परमेश्वर पर विश्वास करने में सबसे महत्वपूर्ण उसके वचनों का अभ्यास और अनुभव करना है (भाग एक)
जब परमेश्वर में तुम लोगों की आस्था की बात आती है तो अपने कर्तव्य को सही तरीके से निभाने के अलावा सत्य को समझना, सत्य वास्तविकता में प्रवेश करना और जीवन प्रवेश के लिए अधिक प्रयास करना महत्वपूर्ण होता है। चाहे कुछ भी हो जाए, सीखने के लिए कुछ सबक तो होते ही हैं, इसलिए इसे हल्के में लेकर छोड़ो मत। तुम्हें इस बारे में एक-दूसरे से सहभागिता करनी चाहिए, तब तुम्हें पवित्र आत्मा प्रबुद्ध और रोशन करेगा और तुम सत्य समझ पाओगे। संगति के जरिए, तुम्हारे पास अभ्यास का एक मार्ग होगा और तुम जान जाओगे कि परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे किया जाता है। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम्हारी कुछ समस्याओं का समाधान हो जाएगा, तुम्हें ज्यादा से ज्यादा बातें स्पष्ट रूप से समझ आने लगेंगी और सत्य की तुम्हारी समझ बढ़ जाएगी। इस तरह, तुम्हारी जानकारी के बिना ही तुम्हारा आध्यात्मिक कद बढ़ जाएगा। तुम्हें सत्य के लिए प्रयास करने की पहल करनी चाहिए और सत्य में तुम्हें अपना पूरा ध्यान लगाना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, “मैं बरसों से परमेश्वर में विश्वास करता आया हूँ और मैंने बहुत सारे सिद्धांत समझ लिए हैं। अब मेरे पास एक आधार है। अब विदेशों में हमारा कलीसियाई जीवन अच्छा है, भाई-बहन परमेश्वर में विश्वास के मामलों में संगति के लिए दिन भर इकट्ठे होते हैं, और इस तरह मैं जो देखता और सुनता हूँ उससे प्रभावित होता हूँ, और इससे मुझे पोषण मिलता रहता है—और इतना पर्याप्त है। मुझे अपने जीवन प्रवेश की समस्याएँ या अपनी विद्रोहशीलता की समस्याएँ दूर करने का प्रयास करने की जरूरत नहीं पड़ती। अगर मैं हर दिन प्रार्थना करने, परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने, भजन गाने, अपने कर्तव्य का निर्वहन करने और जो कर्तव्य मुझे करना चाहिए उसे पूरा करने के लिए अपनी समय-सारणी का पालन करता हूँ तो मैं स्वाभाविक रूप से जीवन में प्रगति करूँगा।” वे भ्रमित विश्वासी ऐसा ही सोचते हैं। ये लोग सत्य को कतई स्वीकार नहीं करते। वे केवल धार्मिक अनुष्ठानों में लिप्त रहते हैं, वाक्पटुता से बोलते हैं, खोखले नारे लगाते हैं, शब्द और धर्म-सिद्धांत की बातें करते हैं और सोचते हैं कि उन्होंने अच्छा काम किया है। परिणामस्वरूप, जब अन्य लोग सत्य का अभ्यास करके अपने में थोड़ा-बहुत बदलाव ला रहे होते हैं, तब इन भ्रमित विश्वासियों के पास बिल्कुल भी कोई अनुभवजन्य गवाही नहीं होती। वे अपने बारे में किसी ज्ञान की बात भी नहीं कर पाते। वे खाली हाथ रह जाते हैं और कुछ हासिल नहीं कर पाते। क्या वे दरिद्र और दयनीय नहीं होते? उद्धार प्राप्त करने के लिए कोई भी मार्ग सत्य को स्वीकार करने और खोजने से ज्यादा वास्तविक या व्यावहारिक नहीं है। अगर तुम सत्य को नहीं पा सकते तो परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास खोखला है। जो लोग खोखले शब्द और धर्म-सिद्धांत झाड़ते हैं, जो हमेशा तोते की तरह नारे लगाते हैं, ऊँची प्रतीत होती बातें कहते हैं, विनियमों का पालन करते हैं, और कभी भी सत्य के अभ्यास पर ध्यान नहीं देते, वे कुछ भी हासिल नहीं करते, चाहे वे कितने ही वर्षों पुराने विश्वासी क्यों न हों। वे कौन-से लोग हैं जो कुछ हासिल करते हैं? वे लोग जो सच्चे मन से अपना कर्तव्य निभाते हैं और सत्य का अभ्यास करने के लिए तैयार होते हैं, जो परमेश्वर द्वारा सौंपे गए काम को अपना मिशन समझते हैं, जो खुशी-खुशी अपना सारा जीवन परमेश्वर के लिए खपा देते हैं और खुद अपनी खातिर योजना नहीं बनाते, जो व्यावहारिक तरीके से आचरण करते हैं और परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित होते हैं। वे अपना कर्तव्य निभाते हुए सत्य सिद्धांतों को समझने में सक्षम होते हैं और सभी मामलों पर सावधानीपूर्वक ध्यान देते हैं, इससे उन्हें परमेश्वर की गवाही देने के परिणाम को हासिल करने और परमेश्वर के इरादे पूरे करने का अवसर मिलता है। जब वे अपना कर्तव्य निभाने के दौरान कठिनाइयों का सामना करते हैं, तो वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं और परमेश्वर के इरादों की थाह पाने की कोशिश करते हैं, वे परमेश्वर की तरफ से आने वाले आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होने में सक्षम रहते हैं और वे चीजें करते समय सत्य की खोज और उसका अभ्यास करते हैं। वे तोते की तरह नारे नहीं लगाते या ऊँची प्रतीत होने वाली बातें नहीं कहते, बल्कि अपने पाँव मजबूती से जमीन पर टिकाकर हर काम करने पर, और बहुत जतन से सिद्धांतों का पालन करने पर ही ध्यान देते हैं। वे हर काम दिल लगाकर करते हैं, हर चीज की तहेदिल से सराहना करना सीखते हैं, और कई मामलों में वे सत्य का अभ्यास करने में सक्षम रहते हैं, जिसके बाद वे ज्ञान और समझ हासिल कर लेते हैं, और वे सबक सीखने और सचमुच कुछ पा लेने में सफल हो जाते हैं। जब उनके विचार या दशाएँ गलत होती हैं तो वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, और उनके समाधान के लिए सत्य की खोज करते हैं; वे चाहे जिन सत्यों को भी समझते हों, उनके मन में उनके लिए प्रशंसा की भावना होती है, और वे अपनी अनुभवजन्य गवाही के बारे में बात करने में सक्षम होते हैं। ऐसे लोग आखिर में सत्य को प्राप्त कर लेते हैं। जो लोग लापरवाह और असावधान होते हैं वे कभी नहीं सोचते कि सत्य का अभ्यास कैसे किया जाए। वे केवल प्रयास करने, काम में जुटे रहने, खुद को प्रदर्शित करने और दिखावा करने में ही लगे रहते हैं, लेकिन कभी सत्य का अभ्यास करने की खोज नहीं करते, जिसकी वजह से उनके लिए सत्य पाना मुश्किल हो जाता है। जरा सोचो, किस तरह के लोग सत्य वास्तविकताओं में प्रवेश कर सकते हैं? (जिनके पैर जमीन पर होते हैं, जो व्यावहारिक होते हैं और काम में दिल लगाते हैं।) जो लोग व्यावहारिक तरीके से काम करते हैं, जो काम में दिल लगाते हैं और कर्तव्यनिष्ठ होते हैं : ऐसे लोग वास्तविकता पर और कार्य करते समय सत्य सिद्धांतों के उपयोग पर अधिक ध्यान देते हैं। साथ ही, वे सभी चीजों में व्यावहारिकता पर ध्यान देते हैं, वे व्यावहारिक होते हैं, उन्हें सकारात्मक चीजें, सत्य और व्यावहारिक चीजें पसंद होती हैं। ऐसे ही लोग अंततः सत्य समझते हैं और उसे प्राप्त करते हैं। तुम लोग किस प्रकार के व्यक्ति हो? (अव्यावहारिक, जो हमेशा दिखावे के लिए काम करना चाहता है, और छल-कपट पर निर्भर रहता है।) क्या ऐसा करने से कुछ हासिल हो सकता है? (नहीं।) क्या तुम्हें अपनी समस्याओं को हल करने का तरीका मिल गया है? यदि तुम इसे पहचानकर चीजों को बदलना शुरू करते हो, तो क्या यह जान पाओगे कि चीजों पर तुम्हारी धारणाओं, कल्पनाओं और दृष्टिकोण में बदलाव हुआ है या नहीं? (मुझे लगता है कि उनमें कुछ हद तक बदलाव हुए हैं।) जब तक परिणाम मिलते हैं और प्रगति होती है, तुम्हें उस पर संगति करनी चाहिए और दूसरों को शिक्षित होने देना चाहिए। भले ही तुम्हारा अनुभव सीमित है, फिर भी यह जीवन में विकास का अनुभव है। परमेश्वर में विश्वास करने का तुम्हारा अनुभव और परमेश्वर के वचन का अनुभव करते हुए जीवन में प्रगति करना ही जीवन में विकास की प्रक्रिया है। ये अनुभव सबसे अधिक मूल्यवान हैं।
जब सभी लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं, और अपने कर्तव्य निभाते हैं, तो ऐसा क्यों है कि कुछ वर्षों के बाद वे एक-दूसरे से भिन्न हो जाते हैं, ऊँच-नीच उभर आती है, और लोगों के असली रंग सामने आ जाते हैं? वास्तव में, हर किसी को उसकी किस्म के अनुसार छाँट दिया जाता है। कुछ लोग अपनी अनुभवजन्य गवाही के बारे में बात कर पाते हैं, जबकि अन्य लोगों के पास कोई अनुभवजन्य गवाही नहीं होती। कुछ लोग बहुत-से सत्यों को समझने और वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम होते हैं, जबकि अन्य लोग कोई भी सत्य प्राप्त नहीं कर पाते हैं या अपने स्वभाव को जरा भी बदल नहीं पाते हैं। कुछ लोगों को अपने कर्तव्यों में नतीजे मिलते हैं, वे समस्याएँ हल करने के लिए सत्य खोजने में सक्षम होते हैं और वे धीरे-धीरे अपने कर्तव्य इस ढंग से निभाने लगते हैं जो मानक स्तर का होता है। कुछ लोग अपने कर्तव्य निभाने में धूर्त और चालाक होते हैं, जैसे-तैसे काम करते हैं और सत्य को समझने के बाद भी उसे अभ्यास में नहीं लाते हैं। वे सभी सभाओं में भाग लेते