व्यावहारिक होना शांति लाता है

08 अक्टूबर, 2025

हेली, जापान

जब मैंने 2017 में कलीसिया में नए लोगों के सिंचन का काम शुरू किया तो मैंने सभी प्रासंगिक सत्य सिद्धांतों का अध्ययन करने और ज्ञान पाने में तेजी दिखाई ताकि मैं जल्द से जल्द अपने काम में सक्षम बन सकूँ। मैंने बहुत मेहनत की और अपने कर्तव्य में बहुत बड़ी कीमत चुकाई और इसलिए मुझे बेहतरीन नतीजे मिले। लगभग एक साल बाद मुझे समूह अगुआ चुना गया। सभी भाई-बहनों ने कहा कि समूह अगुआ बनने के बाद मैंने बहुत तेजी से प्रगति की है और जब भी उन्हें कोई समस्या होती थी तो वे सभी मेरे पास संगति के लिए आते थे। मैंने मन में सोचा, “ऐसा लगता है कि हर कोई वाकई मुझे स्वीकार करता है। जब तक मैं सत्य का अनुसरण करती रहूँगी, मुझे निश्चित रूप से बाद में और भी ऊँचे पद पर तरक्की पाने का मौका मिलेगा। तब हर कोई वाकई मेरा सम्मान करेगा।”

कुछ समय बाद ही हमारे समूह के पर्यवेक्षक को वास्तविक काम न करने के कारण बर्खास्त कर दिया गया। मैंने मन ही मन सोचा, “मैं हमेशा अपने कर्तव्य में बहुत सक्रिय रही हूँ, मैं कुछ भाई-बहनों की समस्याएँ और मुश्किलें भी सुलझा पाई हूँ और मैं अपने काम में असरदार रही हूँ। अब जबकि मैं एक समूह अगुआ हूँ और हम जल्द ही नया पर्यवेक्षक चुनेंगे तो पक्का मैं ही पहली पसंद बनूँगी। यह खुद को अलग दिखाने का एक शानदार मौका है!” लेकिन कुछ ही दिनों बाद हमारे अगुआ ने दूसरी कलीसिया से तबादला करके एक बहन को हमारा पर्यवेक्षक बना दिया; उसने कहा कि उसकी काबिलियत अच्छी है, वह सत्य का अनुसरण करती है और वह विकसित किए जाने के लायक है। जब मैंने यह समाचार सुना तो मैं वाकई निराश हो गई। मैंने सोचा, “तो यह बहन विकसित होने के लिए एक अच्छी उम्मीदवार है और मैं नहीं हूँ?” लेकिन फिर मेरे मन में यह विचार आया कि अगर यह बहन वाकई वास्तविक कार्य कर सकती है तो यह सकारात्मक नतीजा है। यह एहसास होने के बाद मैं समर्पण करने में और भी सक्षम हो गई। बाद में जब उस बहन को कलीसिया के कार्य की कुछ आवश्यकताओं के कारण फिर दूसरे काम पर लगा दिया गया तो मैं बहुत उत्साहित हो गई और सोचा, “वे इस बार पक्का पर्यवेक्षक के पद के लिए मेरे नाम पर विचार करेंगे।” लेकिन कुछ ही दिनों बाद हमारे अगुआ ने बहन एडेल को पर्यवेक्षक के रूप में तरक्की दे दी। इस बार मैंने इस समाचार को इतनी सहजता से नहीं लिया। मैंने सोचा, “मैं अपने कर्तव्य में वाकई कड़ी मेहनत करती हूँ और कुछ वास्तविक मुद्दों को सुलझाने में सक्षम हूँ। फिर अगुआ ने मुझे तरक्की क्यों नहीं दी? क्या उसे लगता है कि मैं विकसित होने के लायक नहीं हूँ? क्या वह मुझे कमतर मानता है? अब भाई-बहन मेरे बारे में क्या सोचेंगे क्योंकि मुझे दो बार तरक्की देने में दरकिनार किया गया है? एडेल का हाल ही में यहाँ तबादला हुआ है और वह अक्सर मेरे पास सुझाव लेने आती है, क्योंकि उसका अभी तक काम में हाथ नहीं बैठा है और फिर