धांत हैं। इसके परिणामस्वरूप, उसने लोगों को दो हजार वर्षों से अंधा बना रखा है। अगर तुम आज धार्मिक लोगों के किसी समूह से कहो कि पौलुस गलत था, तो वे विरोध करेंगे और इस बात को स्वीकार नहीं करेंगे क्योंकि वे सभी पौलुस को ऊंची निगाह से देखते हैं। पौलुस उनका आदर्श और उनका संस्थापक पिता है और वे पौलुस के संतानोचित पुत्र और वंशज हैं। उन्हें किस हद तक गुमराह किया गया है? वे पहले से ही परमेश्वर के विरोध में पौलुस वाले पक्ष में खड़े हैं; उनके मत पौलुस जैसे हैं, उनका प्रकृति सार एक जैसा है और अनुसरण करने का तरीका भी वही है। उन्हें पौलुस द्वारा पूरी तरह से समाहित कर लिया गया है। यह पौलुस का चौथा बड़ा पाप है। पौलुस ने प्रभु यीशु मसीह की पहचान को अस्वीकार किया, और उसने व्यवस्था के युग के बाद अनुग्रह के युग में परमेश्वर द्वारा किए गए कार्यों से इनकार किया। ये सबसे गंभीर बात है। एक और गंभीर बात यह है कि उसने स्वयं को प्रभु यीशु मसीह के समान श्रेणी में रखा। पौलुस जिस युग में रहा, उसमें वह प्रभु यीशु मसीह से मिला था, परन्तु उसने उसे परमेश्वर के रूप में नहीं देखा; इसके बजाय, उसने प्रभु यीशु मसीह के साथ एक सामान्य व्यक्ति जैसा व्यवहार किया, जैसे कि वह मानवजाति का एक सामान्य सदस्य भर हो; एक ऐसा व्यक्ति जिसका प्रकृति सार भ्रष्ट मनुष्यों जैसा था। किसी भी तरह से पौलुस ने प्रभु यीशु को मसीह नहीं माना, उसे परमेश्वर मानने की तो बात ही छोड़ो। यह बहुत ही गंभीर मामला है। तो पौलुस ऐसा क्यों करता था? (उसने यह नहीं पहचाना कि देहधारी परमेश्वर में परमेश्वर का सार है, इसलिए उसने प्रभु यीशु मसीह को परमेश्वर नहीं माना।) (उसने प्रभु यीशु के वचनों को सत्य के रूप में नहीं देखा, न ही यह देखा कि प्रभु यीशु मसीह सत्य का प्रतिरूप था।) (ऊपरी तौर पर, पौलुस प्रभु यीशु पर विश्वास करने का दिखावा करता था, लेकिन वास्तव में उसका जिस पर विश्वास था वह स्वर्ग में अवस्थित अज्ञात परमेश्वर था।) (उसने सत्य की तलाश नहीं की, इसलिए वह यह जान पाने में असमर्थ रहा कि मसीह ही सत्य और जीवन था।) बताते रहो। (पौलुस ने कहा कि उसके लिए जीवित रहना मसीह होना था। वह परमेश्वर बनना चाहता था और प्रभु यीशु का स्थान लेना चाहता था।) तुम लोगों ने जो कुछ भी कहा वह तथ्यों के अनुरूप है। पौलुस ने जिन-जिन तरीकों से खुद को प्रकट किया और उसका हर एक पाप पहले उल्लिखित पापों से भी अधिक गंभीर था।

आओ, पौलुस के कहे इस वाक्यांश का विश्लेषण करें : “मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है।” ये प्रभावोत्पादक शब्द हैं। उसके शब्दों का चयन देखो : “धर्म का मुकुट।” आम तौर पर, “मुकुट” शब्द का प्रयोग करना ही काफी साहस का काम है, लेकिन मुकुट को परिभाषित करने के लिए एक गुणात्मक अभिव्यक्ति के रूप में “धार्मिकता” का प्रयोग करने का साहस कौन करेगा? केवल पौलुस ही इस शब्द का उपयोग करने का साहस कर सकता था। उसने इसका प्रयोग क्यों किया? इस शब्द का एक मूल है, और इसे सावधानी से चुना गया है; उसके शब्दों के गहरे संकेतार्थ हैं! कैसे संकेतार्थ? (वह इस शब्द के प्रयोग से परमेश्वर पर दबाव डालने की कोशिश कर रहा था।) परमेश्वर पर दबाव डालने की चाह इसका एक पहलू है। निश्चित ही उसका इरादा लेन-देन करने का था और इसमें भी एक बात परमेश्वर के साथ शर्तें