हैं, परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं, और अपने कर्तव्य निभाते हैं, फिर भी परिणाम भिन्न क्यों होते हैं? ऐसा क्यों है कि कुछ लोग सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चल पाते हैं जबकि अन्य अपने ही रास्ते पर चलते हैं? कुछ लोग सत्य स्वीकारने में सक्षम होते हैं जबकि अन्य ऐसा नहीं कर पाते? ऐसा कैसे हो सकता है? क्यों कुछ लोग काट-छाँट किए जाने पर इसे स्वीकारने और आज्ञाकारी बनने में सक्षम होते हैं, जबकि अन्य लोग प्रतिरोधी होते हैं, कुतर्क और विद्रोह करते हैं और यहाँ तक कि बखेड़ा खड़ा कर देते हैं? वे सभी सभाओं में परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हैं, उपदेश और संगति सुनते हैं, कलीसियाई जीवन जीते हैं, और अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं, तो उनके बीच इतना बड़ा अंतर क्यों है? क्या तुम इस समस्या की असलियत देख सकते हो? यह अच्छी और बुरी मानवता के बीच का अंतर है, और इसका सीधा संबंध इस बात से है कि लोग सत्य से प्रेम करते हैं या नहीं। वास्तव में, चाहे किसी व्यक्ति की काबिलियत कैसी भी हो, यदि वह सत्य स्वीकार सकता है, लगन से अपना कर्तव्य निभा सकता है, और चिंतन-मनन करके खुद को पहचान सकता है, तो वह जीवन प्रवेश प्राप्त करेगा, सच्चे बदलाव का अनुभव करेगा और इस ढंग से अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम होगा जो मानक स्तर का है। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ने में मेहनत नहीं करते, सत्य नहीं समझते, तो तुम आत्मचिंतन नहीं कर सकते; तुम केवल सांकेतिक प्रयास करने और कोई बुरा कर्म या अपराध न करने मात्र से संतुष्ट रहोगे और इसे पूँजी के रूप में उपयोग करोगे। तुम हर दिन जैसे-तैसे गुजार दोगे, भ्रम की स्थिति में रहोगे, केवल नियत समय पर काम करोगे, अपनी जाँच करने में कभी दिल नहीं लगाओगे या खुद को जानने का प्रयास नहीं करोगे; तुम हमेशा लापरवाह रहोगे। इस तरह, तुम कभी भी अपना कर्तव्य इस ढंग से नहीं निभाओगे जो मानक स्तर का है। किसी चीज में अपना सारा प्रयास लगाने के लिए, पहले तुम्हें पूरी तरह उसमें अपना मन लगाना होगा; अगर तुम पहले किसी चीज में पूरी तरह अपना मन लगाते हो, तभी तुम अपना सारा प्रयास उसमें लगा सकते हो और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकते हो। आज, ऐसे लोग हैं जो अपने कर्तव्य के निर्वहन में मेहनत करना शुरू कर चुके हैं, वे सोचने लगे हैं कि परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निर्वहन ठीक से कैसे किया जाए। वे नकारात्मक और सुस्त नहीं हैं, वे निष्क्रिय होकर ऊपरवाले के आदेश की प्रतीक्षा नहीं करते, बल्कि थोड़ी-सी पहल करते हैं। तुम लोगों के कर्तव्य प्रदर्शन को देखते हुए, तुम पहले की तुलना में थोड़े अधिक प्रभावी हो। हालाँकि यह अभी भी मानक से नीचे है, फिर भी इसमें थोड़ी-बहुत वृद्धि तो हुई है—जो कि अच्छा है। लेकिन तुम्हें यथास्थिति से संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए, तुम्हें खोजते और बढ़ते रहना चाहिए—तभी तुम अपना कर्तव्य बेहतर और एक ऐसे ढंग से निभाओगे जो मानक स्तर का हो। लेकिन जब कुछ लोग अपना कर्तव्य निभाते हैं तो वे कभी भी अपना सौ प्रतिशत नहीं देते, इसे अपना सर्वस्व नहीं देते, वे केवल अपने प्रयास का 50 से 60 प्रतिशत ही देते हैं और अपना कार्य पूरा होने तक कामचलाऊ ढंग से कार्य करते रहते हैं। वे कभी भी सामान्य स्थिति को बनाए नहीं रख पाते : जब उन पर नजर रखने या उनका समर्थन करने वाला कोई नहीं होता, तो वे सुस्त होकर उत्साह खो बैठते हैं; जब सत्य पर संगति करने वाला कोई होता है, तो वे उत्साहित रहते हैं, लेकिन यदि कुछ समय के लिए उनके साथ सत्य पर संगति न की जाए, तो वे उदासीन हो जाते हैं। जब वे इस तरह ऊहापोह की स्थिति में रहते हैं, तो यहाँ समस्या क्या है? जब लोगों ने सत्य प्राप्त नहीं किया होता, तो उनकी स्थिति ऐसी ही होती है, वे सभी जुनून में जीते हैं—जिसे बनाए रखना बेहद कठिन होता है : कोई न कोई ऐसा होना चाहिए जो हर दिन उन्हें उपदेश दे और उनके साथ संगति करे; जब कोई उन्हें सींचने वाला, देखभाल करने वाला और उनका समर्थन करने वाला नहीं होता, तो वे फिर से ठंडे