सृजित प्राणी का कर्तव्य उचित ढंग से निभाने में ही जीने का मूल्य है (भाग एक)

आज तुम सभी लोग अपने कर्तव्य निभाने में व्यस्त हो, परमेश्वर के वचनों और अंत के दिनों के उसके कार्य का प्रसार करने और गवाही देने का प्रशिक्षण ले रहे हो। परमेश्वर की गवाही देने के लिए चाहे फिल्में बनाना हो या भजन गाना, तुम लोग जो कर्तव्य निभाते हो क्या वे भ्रष्ट मानवजाति के लिए मूल्यवान हैं? (हैं।) उनका मूल्य कहाँ निहित है? उनका मूल्य परमेश्वर द्वारा व्यक्त इन वचनों और सत्यों को देखने के बाद लोगों को सही मार्ग पर चलने में मदद करने में और लोगों को यह समझने में मदद करने में निहित है कि वे सृजित प्राणियों में से एक हैं, और उन्हें सृष्टिकर्ता के समक्ष आना चाहिए। बहुत-से लोग जिन चीजों का सामना करते हैं उनमें से कई चीजों की असलियत जानने या इन्हें समझने में असमर्थ होते हैं। वे असहाय महसूस करते हैं और उन्हें जीवन निरर्थक और खोखला लगता है, उनके पास कोई आध्यात्मिक पोषण नहीं होता। इस सबका स्रोत क्या है? इन सबका उत्तर परमेश्वर के वचनों में निहित है। जब से तुम लोगों ने परमेश्वर में विश्वास किया है, तुम सभी ने उसके वचनों को बहुत पढ़ा है और तुमने कुछ सत्यों को भी समझा है, तो तुम लोगों को जो कर्तव्य निभाना चाहिए वह है परमेश्वर के वचन का उपयोग करके इन लोगों को प्रबुद्ध बनाना और उनके गलत विचारों और दृष्टिकोणों को बदलने में मदद करना, उन्हें परमेश्वर के वचन के भीतर के सत्य को समझने और संसार के अँधेरे और बुराई की असलियत जानने में सक्षम बनाना, उन्हें सच्चा मार्ग खोजने, सृष्टिकर्ता को खोजने, परमेश्वर की वाणी सुनने, और उसके वचनों को पढ़ने में मदद करना। इससे वे कुछ सत्यों को समझ सकेंगे और परमेश्वर द्वारा किए जा रहे उद्धार-कार्य को देख पाएँगे, ताकि वे उसकी ओर मुड़कर उसके कार्य को स्वीकार सकें। यही वह कर्तव्य है जो तुम लोगों को निभाना चाहिए। तुम सबका दिल जानता है कि परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद से तुमने कितने सत्यों को समझा है और कितनी समस्याओं का समाधान किया है। आजकल, धर्मावलंबी और अविश्वासी दोनों तरह के बहुत-से लोग सच्चा मार्ग खोज रहे हैं और उद्धारकर्ता की तलाश में हैं। वे विशिष्ट प्रश्नों के उत्तर नहीं जानते, जैसे कि लोग क्यों जीते और मरते हैं, किसी व्यक्ति के जीवन का मूल्य और अर्थ क्या है, या लोग कहाँ से आते हैं और कहाँ जा रहे हैं। वे तुम लोगों के इंतजार में हैं, ताकि तुम सुसमाचार का प्रचार करते हुए और परमेश्वर के लिए गवाही देते हुए, उन्हें सृष्टिकर्ता के समक्ष ले जाओ—यही कारण है कि आज जो कर्तव्य तुम लोग निभा रहे हो वे बहुत अर्थपूर्ण हैं! एक ओर तुम खुद परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर रहे हो, वहीं दूसरी ओर तुम दूसरों को भी परमेश्वर के कार्य के बारे में गवाही दे रहे हो। जितना अधिक तुम लोग इसका अनुभव करोगे, तुम्हें उतने ही अधिक सत्यों को