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ओहदा खोने के बाद ...

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हुईमीन जियाओजूओ शहर, हेनान प्रदेश

हर बार जब मैं किसी को बदले जाने और इस कारण उनके दुखी, कमजोर या रुष्ट होने और उनके अनुसरण न करने की घटना को देखती थी या इस बारे मेँ सुनती थी तो ऐसे लोगों के प्रति मेरे मन मेँ निरादर का भाव आ जाता था। मैं सोचती थी कि यह सब इससे अधिक कुछ नहीं है कि कलीसिया के अंतर्गत अलग-अलग लोगों के अलग-अलग कार्य कलाप हैं, यहाँ उच्च और निम्न मेँ कोई भेद नहीं है और हम सब परमेश्वर की संतति हैं तथा ऐसा कुछ भी नहीं है जिसको हम तुच्छ समझें। अत: मैं सोचती थी कि चाहें हम नए विश्वासियों की देख-रेख कर रहे हैं या किसी जनपद का नेतृत्व हमारे हाथ मेँ है; मैने कभी भी नहीं सोचा था कि मेरा पूरा ध्यान ओहदे पर ही केंर्दित था, क्या मै इस तरह की सोच वाली व्यक्ति थी। मैं असंख्य वर्षों तक यह मानने के लिए सहमत नहीं होती कि अपनी बदली होने पर मैं ऐसा कोई शर्मनाक व्यवहार करूंगी...।

चूंकि मेरे कार्य ने विगत कुछ समय से कोई परिणाम नहीं दिया था, मेरे नेता ने मुझे बदल दिया। उस समय मुझे लगा कि भले ही मेरी चारित्रिक योग्यता, एक जनपद का नेता बनने के योग्य न हो, फिर भी मुझे इस कार्य की देख-रेख और संरक्षण का कार्य करने के लिए अनुमति प्रदान की जानी चाहिए थी। मैंने अपने नेता से कभी यह अपेक्षा नहीं की थी कि वे मुझे रोजमर्रा के काम की ज़िम्मेदारी सौंपेंगे। अत: मुझे आश्चर्य हुआ कि मुझ जैसे जनपद स्तर के प्रतिष्ठित नेता को रोज मर्रा का काम सौंपा जा रहा है, जबकि कलीसिया का कोई भी व्यक्ति जिसके पास थोड़ी भी समझ है वह इस काम को कर सकता है। क्या इस काम को मुझे देना मेरी प्रतिभा का स्पष्ट रूप से दुरुपयोग करना नहीं है? लेकिन मैंने अपनी भावनाओं को अपने मन मेँ ही रखा क्योंकि मुझे आशंका थी कि बहने कहेंगी कि मैं अवज्ञाकारी हूँ; कि मैं अपने ओहदे को लेकर चिंतित हूँ। लेकिन जैसे ही मैं घर पहुंची, मैं बिस्तर पर धम्म से पसर गई और अत्यंत विचलित महसूस करने लगी। मन मेँ यह विचार घुमड़ने लगा कि अब आज के बाद मेरा कोई ओहदा नहीं होगा और मेरे भाई और बहन मेरे बारे मेँ क्या सोचेंगे – इस बात से मेरा मन भन्नाया हुआ था। और अब जब मुझे रोज मर्रा का काम देखना है तो मेरे अच्छे दिन फिर कब आएंगे? मैं जितना अधिक इस बारे मेँ सोचती थी, मेरा मन उतना ही अधिक बेचैन होता जा रहा था।

कुछ दिनों बाद, मैं उस बहन से मिली जिसने मेरे लिए इस कार्य की व्यवस्था की थी। जैसे ही मैं उनसे मिली उन्होने मेरे साथ संगति की और कहा, "इस काम को करना आसान प्रतीत हो सकता है, फिर भी इसे निष्ठा से किया जाना चाहिए" और इसके बाद वे सत्य, बुद्धि और आज्ञापालन जैसे पक्षों पर बात करने लगीं। मैं अनिच्छुक ढंग से बुदबुदा रही थी जबकि मेरे दिल मेँ आग लगी हुई थी और मैं सोच रही थी, "आप मुझे ऐसे सहभागिता दे रही हैं? जैसे कि मुझे कुछ भी पता नहीं है! क्या मैं ही वह नहीं हूँ जिसने आपके साथ शुरूआत में सहभागिता की थी? अब आप पलट कर मुझे समझा