पड़ जाते हैं और सुस्त हो जाते हैं। और जब उनका हृदय शिथिल हो जाता है, तो वे अपने कर्तव्य पालन में कम प्रभावी हो जाते हैं; यदि वे अधिक मेहनत करते हैं, तो उनकी प्रभावशीलता बढ़ जाती है, कर्तव्य निर्वहन में उनके नतीजे बेहतर हो जाते हैं, और उन्हें अधिक लाभ होता है। क्या तुम लोगों का यह अनुभव है? तुम लोग कह सकते हो, “हमें अपना कर्तव्य निभाने में हमेशा परेशानी क्यों होती है? जब इन समस्याओं का समाधान हो जाता है, तो हम उत्साहित हो जाते हैं; जब नहीं होता, तो हम उदासीन हो जाते हैं। जब हमारे कर्तव्य निभाने का कोई परिणाम आता है, जब परमेश्वर हमारे विकास के लिए हमें स्वीकार करता है, तो हम प्रसन्न होते हैं, हमें लगता है कि हमने अंततः परिपक्वता हासिल की है, लेकिन जैसे ही कोई समस्या आती है, हम फिर से नकारात्मक हो जाते हैं—हमारी अवस्था हमेशा एक-समान क्यों नहीं रहती?” दरअसल, इसका मुख्य कारण यह है कि तुम लोग बहुत कम सत्य समझते हो, तुम्हारे अनुभवों और प्रवेश में गहराई की कमी है, तुम अभी भी बहुत-से सत्य नहीं समझते, तुममें संकल्प की कमी है और तुम बस अपना कर्तव्य निभा पाने से ही संतुष्ट हो जाते हो। यदि तुम्हें सत्य की समझ नहीं है तो तुम अपने कर्तव्य इस ढंग से कैसे निभा सकते हो जो मानक स्तर का हो? वास्तव में, परमेश्वर लोगों से जो माँगता है, उसे लोग प्राप्त कर सकते हैं; अगर तुम लोग अपनी अंतरात्मा से काम लो, अपना कर्तव्य निभाते समय अपनी अंतरात्मा का अनुसरण करो तो तुम्हारे लिए सत्य स्वीकारना आसान होगा—और यदि तुम सत्य स्वीकार सको तो तुम अपना कर्तव्य इस ढंग से निभा सकते हो जो मानक स्तर का है। तुम लोगों को इस तरह से सोचना चाहिए : “इन वर्षों में परमेश्वर में विश्वास रखते हुए, इन वर्षों में परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हुए, मैंने बहुत कुछ पाया है, परमेश्वर ने मुझ पर महान अनुग्रह और आशीर्वाद बरसाया है। मैं परमेश्वर के हाथों में जीता हूँ, मैं उसके प्रभुत्व और संप्रभुता में जीता हूँ, उसी ने मुझे ये साँसें दी हैं, इसलिए मुझे अपना मन लगाना और पूरी ताकत से अपना कर्तव्य पूरा करने का प्रयास करना चाहिए—यही कुंजी है।” लोगों में संकल्प होना ही चाहिए; जिनमें संकल्प होता है, वे ही सत्य के लिए वास्तव में प्रयास कर सकते हैं, सत्य समझ लेने के बाद ही वे अपना कर्तव्य ठीक से निभा सकते हैं, परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं और शैतान को शर्मसार कर सकते हैं। यदि तुममें इस प्रकार की ईमानदारी है, और तुम अपने लिए कोई योजना नहीं बनाते हो, बल्कि सत्य प्राप्त कर अपना कर्तव्य ठीक से निभाना चाहते हो, तो तुम्हारा कर्तव्य-निष्पादन सामान्य हो जाएगा और पूरे समय स्थिर रहेगा; तुम्हारे सामने चाहे कोई भी परिस्थिति हो, तुम दृढ़ता से अपना कर्तव्य निभाने में लगे रहोगे। चाहे तुम्हें कोई भी गुमराह या बाधा डालने आए और चाहे तुम्हारी मनःस्थिति चाहे अच्छी हो या बुरी, तब भी तुम अपना कर्तव्य सामान्य रूप से निभा पाओगे। इस तरह, तुम्हारी ओर से परमेश्वर का मन निश्चिंत हो सकता है, पवित्र आत्मा सत्य सिद्धांत समझने में तुम्हें प्रबुद्ध कर पाएगा और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने में तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा। परिणामस्वरूप, तुम्हारा कर्तव्य निर्वहन यकीनन मानक स्तर का होगा। यदि तुम सच्चे मन से खुद को परमेश्वर के लिए खपाओगे, व्यावहारिक तरीके से अपना कर्तव्य निभाओगे, धूर्तता से काम नहीं करोगे या चालबाजी नहीं करोगे, तो परमेश्वर तुम्हें स्वीकार कर लेगा। परमेश्वर लोगों के मन, विचार और इरादों और मंशाओं की पड़ताल करता है। यदि तुम्हारे दिल में सत्य के लिए तड़प है और तुम सत्य खोज सकते हो, तो परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन करेगा। किसी भी मामले में, अगर तुम सत्य खोजते हो, तो परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध करेगा। वह तुम्हारे हृदय को प्रकाश के प्रति खोल देगा और तुम्हें अभ्यास का मार्ग देगा, और तब तुम्हारे कर्तव्य का प्रदर्शन फलदायी होगा। परमेश्वर की प्रबुद्धता उसका अनुग्रह और आशीष है। मामूली बातों के लिए भी, यदि परमेश्वर लोगों