अक्सर परमेश्वर के सामने जीने से ही उसके साथ एक सामान्य संबंध बनाया जा सकता है (भाग दो)

क्या तुम लोगों ने अय्यूब की किताब पढ़ी है? इसे पढ़ते समय क्या तुम भावनात्मक रूप से प्रभावित हुए? क्या तुम्हारे मन में भी ऐसी लालसा पैदा हुई कि तुमने अय्यूब जैसा व्यक्ति बनना चाहा हो? (हाँ।) ऐसी दशा और मनःस्थिति कितने समय तक बनी रह सकती है? एक-दो दिन, एक-दो महीने, या एक-दो साल? (दो-तीन दिन।) तो क्या ऐसी दशा और मनःस्थिति दो-तीन दिन में गायब हो जाएगी? प्रभावित महसूस होने पर तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए, परमेश्वर से कहना चाहिए कि तुम अय्यूब जैसा व्यक्ति बनना चाहते हो, तुम सत्य समझना चाहते हो, परमेश्वर का ज्ञान हासिल करना चाहते हो, और एक ऐसा व्यक्ति बनना चाहते हो जो परमेश्वर का भय मानता हो और बुराई से दूर रहता हो। तुम्हें परमेश्वर से विनती करनी चाहिए कि वह तुममें यह चीज लाए, तुम्हारा मार्गदर्शन करे, तुम्हारे लिए परिवेशों का इंतजाम करे, तुम्हें शक्ति दे और तुम्हारी रक्षा करे ताकि तुम अपने सामने आने वाली हर स्थिति में अडिग रह सको, परमेश्वर का प्रतिरोध न करो, बल्कि परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने वाले कर्म करो और उसके इरादों को संतुष्ट करो। इस लक्ष्य के लिए और तुम जो चीजें पाना चाहते हो उनके लिए तुम्हें हमेशा परमेश्वर से प्रार्थना और विनती करनी चाहिए और जब परमेश्वर तुम्हारा वास्तविक दिल देखेगा तो वह कार्य करेगा। परमेश्वर के कार्य करने पर डरना मत। परमेश्वर तुम्हारा शरीर फोड़ों से बिल्कुल भी नहीं भर सकता है और तुमसे तुम्हारी तमाम चीजें नहीं छीन सकता है, जैसा कि उसने तब किया था जब उसने अय्यूब का परीक्षण किया था। परमेश्वर ऐसा नहीं करेगा; वह तुम्हारे आध्यात्मिक कद के अनुसार धीरे-धीरे तुम्हारे ऊपर और अधिक रखेगा। तुम्हें परमेश्वर को ईमानदारी से पुकारना चाहिए—ऐसा मत करो कि अय्यूब की किताब पढ़ने के दो दिन बाद तक और उससे प्रभावित रहने तक ही उसे पुकारो, और किताब के न पढ़ने पर तीसरे दिन उसे भूल जाओ और उसे दिल में बसाना बंद कर दो। अगर तुम ऐसा करोगे, तो मुसीबत में पड़ जाओगे! अगर तुम अय्यूब जैसे लोगों की सराहना करते हो, और उस जैसा व्यक्ति बनना चाहते हो, तो तुम्हारे सामने वैसा व्यक्ति बनने का रास्ता होना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के सामने अपना दिल बिछाना होगा, इसके लिए अक्सर उससे प्रार्थना करनी होगी, इस पर अक्सर मनन करना होगा, और परमेश्वर द्वारा अय्यूब के लिए बोले गए वचनों को खाना और पीना होगा, बार-बार नियमितता से उन पर सोच-विचार करना होगा और इसके बाद उन लोगों के साथ संगति करनी होगी जिन्हें इस प्रकार का अनुभवजन्य ज्ञान है। तुम्हें इस लक्ष्य के प्रति कड़ी मेहनत करनी होगी। तुम्हें कड़ी मेहनत कैसे करनी चाहिए? अगर तुम सिर्फ बैठकर देखते और प्रतीक्षा करते रहे, तो यह कड़ी मेहनत करना नहीं है। तुम्हें इसे अभ्यास में लाना होगा, तुम्हें इसके लिए प्रयास करने होंगे, साथ ही साथ कष्ट सहने वाला और लालसा रखने वाला दिल रखने का संकल्प लेना होगा, और फिर इसके लिए