अपनी धारणाओं का समाधान करके ही व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास के सही मार्ग पर चल सकता है (1) भाग तीन
अब हम देहधारण के बारे में लोगों की धारणाओं पर संगति करेंगे; लोगों के मन में देहधारण के बारे में भी अनेक धारणाएँ होती हैं। जब लोगों ने देहधारी परमेश्वर को नहीं देखा होता, तब उनके मन में ढेरों कल्पनाएँ होती हैं, है कि नहीं? मिसाल के तौर पर, वे मानते हैं कि देहधारी को सब कुछ स्पष्ट रूप से समझना और देखना चाहिए। संक्षेप में कहें, तो वे सोचते हैं कि देहधारी परमेश्वर का देह असाधारण रूप से उत्तम होगा, और वह उन जैसे लोगों के लिए कुछ ज्यादा ही अच्छा और उनकी पहुँच से बाहर होगा। जब लोग परमेश्वर से न मिले हों, तो उनकी ये कल्पनाएँ धारणाएँ होती हैं, और ये कुछ विशेष रायों, या लोगों के ज्ञान, धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक सांस्कृतिक शिक्षा के अनुसार पैदा होती हैं। एक बार परमेश्वर से मिल लेने के बाद, लोग नई धारणाएँ बना लेते हैं : “तो, मसीह ऐसा दिखता है। वह इस तरह बोलता है और उसका व्यक्तित्व ऐसा है। जो मैंने सोचा था उससे वह भिन्न कैसे हो सकता है? मेरे परमेश्वर को ऐसा नहीं होना चाहिए।” दरअसल, लोगों को कोई अंदाजा नहीं है और वे समझा नहीं सकते कि परमेश्वर को कैसा होना चाहिए। लोग लगातार ये धारणाएँ बनाने के साथ-साथ निरंतर स्वयं को नकारते रहते हैं और अपनी काट-छाँट करते रहते हैं, यह मानते हुए कि मन में धारणाएँ और कल्पनाएँ रखना गलत है, परमेश्वर के कार्य सही हैं मगर वे अभी भी उन्हें समझ नहीं पाते हैं। उनकी धारणाएँ निरंतर बाहर निकलती रहती हैं और उनके दिलों में यह सोचते हुए एक युद्ध चलता रहता है, वे सोचते हैं, “परमेश्वर जो करता है वह सही है; मुझे अपने मन में कोई धारणा नहीं रखनी चाहिए।” लेकिन वे अपनी धारणाओं को पूरी तरह किनारे नहीं रख पाते, वे अभी भी आश्वस्त नहीं हैं, और इसलिए उनके दिलों में सुकून नहीं है। वे सोचते हैं, “वह मानव है या परमेश्वर? यदि वह परमेश्वर है, तो वह उस जैसा नहीं दिखाई देता, और यदि वह मानव है, तो उसके लिए इतने सत्य व्यक्त करना संभव नहीं होगा।” वे यहाँ अटक जाते हैं। वे संगति के लिए किसी दूसरे को ढूँढ़ना चाहते हैं, लेकिन इस बारे में बात करना उनके लिए मुश्किल होता है, इस डर से कि लोग उनकी हँसी उड़ाएँगे, या दूसरे उन्हें बहुत अज्ञानी कहेंगे, जिसमें आस्था नहीं है या जिसकी समझ विकृत है, और इसलिए वे अपनी भावनाओं को दबा लेते हैं। चाहे जो हो, किसी ने परमेश्वर को देखा हो या न देखा हो, अगर उसके दिल में परमेश्वर के बारे में धारणाएँ और गलतफहमियाँ तैयार होती हैं, तो उसकी समझ के साथ भी समस्या है। परमेश्वर बहुत-से सत्य व्यक्त करता है, और उनके बारे में बहुत स्पष्ट और सुबोध संगति करता है, ताकि लोग अपने दिलों में और वचन से आश्वस्त हो सकें। जब लोग ऐसी स्थिति में भी धारणाएँ और गलतफहमियाँ पाल लेते हैं, तो अब यह समस्या उतनी सरल नहीं रह जाती है। कुछ लोगों के मन में आध्यात्मिक समझ न होने के कारण धारणाएँ होती हैं; कुछ लोगों के मन में विकृत समझ के कारण धारणाएँ होती हैं; और कुछ लोग धारणाएँ इसलिए बना लेते हैं क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते हैं और लेश मात्र भी सत्य को नहीं समझते हैं। बात जो भी हो, अगर लोगों के दृष्टिकोण और विचार परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के सार के अनुरूप न हों और वे लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने, परमेश्वर को जानने और उसके कार्य के प्रति समर्पण करने में रुकावट बनते हैं या फिर उनके कारण लोग ऐसे विचार और नजरिये रखते हैं जो परमेश्वर पर सवाल खड़े करते हैं, उसे गलत समझते हैं, नकारते हैं और उसका प्रतिरोध करते हैं तो ये सब धारणाएँ हैं और ये सब सत्य के विरुद्ध हैं।
अब, मैं तुम्हारे साथ संगति के लिए कुछ ठोस उदाहरणों का प्रयोग करूँगा। तुममें से बहुत-से लोगों ने मेरे बारे में कहानियाँ सुनी होंगी। जब तुमने पहले-पहल परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू किया, या तुमने खुद को किसी खास स्थिति में पाया, तो किसी ने तुम्हें कुछ ऐसी कहानियाँ सुनाई होंगी, जिनसे तुम्हारा दिल गहनता से द्रवित हो गया होगा या तुम रो पड़े होगे। मिसाल के तौर पर, किसी ने कहा कि एक साल नव वर्ष के वक्त दूसरे सभी लोग नव वर्ष मनाने के लिए घर चले गए, जबकि मसीह हवा और बर्फ का सामना करते हुए, सड़कों पर अकेला भटकता रहा, उसके लिए जाने को कोई घर नहीं था। यह कहानी सुनने के बाद, कुछ लोग बहुत भावुक हो गए और बोले, “परमेश्वर के लिए संसार में आकर जीना सचमुच बहुत मुश्किल है! मानवजाति बहुत भ्रष्ट है और वे सभी परमेश्वर को नकारते हैं, और इसीलिए परमेश्वर इस तरह दुख सहता है। लगता है परमेश्वर ने जो कहा वह सच है, ‘लोमड़ियों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं; परन्तु मनुष्य के पुत्र के लिये सिर धरने की भी जगह नहीं है।’ ये वचन साकार हो गए हैं। परमेश्वर बहुत महान है!” वे मानते हैं कि परमेश्वर की महानता इस कहानी से उत्पन्न हुई है, और वे इस कहानी से यही निष्कर्ष निकालते हैं। इस कहानी को सुनकर तुम रो पड़ते हो, पर क्या कभी तुमने सोचा है कि लोग ऐसी कहानियाँ क्यों सुनना चाहते हैं? वे ऐसी कहानियों से भावुक क्यों हो जाते हैं? लोगों के मन में परमेश्वर के देह के बारे में एक प्रकार की धारणा है, परमेश्वर के देह को लेकर उनकी एक प्रकार की अपेक्षा है और उनके पास उसके देह को मापने का एक प्रकार का मानक है। यह धारणा क्या है? वह यह है कि यदि परमेश्वर देहधारी होकर आता है, तो उसे दुख सहना चाहिए। परमेश्वर ने कहा था : “लोमड़ियों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं; परन्तु मनुष्य के पुत्र के लिये सिर धरने की भी जगह नहीं है।” यदि ये वचन साकार नहीं हुए होते, यदि मनुष्य पुत्र की जीवन स्थितियाँ ऐसी नहीं रही होतीं, और उसने इस तरह दुख न सहकर खुशी का आनंद लिया होता, तो लोग उसकी प्रशंसा नहीं करते और अभिप्रेरित महसूस नहीं करते, और तब वे अपना कर्तव्य नहीं निभाना चाहते, जरा भी दुख सहने को तैयार नहीं होते। लोग मानते हैं कि परमेश्वर को दुख सहना चाहिए, और दुख सह कर ही वह मानवजाति के लिए एक उदाहरण और एक आदर्श प्रस्तुत कर सकता है। वे मानते हैं कि इस संसार में आने पर परमेश्वर विशाल संपत्ति और पद का आनंद नहीं ले सकता—ये चीजें इस संसार की हैं। परमेश्वर इस संसार में विशेष