को प्रबुद्ध न करे, तो उन्हें कभी प्रेरणा नहीं मिलेगी। प्रेरणा के बिना लोगों के लिए अपनी समस्याओं को हल करना कठिन है, और वे अपने कर्तव्य में परिणाम प्राप्त नहीं करेंगे। ऐसी बहुत-सी चीजें हैं जिन पर लोग कई वर्षों के अध्ययन के बाद भी केवल मानव प्रतिभा, बुद्धि और काबिलियत के बल पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते हैं। क्यों नहीं कर सकते? क्योंकि अभी तक परमेश्वर का तय किया हुआ समय नहीं आया है। यदि परमेश्वर कार्य न करे, तो व्यक्ति चाहे कितना भी काबिल क्यों न हो, वह बेकार है। इसे स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। तुम्हें विश्वास होना चाहिए कि सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है और लोग बस सहयोग कर रहे हैं। यदि तुम खरे हो, तो परमेश्वर जान जाएगा और वह हर हालात में तुम्हारे लिए रास्ता खोलेगा। किसी भी कठिनाई को पार करना मुश्किल नहीं है; तुममें यह आस्था होनी चाहिए। इसलिए, अपने कर्तव्य निभाते समय, तुम लोगों को कोई आशंका नहीं होनी चाहिए। यदि तुम इसमें अपना सब कुछ लगाकर पूरे दिल से काम करोगे, तो परमेश्वर तुम्हें कठिनाइयाँ नहीं देगा, और न ही वह तुम्हें तुम्हारी क्षमता से अधिक कोई जिम्मेदारी देगा। तुम्हें केवल तभी चिंता करनी चाहिए जब तुम बिना सच्चाई के बातें कहते हो, केवल बातें करते हो और कोई काम नहीं करते, ऐसी बातें कहते हो जो सुनने में अच्छी लगती हैं लेकिन वास्तव में तुम अपने कर्तव्यों को सही ढंग से नहीं निभाते हो—फिर तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता। यदि अपने कर्तव्यों और परमेश्वर के प्रति तुम्हारा यही रवैया है, तो क्या तुम्हें परमेश्वर की आशीष प्राप्त होगी? बिल्कुल नहीं। यदि तुम परमेश्वर के साथ अनमने ढंग से व्यवहार करते हो और उसे धोखा देते हो, तो परमेश्वर तुम पर कोई ध्यान नहीं देगा और तुम्हें हटा देगा; यही तुम्हारा परिणाम होगा। परमेश्वर को धोखा देना खुद को धोखा देना है। परमेश्वर कहेगा, “इस व्यक्ति का दिल बहुत कपटी है और इसमें ईमानदारी का कोई नामोनिशान नहीं है। ऐसे लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता या उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं सौंपी जा सकती। उन्हें अलग ही रहने दो।” इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि तुम्हें अकेला छोड़ दिया जाएगा और अनदेखा कर दिया जाएगा। यदि तुम पश्चात्ताप नहीं करते, तो तुम पूरी तरह से त्याग दिए जाओगे। तुम्हें दंडित होने के लिए शैतान, दुष्ट आत्माओं और अशुद्ध आत्माओं के हवाले कर दिया जाएगा। जब किसी को अकेला छोड़ दिया जाता है और अनदेखा किया जाता है तो उसकी अवस्था कैसी होती है? इसका मतलब है कि अब पवित्र आत्मा तुम में कार्य नहीं कर रहा है। तुम कुछ भी स्पष्ट रूप से नहीं देख सकोगे और जहाँ अन्य लोग हमेशा प्रबुद्ध और रोशन किए जाएँगे, तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा; तुम सुन्न ही रह जाओगे। जब कोई सत्य और जीवन प्रवेश पर संगति करेगा, तो तुम्हें हमेशा नींद आएगी और तुम झपकी लोगे। यह किस प्रकार की घटना है? ऐसी जहाँ परमेश्वर कार्य नहीं कर रहा है। यदि परमेश्वर कार्य नहीं करेगा, तो क्या व्यक्ति जिंदा लाश बनकर नहीं रह जाएगा? परमेश्वर में विश्वास करके भी उसकी मौजूदगी का एहसास नहीं कर पाना बहुत भयावह है। ऐसा व्यक्ति अपनी जीने की इच्छाशक्ति और प्रेरणा खो देता है। वह जीने के लिए अपनी सारी पूँजी खो देता है। ऐसे जीवन का क्या मूल्य है? क्या तुम सूअरों और कुत्तों से भी बदतर नहीं हो? तुम्हारे कार्यों और व्यवहार के कारण, परमेश्वर को लगता है तुम भरोसा या विश्वास करने लायक नहीं हो। परमेश्वर अपने दिल की गहराई से तुमसे घृणा करता है, और इस प्रकार तुम्हें त्याग देता है या कुछ समय के लिए तुम्हें अलग कर देता है। मैं सोचता हूँ कि ऐसा व्यक्ति अपने दिल की पीड़ा और परेशानी को क्यों नहीं जानता? उनके दिल में क्या समस्या है? क्या उनके पास अंतरात्मा की जागरूकता है? चाहे तुमने कितने ही वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया हो या चाहे तुम्हारी आस्था सच्ची है या नहीं, तुम पहले से ही स्व-आचरण के कुछ धर्म-सिद्धांतों को