तय करने की कोशिश से संबंधित है। हमेशा इस धार्मिकता के मुकुट के बारे में उपदेश देने के पीछे क्या इसके अलावा कोई और उद्देश्य था? (वह लोगों को गुमराह करना चाहता था और उन्हें यह सोचने को बाध्य करना चाहता था कि अगर उसे मुकुट नहीं मिला तो परमेश्वर धार्मिक नहीं है।) इस बारे में उसके प्रचार में उकसाने और गुमराह करने का एक तत्व है और यह पौलुस की इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं से जुड़ा है। धार्मिकता का मुकुट अंततः पा लेने की अपनी इच्छा को साकार करने और पूरा करने के लिए उसने हर जगह इसके बारे में प्रचार करने की रणनीति का इस्तेमाल किया। अंशतः, इन शब्दों का प्रचार करने का उसका लक्ष्य लोगों को भड़काना और गुमराह करना था; यह सुनने वालों में ऐसा विशेष विचार पैदा करने के लिए था कि “मेरे जैसा व्यक्ति जो खुद को इतना खपाता है, जो चारों ओर इतनी यात्राएँ करता है और मेरी तरह अनुसरण करने का प्रयास करता है, वह धर्म का मुकुट पाने में सफल होगा।” इसे सुनने के बाद लोगों को स्वाभाविक रूप से लगता था कि परमेश्वर तभी धार्मिक है जब पौलुस जैसे व्यक्ति को मुकुट मिले। उन्हें लगता था कि उन्हें भी पौलुस की तरह ही अनुसरण करना चाहिए, चतुर्दिक यात्राएँ करनी चाहिए और खुद को खपाना चाहिए, कि वे प्रभु यीशु की बातें नहीं सुन सकते और पौलुस ही मानक है, वही प्रभु है, और वही वह दिशा और लक्ष्य है जिसकी ओर लोगों को चलना चाहिए। वे यह भी सोचते थे कि अगर लोग पौलुस की तरह काम करेंगे, तो वे उसके जैसा ही मुकुट, परिणाम और मंजिल पाएँगे। एक लिहाज से पौलुस लोगों को भड़का रहा था और उन्हें गुमराह कर रहा था। दूसरे लिहाज से उसका एक अत्यंत दुर्भावनापूर्ण लक्ष्य था। अपने हृदय की गहराई में, वह सोचता था कि “ऐसा होना तो नहीं चाहिए, किंतु यदि मुझे मुकुट नहीं मिलता है और पता चलता है कि यह सिर्फ मेरी अपनी कल्पना और मेरी वहमपूर्ण सोच थी, तो इसका मतलब यह होगा कि मुझ समेत मसीह में विश्वास करने वाले सभी लोग अपनी आस्था के मामले में गुमराह हुए थे। इसका मतलब होगा कि पृथ्वी पर कोई परमेश्वर मौजूद नहीं है, और, परमेश्वर, मैं स्वर्ग में भी तुम्हारे अस्तित्व को नकार दूँगा और तुम इस संबंध में कुछ भी नहीं कर सकोगे।” वह जो जताना चाह रहा था वह था : “अगर मुझे यह मुकुट नहीं मिला, तो न केवल भाई-बहन तुमको नकार देंगे, बल्कि मैं तुमको उन सभी लोगों को जीतने से रोक दूँगा जिन्हें मैंने उकसाया है और जो इन शब्दों को जानते हैं। मैं उन्हें भी तुम्हें हासिल करने से रोक दूँगा और इसी के साथ मैं स्वर्ग में परमेश्वर के रूप में तुम्हारे अस्तित्व को भी नकार दूँगा। तुम धार्मिक नहीं हो। अगर मैं, पौलुस, मुकुट नहीं पा सकता, तो वह किसी को भी नहीं मिलना चाहिए!” यह पौलुस का दुर्भावनापूर्ण हिस्सा था। क्या यह किसी मसीह-विरोधी का सा व्यवहार नहीं है? यह एक मसीह-विरोधी, एक बुरे दानव का व्यवहार है : लोगों को भड़काना, गुमराह करना और उन्हें अपने आकर्षण में फँसाने के साथ ही खुले तौर पर परमेश्वर के खिलाफ शोर मचाना और उसका विरोध करना। हृदय की गहराई में पौलुस सोचता था, “यदि मुझे मुकुट नहीं मिलता, तो परमेश्वर धार्मिक नहीं है। यदि मुझे मुकुट मिलता है, तभी वह धर्म का मुकुट है, और केवल तभी परमेश्वर की धार्मिकता वास्तव में धार्मिक है।” यह उसके “धार्मिकता का मुकुट” का प्रारंभिक बिंदु है। इस तरह वह कर क्या रहा था? वह खुले तौर पर उन लोगों को भड़का रहा था और गुमराह कर रहा था जो परमेश्वर का अनुसरण करते थे। साथ ही साथ, वह खुले आम परमेश्वर के विरुद्ध अवमानना करने और उसका विरोध करने के लिए इन तरीकों का उपयोग कर रहा था। दूसरे शब्दों में कहें तो उसका व्यवहार एक विद्रोह का व्यवहार था। इसकी प्रकृति क्या थी? सतही तौर पर, पौलुस द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्द सौम्य और उचित प्रतीत होते हैं और उनमें कुछ भी गलत नहीं लगता—धर्म का मुकुट पाने और धन्य होने के लिए कौन परमेश्वर में विश्वास नहीं करेगा? यहाँ तक कि बिना काबिलियत वाले लोग भी कम से कम स्वर्ग जाने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं। वे स्वर्ग की सड़कों पर झाड़ू लगाने या वहाँ दरबानी करने का मौका पाने पर भी खुश होंगे। परमेश्वर पर विश्वास में इस इरादे और उद्देश्य का होना उचित और समझ में आने लायक माना जा सकता है। परंतु, यह पौलुस का एकमात्र उद्देश्य नहीं था। जब उसके धर्म के मुकुट के बारे में प्रचार करने की बात आई तो उसने बहुत प्रयास किया, बहुत सारी ऊर्जा खर्च की, और बहुत हो-हल्ला मचाया। पौलुस ने जो बातें कहीं उनसे उसकी दुर्भावनापूर्ण प्रकृति के साथ-साथ उसके गहरे भीतर छिपी कालिमायुक्त बातें भी उजागर हो गईं। उस समय, पौलुस ने बड़ा नाम कमाया और ऐसे बहुत-से लोग थे जो उसे अपना आदर्श मानते थे। वह जगह-जगह घूमकर इन सिद्धांतों और ऊँचे लगने वाले विचारों, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के साथ-साथ अपने अध्ययन के दौरान सीखी गई चीजों और अपने मस्तिष्क में पैदा हुए निष्कर्षों का प्रचार करता था। जब पौलुस हर जगह इन बातों का प्रचार करता था, तो उस समय के लोगों पर इसका कितना भारी प्रभाव पड़ा होगा, और इससे उन्हें कितना गंभीर नुकसान पहुँचा होगा और उनके दिलों की गहराई में कितना जहर भर गया होगा? इसके अलावा, उसके पत्रों से ये बातें सीखने वाली बाद की पीढ़ियों के लोगों पर इसका कितना बड़ा प्रभाव पड़ा होगा? जिन लोगों ने उसके शब्दों को पढ़ा है, वे कितने भी लंबे समय तक कोशिश कर लें, इन चीजों से छुटकारा नहीं पा सकते—उनमें बहुत गहराई तक विष भर दिया गया है! कितनी गहराई तक? एक घटना सामने आई है, जिसे “पौलुस प्रभाव” कहा जाता है। पौलुस प्रभाव क्या है? यह धर्म में एक ऐसी घटना है जिसमें लोग पौलुस के विचारों, नजरिये, तर्कों और उसके द्वारा प्रकट किए गए भ्रष्ट स्वभावों के प्रभाव में आते हैं। यह विशेष रूप से उन लोगों को प्रभावित करता है जिनके परिवार कई पीढ़ियों से परमेश्वर में विश्वास करते आए हैं—वे परिवार जो कई दशकों से मसीह का अनुसरण करते रहे हैं। वे कहते हैं, “हमारा परिवार पीढ़ियों से प्रभु में विश्वास रखता आया है और सांसारिक प्रवृत्तियों का पालन नहीं करता। हमने खुद को लौकिक दुनिया से दूर कर लिया है और परमेश्वर की खातिर खुद को खपाने के लिए अपने परिवार और करियर छोड़ दिए हैं। हम जो भी करते हैं वह सब बिल्कुल पौलुस जैसे ही करते हैं। यदि हमें मुकुट नहीं मिलता है या स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता है, तो परमेश्वर के आने पर हम उससे शिकायत और बहस करेंगे।” क्या लोग यह तर्क नहीं देते? (हाँ, वे देते हैं।) और