परमेश्वर से कार्य करने की विनती करते हुए प्रार्थना करनी होगी। अगर परमेश्वर कार्य न करे, तो लोगों में चाहे कितना भी जोश क्यों न हो, उसका कोई लाभ नहीं। परमेश्वर कार्य कैसे करेगा? परमेश्वर तुम्हारे आध्यात्मिक कद के लायक परिवेशों का निर्माण और व्यवस्था करना शुरू कर देगा। तुम्हें परमेश्वर को बताना होगा कि तुम अपनी आस्था में कौन-से लक्ष्य पाना चाहते हो, तुम्हारे संकल्प किस प्रकार के हैं। क्या तुमने इसके लिए परमेश्वर से प्रार्थना और विनती की है? तुमने कितने समय तक इसके लिए प्रार्थना और विनती की? अगर तुम कभी-कभार एक-दो प्रार्थनाएँ करके देखते हो कि परमेश्वर ने कुछ नहीं किया है, और सोचने लगो कि “छोड़ो, जैसा है चलने दो। जो होगा, होने दो, मैं बस उस बहाव के साथ चलता जाऊँगा। मेरे साथ जो भी हो, मुझे परवाह नहीं,” तो यह ठीक नहीं, तुम ईमानदार नहीं हो। अगर तुम्हारा उत्साह सिर्फ दो मिनट का है, तो क्या परमेश्वर तुम्हारे लिए कार्य कर सकेगा और तुम्हारे लिए माहौल तैयार करने में मदद कर सकेगा? परमेश्वर ऐसा नहीं करेगा! परमेश्वर तुम्हारी ईमानदारी देखना चाहता है, और यह कि तुम्हारी ईमानदारी और दृढ़ता कब तक टिक पाती है, और क्या तुम्हारा दिल सच्चा है या झूठा। परमेश्वर प्रतीक्षा करेगा। वह तुम्हारी प्रार्थनाएँ और विनतियाँ सुनता है, तुम उसे विश्वास में लेकर जो संकल्प और आकांक्षाएँ बताते हो, वह सुनता है, मगर जब तक वह कष्ट सहने का तुम्हारा संकल्प देख नहीं लेता, कुछ नहीं करेगा। अगर परमेश्वर से प्रार्थना करने के बाद तुम बिना कुछ किए गायब हो जाते हो, तो क्या ऐसी स्थिति में परमेश्वर कुछ करेगा? बिल्कुल और यकीनन नहीं। तुम्हें परमेश्वर से और अधिक प्रार्थना और विनती करनी होगी, इसमें ज्यादा प्रयास करना होगा, इस पर मनन करना होगा और फिर परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए खड़े किए गए परिवेशों का विस्तार से आनंद लेना होगा; ये परिवेश थोड़ा-थोड़ा करके तुम्हारे सामने आएँगे और परमेश्वर कार्य करने लगेगा। अगर तुम्हारे पास वास्तविक दिल नहीं है तो यह कारगर नहीं होगा। तुम कह सकते हो, “मैं अय्यूब और पतरस की कितनी सराहना करता हूँ!” मगर तुम्हारी सराहना का क्या फायदा? तुम जितना चाहो उनकी सराहना कर सकते हो, मगर तुम वे नहीं हो, और तुम्हारी इस पूरी सराहना को देखकर परमेश्वर वैसा कार्य नहीं करेगा जो उसने उनके लिए किया, क्योंकि तुम उन्हीं के जैसे व्यक्ति नहीं हो। तुममें उन जैसा संकल्प नहीं है, न उन जैसी मानवता है, और न ही वह दिल है जिससे वे सत्य के लिए लालायित थे और जिससे उन्होंने सत्य का अनुसरण किया। ये चीजें हासिल कर लेने के बाद ही परमेश्वर तुम्हें और ज्यादा प्रदान करेगा।