समझ चुके हो और किसी पर निर्भर हुए बिना जी सकते हो और जीवित रह सकते हो, लेकिन यदि तुम जानते हो कि तुम्हें बेनकाब कर दिया गया है, परमेश्वर तुम्हें त्याग चुका है, तो क्या तुम तब भी जीवित रह सकोगे? क्या तुम्हारे जीवन का तब भी कोई अर्थ होगा? उस समय तुम रोओगे और अँधेरे में अपने दाँत पीसोगे। कलीसिया में हम अक्सर ऐसे लोगों को देखते हैं, जिन्हें बेनकाब कर हटा दिया गया है, जब कलीसिया उन्हें दूर भेजने वाली होती है, वे रो-रोकर आँखें लाल कर लेते हैं और यहाँ तक कि मरने की सोचते हैं, उनके पास जीने की इच्छा नहीं होती है। रोते हुए, वे कसम खाते हैं कि वे पश्चात्ताप करेंगे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। यह वैसा ही मामला है जैसे अपनी कब्र देखने तक आँसू न बहाना। इसलिए यदि तुम पश्चात्ताप करना चाहते हो तो तुम्हें यह अवश्य ही अभी कर लेना चाहिए। जल्दी से चिंतन-मनन करो कि तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन में कौन-सी समस्याएँ शेष हैं, या क्या तुम लापरवाह हो, या ऐसा कोई क्षेत्र है जिसमें तुम गैर-जिम्मेदार हो। इस पर चिंतन करो कि तुमने वास्तव में अपने कर्तव्य निर्वहन में परिणाम प्राप्त किए हैं या नहीं—यदि किए हैं, तो चिंतन करो कि ये परिणाम क्यों प्राप्त हुए हैं; और यदि परिणाम प्राप्त नहीं किए, तो चिंतन करो कि क्यों नहीं किए हैं? चिंतन-मनन करके इन चीजों पर स्पष्टता प्राप्त करो, और यदि फिर भी समस्याएँ बनी रहती हैं, तो उन्हें हल करने के लिए सत्य खोजो। ऐसा करने से, अपना कर्तव्य निभाने में तुम्हें कोई कठिनाई नहीं होगी। जो समस्याएँ आने पर उन्हें हल करने के लिए सत्य खोजने में सक्षम हैं, न केवल अपने कर्तव्यों को निभाने में उनकी कठिनाइयाँ कम होंगी, बल्कि वे उन्हें निभाने में और अधिक प्रभावी बनेंगे, और इस दौरान जीवन प्रवेश भी प्राप्त करेंगे। उदाहरण के तौर पर, कुछ लोग सत्य को तब समझना शुरू करते हैं जब वे कई दौर की काट-छाँट से गुजर चुके होते हैं। वे अक्सर आत्म-चिंतन करने में सक्षम होते हैं, और जब भी उन्हें पता चलता है कि उन्होंने कुछ गलत किया है, तो उन्हें पता होता है कि उन्होंने सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन किया है, वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं और उन्हें बहुत पछतावा होता है। कभी-कभी तो वे स्वयं से भी घृणा करते हैं और यह कहते हुए खुद को तमाचा भी जड़ते हैं : “मैं फिर से कुछ गलत करके परमेश्वर को पीड़ा कैसे दे सकता हूँ? मैं कितना हृदयहीन हूँ! परमेश्वर ने इतना कुछ कहा है—मैंने सबक क्यों नहीं सीखा है? मैं परमेश्वर के प्रति समर्पण और उसे संतुष्ट क्यों नहीं कर सकता? मुझे शैतान सचमुच बहुत गहराई तक भ्रष्ट कर चुका है। मेरे दिल में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं है और मैं सत्य को सँजोता नहीं हूँ। मैं हमेशा शैतानी फलसफों के अनुसार जीता हूँ और मैं परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील नहीं हूँ। मेरे पास वास्तव में अंतरात्मा या विवेक नहीं है। मैं परमेश्वर के प्रति इतना विद्रोही हूँ!” इस प्रकार वे पश्चात्ताप करने का संकल्प लेते हैं और सत्य को अभ्यास में लाने, अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाने और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए दृढ़ संकल्पित होते हैं। उनके पास वास्तव में एक पश्चात्ताप करने वाला दिल है, लेकिन भ्रष्ट स्वभाव को छोड़ देना कोई आसान काम नहीं है—इससे पहले कि वे थोड़ा-सा बदल सकें, उनका कुछ परीक्षणों और शोधन से गुजरना आवश्यक है। अब ऐसे बहुत-से लोग हैं जिन्होंने अपना ध्यान सत्य पर लगाना शुरू कर दिया है, जो सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाले लोग बनने को तैयार हैं। तो फिर, वास्तव में पश्चात्ताप करने वाला दिल रखने वाले व्यक्ति को कैसे अभ्यास करना चाहिए? एक तो उन्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और सत्य की अधिक खोज करनी चाहिए, अपने कर्तव्य निर्वहन में उन्हें अपनी समस्याओं को हल करना और अभ्यास का मार्ग खोजना चाहिए। दूसरा यह कि उन्हें सत्य समझने वाले व्यक्ति को खोजना चाहिए और उसके साथ संगति करनी चाहिए, उन्हें