यह प्रवृत्ति काफी महत्वपूर्ण है। यह प्रवृत्ति कहाँ से आती है? (पौलुस ने जो उपदेश दिए उससे।) यह पौलुस द्वारा बनाई गई गाँठ का घातक परिणाम है। यदि पौलुस ने लोगों को इस तरह नहीं भड़काया होता और हमेशा यह नहीं कहा होता कि, “मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है” और “मेरे लिये जीवित रहना मसीह है,” तो इतिहास के उस युग की पृष्ठभूमि के बिना आज के लोगों को उन चीजों का कोई ज्ञान न होता। यदि उनका सोचने का तरीका ऐसा ही होता, तो भी उनमें पौलुस जैसी धृष्टता नहीं होती। यह सब पौलुस के प्रोत्साहन और उकसावे के कारण हुआ था। यदि कोई ऐसा दिन आता है जब उन्हें आशीष नहीं मिलता, तो इन लोगों में इतनी हिम्मत होगी कि वे प्रभु यीशु को खुलेआम चुनौती दें, और वे तो तीसरे स्वर्ग तक जाना चाहेंगे ताकि वे प्रभु के साथ इस मुद्दे पर विवाद कर सकें। क्या यह धार्मिक जगत का प्रभु यीशु के विरुद्ध विद्रोह करना नहीं है? यह स्पष्ट है कि धार्मिक जगत पर पौलुस का गंभीर प्रभाव पड़ा है! अब जब मैंने इस बिंदु तक बात कर ली है, तो तुम निष्कर्ष निकाल सकते हो कि पौलुस का पाँचवाँ पाप क्या था, है न? जब पौलुस ने जिस “धर्म का मुकुट” की बात की थी, उसकी उत्पत्ति को सारांशित करने की बात आती है, तो ध्यान “धार्मिकता” शब्द पर केंद्रित होता है। उसने “धार्मिकता” का उल्लेख क्यों किया? ऐसा इसलिए था क्योंकि वह पृथ्वी पर परमेश्वर के चुने हुए लोगों को भड़काना और गुमराह करना चाहता था, ताकि वे वैसा ही सोचें जैसे वह सोचता था। स्वर्ग में, वह इस शब्द के माध्यम से परमेश्वर पर दबाव डालना और उसके विरुद्ध अवमानना करना चाहता था। यही पौलुस का लक्ष्य था। भले ही उसने कभी इन शब्दों का प्रयोग नहीं किया, परंतु “धार्मिकता” शब्द के इस्तेमाल ने पहले ही उसके लक्ष्य और परमेश्वर के खिलाफ अवमानना करने की प्रवृत्ति को पूरी तरह उजागर कर दिया था। वह बात पहले से ही सबके सामने थी; ये सभी तथ्य हैं। इन तथ्यों के आधार पर, क्या पौलुस के प्रकृति सार को केवल अभिमानी, आत्मतुष्ट, धोखेबाज और सत्य से प्रेम न करने वाले के रूप में समेटा जा सकता है? (नहीं।) ये शब्द उसे पूरी तरह से नहीं व्यक्त कर सकते। मेरे द्वारा इन तथ्यों को सामने लाने और उनका गहन-विश्लेषण, विश्लेषण और निरूपण करने के बाद तुम्हें पौलुस के प्रकृति सार को अधिक स्पष्ट और अच्छी तरह से देखने में सक्षम होना चाहिए। यह वह प्रभाव है जो तथ्यों के आधार पर किसी के सार का विश्लेषण करके पाया जा सकता है। जब पौलुस ने परमेश्वर के विरुद्ध शोर-शराबा किया तो वह अकेले में घटित हुआ कोई मामूली भावनात्मक क्षण, थोड़ा-सा विद्रोही स्वभाव या समर्पण करने में असमर्थता नहीं थी। यह भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करने वाली कोई साधारण समस्या नहीं थी, बल्कि यह पत्रों के माध्यम से लोगों को उकसाने और गुमराह करने के लिए सभी प्रकार के तरीकों का खुले तौर पर उपयोग करने तक बढ़ चुका सार्वजनिक प्रयास था ताकि सभी लोग गुस्से में एक साथ उठकर परमेश्वर का विरोध और उसकी अवमानना करें। पौलुस ने न केवल परमेश्वर के विरुद्ध अवमानना की बल्कि उसने अन्य सभी को भी परमेश्वर के विरुद्ध अवमानना करने के लिए उकसाया—वह केवल अहंकारी नहीं था बल्कि एक बुरा दानव था! यह पाप पहले वाले पापों से भी अधिक गंभीर