रही हैं?" सहभागिता के जो शब्द वह बहन बोले जा रही थी उसका एक भी शब्द मेरे मन मेँ नहीं समा रहा था; बल्कि उसकी लफ्फाजी से असहमत थी। अंत में मैंने धैर्य खोकर कह ही दिया, "कुछ और कहना है? यदि नहीं, तो मैं चलती हूँ!" जब मैं वापस आई, तो चकित थी कि बहन के प्रति मेरा दृष्टिकोण ऐसा क्यों था? यदि उसका ओहदा हमेशा मुझसे ऊपर रहा होता या मेरे बराबर रहा होता, तो भी क्या मैं उसके साथ ऐसा ही व्यवहार करने के बारे मेँ सोच पाती? नहीं, बिलकुल नहीं! क्या ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि मैंने हमेशा उसकी अगुवाई की थी, और अब जब वह मुझे कुछ बता रही है तो मैं उसे मानने के लिए तैयार नहीं थी? क्या यह संकेत नहीं करता है कि मेरे मन मेँ ओहदे का प्रभुत्व छाया हुआ है? मुझे अपने शर्मनाक व्यवहार पर अचानक बहुत ग्लानि हुई और परमेश्वर के न्याय के वचन मुझे याद आए: "जितना अधिक तू इस तरह से तलाश करेगी उतना ही कम तू पाएगी। हैसियत के लिए किसी व्यक्ति की अभिलाषा जितनी अधिक होगी, उतनी ही गंभीरता से उसके साथ निपटा जाना होगा उतने ही अधिक बड़े शुद्धिकरण से उसे अवश्य गुजरना होगा। इस तरह का व्यक्ति अत्यधिक व्यर्थ है! उसके द्वारा इसे पूरे तरह से छोड़ दिए जाने के उद्देश से उसके साथ पर्याप्त रूप से निपटा और उसका ठीक से न्याय अवश्य किया जाना चाहिए। यदि तुम लोग अंत तक इस तरह अनुकरण करते रहते हो, तो तुम लोग कुछ भी नहीं पाओगे। जो लोग जीवन का अनुकरण नहीं करते हैं वे रूपान्तरित नहीं हो सकते हैं; जिन्हें सच्चाई की प्यास नहीं है वे सच्चाई को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। तू व्यक्तिगत रूपान्तरण का अनुकरण करने और प्रवेश करने पर ध्यान केन्द्रित नहीं करती है; तू हमेशा उन अनावश्यक अभिलाषाओं और उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करती है जो परमेश्वर के लिए तुम्हारे प्रेम को बाधित करती हैं और तुझे उसके करीब आने से रोकती हैं। क्या वे चीजें तुझे रूपान्तरित कर सकती हैं? क्या वे तुझे राज्य में ला सकती हैं? यदि तेरी खोज का उद्देश्य सच्चाई की तलाश करना नहीं है, तब भी तू इस अवसर का लाभ उठा सकती है और इसकी सफलता का प्रयास करने के लिए दुनिया में लौट सकती है। तेरा समय वास्तव में इस तरह से बर्बाद करने योग्य नहीं है-क्यों अपने आप को यातना दो?" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "तुम लोग एक विषमता होने के इच्छुक क्यों नहीं हो?" से).परमेश्वर के वचनों को देखते हुए और अपने बारे मेँ सोचते हुए, मुझे महसूस हुआ कि जिसका अनुगमन मैं कर रही थी वह कहीं से भी सत्य नहीं था और न ही मैं परमेश्वर को संतुष्ट करने का कोई प्रयास कर रही थी, बल्कि इसके विपरीत मैं प्रसिद्धि, लाभ और ओहदे के मायाजाल मेँ उलझी हुई थी। ओहदे के साथ मेरे आत्म विश्वास मेँ सौ गुना वृद्धि हो जाती थी और इसके अभाव मेँ पूर्णत: असक्त,तुनकमिजाज़ और इस हद तक हताश हो जाती थी कि काम मेँ मेरा मन ही नहीं लगता था। अपने ओहदे के कारण मैं बहक गई थी, तुच्छ और निरर्थक चीजों के पीछे व्यस्त रहती थी और अपना बहुत समय