समझने और उनसे सुसज्जित होने की जरूरत होगी, और तुम्हें उतना ही अधिक कार्य भी करना होगा। यह परमेश्वर के लिए लोगों को पूर्ण बनाने का एक बेहतरीन अवसर है। अपने कर्तव्य निभाते समय चाहे किसी भी कठिनाई का सामना करना पड़े, तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना कर उसकी ओर देखना चाहिए; जब सभी लोग परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं और मिलकर सत्य की खोज अधिक करते हैं, तो ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसे हल न किया जा सके। परमेश्वर के वचनों में ऐसे बहुत-से सत्य हैं जिन्हें तुम लोगों को समझना है, इसलिए तुम्हें उन पर अक्सर विचार और संगति करनी चाहिए, तभी तुम्हें पवित्र आत्मा का प्रबोधन और रोशनी मिलेगी। ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसका समाधान परमेश्वर पर भरोसा करके न किया जा सके, तुम लोगों की यह आस्था होनी चाहिए।

परमेश्वर ने इस मानवजाति को बनाने के बाद एक प्रबंधन योजना बनाई। पिछले कुछ हजार वर्षों में इस मानवजाति ने सृष्टिकर्ता के लिए गवाही देने के लिए कोई बड़ी जिम्मेदारी या आदेश अपने कंधों पर नहीं लिया है, और परमेश्वर ने मानवजाति के बीच जो कार्य किया वह अपेक्षाकृत छिपा हुआ और सरल था। लेकिन अंत के दिनों में चीजें पहले जैसी नहीं हैं। सृष्टिकर्ता ने वचन बोलने शुरू कर दिए हैं। वह बहुत सारे सत्य व्यक्त कर चुका है और परमेश्वर की प्रबंधन योजना के सारे रहस्यों का खुलासा कर चुका है, लेकिन भ्रष्ट मानवजाति मंदबुद्धि और सुन्न है : वे देखते हैं लेकिन जानते नहीं हैं, वे सुनते हैं लेकिन समझते नहीं हैं, मानो उनके मन पर अज्ञानता की परत चढ़ी हुई हो। इसलिए तुम सब लोगों पर एक बड़ी जिम्मेदारी है! इसमें इतनी बड़ी बात क्या है? परमेश्वर द्वारा व्यक्त इन वचनों और सत्यों का प्रसार करने के अलावा यह बात अभी और भी महत्वपूर्ण है कि तुम हरेक सृजित प्राणी को सृष्टिकर्ता की गवाही दो और परमेश्वर का सुसमाचार सुन चुके सभी सृजित प्राणियों को सृष्टिकर्ता के समक्ष लेकर आओ, ताकि वे परमेश्वर द्वारा मानवजाति की रचना के महत्व को समझ सकें और यह समझ सकें कि सृजित प्राणी के रूप में उन्हें सृष्टिकर्ता के समक्ष लौटना चाहिए, उसके कथन सुनने चाहिए और उसके द्वारा व्यक्त सभी सत्य स्वीकारने चाहिए। इस प्रकार सभी मनुष्यों को सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कराया जा सकता है। क्या उन्हें परमेश्वर के वचनों के बस कुछ अंश पढ़कर सुनाकर या बस कुछ भजन गाना सिखाकर या बस सत्य के एक पहलू पर संगति करके ये नतीजे हासिल करना मुमकिन है? नहीं। इसलिए यदि तुम लोगों को अपने कर्तव्य भली-भाँति निभाने हैं तो तुम्हें विभिन्न तरीकों और विभिन्न रूपों का उपयोग कर सृष्टिकर्ता के क्रियाकलापों और उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं की गवाही देनी चाहिए। इस तरीके से तुम अधिक लोगों को सृष्टिकर्ता के समक्ष लाने में