भी हमारा अगुआ उसका बहुत सम्मान करता है और उसे विकसित कर रहा है।” जब ये सब बातें मेरे मन में आईं, तो मैं बहुत हताश हो गई और मुझे लगा कि मेरे साथ अन्याय हुआ है। बाद में जब एडेल काम से परिचित होने के लिए मुझसे संपर्क करने लगी और बहुत सारे सवाल पूछने लगी, तो मैं अधीर हो गई। मैंने सोचा, “क्या तुम पर्यवेक्षक नहीं हो? अगर तुम ऐसे सवाल पूछती रहोगी जिनका उत्तर मैं पहले ही दे चुकी हूँ तो तुम्हारी काबिलियत उतनी अच्छी नहीं हो सकती!” कभी-कभी जब भाई-बहन नए लोगों के सिंचन से संबंधित प्रश्नों और कठिनाइयों के साथ एडेल के पास आते थे जिनसे वह पहले कभी नहीं निपटी थी तो उसे पता नहीं होता था उन्हें कैसे सुलझाया जाए और कैसे संगति की जाए और तब वह मेरी मदद माँगती थी। मैं जानबूझकर उत्तर देती थी, “यह आसान समस्या है। तुम्हें बस समस्या का मूल पहचानना है और इसके बारे में स्पष्टता से सत्य की संगति करनी है।” फिर मैं ऐसे उदाहरण देती थी कि मैंने इसी तरह के मुद्दों को कैसे सुलझाया है। मैंने सोचा, “मुझे सभी को दिखाना होगा कि मेरे पास प्रतिभा है। ऐसा नहीं है कि मेरे पास कौशल की कमी है, लेकिन मुझे पर्यवेक्षक बनने का अवसर नहीं दिया गया है।” बाद में एडेल ने सुझाव दिया कि हम साथ में रहें ताकि जब भी कोई समस्या आए तो वह मुझसे सलाह ले सके। मैंने सोचा, “जब भी कोई समस्या आएगी तो मुझसे सलाह लोगी? लेकिन फिर समस्या सुलझने पर सारा श्रेय तुम्हें मिलेगा, मुझे नहीं। मैं पर्दे के पीछे रहकर तुम्हारी मदद क्यों करूँ?” यह सोचकर मैंने उसे इस आधार पर मना कर दिया कि “नए लोगों के सिंचन में व्यस्त होने के कारण मेरे पास समय नहीं है।” एडेल ने मुझसे कई बार फिर पूछा लेकिन मैंने कभी सहमति नहीं दी। धीरे-धीरे मैंने देखा कि एडेल मुझसे थोड़ी बाधित लग रही थी और काम पर चर्चा करने में थोड़ी निष्क्रिय हो गई थी। लेकिन मैंने इस पर विचार नहीं किया और खुद को नहीं जाना; इसके बजाय मैंने सोचा कि एडेल को पर्यवेक्षक के रूप में काम करने में मुश्किल हो रही है। इतना ही नहीं, मैंने सोचा कि अगर मैंने उसके साथ सक्रिय भागीदारी की और उसकी स्थिति सुधर गई और वह ठीक से काम करने लगी तो मुझे तरक्की पाने का कोई मौका नहीं मिलेगा। इसके विपरीत, जब वह नकारात्मकता में डूब गई थी तो इससे मेरा उत्साह और पहलकदमी और अधिक उभरकर दिखने लगी थी। इसलिए जब हम काम पर चर्चा करते थे तो मैं बहुत सक्रिय और उत्साही रहती थी और खुद को अलग पहचान दिलाने के लिए अग्रणी भूमिका निभाती थी।

