अक्सर परमेश्वर के सामने जीने से ही उसके साथ एक सामान्य संबंध बनाया जा सकता है (भाग एक)
तुममें से ज्यादातर लोगों ने अनेक वर्षों से परमेश्वर में आस्था रखी है, और सच्चे मार्ग पर एक बुनियाद लगभग बना ली है। अब तुम लोग परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए परिवार और दीन-दुनिया के मायाजाल को छोड़ने में समर्थ हो। तुम परमेश्वर के घर में एक कर्तव्य निभाने का प्रशिक्षण ले रहे हो, परमेश्वर के लिए खपने और सत्य की ओर बढ़ने का प्रयास करने को तैयार हो। यानी तुम लोग चीजें समझने लगे हो, और तुममें थोड़ा जमीर और विवेक है। यह अच्छी बात है। कर्तव्य निभाने की महत्ता बहुत महान होती है! तुम अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभा सकते हो या नहीं, उसका सीधा संबंध तुम्हारे उद्धार और पूर्णता से है। कहा जा सकता है कि कर्तव्य निभाते हुए परमेश्वर के कार्य का अनुभव करके ही जीवन प्रवेश पाया जा सकता है, और अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाकर ही परमेश्वर की स्वीकृति पाई जा सकती है। इसलिए, कर्तव्यों के मामले में तुम लोगों से थोड़ी ज्यादा माँग करना, और तुम्हारी थोड़ी काट-छाँट करना, तुम्हारे लिए फायदेमंद होगा। कम-से-कम तुम जीवन में जल्द तरक्की करोगे। तुम लोगों से ज्यादा की अपेक्षा रखना कोई बुरी बात नहीं है, न ही तुम सबकी परीक्षा लेने के लिए कभी-कभी तुम्हें एक कठिन समस्या में डालना बुरी बात है। यह सब जीवन में आगे बढ़ने और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने में तुम लोगों की मदद करने के लिए है; साथ ही, यह इसलिए है ताकि तुम लोग पेशेवर ज्ञान की बेहतर समझ पा सको और अपने कर्तव्य में अधिक प्रभावी हो सको। अगर तुम सबसे ये अपेक्षाएँ न रखी जातीं, तो परिणाम क्या होता? तुम सब केवल धर्म-सिद्धांत का प्रचार करने और विनियमों का अनुसरण करने में समर्थ होते, और परमेश्वर में अनेक वर्षों तक विश्वास रखने के बाद भी नहीं बदलते। स्थिति ऐसी हो तो, तुम सब आगे कब बढ़ पाओगे? तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह कैसे निभा पाओगे? न सिर्फ तुम सत्य के बारे में कोई प्रगति नहीं करोगे, अपने कर्तव्य के लिए जरूरी व्यावसायिक ज्ञान भी ज्यादा हासिल नहीं कर पाओगे। तो क्या तुम अपना कर्तव्य इस तरह निभा सकते हो जो मानक स्तर का हो और परमेश्वर की गवाही दे सकते हो? जहाँ तक तुम्हारे मौजूदा आध्यात्मिक कद का सवाल है, सत्य की तुम्हारी समझ बहुत उथली है, और तुमने अपना कर्तव्य निभाने के सिद्धांत नहीं समझे हैं। तुम अपना कर्तव्य मानक-स्तरीय ढंग से निभाने के मापदंड तक पहुँचने से भी बहुत दूर हो। फिर भी तुम सब इससे अनभिज्ञ हो और तुम्हें लगता है मानो तुम अच्छा कर रहे हो और कभी-कभी तुम बहुत ज्यादा आत्मतुष्ट और ढीठ भी बन जाते हो। तुम्हारी कथनी और करनी कभी प्रकाश में नहीं आती, और ये सत्य सिद्धांतों के अनुरूप नहीं होतीं। जब कोई तुम्हारी कोई समस्या बताता है, तो तुम उसे स्वीकार नहीं कर पाते, न ही तुम सत्य खोजते हो, तुम अपने लिए बहाने भी बनाते हो। यहाँ समस्या क्या है? वह यह है कि तुममें सही ढंग से आचरण करने के लिए जरूरी बुनियादी विवेक भी नहीं है। तुम जो भी करो, जरूरी है कि कम-से-कम ज्यादातर लोग उसे उपयुक्त मानें। तुम्हें सबके सुझाव सुनने चाहिए—अगर उनका कहा सही हो, तो तुम्हें उसे स्वीकार कर अपनी गलती सुधारनी चाहिए। अगर हर कोई यह सोचता है कि तुम्हारे द्वारा प्राप्त नतीजे ठीक हैं और हर कोई उन्हें स्वीकृति देता है तो केवल तभी तुम्हारे क्रियाकलापों को मानक स्तर का माना जा सकता है। इस प्रकार, एक तरफ तुम सब अपना कर्तव्य निभाते समय सिद्धांतों के अनुसार कर्म कर पाओगे, और