सक्षम रहोगे ताकि वे उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं को स्वीकार कर सकें और इनके प्रति समर्पण कर सकें। क्या यह एक बड़ी जिम्मेदारी नहीं है? (है।) तो फिर तुम लोगों को अपने कर्तव्यों के प्रति कैसा रवैया अपनाना चाहिए? क्या भ्रमित स्थिति में रहना ठीक है? क्या चीजों से आँखें मूँद लेना ठीक है? क्या अपनी ऊर्जा का सिर्फ 50 प्रतिशत इस्तेमाल करना और अनमना रहना ठीक है? क्या टालमटोल करना और चीजों को लेकर लापरवाही करना ठीक है? (नहीं।) तो फिर क्या करना चाहिए? (पूरा दिल लगाना चाहिए।) तुम्हारे पास जितनी भी ऊर्जा, अनुभव और अंतर्दृष्टि है, उसका उपयोग करते हुए, तुम्हें पूरे दिल से काम करना चाहिए। अविश्वासियों को यह समझ नहीं आता कि कोई व्यक्ति अपने जीवन में सबसे सार्थक काम क्या कर सकता है, लेकिन तुम लोग तो इस बारे में थोड़ा-बहुत समझते हो, है ना? (हाँ।) परमेश्वर का आदेश स्वीकारना और अपना लक्ष्य पूरा करना—ये सबसे महत्वपूर्ण चीजें हैं। आज तुम लोग जो कर्तव्य निभा रहे हो वे मूल्यवान हैं! हो सकता है कि तुम्हें फिलहाल उनके नतीजे दिखाई न दें, यह भी हो सकता है कि तुम्हें फिलहाल उनके बड़े प्रभाव न दिखें, लेकिन उनका फल मिलने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। यदि यह काम अच्छी तरह कर लिया गया तो लंबे समय में मानवजाति के लिए इसके योगदान को पैसों से मापना असंभव होगा। ऐसी सच्ची गवाहियाँ किसी भी अन्य चीज से अधिक कीमती और मूल्यवान हैं और वे अनंत काल तक बनी रहेंगी। ये परमेश्वर का अनुसरण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के अच्छे कर्म हैं, और ये याद रखने योग्य हैं। परमेश्वर में विश्वास रखने, सत्य का अनुसरण करने और सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य पूरा करने के अलावा मनुष्य के जीवन में सब कुछ खोखला है और याद न रखने योग्य है। भले ही तुमने धरती को हिला देने वाला कारनामा किया हो, भले ही तुम अंतरिक्ष में गए हो और चंद्रमा तक जा चुके हो; भले ही तुमने ऐसी वैज्ञानिक प्रगति की हो जिससे मानवजाति को कुछ लाभ या मदद मिली हो, इनका कोई मूल्य नहीं है और ये सभी चीजें नष्ट हो जाएँगी। ऐसी एकमात्र चीज कौन-सी है जो कभी नष्ट नहीं होगी? (परमेश्वर के वचन।) केवल परमेश्वर के वचन, परमेश्वर की गवाहियाँ, वे सभी गवाहियाँ और कार्य जो सृष्टिकर्ता की गवाही देते हैं और लोगों के अच्छे कर्म नष्ट नहीं होंगे। ये चीजें हमेशा रहेंगी और ये बहुत मूल्यवान हैं। इसलिए अपनी सभी सीमाएँ तोड़ दो, इस महान प्रयास को अंजाम दो और खुद को किसी भी व्यक्ति, घटनाओं और चीजों से बाधित मत होने दो; ईमानदारी से खुद को परमेश्वर के लिए खपाओ, और अपनी सारी ऊर्जा और हृदय का रक्त अपने कर्तव्य निभाने में लगाओ। यही वह चीज है जिसे परमेश्वर सबसे अधिक आशीष देता है और इसके लिए किसी भी हद तक कष्ट उठाना सार्थक है!