क्या तुममें अब सत्य का अनुसरण करने, सत्य को हासिल करने और परमेश्वर से उद्धार पाकर पूर्ण होने का संकल्प है? (हाँ।) तुम्हारा संकल्प कितना बड़ा है? तुम इसे कब तक कायम रख सकते हो? (अच्छी दशा में होने पर मुझमें संकल्प होता है, मगर मेरी धारणाओं और देह के हितों के विपरीत कुछ घटित होने पर या जब मुझे शोधन से गुजरना होता है या कुछ कठिनाइयाँ आती हैं, तो मैं निराशा की दशा में फँस जाता हूँ और शुरू में जो आस्था और संकल्प मुझमें था वह धीरे-धीरे गायब होने लगता है।) ऐसे काम नहीं चलेगा। तुम बहुत कमजोर हो। तुम्हें ऐसे स्थान पर पहुँचना होगा जहाँ तुम्हारा सामना चाहे किसी भी परिस्थिति से हो, तुम्हारा संकल्प न बदलने पाए। तभी तुम ऐसे व्यक्ति बनोगे जो सचमुच सत्य से प्रेम करता है और सत्य का अनुसरण करता है। अगर अपने साथ कोई चीज घटित होने या किसी कठिनाई का सामना होने पर तुम पीछे हट जाते हो, नकारात्मक और खिन्न हो जाते हो और अपना संकल्प छोड़ देते हो तो यह नहीं चलेगा। तुममें ऐसा संकल्प होना चाहिए कि तुम अपनी जान खतरे में डाल सको और यह कहो, “चाहे कुछ भी हो जाए—भले ही इसका मतलब यह हो कि मैं मर जाऊँगा तो भी सत्य का या सत्य के अनुसरण के अपने लक्ष्य का त्याग नहीं करूँगा।” फिर तुम्हें कोई भी कठिनाई रोक नहीं पाएगी। अगर सचमुच तुम्हारा कठिनाइयों से सामना होता है और तुम असहाय हो जाते हो तो परमेश्वर अपना कार्य करेगा। इसके अलावा, तुम्हें यह समझ होनी चाहिए : “मेरा सामना चाहे किसी भी चीज से हो, ये सब वो सबक हैं जो मुझे सत्य के अनुसरण में सीखने चाहिए—इनकी व्यवस्था परमेश्वर ने की है। मैं कमजोर हो सकता हूँ, मगर निराश नहीं हूँ और मैं ये सबक सीखने का मौका देने के लिए परमेश्वर का आभारी हूँ। मैं परमेश्वर का आभारी हूँ कि उसने मेरे लिए यह स्थिति बनाई है। मैं परमेश्वर का अनुसरण करने और सत्य प्राप्त करने का अपना संकल्प त्याग नहीं सकता। अगर मुझे इसे त्यागना पड़ा तो यह शैतान से हार मानने जैसा होगा, खुद को बर्बाद करना और परमेश्वर को धोखा देना होगा।” तुम्हें ऐसा संकल्प रखना होगा। जिन भी छोटे-छोटे मामलों से तुम्हारा सामना होता है, ये सब तुम्हारे जीवन के विकास के क्रम में छोटे-छोटे किस्से हैं। इन्हें तुम्हारी तरक्की की दिशा अवरुद्ध करने का अवसर नहीं देना चाहिए। कठिनाइयाँ आने पर तुम तलाश और प्रतीक्षा कर सकते हो, मगर तुम्हारी तरक्की की दिशा नहीं बदलनी चाहिए, क्या यह सही नहीं है? (सही है।) दूसरे जो भी कहें, या तुमसे जैसे भी पेश आएँ, और परमेश्वर तुमसे जैसे भी पेश आए, तुम्हारा संकल्प नहीं बदलना चाहिए। अगर परमेश्वर कहे, “तुम सत्य बिल्कुल स्वीकार नहीं करते, मैं तुमसे घृणा करता हूँ,” और तुम कहो, “परमेश्वर मुझसे घृणा करता है, तो मेरे जीवन का क्या अर्थ रह गया है? मैं मर जाऊँ और इन सबसे छूट जाऊँ, यही ठीक रहेगा!” तो तुम परमेश्वर को गलत समझ रहे होगे। यह सही है कि परमेश्वर तुमसे घृणा करता है, मगर तुम्हें लड़ते रहना चाहिए, सत्य स्वीकारना चाहिए, और अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। तब तुम एक बेकार इंसान नहीं रहोगे और परमेश्वर तुम्हें तिरस्कृत नहीं करेगा। फिलहाल, तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है और तुमने अभी वे मापदंड हासिल नहीं किए हैं जो परमेश्वर द्वारा तुम्हारा परीक्षण करने के लिए जरूरी हैं। वह एकमात्र चीज क्या है जो तुम कर सकते हो? तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए : “हे परमेश्वर, मुझे रास्ता दिखाओ, प्रबुद्ध करो, ताकि मैं तुम्हारे इरादे समझ सकूँ और सत्य