अपनी धारणाओं का समाधान करके ही व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास के सही मार्ग पर चल सकता है (1) भाग दो

तुम लोगों के दिलों में और कौन-सी धारणाएँ हैं जो तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन को प्रभावित कर सकती हैं? कौन-सी धारणाएँ अक्सर तुम लोगों को तुम्हारे जीवन में प्रभावित और शासित करती हैं? जब तुम्हारे साथ कुछ ऐसी चीजें हों जो तुम्हारी पसंद के अनुसार न हों, तो स्वाभाविक रूप से तुम्हारे मन में धारणाएँ प्रकट होती हैं और तब तुम परमेश्वर से शिकायत करते हो, बहस करते हो और उससे स्पर्धा करते हो, और ये परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंधों में तेजी से बदलाव लाते हैं : तुम शुरुआत में यह महसूस करने से कि तुम परमेश्वर से बहुत प्रेम करते हो, उसके प्रति बहुत वफादार हो, उसे अपना पूरा जीवन समर्पित कर देना चाहते हो, वहाँ से निकल कर तुम एकाएक अपना इरादा बदल लेते हो, और अब तुम अपना कर्तव्य नहीं निभाना चाहते हो और परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं रहना चाहते हो, और परमेश्वर में अपने विश्वास और इस मार्ग को चुनने को ले कर तुम्हें पछतावा होता है, यहाँ तक कि परमेश्वर द्वारा चुने जाने पर भी शिकायत करते हो। दूसरी और कौन-सी धारणाएँ परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंधों में एकाएक बदलाव लाने में समर्थ हैं? (जब परमेश्वर मेरा परीक्षण करने के लिए कोई स्थिति निर्मित करता है और मेरा खुलासा करता है और मुझे लगता है कि मेरे पास एक अच्छा परिणाम नहीं होगा तो मैं परमेश्वर के बारे में धारणाएँ बना लेता हूँ। मुझे लगता है कि मैं परमेश्वर में विश्वास कर उसका अनुसरण करता हूँ, और मैंने हमेशा अपना कर्तव्य निभाया है, तो अगर मैं परमेश्वर का त्याग न करूँ, तो उसे मुझे छोड़ना नहीं चाहिए।) यह एक तरह की धारणा है। क्या तुम लोगों के मन में अक्सर ऐसी धारणाएँ होती हैं? परमेश्वर द्वारा छोड़ दिए जाने को लेकर तुम लोगों की क्या समझ है? क्या तुम सोचते हो कि यदि परमेश्वर तुम्हें छोड़ देता है, तो इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर तुम्हें नहीं चाहता और वह तुम्हें नहीं बचाएगा? यह एक दूसरे प्रकार की धारणा है। तो ऐसी धारणा कैसे आती है? क्या यह तुम्हारी कल्पना से आती है या इसका कोई आधार है? तुम कैसे जानते हो कि परमेश्वर तुम्हें अच्छा परिणाम नहीं देगा? क्या यह बात खुद परमेश्वर ने तुम्हें बतायी थी? ऐसे विचार पूरी तरह से एक ऐसा फैसला हैं जो तुमने दिया है। अब तुम जान गए हो कि यह एक धारणा है; अहम सवाल यह है कि इसे कैसे सुलझाया जाए। लोगों के मन में परमेश्वर में आस्था को लेकर वास्तव में अनेक धारणाएँ होती हैं। यदि तुम्हें एहसास हो कि तुम्हारे मन में कोई धारणा है, तो तुम्हें जान लेना चाहिए कि यह गलत है। तो इन धारणाओं को कैसे दूर करना चाहिए? पहले, तुम्हें यह स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि क्या ये धारणाएँ ज्ञान से आती हैं या शैतानी फलसफों से, खोट कहाँ है, हानि कहाँ है, और एक बार यह स्पष्ट रूप से समझ लेने के बाद, तुम स्वाभाविक रूप से धारणा को जाने दे पाओगे। हालाँकि यह तुम्हारे इसे अच्छी तरह से दूर कर देने के समान नहीं है; तुम्हें अभी भी सत्य खोजना चाहिए, समझना चाहिए कि परमेश्वर की अपेक्षाएँ क्या हैं, और फिर परमेश्वर के वचनों के अनुसार धारणा का विश्लेषण करना चाहिए। जब तुम स्पष्ट रूप से पहचान सकोगे कि धारणा गलत है, यह एक बेतुकी बात है, यह सत्य के अनुरूप बिल्कुल भी नहीं है, तो इसका अर्थ है कि तुमने बुनियादी तौर पर धारणा को दूर कर दिया है। यदि तुम सत्य नहीं खोजते, धारणा को परमेश्वर के वचनों की कसौटी पर नहीं कसते, तो तुम यह स्पष्ट रूप से पहचान नहीं पाओगे कि धारणा किस तरह गलत है, और इसलिए तुम धारणा को पूरी तरह से छोड़ नहीं पाओगे; भले ही तुम्हें मालूम हो कि यह एक धारणा है, फिर भी तुम इसे अनिवार्यतः पूरी तरह से जाने नहीं दे पाओगे। ऐसे हालात में, जब तुम्हारी धारणाएँ परमेश्वर की अपेक्षाओं के प्रतिकूल हों, और भले ही शायद तुम्हें एहसास हो जाए कि तुम्हारी धारणाओं के गलत होने पर भी तुम्हारा दिल तुम्हारी धारणाओं से चिपका हुआ है, और तुम पक्के तौर पर जानते हो कि तुम्हारी धारणाएँ सत्य के प्रतिकूल हैं, फिर भी अपने दिल में अब भी यह मानते हो कि तुम्हारी धारणाएँ उचित हैं, तब तुम ऐसे व्यक्ति नहीं होगे जो सत्य समझता है, और तुम जैसे लोगों के पास कोई जीवन प्रवेश नहीं होता और तुममें आध्यात्मिक कद का बेहद अभाव होता है। मिसाल के तौर पर, लोग अपने परिणाम और गंतव्य और अपने कर्तव्य संबंधी स्थिति में बदलाव तथा बर्खास्त किए जाने के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। कुछ लोग अक्सर ऐसी चीजों के बारे में गलत निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं, वे सोचते हैं कि जैसे ही वे बर्खास्त किए जाएँगे, और जब उनके पास अब और कोई रुतबा नहीं होगा या फिर परमेश्वर कहेगा कि वह उन्हें पसंद नहीं करता या अब उन्हें नहीं चाहता है तो उनके लिए सब कुछ खत्म हो चुका होगा। वे यह फैसला देते हैं। उन्हें लगता है, “परमेश्वर में विश्वास रखने की कोई तुक नहीं है, परमेश्वर मुझे नहीं चाहता है और मेरा परिणाम पहले से निर्धारित है तो अब जीने की क्या तुक है?” दूसरे लोग ऐसे विचार सुनकर उन्हें विवेकपूर्ण और गरिमामय समझते हैं—लेकिन वास्तव में, यह कैसी सोच है? यह परमेश्वर के प्रति विद्रोहशीलता है, यह खुद को मायूसी में छोड़ देना है। वे खुद को मायूसी में क्यों छोड़ देते हैं? इसलिए कि वे परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते हैं, वे स्पष्ट