आज तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, उसके वचन सुनते हो और सृष्टिकर्ता का आदेश स्वीकारते हो। कभी-कभी यह थोड़ा कठिन और थकाऊ होता है और कभी-कभी तुम्हारा थोड़ा अपमान और शोधन होता है; लेकिन ये अच्छी चीजें हैं, न कि खराब चीजें। अंत में तुम्हें क्या हासिल होगा? तुम्हें सत्य और जीवन प्राप्त होगा और आखिरकार तुम्हें सृष्टिकर्ता की मान्यता और स्वीकृति मिलेगी। परमेश्वर कहता है, “तुम मेरा अनुसरण करो और मैं तुम्हें कृपा की दृष्टि से देखता हूँ और तुमसे प्रसन्न हूँ।” यदि परमेश्वर इसके अलावा कुछ नहीं कहता कि तुम उसकी नजरों में एक सृजित प्राणी हो तो तुम व्यर्थ में नहीं जी रहे हो और तुम उपयोगी हो। परमेश्वर से स्वीकृति पाना अद्भुत है और यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। यदि लोग शैतान का अनुसरण करेंगे तो उन्हें क्या हासिल होगा? (विनाश।) लोगों का विनाश होने से पहले वे क्या बन जाएँगे? (वे राक्षस बन जाएँगे।) वे लोग राक्षस बन जाएँगे। लोग चाहे कितने भी कौशल हासिल कर लें, कितने भी पैसे कमा लें, उन्हें कितनी भी शोहरत और लाभ मिल जाए, वे कितने भी सांसारिक सुखों का आनंद उठाएँ, या लौकिक संसार में उनका दर्जा चाहे कितना भी ऊँचा हो, अंदर से वे अधिक से अधिक भ्रष्ट, अधिक से अधिक दुष्ट और गंदे, और अधिक से अधिक विद्रोही और पाखंडी बन जाएँगे और आखिरकार वे जीते-जागते राक्षस बन जाएँगे—वे अमानुष बन जाएँगे। ऐसे लोग सृष्टिकर्ता की नजरों में कैसे माने जाते हैं? बस “अमानुष,” और कुछ नहीं? ऐसे व्यक्ति के प्रति सृष्टिकर्ता का दृष्टिकोण और रवैया क्या है? यह विमुखता, घृणा, बेइंतहा नफरत, परित्याग और आखिरकार अभिशाप, दंड और विनाश का दृष्टिकोण और रवैया है। लोग अलग-अलग मार्ग पर चलते हैं और अंत में अलग-अलग परिणाम पाते हैं। तुम लोग कौन-सा मार्ग चुनते हो? (परमेश्वर में विश्वास और उसका अनुसरण करने का मार्ग।) परमेश्वर का अनुसरण करने का विकल्प चुनना सही मार्ग चुनना है : यह रोशनी के मार्ग पर चलना है। यदि लोग एक उपयोगी और सार्थक जीवन जीना चाहते हैं, साफ अंतरात्मा रखना चाहते हैं, और वास्तव में सृष्टिकर्ता के समक्ष और उसके करीब लौटना चाहते हैं, तो उन्हें पूरे दिल से खुद को समर्पित करना चाहिए, सृजित प्राणियों के रूप में अपने कर्तव्य निभाते हुए परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए और उसका गुणगान करना चाहिए—वे आधे-अधूरे मन से कार्य नहीं कर सकते। तुम्हें कहना चाहिए, “अपने जीवनकाल में और इस संसार में मैं अकूत धन-दौलत कमाने, बाकी सबसे अलग दिखने या अपने पूर्वजों को गर्वित करने, जनसाधारण के बीच श्रेष्ठ बनने या अपने बारे में ऊँचा सोचे जाने की उम्मीद नहीं करता हूँ—मैं इन चीजों के लिए नहीं लड़ूँगा। मैं उस मार्ग पर नहीं चलूँगा। मैं एक साधारण ढंग से परमेश्वर का अनुसरण करूँगा और अपना जीवन, अपनी ऊर्जा और अपनी सारी क्षमताएँ, गुण और प्रतिभाएँ अपना कर्तव्य निभाने में समर्पित कर दूँगा, मैं ये सारी चीजें परमेश्वर को