समस्याएँ सुलझाने में अधिक परिपक्व और अनुभवी हो जाओगे। दूसरी तरफ, तुम लोग ज्यादा सीख सकोगे, और साथ ही साथ तुम सत्य को समझ कर जीवन प्रवेश पा सकोगे। इसलिए जब तुम्हारे साथ कोई बात हो जाए, तो तुम्हें आत्मतुष्ट नहीं होना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के सामने खुद को शांत करना और सबक सीखना चाहिए। ज्यादा सीखने के लिए तुम्हें खुद का त्याग करने में सक्षम होना चाहिए। अगर तुम सोचते हो, “मैं इस विषय में तुम सबसे बड़ा विशेषज्ञ हूँ, इसलिए मुझे प्रभारी होना चाहिए, और तुम सबको मेरी बात सुननी चाहिए!”—तो यह कैसा स्वभाव है? यह अहंकार और आत्मतुष्टता है। यह शैतानी और भ्रष्ट स्वभाव है, और यह सामान्य मानवता के दायरे के बाहर है। तो आत्मतुष्ट न होने का क्या अर्थ है? (इसका अर्थ है सबके सुझाव सुनना और सभी से विचार-विमर्श करना।) तुम्हारे निजी विचार और राय जो भी हों, अगर तुम आँख बंद करके तय मान लोगे कि ये सही हैं और चीजें इसी ढंग से की जानी चाहिए, तो यह अहंकार और आत्मतुष्टता है। अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हारे कुछ विचार या राय सही हैं, मगर तुम्हें खुद पर पूरी आस्था नहीं है और खोज और संगति से तुम इनकी पुष्टि कर सकते हो, तो यही है आत्मतुष्ट न होना। काम करने का विवेकपूर्ण तरीका काम से पहले सबका साथ और स्वीकृति पाने की प्रतीक्षा करना है। अगर कोई तुमसे असहमत हो, तो तुम्हें कर्तव्यनिष्ठा से इस पर प्रतिक्रिया देनी चाहिए और अपने काम के पेशेवर पहलुओं पर बारीकी से ध्यान देना चाहिए। तुम्हें यह कहकर इससे नजर नहीं फेरनी चाहिए, “इसे तुम बेहतर समझते हो या मैं? काम के इस क्षेत्र से मैं इतने वर्षों से जुड़ा हुआ हूँ—क्या इसकी समझ मुझे तुमसे ज्यादा नहीं है? तुम्हें इस बारे में क्या मालूम? तुम इसे नहीं समझते!” यह अच्छा स्वभाव नहीं है, यह बहुत अहंकारी और आत्मतुष्ट होना है। संभव है तुमसे असहमत होने वाला व्यक्ति नौसिखिया हो, और उसे काम के इस क्षेत्र की अच्छी समझ न हो; शायद तुम सही हो और तुम चीजें सही ढंग से कर रहे हो, मगर समस्या तुम्हारे स्वभाव की है। तो फिर व्यवहार और कर्म करने का सही तरीका क्या है? सत्य सिद्धांतों के अनुसार तुम व्यवहार और कर्म कैसे कर सकते हो? तुम्हें अपने विचार सामने रखने चाहिए और सभी को देखने देना चाहिए कि क्या उनमें कोई समस्या है। अगर कोई सुझाव दे, तो पहले तुम्हें उसे स्वीकार कर लेना चाहिए, और तब सभी को अभ्यास के सही मार्ग की पुष्टि करने देना चाहिए। अगर उनमें से किसी को कोई समस्या न हो, तब तुम काम करने का सबसे उपयुक्त तरीका तय कर उसी तरह काम कर सकते हो। कोई समस्या नजर आने पर तुम्हें सबकी राय माँगनी चाहिए और तुम सबको साथ मिलकर एक साथ सत्य खोजकर उस पर एक साथ संगति करनी चाहिए, और इस तरह तुम लोग पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता पा सकोगे। जब तुम्हारे दिल प्रकाशित हों, और तुम्हारे सामने बेहतर मार्ग हो, तो तुम्हें प्राप्त होने वाले नतीजे पहले से बेहतर होंगे। क्या यह परमेश्वर का मार्गदर्शन नहीं है? यह अद्भुत चीज है! अगर तुम आत्मतुष्ट होने से बच सको, अपनी कल्पनाएँ और विचार त्याग सको और दूसरों की सही राय सुन सको, तो तुम पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता पा सकोगे। तुम्हारा दिल प्रकाशित हो जाएगा और तुम सही मार्ग पा सकोगे। तुम्हें आगे का रास्ता मिलेगा, और जब इस पर अमल करोगे, तो यह यकीनन सत्य के अनुरूप होगा। ऐसे अभ्यास और अनुभव के जरिए तुम सीख सकोगे कि सत्य पर अमल कैसे करें, और साथ ही काम के उस क्षेत्र के बारे में तुम कुछ नया सीख सकोगे। क्या यह अच्छी बात नहीं है? इसके जरिए तुम्हें एहसास होगा कि अपने साथ कुछ घटने पर तुम्हें आत्मतुष्ट नहीं होना चाहिए और सत्य खोजना चाहिए और अगर तुम आत्मतुष्ट होकर सत्य स्वीकार नहीं करते, तो हर कोई तुम्हें नापसंद करेगा और परमेश्वर यकीनन तुमसे बेइंतहा नफरत करेगा। क्या यह सबक सीखना नहीं है? अगर तुम हमेशा इस प्रकार अनुसरण करते हो और सत्य पर अमल करते हो, तो तुम अपने कर्तव्य में प्रयोग होने वाले व्यावसायिक कौशल को पैना बनाते जाओगे, अपने कर्तव्य में बेहतर-से-बेहतर नतीजे पाओगे, परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध कर आशीष देगा, और भी ज्यादा हासिल करने देगा। इसके अलावा, तुम्हारे पास सत्य पर अमल करने का मार्ग होगा, और जब तुम जान लोगे कि सत्य पर अमल कैसे करें, तो धीरे-धीरे सिद्धांतों को समझ लोगे। जब तुम जान लोगे कि किन कर्मों से परमेश्वर से प्रबुद्धता और मार्गदर्शन मिलेगा, किनसे वह घृणा कर तुम्हें बर्खास्त कर देगा, और किनसे उसकी स्वीकृति और आशीष मिलेंगे, तो तुम्हें आगे का रास्ता मिलेगा। जब लोगों को परमेश्वर के आशीष और प्रबुद्धता मिलेंगे, तो उनके जीवन की प्रगति तेजी से होगी। उन्हें हर दिन परमेश्वर की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन मिलेंगे, और उनके दिलों में शांति और खुशी होगी। क्या इससे उन्हें आनंद नहीं मिलेगा? जब तुम्हारे कर्मों को परमेश्वर के सामने पेश किया जा सकेगा और उन्हें परमेश्वर की स्वीकृति मिलेगी, तो तुम्हें दिल में आनंद का अनुभव होगा, और भीतर से शांति और खुशी मिलेगी। शांति और खुशी की ये भावनाएँ परमेश्वर ने तुम्हें दी हैं, ये वे संवेदनाएँ हैं जो पवित्र आत्मा ने तुम्हें दी हैं।
अहंकारी और आत्मतुष्ट होना इंसान का सबसे स्पष्ट शैतानी स्वभाव है और अगर लोग सत्य स्वीकार नहीं करते हैं तो उनके पास इस स्वभाव को स्वच्छ करने का कोई मार्ग नहीं होगा। सभी लोगों में अहंकारी और आत्मतुष्ट स्वभाव होता है और वे हमेशा दंभी होते हैं। वे जो भी सोचें या कहें, चीजों को कैसे भी देखें, वे हमेशा सोचते हैं कि उनका नजरिया और उनका रवैया ही सही है, और दूसरों का कहा उनके जैसा ठीक या उतना सही नहीं है। वे हमेशा अपनी ही राय से चिपके रहते हैं और बोलने वाला इंसान चाहे जो भी हो, वे उसकी बात नहीं सुनते। भले ही किसी और की बात सही और सत्य के अनुरूप हो तो भी वे इसे स्वीकार नहीं करेंगे; वे सिर्फ सुनते हुए लगेंगे, मगर वे उस विचार को सच में नहीं अपनाएँगे और कार्य करने का समय आने पर भी वे अपने ही ढंग से काम करेंगे, हमेशा यह सोचते हुए कि जो वे कहते हैं वही सही और वाजिब है। संभव है तुम जो कहो, वह सचमुच सही और वाजिब हो, या तुम्हारा किया सही और त्रुटिहीन हो, मगर तुमने कैसा स्वभाव प्रदर्शित किया है? क्या यह अहंकारी और आत्मतुष्ट स्वभाव नहीं है? अगर तुम इस अहंकारी और आत्मतुष्ट स्वभाव को नहीं छोड़ते, तो क्या इससे तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन पर असर नहीं पड़ेगा? क्या इससे सत्य का तुम्हारा अभ्यास प्रभावित नहीं होगा? अगर तुम अपने अहंकारी और आत्मतुष्ट स्वभाव का समाधान नहीं करते हो, तो क्या इससे भविष्य में गंभीर रुकावटें पैदा नहीं होंगी? यकीनन रुकावटें आएँगी, यह होकर ही रहेगा। बोलो, क्या परमेश्वर इंसान के इस बर्ताव को देख सकता है? परमेश्वर यह देखने में बहुत समर्थ है! परमेश्वर न सिर्फ लोगों के दिलों की गहराई जाँचता है, वह हर जगह हमेशा उनकी हर कथनी और करनी का निरीक्षण करता है। तुम्हारा यह व्यवहार देखकर परमेश्वर क्या कहेगा? परमेश्वर कहेगा : “तुम दुराग्रही हो! जब यह न पता हो कि तुम गलत हो तो तुम्हारा अपने विचारों से चिपके रहना तो समझ आता है, मगर जब तुम्हें साफ पता है कि तुम गलत हो और फिर भी तुम अपने विचारों से चिपके रहते