के अनुसरण के मार्ग पर चलने की आस्था और दृढ़ता पा सकूँ, ताकि मैं परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रहूँ। हालाँकि मैं कमजोर हूँ, मेरा आध्यात्मिक कद अपरिपक्व है, फिर भी मैं तुमसे मुझे शक्ति देने और मेरी रक्षा करने की प्रार्थना करता हूँ, ताकि मैं अंत तक तुम्हारा अनुसरण कर सकूँ।” तुम्हें अक्सर परमेश्वर के सामने आकर प्रार्थना करनी चाहिए। दूसरे लोग सांसारिक चीजों की लालसा रख सकते हैं, देह-सुख में लिप्त रह सकते हैं, और सांसारिक प्रवृत्तियों के पीछे भाग सकते हैं, लेकिन तुम्हें उनके साथ नहीं रहना चाहिए—बस अपना कर्तव्य निभाने पर ध्यान देना चाहिए। जब दूसरे निराशा महसूस करें और अपना कर्तव्य न निभाएँ, तो तुम्हें बेबस नहीं होना चाहिए, और तुम्हें उनकी मदद के लिए सत्य खोजना चाहिए। जब दूसरे ऐशो-आराम में लिप्त हों, तो तुम्हें उनसे ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, तुम्हें सिर्फ परमेश्वर के सामने जीने की चिंता करनी चाहिए। जब दूसरे लोग शोहरत, लाभ और रुतबे के पीछे भागें, तो तुम्हें उनके लिए प्रार्थना कर उनकी मदद करनी चाहिए, परमेश्वर के सामने शांतचित्त रहना चाहिए और इन चीजों को अपने ऊपर प्रभाव डालने नहीं देना चाहिए। तुम्हारे इर्द-गिर्द जो भी घटे, तुम्हें परमेश्वर से हर चीज के बारे में प्रार्थना करनी चाहिए। तुम्हें हमेशा सत्य खोजना चाहिए, खुद को संयम में रखना चाहिए, सुनिश्चित करना चाहिए कि तुम परमेश्वर की मौजूदगी में जी रहे हो, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है। परमेश्वर लोगों की हमेशा पड़ताल करता रहता है, और पवित्र आत्मा ऐसे लोगों के भीतर काम करता है। परमेश्वर किसी व्यक्ति के दिल की पड़ताल कैसे करता है? न केवल वह अपनी नजरों से देखता है, बल्कि तुम्हारे लिए वातावरण व्यवस्थित करता है और अपने हाथों से तुम्हारे दिल को छूता है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? इसलिए कि जब परमेश्वर तुम्हारे लिए एक वातावरण व्यवस्थित करता है, तो देखता है कि क्या तुम उससे नाखुश हो और उससे घृणा करते हो, या उसे पसंद कर उसके प्रति समर्पित हो जाते हो, क्या तुम निष्क्रियता से प्रतीक्षा करते हो या सक्रियता से सत्य खोजते हो। परमेश्वर देखता है कि तुम्हारा दिल और सोच कैसे बदलते हैं, और किस दिशा में विकसित हो रहे हैं। तुम्हारे दिल की दशा कभी-कभी सकारात्मक होती है, और कभी-कभी नकारात्मक। अगर तुम सत्य स्वीकार सकते हो तो तुम परमेश्वर से वे लोग, घटनाएँ, चीजें और विविध परिवेश स्वीकार कर सकोगे जिनका इंतजाम वह तुम्हारे लिए करता है और तुम उनसे सही ढंग से निपट सकोगे। परमेश्वर के वचन पढ़ने से और सोच-विचार से तुम्हारी सारी सोच और सारे विचार, सारी राय, और तमाम मनःस्थितियाँ उसके वचनों के आधार पर बदल जाएँगी। तुम्हारे मन में इस बारे में स्पष्टता आएगी, और परमेश्वर इन सबकी भी पड़ताल करेगा। हालाँकि तुमने इस बारे में किसी से बात नहीं की होगी, या इस बारे में प्रार्थना नहीं की होगी, और तुमने सिर्फ तुम्हारे दिल और दुनिया में ही सोचा होगा, मगर परमेश्वर के नजरिए में यह पहले ही स्पष्ट हो