समर्पित कर दूँगा। इस दौरान, भले ही दूसरे लोग मेरा तिरस्कार करें और कभी-कभी मेरे भाई-बहन मेरी काट-छाँट करें या मुझे गलत समझ बैठें; या यदि परमेश्वर मेरा शोधन करे या मेरा परीक्षण करे और मुझे बहुत कष्ट दे; या यदि मुझे इस जीवन में कोई दैहिक सुख न मिले और मैं खुद को अकेला या बिना देखरेख के पाऊँ—तो भी मुझे यह सब स्वीकार है और मैं अपना पूरा अस्तित्व परमेश्वर को समर्पित करता हूँ।” तुम्हारे पास यही संकल्प होना चाहिए! ऐसे संकल्प के साथ व्यक्ति बहुत सारी कठिनाइयों को सहन कर सकता है, लेकिन इसके बिना यदि किसी के पास केवल एक इच्छा है या वह अचानक उत्साहित हो जाता है, तो यह काम नहीं करेगा : इसमें कोई प्रेरणा नहीं है। अपने कर्तव्यों में व्यस्त होने पर कुछ लोग एक-दो वक्त का खाना-पीना छोड़ देते हैं और थोड़ी कम नींद लेते हैं, और जब उन्हें एहसास होता है कि वे अच्छे नहीं दिख रहे तो सोचते हैं, “यह काम नहीं कर रहा। चाहे मैं कितना भी व्यस्त क्यों न रहूँ, मुझे आराम करना होगा; मैं समय से पहले बूढ़ा नहीं हो सकता और इतनी कठिनाइयाँ नहीं सह सकता। अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखना जरूरी है।” इन विचारों के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है? वे परमेश्वर के इरादों के प्रति लापरवाह हैं। वे अपने कर्तव्य और परमेश्वर के आदेश की तुलना में शरीर को अधिक सँजोते हैं; जरा-सा कष्ट होने पर वे अनिच्छुक हो जाते हैं और कछुए की तरह अपना सिर वापस कवच में खींचकर शिकायत करने लगते हैं; वे उन चीजों के बारे में चिंता नहीं कर पाते जिनके बारे में परमेश्वर चिंता करता है, और वे उन चीजों के बारे में सोच नहीं पाते हैं जिनके बारे में परमेश्वर सोचता है, वे परमेश्वर के इरादों के प्रति लापरवाह होते हैं। यदि अगुआ कहता है कि कोई कार्य बहुत जरूरी है तो ऐसे लोग जवाब देंगे, “मैं उसकी बिल्कुल भी परवाह नहीं कर सकता और मैं असुविधा नहीं चाहता। मुझे इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है।” क्या ऐसे लोग होते हैं? (बिल्कुल, होते हैं।) ऐसे लोग स्वार्थी, नीच और विश्वासघाती होते हैं। वे चालें चलते हैं, वे भरोसेमंद नहीं होते और वे उनमें से नहीं हैं जो ईमानदारी से परमेश्वर को चाहते हैं। वे यह भी कहेंगे कि उन्होंने खुद को परमेश्वर के प्रति समर्पित कर दिया है, लेकिन ये केवल खोखले शब्द हैं—ये लोग किसी भी व्यावहारिक मामले को नहीं सँभालते, वे थोड़ी-सी भी कठिनाई नहीं सहते, या थोड़ी-सी भी कीमत नहीं चुकाते हैं। ऐसे लोगों से परमेश्वर प्रसन्न नहीं होता और उन्हें उसकी आशीष नहीं मिलती है। कुछ लोग अपने शरीर को थोड़ा-सा कष्ट होते ही अपने कर्तव्य निभाने से पीछे हट जाते हैं। खास तौर पर युवा लोग अपने रंग-रूप की बहुत परवाह करते हैं और जब वे देखते हैं कि उनके चेहरे मुरझाने लगे हैं, उनकी त्वचा अब चिकनी नहीं रही या उनके बाल पकने लगे हैं तो वे दुखी हो जाते हैं। वे हमेशा बूढ़े और