हो और पश्चात्ताप करने से पहले मरना पसंद करोगे, तो तुम निरे जिद्दी बेवकूफ हो और मुसीबत में हो। सुझाव कोई भी दे, अगर तुम इसके प्रति हमेशा नकारात्मक, प्रतिरोधी रवैया अपनाकर सत्य को लेशमात्र भी स्वीकार नहीं करते, और तुम्हारा दिल पूरी तरह प्रतिरोधी, बंद और चीजों को नकारने के भाव से भरा है, तो तुम हँसी के पात्र हो, बेहूदा हो! तुमसे निपटना बहुत मुश्किल है।” तुमसे निपटना मुश्किल क्यों है? तुमसे निपटना इसलिए मुश्किल है, क्योंकि तुम जो प्रदर्शित कर रहे हो वह एक त्रुटिपूर्ण रवैया या त्रुटिपूर्ण व्यवहार नहीं है, बल्कि तुम्हारे स्वभाव का खुलासा है। किस स्वभाव का खुलासा? उस स्वभाव का जिसमें तुम सत्य से विमुख हो, सत्य से घृणा करते हो। जब एक बार तुम्हें उस व्यक्ति के रूप में निरूपित कर दिया गया जो सत्य से घृणा करता है तो परमेश्वर की नजरों में तुम मुसीबत में हो, और वह तुम्हें ठुकरा देगा और अनदेखा करेगा। लोगों के नजरिये से देखें तो ज्यादा-से-ज्यादा वे कहेंगे : “इस व्यक्ति का स्वभाव बुरा है। यह बेहद जिद्दी, दुराग्रही और अहंकारी है! इसके साथ निभाना बहुत मुश्किल है, यह सत्य से प्रेम नहीं करता। इसने कभी भी सत्य को स्वीकार नहीं किया, और यह सत्य पर अमल नहीं करता।” ज्यादा-से-ज्यादा, सब लोग तुम्हारा यही आकलन करेंगे, मगर क्या यह आकलन तुम्हारे भाग्य का फैसला कर सकता है? लोग तुम्हारा जो आकलन करते हैं, वह तुम्हारे भाग्य का फैसला नहीं कर सकता, मगर एक चीज है जो तुम्हें नहीं भूलनी चाहिए : परमेश्वर लोगों के दिलों की जाँच करता है, और साथ ही साथ वह उनकी हर कथनी और करनी का निरीक्षण करता है। अगर परमेश्वर तुम्हें इस तरह परिभाषित करता है, और अगर वह मात्र इतना नहीं कहता कि तुम्हारा स्वभाव थोड़ा भ्रष्ट है, या तुम थोड़े अवज्ञाकारी हो, बल्कि कहता है कि तुम सत्य से घृणा करते हो, तो क्या यह एक गंभीर समस्या नहीं है? (यह गंभीर है।) इससे मुसीबत होगी, और यह मुसीबत इसमें नहीं है कि लोग तुम्हें किस नजर से देखते हैं, या तुम्हारा आकलन कैसे करते हैं, यह इस बात में है कि परमेश्वर सत्य से घृणा करने वाले तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव को कैसे देखता है। तो परमेश्वर इसे किस नजर से देखता है? क्या परमेश्वर ने सिर्फ यह तय कर दिया है कि तुम सत्य से घृणा करते हो, इससे प्रेम नहीं करते, और कुछ नहीं? क्या यह इतना सरल है? सत्य कहाँ से आता है? सत्य किसका प्रतिनिधित्व करता है? (यह परमेश्वर को दर्शाता है।) इस पर विचार करो : अगर एक इंसान सत्य से घृणा करता है, तो परमेश्वर अपने नजरिये से उसे कैसे देखेगा? (अपने शत्रु के रूप में।) क्या यह एक गंभीर समस्या नहीं है? जब कोई व्यक्ति सत्य से घृणा करता है, तो वह परमेश्वर से घृणा करता है! मैं क्यों कहता हूँ कि वह परमेश्वर से घृणा करता है? क्या उन्होंने परमेश्वर को शाप दिया? क्या उन्होंने परमेश्वर के सामने उसका विरोध किया? क्या उन्होंने उसकी पीठ पीछे उसकी आलोचना या निंदा की? ऐसा जरूरी नहीं। तो मैं क्यों कहता हूँ कि सत्य से घृणा करने वाले स्वभाव का खुलासा करना परमेश्वर से घृणा करना है? यह राई का पहाड़ बनाना नहीं है, यह स्थिति की वास्तविकता है। यह पाखंडी फरीसियों जैसा होना है, जिन्होंने सत्य से अपनी घृणा के कारण प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया—बाद में हुए परिणाम भयावह थे। इसका यह अर्थ है कि अगर किसी व्यक्ति का स्वभाव सत्य से विमुख है और वह सत्य से घृणा करता है, तो वह कभी भी कहीं भी इसे प्रकट कर सकता है, और अगर वह इसी के सहारे जीता है, तो क्या वह परमेश्वर का विरोध नहीं करेगा? जब उनका सामना किसी ऐसी चीज से होता है जो सत्य से या विकल्प चुनने