रूप से नहीं समझ सकते हैं कि परमेश्वर लोगों को किस तरह बचाता है, और वे परमेश्वर में सच्ची आस्था नहीं रखते हैं। जब लोग खुद को निराशा के हवाले कर देते हैं, तो क्या परमेश्वर जानता है? (हाँ।) परमेश्वर जानता है तो फिर वह ऐसे लोगों से कैसे पेश आता है? लोग एक तरह की धारणा बना लेते हैं और कहते हैं, “परमेश्वर ने मनुष्य पर अपने दिल का बहुत सारा खून खपाया है, उसने हर व्यक्ति पर बहुत काम किया है और बहुत प्रयास किए हैं; परमेश्वर के लिए किसी व्यक्ति को चुनना और बचाना आसान नहीं है। अगर कोई व्यक्ति खुद को मायूसी में छोड़ देगा, तो परमेश्वर बहुत आहत होगा और हर दिन यही उम्मीद करेगा कि वह व्यक्ति स्वयं को फिर से उठा लेगा।” यह अर्थ सतही स्तर पर है, लेकिन वास्तव में यह भी इंसान की ही धारणा है। परमेश्वर ऐसे लोगों के प्रति एक विशेष रवैया अपनाता है : यदि तुम खुद को मायूसी में छोड़ देते हो और आगे बढ़ने की कोशिश नहीं करते, तो वह तुम्हें खुद चुनने देगा; वह तुम्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध कुछ भी करने पर मजबूर नहीं करेगा। यदि तुम कहते हो, “मैं अभी भी एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना चाहता हूँ, मैं परमेश्वर के कहे अनुसार अभ्यास करने और उसके इरादों को पूरा करने के लिए सब कुछ कर सकता हूँ। मैं अपने सभी गुणों और प्रतिभाओं का प्रयोग करूँगा, और अगर मैं किसी भी काम के काबिल नहीं हूँ तो मैं समर्पण करना और आज्ञाकारी बनना सीखूँगा; मैं अपना कर्तव्य नहीं छोडूँगा,” परमेश्वर कहता है, “यदि तुम इस तरह से जीने को तैयार हो, तो अनुसरण करते रहो, लेकिन परमेश्वर जैसा कहे, तुम्हें वैसा ही करना चाहिए; परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानक और उसके सिद्धांत नहीं बदलते।” इन वचनों का क्या अर्थ है? इनका मतलब है कि सिर्फ लोग ही खुद को छोड़ सकते हैं; परमेश्वर कभी किसी को छोड़ नहीं देता है। यदि कोई अंततः उद्धार पाकर परमेश्वर को निहारने में समर्थ है, परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित कर परमेश्वर के सामने आ सकता है, तो ऐसा उसके असफल होने पर या एक ही बार उसकी काट-छाँट होने पर हासिल नहीं किया जा सकता या एक ही बार उसका न्याय करने और ताड़ना देने पर हासिल नहीं किया जा सकता। पूर्ण बनाए जाने से पहले पतरस का सैकड़ों बार शोधन किया गया था। अंत तक श्रम करने के बाद बने रहने वालों में ऐसा एक भी नहीं होगा जिसने अंत तक पहुँचने से पहले केवल आठ या दस बार परीक्षणों और शोधन का अनुभव किया हो। किसी व्यक्ति का चाहे जितनी भी बार परीक्षण और शोधन किया जाए, क्या यह परमेश्वर का प्रेम नहीं है? (हाँ, है।) जब तुम परमेश्वर के प्रेम को देख सकते हो तो तब तुम मनुष्य के प्रति परमेश्वर के रवैये को समझ सकते हो।

जब कुछ लोग परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं और देखते हैं कि वह अपने वचनों में लोगों की निंदा कर रहा है तो वे धारणाएँ बना लेते हैं और प्रतिरोधी महसूस करते हैं। मिसाल के तौर पर, परमेश्वर के वचन कहते हैं कि चूँकि तुम सत्य को स्वीकार नहीं करते, इसलिए परमेश्वर तुम्हें पसंद नहीं करता या स्वीकार नहीं करता, तुम कुकर्मी हो, मसीह-विरोधी हो, वह बस तुम्हें देखने भर से नाराज हो जाता है, और वह तुम्हें नहीं चाहता। लोग ये वचन पढ़कर सोचते हैं, “ये वचन मेरी ओर निर्देशित हैं। परमेश्वर ने तय कर लिया है कि वह मुझे नहीं चाहता, और चूँकि परमेश्वर ने मुझे त्याग दिया है, इसलिए मैं भी अब उसमें विश्वास नहीं रखूँगा।” कुछ ऐसे लोग भी हैं जो परमेश्वर के वचन पढ़कर अक्सर धारणाएँ और गलतफहमियाँ बना लेते हैं, क्योंकि परमेश्वर लोगों की भ्रष्ट दशाओं को उजागर करता है और उनकी निंदा करते हुए कुछ बातें कहता है। वे यह सोच कर नकारात्मक और कमजोर हो जाते हैं कि वे ही परमेश्वर के वचनों का निशाना थे, परमेश्वर उन्हें छोड़ रहा है, और वह उन्हें नहीं बचाएगा। वे इतने निराश हो जाते हैं कि उन्हें आँसू आ जाते हैं और अब परमेश्वर का अनुसरण नहीं करना चाहते। यह वास्तव में परमेश्वर को लेकर गलतफहमी है। जब तुम परमेश्वर के वचनों का अर्थ नहीं समझते, तो तुम्हें परमेश्वर पर फैसला देने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। तुम नहीं जानते कि परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति को त्यागता है, और वह लोगों को किन हालात में छोड़ता है, या वह लोगों को किन हालात में किनारे कर देता है; इन सभी के लिए सिद्धांत और संदर्भ हैं। अगर तुम्हें इन विस्तृत मामलों में पूरी अंतर्दृष्टि नहीं है, तो तुम्हारे अतिसंवेदनशील होने की बड़ी संभावना होगी और तुम परमेश्वर के केवल एक वचन के आधार पर खुद फैसला दे दोगे। क्या यह समस्यात्मक नहीं है? लोगों का न्याय करते समय परमेश्वर उनके किस मुख्य पहलू की निंदा करता है? परमेश्वर जिसका न्याय कर जिसे उजागर करता है, वह लोगों के भ्रष्ट स्वभाव और भ्रष्ट सार होते हैं, वह उनके शैतानी स्वभावों और शैतानी प्रकृति की निंदा करता है, वह परमेश्वर के प्रति उनके विद्रोह और विरोध की विभिन्न अभिव्यक्तियों और व्यवहारों की निंदा करता है, वह परमेश्वर के प्रति समर्पण न कर पाने, हमेशा परमेश्वर का विरोध करने, हमेशा अपनी अभिप्रेरणाएँ और लक्ष्य रखने के लिए उनकी निंदा करता है—लेकिन ऐसी निंदा का यह अर्थ नहीं है कि परमेश्वर ने शैतानी स्वभाव वाले लोगों को त्याग दिया है। अगर यह तुम्हें स्पष्ट नहीं है, तो तुममें समझने की क्षमता नहीं है, जो तुम्हें कुछ हद तक मानसिक रोग वाले लोगों जैसा बना देता है, हमेशा हर चीज के प्रति शक्की और परमेश्वर की गलत व्याख्या करने वाला। ऐसे लोगों में सच्ची आस्था नहीं है, फिर वे बिल्कुल