है। यह अच्छी बात है या बुरी कि हम पहले से ज्यादा गंभीर होते जा रहे पापों के बारे में बात कर रहे हैं? (यह अच्छी बात है।) यह अच्छी बात कैसे है? (क्योंकि हम पौलुस के बारे में अधिक भेद पहचान रहे हैं।) जब तुम्हारे पास अधिक भेद पहचानने की क्षमता होगी, तो तुम पौलुस की विभिन्न अभिव्यक्तियों, भ्रष्टाचार के प्रकाशनों और उसके असली चेहरे को पूरी तरह से उजागर करने और स्पष्ट रूप से देख पाने में सक्षम होगे। क्या ऐसा करने से तुम हम सब के लक्ष्य को पा लोगे? (नहीं, ऐसा नहीं होगा।) तुमको पौलुस की उन सभी अभिव्यक्तियों को लेना चाहिए जिन्हें हमने संक्षेपित किया है। इसी के साथ उन अभिव्यक्तियों के मुख्य कथ्य, विषय-वस्तु और सार को लेना चाहिए और उन्हें अपने से जोड़ना चाहिए। जब तुम स्पष्ट रूप से देख लोगे कि तुम जिस पथ पर चल रहे हो और तुम्हारे सार में पौलुस की तुलना में कितना अंतर है तो तुम परिणामों को पूरी तरह से पा लोगे और पौलुस का गहन-विश्लेषण करने के हमारे लक्ष्य को भी पा लोगे। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कहते हैं, “मुझमें पौलुस की तरह धार्मिकता का मुकुट पाने के लिए सतत प्रयासरत होने जैसी कोई अभिव्यक्ति नहीं है।” हो सकता है कि तुम्हारी अभिव्यक्तियाँ और तुम्हारा सार पौलुस की तरह गंभीर न हो, लेकिन तुम्हारे और उसके सार के बीच कुछ न कुछ एक समान है। उसकी अभिव्यक्तियाँ ऐसी थीं, और तुम्हारी दशाएँ इस तरह की हैं। अगर कहें कि पौलुस की अभिव्यक्तियाँ एक पैमाने पर 10 या 12 थीं, तो तुम्हारी किस स्तर पर हैं? (मैं सातवें या आठवें स्तर पर हूँ।) पौलुस इन चीजों को हर समय दिखाता था, और हर समय इन चीजों से भरा रहता था। यद्यपि संभव है कि तुम इन चीजों को हर समय प्रकट नहीं करते, फिर भी तुम इन्हें अक्सर प्रकट करते हो। तुम शायद अपना आधा जीवन इन्हीं चीजों को करने में और इन्हीं दशाओं में बिताते हो। खास तौर पर तब जब परमेश्वर तुम्हारा परीक्षण करता है, जब परमेश्वर के कार्य तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खाते, जब वह तुम्हारे साथ काट-छाँट कर रहा होता है, और जब वह तुम्हारे लिए जिन परिवेशों का निर्माण करता है वे तुम्हारी अपेक्षाओं से मेल नहीं खाते हैं तो तुम्हारे भीतर इस प्रकार की दशाएँ जन्म ले सकती हैं; तुम परमेश्वर के विरुद्ध अवमानना कर सकते हो और उसका विरोध कर सकते हो। ऐसे मौकों पर पौलुस द्वारा लोगों को उकसाने और गुमराह करने के तरीकों के बारे में हमारा विश्लेषण तुम्हारे काम आ सकता है। क्यों? क्योंकि अब, तुम्हारा मन जानता है कि पौलुस की अभिव्यक्तियाँ कितनी गंभीर प्रकृति की थीं; वे भ्रष्ट स्वभाव के साधारण खुलासे नहीं थे, बल्कि दानवी प्रकृति सार था जो परमेश्वर का विरोध करता है। जब तुम्हारे भीतर ऐसी दशाएँ उत्पन्न होंगी, तो तुमको पता चल जाएगा कि यह समस्या कितनी गंभीर है। तब तुम्हें लौट आना चाहिए, पश्चात्ताप करना चाहिए और इस गलत दशा को त्याग देना चाहिए। तुम्हें इससे दूर चले जाना चाहिए, सत्य की खोज करनी चाहिए और परमेश्वर के प्रति समर्पण का मार्ग खोजना चाहिए। यही वह सच्चा पथ है जिस पर मनुष्यों को चलना चाहिए और यही वह विधान है जिसका सृजित प्राणियों को पालन करना चाहिए। यह संगति लोगों के लिए मददगार है।

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