से जुड़ी होती है, तो अगर वे सत्य को स्वीकार नहीं कर सकते, और अपने भ्रष्ट स्वभाव के सहारे जीते हैं, तो स्वाभाविक रूप से वे परमेश्वर का विरोध करेंगे, और उसे धोखा देंगे, क्योंकि उनका भ्रष्ट स्वभाव परमेश्वर और सत्य से घृणा करता है। अगर तुम्हारा स्वभाव ऐसा है तो परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों को लेकर भी तुम सवाल उठाओगे, और उनका गहन-विश्लेषण और समालोचना करना चाहोगे। फिर तुम परमेश्वर के वचनों को शक से देखोगे, और कहोगे, “क्या ये सचमुच परमेश्वर के वचन हैं? ये मुझे सत्य जैसे नहीं लगते, ये सब मुझे अनिवार्यतः सही नहीं लगते!” इस प्रकार क्या सत्य से घृणा करने वाला तुम्हारा स्वभाव स्वतः प्रकट नहीं हो गया? इस प्रकार सोचने पर, क्या तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकोगे? यकीनन नहीं। अगर तुम परमेश्वर को समर्पित नहीं हो सकते, तो क्या वह अभी भी तुम्हारा परमेश्वर है? नहीं। फिर तुम्हारे लिए परमेश्वर क्या होगा? तुम उससे शोध के एक विषय के रूप में पेश आओगे, ऐसा जिस पर शक किया जाना चाहिए, जिसकी निंदा होनी चाहिए; तुम उससे एक साधारण और आम इंसान की तरह पेश आओगे, और ऐसे ही उसकी निंदा करोगे। ऐसा करके तुम ऐसे इंसान बन जाओगे जो परमेश्वर का प्रतिरोध और ईशनिंदा करता हो। किस प्रकार के स्वभाव के कारण ऐसा होता है? यह ऐसे अहंकारी स्वभाव के कारण होता है जो कुछ हद तक फूल चुका हो; न सिर्फ तुम्हारा शैतानी स्वभाव तुमसे प्रकट होगा, बल्कि तुम्हारे शैतानी रूप का भी पूरी तरह खुलासा हो जाएगा। परमेश्वर का प्रतिरोध करने के स्तर तक पहुँच चुके इंसान, जिसका विद्रोहीपन एक विशेष सीमा तक पहुँच चुका हो, उसके और परमेश्वर के बीच के रिश्ते का क्या होता है? यह शत्रुता का रिश्ता बन जाता है, जिसमें व्यक्ति परमेश्वर को अपने विरोध में खड़ा कर लेता है। परमेश्वर में अपनी आस्था में, अगर तुम सत्य को स्वीकार कर उसके प्रति समर्पण नहीं कर सकते, तो परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर नहीं रह जाता। अगर तुम सत्य को मना करके उसे ठुकरा देते हो, तो तुम ऐसे इंसान बन चुके होगे, जो परमेश्वर का प्रतिरोध करता है। फिर भी क्या परमेश्वर तुम्हें बचा सकेगा? यकीनन नहीं। परमेश्वर तुम्हें उसका उद्धार पाने का एक मौका देता है और तुम्हें एक शत्रु के रूप में नहीं देखता, मगर तुम सत्य को स्वीकार नहीं कर सकते और परमेश्वर को अपने विरोध में खड़ा कर देते हो; परमेश्वर को अपने सत्य और अपने मार्ग के रूप में स्वीकार करने की तुम्हारी असमर्थता तुम्हें एक ऐसा इंसान बना देती है जो परमेश्वर का प्रतिरोध करता है। इस समस्या को कैसे सुलझाया जा सकता है? तुम्हें तुरंत पश्चात्ताप करना चाहिए और अपना मार्ग बदल लेना चाहिए। उदाहरण के लिए, अपना कर्तव्य निभाते समय जब तुम्हारे सामने कोई समस्या या कठिनाई आए, और तुम उसे सुलझाना न जानो, तो तुम्हें बिना सोचे-विचारे उस पर मनन नहीं करना चाहिए, तुम्हें पहले परमेश्वर के सामने खुद को शांत करना चाहिए, प्रार्थना कर उससे खोजना चाहिए और देखना चाहिए कि परमेश्वर के वचन इस बारे में क्या कहते हैं। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद भी अगर तुम न समझो, और न जान पाओ कि यह मसला किन सत्यों से संबंधित है, तो तुम्हें एक सिद्धांत को कसकर थामे रहना चाहिए—यानी पहले समर्पण करो, कोई निजी विचार या सोच न रखो, शांतचित्त होकर प्रतीक्षा करो, और देखो कि परमेश्वर क्या कुछ करने की इच्छा और इरादा रखता है। जब तुम सत्य को न समझ सको, तो तुम्हें उसे खोजना चाहिए, और बिना विचारे लापरवाही से कुछ करने के बजाय परमेश्वर की प्रतीक्षा करनी चाहिए। तुम्हारे सत्य न समझ पाने पर, कोई तुम्हें सुझाव