तौर पर दुख सहने के लिए आया है, और दुख सहने के बाद ही वह मानवजाति को अवाक बना सकता है, अपने दुखों से उन्हें भावुक कर उनसे अपनी प्रशंसा करवा सकता है और फिर उनसे अपना अनुसरण करवा सकता है। लोगों के मन में परमेश्वर के बारे में ऐसी धारणा होती है, जिस वजह से वे ऐसी कहानियों से तादात्म्य स्थापित करते हैं और इन्हें स्वीकारने में उन्हें आसानी होती है। तो क्या तुम लोग जानना चाहोगे कि यह कहानी सच्ची है या नहीं? तुम सब क्या चाहते हो, यह सच्ची हो या फिर न हो? क्या इसका जवाब देना तुम्हारे लिए मुश्किल है? यदि यह सच्ची हो, तो लोग इसे अपनी धारणाओं के बहुत अनुरूप पाएँगे; यदि यह सच्ची न हो, तो क्या तुम सबके अंतर्मन में यह शौर्यपूर्ण उदाहरण नष्ट हो जाएगा? क्या तुम लोगों पर इसका प्रभाव पड़ेगा? क्या यह तुम सबके लिए एक झटका होगा? वास्तव में, यह महत्वपूर्ण नहीं है कि यह सच्ची है या नहीं। फिर महत्वपूर्ण क्या है? लोगों की धारणाओं का विश्लेषण करना। हर किसी के मन में देहधारी परमेश्वर, उसके जीवन, उसके जीवन परिवेश, उसके जीवन की गुणवत्ता, उसके रोटी, कपड़ा, मकान और आने-जाने के साधन को मापने के लिए एक धारणा है, एक मानक है, और वह धारणा यह है कि जब परमेश्वर आता है, वह दुख सहेगा। इसके अलावा, लोगों के दिलों में यह बात है कि मसीह को निश्चित रूप से प्रभावशाली होना चाहिए, आराधना, प्रशंसा और श्रद्धा के योग्य होना चाहिए : उसे अत्यंत शीघ्रता से पढ़ने में समर्थ होना चाहिए, और जिस भी चीज पर कभी उसकी नजर पड़े, उसे कभी भूलना नहीं चाहिए, उसमें सामान्य लोगों की पहुँच से बाहर की कुछ असाधारण काबिलियतें होनी चाहिए, और उसे संकेत और चमत्कार दिखाने में समर्थ होना चाहिए, जो फिर उसे अनुसरण और “शक्तिमान परमेश्वर” की पदवी के योग्य बना देते हैं। यदि असल जीवन में लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ साकार हो जाएँ तो वे अपनी आस्था में बहुत जोशीले और आत्मविश्वासी हो जाएँगे। यदि असल में जो चीजें होती हों वे उनकी धारणाओं और कल्पनाओं के प्रतिकूल हों, जैसे कि मसीह का सत्ताधारी अधिकारियों द्वारा पीछा किए जाते हुए देखना, तो लोग सोचते हैं, “परमेश्वर अभी भी पीछा किए जाने की पीड़ा झेल रहा है—यह वह नायक और उद्धारकर्ता नहीं है जिसकी मैंने कल्पना की थी!” और फिर वे सोचते हैं कि परमेश्वर विश्वास रखने के योग्य नहीं है। क्या ऐसा उनकी धारणाओं के कारण नहीं हुआ है? ये धारणाएँ कैसे बनती हैं? एक पहलू यह है कि ये लोगों की कल्पनाओं से पैदा होती हैं, जबकि दूसरा पहलू यह है कि लोग प्रसिद्ध और महान लोगों की छवियों से प्रभावित होते हैं, जिसके कारण वे परमेश्वर के बारे में गलत परिभाषाएँ गढ़ लेते हैं। लोग मानते हैं कि प्रसिद्ध और महान लोगों का जीवन सरल होता है, उनके लिए एक टूथब्रश 20-30 साल चल सकता है, और एक ही पोशाक मरम्मत करके जीवन भर पहनी जा सकती है। कुछ प्रसिद्ध और महान लोग कुछ भी व्यर्थ किए बिना खाना खाते हैं, यहाँ तक कि खाना खा लेने के बाद कटोरा भी साफ चाट लेते हैं, खाने के वे दाने भी उठा कर खा लेते हैं जो यहाँ-वहाँ गिर गए हों, और इसलिए लोग अपने दिलों में इन महान लोगों के बारे में असाधारण छवि बना लेते हैं, और वे देहधारी परमेश्वर को मापने के लिए इन छवियों का प्रयोग करते हैं। यदि देहधारी परमेश्वर उनकी छवियों से मेल नहीं खाता, तो वे धारणाएँ बना लेते हैं, लेकिन यदि देहधारी परमेश्वर का इन छवियों के साथ सटीक मेल बैठ जाता है, तो वे धारणाएँ नहीं बनाते। क्या लोगों का इन चीजों के साथ मसीह की तुलना करना सत्य के अनुरूप है? क्या प्रसिद्ध और महान लोग जो कुछ करते हैं, वह सत्य के अनुरूप है? क्या उनका प्रकृति सार संतों वाला है? दरअसल, ये सभी प्रसिद्ध और महान लोग दानव और दानव राजा हैं, और उनमें से एक में भी सामान्य मानवता का सार नहीं है। उन्हें मापने के लिए इंसानी धारणाओं का प्रयोग करने पर भले ही ऐसा लगे कि उनमें कुछ गुण हैं, मगर उनके प्रकृति सार और कृत्यों के संदर्भ में वे सब सार रूप में दानव और शैतान हैं। देहधारी परमेश्वर से तुलना करने के लिए दानवों और शैतानों की छवियाँ लेना क्या परमेश्वर के विरुद्ध ईशनिंदा नहीं है? शैतान और दानव हमेशा से भेस बदलकर खुद को छिपाने में श्रेष्ठ रहे हैं। बाहर कही गई उनकी सभी बातें और उनके किए हुए सभी काम लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप होते हैं, और वे हमेशा मीठी बातें बोलते हैं। हालाँकि वे मन में जो योजना बनाते हैं और परदे के पीछे वे जो करते हैं, वे सब शर्मनाक दानवी चीजें होती हैं, और अगर कोई उन्हें उजागर न करे, तो कोई भी उनकी थाह नहीं पा सकेगा। शैतान और दानव राजाओं द्वारा बोली गई हर बात पाखंडी और गुमराह करने वाली होती है, और सत्य समझने वाले कुछ लोग इसे स्पष्ट रूप से समझ पाएँगे। कुछ लोग हमेशा ऐसे महान लोग जो दानव होते हैं उनकी छवि की तुलना देहधारी परमेश्वर से करते हैं और जब उनमें कोई मेल ही नहीं खाता है तो वे परेशान हो जाते हैं, धारणाएँ बना लेते हैं और कभी भी उन्हें त्यागते नहीं हैं। क्या ऐसे बहुत-से लोग हैं? यकीनन ऐसे बहुत-से लोग हैं। कुछ लोग अभी भी चिंतित हैं कि जो कहानी मैंने अभी सुनाई वह सच्ची है या नहीं। जब पहली बार मैंने इस बारे में सुना, तो मैं उलझन में पड़ गया कि मैं यानी इससे जुड़ा हुआ व्यक्ति नहीं जानता था कि मुझे अनुमानतः क्या हुआ था। यह कहानी एक बड़ा लतीफा और एक बड़ा झूठ थी। यह सच्ची नहीं थी। उस स्थिति में, भले ही नए कार्य के इस चरण को स्वीकार करने वाले बहुत ज्यादा भाई-बहन नहीं थे, फिर भी कुछ लोग थे जिन्होंने परमेश्वर के पहले-पहल अपने वचन कहना शुरू करने पर उसे स्वीकार कर लिया था। यही नहीं, वे सभी यीशु के विश्वासी थे, जिन्होंने उसके कार्य के इस चरण को स्वीकार लिया था। वे सभी प्रेम दर्शाने को तैयार थे, और मसीह के चेहरे पर दरवाजा कभी भी बंद नहीं कर सकते थे; वे यकीनन कभी ऐसा नहीं कर सकते थे। नव वर्ष पर, कुछ लोगों ने मुझे अपने घर आमंत्रित किया था। इसके अलावा, जब इतने सारे भाई-बहन थे, तो यह कैसे हो सकता था कि मैं किसी के घर जाता और मेरी मेजबानी नहीं होती? ऐसा कहना यूँ लगता है मानो भाई-बहन विद्रोही हो रहे थे और कोई भी कहीं भी मेरी मेजबानी नहीं करता। यह भाई-बहनों को फँसाने और उनके बारे में निराधार अफवाहें गढ़ने का प्रयास था! यह सब पूरी तरह से बेबुनियाद था, और साफ तौर पर छिपे हुए मंसूबों वाले कुछ लोगों द्वारा गढ़ा गया था, फिर भी तुम लोगों ने सचमुच उस पर यकीन कर लिया। तुम अभी भी इस पर कैसे विश्वास कर सकते हो? इसलिए कि लोगों के मन में देहधारण को लेकर कुछ विशेष धारणाएँ हैं, उनकी भावनाओं, आकांक्षाओं और मनोवैज्ञानिक रचना के संदर्भ में उनकी ये आवश्यकताएँ हैं, और इसलिए वे ऐसी कहानियाँ सुनने को तैयार हैं। कुछ लोगों ने इन कहानियों को गढ़ने के मौके का फायदा उठाया और फिर उन्होंने इन्हें फैलाने और प्रसारित करने, इन्हें अतिरंजित करने और फिर उन्हें नाटकीय बनाने और चीजें गढ़ने की भरसक कोशिश की। आखिरकार, ज्यादा-से-ज्यादा लोगों ने उन मनगढ़ंत बातों को सुना और इन्हें सच्चा मान लिया। यदि आज मैंने इस मामले को स्पष्ट न किया होता, तो तुम लोग जीवन भर कभी भी सच और झूठ में फर्क नहीं कर पाते। क्या अब तुम समझ रहे हो? यह घटना कभी हुई ही नहीं।
