परमेश्वर की संप्रभुता को कैसे जानें (भाग दो)
प्रभु यीशु को सलीब पर चढ़ाए हुए दो हजार वर्ष बीत चुके हैं, और अब जो लोग अंतिम दिनों में परमेश्वर के कार्य को स्वीकारते हैं, वे उसकी आवाज सुनते हैं, और हर दिन सत्य के बारे में उपदेश सुनते और संगति करते हैं। वे परमेश्वर के कार्य के तीनों चरणों को समझते हैं, और उसकी प्रबंधन योजना के रहस्य जानते हैं। क्या धर्म के भीतर प्रभु पर विश्वास करने वाले लोग समझते हैं? अब भी वे नहीं समझते, और अभी भी अपनी धारणाओं से चिपके हैं। जब कोई कहता है, “प्रभु यीशु एक निर्धन सुतार का पुत्र था। देखो तुम लोग कैसे प्रभु पर विश्वास करते हो,” तो उसका खंडन करने की शक्ति उनमें नहीं होती और वे परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ होते हैं। लोग कितने तिरस्करणीय होते हैं! परमेश्वर ने मानवजाति के लिए बहुत-से सत्य व्यक्त किए हैं और इतनी बड़ी चीजें की हैं, लेकिन यदि वह व्यक्तिगत रूप से लोगों को इन चीजों का महत्व, मूल्य और सत्य नहीं बताता, तो एक भी व्यक्ति परमेश्वर के पक्ष में बोलने और उसकी गवाही देने के लिए खड़े होने में सक्षम नहीं होता। परमेश्वर के पक्ष में बोलने से क्या अभिप्राय है? यह परमेश्वर के कर्मों और संप्रभुता की गवाही देना है, उस कीमत की गवाही देना है जो उसने इस मानवजाति के छुटकारे के लिए चुकाई है, और उसके विचारों और जो कुछ भी उसने किया है उसके अर्थ की गवाही देना है। इससे तुम लोग क्या समझ सकते हो? (मानवजाति परमेश्वर के कार्य की कल्पना नहीं कर सकती।) मानवजाति परमेश्वर के कार्य की कल्पना नहीं कर सकती, न ही उसकी थाह पा सकती है। इसलिए मनुष्य के पास परमेश्वर का कार्य, मानवजाति के लिए उसका मार्गदर्शन और उसकी इच्छा को देखने या व्यवहार करने के लिए सही परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण होना चाहिए। मनुष्य का रुख सही होना चाहिए। यह महत्वपूर्ण है। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम कौन हो और परमेश्वर कौन है, तुम्हारे पास क्या-क्या चीजें होनी चाहिए ताकि तुम परमेश्वर के वचनों और कार्य को समझने में सक्षम हो सको, तुम्हें पता होना चाहिए कि वह क्या है जिसे तुम मूलतः स्पष्ट रूप से समझने या जिसकी थाह पाने में असमर्थ हो, और तुम्हारा रवैया कैसा होना चाहिए। यही विवेक है जो तुम्हारे पास होना चाहिए। इस तरह परमेश्वर से तुम्हारा रिश्ता काफी सामान्य और सौहार्दपूर्ण हो जाएगा। यदि तुम परमेश्वर के बारे में अध्ययन करने और अटकलें लगाने में या उसके द्वारा किए जाने वाले हर काम की जाँच करने में हमेशा प्रतीक्षा करके पता लगाने, अटकलें लगाने, संदेह करने का या प्रतिरोधी रवैया अपनाते हो, तो परेशानी होगी। यह अकादमिक अनुसरण में, शोध में लिप्त होना है, यह एक छद्म-विश्वासी होना है। तुम्हें परमेश्वर की संप्रभुता के साथ समर्पण, खोज और भय का दृष्टिकोण और रवैया अपनाना चाहिए; केवल इसी से सच्चा ज्ञान और परमेश्वर की समझ पैदा होगी। यदि तुम परमेश्वर को समझते हो तो तुम उसका विरोध नहीं करोगे, या कम से कम तुम उसे गलत तो नहीं समझोगे। तुम समर्पण करने में सक्षम होगे और कहोगे, “यद्यपि मैं परमेश्वर के ऐसा करने का मतलब नहीं जानता, लेकिन मैं समझता हूँ कि वह जो कुछ भी करता है वह सही होता है।” यह समझ क्या है? यह समझ है कि तुम्हारा हृदय पूरी तरह से आश्वस्त है कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है