बदसूरत होने, कोई साथी न ढूँढ़ पाने या अपना घर न बसा पाने को लेकर चिंतित रहते हैं। क्या ऐसे लोग सत्य प्राप्त कर सकते हैं? यह निर्धारित करने के लिए परमेश्वर के सिद्धांत क्या हैं कि लोग अपने कर्तव्य निर्वहन में कीमत चुकाने में सक्षम हैं और क्या वे अपने कर्तव्य मानक स्तर पर निभाते हैं? परमेश्वर बस लोगों की ईमानदारी देखना चाहता है। कभी-कभी लोग सोचते हैं, “मैं बस अपना दिल समर्पित कर दूँगा और यह काफी होगा,” लेकिन वे जरा-सा भी बदले बिना वही करते रहते हैं जो वे आम तौर पर करते हैं। परमेश्वर इस मामले को किस प्रकार देखता है? एक ओर परमेश्वर तुम्हारी आकांक्षाओं को देखेगा, वहीं दूसरी ओर वह तुम्हारे वास्तविक क्रियाकलापों को देखेगा। परमेश्वर इन चीजों की जाँच-पड़ताल करेगा। यदि तुम्हारे पास आकांक्षा और संकल्प है और तुम वास्तव में कीमत चुका सकते हो तो भले ही तुम कभी-कभी कमजोर पड़ जाओ, परमेश्वर देखेगा कि तुम्हारे दिल ने वास्तव में हार नहीं मानी है और यह ऊँचे स्तर की ओर बढ़ने की कोशिशों में जुटा है, और तुम सत्य, निष्पक्षता, धार्मिकता और सकारात्मक चीजों से प्रेम करते हो, और तब वह तुम्हारा त्याग नहीं करेगा। कुछ लोग बहुत अच्छा बोलते हैं, लेकिन उनके दिल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है; वे जरा भी सत्य का अभ्यास नहीं करते और केवल दूसरों को बेवकूफ बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं। उनके पास इस तरह से बोलने के अलावा और कोई चारा नहीं होता है, वे इसी तरह अपने आस-पास के लोगों के साथ अनमने होकर चीजें करते हैं। वे कुछ हद तक सम्मानित लग सकते हैं, लेकिन वास्तव में वे काम नहीं करना चाहते हैं। यदि वे काम करते भी हैं, तो वे जो कहते हैं उसे अमल में नहीं लाते हैं। इसके बजाय वे अपनी मनमर्जी के काम करते हैं, वही करते हैं जो उनके लिए अच्छा है और जिनसे उनकी रक्षा होती है। क्या उनकी कथनी-करनी में अंतर नहीं है? क्या परमेश्वर इस अंतर को देख सकता है? परमेश्वर इसकी पड़ताल करता है और वह इसे देखने में पूरी तरह सक्षम है। कुछ लोग कपटी होते हैं और छोटी-छोटी चालें चलते हैं। वे सोचते हैं कि परमेश्वर नहीं जानता, वह न तो परवाह करता है और न ही यह सब देखता है। क्या वाकई ऐसा है? परमेश्वर ईमानदार लोगों और छोटी-छोटी चालें चलने वालों के साथ कैसा व्यवहार करता है? क्या तुम लोग इन दोनों प्रकार के लोगों के प्रति परमेश्वर के व्यवहार के बीच अंतर देख सकते हो? (परमेश्वर ईमानदार लोगों को आशीष देता है और कपटी लोगों से घृणा करता है।) परमेश्वर ईमानदार लोगों को कैसे आशीष देता है? ईमानदार लोगों के पास परमेश्वर की आशीष होने के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है? (ईमानदार लोगों को अपने कर्तव्यों के अच्छे नतीजे मिलते हैं।) (परमेश्वर ईमानदार लोगों को प्रबुद्ध करता है और ईमानदार लोग आसानी से सत्य समझकर वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं।) (परमेश्वर