अपनी विद्रोहशीलता, अपने प्रकृति सार और जिन पहलुओं में वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं उनका गहन-विश्लेषण करना चाहिए। उन्हें इन समस्याओं के बारे में स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए, फिर परमेश्वर के वचनों पर अच्छी तरह से विचार करना चाहिए और देखना चाहिए कि वे उन पर कैसे लागू होते हैं; एक बार फिर, उन्हें परमेश्वर के उन वचनों पर विचार करना चाहिए जो बहुत महत्वपूर्ण हैं, और जब तक उन्हें सच्चा ज्ञान प्राप्त न हो, तब तक उन्हें अपनी खुद की समस्याओं, अपने प्रकृति सार पर चिंतन-मनन करना चाहिए। इस तरह, वे सच्चा पश्चात्ताप करके खुद से घृणा कर सकेंगे। इसके बाद उन्हें आगे बढ़कर अपने कर्तव्य निर्वहन में आने वाली समस्याओं की पहचान करनी चाहिए और उनका समाधान करने के लिए सत्य का इस्तेमाल करना चाहिए। इस तरह, अपना कर्तव्य निभाने में आने वाली समस्याएँ कम होने लगेंगी और परिणाम हासिल होंगे। यदि कोई वास्तव में पश्चात्ताप करना चाहता है, तो उसे इसी तरह अभ्यास करना चाहिए। सच्चे पश्चात्ताप का यही एकमात्र मार्ग है।
सत्य का अनुसरण करने का क्या प्रभाव होगा? पहला यह कि सत्य का अनुसरण करने से व्यक्ति भ्रष्ट स्वभाव को छोड़ देता है; दूसरा यह कि ऐसा करने से व्यक्ति अपने कर्तव्य निर्वहन में सत्य का अभ्यास कर पाता है और परमेश्वर के प्रति सचमुच समर्पण करने वाला व्यक्ति बन सकता है। यह सच्चे पश्चात्ताप की गवाही है। सच्चा पश्चात्ताप करने के लिए, व्यक्ति का सत्य समझना और उसका अभ्यास करना जरूरी है, तभी कोई परिणाम प्राप्त होता है। यदि तुम समस्या हल करने के लिए सत्य नहीं खोजते, और तुम बस कहने के लिए पश्चात्ताप करते हो, तो इसका कोई परिणाम नहीं मिलेगा। इस तरह, तुम्हें शांति या जमीन से जुड़ा हुआ महसूस नहीं होगा। यदि तुम प्रार्थना में बस यह कहते हो कि तुम सच में पश्चात्ताप करना चाहते हो, लेकिन अपने कर्तव्य निर्वहन में, तुम अपनी समस्याओं को हल करने और मानक स्तर पर अपना कर्तव्य निभाने के लिए सत्य नहीं खोजते हो तो तुम परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश कर रहे हो। सच्चा पश्चात्ताप मुख्य रूप से लगन होने, सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने, सत्य का अभ्यास करने और अपने कर्तव्य निर्वहन में सच्ची गवाही देने में दिखता है। ये सच्चे पश्चात्ताप के लक्षण हैं, और यही सच्चे पश्चात्ताप की गवाही भी है। यदि कोई अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाए बिना, प्रार्थना में परमेश्वर से बस पश्चात्ताप की बातें करता है, तो क्या वह परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश नहीं कर रहा है? यदि कोई बात किसी की अंतरात्मा तक ही नहीं पहुँच रही है, तो वह परमेश्वर तक कैसे पहुँचेगी? तुम्हारी वर्तमान परिस्थितियाँ जो भी हों, अगर तुम सच्चे मन से परमेश्वर के लिए अपना कर्तव्य नहीं निभा सकते, अगर तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन में बहुत-सी समस्याएँ बनी रहती हैं, जिन्हें हल करने के लिए तुम सत्य नहीं खोजते, तो यह एक बड़ी समस्या है; तुम्हें इसके बारे में पूरी निष्ठा से प्रार्थना और आत्म-चिंतन करना चाहिए। यदि तुम वास्तव में पश्चात्ताप नहीं कर सकते और हमेशा खराब तरीके से अपना कर्तव्य निभाते हो, तो बेशक तुम पर हटाए जाने का खतरा बना रहेगा। चाहे तुमने कितने ही वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया हो—अगर तुम अपना कर्तव्य निभाने में हमेशा बेपरवाह रहोगे, हमेशा अपने फायदे के पीछे भागते रहोगे, हमेशा परमेश्वर के घर का फायदा उठाओगे, सत्य को नहीं स्वीकारोगे या उसका जरा भी अभ्यास नहीं करोगे, तो तुम परमेश्वर के सच्चे विश्वासी नहीं हो। तुम ऐसे हो जो सत्य से विमुख है, एक छद्म-विश्वासी हो जो केवल भरपेट निवाले खाना चाहता है। भले ही तुम अब भी परमेश्वर के घर में रह रहे होगे, अब भी खुद को परमेश्वर का विश्वासी बताते होगे, पर सच तो यह है कि अब परमेश्वर के साथ तुम्हारा कोई संबंध नहीं है। परमेश्वर ने तुम्हें बहुत पहले ही किनारे कर दिया है, और तुम एक बेजान खोल, चलती-फिरती लाश बन गए हो। ऐसे में जीने का क्या मतलब है? जो इस स्तर