उसका मतलब है, और लोगों को समर्पण करना चाहिए। प्रभु यीशु मसीह ने स्वयं को शैतान के हाथों में सौंप दिया था और शैतान ने उसे सलीब पर चढ़ा दिया—लोगों की नजर में यह अच्छी बात नहीं थी, लेकिन उसने परमेश्वर की इच्छा पूरी की और मानवजाति को छुटकारा दिलाने का कार्य पूरा किया। यह एक महान चीज है, जो संपूर्ण मानवजाति के लिए अति महत्वपूर्ण और मूल्यवान है, लेकिन क्या मानवजाति ने इसे स्पष्ट रूप से देखा? (नहीं देखा।) मानवजाति ने इसे स्पष्ट रूप से नहीं देखा। मानवजाति ने इसमें परमेश्वर का इरादा नहीं देखा, न ही परमेश्वर द्वारा इसे करने का अर्थ और मूल्य समझा; यानी लोगों को इसमें मानवजाति के लिए असीम लाभ नहीं दिखाई दिया। उन्होंने केवल यह देखा कि सलीब पर चढ़ाए जाने के तीन दिन बाद प्रभु यीशु पुनर्जीवित हुआ, लोगों के बीच आया और उनसे मिला, बातें कीं, यादें ताजा कीं और लौट गया; परंतु परमेश्वर की इच्छा पूरी हुई। क्या यह अति महत्वपूर्ण नहीं है? (यह है।) क्या लोगों ने इसकी थाह ली? नहीं ली। इस मामले से लोगों को अपना सही मूल्यांकन करना चाहिए, और परमेश्वर के प्रति सही रवैया रखना चाहिए। परमेश्वर जो कुछ भी करता है, चाहे लोग उसे समझें या न समझें, उन्हें अपना मुँह अवश्य बंद रखना चाहिए। यही सही है। हर चीज का अध्ययन करने के बारे में मत सोचो, यह ठीक नहीं है। क्यों नहीं है? ऐसा कोई नियम नहीं है जो तुम्हें ऐसा करने की अनुमति देने से मना करे, लेकिन ऐसा करते-करते तुम दीवार से टकरा जाओगे और खतरे में पड़ जाओगे। तुम इसे नहीं समझ सकते, और इसे समझने में अब भी सक्षम नहीं हो, लेकिन तुम हमेशा अध्ययन करना चाहते हो, हमेशा परमेश्वर के विरोध में खड़े रहते हो। यदि तुम अध्ययन करके इसे हल नहीं कर सकते, साथ ही सत्य की खोज भी नहीं करते, तो कौन-सी समस्याएँ हैं जो आसानी से आ सकती हैं? परमेश्वर को गलत समझना तुम्हारे लिए आसान होगा। शुरुआत में तुम गलत समझोगे और यदि तुम चीजों को ठीक से नहीं समझ सकते और यह गलतफहमी बनी रहती है, तो तुम नकारात्मक और कमजोर हो जाओगे, और यह तुम्हारे कर्तव्य पालन और जीवन प्रवेश को प्रभावित करेगा—ये सभी चीजें आपस में संबंधित हैं। कई चीजें एक-दो वर्षों में ठीक से समझ में नहीं आ पातीं और सत्य बहुत गहरा होता है। भले ही परमेश्वर ने तुम्हें अभी-अभी प्रबुद्ध किया हो, क्या तुम अपने छोटे आध्यात्मिक कद से ये सब समझ सकते हो? तुम थोड़ा बहुत समझ भी लोगे, तो भी क्या तुम सत्य को पूरी तरह समझ पाओगे? तुम कहोगे, “मैं गुरुत्वाकर्षण जानता हूँ। ऐसा क्यों है कि चीजें पृथ्वी पर ऊपर जाने की बजाय नीचे गिरती हैं, लेकिन यदि तुम वायुमंडल छोड़ कर अंतरिक्ष में चले गए तो तुम तैरने लगोगे? क्योंकि तुम पृथ्वी के गुरुत्वीय खिंचाव से बाहर निकल चुके होगे। मैं यह समझता हूँ, तो क्या मैंने पहले ही परमेश्वर के कर्मों की थाह नहीं पा ली है?” तुम नहीं जानते कि परमेश्वर गुरुत्वाकर्षण पर ठीक कैसे संप्रभु है, और तुमने इसकी अभिव्यक्ति मात्र को ही समझा है। इसका मतलब यह नहीं है कि तुमने इसकी थाह ले ली है कि परमेश्वर इस पर कैसे संप्रभु है, और यदि तुम जान भी पाते हो, तो क्या तुम इस पर संप्रभु हो पाने में सक्षम हो पाओगे? यदि लोग वायुमंडल से बाहर चले गए तो उन्हें परेशानी होगी, वे गुरुत्वाकर्षण के बिना हर जगह बस तैरते और उड़ते रहेंगे। इससे क्या समझा जा सकता है? (कि ऐसी बहुत-सी चीजें हैं जिनकी लोग थाह नहीं पा सकते।) लोग थाह नहीं पा सकते, फिर भी वे हमेशा परमेश्वर का अध्ययन करने और उसे देखने के लिए उसके विरोध में खड़े रहते हैं, उनके मन में संदेह होता है और वे कहते हैं, “यदि मैं इस मामले की थाह नहीं पा सकता, तो फिर तुम परमेश्वर नहीं हो।” इस राय के बारे में क्या कहना है? यह राय और रुख गलत हैं, वे परमेश्वर के खिलाफ खड़े हैं, और हमेशा अध्ययन करते रहना भी गलत है। तुम्हें परमेश्वर को समझना चाहिए और कहना चाहिए, “मैं इसे नहीं समझ सकता, यह बहुत गहरा है और यदि परमेश्वर मुझे प्रबुद्ध भी कर दे तो भी मैं इसे पूरी तरह से नहीं समझ पाऊँगा। इसलिए मैं समर्पित हृदय से कुछ वर्षों तक खोज करूँगा, और यदि परमेश्वर मुझे उत्तर नहीं देता तो मैं अभी के लिए उसे दरकिनार कर दूँगा। मेरे और परमेश्वर के बीच कोई आड़ या गलतफहमी नहीं है। अगर मुझे परमेश्वर के बारे में गलतफहमी नहीं है या मैं उसके बारे में शिकायत नहीं करता तो मैं उसका विरोध नहीं करूँगा। यदि मैं उसका विरोध नहीं करता, तो मैं उसके विरुद्ध विद्रोह नहीं करूँगा, और यदि मैं उसके विरुद्ध विद्रोह नहीं करता, तो मैं उसे नहीं ठुकराऊँगा या उससे दूर नहीं जाऊँगा। मैं सदैव परमेश्वर का अनुयायी हूँ।” “सदैव परमेश्वर का अनुयायी” बने रहने का आधार क्या है? इसका आधार है कि “इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर जो करता है वह मेरी धारणाओं से मेल खाता है या नहीं, मैं हमेशा उसके प्रति समर्पण करूँगा और उसका अनुसरण करूँगा। परमेश्वर अभी भी मेरा परमेश्वर है और मैं एक सृजित प्राणी हूँ, मैं एक इंसान हूँ। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर मेरे साथ कैसा व्यवहार करता है, वह चाहे मुझे नरक में फेंके, चाहे आग की झील में या शैतान के सामने या दानवों के आगे फेंके, मैं बिना किसी शिकायत के सदैव उसके आगे समर्पण करूँगा। परमेश्वर का दर्जा नहीं बदल सकता, न ही एक सृजित प्राणी के रूप में मेरी पहचान बदल सकती है। जब तक यह तथ्य अपरिवर्तित रहता है, मुझे परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए, और वह सदैव मेरा परमेश्वर है।” एक बार जब परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास मजबूती से जड़ पकड़ लेता है, तो तुम उससे मुँह नहीं मोड़ोगे। यह एक सृजित प्राणी के रूप में तुम्हारी पहचान और परमेश्वर के बीच का संबंध है। एक बार जब तुम स्पष्ट रूप से अपने हृदय में परमेश्वर की पहचान और स्थिति देख लेते हो, और एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी पहचान और स्थिति देख लेते हो जिनका तुम्हें पालन करना चाहिए, और एक बार तुम्हारे हृदय में इनकी जड़ें जम गईं, तो तुम परमेश्वर से दूर नहीं जाओगे। फिर जब तुम कमजोर, नकारात्मक या दुखी होते हो, या कुछ ऐसा होता है जो तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खाता और तुम उसकी थाह नहीं ले पाते या उसे समझ नहीं पाते, तो क्या यह परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध को प्रभावित कर सकता है? (यह ऐसा नहीं कर सकता।) जब तक तुम दर्शन के सत्य के बारे में स्पष्ट हो, तुमने नींव रख दी है, और तुमने कई वातावरणों का अनुभव कर लिया है और अनुभव से यह समझ लिया है कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है उसका अर्थ होता है, तब तुम परमेश्वर के कार्य को जान लोगे और धारणाओं