बाद में चूँकि ज्यादा से ज्यादा लोग परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकारने लगे तो हमारे समूह में कुछ और सिंचनकर्ता नियुक्त किए गए, एडेल ने मुझे नए आए भाई-बहनों की मदद करने में अधिक समय बिताने के लिए कहा। मैं इन अवसरों का उपयोग लोगों को यह बताने के लिए करती थी कि कैसे मैंने नए लोगों की धारणाएँ और उलझनें सुलझाने के लिए सत्य खोजा और उनके लिए अपने व्यक्तिगत अनुभव और अभ्यास के मार्गों की व्यवस्थित रूप से रूपरेखा पेश की। उसके बाद जब भी भाई-बहनों के सामने कोई समस्या आती तो वे चर्चा के लिए मुझसे संपर्क करते। कुछ मामलों में लोग मेरे पास ऐसी समस्याएँ लेकर भी आते थे, जिन्हें एडेल स्वयं नहीं सुलझा सकती थी। मैं अपने आप से बहुत खुश थी और सोच रही थी, “लगता है कि इन दिनों मेरी सारी मेहनत रंग ला रही है और सभी मुझे स्वीकार करते हैं। मैं भले ही पर्यवेक्षक नहीं हूँ, लेकिन मैं पर्यवेक्षक का अधिकांश काम सँभाल सकती हूँ। अगली बार जब कार्यकर्ताओं और अगुआओं के लिए चुनाव होगा तो भाई-बहन पक्का मुझे ही वोट देंगे।”

इसके कुछ ही समय बाद वार्षिक चुनाव का समय आ गया और मैं वाकई उत्साहित थी। मैंने सोचा, “अगर मुझे अगुआ चुना जाता है तो मेरे पास कलीसियाई परियोजनाओं पर निर्णय लेने की शक्ति होगी। अगर कार्य मेरी देखरेख में आगे बढ़ता है तो भाई-बहन निश्चित रूप से मुझे मेरे पद के योग्य समझेंगे और मेरा और भी अधिक सम्मान करेंगे।” लेकिन मुझे बड़ी हैरानी हुई, जब नतीजे घोषित किए गए तो मेरा नाम नहीं लिया गया। मेरा चेहरा लाल हो गया और मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। चोट पर नमक छिड़कते हुए भाई-बहनों ने कहा कि मेरा स्वभाव अहंकारी है, मैं अक्सर लोगों को बाधित करती हूँ, जीवन प्रवेश को प्राथमिकता नहीं देती, शायद ही कभी आत्म-चिंतन करती हूँ, और न ही चीजों से ज्ञान पाती हूँ या सबक सीखती हूँ; संक्षेप में, मैंने सत्य का अनुसरण नहीं किया। जब मैंने यह सब सुना तो मुझे बहुत बुरा लगा—अब सभी भाई-बहन जानते थे कि मैंने सत्य का अनुसरण नहीं किया। न सिर्फ मैं खुद को अलग पहचान दिलाने में असफल रही, बल्कि मैं पूरी तरह से शर्मिंदा भी हो गई। उन दिनों मुझे डर था कि भाई-बहन मुझसे पूछेंगे कि मैंने उस परिस्थिति का अनुभव कैसे किया, लेकिन मुझे यह भी चिंता थी कि कोई भी मुझसे बात नहीं करेगा, वे मेरा भेद पहचान लेंगे और मुझसे दूर रहेंगे। मेरी भावनाएँ अस्थिर थीं और मैं बस यही सोच पा रही थी कि क्या हुआ था। मैं अपने कर्तव्य पर ध्यान नहीं दे पा रही थी और मैं बहुत दुखी और संतप्त हो गई थी। मैं सोचती रही कि मुझे इस तरह के माहौल का सामना क्यों करना पड़ा। बाद में कुछ भाई-बहनों ने मेरे साथ संगति की और कहा कि मैं अपने कर्तव्य निर्वहन पर चिंतन करने में ज्यादा समय लगाऊँ। उन्होंने यह भी बताया कि मेरे काम में कुछ योग्यताएँ होने के बावजूद मैंने सत्य का अनुसरण करने को प्राथमिकता नहीं दी, मैं सिर्फ प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे भागती रही और गलत रास्ते पर चलती रही। मैं जानती थी कि भाई-बहनों की सलाह और मदद परमेश्वर से आती है और इसलिए मैं उसके सामने प्रार्थना करने आई, “हे परमेश्वर, इस तरह से बेनकाब होना मेरे लिए बहुत मुश्किल रहा है। प्रिय परमेश्वर, मेरा प्रबोधन करो और मुझे यह अनुमति दो कि मैं खुद को जान सकूँ और तुम्हारा इरादा समझ सकूँ।”