अब मैं तुम्हें कुछ बातें बताऊँगा ताकि इनके जरिये तुम लोग समझ सको कि देहधारण और मसीह को लेकर कौन-सी धारणाएँ हैं। जब परमेश्वर के नए कार्य का यह चरण शुरू हुए ज्यादा दिन नहीं हुए थे, तब कलीसिया को कुछ भजन लिखने की जरूरत थी, और मैंने भी एक भजन लिखा। उस वक्त, देहधारी परमेश्वर की गवाही पहले ही दी जा चुकी थी। मेरा भजन पढ़ने के बाद, कुछ लोगों ने सोचा कि यह बहुत अच्छा है, लेकिन एक व्यक्ति ऐसा था जिसने एक बड़ी अजीब बात कही : “तुमने यह भजन इतनी जल्दी कैसे लिख डाला? तुम्हें इतने सारे शब्द सूझे कैसे?” यह सुनकर मुझे बड़ी उलझन हुई, और मैंने सोचा, “क्या किसी को गाना लिखने के लिए शब्दों की जरूरत होती है? क्या किसी का सुविज्ञ होना जरूरी है? तो मेरे द्वारा व्यक्त किए गए वचन उसकी सोच में क्या हैं?” उसके मन में एक धारणा थी, एक विचार था, वह मानता था कि देहधारी द्वारा व्यक्त किए जा रहे ये वचन महज शब्द और आलेख हैं—उसने न ही सोचा, और न ही समझा कि ये वचन सत्य थे। उसे देहधारी का किया हुआ हर कार्य बहुत अस्पष्ट लगा। सत्य को न समझ पाने के कारण उसने उन्हें समझने के लिए गैर-विश्वासियों के कथनों का प्रयोग किया, और यह सुनकर लोग असहज हो गए और घृणा करने लगे। इस व्यक्ति को आध्यात्मिक समझ नहीं थी और ऐसे लोग अभी भी हैं। तो यह मामला किस प्रकार की धारणाओं से संबंधित है? इस व्यक्ति ने देहधारी को नहीं नकारा और न ही मसीह को नकारा; उसने जो हुआ उसे मापने के लिए एक धारणा का प्रयोग किया। उसका मानना था कि मसीह जरूर जानकार और शिक्षित होगा और दूसरे लोगों के बीच होने पर वह उन्हें पूरी तरह से विश्वास दिलाने में समर्थ होगा। भले ही मसीह बहुत शिक्षित न हो, फिर भी परमेश्वर और मसीह बनने के योग्य होने के लिए उसकी काबिलियत, प्रतिभा और क्षमताएँ दूसरों से बेहतर होनी चाहिए, यानी वह कुछ मामलों में दूसरे लोगों से कुछ तरीकों से बेहतर होना चाहिए या कुछ खास ढंग से बाकी लोगों से भिन्न होना चाहिए। वह मानता था कि मसीह तब मसीह हो सकता है जब वह इस योग्य हो। वह नहीं मानता था कि मसीह में मसीह का सार होने पर ही, वह मसीह हो सकता है, और इसीलिए उसने ऐसी बात कही। परमेश्वर में लोगों के विश्वास और उनके जीवन प्रवेश में इस प्रकार की धारणा कौन-सी रुकावटें डालती है? लोग परमेश्वर के वचनों का विश्लेषण करने और परमेश्वर के देह का विश्लेषण और उसका अध्ययन करने के लिए अपना दिमाग लगाएँगे, और वे यह सोचते हुए हमेशा उसका अध्ययन करते रहते हैं “क्या इस व्यक्ति की बात तार्किक है? क्या यह सामान्य सोच के अनुरूप है? क्या यह व्याकरण के नियमों के अनुरूप है? उसने इसे कहाँ से सीखा?” वे परमेश्वर के वचनों में सत्य नहीं खोजते, वे सत्य स्वीकारने के दृष्टिकोण से परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते, और वे परमेश्वर के वचनों को सत्य के रूप में स्वीकार नहीं करते। इसके बजाय, वे विश्लेषण, जाँच और प्रश्न उठाने के लिए अपने दिमाग और ज्ञान का प्रयोग करते हैं। लोग इस व्यक्ति को मापने या उससे पेश आने के लिए चाहे जैसे भी नजरियों या धारणाओं का प्रयोग करें, अंतिम परिणाम क्या होता है? (वे सत्य प्राप्त नहीं कर सकते हैं।) वे निश्चित तौर पर सत्य प्राप्त नहीं कर सकते हैं। एक और भी पहलू है जो तुमने नहीं समझा है, और वह यह है कि लोग यह नहीं पता लगा पाते हैं कि वह देहधारी है या नहीं—क्या यह अहम नहीं है? (बिल्कुल।) बहुत-से लोग उसके द्वारा दिए गए धर्मोपदेशों और खोले गए रहस्यों को सुनकर पता लगा लेते हैं कि वह सचमुच परमेश्वर है, उसके वचन सत्य और जीवन हैं, और वे परमेश्वर से आते हैं। हालाँकि यदि लोग हमेशा अपनी धारणाओं से परमेश्वर का अध्ययन करते हों, और कभी भी उसके वचनों को सत्य के रूप में न स्वीकारते हों, तो अंतिम परिणाम क्या होता है? वे इस व्यक्ति की पहचान और सार और उसके कार्य पर हमेशा सवाल उठाएँगे, यानी वे यह सत्यापित नहीं कर पाएँगे कि वह मनुष्य है या परमेश्वर, यह सोचेंगे कि यह व्यक्ति शायद परमेश्वर का भेजा हुआ कोई संदेशवाहक या कोई नबी है क्योंकि इंसान ऐसी बातें नहीं कह पाते हैं जैसी वह कहता है। कुछ लोग यह स्वीकार नहीं करते कि यह व्यक्ति परमेश्वर है, क्योंकि उनके भीतर बहुत-से प्रतिबंध और बंधन और बहुत-सी धारणाएँ होती हैं, जो इस देह से मेल नहीं खाती हैं। जब ये मेल नहीं खातीं, तो ये लोग सत्य नहीं खोजते, बल्कि अपनी धारणाओं से चिपके रहते हैं, और इसलिए वे अटक जाते हैं। जब ऐसे व्यक्ति को तुम उसकी आस्था में प्रयास करने को कहते हो, तो उसके मन में बहुत-सी धारणाएँ पैदा होती हैं जिन्हें वह जाने नहीं दे पाता, और जब तुम उसे जाने को कहते हो, तो वह डर जाता है कि उसे आशीष नहीं मिलेंगे। क्या ऐसे लोग हैं? क्या तुम लोग ऐसे हो? हालाँकि तुम लोगों में से ज्यादातर ने पुष्टि की है कि यह व्यक्ति सचमुच देहधारी परमेश्वर है, मगर वास्तव में तुम 80-90 प्रतिशत ही पुष्टि करते हो, और अभी भी 10-20 प्रतिशत संदेह और प्रश्न करते हैं। यह कहा जा सकता है कि तुमने मूलतः इसकी पुष्टि की है, और बचे हुए संदेह और प्रश्न उतने अविलंबनीय मसले नहीं हैं। इन धारणाओं का समाधान पहुँच के भीतर है, लेकिन यदि ये धारणाएँ और प्रश्न समय रहते दूर नहीं किए जाएँगे तो ये बेहद तकलीफदेह हो सकते हैं। जहाँ तक तुम्हारी धारणाओं का सवाल है, मुझे तुम लोगों से कैसे पेश आना चाहिए ताकि तुम लोग संतुष्ट हो पाओ, सोच पाओ कि यह परमेश्वर का किया हुआ है, और परमेश्वर को लोगों से इसी तरह पेश आना चाहिए? क्या मुझे धीमी आवाज में बोलना चाहिए और फिर तुम्हारे बारे में चिंतित होकर हर मामले में तुम सबकी परवाह करनी चाहिए? यदि किसी दिन मुझे पता चले कि तुममें से कुछ लोगों ने कुछ बेतुका किया है, और फिर मैं तुम लोगों को खरी-खोटी सुना दूँ, तुम्हें उजागर कर सख्ती से तुम सबका न्याय करूँ, और तुम्हारे स्वाभिमान को चोट पहुँचा दूँ, तो क्या तुम लोगों को लगेगा कि मैं परमेश्वर जैसा नहीं हूँ? तुम सब मानते हो कि परमेश्वर अत्यंत सज्जन होगा, अत्यधिक प्रेमपूर्ण होगा, और वह प्रेमपूर्ण दयालुता से सराबोर होगा, तो फिर तुम सबकी धारणाओं और कल्पनाओं वाला परमेश्वर बनने के लिए मैं क्या कर सकता हूँ? यदि तुम लोग अभी भी परमेश्वर से ऐसी माँगें करते हो, तो तुम विवेकहीन हो, और तुम लोग परमेश्वर को वास्तव में नहीं जानते हो।