अंत तक परमेश्वर का अनुसरण कैसे कर सकते हैं? परमेश्वर से निंदा का सिर्फ एक वक्तव्य सुन कर तुम सोचते हो कि परमेश्वर द्वारा निंदित होने के कारण लोग उसके द्वारा त्याग दिए गए हैं और अब वे बचाए नहीं जाएँगे, और इस वजह से तुम निराश हो जाते हो, और खुद को मायूसी में डुबो लेते हो। यह परमेश्वर की गलत व्याख्या करना है। असल में परमेश्वर ने लोगों को नहीं त्यागा है। उन्होंने परमेश्वर की गलत व्याख्या कर खुद को त्याग दिया है। लोग खुद को त्याग दें इससे ज्यादा गंभीर कुछ नहीं होता, जैसा कि पुराने नियम के वचनों में साकार हुआ है : “मूढ़ लोग निर्बुद्धि होने के कारण मर जाते हैं” (नीतिवचन 10:21)। लोग खुद को मायूसी में डुबो लें उससे ज्यादा मूर्खतापूर्ण व्यवहार कुछ भी नहीं है। कभी-कभी तुम परमेश्वर के ऐसे वचन पढ़ते हो जो लोगों पर फैसला देते लगते हैं; असल में ये किसी पर फैसला नहीं देते, बल्कि ये परमेश्वर के इरादों और राय की अभिव्यक्ति हैं। ये सत्य और सिद्धांत के वचन हैं, वे किसी पर फैसला नहीं दे रहे हैं। क्रोध या रोष के समय में बोले गए परमेश्वर के वचन उसका स्वभाव भी दर्शाते हैं, ये वचन सत्य हैं और इसके अलावा सिद्धांत हैं। लोगों को यह बात समझनी चाहिए। यह कहने के पीछे परमेश्वर का उद्देश्य लोगों को सत्य और सिद्धांतों को समझने देना है; यह किसी पर फैसला देने के लिए बिल्कुल नहीं है। इसका लोगों की अंतिम मंजिल और पुरस्कार से कोई लेना-देना नहीं है, यह लोगों का अंतिम दंड तो है ही नहीं। ये महज लोगों का न्याय करने और उनकी काट-छाँट करने के लिए बोले गए वचन हैं, ये लोगों के परमेश्वर की अपेक्षाओं पर खरे न उतरने पर उसके क्रोध का परिणाम हैं, ये लोगों को जगाने, उन्हें प्रेरित करने के लिए बोले गए हैं, और ये वचन परमेश्वर के दिल से निकले हैं। फिर भी कुछ लोग परमेश्वर द्वारा न्याय के सिर्फ एक वक्तव्य से गिर पड़ते हैं और उसका त्याग कर देते हैं। ऐसे लोग नहीं जानते कि उनके लिए अच्छा क्या है, उन पर विवेक का प्रभाव नहीं होता, और वे सत्य को बिल्कुल स्वीकार नहीं करते। कुछ लोग थोड़े समय के लिए कमजोर महसूस करते हैं और फिर वे यह सोच कर दोबारा परमेश्वर के समक्ष आते हैं, “यह सही नहीं है, मुझे परमेश्वर का अनुसरण करते रहना चाहिए, और वैसे ही करना चाहिए जैसी परमेश्वर की अपेक्षा हो। यदि मैं परमेश्वर का अनुसरण न करूँ या अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से न निभाऊँ, तो मेरा जीवन बेकार हो जाएगा। सार्थक जीवन जीने के लिए मुझे परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए।” तो वे परमेश्वर का अनुसरण कैसे करें? उन्हें परमेश्वर के कार्य का अनुभव अवश्य करना चाहिए। कोई सिर्फ यह कहे कि वह परमेश्वर में विश्वास रखता है पर वह परमेश्वर के कार्य का अनुभव न करे, तो यह परमेश्वर का अनुसरण करना नहीं है। पूर्व में समर्पित होकर अपना कर्तव्य न निभाना और थोड़ी काट-छाँट स्वीकारने को तैयार न होना—क्या किसी को परमेश्वर का कार्य स्वीकारते समय यह रवैया अपनाना चाहिए? काट-छाँट किए जाने को न स्वीकारना और थोड़ा भी दुख झेलने पर लगातार शिकायत करते रहना—यह कैसा स्वभाव है? व्यक्ति को आत्मचिंतन करना चाहिए और समझना चाहिए कि परमेश्वर की अपेक्षा क्या है, और उसे वैसा ही करना चाहिए जैसी कि परमेश्वर की अपेक्षा हो। यदि परमेश्वर कहता है कि तुम ज्यादा अच्छे नहीं हो, तो तुम ज्यादा अच्छे नहीं हो, और तुम्हें चीजों पर फैसला देने या परमेश्वर का विरोध करने के लिए अपनी धारणाओं और कल्पनाओं का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए; तुम्हें समर्पण कर यह स्वीकारना चाहिए कि तुम ज्यादा अच्छे नहीं हो। तब क्या तुम्हारे सामने अभ्यास का पथ नहीं होगा? यदि कोई सत्य का अभ्यास कर परमेश्वर को समर्पित हो पाता हो, तो क्या वह तब भी परमेश्वर को छोड़ सकेगा? नहीं, नहीं छोड़ सकेगा। ऐसा भी समय होता है जब तुम मानते हो कि परमेश्वर ने तुम्हें छोड़ दिया है—लेकिन दरअसल, परमेश्वर ने तुम्हें छोड़ नहीं दिया है, वह तुम्हें एक तरफ रख देता है ताकि तुम आत्मचिंतन कर सको। परमेश्वर को शायद तुम घिनौने लगो, और वह तुम पर ध्यान न देना चाहे, लेकिन उसने तुम्हें सचमुच त्यागा नहीं है। ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य निभाने के लिए प्रयास करते हैं, लेकिन उनके सार और उनमें अभिव्यक्त अनेक चीजों के कारण, परमेश्वर देख लेता है कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते और सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते, और इसलिए परमेश्वर उन्हें वास्तव में त्याग देता है; वे सच में चुने नहीं गए थे, उन्होंने बस कुछ समय तक सेवा की थी। इसी बीच ऐसे भी कुछ लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर अनुशासित करने, ताड़ना देने, न्याय करने और यहाँ तक कि निंदा कर शाप देने के भरसक प्रयास करता है, और इसके लिए वह उनसे पेश आने के ऐसे विभिन्न तरीके इस्तेमाल करता है जो मनुष्य की धारणाओं के प्रतिकूल होते हैं। कुछ लोग परमेश्वर का इरादा नहीं समझते, और सोचते हैं कि परमेश्वर उन्हें बार-बार निशाना बनाकर उनका दिल दुखा रहा है। वे सोचते हैं कि परमेश्वर के समक्ष जीने में कोई गरिमा नहीं है, वे अब परमेश्वर को आहत नहीं करना चाहते और कलीसिया को छोड़ देना चाहते हैं। वे यह भी सोचते हैं कि यूँ करने के पीछे एक कारण है, और इस तरह वे परमेश्वर से मुँह मोड़ लेते हैं—लेकिन दरअसल परमेश्वर ने उनका त्याग नहीं किया था। ऐसे लोगों को परमेश्वर के इरादे का कोई अनुमान नहीं होता है। वे थोड़े ज्यादा ही संवेदनशील होते हैं, और परमेश्वर का उद्धार छोड़ने की हद तक चले जाते हैं। क्या इन लोगों के भीतर सच में जमीर