एक दिन परमेश्वर के वचन पढ़ते समय मुझे कुछ अंश मिले जिनमें परमेश्वर उजागर करता है कि कैसे मसीह-विरोधी प्रतिष्ठा और रुतबा खोजते हैं। परमेश्वर के वचन कहते हैं : “मसीह-विरोधी चाहे कोई भी कर्तव्य करें, वे खुद को ऊँचे स्थान पर यानी प्रमुखता के स्थान पर रखने की कोशिश करेंगे। वे एक साधारण अनुयायी के रूप में अपने स्थान से कभी संतुष्ट नहीं हो सकते। और उन्हें सबसे अधिक जुनून किस चीज का होता है? लोगों के सामने खड़े होकर उन्हें आदेश देने, उन्हें डाँटने, और लोगों से अपनी बात मनवाने का जुनून। वे इस बारे में सोचते तक नहीं कि अपना कर्तव्य ठीक तरह कैसे करें—इसे करते हुए सत्य का अभ्यास करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सत्य सिद्धांतों को खोजना तो दूर की बात है। इसके बजाय, वे विशिष्ट दिखने के तरीके खोजने के लिए दिमाग के घोड़े दौड़ाते हैं, ताकि अगुआ उनके बारे में अच्छा सोचें और उन्हें आगे बढ़ाएँ, ताकि वे खुद अगुआ या कार्यकर्ता बन सकें और दूसरे लोगों की अगुआई कर सकें। वे सारा दिन यही सोचते और इसी की उम्मीद करते रहते हैं। मसीह-विरोधी नहीं चाहते कि दूसरे उनकी अगुआई करें, न ही वे सामान्य अनुयायी बनना चाहते हैं, चुपचाप और बिना किसी तमाशे के अपने कर्तव्य करते रहना तो दूर की बात है। उनका कर्तव्य जो भी हो, यदि वे महत्वपूर्ण स्थान पर और आकर्षण का केंद्र नहीं हो सकते, यदि वे दूसरों से ऊपर नहीं हो सकते और दूसरे लोगों की अगुआई नहीं कर सकते तो उन्हें अपना कर्तव्य करना उबाऊ लगने लगता है, वे नकारात्मक हो जाते हैं और ढीले पड़ जाते हैं। दूसरों से प्रशंसा और आराधना पाए बिना उनके लिए अपना काम और भी कम दिलचस्प हो जाता है और उनमें अपना कर्तव्य करने की इच्छा और भी कम हो जाती है। लेकिन अगर अपना कर्तव्य करते हुए वे महत्वपूर्ण स्थान पर और आकर्षण का केंद्र हो सकते हों और अपनी बात मनवा सकते हों तो वे प्रेरित महसूस करते हैं और कैसी भी कठिनाइयाँ झेल सकते हैं। अपने कर्तव्य निर्वहन में हमेशा उनके व्यक्तिगत इरादे होते हैं और वे हमेशा दूसरों को पराजित करने और अपनी इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं को संतुष्ट करने की अपनी जरूरत पूरी करने के एक साधन के रूप में खुद को दूसरों से अलग दिखाना चाहते हैं(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग सात))। “मसीह-विरोधियों के लिए प्रतिष्ठा और रुतबा कोई अतिरिक्त आवश्यकता नहीं है, यह बात तो रहने ही दो कि ये उनके लिए ऐसी बाहरी चीजें हैं जिनके बिना उनका काम चल सकता है। ये मसीह-विरोधियों की प्रकृति का हिस्सा हैं, ये उनकी हड्डियों में हैं, उनके खून में हैं, ये उनमें जन्मजात हैं। मसीह-विरोधी इस बात के प्रति उदासीन नहीं होते कि उनके पास प्रतिष्ठा और रुतबा है या नहीं; यह उनका रवैया नहीं होता। फिर उनका रवैया क्या होता है? प्रतिष्ठा