का फिर से उभरना मुश्किल होगा। कुछ लोग केवल एक हिस्सा ही समझ पाते हैं। उदाहरण के लिए, न्याय और ताड़ना के संबंध में लोग स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर जो करता है वह सार्थक है, लेकिन जब काट-छाँट की बात आती है तो उनके मन में धारणाएँ होती हैं। चाहे उनके साथ कोई भी काट-छाँट करे, वे इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते और वे यह नहीं मानते कि यह मामला परमेश्वर से आया है। वे सोचते हैं कि यह मनुष्य ने किया है, और शैतान से आया है। क्या यह एक और गलती नहीं है? दूसरी समस्या सामने आती है, और उन्हें सत्य की खोज जारी रखनी होगी। यदि तुम इसे पास नहीं कर सकते, तो क्या तुम पूरी तरह से परमेश्वर के कार्य के लिए समर्पण कर सकते हो? तुम केवल उसी को समर्पण कर सकते हो जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप है, और उस को समर्पण नहीं कर सकते जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं है। इस तरह का व्यक्ति बहुत आसानी से परमेश्वर का विरोध कर सकता है, और वह व्यक्ति होता है जिसका स्वभाव नहीं बदला है।
लोगों के बीच कई सोच, विचार और स्थितियाँ होती हैं जो अक्सर उनकी कुछेक राय, परिप्रेक्ष्यों और रुख को प्रभावित करती हैं। यदि तुम सत्य की खोज के माध्यम से इन सोच, विचारों और स्थितियों को एक-एक करके हल कर सकते हो, तो वे परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध को प्रभावित नहीं करेंगी। अभी तुम्हारा आध्यात्मिक कद छोटा हो सकता है, तुम्हारी सत्य की समझ भी सतही हो सकती है, और क्योंकि तुमने केवल कुछ समय के लिए ही परमेश्वर में विश्वास किया है या कई अन्य कारणों से तुम बहुत-से सत्य नहीं समझते हो—लेकिन तुम्हें एक सिद्धांत ठीक से समझ लेना चाहिए : मुझे परमेश्वर की हर बात के लिए समर्पण करना चाहिए, बाहर से चाहे वह अच्छी दिखे या बुरी, सही हो या गलत, मानवीय धारणाओं के अनुरूप हो या विपरीत। यह सही है या गलत इसकी आलोचना, मूल्यांकन, विश्लेषण या अध्ययन करने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। मुझे जो करना चाहिए वह यह है कि एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य पूरा करूँ और फिर उन सत्यों का अभ्यास करूँ जिन्हें मैं समझ सकता हूँ, ताकि परमेश्वर को संतुष्ट कर सकूँ और सच्चे मार्ग से विचलित न होऊँ। परमेश्वर मुझे जितना समझने देगा मैं उतना अभ्यास करूँगा और जो मुझे अभ्यास करना चाहिए उसकी तलाश करूँगा, भले ही परमेश्वर ने मुझे प्रबुद्ध न किया हो; यदि परमेश्वर ने मुझे किसी ऐसी चीज के बारे में प्रबुद्ध नहीं किया है जिसे समझने की आवश्यकता मुझे नहीं है तो मैं समर्पण करूँगा और प्रतीक्षा करूँगा, और शायद एक दिन परमेश्वर मुझे समझने देगा। ठीक प्रभु यीशु के सलीब पर चढ़ने की तरह, दो हजार वर्ष बाद वे लोग जो अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य स्वीकार करते हैं वे मूलतः समझते हैं और यहाँ तक कि जो लोग अपने अनुसरण को लेकर बहुत उत्सुक नहीं हैं वे भी समझते हैं कि यह सब क्या था। हो सकता है कि अभी तुम परमेश्वर की प्रबंधन योजना से संबंधित कुछ महान कार्यों को न समझ पाओ, लेकिन चूँकि तुम सत्य को नहीं समझते, तो तुम परमेश्वर को गलत समझते हो और उसके अस्तित्व से इनकार करते हो, जो परमेश्वर और तुम्हारे बीच के सामान्य संबंध को तोड़ देता है। यह एक भयंकर गलती है। तुम्हारा