है? ऐसा समय भी होता है जब परमेश्वर लोगों को दूर रखता है, ऐसा समय भी होता है जब वह उन्हें कुछ समय के लिए किनारे कर देता है ताकि वे आत्मचिंतन कर सकें, लेकिन परमेश्वर उनका त्याग नहीं करता; वह उन्हें प्रायश्चित्त करने का अवसर देता है। परमेश्वर सिर्फ दुष्ट लोगों को त्याग देता है जो अनेक बुरे कर्म करते हैं, जो छद्म-विश्वासी और मसीह-विरोधी हैं। कुछ लोग कहते हैं, “मुझे लगता है कि मुझमें पवित्र आत्मा ने कार्य नहीं किया है, बहुत समय से मुझे पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता नहीं मिली है। क्या परमेश्वर ने मुझे त्याग दिया है?” यह एक गलतफहमी है। इसमें स्वभाव की समस्या भी है : लोग अत्यधिक भावुक होते हैं, वे हमेशा अपने तर्क के पीछे चलते हैं, हमेशा हठी और तर्कहीन होते हैं—क्या यह स्वभाव की समस्या नहीं है? तुम कहते हो कि परमेश्वर ने तुम्हें त्याग दिया है, वह तुम्हें नहीं बचाएगा, तो क्या उसने तुम्हारा परिणाम निर्धारित कर दिया है? परमेश्वर ने तुमसे गुस्से में सिर्फ कुछ वचन बोले हैं। तुम कैसे कह सकते हो कि उसने तुम्हें छोड़ दिया है, वह तुम्हें अब नहीं चाहता? ऐसे मौके आते हैं जब तुम पवित्र आत्मा का कार्य महसूस नहीं कर सकते, लेकिन परमेश्वर ने तुम्हें अपने वचन पढ़ने से वंचित नहीं किया है, न ही उसने तुम्हारा परिणाम नियत किया है या उद्धार का तुम्हारा रास्ता बंद किया है—तो फिर तुम किस बात को ले कर इतने उदास हो? तुम एक बुरी दशा में हो, तुम्हारी मंशाओं के साथ समस्या है, तुम्हारे विचार और नजरिए के साथ समस्याएँ हैं, तुम्हारी मानसिक दशा विकृत है—फिर भी तुम सत्य खोज कर इन चीजों को दुरुस्त करने की कोशिश नहीं करते, बल्कि इसके बजाय निरंतर परमेश्वर की गलत व्याख्या कर उसके बारे में शिकायत करते हो, परमेश्वर पर जिम्मेदारी डालते हो, और यह भी कहते हो, “परमेश्वर मुझे नहीं चाहता, इसलिए मैं अब उसमें विश्वास नहीं रखता।” क्या तुम तर्कहीन नहीं हो? क्या तुम अनुचित नहीं हो? ऐसा व्यक्ति अत्यधिक भावुक होता है, बिल्कुल नासमझ होता है, हर तर्क के लिए अभेद्य होता है। वे सत्य को बहुत कम स्वीकार कर पाते हैं और उनके लिए उद्धार प्राप्त करना बहुत मुश्किल होगा।

ये वचन याद रखो : पतरस को सैकड़ों बार शोधन के बाद पूर्ण बनाया गया था। तुम लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं में, सैकड़ों बार शोधन किए जाने का अर्थ है परमेश्वर का अनुसरण करने और अंत में क्रूस पर उलटा चढ़ाए जाने के लिए अनकही मुश्किलों का शानदार जीवन जीना। लेकिन बात ऐसी नहीं है; यह महज मनुष्य की धारणा है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि यह मनुष्य की धारणा है? इसलिए कि लोग नहीं समझते कि परमेश्वर के परीक्षण क्या हैं और यह कि प्रत्येक परीक्षण परमेश्वर के हाथों ही व्यवस्थित कर किया जाता है; लोग इस “सैकड़ों बार” को नहीं समझते या यह नहीं समझते कि परमेश्वर ने पतरस का “सैकड़ों बार” शोधन क्यों किया या यह “सैकड़ों बार” कैसे हुआ, या इसका मूल कारण क्या था—लोग ये चीजें नहीं जानते, इसके बजाय चीजों को समझने के लिए हमेशा अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के भरोसे रहते हैं, और नतीजतन वे परमेश्वर को गलत समझते हैं। लोग परमेश्वर के उन कुछ वचनों को नहीं समझ पाते, जिनका उन्होंने अनुभव नहीं किया है। असल जीवन में, यदि परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति को केवल आशीष दे, उनका मार्गदर्शन करे और उनसे शांति से बात करे, तो परीक्षण लोगों के लिए सदा सिर्फ खोखले शब्द होंगे, एक शब्द, परिभाषा या अवधारणा से ज्यादा कुछ नहीं होंगे। हालाँकि परमेश्वर अक्सर तुम पर यह कार्य करता है : अभी तुम्हें बीमार कर देता है, अभी तुम्हारा सामना किसी अप्रिय चीज से करवा देता है जिससे तुम हतोत्साहित और कमजोर हो जाते हो, अभी तुम्हारा सामना किसी ऐसी मुश्किल स्थिति से करवा देता है, जिससे निपटना तुम्हें बहुत कठिन लगता है, और तुम नहीं जानते कि क्या करना सही है—ये चीजें तुम्हारे लिए क्या हैं? इन तमाम अप्रिय चीजों, इन तमाम कष्टों, मुश्किलों या तकलीफों, या शैतान के प्रलोभनों की बात पर भी, यदि तुम हमेशा उन्हें परमेश्वर द्वारा तुम्हें दिए गए परीक्षणों के रूप में ले सको, मान सको कि प्रत्येक परीक्षण सैकड़ों में से एक है, और तुम उन्हें स्वीकार कर उनके भीतर सत्य को खोज सको, तो तुम्हारी दशा में परिवर्तन होगा और परमेश्वर के साथ तुम्हारे रिश्ते में सुधार होगा। लेकिन यदि परीक्षणों का सामना होने पर तुम उन्हें ठुकरा दो, उनसे छिपने, उनका प्रतिरोध और विरोध करने की निरंतर कोशिश करते रहो, तो ये “सैकड़ों परीक्षण” सदा तुम्हारे लिए खोखले शब्द ही होंगे, जो कभी साकार नहीं होंगे। मिसाल के तौर पर, कोई तुम्हारे प्रति बुरा रवैया रखता हो, और इसका कारण जाने बिना तुम दुखी हो जाते हो। यदि तुम गर्ममिजाजी में जीते हो, अपने देह में जीते हो, तो तुम्हारे पास भी उनके साथ अप्रिय होने का बहाना है—दाँत के बदले दाँत, आँख के बदले आँख। लेकिन यदि तुम परमेश्वर के समक्ष जीते हो, और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया और बचाया जाना चाहते हो, तो जिन सब चीजों का तुम सामना कर रहे हो, उन्हें परमेश्वर के एक परीक्षण के रूप में लेकर स्वीकार लेना चाहिए; असल में, यह उन विभिन्न तरीकों में से एक है जिससे परमेश्वर तुम्हारा परीक्षण करता है। इस तरह संगति करके क्या तुम लोग अब अपने दिलों में बहुत अधिक मुक्त और काफी ज्यादा राहत महसूस कर रहे हो? यदि तुम लोग इन वचनों के अनुसार अभ्यास कर सको, अपने व्यवहार और नजरियों की इन वचनों से तुलना कर सको, तो तुम्हें इससे अपने दैनिक जीवन में परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं को समर्पित होने में बड़ी सहायता मिलेगी।