और रुतबा उनके दैनिक जीवन से, उनकी दैनिक स्थिति से, जिस चीज का वे रोजाना अनुसरण करते हैं उससे, घनिष्ठ रूप से जुड़े होते हैं। मसीह-विरोधियों के लिए रुतबा और प्रतिष्ठा उनका जीवन हैं। चाहे वे कैसे भी जीते हों, चाहे वे किसी भी परिवेश में रहते हों, चाहे वे कोई भी काम करते हों, चाहे वे किसी भी चीज का अनुसरण करते हों, उनके कोई भी लक्ष्य हों, उनके जीवन की कोई भी दिशा हो, यह सब अच्छी प्रतिष्ठा और ऊँचा रुतबा पाने के इर्द-गिर्द घूमता है। और यह लक्ष्य बदलता नहीं है; वे कभी ऐसी चीजों को दरकिनार नहीं कर सकते हैं। यह मसीह-विरोधियों का असली चेहरा और सार है। तुम उन्हें पहाड़ों की गहराई में किसी घने-पुराने जंगल में छोड़ दो, फिर भी वे प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे दौड़ना नहीं छोड़ेंगे। तुम उन्हें लोगों के किसी भी समूह में रख दो, फिर भी वे सिर्फ प्रतिष्ठा और रुतबे के बारे में ही सोचेंगे। यूँ तो मसीह-विरोधी परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन वे प्रतिष्ठा और रुतबे के अनुसरण को परमेश्वर में आस्था के समकक्ष रखते हैं और दोनों चीजों को समान पायदान पर रखते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब वे परमेश्वर में आस्था के मार्ग पर चलते हैं तो वे प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण भी करते हैं। यह कहा जा सकता है कि मसीह-विरोधियों के दिलों में, परमेश्वर में विश्वास करने में सत्य का अनुसरण ही प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण करना है और प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण सत्य का अनुसरण करना भी है—प्रतिष्ठा और रुतबा हासिल करना सत्य और जीवन हासिल करना है। अगर उन्हें लगता है कि उन्होंने प्रसिद्धि, लाभ या रुतबा हासिल नहीं किया है, कि कोई उनका आदर नहीं करता, उन्हें उच्च सम्मान नहीं देता है या उनका अनुसरण नहीं करता है तो वे बहुत उदास हो जाते हैं, वे मानते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने की कोई तुक नहीं है, इसका कोई मूल्य नहीं है और वे मन-ही-मन सोचते हैं, ‘क्या मैं परमेश्वर में इस तरह विश्वास कर विफल रहा हूँ? क्या मेरे लिए कोई आशा नहीं है?’ वे अक्सर अपने दिलों में ऐसी चीजों का हिसाब-किताब लगाते हैं। वे यह हिसाब-किताब लगाते हैं कि वे कैसे परमेश्वर के घर में अपने लिए जगह बना सकते हैं, वे कैसे कलीसिया में उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं, जब वे बात करें तो वे कैसे खुद को सुनने के लिए लोगों को जुटा सकते हैं और जब वे कार्य करें तो कैसे उनसे अपनी प्रशंसा के गीत गवा सकते हैं, वे जहाँ कहीं भी हों वे कैसे अपना अनुसरण करने के लिए लोगों को जुटा सकते हैं और उनके पास कैसे कलीसिया में एक प्रभावी आवाज हो सकती है और उनके पास कैसे शोहरत, लाभ और रुतबा हो सकता है—वे वास्तव में अपने दिलों में ऐसी