ईमानदार लोगों से प्रेम करता है और उनकी परवाह करता है, और केवल ईमानदार लोग ही परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं।) ये सभी कथन सही हैं और ये ईमानदार लोगों के लिए परमेश्वर के आशीष हैं। क्या अब तुम लोग अलग-अलग लोगों और अलग-अलग रास्तों पर चलने वाले लोगों के प्रति परमेश्वर के व्यवहार में अंतर और रवैया नहीं देख सकते हो? ईमानदार लोग मूर्खतापूर्ण चीजें करते हैं और कमजोरी का अनुभव भी करते हैं; लेकिन उनके पास परमेश्वर का प्रबोधन और मार्गदर्शन होता है, वे उसकी सुरक्षा का आनंद लेते हैं और हर जगह उसकी आशीषों को महसूस कर सकते हैं। परमेश्वर उन्हें अनुशासित करता है और उनकी काट-छाँट करता है या उन्हें परीक्षणों से गुजारता है और उनका शोधन करता है ताकि वे बदल सकें और प्रगति कर सकें। जो लोग हमेशा अपनी कथनी-करनी से चालें चलते हैं और अपने कर्तव्य निर्वहन में हमेशा धूर्तता बरतकर जिम्मेदारी से भागते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते। उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, जो दलदल में, अँधेरे में जीने जैसा है। वे चाहे कैसे भी ढूँढ़ लें, चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, वे न तो रोशनी देख सकते हैं और न ही कोई दिशा पा सकते हैं। वे प्रेरणा और परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना अपने कर्तव्य निभाते हैं, कई मामलों में रुकावटों का सामना करते हैं और कुछ चीजें करते समय वे अनजाने में प्रकट हो जाते हैं। उन्हें प्रकट करने का उद्देश्य क्या है? ऐसा इसलिए है ताकि हर कोई उनका भेद पहचान सके और यह असलियत देख सके कि वे किस प्रकार के लोग हैं। वास्तव में इस प्रकार के सभी लोग श्रमिक होते हैं। जब वे किसी वास्तविक परिवर्तन से गुजरे बिना श्रम करना समाप्त कर देंगे तो वे प्रकट किए और हटाए जाने लगेंगे। जिन लोगों ने तमाम बुरे कर्म किए हैं उन्हें दंडित किया जाएगा और अविश्वासियों की तरह वे तमाम तरह की भयानक मौत मरेंगे। कुछ लोगों ने ईशनिंदा वाली और धृष्टतापूर्ण बातें बोली हैं, और इस वजह से परमेश्वर अब उन्हें नहीं चाहता है, और वह उन्हें शैतान को सौंप देता है। क्या उन्हें शैतान को सौंपने से अभी भी अच्छे नतीजे मिल सकते हैं? उनके पास परमेश्वर की सुरक्षा नहीं होगी, शैतान उन्हें पीड़ा देगा और उन पर कार्रवाई करेगा; वे राक्षसों के वश में हो जाएँगे, भूतों जैसे दिखेंगे और अंत में बुरी आत्माएँ अत्याचार कर-करके उन्हें मार डालेंगीं। क्या परमेश्वर अलग-अलग लोगों के साथ अलग-अलग तरह से व्यवहार नहीं करता? जब परमेश्वर लोगों में कार्य करता है, तो वह उन्हें प्रेरित कर रहा होता है, उन्हें प्रबोधन और मार्गदर्शन देता है, और उनकी आंतरिक दशाओं को बदल रहा होता है। अच्छे लोग अधिक से अधिक ईमानदार रहना पसंद करते हैं, क्योंकि ईमानदार रहकर ही वे अपने कर्तव्य उचित ढंग से निभा सकते हैं और सत्य के अनुसरण का सफर