परमेश्वर में विश्वास को लेकर लोगों की धारणाओं पर आज की चर्चा में कौन-से मुख्य पहलू हैं? एक है लोगों के बाहरी व्यवहार का पहलू, फरीसियों की ही तरह झूठा बर्ताव करना, अत्यंत परिष्कृत और सुशील ढंग से पेश आना; दूसरा पहलू है रोटी, कपड़ा, मकान और यात्रा का; परमेश्वर में विश्वास को लेकर लोगों की समझ का एक और पहलू है, यह सोचना कि परमेश्वर में विश्वास रखने से उन्हें आशीष प्राप्त होने चाहिए और उन्हें लाभ दिए जाने चाहिए। इस पहलू को लेकर अय्यूब का अनुभव क्या था? जब अय्यूब को परीक्षणों का सामना करना पड़ा, तो वह यह सुनिश्चित कर पाया कि ये परमेश्वर से आए थे, उसने कोई गलत काम नहीं किया था और यह परमेश्वर का दंड नहीं था, बल्कि यह परमेश्वर द्वारा उसका परीक्षण करना था और शैतान द्वारा उसे प्रलोभन देना था—उसने इसे इसी तरह से समझा। और अय्यूब के मित्रों ने इसे कैसे समझा? उन्होंने माना कि यह विपदा अय्यूब पर इसलिए टूटी होगी क्योंकि उसने कुछ गलत किया था और परमेश्वर का अपमान किया था। उनका इस तरह सोचना यह दर्शाता है कि उनके मन में परमेश्वर में विश्वास को लेकर धारणाएँ थीं। अय्यूब की समझ दूसरों से अलग क्यों थी? इसलिए कि अय्यूब ने स्पष्ट देख लिया था कि क्या हो रहा है, और इसलिए उसने इस बारे में कोई धारणाएँ नहीं पालीं। जब परमेश्वर अय्यूब पर अपना कार्य कर रहा था, तब अय्यूब ने अनुभव प्राप्त कर परमेश्वर के कार्य को जान लिया, और मनुष्य की ये धारणाएँ और विचार अब अय्यूब में नहीं मिलने वाले थे। और इसलिए जब परमेश्वर का हाथ अय्यूब पर पड़ा, तो क्या उसने गलत समझा? (नहीं।) उसने गलत नहीं समझा और इसलिए उसने शिकायत नहीं की; उसने गलत नहीं समझा और इसलिए उसने विद्रोह नहीं किया; उसने गलत नहीं समझा और इसलिए वह सचमुच समर्पित हो पाया। क्या यह सही नहीं है? (हाँ।) यह सही क्यों है? यदि लोग परमेश्वर के वचनों पर अपने दिल में “आमीन” कहते हैं, परमेश्वर के वचनों को सकारात्मक चीजों की वास्तविकता के रूप में लेते हैं, उस चीज के रूप में जोकि सही है, मानक है, सर्वोपरि है, और उन सिद्धांतों के रूप में लेते हैं जिनका उन्हें अभ्यास करना चाहिए, तो वे समर्पण करेंगे, गलत नहीं समझेंगे। जब लोग परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों या उसके द्वारा किए गए कार्यों के बारे में गलतफहमियाँ पैदा करते हैं, तो इसके लिए हमेशा एक अभिव्यक्ति होती है—वह अभिव्यक्ति क्या है? (वे उन्हें स्वीकारने को तैयार नहीं हैं।) और परमेश्वर के वचनों और कार्यों को स्वीकारने की अनिच्छा के पीछे क्या होता है? यह कि उनके अपने विचार हैं, और इन विचारों का परमेश्वर के वचनों से विरोधाभास और टकराव होता है, और फिर लोग परमेश्वर के बारे में गलतफहमियाँ और धारणाएँ पाल लेते हैं, यह मानकर कि परमेश्वर जो कुछ कहता है, वह अनिवार्य रूप से सही नहीं है। कभी-कभी भले ही लोग उन्हें स्वीकारते हुए दिखें, फिर भी यह सिर्फ दिखावा है, सच्ची स्वीकृति नहीं है। सत्य को खोजने के द्वारा व्यक्ति को पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों और अपेक्षाओं के अनुसार सोचना चाहिए, और दिल से परमेश्वर के वचनों से सहमत होना चाहिए, और केवल तभी वह परमेश्वर के अनुकूल हो पाएगा। यदि तुम इन चीजों को दिल से नहीं स्वीकारते, और गलत समझकर उनका विरोध और प्रतिरोध करते हो, तो यह दर्शाता है कि तुम्हारे भीतर कुछ है। यदि तुम अपने भीतर की इस चीज का गहन-विश्लेषण कर सत्य को खोज सको, तो तुम्हारी धारणाएँ हल हो सकती हैं; यदि तुम्हारी समझ विकृत है, तुम्हें कोई आध्यात्मिक समझ नहीं है, या तुममें समझ की क्षमता नहीं है, तुम परमेश्वर के वचनों से अपनी धारणाओं की तुलना करने में बिल्कुल नाकाबिल हो, उन्हें जानने और उनका विश्लेषण करने में असमर्थ हो, और जान ही नहीं पाते कि कब तुम्हारे भीतर धारणाएँ उभरती हैं, तो तुम्हारी धारणाएँ दूर नहीं हो सकेंगी। कुछ लोग अच्छी तरह जानते हैं कि उनके दिलों में परमेश्वर को लेकर धारणाएँ हैं, फिर भी वे कहते हैं कि ऐसा कुछ नहीं है, वे डरते हैं कि अगर वे बता देंगे तो उनकी नाक कट जाएगी और लोग उन्हें नीची नजर से देखेंगे। यदि कोई उनसे पूछे, “यदि तुमने परमेश्वर को गलत नहीं समझा है, तो ऐसा क्यों है कि तुम उसे समर्पित नहीं हो पाते हो?” तो वे जवाब देते हैं, “मैं अभ्यास करने का तरीका नहीं जानता हूँ।” यह कैसी अभिव्यक्ति है? यदि तुम्हें कोई आध्यात्मिक समझ नहीं है, यदि तुम समझ-बूझ के काबिल नहीं हो, और नहीं जानते कि कोई समस्या आने पर आत्मचिंतन कैसे करें, तो तुम परमेश्वर को लेकर अपनी धारणाओं या गलतफहमियों को हल नहीं कर पाओगे। जब ऐसी चीजें होती हैं जो तुम्हारी धारणाओं से संबंधित न हों, तो तुम बहुत शांत महसूस करते हो, और यह नहीं देखा जा सकता कि तुम्हें कोई समस्या है। हालाँकि जैसे ही कोई ऐसी चीज होती है जो तुम्हारी धारणाओं को छूती हो, तो तुम्हारे अंदर परमेश्वर के प्रति प्रतिरोध पैदा हो जाता है। यह प्रतिरोध कैसे अभिव्यक्त होता है? कभी-कभी शायद तुम्हें गुस्सा आए, और समय के साथ इस भावना का समाधान न होने पर, परमेश्वर के बारे में तुम्हारी गलतफहमियाँ और ज्यादा जड़ें जमा लेंगी और तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव फैल जाएगा, और तुम अपनी धारणाओं की भड़ास निकालकर परमेश्वर की आलोचना करने लगोगे। जैसे ही तुम परमेश्वर की आलोचना करते हो, वैसे ही यह सोच या व्यवहार की समस्या नहीं रह जाती, बल्कि शैतानी स्वभाव का प्रकटन बन जाती है। यदि कोई सिर्फ अज्ञानता के कारण थोड़ा सा प्रतिरोध दर्शाता है या उसके व्यवहार में समर्पण नहीं होता है तो परमेश्वर