देहधारण को लेकर धारणाओं के बारे में मैं तुम सबको एक और बात बताता हूँ। बीस वर्ष पहले, जब मैं चीन में था, तब मैं 20 वर्ष का भी नहीं था, उस उम्र में लोग अपनी बातों और कृत्यों में उतने अनुभवी और परिपक्व नहीं होते; वे कमउम्र लोगों की तरह ही बोलते और पेश आते हैं, और यह सामान्य है। यदि वे बड़ी उम्र के लोगों की तरह बोलते या पेश आते, तो वह सामान्य नहीं होता। किसी भी उम्र के लोगों का अपने उम्र समूह के लोगों जैसा होना सामान्य है। परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया और मनुष्य के लिए एक सामान्य विकास रूपरेखा नियत की। बेशक, देहधारी परमेश्वर स्वयं भी कोई अपवाद नहीं है और वह भी इसी रूपरेखा के अनुसार जीवन जीता और उसका अनुभव करता है। यह रूपरेखा परमेश्वर से आई, और परमेश्वर इसका उल्लंघन नहीं करेगा। इसलिए, 20 वर्ष की आयु का होने से पहले, देहधारी परमेश्वर के कुछ व्यवहार यकीनन कमउम्र लोगों जैसे ही थे। मिसाल के तौर पर, एक बार घर बदलते वक्त, कुछ भाई-बहन जाने के बाद कुछ पेन और नोटबुक्स पीछे छोड़ गए। मुझे लगा इन्हें फेंक देना अफसोस की बात होगी और फिर भाई-बहनों को नोट्स भी तो लिखने होते हैं, इसलिए मैंने उन्हें पैक कर कुछ बहनों के बीच बाँट दिया। तब किसी ने धारणा बना ली और कहा, “जिसे भी ये चीजें चाहिए वह खुद आकर ले सकता है। तुम बच्चे जैसा बर्ताव कर रहे हो, सबको बाँटते फिर रहे हो!” उसने यही कहा। यह एक अहम मामला है या मामूली? यदि कोई किसी सामान्य व्यक्ति की आलोचना करे कि वह बच्चों जैसा बर्ताव कर रहा है, तो ऐसा करना सामान्य बात होगी, यह एक कथन होगा, और कोई भी उस पर ध्यान नहीं देगा या उसे गंभीरता से नहीं लेगा; कोई भी यह नहीं सोचेगा कि यह कथन कोई धारणा थी या कोई नजरिया, बस उसे जैसा है वैसा ले लेगा। हालाँकि मुझसे ऐसा कहने के पीछे उसका व्यवहार क्या था? इसकी प्रकृति क्या थी? उसकी धारणाओं और कल्पनाओं में, भले ही देहधारी परमेश्वर 20 वर्ष का न हुआ हो, फिर भी उसे बड़ी उम्र के व्यक्ति जैसा बर्ताव करना चाहिए, हर दिन गंभीर बैठकर सामने देखते रहना चाहिए, बुद्धिमान, कभी लतीफे न सुनाने वाले या गपशप न करने वाले, विशेष रूप से स्थिर और संयमित, अनुभवी बड़ी उम्र के व्यक्ति जैसा दिखना चाहिए। जैसे ही मैं ऐसा बर्ताव करता या ऐसा कुछ करता जो एक बड़े व्यक्ति के कृत्य के प्रतिकूल होता, जैसे कि कुछ बहनों के बीच पेन और नोटबुक बाँटना, तो कोई मेरे कार्यों की यह कहकर निंदा करता कि मेरे कृत्य बच्चों जैसे हैं, ये मसीह और उसके मन में बसे परमेश्वर के कार्यों जैसे नहीं हैं, क्योंकि देहधारी परमेश्वर को किसी भी तरह से बच्चे जैसा बर्ताव नहीं करना चाहिए। क्या यह उसका देहधारी परमेश्वर को परिभाषित करना नहीं है? ऐसी परिभाषा एक तरह की निंदा और आलोचना है या यह एक प्रकार की प्रशंसा और स्वीकृति है? (यह निंदा और आलोचना है।) यह एक प्रकार की निंदा क्यों है? क्या ऐसा है कि देहधारी परमेश्वर बच्चे जैसा था, यह कहकर वह परमेश्वर को नकार रहा था? उसके ऐसा कहने में गलत क्या था? ऐसी धारणा बनाने के पीछे उसके मन में कौन-सा प्रमुख मुद्दा था? (वह देहधारी की सामान्य मानवता को नकार रहा था, परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता को नकार रहा था। यह ऐसा है जैसा परमेश्वर ने अभी-अभी कहा कि देहधारी बिल्कुल सृजित मानवजाति जैसा है, जिसकी विकास रूपरेखा सामान्य है। लेकिन उस व्यक्ति ने परमेश्वर को विशेष रूप से अलौकिक माना और इसलिए उसने देहधारण को नहीं समझा। इसकी प्रकृति परमेश्वर को नकारना और उसकी निंदा करना है, और यह ईशनिंदा है।) सही है, उसका नकारना ही इस समस्या का सार था। उसने देहधारी परमेश्वर को इस तरह से क्यों नकारा? इसलिए कि उसने अपने दिल में देहधारी परमेश्वर के बारे में एक धारणा पाल रखी थी, वह सोचता था, “तुम परमेश्वर हो, इसलिए तुम सामान्य उम्र बढ़ने के साथ अपनी सामान्य मानवता प्रकट नहीं कर सकते हो। तुम अभी 20 वर्ष के नहीं हो, लेकिन तुम्हें एक 50 वर्ष के व्यक्ति जितना परिपक्व और अनुभवी होना चाहिए। तुम परमेश्वर हो, इसलिए तुम्हें सामान्य मानवजाति की विकास रूपरेखा का उल्लंघन कर जीना चाहिए। तुम्हें अलौकिक होना चाहिए, तुम्हें दूसरे हर किसी से भिन्न होना चाहिए, तभी तुम वह मसीह और परमेश्वर हो सकोगे जो हमारे मन में है।” उसके मन में यह धारणा थी। और इस धारणा का परिणाम क्या था? यदि यह घटना नहीं हुई होती, तो क्या इस धारणा का खुलासा हुआ होता? कोई नहीं जानता; बात बस इतनी है कि इस मामले से उसका खुलासा हुआ। यदि उसके मन में इस मामले को लेकर कोई धारणा थी, लेकिन उसने सोचा था कि परमेश्वर ने जो किया था, लोग उसे पूरी तरह से नहीं समझ पाए थे और उसने बेपरवाही से नहीं बोला था, तो उसके पास खोजने के लिए स्थान होता और यह क्षमायोग्य होता। लोग सत्य को नहीं समझते हैं, और ऐसी बहुत-सी चीजें हैं जो वे अच्छी तरह से नहीं समझ पाते हैं। हालाँकि लोग इन चीजों को अच्छी तरह नहीं समझते हैं, फिर भी कुछ लोग आलोचना और निंदा करते हैं, जबकि दूसरे लोग बेपरवाही से नहीं बोलते और इसके बजाय प्रतीक्षा कर सत्य खोजते हैं—क्या यहाँ प्रकृति में अंतर नहीं है? (बिल्कुल।) तो अच्छी तरह समझने में इस व्यक्ति की विफलता की प्रकृति क्या थी? वह तुरंत निंदा करने पर उतर आया और यह एक गंभीर समस्या थी। एक बार जब लोग धारणाएँ बना लेते हैं, तो देहधारी परमेश्वर को लेकर उनके मन में शक, निंदा और इनकार पैदा हो जाता है, और यह अत्यंत गंभीर मामला है।