दे, और सत्य के अनुसार कुछ करने का तरीका बताए, तो तुम्हें पहले उसे स्वीकार कर लेना चाहिए, सबको उस पर संगति करने देना चाहिए, और देखना चाहिए कि यह रास्ता सही है या नहीं और यह सत्य सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं। अगर तुम इस बात की पुष्टि कर लो कि यह सत्य के अनुरूप है, तो उस पर अमल करो; अगर तुम तय कर लो कि यह सत्य के अनुरूप नहीं है, तो उस पर अमल मत करो। यह इतना ही आसान है। सत्य की खोज करते समय, तुम्हें बहुत-से लोगों से खोजना चाहिए। अगर किसी के पास कुछ कहने को है, तो तुम्हें सुनना चाहिए और उसके सभी कथनों को गंभीरता से लेना चाहिए। उनकी अनदेखी न करो, न ही उन्हें महत्वहीन समझो, क्योंकि यह तुम्हारे कर्तव्य के दायरे के भीतर के मामलों से संबंधित है और तुम्हें इसे गंभीरता से लेना चाहिए। यही सही रवैया और सही दशा है। जब तुम्हारी दशा सही हो, और तुम सत्य से विमुख और घृणा करने वाला स्वभाव प्रदर्शित न करो, तो इस प्रकार अभ्यास करने से यह तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव की जगह ले लेगा। यही है सत्य का अभ्यास। अगर तुम सत्य पर इस तरह अमल करोगे, तो इसका फल क्या होगा? (पवित्र आत्मा हमारा मार्गदर्शन करेगा।) पवित्र आत्मा का मार्गदर्शन पाना एक पहलू है। कभी-कभी मामला बहुत आसान होगा और इसे तुम अपने दिमाग से पूरा कर लोगे; दूसरे लोगों के सुझाव देने और तुम्हारे उन्हें समझ लेने के बाद तुम चीजों को सुधार सकोगे और सिद्धांतों के अनुसार काम कर पाओगे। लोगों को लग सकता है कि यह बहुत छोटी बात है, मगर परमेश्वर के लिए यह बड़ी बात है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि जब तुम ऐसा अभ्यास करते हो, तो परमेश्वर के लिए तुम सत्य पर अमल करने वाले इंसान बन जाते हो, एक इंसान जो सत्य से प्रेम करता है, और एक ऐसा इंसान जो सत्य से विमुख नहीं है—जब परमेश्वर तुम्हारे दिल में झाँकता है, तो वह तुम्हारा स्वभाव भी देखता है, और यह एक बहुत बड़ी बात है। दूसरे शब्दों में, जब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो परमेश्वर की मौजूदगी में कर्म करते हो तो तुम जो जीते और प्रकट करते हो वे सब ऐसी सत्य वास्तविकताएँ होती हैं जो लोगों में होनी चाहिए। तुम जो भी चीज करते हो उसमें जो रवैये, विचार और दशाएँ होती हैं, वे परमेश्वर के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण होती हैं और यही वे चीजें हैं जिनकी परमेश्वर पड़ताल करता है।
क्या यह घृणित नहीं है कि कुछ लोग बाल की खाल निकालना पसंद करते हैं और जब भी उनके साथ कुछ घटित होता है तो ऐसे रास्ते पर चल पड़ते हैं जो अंततः कहीं नहीं पहुँचता? यह एक बड़ी समस्या है। साफ सोचवाले लोग ऐसी गलती नहीं करते, बेतुके लोग ही ऐसे होते हैं। वे हमेशा कल्पना करते हैं कि दूसरे लोग उनका जीना दूभर कर रहे हैं, उन्हें मुश्किलों में डाल रहे हैं, इसलिए वे हमेशा दूसरों से दुश्मनी मोल लेते हैं। क्या यह भटकाव नहीं है? सत्य को लेकर वे प्रयास नहीं करते, उनके साथ कुछ घटने पर वे बेकार की बातों में उलझना पसंद करते हैं, सफाई माँगते हैं, लाज बचाने की कोशिश करते हैं, और इन मामलों को सुलझाने के लिए वे हमेशा इंसानी हल ढूँढ़ते हैं। जीवन प्रवेश में यह सबसे बड़ी बाधा है। अगर तुम परमेश्वर में इस तरह विश्वास रखते हो, या इस तरह अभ्यास करते हो, तो कभी भी सत्य हासिल नहीं कर पाओगे, क्योंकि तुम कभी परमेश्वर के सामने नहीं आते। परमेश्वर ने तुम्हारे लिए जो कुछ इंतजाम कर रखा है वह प्राप्त करने के लिए तुम कभी परमेश्वर के सामने नहीं आते, न ही तुम इस सब से निपटने के लिए सत्य का प्रयोग करते हो, इसके बजाय तुम चीजों से निपटने के लिए इंसानी समाधानों