इसकी निंदा नहीं करता है; यदि कोई अपने स्वभाव से परमेश्वर का सीधे तौर पर प्रतिरोध करता है और ऐसा वह जानबूझकर करता है तो यह उसके लिए मुसीबत खड़ी करेगा, और वह परमेश्वर की अवज्ञा कर रहा होगा। जब कोई जानबूझकर परमेश्वर की अवज्ञा करता है, तो यह परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध एक अपमान है। इसलिए मन में धारणाएँ होने पर लोगों को उन्हें हल करना चाहिए; अपनी धारणाएँ हल करने के बाद ही लोग परमेश्वर और अपने बीच की गलतफहमियाँ हल कर सकते हैं; और उनके और परमेश्वर के बीच की गलतफहमियाँ हल होने के बाद ही वे सच में परमेश्वर को समर्पित हो सकते हैं। कुछ लोग कहते हैं, “मेरे मन में कोई धारणा नहीं है, और मेरे और परमेश्वर के बीच की गलतफहमियाँ हल हो गई हैं। अब मैं किसी भी चीज के बारे में नहीं सोचता हूँ।” क्या यह काफी है? धारणाएँ हल करने का उद्देश्य केवल उन्हें हल करना नहीं है, बल्कि यह परमेश्वर की अपेक्षाओं और सत्य के अनुसार अभ्यास करना, परमेश्वर को समर्पित होना और परमेश्वर को संतुष्ट करना है। कुछ लोग कहते हैं, “अगर मेरे मन में परमेश्वर को लेकर कोई गलतफहमी न हो तो यह काफी है, सब कुछ ठीक होगा, और मैं सुरक्षित रहूँगा।” यह सचमुच सत्य का अभ्यास करना नहीं है, न ही यह सच्चा समर्पण है—समस्या अभी भी हल नहीं हुई है। यदि समस्या सचमुच हल हो गई होती, तो न सिर्फ लोगों के मन में परमेश्वर को लेकर कोई गलतफहमी नहीं होती, बल्कि वे यह भी जानते कि परमेश्वर की अपेक्षाएँ क्या हैं और उनके साथ होने वाली चीजों में उसके इरादे क्या हैं। वे न सिर्फ अपनी धारणाओं का गहन-विश्लेषण कर पाएँगे बल्कि धारणाओं वाले लोगों की यह सीखने में भी मदद कर पाएँगे कि सत्य को कैसे खोजें, सत्य का अभ्यास कैसे करें और परमेश्वर की अपेक्षाएँ कैसे पूरी करें। क्या वे तब परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं होंगे? धारणाओं को हल करने का अंतिम लक्ष्य परमेश्वर के इरादों को समझना और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करना है—यही अहम है। तुम कहते हो कि तुमने मन में परमेश्वर के बारे में कोई गलतफहमी नहीं पाली है, तो क्या तुम सत्य को समझते हो? यदि तुम सत्य को नहीं समझते हो, तो भले ही तुम्हारे मन में कोई धारणा या गलतफहमी न हो, तुम अब भी परमेश्वर को समर्पण करने वाले व्यक्ति नहीं हो। कोई गलतफहमी न होने का यह अर्थ नहीं है कि तुम परमेश्वर को समझते हो, यह अर्थ तो बिल्कुल भी नहीं है कि तुम उसके प्रति समर्पण करने के काबिल हो। सब कुछ ठीक होने पर लोगों के मन में परमेश्वर को लेकर कोई धारणा या गलतफहमी नहीं होती, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि उनके मन में परमेश्वर को लेकर कोई धारणा या गलतफहमी है ही नहीं। जब उनके साथ उनके निजी हितों को प्रभावित करने वाली कोई चीज हो जाती है, तब स्वाभाविक रूप से उनके मन में धारणाएँ उभरती हैं और वे परमेश्वर के बारे में गलतफहमियाँ बना लेते हैं और शिकायतें तक करते हैं। जब लोग अपने निजी हितों को इतना ज्यादा अहम मानते हैं, तो क्या वे परमेश्वर को समर्पित हो सकेंगे? ऐसा क्यों है कि जब किसी के निजी हितों को प्रभावित करने वाली कोई चीज हो जाती है, तो उसके चलते उनके मन में धारणाएँ और गलतफहमियाँ पैदा हो जाती हैं, और वे परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह कर उसकी अवज्ञा करते हैं? शैतानी प्रकृति और शैतानी स्वभाव वाले लोगों के साथ ऐसे ही होता है। जब उनके निजी हितों को प्रभावित करने वाली कोई चीज हो जाती है तो वे अब परमेश्वर को समर्पित नहीं हो पाते, और तब भी परमेश्वर को समर्पित नहीं हो पाते जब कोई ऐसी चीज हो जाती है जो उनकी धारणाओं और कल्पनाओं के विपरीत होती है। लोगों की स्थिति के अनुसार परमेश्वर के प्रति उनकी धारणाएँ और गलतफहमियाँ पैदा होती हैं। यदि वे सत्य खोज नहीं पाते और उसे स्वीकार नहीं कर पाते, तो उनकी धारणाएँ कभी हल नहीं होंगी और परमेश्वर के साथ उनका रिश्ता कभी भी फिर से सामान्य नहीं हो पाएगा। जो लोग मन में धारणाएँ रखते हैं, पर उन्हें हल करने के लिए सत्य नहीं खोजते, वे परमेश्वर द्वारा नहीं बचाए जाएँगे, भले ही उन्होंने जितने भी वर्ष उसमें विश्वास रखा हो।

परमेश्वर द्वारा मनुष्य का उद्धार केवल खोखली बातें नहीं है। वह ये सत्य इसलिए व्यक्त करता है ताकि भ्रष्ट मानवजाति की उन विभिन्न चीजों से निपटा जा सके जो सत्य के विपरीत हैं—उसकी धारणाएँ, कल्पनाएँ, ज्ञान, फलसफे, पारंपरिक संस्कृति, इत्यादि—इन चीजों का विश्लेषण करके, मनुष्य को समझने देता है कि सकारात्मक चीजें किससे बनती हैं और नकारात्मक चीजें किससे, कौन-सी चीजें परमेश्वर से आती हैं, कौन-सी चीजें शैतान से आती हैं, सत्य क्या है, शैतान के फलसफे और तर्क क्या हैं। जब लोग इन चीजों को साफ तौर पर देख पाएँगे, तो वे सहज ही जीवन का सही मार्ग चुनेंगे, वे सत्य का अभ्यास कर पाएँगे, परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार चल पाएँगे और नकारात्मक चीजों को पहचान पाएँगे। यही इंसान से परमेश्वर अपेक्षा रखता है और इसी मानक से वह लोगों को पूर्ण करता है और बचाता है। कुछ लोग कहते हैं, “परमेश्वर मनुष्य की धारणाओं का विश्लेषण करता है, लेकिन मेरे अंदर तो कोई धारणा नहीं है। जिन लोगों में धारणाएँ होती हैं, वे आमतौर पर बहुत धूर्त और शातिर होते हैं, या फिर धर्मशास्त्री और फरीसी होते हैं। मैं वैसा नहीं हूँ।” ऐसी बात कह पाने में समस्या क्या है? वे खुद को नहीं जानते। उनके साथ सत्य पर चाहे जैसे भी संगति की जाए, वे यह सोच कर उसे खुद पर लागू नहीं करते कि वे ऐसे नहीं हैं। यह अज्ञानता है, उन्हें आध्यात्मिक समझ नहीं है। क्या तुम लोग इस तरह सोच पाए