चुका होगा—उसके लिए यह जाहिर होगा। लोग तुम्हें अपनी नजरों से देखते हैं, मगर परमेश्वर अपने दिल से तुम्हारे दिल को छूता है, वह तुम्हारे इतना करीब है। अगर तुम परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को महसूस कर सकते हो, तो तुम परमेश्वर की मौजूदगी में जी रहे हो। अगर तुम उसकी जाँच-पड़ताल को जरा भी महसूस नहीं कर रहे हो, अपनी ही दुनिया में जी रहे हो, और अपनी ही भावनाओं और भ्रष्ट स्वभाव के साथ जी रहे हो, तो तुम मुसीबत में हो। अगर तुम परमेश्वर की मौजूदगी में नहीं जीते, अगर तुम्हारे और परमेश्वर के बीच एक बड़ी खाई है, और तुम उससे बहुत दूर हो, अगर तुम उसके इरादों का जरा भी ख्याल नहीं रखते, और तुम परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं करते, तो परमेश्वर यह सब जान लेगा। इसे भाँप लेना उसके लिए बहुत आसान होगा। इसलिए, जब तुममें संकल्प और एक लक्ष्य होगा, तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने और एक ऐसा व्यक्ति बनने को तैयार हो जाओगे जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलता है, उसका भय मानता है और बुराई से दूर रहता है, जब तुम्हारे मन में यह संकल्प होगा, और तुम इन चीजों के लिए अक्सर प्रार्थना और विनती कर सकोगे, और हमेशा परमेश्वर से दूरी बनाए बिना या उसे छोड़े बिना, परमेश्वर की मौजूदगी में रह सकोगे, तब तुम्हारे मन में इन चीजों के बारे में स्पष्टता होगी, और परमेश्वर भी ये सब जानता है। कुछ लोग कहते हैं, “मैं स्वयं इस बारे में स्पष्ट हूँ, लेकिन परमेश्वर को यह मालूम है या नहीं?” यह प्रश्न अवैध है। अगर तुम यह कहते हो, तो साबित होता है कि तुमने कभी भी परमेश्वर से संगति नहीं की है, और तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई भी संबंध नहीं है। मैं क्यों कहता हूँ कि तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई संबंध नहीं है? तुमने परमेश्वर के सामने जीवन नहीं जिया है, और इसलिए तुम भाँप नहीं सकते कि वह तुम्हारे साथ है या नहीं, वह तुम्हें रास्ता दिखाता है या नहीं, तुम्हारी रक्षा करता है या नहीं, और तुम्हारे कुछ गलत करने पर वह तुम्हें फटकारता है या नहीं। अगर तुम्हें इन तमाम चीजों का अंदाजा नहीं है, तो तुम परमेश्वर के सामने नहीं रहते, तुम बस इसकी कल्पना कर रहे हो और अपने आप में मगन हो—तुम अपनी ही दुनिया में जी रहे हो, परमेश्वर के सामने नहीं, और तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई भी संबंध नहीं है।

लोग परमेश्वर से सामान्य संबंध कैसे कायम रख सकते हैं? इसे कायम रखना किस पर निर्भर करता है? यह परमेश्वर से दिल से विनती और प्रार्थना करने और उससे संवाद करने पर निर्भर करता है। इस प्रकार के संबंध से लोग हमेशा परमेश्वर के सामने जी पाते हैं। इसलिए, परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करने के लिए लोगों को पहले शांत रहना चाहिए। कुछ लोग हमेशा बाहर कुछ-न-कुछ करते रहते हैं, और सिर्फ बाहरी मामलों में उलझे रहते हैं। वे अगर एक-दो दिन आध्यात्मिक जीवन न जिएँ, तो भी वे जान नहीं पाएँगे। तीन-चार दिन या एक-दो महीने बाद