मैंने अभी-अभी देहधारण के बारे में धारणाओं के तीन उदाहरण दिए हैं। ये तीन उदाहरण कुछ मुद्दे दिखाते हैं, और तुम्हें खोजकर पता लगाना चाहिए कि इनमें सत्य क्या है। पहली धारणा क्या है? (लोग महान हस्तियों की अपनी परिभाषाओं का प्रयोग कर देहधारी परमेश्वर पर फैसला देते हैं, वे यह मानते हैं कि मानवजाति के लिए एक आदर्श बनने के खातिर परमेश्वर को दुख सहना चाहिए।) यह एक धारणा है जो लोगों के मन में होती है। उनकी धारणा यह है कि देहधारी परमेश्वर को ज्यादा दुख सहने चाहिए और मनुष्य के लिए एक उदाहरण स्थापित करना चाहिए, उसके लिए एक आदर्श होना चाहिए। दूसरी धारणा क्या है? (लोग मानते हैं कि मसीह को साधारण लोगों से अधिक जानकार और शिक्षित होना चाहिए, और तभी वह मसीह है।) बहुत-से लोग अभी भी मानते हैं कि परमेश्वर के कथन और कार्य उसके ज्ञान और गुणों से आते हैं, या फिर उन कुछ चीजों से आते हैं, जिनमें उसे प्रवीणता प्राप्त है या जिन्हें उसने समझा है—यह एक धारणा है। और तीसरी धारणा क्या है? (लोग मानते हैं कि मसीह में सामान्य मानवजाति के कोई भी प्रकाशन नहीं होने चाहिए।) विशेष रूप से कहें तो बात यह है कि देहधारी परमेश्वर को अलौकिक होना चाहिए और उसे दूसरे सभी लोगों से भिन्न होना चाहिए और उसमें अलौकिक क्षमताएँ होनी चाहिए। यदि मसीह हर दृष्टि से साधारण और सामान्य होता, तो परमेश्वर में लोगों की आस्था कमजोर होती, और वे परमेश्वर पर शक करते और उसे नकार भी देते—सभी लोग अलौकिक परमेश्वर से प्रेम करते हैं। मेरा ये कहानियाँ सुनाना क्या तुम लोगों के लिए सत्य समझने में लाभकारी है? (हाँ।) यह लाभकारी होना चाहिए। यदि मैं बिना किसी तथ्यात्मक आधार के सत्य के इस पहलू पर संगति करता, तो शायद तुम सब सोचते कि यह अमूर्त है, और तुम नहीं जान पाते कि इसका संदर्भ वास्तव में किससे है। हालाँकि मैंने जो तुम्हें बताए हैं वे कुछ ठोस उदाहरण हैं, और इन्हें सुनने के बाद तुम लोग सोचते हो कि ये व्यावहारिक और समझने में आसान हैं, और इन कहानियों के जरिये तुम कुछ सत्यों को समझ पा रहे हो। लेकिन क्या तुम लोग किन्हीं दूसरी चीजों का सामना होने पर उन्हें मापने और उनके साथ पेश आने के लिए यह सीख पा रहे हो कि सत्य का प्रयोग कैसे करें? यदि तुम सत्य को लागू कर सकते हो, तो इससे यह पता चलता है कि तुम्हें आध्यात्मिक समझ है और तुम इन कहानियों में सत्य समझते हो; यदि नहीं तो तुम लोगों में आध्यात्मिक समझ नहीं है और तुम इन कहानियों में सत्य को नहीं समझ पाए हो। यदि इन कहानियों के कथानकों में तुम उनके सत्य का पता लगा सकते हो, जान सकते हो कि परमेश्वर के इरादे क्या हैं, जान सकते हो कि तुम्हें क्या समझना, विश्लेषण करना और किसमें प्रवेश करना चाहिए, और किन सत्यों को तुम्हें खोजना और हासिल करना चाहिए, तो तुम्हारे पास आध्यात्मिक समझ है; यदि मेरे ये कहानियाँ सुना देने के बाद तुम्हें इन चीजों में बड़ी दिलचस्पी हो जाती है, और तुम उन्हें याद तो रखते हो, पर सत्य को एक तरफ रख देते हो, तो तुममें आध्यात्मिक समझ नहीं है। यदि तुम इन कहानियों के सत्य को सचमुच समझ सकते हो, तो मेरा ये कहानियाँ बताना बेकार नहीं हुआ होगा। अगर इससे तुम लोगों को सत्य समझने में मदद मिल सके, तो मैं तुम्हें कुछ व्यावहारिक उदाहरण दूँगा। समस्या चाहे जो हो, मैं उसका विश्लेषण करूँगा; अगर इससे तुम्हें समझ मिलती है, तुम सत्य समझ पाते हो, और चीजें स्पष्ट रूप से देख पाते हो, तो चाहे जितनी भी कहानियाँ सुनानी हों, मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी। वास्तव में, मैं तुम्हें ये चीजें नहीं बताना चाहता हूँ, और मैं तुम्हें सच में सही और गलत की कहानियाँ नहीं बताना चाहता हूँ, लेकिन अगर ये चीजें सत्य में प्रवेश करने में तुम्हारी मदद करें, तो मैं तुम्हें ये बताऊँगा; अगर इनसे तुम्हें सत्य को समझने में मदद मिले, तो थोड़ा और बोलने में मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी। लेकिन, यदि तुम लोगों को मेरा लगातार बोलते रहना पसंद न हो, तो मेरे पास कम बोलने के सिवाय कोई विकल्प नहीं होगा।
मैंने तुम्हें जो कहानियाँ सुनाई हैं उनसे किन धारणाओं का समाधान होना चाहिए? सबसे पहले तुम्हें समझना चाहिए कि देहधारी परमेश्वर के मामले में परमेश्वर इस देह की मानवता को मूलतः कैसे परिभाषित करता है? वह साधारण और सामान्य है, और भ्रष्ट मानवजाति के बीच रहकर सामान्य मानवता की सभी गतिविधियों में शामिल हो सकता है, और वह कोई भिन्न प्रकार का नहीं है। वह लोगों की मदद, मार्गदर्शन और अगुआई कर सकता है। उसकी सामान्य मानवता हो या उसकी दिव्यता या उसका व्यक्तित्व—पहलू चाहे जो हो—उसे निश्चित रूप से हाथ में लिया हुआ कार्य और अपनी सेवकाई सँभालने में समर्थ होना चाहिए। यही वह मानक है जिससे परमेश्वर मसीह और देहधारण को मापता है; यह उसके कार्य के लिए और उसकी परिभाषा के लिए एक मानक है। जब प्रभु यीशु ने अपना कार्य किया, तो अब के देहधारण की तुलना में उसकी मानवता के कुछ अलौकिक पहलू थे। वह चमत्कार कर सकता था : वह अंजीर के वृक्ष को शाप दे सकता था, समुद्र को फटकार सकता था, समुद्र और हवाओं को शांत कर सकता था, बीमारों को ठीक कर सकता था, राक्षसों को निकाल सकता था, और पाँच रोटियों और दो मछलियों से पाँच हजार लोगों को खाना खिला सकता था, इत्यादि। हालाँकि इसके अलावा, उसकी सामान्य मानवता और बुनियादी जरूरतें अत्यंत सामान्य और व्यावहारिक दिखाई देती थीं। ऐसा नहीं है कि वह साढ़े तैंतीस वर्ष का पैदा हुआ था और फिर उसे क्रूस पर चढ़ा दिया गया। एक-एक दिन, एक-एक वर्ष, एक-एक मिनट, एक-एक सेकंड जीते हुए वह साढ़े तैंतीस वर्ष की उम्र तक जीवित रहा, जब तक कि आखिरकार उसे क्रूस पर नहीं चढ़ा दिया गया जिससे उसने मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा किया। इस संसार में साढ़े तैंतीस वर्ष जीने के बाद ही देहधारी ने यह कार्य पूरा किया—क्या यह व्यावहारिक नहीं है? (जरूर है।) यह व्यावहारिक है। परमेश्वर द्वारा अब किए जा रहे कार्य के चरण की बात करें, तो वह तुम सबको जो भी बताता है और जिन भी सत्यों पर तुम्हारे साथ संगति करता है, वे तुम्हारे आध्यात्मिक कद, जीवन में तुम्हारे विकास के स्तर और परमेश्वर द्वारा निर्मित संपूर्ण परिवेश पर आधारित होते हैं, और इसलिए मैं गहन-विचार करता हूँ कि कौन-से सत्य तुम्हारे साथ संगति के लिए सबसे अधिक उपयुक्त होंगे और वे कौन-से सत्य हैं जो मैं चाहता हूँ कि तुम समझो। बाहर से, ऐसा लगता है मानो यह देह इन चीजों पर चिंतन कर रहा है, जबकि असल में साथ-ही-साथ परमेश्वर का आत्मा कार्य कर रहा है; जब यह व्यक्ति सहयोग कर रहा होता है, तब परमेश्वर का आत्मा इस सबका मार्गदर्शन कर रहा होता है। यदि तुम इस पर इस तरह से गौर करो तो तुम इस देह के सार या उसकी पहचान पर संदेह नहीं करोगे—तुम इन