हो? आज ज्यादातर लोग ऐसा नहीं सोचते। जब किसी ने परमेश्वर के अनेक वचनों को खा-पी लिया हो, और वह कुछ सत्यों को समझ सकता हो, तो वह स्पष्ट रूप से देख सकता है कि सभी के पास धारणाओं और कल्पनाओं की चीजें हैं, और सभी के पास भ्रष्ट स्वभाव है। इन चीजों का विश्लेषण करने में कुछ भी शर्मनाक नहीं है; इसके अलावा, उनका विश्लेषण करने पर, वे मानते हैं कि इससे दूसरों को विवेक विकसित करने में मदद मिलेगी और वे स्वयं भी विकसित होकर सत्य को अधिक तेज़ी से समझने में सक्षम होंगे। यही कारण है कि वे सभी लोग खुलकर अपना विश्लेषण कर पाते हैं। धारणाओं का विश्लेषण करने का उद्देश्य क्या है? इनका उद्देश्य है धारणाओं को दर-किनार करना, मनुष्य और परमेश्वर के बीच की गलतफहमियों को दूर करना और फिर लोगों को इस योग्य बनाना कि वे परमेश्वर की अपेक्षाओं पर ध्यान केंद्रित कर सकें, उन्हें उद्धार के मार्ग पर कैसे प्रवेश करने का ज्ञान हो सके और वे जान सकें कि सत्य का अभ्यास करने के लिए क्या करना चाहिए। इस तरह अक्सर अभ्यास करने से, अंत में अभीष्ट प्रभाव प्राप्त होता है : एक पहलू यह है कि लोग परमेश्वर के इरादे समझ और उसके प्रति समर्पित हो पाएँगे और दूसरा पहलू यह है कि उन्हें बुरी धारणाओं और कल्पनाओं और ज्ञान से उपजने वाली चीजों जैसी नकारात्मक चीजों को नकारने तथा उनका विरोध करने की प्रतिरक्षा मिलेगी। जब कभी किसी धार्मिक बुद्धिजीवी, धर्मशास्त्री या किसी धार्मिक पादरी या एल्डर से तुम्हारा सामना होगा, तो उनसे बात करके ही तुम उनकी असलियत जान जाओगे और सत्य के जरिए तुम उनकी असंख्य धारणाओं, कल्पनाओं, पाखंड और भ्रांतियों का खंडन कर पाओगे। इससे पता चलता है कि तुम नकारात्मक चीजों की पहचान कर सकते हो, तुम थोड़ा-बहुत सत्य समझ गए हो, तुम्हारा एक विशिष्ट आध्यात्मिक कद है और तुम इन धार्मिक अगुआओं और हस्तियों से सामना होने पर घबराते नहीं हो। वे जिस ज्ञान, विद्वत्ता और फलसफे की बातें करते हैं, यहाँ तक कि उनकी सारी विचारधारा और सिद्धांत—अपुष्ट होते हैं, क्योंकि तुम धर्म के वचनों और धर्म-सिद्धांतों, धारणाओं और कल्पनाओं की असलियत जान चुके हो। और अब वे चीजें तुम्हें गुमराह नहीं कर सकतीं। लेकिन तुम लोग अभी तक वहाँ नहीं पहुँचे हो। जब तुम्हारा सामना इन धार्मिक धोखेबाजों, फरीसियों या किसी ऐसे व्यक्ति से होता है जो थोड़ा-बहुत रुतबे वाला होता है तो तुम लोग भयभीत हो जाते हो; यह जानते हुए भी कि वे जो कह रहे हैं वह गलत है, उनकी बातें धारणाओं और कल्पनाओं से निर्मित हैं, ज्ञान से पैदा हुई हैं, पर तुम लोगों को पता नहीं होता कि उसका खंडन कैसे करना है, उसका विश्लेषण कहाँ से शुरू करना है या उन लोगों को किन शब्दों से उजागर करना है। क्या इससे साबित नहीं होता कि तुमने अभी भी सत्य को समझा नहीं है? (जरूर।) इसलिए तुम लोगों को सत्य से युक्त हो जाना चाहिए, और एक बार सत्य को समझ लेने के बाद तुम फिर खुद विश्लेषण कर सकोगे और जान जाओगे कि लोगों का भेद कैसे पहचानें। जब सत्य को समझ लोगे, तो तुम लोगों को स्पष्ट रूप से समझ पाओगे, लेकिन यदि तुम सत्य को नहीं समझोगे, तो कभी भी लोगों को स्पष्ट रूप से नहीं समझ पाओगे। लोगों और चीजों की असलियत जानने के लिए, तुम्हें सत्य की समझ होनी चाहिए; सत्य को आधारशिला बनाए बिना, अपना जीवन बनाए बिना, तुम किसी भी चीज की गहराई में नहीं जा पाओगे।

जब लोग विभिन्न धारणाओं और कल्पनाओं को सुलझा लेते हैं, तो उन्हें परमेश्वर के वचनों का ज्ञान और अनुभव प्राप्त हो जाता है, साथ ही वे परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में भी प्रवेश कर चुके होते हैं। परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने की प्रक्रिया में, एक-एक करके, लोगों में उत्पन्न होने वाली विभिन्न धारणाएँ और कल्पनाएँ दूर हो जाती हैं, और परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के सार के बारे में लोगों के परमेश्वर-संबंधी ज्ञान में और लोगों के प्रति परमेश्वर की जो विभिन्न प्रवृत्तियाँ हैं, उनमें परिवर्तन आ जाता है। यह परिवर्तन कैसे लाया जाता है? यह तब लाया जाता है जब लोग विभिन्न इंसानी धारणाओं और कल्पनाओं को एक तरफ रख देते हैं, जब वे ज्ञान, फलसफों, पारंपरिक संस्कृति या दुनिया से आए विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों को एक तरफ रखकर, परमेश्वर से आए और सत्य से जुड़े विभिन्न दृष्टिकोणों को स्वीकार करते हैं। जब लोग परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में स्वीकार कर लेते हैं, तो वे परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में भी प्रवेश कर लेते हैं और सत्य का उपयोग करके प्रश्नों को देखने और उनके बारे में सोचने लगते हैं एवं सत्य का प्रयोग करके समस्याएँ हल कर पाते हैं। जब एक बार लोग परमेश्वर के बारे में अपनी विभिन्न धारणाएँ और गलतफहमियाँ दूर कर लेते हैं, तो वे परमेश्वर के साथ अपने रिश्ते में तुरंत सुधार कर पाते हैं, और साथ-साथ जीवन प्रवेश की ओर अपना पथ प्रशस्त कर पाते हैं। जब लोग ऐसे बदलाव हासिल कर लेते हैं, तो परमेश्वर के साथ उनके रिश्ते का क्या होता है? यह सृजित प्राणियों और सृष्टिकर्ता का रिश्ता हो जाता है। इस स्तर पर संबंधों में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती, कोई परीक्षा नहीं होती और विद्रोह भी बहुत कम होता है; लोग परमेश्वर के प्रति बहुत अधिक समर्पित, समझदार, श्रद्धावान, वफादार एवं ईमानदार हो जाते हैं और वास्तव में परमेश्वर का भय मानने लगते हैं। जब लोग अपनी धारणाएँ दूर कर लेते हैं तो उनके जीवन में यह बदलाव आ जाता है। यदि तुम लोग ऐसा बदलाव ला पाओ, तो फिर क्या तुम अपनी धारणाएँ दूर करने को तैयार