का प्रयोग करते हो। इसलिए परमेश्वर की दृष्टि में तुम उससे बहुत दूर भटक गए हो। न सिर्फ तुम्हारा दिल उससे भटक गया है, तुम्हारा पूरा अस्तित्व उसकी मौजूदगी में नहीं जीता है। हमेशा जरूरत से ज्यादा विश्लेषण कर बाल की खाल निकालने वालों को परमेश्वर इसी नजर से देखता है। ऐसे लोग भी हैं, जो वाक्पटु हैं, चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं, जिनके दिमाग तेज और चालाक हैं, जो सोचते हैं, “मैं अच्छा बोलता हूँ। सभी दूसरे लोग सच में मेरी प्रशंसा करते हैं, मुझे सम्मान देते हैं, और मेरा बहुत आदर करते हैं। आमतौर पर लोग मेरा कहा मानते हैं।” क्या यह उपयोगी है? तुमने लोगों के बीच अपनी प्रतिष्ठा बना रखी है, मगर परमेश्वर के सामने तुम जिस तरीके से व्यवहार करते हो उस तरीके को वह स्वीकार्य नहीं पाता है। परमेश्वर कहता है कि तुम एक छद्म-विश्वासी हो, सत्य के प्रति शत्रुभाव रखते हो। लोगों के बीच तुम चालाक और जोड़-तोड़ करने वाले व्यक्ति हो सकते हो, शायद तुम चीजें भी अच्छी तरह सँभाल लेते होगे, सभी के साथ मिलजुल कर रहते होगे; किसी भी स्थिति में चीजें सँभालने और उनका ध्यान रखने का कोई उपाय हमेशा ढूँढ़ लेते होगे, मगर तुम समस्याएँ सुलझाने के लिए परमेश्वर के सामने नहीं आते और सत्य नहीं खोजते। ऐसे लोगों से निपटना मुश्किल होता है। उनके बारे में परमेश्वर को सिर्फ एक ही बात कहनी है : “तुम एक छद्म-विश्वासी हो, परमेश्वर में विश्वास रखने के बहाने तुम आशीष पाने के लिए इस मौके का लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हो। तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो सत्य स्वीकारता है।” इस प्रकार के आकलन के बारे में तुम्हारी क्या सोच है? क्या तुम लोग यही चाहते हो? यकीनन नहीं। संभव है कुछ लोग परवाह न करें और कहें, “परमेश्वर हमें किस नजर से देखता है, इससे हमें फर्क नहीं पड़ता, वैसे भी हम परमेश्वर को नहीं देख सकते। हमारी तात्कालिक समस्या अपने इर्द-गिर्द के लोगों के साथ अच्छे संबंध बनाना है। एक बार हमारे पाँव जम जाएँ, तो हम अगुआओं और कार्यकर्ताओं को जीत सकते हैं, ताकि सब हमारी प्रशंसा करें।” यह कैसा व्यक्ति है? क्या यह परमेश्वर में विश्वास रखने वाला व्यक्ति है? यकीनन नहीं; ऐसे लोग छद्म-विश्वासी हैं। परमेश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों को हमेशा परमेश्वर की मौजूदगी में रहना चाहिए; उनका सामना चाहे कैसे भी मसलों से हो, सत्य खोजने के लिए उन्हें परमेश्वर के सामने आना होगा ताकि अंत में परमेश्वर कहे, “तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य से प्रेम करता है, जो परमेश्वर को प्रसन्न करता है, और जो परमेश्वर को स्वीकार्य है। परमेश्वर ने तुम्हारा दिल देखा है और उसने तुम्हारा समर्पण भी देखा है।” ऐसे आकलन के बारे में तुम क्या सोचते हो? सिर्फ ऐसे लोगों को ही परमेश्वर की स्वीकृति मिलती है। क्या तुम लोग इसे पूरी तरह समझ सकते हो? मैं तुम लोगों को बताता हूँ कि परमेश्वर के विश्वासी चाहे कोई भी कर्तव्य निभाएँ—वे बाहरी मामले सँभालते हों, या कोई ऐसा कर्तव्य निभाते हों जिनका संबंध परमेश्वर के घर में विभिन्न कार्यों या विशेषज्ञता के क्षेत्रों से हो—अगर वे अक्सर परमेश्वर के सामने नहीं आते, उसकी मौजूदगी में नहीं रहते, उसकी पड़ताल स्वीकारने की हिम्मत नहीं रखते, और वे परमेश्वर से सत्य नहीं तलाशते, तो वे छद्म-विश्वासी हैं, और अविश्वासियों से अलग नहीं हैं। क्या तुम लोग यह बात समझ पा रहे हो? संभव है कुछ लोग फिलहाल माहौल उपयुक्त न होने के कारण कोई कर्तव्य नहीं निभा पाते; वे अविश्वासियों के माहौल में रहते हैं, फिर भी उन्हें अक्सर परमेश्वर का प्रबोधन और