एक रवैया, परिप्रेक्ष्य और रुख होना चाहिए जहाँ तुम कहो : “जो चीजें मुझे समझ में नहीं आती हैं मैं उनकी बस प्रतीक्षा करूँगा। एक दिन जब परमेश्वर मानवजाति को प्रबुद्ध करेगा, तो शायद मैं भी उन सब चीजों को समझ पाऊँगा।” प्रभु यीशु ने जाते समय कहा, “मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते” (यूहन्ना 16:12)। वे उन्हें क्यों नहीं सह सकते थे? ऐसा इसलिए था क्योंकि लोगों का आध्यात्मिक कद काफी अपरिपक्व था, और वे समझ नहीं सकते थे। यह तीन या पाँच साल के बच्चे को पैसे कमाने या परिवार का भरण-पोषण करने के बारे में बताने जैसा है; वह इसे सुनेगा, लेकिन उसे लगेगा कि यह उसकी समझ से बहुत दूर है और यह उसकी पहुँच से बाहर है। लोगों के समझने के लिए ऐसा बहुत कुछ है जो कि परमेश्वर मानवजाति को बताना चाहता है, लेकिन मानवजाति के अपरिपक्व आध्यात्मिक कद के कारण, या चूँकि परमेश्वर के कार्य की प्रक्रियाएँ अभी भी मनुष्य के सामने पूरी तरह से प्रकट नहीं हुई हैं और लोगों ने उनका अनुभव नहीं किया है, यदि ये बातें बहुत पहले ही पता चल जाएँ तो वे इन्हें समझ नहीं पाएँगे। अगर उन्होंने सुन भी लिया तो वे इसे धर्म-सिद्धांत के रूप में लेंगे और इसका शाब्दिक रूप ही समझेंगे, लेकिन वास्तव में नहीं जान पाएँगे कि परमेश्वर क्या कह रहा है। इसलिए परमेश्वर बोलता नहीं है। क्या परमेश्वर का न बोलना उचित है? क्या इसमें मनुष्य का कोई हित है? (हाँ है।) क्या इससे लोगों के जीवन के विकास में देरी होगी? निश्चित रूप से इसमें कोई देरी नहीं होगी, कतई देरी नहीं होगी, तुम्हारी दिनचर्या या तुम्हारे सामान्य अनुसरण पर कोई असर नहीं होगा। तो तुम बस अपने हृदय को आराम दो और सत्य का अनुसरण करते रहो, क्योंकि यही सबसे महत्वपूर्ण बात है; अंततः यह सब सत्य की खोज पर आकर टिक जाता है। यदि तुम सत्य का अनुसरण करते हो तो परमेश्वर द्वारा कि गई कुछ चीजों में जो रहस्य हैं, उसकी बुद्धि, अद्भुतता और सभी कार्यों में उसका स्वभाव, और वे सारी चीजें जिन्हें मानवजाति को समझना चाहिए, परमेश्वर का अनुसरण करने की प्रक्रिया के माध्यम से धीरे-धीरे स्पष्ट हो जाएँगी। परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने में कई पहलू शामिल हैं, और परमेश्वर के साथ अपनी बातचीत, जुड़ाव और संपर्क की प्रक्रिया में तुम्हें उसके वचन अनुभव करने चाहिए, और उसके कार्य का निजी अनुभव प्राप्त करना चाहिए, साथ ही उसके द्वारा तुम्हारे प्रबोधन व मार्गदर्शन का भी आनंद लेना चाहिए। इस प्रक्रिया में तुम अनजाने में ही परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर लोगे; अर्थात् अपने ऊपर उसकी संप्रभुता और व्यवस्था का अनुभव करने की प्रक्रिया के माध्यम से धीरे-धीरे तुम्हें परमेश्वर की समझ आने लगेगी। यदि तुम इन प्रक्रियाओं से नहीं गुजरते हो, लेकिन परमेश्वर का कार्य देखने के लिए अपनी कल्पना पर भरोसा करते हुए रोज आँखें फाड़कर आकाश को घूरते हो, तो तुम परमेश्वर का कार्य कभी नहीं देख पाओगे। आखिरकार तुम संदेह करने लगोगे और कहोगे, “कहाँ है परमेश्वर? क्या चाँद उसने बनाया? सूरज सुबह उगता है और रात को डूब जाता है—क्या इसी तरह से परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है?” इस प्रकार की समझ खोखली है, और तुम्हारा दृढ़ विश्वास खोखले शब्द बनकर रह जाएगा। यदि कोई तुमसे पूछेगा कि क्या तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो तुम कहोगे : “मैं परमेश्वर में विश्वास करता हूँ, मुझे दृढ़ विश्वास है, मैं एक ईसाई हूँ।” यदि वे फिर पूछते हैं : “तुम बौद्ध क्यों नहीं हो?” तुम कहोगे : “बौद्ध धर्म सच्चा मार्ग नहीं है, ईसाई धर्म सच्चा मार्ग है।” तुम सिर्फ यही कह सकते हो इससे साबित होता है कि तुम्हारे पास कोई अनुभव नहीं है और तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया है। परमेश्वर के बारे में सब कुछ, वह सब जो उसके पास है और जो वह स्वयं है, उसका स्वभाव, मानवजाति और सभी चीजों के लिए उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाएँ, उसके वचनों की वास्तविकता तथा सटीकता और मानवजाति के लिए उन वचनों की महत्ता, आत्मिक निर्माण और मूल्य, साथ ही साथ मनुष्य के लिए परीक्षण, अनुशासन, प्रबोधन और रोशनी, सांत्वना और प्रोत्साहन, और कुछ खास मार्गदर्शन आदि के माध्यम से काम करने के उसके कुछ तरीके—यदि इन सबका तुमने अनुभव नहीं किया, तो क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो सकता है? क्या तुम सचमुच उसके प्रति समर्पण कर सकते हो? परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ हमेशा एक प्रश्नचिह्न रहेगी, प्रश्नचिह्नों की एक श्रृंखला रहेगी, जिसमें कोई वास्तविक समझ नहीं होगी। तो क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है? क्या यह वास्तव में सृजित प्राणी और सृष्टिकर्ता के बीच का संबंध है? यह प्रश्नचिह्न वास्तव में क्या दर्शाता है? परमेश्वर हमेशा तुम्हारे लिए अजनबी रहेगा, चाहे यह उसकी पहचान की बात हो, उसकी स्थिति की बात हो या उसके सार की बात हो। वह तुम्हारा परिवार नहीं है, तुम्हारा रिश्तेदार नहीं है, वह हमेशा एक अजनबी परग्रही आगंतुक की तरह लगता है जिसे तुमने कभी नहीं जाना—इसलिए यह समझाना आसान नहीं है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध वास्तव में क्या है, लेकिन यह निश्चित रूप से सृजित प्राणी और सृष्टिकर्ता के बीच के संबंध के स्तर तक नहीं पहुँचता।
परमेश्वर पर विश्वास करने के महत्वपूर्ण बिंदु क्या हैं? परमेश्वर पर आस्था को उस वास्तविकता में कैसे बदला जाए जो लोगों के जीवन में होनी चाहिए? समर्पण कैसे हासिल करें और परमेश्वर को कैसे प्राप्त करें? इससे पहले कि तुम परमेश्वर के प्रति समर्पित हो और उसे प्राप्त करो, तुम्हें उसके वचनों को अनुभव करने पर भरोसा होना चाहिए, और सबसे महत्वपूर्ण यह कि उसके न्याय और ताड़ना पर भरोसा होना चाहिए। यद्यपि बहुत-से लोग अपना कर्तव्य निभाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें समझ नहीं आता कि परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे किया जाए। ऐसा करने के लिए तुम्हें उसके न्याय और ताड़ना, उसकी काट-छाँट, परीक्षणों और शोधन का अनुभव करना चाहिए। परमेश्वर की सभी आवश्यकताओं का अभ्यास करना चाहिए, उनके भीतर प्रवेश कर उन्हें हासिल करना चाहिए। इसी को परमेश्वर के कार्य का अनुभव करना कहते हैं। इसे अनुभव करने के लिए तुम्हें परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध स्थापित करना होगा, हमेशा समर्पित हृदय से परमेश्वर से प्रार्थना करनी होगी और उससे खोज करनी होगी। चाहे कुछ भी हो, तुम कितनी भी कठिनाइयों का सामना करो, तुम्हें परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए और उसकी ओर देखना चाहिए, उसके वचनों में उत्तर और रास्ता खोजना चाहिए, और हमेशा उसके साथ प्रार्थना और संगति करनी चाहिए। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने का मतलब है उसके संपर्क में रहना और उसके वचनों और कार्य के लिए समर्पित होना, समस्या या कठिनाई आने पर प्रार्थना करना और उससे मार्गदर्शन खोजना। जब तुम्हें इस तरह का काफी अनुभव हो जाएगा, और तुम सत्य को समझ लोगे, तो तुम सीख चुके होगे कि घटित होने वाली चीजों पर परमेश्वर के वचनों को कैसे लागू किया जाए। परमेश्वर के वचन लागू करने के कई तरीके हैं, उदाहरण के लिए जब चीजें होती हैं तो प्रार्थना करना और खोज करना, और इस प्रकार से देखना कि कैसे परमेश्वर के वचन साफ-साफ बताते हैं कि लोगों को कैसे कार्य करना चाहिए, सिद्धांत क्या हैं, और लोगों के लिए परमेश्वर के इरादे और अपेक्षाएँ क्या हैं। जब तुम यह सब जानते हो, और परमेश्वर की इच्छाओं को समझते हो, तो तुम्हारे पास परमेश्वर के बारे में कुछ ज्ञान और परमेश्वर की कुछ समझ होगी। परीक्षणों का सामना करना पड़े तो तुम्हें यह खोजना चाहिए, “इतने बड़े परीक्षण के बारे में परमेश्वर का वचन क्या कहता है? परमेश्वर द्वारा लोगों का परीक्षण करने का क्या अर्थ है? वह लोगों का परीक्षण क्यों करना चाहता है?” परमेश्वर के वचन कहते हैं कि तुम भ्रष्ट हो, हमेशा विद्रोही और अवज्ञाकारी हो, और तुम उसके प्रति समर्पण नहीं करते हो, बल्कि हमेशा कल्पनाएँ और धारणाएँ रखते हो, और परमेश्वर तुम्हें परीक्षणों के माध्यम से शुद्ध करना चाहता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम क्या अनुभव करते हो, उत्पीड़न और परीक्षण या काट-छाँट, अनुशासित और दंडित किया जाना, और चाहे परमेश्वर तुम्हारे लिए कैसे भी वातावरण का इंतजाम करे या कोई भी तरीका इस्तेमाल करे, तुम्हें हमेशा परमेश्वर के वचनों में उत्तर और आधार की तलाश करनी चाहिए, और उसके इरादों और तुमसे अपेक्षाओं का पता लगाना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि चाहे कुछ भी हो, तुम्हें पहले यह सोचना चाहिए कि परमेश्वर ने क्या कहा है, वह लोगों से कैसे अभ्यास करवाना चाहता है, लोगों से उसकी अपेक्षाएँ क्या हैं और उसके इरादे क्या हैं। इन बातों को समझो और तुम जान जाओगे कि परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे किया जाए। यदि तुम्हारे हृदय में परमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है और तुम सत्य से प्रेम नहीं करते, लेकिन हमेशा यह सोचते हो कि जब ऐसा होता है तब इसके बारे में पुस्तकें, आम लोग या प्रसिद्ध और महान लोग क्या कहते हैं, या तब अविश्वासी लोग क्या करते हैं, तो यदि तुम इस तरह से खोज और अभ्यास करते हो तो फिर तुम छद्म-विश्वासी हो, क्योंकि तुम्हारी सोच और तुम्हारा मार्ग अविश्वासियों के समान हैं। यदि तुम वह हो जिसका परमेश्वर में विश्वास है, लेकिन तुम्हारी सोच अविश्वासियों के समान है और तुम अविश्वासियों के मार्ग पर चलते हो, तो यह गलत रास्ता है और आगे कहीं नहीं पहुँचता; यह वह नहीं है जो परमेश्वर में विश्वास रखने वाले किसी व्यक्ति को करना चाहिए, या यह वह मार्ग नहीं है जिस पर उन्हें चलना चाहिए। कलीसिया के भीतर भी ऐसे लोग होते हैं, और वे कलीसिया में छिपे छद्म-विश्वासी, अविश्वासी हैं।
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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?