हो जाओगे? (हाँ।) लेकिन लोगों की धारणाओं को दूर करना एक बहुत ही पीड़ादायक प्रक्रिया है। लोगों को अपने आपको नकारना होता है, उन्हें अपनी धारणाओं को एक तरफ रखना होता है, उन चीजों को दरकिनार करना होता है जिन्हें वे सही मानते हैं, उन चीजों को एक तरफ रखना होता है जिनको वे लगातार खोजते हैं, उन चीजों को अलग रखना होता है जिन्हें वे सही मानते हैं, जिनका उन्होंने आजीवन अनुसरण किया है और जिन चीजों के लिए वे आजीवन तरसते रहे हैं। इसका मतलब यह है कि लोगों को खुद के खिलाफ विद्रोह करना चाहिए, ज्ञान, फलसफों को दर-किनार कर देना चाहिए—यहाँ तक कि शैतान की दुनिया से सीखे गए जीवित रहने के तरीके को भी छोड़ देना चाहिए और उसके स्थान पर एक ऐसा जीने का तरीका अपनाना चाहिए जिसकी बुनियाद और मूल सत्य हो। इस तरह, लोगों को गहन कष्ट सहने चाहिए। ज़रूरी नहीं कि इस तरह के कष्ट कोई शारीरिक रोग या दैनिक जीवन की मुश्किलें और कठिनाइयाँ ही हों, बल्कि ये तुम्हारे दिल में विभिन्न चीजों और मानवजाति के बारे में हर तरह के दृष्टिकोण में हुए परिवर्तन से आ सकते हैं, या ये परमेश्वर के बारे में तुम्हारे ज्ञान के विभिन्न पहलुओं में हुए बदलाव से भी आ सकते हैं, जो दुनिया, मानव जीवन, मानवजाति और परमेश्वर के बारे में तुम्हारे ज्ञान और दृष्टिकोण तक को उलट कर रख देते हैं।

हमने अभी-अभी परमेश्वर में विश्वास को लेकर लोगों की धारणाओं पर संगति की और कुछ उदाहरण दिए ताकि तुम्हें सत्य के इस पहलू की एक बुनियादी संकल्पना मिल सके। इसके बाद, तुम सब इस पर फिर से सोच-विचार कर सकते हो, और साथ मिलकर इस पर संगति कर सकते हो, निष्कर्ष निकाल सकते हो, और इन्हें कदम-दर-कदम दूर करने से पहले, धीरे-धीरे आत्मचिंतन कर समझ सकते हो, और परमेश्वर में विश्वास को लेकर विभिन्न धारणाओं का विश्लेषण कर सकते हो। संक्षेप में कहें तो लोगों के मन में परमेश्वर में विश्वास को लेकर अनेक कल्पनाएँ और धारणाएँ होती हैं। मिसाल के तौर पर, लोगों के जीवन के संदर्भ में हो, या शादी-ब्याह, परिवार या कामकाज के संदर्भ में, जैसे ही कोई मुश्किल आती है, वैसे ही लोग अपने मन में परमेश्वर के बारे में धारणाएँ बना लेते हैं और फिर वे उसके बारे में शिकायत कर उसकी आलोचना करते हैं, हमेशा दिल से यह सोचते हुए कि “परमेश्वर मेरी रक्षा क्यों नहीं करता है, मुझे आशीष क्यों नहीं देता है?” ठीक वैसे ही जैसे गैर-विश्वासी हमेशा कहते हैं : “स्वर्ग अन्यायपूर्ण है,” और “स्वर्ग अंधा है”; लेकिन ये चीजें संयोग से नहीं होतीं। जब जीवन आरामदेह और खुशहाल होता है, तो लोग परमेश्वर से कभी भी धन्यवाद का एक शब्द भी नहीं बोलते और वे उसे नकार भी सकते हैं और उसके अस्तित्व पर संदेह भी कर सकते हैं। हालाँकि जब विपत्ति आती है, तो इसकी जिम्मेदारी वे परमेश्वर पर डाल देते हैं, और वे उसकी आलोचना और उसके विरुद्ध ईशनिंदा करने लगते हैं। कुछ लोग यह भी सोचते हैं कि एक बार परमेश्वर में विश्वास रख लेने के बाद उन्हें अब कुछ भी सीखने या कार्य करने की जरूरत नहीं है, समय आने पर परमेश्वर उनके लिए सब कुछ तैयार कर देगा और अगर उन्हें कोई कठिनाई हो तो वे परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं और अपना मामला उसे सौंप सकते हैं और वह उनके लिए इसे सुलझा देगा। वे मानते हैं कि यदि वे बीमार पड़ गए तो परमेश्वर उन्हें ठीक कर देगा, विपत्ति आए तो परमेश्वर उनकी रक्षा करेगा, और परमेश्वर के दिन का आगमन होने पर वे सब रूप बदल लेंगे और यदि परमेश्वर संकेत और चमत्कार दिखाएगा, तो सब कुछ ठीक हो जाएगा—लोगों के मन में ये कल्पनाएँ और धारणाएँ होती हैं। जहाँ तक कर्तव्यों से जुड़े उस व्यावसायिक ज्ञान की बात है जो लोगों को सीखना चाहिए, लोगों को उसे कर्तव्यों की जरूरत के अनुसार सीखना चाहिए; इसे उचित काम के प्रति व्यक्ति की व्यावहारिकता और समर्पण कहा जाता है, और किसी को सिर्फ सपना देखते हुए अपनी कल्पना के भरोसे नहीं रहना चाहिए। परमेश्वर लोगों से वह करने की अपेक्षा करता है जो लोगों को करना ही चाहिए, यानी वे कर्तव्य जो लोगों को निभाने चाहिए। इसे बिल्कुल भी बदला नहीं जा सकता और इससे कर्तव्यनिष्ठ ढंग से पेश आना चाहिए—यह सत्य के अनुरूप है, और यह वह नजरिया है जो लोगों को अपने कर्तव्य के प्रति रखना चाहिए। यह कोई धारणा नहीं है, यह सत्य है और परमेश्वर इसी की अपेक्षा करता है। ऐसे बहुत-से मौके होते हैं जब परमेश्वर द्वारा किया हुआ कार्य लोगों की कल्पनाओं के प्रतिकूल होता है। यदि लोग अपनी धारणाओं को एक तरफ रखकर परमेश्वर के इरादों और सत्य सिद्धांतों को खोज सकें, तो वे इन चीजों से गुजर सकेंगे। यदि तुम जिद्दी हो, और जिद पकड़कर अपनी धारणाओं से चिपके रहते हो, तो यह तुम्हारे सत्य को न स्वीकारने, सही चीजों और परमेश्वर की अपेक्षाओं को न स्वीकारने के बराबर है। यदि तुम सत्य को या उन चीजों को नहीं स्वीकारते, जो सही हैं, तो क्या यह नहीं कहा जा सकता कि तुम परमेश्वर के विरोध में हो? सत्य और सकारात्मक चीजें परमेश्वर से आती हैं। यदि तुम उन्हें स्वीकार नहीं करते, और इसके बजाय अपनी धारणाओं से चिपके रहते हो, तो साफ तौर पर तुम सत्य के विरुद्ध हो। परमेश्वर में विश्वास को लेकर लोगों की धारणाओं के बारे में अपनी संगति को हम यहीं समाप्त करेंगे। शेष यह है कि तुम लोगों को इन सिद्धांतों और आज यहाँ संगति में बताए गए वचनों के आधार पर इसे खुद पर लागू करना है। परमेश्वर में विश्वास को लेकर लोगों की धारणाएँ सबसे ज्यादा आम हैं और तीन प्रकार की धारणाओं में सबसे मूलभूत हैं। इन धारणाओं से जुड़े सत्य सचमुच उतने गूढ़ नहीं हैं, और इसलिए इन धारणाओं को दूर करना आसान होना चाहिए।

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