शुरू कर सकते हैं। केवल ईमानदार रहकर ही वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर लगातार आत्म-चिंतन कर सकते हैं, परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करने से बच सकते हैं, अपने ऊपर आने वाली परिस्थितियों में परमेश्वर के प्रति समर्पित हो सकते हैं, हर चीज में सत्य की खोज और प्रयास कर सकते हैं। परमेश्वर लोगों से यही अपेक्षा करता है और जब वे उसकी अपेक्षाओं को पूरा कर लेते हैं, तो वह उनमें कार्य करता है, उन्हें प्रबुद्ध और रोशन करता है, उनका मार्गदर्शन करते हुए उन्हें आशीष देता है। परमेश्वर उन लोगों को अलग कर देता है जो सत्य से विमुख हो चुके हैं और उससे नफरत करते हैं। परमेश्वर उन बुरे और कुकर्मी लोगों से कैसे निपटता है जो तमाम कुकर्म करते हैं, कलीसिया के कार्य में लगातार बाधा डालते और गड़बड़ी करते हैं? परमेश्वर उन्हें बेनकाब करके शैतान को सौंप देगा। वे परेशानियाँ पैदा करना शुरू कर देंगे और अपना असली चेहरा उजागर कर देंगे, अनियंत्रित ढंग से नकारात्मक बातें कहेंगे, और मसखरों जैसा व्यवहार करते हुए कलह के बीज बोएँगे। वे कई बुरे काम करेंगे जिससे कलीसिया में बाधाएँ और गड़बड़ियाँ पैदा होंगी, और जब परमेश्वर के चुने हुए लोग सत्य को समझेंगे और उन्हें पहचानकर उजागर कर सकेंगे, तो उन्हें हटाकर निष्कासित कर दिया जाएगा। क्या वे यही चाहते हैं? (नहीं।) जो लोग सत्य नहीं स्वीकारते और अपने उचित कर्तव्यों का पालन नहीं करते हैं, उनके लिए चीजें इसी तरह समाप्त होती हैं। जब लोग सही मार्ग पर नहीं चलते हैं, और यदि परमेश्वर उन्हें शैतान और उसके छोटे राक्षसों को सौंप देता है, तो वे पूरी तरह से बर्बाद हो जाते हैं और सदा-सर्वदा के लिए त्याग दिए जाते हैं। बेनकाब किए जाने पर वे सोचेंगे, “यह क्या हो रहा है? क्या मैंने कोई समस्या खड़ी की? क्या मैं बाधक था, क्या मैंने परेशानी पैदा की थी? मुझे इसकी जानकारी क्यों नहीं थी?” परमेश्वर हर चीज की जाँच-पड़ताल करता है, और यदि वह उन्हें बेनकाब करने और हटाने का माहौल बनाता है, तो यह सब बहुत जल्दी हो जाएगा। यह मुमकिन है कि एक-दो घटनाओं के बाद ही उन्हें कुकर्मी लोग घोषित कर दिया जाए और फिर उनसे निपटा जाए। कुछ चीजों का ध्यान परमेश्वर खुद रखता है और कुछ अन्य चीजें वह छोटे राक्षसों, शैतान या बुरी आत्माओं की सेवा लेकर करता है। एक ओर वह परमेश्वर के चुने हुए लोगों को पूर्ण और उन्नत बनाता है; वहीं दूसरी ओर वह बुरे लोगों को बेनकाब कर हटाता है। यदि तुम इसे अपनी धारणाओं का उपयोग करके मापते हो और सोचते हो कि यह परमेश्वर ने नहीं किया है, वह ऐसी चीजें नहीं करता है, ये चीजें उसके द्वारा आयोजित नहीं की जाती हैं, तो क्या यह गलत नहीं है? सभी चीजें परमेश्वर के हाथ में हैं और जब तुम लोग इसका अनुभव कर लोगे तो इस बात को जान लोगे।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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