चीजों पर कभी सवाल नहीं उठाओगे। मैं तुम लोगों के साथ जो चीजें करता हूँ और तुम लोगों से जो अपेक्षाएँ रखता हूँ, वे कभी भी परमेश्वर के आत्मा की संपूर्ण प्रबंधन योजना के प्रतिकूल नहीं हो सकती। वे साथ-साथ आगे बढ़ते हैं, एक ही दिशा में चलते हैं, और एक-दूसरे को सहारा देते हैं। यदि परमेश्वर के आत्मा ने यह देह धारण न किया होता, तो वह तुमसे आमने-सामने बात न कर पाता, तुम उसकी बातें न सुन पाते, और तुम नहीं समझ पाते कि वह तुमसे क्या अपेक्षाएँ रखता है। हालाँकि यदि केवल यह देह ही होता और परमेश्वर का आत्मा उसके भीतर न रहा होता, तो क्या यह देह कोई भी कार्य कर पाता? यकीनन नहीं कर पाता। यदि परमेश्वर देहधारी न हुआ होता, तो कोई भी इंसान इस कार्य का बीड़ा न उठा पाता। इसलिए, इस सामान्य देह को प्रति दिन, प्रति माह, और प्रति वर्ष जीना होगा, पल-दर-पल इसी प्रकार जीवन जीना होगा, परमेश्वर की मानवता निरंतर परिपक्व होते हुए, उसका अनुभव सदा बढ़ते हुए, और साथ ही परमेश्वर की प्रबंधन योजना द्वारा अपेक्षित कार्य का बीड़ा उठाने का निरंतर प्रयास करते हुए। कार्य के इस चरण के निर्वहन में, मैं 20 वर्ष से भी कम उम्र में ही कलीसिया में कार्य करने लगा था, और भाई-बहनों के संपर्क में आया था। मैंने सभाओं में भाग लेना, संगति करना और कलीसियाओं के बीच आना-जाना शुरू कर दिया, और मैं तरह-तरह के लोगों के संपर्क में आया। उस वक्त से अब तक, मुझे लगता है कि मेरी भाषाई काबिलियत और लोगों और चीजों को देखने की मेरी काबिलियत लगातार बढ़ती रही है। मेरी काबिलियत की यह बढ़त तुम सबके हालात से भिन्न कैसे है? तुम लोगों को मेरे बोले गए वचनों और मेरे द्वारा संगति किए गए सत्यों के जरिये अनुभव करना चाहिए, और अनुभव बढ़ने के साथ तुम धीरे-धीरे सुनिश्चित हो जाओगे कि मैं जो वचन बोलता हूँ वे परमेश्वर से आए हैं, वे सत्य हैं, सही हैं, और ऐसे वचन हैं जो तुम लोगों को स्वभावगत परिवर्तन प्राप्त कर उद्धार पाने योग्य बना सकते हैं। अपनी बात कहूँ, तो जब तुम लोग तरक्की कर रहे होते हो, तब मैं और ज्यादा गहरा होता जाता हूँ। तुम लोगों के बारे में मेरी समझ तो लगातार बढ़ ही रही है, मैं लगातार वे चीजें भी तैयार कर रहा हूँ जो मैं कदम-दर-कदम तुम्हारा पोषण कर पाने के लिए कहना चाहता हूँ। कुछ लोग कहते हैं, “तुम हमारी जरूरतों का पोषण देना चाहते हो, हमारा आध्यात्मिक कद धीरे-धीरे बढ़ाना चाहते हो, हमें परिवर्तित होने और उद्धार के पथ पर ज्यादा-से-ज्यादा प्रगति करने के योग्य बनाना चाहते हो, और चाहते हो कि परमेश्वर से हमारा हमेशा से ज्यादा करीबी रिश्ता बने, तो तुम यह कैसे करोगे?” तुम्हें इस बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है। मैं कभी कोई चीज नहीं माँगता, न ही मुझे उपवास रखने या प्रार्थना करने, या कोई भी चीज माँगने की जरूरत है जैसे कि वर्षा के लिए प्रार्थना करना, ताकि परमेश्वर जल्द-से-जल्द मुझे कुछ वचन दे दे जिनसे मैं तुम लोगों का पोषण कर सकूँ। मुझे ऐसा करने की जरूरत नहीं है। चूँकि यह देह स्वयं परमेश्वर है, और वह यह सेवकाई करता है, इसलिए वह लोगों को पोषण देने के लिए सत्य व्यक्त करता है—परमेश्वर के देहधारी शरीर और भ्रष्ट मानवजाति के बीच यही अंतर है। इसलिए तुम लोगों को जो चाहिए उसे समझने पर ध्यान देने की मुझे जरूरत नहीं है; फिर भी मैं तुम लोगों को जो पोषण देना चाहता हूँ और तुम्हारे साथ जो संगति करना चाहता हूँ, वह यकीनन वही है जिसकी तुम लोगों को जरूरत है। तुम लोगों को मेरे वचनों और कार्य के मद्देनजर बस आगे बढ़ने की जरूरत है, और तुम लोगों की दशा सुधरने लगेगी, और इसके साथ-साथ तुम्हारे जीवन में भी और ज्यादा-से-ज्यादा तरक्की होगी। साथ ही, जब मैं तुम लोगों का सिंचन कर रहा हूँ तो परमेश्वर का आत्मा सहयोगपूर्ण ढंग से अपना कार्य करेगा। असल में, यह परमेश्वर का आत्मा ही है जो उसकी मानवता के साथ सहयोग करता है और उसकी मानवता उसकी दिव्यता के साथ सहयोग करती है—वे सब साथ-साथ कार्य करते हैं। मैं यहाँ तुम लोगों का सिंचन कर रहा हूँ और परमेश्वर का आत्मा तुम लोगों के बीच है, वह कार्य कर रहा है, प्रबुद्ध और रोशन कर रहा है और फिर तुम लोगों के लिए स्थितियाँ बना और हालात तैयार कर रहा है ताकि तुम लोग विभिन्न सत्यों में प्रवेश कर सको। उसकी मानवता और दिव्यता इस तरह एक साथ कार्य करती हैं। तो क्या ऐसा कोई इंसान है जो देह और आत्मा के बीच यह सहयोग प्राप्त कर सके? बिल्कुल नहीं। इसलिए, यदि तुम परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन को जानने की कोशिश न करो और सत्य के इस पहलू से देह के साथ पेश न आओ तो तुम कभी भी समझ नहीं पाओगे कि इस देह का वास्तविक सार क्या है, यह देह किसके बारे में है, और वह ठीक किस तरह से कार्य करता है। यदि तुम ये चीजें न समझ पाओ, तो तुम कभी भी सुनिश्चित नहीं हो पाओगे कि वह इंसान है या परमेश्वर। लेकिन यदि तुम इस स्तर को स्पष्ट रूप में देख सको या अपने अनुभव में इस स्तर तक पहुँच सको और इस स्तर के प्रति जागरूक हो सको तो फिर तुम जान लोगे कि जब परमेश्वर की देह—मसीह—धरती पर कार्य कर रही होती है तो पवित्र आत्मा सहयोग कर रहा होता है और वही कार्य कर रहा होता है, और यह एक ऐसी चीज है जो पूरी मानवजाति में कोई भी हासिल नहीं कर सकता है। और जब आत्मा कार्य कर रहा होता है तो उसके कार्य के साथ देह सहयोग कर रही होती है। वे एक-दूसरे के पूरक हैं, संगत हैं और कभी भी एक-दूसरे के प्रतिकूल नहीं होते। कुछ लोग कहते हैं, “कभी-कभी जब मैं परीक्षणों का सामना करता हूँ, तब पवित्र आत्मा मुझे सबक सीखने के लिए प्रबुद्ध करता है। मगर तुम दूसरे सत्य व्यक्त करते हो। यह सब क्या है?” इसमें कोई विरोधाभास या विरोध नहीं है। मसीह धीरे-धीरे और उपयुक्त क्रम में सत्य व्यक्त करता है, जबकि पवित्र आत्मा सभी के अनुभवों में विभिन्न सीमाओं तक उनकी अगुआई करता है—सबके लिए सबकुछ समान है, ऐसा कोई तरीका नहीं है। मसीह उन अहम मसलों के आधार पर सत्य पर संगति करने के द्वारा उपदेश देता है जिनका सामना वास्तव में परमेश्वर के चुने हुए लोग करते हैं, और पवित्र आत्मा का मार्गदर्शन भी हर व्यक्ति के अपने हालात पर आधारित होता है। इसमें कोई विरोधाभास या विवाद नहीं है। अलग-अलग समय और अलग-अलग चरणों में लोगों का आध्यात्मिक कद भिन्न-भिन्न होता है, जबकि परमेश्वर द्वारा किया गया पूरा कार्य उसके द्वारा व्यक्त सत्य में है, यानी सत्य, मार्ग और जीवन जैसा कि परमेश्वर द्वारा कहा गया है। उसका