भी वे जान नहीं पाएँगे, क्योंकि उन्होंने प्रार्थना या विनती नहीं की है, परमेश्वर के साथ संगति नहीं की है। विनती तब की जाती है जब तुम्हारे साथ कुछ घट जाए, और तुम चाहो कि परमेश्वर तुम्हारी मदद करे, तुम्हें रास्ता दिखाए, तुम्हारे लिए प्रावधान करे, तुम्हें प्रबुद्ध करे, तुम्हें समझाए कि उसके इरादे क्या हैं, तुम्हें बताए कि सत्य क्या है, तुम्हें समझाए कि सत्य सिद्धांत क्या हैं, और तुम्हें यह बताए कि सत्य का अभ्यास कैसे करें—ऐसी विनती ही परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होती है। प्रार्थना का दायरा अपेक्षाकृत बड़ा होता है। कभी-कभी तुम अपने मन की बातें बता सकते हो—कठिनाइयों ने घेर लिया हो, या जब तुम निराशा और कमजोरी महसूस कर रहे हो, तुम परमेश्वर के साथ दिल से इनके बारे में बातें कर सकते हो; तुम परमेश्वर से उस वक्त भी प्रार्थना कर सकते हो जब तुम विद्रोही हो, या रोजमर्रा की अपनी उन समस्याओं के बारे में बात कर सकते हो, जिन्हें तुम समझ पा रहे हो और उनके बारे में भी जिन्हें तुम समझ नहीं पा रहे हो—इसे प्रार्थना कहते हैं। प्रार्थना परमेश्वर से अपने दिल की बात करना है, या परमेश्वर से सत्य तलाशना है। कभी-कभी यह एक नियत समय पर की जाती है, कभी-कभी इसका कोई नियत समय नहीं होता; तुम कभी भी कहीं भी प्रार्थना कर सकते हो। आत्मा से संगति का कोई आकार, कोई रूप नहीं होता : हो सकता है कि कोई बात तुम्हें परेशान कर रही हो या नहीं भी कर रही हो, हो सकता है कि तुम कुछ कहना चाहते हो या नहीं भी कहना चाहते हो। जब तुम्हें कोई बात परेशान कर रही हो, तो तुम्हें परमेश्वर से इस बारे में बात करके प्रार्थना करनी चाहिए। आम तौर पर तुम्हें ऐसे सवालों पर सोच-विचार करने की कोशिश करनी चाहिए जैसे कि परमेश्वर मनुष्य से प्रेम कैसे करता है, वह मनुष्य के बारे में कैसे चिंता करता है, वह मनुष्य की काट-छाँट क्यों करता है, परमेश्वर के समक्ष समर्पण करने का वास्तव में अर्थ क्या है, इत्यादि; हर समय हर जगह परमेश्वर से संवाद करने, परमेश्वर से प्रार्थना करने, और उससे कुछ जानने की कोशिश करनी चाहिए। यह आत्मा से संगति या संक्षेप में “आत्मिक संगति” है। कभी-कभी सड़क पर चलते हुए तुम्हें ऐसा कोई विचार आ सकता है जो तुम्हें बहुत परेशान कर देता है; तुम्हें झुकने या आँखें बंद करने की जरूरत नहीं है। तुम बस अपने मन में परमेश्वर से बात कर सकते हो, “हे परमेश्वर, मुझ पर यह मुसीबत आ पड़ी है और मुझे इससे निपटना नहीं आता, मुझे इस मामले में तुम्हारा मार्गदर्शन चाहिए।” जब तुम्हारे दिल के भीतर कोई हल्की-सी हलचल हो, और तुम इस बारे में परमेश्वर से कुछ दिल को छूने वाली बातें कहो, तो वह जान जाएगा। कभी-कभी तुम्हें घर की बहुत याद आ रही है, और तुम कहते हो, “हे परमेश्वर, मुझे घर की याद आ रही है।” तो तुम नहीं बताते कि विशेष रूप से तुम्हें किसकी याद सता रही है, बस इतना ही कि तुम दुखी हो, और परमेश्वर को इस बारे में बता रहे हो। तुम अपनी समस्याएँ तभी सुलझा सकते हो जब परमेश्वर से प्रार्थना करो और उसे बताओ कि तुम्हारे दिल में क्या है। क्या किसी दूसरे व्यक्ति से बात