बर्बाद करती थी; और अंत मेँ मुझे क्या हासिल हुआ? वही; जो शर्मनाक व्यवहार मैंने आज प्रदर्शित किया? मेरे लिए परमेश्वर ने जो जो किया है उसके बारे मेँ सोचते हुए, मुझे लगा कि परमेश्वर ने जो विश्वास मुझ पर किया था, उसके अनुरूप सिर्फ यही नहीं कि मैंने उनके हृदय को सुख नहीं पहुंचाया बल्कि उन्होने जो दायित्व मुझे सौंपा था, उसे निम्न कोटि का समझ कर, मैंने उसका प्रतिरोध किया और उसे करना नहीं चाहती थी। मेरी स्थिति को देखते हुए उन्होने मुझे निम्न कोटि का काम सौंपा था, और मैं उसे करना नहीं चाहती थी। तो क्या मैं अपनी सच्चाई के साथ जी रही थी? मैंने परमेश्वर को उनके प्रकटीकरण के लिए धन्यवाद दिया जिसके कारण मैं अपनी प्रसिद्धि, लाभ और ओहदे के पीछे भागने के शर्मनाक व्यवहार को पहचान सकी, और यह समझ पाई कि मैं अत्यंत धृष्ट व अहंकारी हो गई थी और ओहदे को अत्यधिक महत्व देने लगी थी। फिर परमेश्वर के वचनों का एक गीत मन मेँ गूँजा: "हे परमेश्वर! चाहे मेरी हैसियत हो या नहीं, अब मैं स्वयं को समझती हूँ। यदि मेरी हैसियत ऊँची है तो यह तेरे उत्कर्ष के कारण है, और यदि यह निम्न है तो यह तेरे आदेश के कारण है। सब कुछ तेरे हाथों में है। मेरे पास कोई विकल्प या शिकायतें नहीं हैं। तूने निश्चित किया कि मैं इस देश में और इन लोगों के बीच पैदा हूँगी, और मुझे केवल तेरे प्रभुत्व के अधीन पूरी तरह से आज्ञाकारी होना चाहिए क्योंकि सब कुछ उसी के भीतर है जो तूने निश्चित किया है। … यदि तून मुझे उपयोग करता है, तो मैं एक प्राणी हूँ। यदि तू मुझे पूर्ण बनाता है, मैं तब भी एक प्राणी हूँ। यदि तू मुझे पूर्ण नहीं बनाता है, तो मैं तब भी तुझ से प्यार करती हूँ क्योंकि मैं सृजन से अधिक कुछ नहीं हूँ।" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "तुम लोग एक विषमता होने के इच्छुक क्यों नहीं हो?" से). मैंने इस गीत को बार बार और कई बार गाया, मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे, और मैं परमेश्वर के समक्ष प्रार्थना करने उपस्थित हुई: हे परमेश्वर! आपके वचनों से मैं आपकी आकांक्षा समझ सकी हूँ। इस बात की परवाह किए बगैर कि मेरा ओहदा ऊंचा है या नीचा है, हम आपकी रचना हैं और हमें आपकी व्यवस्थाओं का अक्षरश: पालन करना चाहिए, आपके सृजन के रूप मेँ जो दायित्व मुझसे अपेक्षित है, उसे पूरा करने का मुझे पूर्ण प्रयास करना चाहिए और आपने जो दायित्व मुझे सौंपा है उसमे नुकताचीनी नहीं करनी चाहिए। हे परमेश्वर! मैं आपकी व्यवस्थाओं का पालन करना चाहती हू, एक बैल की तरह काम करते हुए आपके सम्मुख और आपके नियंत्रण हेतु सर्वथा प्रस्तुत रहना चाहती हूँ। भविष्य मे ओहदे के लिए, कभी कोई ऐसा काम न करूँ जो मेरे दुख का कारण बने या जिससे आपको आघात पहुंचे। हे परमेश्वर! मेरी इच्छा है कि आप मेरा निर्णय करें और मेरे लिए अधिक से अधिक न्यायी बनें, मैं ओहदे की अभिलाषा से मुक्ति पाऊँ, उन सभी अधमताओं से मुक्त हो जाऊँ जो मुझे आपके नजदीक पहुँचने और आपसे प्रेम करने के मार्ग मे मेरे लिए बाधक बनते हैं, और मैं अपने कर्तव्य को पूरी ईमानदारी के साथ पूरा कर सकूँ।