कार्य इस दायरे से परे नहीं जाता—यह सब सत्य है। पवित्र आत्मा जिन सत्यों से तुम्हें प्रबुद्ध करता है, और समझने के लिए तुम्हें जो रोशनी देता है, वे किस पर आधारित होते हैं? ये इन सत्यों पर आधारित होते हैं जिन्हें मसीह अब व्यक्त करता है, यानी, सत्य, मार्ग और जीवन जिनके बारे में वह अब तुम्हें समझने देता है। कुछ लोग कहते हैं, “हमें देह रूप में तुम्हारी जरूरत नहीं है। हमें प्रबुद्ध करने और हमारे मार्गदर्शन के लिए हमारे पास पवित्र आत्मा का होना काफी है। तुम्हारे बिना भी हमें वैसी ही नई प्रबुद्धता और रोशनी मिल सकेगी, हम नए युग में वैसे ही प्रवेश कर सकेंगे, और हम वैसे ही उद्धार प्राप्त कर सकेंगे।” क्या ऐसा कहना तर्कसंगत है? (नहीं।) धार्मिक लोगों ने दो हजार वर्षों से यीशु में विश्वास रखा है, और पवित्र आत्मा ने दो हजार वर्ष तक उनका मार्गदर्शन किया है, पर उन्होंने क्या पाया है? सिर्फ छुटकारे का सुसमाचार, और उन्होंने परमेश्वर के अत्यधिक अनुग्रह का आनंद लिया है, फिर भी वे परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों में व्यक्त ये सत्य प्राप्त नहीं कर पाए हैं। इसलिए, यदि अंत के दिनों में परमेश्वर का देहधारी शरीर इतने सारे सत्य व्यक्त करते हुए यहाँ मौजूद न होता, तो तुम लोग क्या हासिल कर पाते? तुम बस उन्हीं धार्मिक लोगों जैसे ही होते, पवित्र आत्मा से अत्यधिक प्रबुद्धता और अत्यंत अनुग्रह प्राप्त करते, या फिर परमेश्वर तुम्हें चुनकर तुम्हारा उपयोग करता और तुम एक नबी या एक प्रेरित बन जाते, लेकिन यदि तुम अंत के दिनों के परमेश्वर के देहधारण द्वारा व्यक्त ये सत्य स्वीकार नहीं करते हो, तो तुम्हारे पास कोई उपाय नहीं होगा जिससे कि तुम पूर्ण बनाए जा सको, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सको, या परमेश्वर की स्वीकृति पा सको।
तुम लोग अब देहधारण को स्वीकार करने में समर्थ हो, मगर तुम लोगों के मन में देहधारण के सार को लेकर अभी भी कुछ धारणाएँ हैं, और तुम कभी इसे लेकर सुनिश्चित नहीं होते कि देहधारण ही व्यावहारिक परमेश्वर है। यदि अभी मैं तुम लोगों से बातें कर रहा होता और तुम्हें पता चलता कि मैं बाहरी दुनिया की भी कुछ चीजें नहीं समझता हूँ, तो क्या तुम धारणाएँ बना लोगे? कुछ लोग इससे उबर नहीं पाएँगे, और सोचेंगे, “तुम इसे भी नहीं समझते हो। ऐसा नहीं होना चाहिए। तुम देहधारी परमेश्वर हो, तो तुम्हें सब कुछ समझना चाहिए। ऐसा कुछ भी नहीं होना चाहिए जिसे तुम नहीं जानते, या जो तुम कर नहीं सकते। भले ही तुम एक साथ हर जगह नहीं रह सकते हो, फिर भी तुम्हें सब कुछ जानना चाहिए!” क्या यह वह धारणा नहीं है जो लोगों के मन में है? (बिल्कुल।) यह भी एक धारणा है। देहधारण की सामान्य मानवता के पीछे की संकल्पना क्या है? वह यह है कि देहधारी के सोचने के तरीके में सामान्य इंसानी तर्क है—यह अलौकिक नहीं है, यह अस्पष्ट नहीं है, और यह खोखला नहीं है। अध्ययन करने के द्वारा जिस चीज तक सामान्य मानवता की सोच से पहुँचा जा सकता है, उसे वह प्राप्त कर सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह ऐसी चीजों के बारे में उस व्यक्ति से ज्यादा जाने जिसे इसमें विशेषज्ञता हासिल है, और यह सामान्य है। इसके अलावा, वह सामान्य मानवता के तर्क और सोच के अनुसार बोलता और कार्य करता है, अलौकिक ढंग से नहीं। मिसाल के तौर पर, सामान्य मानवता की सोच कदम-दर-कदम आगे बढ़ती है, और देहधारी भी इसी तरह सोचता है। उसकी सामान्य मानवता ऐसी क्यों है? क्या यह उचित है? (हाँ।) तुम ऐसा क्यों कहते हो कि यह उचित है? कोई सामान्य व्यक्ति सीढ़ियाँ चढ़ते समय एक बार में कितने पायदान चढ़ता है? (एक।) एक कदम पर एक पायदान; सीढ़ियाँ चढ़ने का यही सामान्य तरीका है। यदि मैं एक कदम पर कई पायदान चढ़कर तुरंत घर के अंदर प्रवेश कर जाता, तो क्या तुम लोग यह कर पाते? (नहीं।) नहीं, तुम लोग नहीं कर पाते। और अगर मैं जोर देकर कहूँ कि तुम्हें यह करना ही है, तो तुम लोग क्या करोगे? क्या तुम यह कर पाओगे? (नहीं।) नहीं, तुम लोग नहीं कर पाओगे। यह उन लोगों की जरूरतों पर आधारित होता है जो इस कार्य का लक्ष्य हैं। मैं सत्य पर इस प्रकार संगति करता हूँ, एक विषय और एक मुख्य मुद्दा लेता हूँ, और फिर विशिष्ट रूप से और पूरी तरह बोलने में अपनी पूरी क्षमता लगा देता हूँ, कहानियाँ सुनाता हूँ, उदाहरण देता हूँ, बार-बार बातें दोहराता हूँ, फिर भी इस तरह बोलने पर भी ऐसे बहुत-से लोग हैं जो नहीं समझते हैं और मुख्य बात ही नहीं समझते। इसलिए यदि मैं इतने विस्तार से न बोलूँ और सभी चीजों को अत्यंत गूढ़ और व्यापक ढंग से न समझाऊँ, तो तुम लोग कुछ भी हासिल नहीं कर पाओगे, या समझ नहीं पाओगे, और यह कार्य खोखला और अव्यावहारिक होगा। तुम लोग एक कदम पर एक पायदान चढ़कर आगे बढ़ सकते हो, इसलिए मैं भी एक कदम पर एक पायदान चढ़कर तुम्हें आगे बढ़ाऊँगा, और इस तरह से तुम लोग मेरे कदम से कदम मिला सकोगे। यदि मैं एक कदम में चार पायदान चढ़ जाऊँ, तो नतीजा क्या होगा? तुम लोग कभी भी मेरे कदम से कदम नहीं मिला पाओगे। यदि मेरी सोच उन्नत होती, मैं कूदते-फाँदते हुए आगे बढ़ पाता और तुम लोग उस तक पहुँच ही नहीं पाते, तो देहधारण निरर्थक हो जाता। इसलिए यह देह चाहे जितना भी सामान्य और व्यावहारिक क्यों न हो—ऐसा लग सकता है कि उसमें परमेश्वर के आत्मा की काबिलियतें नहीं हैं—ये सब मानवजाति की जरूरतों के कारण है। चूँकि फिलहाल परमेश्वर द्वारा पोषित होने वाले लोग वे हैं जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके हैं, जो कोई सत्य नहीं समझते, और जिनमें सत्य समझने की काबिलियत नहीं है, इसलिए देहधारी होने पर उसके पास सामान्य मानवता की सबसे बुनियादी सोच होनी चाहिए। यह सबसे बुनियादी सोच क्या है? वह यह है कि जब वह बोले, तो औसत काबिलियत वाले, यहाँ तक कि थोड़ी कम काबिलियत वाले लोग भी उसे समझ सकें। अगर उनकी सोच सामान्य हो, तो सभी लोग उसकी कही और बताई हुई चीज को समझ सकेंगे, उसके द्वारा उपदेशित सत्यों को समझ सकेंगे, और फिर सत्य को स्वीकार सकेंगे। केवल इसी प्रकार से परमेश्वर के किए हुए कार्य का प्रत्येक कदम और उसके बोले हुए सभी वचनों का प्रभाव पड़ सकेगा और नतीजे दिखाई दे सकेंगे। क्या यह व्यावहारिक नहीं है? (बिल्कुल।) तो यदि लोग धारणाओं से चिपके रहें और यह कहकर उन्हें जाने न दें, “पहले, कुछ सम्राटों को असाधारण स्मरण शक्ति का गुण प्राप्त था, और वे एक ही नजर में दस पंक्तियाँ पढ़ सकते थे। क्या परमेश्वर को