करके तुम अपनी समस्याएँ सुलझा सकते हो? सत्य समझने वाले किसी व्यक्ति से मिलना उतना बुरा नहीं होगा—न सिर्फ तुम अपनी समस्याएँ सुलझा पाओगे, बल्कि इससे तुम्हें लाभ भी होगा। लेकिन अगर तुम किसी ऐसे इंसान से मिलोगे जो सत्य नहीं समझता, तो तुम अपनी समस्याएँ नहीं सुलझा सकोगे, और इसका उस पर भी प्रभाव पड़ सकता है। अगर तुम परमेश्वर से बात करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें सुकून पहुँचाएगा और प्रभावित करेगा। अगर तुम परमेश्वर के सामने शांतचित्त बैठकर उसके वचन पढ़ सको, और फिर सोच-विचार कर प्रार्थना कर सको, तो तुम सत्य को समझ कर अपनी समस्याएँ सुलझा सकते हो। परमेश्वर के वचनों से तुम्हें अपनी कठिनाइयों से पार पाने का रास्ता ढूँढ़ने में मदद मिल सकती है, और जब तुम इस छोटी-सी बाधा को पार कर जाओगे, तो तुम लड़खड़ाओगे नहीं, बेबस नहीं होगे, न ही यह तुम्हारे कर्तव्य के निर्वाह को प्रभावित करेगा। कभी-कभी ऐसे पल आएँगे जब तुम अचानक महसूस करोगे कि तुम्हारी आत्मा डूब रही है और तुम थोड़े अंधकार में हो। ऐसा होने पर, तुम्हें फौरन परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए, और उसके करीब जाना चाहिए, यानी तुम्हारे दिल में क्या है यह उसे बताना चाहिए, और हर समय हर जगह उसे अपने मन की बात बतानी चाहिए। इस तरह तुम्हारी दशा ठीक हो सकती है। तुममें आस्था होनी चाहिए : “हर पल परमेश्वर मेरे साथ है, उसने मुझे कभी नहीं छोड़ा है, मैं महसूस कर सकता हूँ। मैं कहीं भी रहूँ, कुछ भी करूँ—चाहे मैं किसी सभा में शामिल होऊँ, या अपना कर्तव्य निभा रहा होऊँ—मैं दिल से जानता हूँ कि परमेश्वर मेरा हाथ थाम कर मेरी अगुआई कर रहा है, और उसने मुझे कभी नहीं छोड़ा।” कभी-कभी जब तुम याद करते हो कि इतने सालों से तुमने इस तरह हर दिन कैसे गुजारा है, तो तुम्हें महसूस होगा कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद ऊँचा हुआ है, परमेश्वर तुम्हारा मार्गदर्शन करता रहा है, और परमेश्वर का प्रेम हमेशा तुम्हारी रक्षा करता रहा है। ये बातें सोचते हुए तुम अपने मन में प्रार्थना करोगे, परमेश्वर को धन्यवाद कहोगे : “हे परमेश्वर, तुम्हारा धन्यवाद! मैं बहुत कमजोर, दब्बू, और बहुत ज्यादा भ्रष्ट हूँ। अगर मुझे तुम्हारा मार्गदर्शन नहीं मिला होता, तो मैं अपने-आप इस मुकाम पर नहीं पहुँच पाया होता।” क्या यह आत्मिक संगति नहीं है? अगर लोग इस प्रकार परमेश्वर के साथ अक्सर संगति कर सकें, तो क्या उनके पास परमेश्वर से कहने को बहुत कुछ नहीं होगा? ऐसे ज्यादा दिन नहीं जाएँगे जब वे परमेश्वर से एक भी बात न कह सकें। तुम्हारे पास परमेश्वर से कहने को कुछ भी नहीं है, तो परमेश्वर तुम्हारे दिल से अनुपस्थित है। अगर परमेश्वर तुम्हारे दिल में है, और तुम परमेश्वर में आस्था रखते हो, तो तुम अपने मन की सारी बातें उससे कह सकते हो, वो सब भी जो तुम अपने विश्वासपात्रों से कहोगे। दरअसल परमेश्वर तुम्हारा सबसे करीबी विश्वासपात्र है। अगर तुम परमेश्वर से एक करीबी विश्वासपात्र की तरह पेश आओ, सबसे भरोसेमंद, सबसे अधिक विश्वसनीय और सबसे घनिष्ठ परिवार के सदस्य की तरह जिस पर तुम सबसे