मार्गदर्शन मिलता है। ऐसा कैसे हो सकता है? सबसे अहम बातें ये हैं कि वे परमेश्वर से प्रार्थना करने, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने, सत्य को खोजकर उसका अभ्यास करने और परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध कायम रखने में समर्थ हैं। ये बातें हैं जो यह तय करने में अहम हैं कि कोई व्यक्ति हमेशा परमेश्वर की मौजूदगी में रह सकता है या नहीं। अगर तुम्हें अक्सर परमेश्वर की अनुभूति नहीं होती, तुम अक्सर कमजोर और नकारात्मक हो जाते हो, अक्सर स्वच्छंद रहते हो या अपना कर्तव्य करते समय कोई बोझ नहीं उठाते, हमेशा भ्रमित रहते हो, तो यह एक अच्छी दशा है या बुरी? क्या यह परमेश्वर के सामने जीने की दशा है, या परमेश्वर के सामने बिल्कुल न जीने की दशा है? (यह परमेश्वर के सामने न जीने की दशा है।) तो तुम लोगों को इसे मापना होगा—तुम लोग अक्सर परमेश्वर के सामने जीते हो या नहीं? अगर तुम ऐसा विरले ही करते हो, प्रार्थना भी नहीं करते, या परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ते, तो यह मुसीबत का संकेत है, इसका अर्थ है कि तुम अविश्वासी हो। कुछ लोग उचित मामलों में विरले ही ध्यान केंद्रित करते हैं, वे स्वच्छंद और संयमहीन होते हैं, और जब उनके साथ चीजें घटती हैं, तो वे हमेशा पशोपेश में रहते हैं और नहीं जान पाते कि सत्य को कैसे खोजें। वे यह भी नहीं जानते कि उन्हें अपने कर्तव्य निभाने के परिणाम मिले हैं या नहीं। वे नहीं जानते कि उनके कौन-से नित्य कर्म परमेश्वर को नाराज करते हैं, कौन-से परमेश्वर को स्वीकार्य हैं, और किनसे परमेश्वर को घृणा है। वे बस जैसे-तैसे दिन गुजारते हैं। इस दशा के बारे में तुम क्या सोचते हो? क्या ऐसी दशाओं में रहने वाले लोगों के पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होता है? क्या उनके कार्यों के कोई सिद्धांत हो सकते हैं? क्या वे समझदारी के काम कर सकते हैं? अपना कर्तव्य निभाते समय क्या वे कह सकते हैं, “मुझे संयम से रहना चाहिए, अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाना चाहिए, मुझे इसे पूरी लगन और शक्ति से निभाना चाहिए”? क्या वे समर्पित हो सकते हैं? (नहीं हो सकते।) तो फिर ऐसे लोग क्या कर रहे हैं? वे सिर्फ कड़ी मेहनत कर रहे हैं! क्या ऐसे लोगों ने सत्य प्राप्त कर लिया है? (नहीं।) यह एक बहुत बड़ी क्षति है। बेवकूफों की यह टोली सत्य का अनुसरण करना कैसे नहीं जानती? इन लोगों ने दस-बीस साल से परमेश्वर में विश्वास रखा है और बहुत-से धर्मोपदेश सुने हैं, फिर भी वे नहीं जानते कि परमेश्वर में विश्वास के जरिए क्या पाना है, सत्य का अनुसरण कैसे करें, सत्य का अभ्यास कैसे करें या अपना कर्तव्य कैसे निभाएँ। अगर उनके मन में इन अहम बातों के बारे में भी स्पष्टता नहीं है, तो क्या वे थोड़े बेवकूफ नहीं हैं? वे बहुत मंदबुद्धि और सुन्न हैं। सत्य पर वे कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाते, और यह खतरनाक है। परमेश्वर में विश्वास रखने के बारे में सबसे अहम बात क्या है? यह सत्य प्राप्त करना है। सत्य प्राप्त करके कोई व्यक्ति कौन-सी समस्याएँ सुलझा सकता है? मुख्य रूप से अपने पाप, अपना भ्रष्ट स्वभाव, परमेश्वर में विश्वास रखने में आने वाली सभी कठिनाइयाँ और अपना गलत नजरिया। ये सभी समस्याएँ सुलझाई जा सकेंगी। सत्य प्राप्त करके इंसान को उसका किस में उपयोग करना चाहिए? अपने कर्तव्य निर्वहन में, और परमेश्वर की गवाही देने में—ये सबसे अहम चीजें हैं। फिलहाल, शायद तुम लोगों को इसका सच्चा ज्ञान न हो, तुमने अब भी सत्य का मूल्य या महत्व नहीं पहचाना हो, मगर एक दिन जरूर जान जाओगे।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?