ऐसा नहीं होना चाहिए? यदि तुम्हारे पास ये गुण नहीं हैं, तो हम तुम्हारा अनुसरण नहीं कर पाएँगे, क्योंकि तुम अत्यंत साधारण हो। बढ़िया होगा यदि तुम एक बड़ी हस्ती जैसे लगो,” इससे तुम क्या समझ सकते हो? लोग शैतान द्वारा इस बिंदु तक भ्रष्ट किए जा चुके हैं, जहाँ वे इतने ज्यादा अज्ञानी हैं कि सुधार से परे हैं। थोड़ी-सी सामान्य इंसानी सोच और काबिलियत होना, और परमेश्वर उन्हें चुनता और उन पर कार्य करता है, लोगों का परमेश्वर का अनुसरण करने का थोड़ा मन होता है और वे थोड़ा जमीर और विवेक रख पाते हैं—इसके अलावा वे कुछ भी नहीं समझते। न केवल वे कोई भी सत्य नहीं समझते, बल्कि वे यह भी नहीं समझते कि सामान्य मानवता क्या है, भ्रष्ट स्वभाव क्या हैं, धारणाएँ और कल्पनाएँ कैसे पैदा होती हैं, उन्हें कैसे दूर करना चाहिए, लोगों को परमेश्वर से कैसे पेश आना चाहिए, या कम-से-कम उनके पास कैसा जमीर और विवेक होना चाहिए, इत्यादि। परमेश्वर चाहे जितनी भी आसानी से समझी जाने वाली भाषा का प्रयोग करे, लोग ठीक से समझ नहीं पाते और बस सतही ढंग से ही समझ पाते हैं। मुझे बताओ, कुछ भी न समझने वाले, परमेश्वर का विरोध करने वाले भ्रष्ट लोगों के समूह का सामना होने पर, देहधारी परमेश्वर में किस प्रकार का सार, कैसी मानवता और कैसी सामान्य इंसानी सोच होनी चाहिए, ताकि वह परमेश्वर के समक्ष ऐसे लोगों को ले जा सके? मुझे बताओ, परमेश्वर को क्या करना चाहिए? कुछ लोग कहते हैं, “परमेश्वर सर्वशक्तिमान है न? लोगों पर विजय पाने के लिए वह अनेक संकेत और चमत्कार क्यों नहीं दिखाता?” यह एक धारणा है जो ज्यादातर लोगों के मन में है। वे यह सवाल नहीं उठाते कि क्या संकेत और चमत्कार दिखाकर और अलौकिक उपायों से भ्रष्ट स्वभावों का खुलासा कर उन्हें दूर किया जा सकता है। क्या लोगों के मन में अलौकिक साधनों से सत्य गढ़ा जा सकता है? क्या यह शैतान को राजी करेगा? (नहीं।) तुम लोगों का फिलहाल “नहीं” कहना शायद एक प्रकार का धर्म-सिद्धांत है, लेकिन किसी दिन-विशेष तक अनुभव करने के बाद तुम लोग जान जाओगे कि लोग कितने संवेदनाहीन और मंदबुद्धि हैं, कितने विद्रोही और दुराग्रही हैं, आखिर कितने दुष्ट हैं, और वे सत्य से कितना प्रेम नहीं करते हैं। किसी दिन-विशेष तक अनुभव कर लेने के बाद, तुम लोग समझ जाओगे कि परमेश्वर का देहधारी शरीर, सामान्य मानवता का यह देह, वह है जिसकी संपूर्ण मानवता को जरूरत है। इसलिए, यदि तुम्हारे मन में अभी भी तरह-तरह की कल्पनाएँ और धारणाएँ हैं, तो तुम्हारा ऐसा करना एक गैर-जिम्मेदार रवैया है और परमेश्वर के लिए यह ईशनिंदा है; यह मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादे को नकारना और उस पर सवाल उठाना है। यदि तुम सोचते हो, “हमारे पास ज्ञान, शिक्षा और दिमाग है। हम अंत के दिनों में पैदा हुए हैं, और हममें से कुछ लोगों ने संसार में उच्च शिक्षा प्राप्त की है, और हमारी कुछ विशेष पारिवारिक पृष्ठभूमियाँ हैं। हम आधुनिक, शिक्षित लोग हैं, और ऐसे अत्यंत साधारण और सामान्य मसीह को, जिसे सब लोग नीची नजर से देखते हैं, नकारने के हमारे पास कारण हैं; हमारे पास तुम्हारे बारे में धारणाएँ बनाने के कारण हैं,” तो फिर यह कैसी समस्या है? यह विद्रोहशीलता है और अच्छे-बुरे में फर्क नहीं जानना है! धारणाएँ पैदा होने के बाद लोग उन्हें दूर कर सकते हैं, लेकिन उनके दूर हो जाने के बाद भी यदि लोग जिद पकड़कर परमेश्वर के देहधारण या मसीह के सामान्य मानवता वाले पक्ष को स्वीकार करने से मना करते हैं, तो फिर यह उनके लिए तकलीफ पैदा करेगा और यह उन्हें उद्धार प्राप्त करने से रोकेगा। जब तुम किसी दिन-विशेष तक अनुभव कर लोगे, तो तुम समझ जाओगे कि परमेश्वर का देहधारण जितना सामान्य होता है, उसकी मानवता जितनी सामान्य होती है, उसके पास जो सब है और जो वो प्रकट करता है, जितना सामान्य होता है, उतना ही ज्यादा हमारा उद्धार होता है, और ये चीजें जितनी अधिक सामान्य होती हैं, उतनी ही हमारी जरूरत के अनुरूप होती हैं। अगर परमेश्वर का देहधारण अलौकिक होता, तो धरती पर जीने वाले लोगों में किसी को भी उद्धार प्राप्त न होता। परमेश्वर की दीनता और छिपाने के कारण ही, देखने में साधारण लगने वाले परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता के कारण ही, इंसान को उद्धार का अवसर मिलता है। चूँकि लोगों में विद्रोहशीलता, शैतानी भ्रष्ट स्वभाव और भ्रष्ट सार है, इसलिए परमेश्वर के प्रति हर तरह की धारणाएँ, गलतफहमियाँ और प्रतिरोध पैदा होते हैं; यहाँ तक कि इन धारणाओं के परिणामस्वरूप लोग अक्सर घमंड और आत्म-विश्वास से इस मसीह को अस्वीकार करते हैं और उसकी सामान्य मानवता को अस्वीकार करते हैं—यह एक बड़ी गलती है। अगर तुम संपूर्ण उद्धार पाना चाहते हो, यदि तुम परमेश्वर का उद्धार पाना चाहते हो, उसका न्याय और उसकी ताड़ना पाना चाहते हो, तो तुम्हें पहले अपनी विभिन्न धारणाओं और कल्पनाओं और मसीह की सामान्य मानवता के बारे में त्रुटिपूर्ण परिभाषाओं को भुला देना होगा, तुम्हें मसीह के बारे में अपने विभिन्न नजरियों और रायों को अलग रखना होगा और परमेश्वर से आने वाली हर बात को स्वीकार करने के तरीके पर विचार करना होगा। केवल तभी परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन और उसके द्वारा व्यक्त किए गए सत्य धीरे-धीरे तुम्हारे हृदय में प्रवेश कर पाएँगे और तुम्हारा जीवन बन पाएँगे। यदि तुम उसका अनुसरण करना चाहते हो, तो तुम्हें उसकी हर चीज को स्वीकार करना चाहिए; उसका आत्मा हो, उसके वचन हों, या उसका देह, तुम्हें सब कुछ स्वीकार कर लेना चाहिए। यदि तुमने उसे सचमुच स्वीकार कर लिया है, तो तुम्हें उसके विरोध में खड़ा नहीं होना चाहिए, हमेशा उसे गलत नहीं समझना चाहिए, अपनी धारणाओं के भरोसे रहकर उसके प्रति विद्रोही नहीं होना चाहिए, अपनी धारणाओं से चिपके तो रहना ही नहीं चाहिए, हमेशा उस पर संदेह नहीं करना चाहिए और उसका प्रतिरोधी और उसके विरोध में नहीं होना चाहिए। इस प्रकार का रवैया तुम्हें हानि ही पहुँचाएगा और यह तुम्हारे लिए बिल्कुल भी लाभकारी नहीं है। क्या तुम मेरी बात मान सकते हो? (हाँ।) अच्छी बात है, तो चलो जल्दी करो, और अपनी धारणाएँ दूर करने के लिए सत्य को खोजो। यह मसला भ्रष्ट स्वभावों से जुड़ा हुआ है, और यदि तुम इसे नहीं सुलझाते हो, तो तुम्हें अपने भ्रष्ट स्वभावों के कारण अपनी जान देनी पड़ेगी।
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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?