पर पहुँच गया है, उसके पास वैसे भी बताने लायक कोई मंजिल नहीं है। परमेश्वर के सामने आकर जल्द-से-जल्द अपने पापों को कबूलना ही उनका एकमात्र रास्ता है। यदि तुम सचमुच ईमानदार हो और वास्तव में पश्चात्ताप करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे अपराधों को याद नहीं रखेगा। लेकिन एक बात है जो तुम्हें याद रखनी चाहिए : किसी भी समय, और चाहे तुम्हें परमेश्वर के बारे में पता हो या नहीं, या उसे लेकर तुम्हारे मन में धारणाएँ या गलतफहमियाँ हों, तुम्हें कभी भी उससे लड़ना या उसका विरोध करना नहीं चाहिए। नहीं तो, तुम्हें पक्का कठोर दंड भुगतना पड़ेगा। यदि तुम अपना दिल कठोर पाते हो, या ऐसी अवस्था में हो जहाँ तुम कहते हो, “मैं इसे ऐसे ही करूँगा, देखते हैं परमेश्वर मेरा क्या बिगाड़ सकता है। मैं किसी से नहीं डरता। मैंने पहले भी हमेशा इसे ऐसे ही किया है,” तो तुम मुसीबत में हो। यह एक शैतानी प्रकृति का उभार है; यह हठ है। तुम पहले से ही अच्छी तरह जानते हो कि तुम जो कर रहे हो वह गलत है, जो पहले से ही खतरनाक है, लेकिन तुम इसे गंभीरता से नहीं लेते। तुम्हारा दिल डरता नहीं है, यह किसी आरोप या दोष को स्वीकार नहीं करता, और चिंतित या दुखी नहीं होता है—तुम तो पश्चात्ताप करना भी नहीं जानते। यह हठ करने की अवस्था है और इससे तुम मुसीबत में पड़ जाओगे। इससे परमेश्वर के लिए तुम्हें किनारे करना आसान हो जाता है। यदि कोई व्यक्ति इस स्तर तक पहुँच जाता है और अभी भी इतना सुन्न है कि यह भी नहीं जानता कि उसे वापस लौट जाना चाहिए, तो क्या परमेश्वर के साथ उसका संबंध वापस ठीक किया जा सकता है? इसे पहले जैसा करना आसान नहीं होगा। फिर तुम परमेश्वर के साथ वापस सामान्य संबंध कैसे बना पाओगे, जिससे तुम महसूस कर पाओ कि उसके करीब आना पूरी तरह स्वाभाविक और न्यायोचित है? जहाँ तुम उसके प्रति समर्पण कर सको, उसके आगे झुक सको, और अपना सब कुछ उसे अर्पित कर सको, उसका भय मान सको और चाहे तुम उसके वचनों को समझ पाओ या नहीं, उन्हें सत्य के रूप में स्वीकार सको, और फिर सत्य को खोजकर समर्पण का अभ्यास कर सको? तुम कब इस दशा में लौट पाओगे? इस दशा को बहाल करने के लिए तुम्हें किस हद तक जाना होगा? मुझे डर है कि यह वाकई कठिन होगा, क्योंकि यह समय या यात्रा की लंबाई या तुम्हारी तय की गई दूरी का सवाल नहीं है। यह तुम्हारे जीवन की अवस्था और इस बात का सवाल है कि तुम सचमुच सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हो या नहीं। यदि तुमने कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है, फिर भी अपने भीतर मौजूद समस्याओं को हल करने के लिए सत्य का उपयोग करने में बिल्कुल भी सक्षम नहीं हुए हो, और तुम इन समस्याओं की गंभीरता से अनजान हो, बेखबर रहते हुए अक्सर एक विद्रोही अवस्था में आनंद से रहते हो, गलत चीजें करते हो, गलत शब्द कहते हो, कठोर दिल से परमेश्वर के खिलाफ विरोध, प्रतिरोध और विद्रोह करते हो, और हठपूर्वक अपनी धारणाओं, कल्पनाओं, विचारों और दृष्टिकोणों पर अड़े रहते हो, इन चीजों से तुम बिल्कुल ही बेखबर हो, तो तुम्हारे पास कोई सत्य वास्तविकता नहीं है, तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाले व्यक्ति नहीं हो, और अभी भी परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने से बहुत दूर हो। तुम्हें अपने दिल में इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए। यदि तुम अपनी वास्तविक अवस्था को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते, हमेशा अपने विश्वास करने के तरीके को सही मानते हो, परमेश्वर के लिए खपने में खुद को सक्षम मानते हो, समझते हो कि तुमने कष्ट उठाया है और कीमत चुकाई है, और यह मानते हो कि तुम्हें स्वर्ग के राज्य में प्रवेश जरूर मिलेगा, तो तुम्हारे अंदर लेशमात्र भी विवेक नहीं है। तुम्हारे पास कोई सत्य वास्तविकता नहीं है, बल्कि तुम इसे जानते भी नहीं हो। इसका मतलब यह है कि तुम्हारे मन में उलझन है, तुम दुविधा में हो, तुम एक भ्रमित व्यक्ति हो, और तुममें सत्य समझने या खुद को जानने की पर्याप्त काबिलियत नहीं है, इसलिए तुम परमेश्वर द्वारा बचाए नहीं जा सकते।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?