ज्यादा निर्भर हो, तो परमेश्वर से कहने के लिए कुछ भी नहीं होना नामुमकिन है। अगर तुम्हारे पास परमेश्वर से कहने के लिए हमेशा कुछ है, तो क्या तुम हमेशा उसकी मौजूदगी में नहीं रहोगे? अगर तुम हमेशा परमेश्वर की मौजूदगी में रहोगे, तो तुम्हें हर पल यह एहसास होगा कि परमेश्वर कैसे तुम्हारा प्रबोधन और मार्गदर्शन करता है, कैसे तुम्हारी परवाह और रक्षा करता है, और तुम्हें शांति और खुशी देता है, कैसे वह तुम्हें आशीष देता है, और कैसे वह तुम्हें फटकारता है, अनुशासित करता है, संयत करता है, न्याय कर तुम्हें ताड़ना देता है। यह सब तुम्हें स्पष्ट और प्रत्यक्ष नजर आएगा। अगर तुम हर दिन जैसे-तैसे गुजारोगे, सिर्फ बातों से परमेश्वर में विश्वास रखोगे, परमेश्वर को दिल में नहीं बसाओगे, बाहर से ही अपना कर्तव्य निभाओगे और सभाओं में शामिल होओगे, हर दिन परमेश्वर के वचन पढ़ोगे और प्रार्थना करोगे, इन सबमें केवल औपचारिकता निभाओगे तो यह परमेश्वर में विश्वास नहीं है—तुम्हारे इन धार्मिक अनुष्ठानों में से एक का भी सत्य के साथ कोई संबंध नहीं है। परमेश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों को हर दिन परमेश्वर के वचनों का एक अंश पूरे ध्यान से पढ़ना चाहिए, और इन वचनों के दायरे में प्रार्थना कर संगति करनी चाहिए। हर दिन परमेश्वर के वचनों से थोड़ी रोशनी पानी चाहिए, और थोड़ा सत्य समझना चाहिए। विशेष रूप से उन्हें अपना कर्तव्य निभाते समय सत्य खोजने और मामलों को सिद्धांतों के अनुसार सँभालने में सक्षम होना चाहिए, और हर दिन जीवन अनुभव प्राप्त करने और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में समर्थ होना चाहिए। ऐसा ही व्यक्ति सच्चा विश्वासी और परमेश्वर का अनुसरण करने वाला होता है।

परमेश्वर की आस्था में सबसे अहम मसला कौन-सा है, जिसका समाधान सबसे ज्यादा जरूरी है? यह परमेश्वर के साथ तुम्हारे सामान्य संबंध का मसला है। अगर तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, मगर वह तुम्हारे दिल में बसा हुआ नहीं है, तुमने उसके साथ अपना संबंध तोड़ लिया है, और तुम परमेश्वर को अपना सबसे घनिष्ठ, सबसे भरोसेमंद और सबसे करीबी परिवार का सदस्य और विश्वासपात्र नहीं समझते, तो परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर नहीं है। मेरे कथनों के अनुसार कुछ समय तक अभ्यास करके देखो कि क्या तुम लोगों की आंतरिक दशा में बदलाव आया है। मेरे कथनों के अनुसार अभ्यास करके तुम सुनिश्चित कर सकते हो कि तुम परमेश्वर की मौजूदगी में जी रहे हो, तुम्हारी अवस्था और दशा सामान्य है। जब किसी व्यक्ति की दशा सामान्य होती है, और वह अपने जीवन अनुभव के सभी चरणों में सामने आने वाले किसी भी व्यक्ति, घटनाओं, चीजों या विभिन्न परिवेशों से प्रभावित न होता हो, और अपना कर्तव्य सामान्य रूप से निभाते रहने में समर्थ हो, तो उसका आध्यात्मिक कद सच्चा है, और वह ऐसा व्यक्ति है जो सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर चुका है।

13 जुलाई 2017

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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