चीजों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। ऐसे लोग इन्हीं चीजों के पीछे भागते हैं(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग तीन))। परमेश्वर के वचन उजागर करते हैं कि कैसे मसीह-विरोधी प्रतिष्ठा और रुतबे को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कब और कहाँ, अच्छी प्रतिष्ठा और ऊँचा रुतबा पाना उनका अंतिम लक्ष्य होता है। वे खुद को अलग दिखाने और दूसरों का सम्मान पाने के लिए ही परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और अपने कर्तव्य निभाते हैं। वे हमेशा रुतबे वाला पद पाने, अंतिम निर्णय का अधिकार और निर्णय लेने की शक्ति पाने और दूसरों पर अधिकार रखने के लिए प्रयासरत रहते हैं। अगर उन्हें रुतबा और प्रतिष्ठा न मिले तो वे सोचने लगते हैं कि परमेश्वर में विश्वास रखना व्यर्थ है और अपना कर्तव्य निभाने की कोई वजह नहीं है। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए मुझे एहसास हुआ कि मैंने जो स्वभाव प्रकट किया और मेरे अनुसरण के पीछे मेरा दृष्टिकोण मसीह-विरोधियों से अलग नहीं था। मैं हमेशा पर्यवेक्षक या अगुआ बनने का प्रयास करती थी क्योंकि मुझे लगता था कि अगुआओं और कार्यकर्ताओं की बात अंतिम होती है, वे अहम फैसले ले सकते हैं और उन्हें बहुत सम्मान, समर्थन और आदर मिलता है। समूह अगुआ के रूप में मेरे अधिकार का दायरा सीमित था और मैं शायद ही कभी खुद को अलग पहचान दिला पाती थी, इसलिए जब भी मुझे अपने काम में नतीजे मिलते तो अचानक और अधिक शक्ति और अधिकार पाने की मेरी इच्छा बढ़ जाती थी ताकि और भी लोग मेरा सम्मान करें और मेरे इर्द-गिर्द रहें। जब मैंने सुना कि कलीसिया एक नया पर्यवेक्षक चुनने जा रही है, तो मैं चुनाव का बेसब्री से इंतजार करने लगी, क्योंकि मुझे लगा कि खुद को अलग पहचान दिलाने का मेरा मौका आखिरकार आ गया है। लेकिन फिर जब अगुआ ने दूसरी कलीसिया से तबादला कर किसी और को पर्यवेक्षक बना दिया, तो मैं बहुत निराश हुई और इस नतीजे को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, यह मानते हुए कि अगुआ मुझे प्रशिक्षण का मौका नहीं देना चाहता और वह मेरे खिलाफ है। खुद को वर्तमान पर्यवेक्षक से बेहतर साबित करने के लिए मैंने जानबूझकर उसके लिए चीजें मुश्किल बना दीं और उसका बहिष्कार किया, जिससे वह बाधित हो गई। यह सुनिश्चित करने के लिए कि मुझे ही पर्यवेक्षक चुना जाए, मैंने भाई-बहनों की मदद करने के हर अवसर का इस्तेमाल दिखावा करने और खुद को स्थापित करने के लिए किया ताकि और लोग मुझे स्वीकारें और अगले चुनाव में मेरे लिए वोट करें। मैं केवल रुतबे, प्रसिद्धि और लाभ के पीछे भागती थी और मैंने जो कुछ भी किया, वह सब रुतबा पाने के लिए था। मैं मसीह-विरोधी के मार्ग पर चल रही थी। इसका एहसास होने पर मुझे बहुत पछतावा हुआ और इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं अपने कर्तव्य में सत्य का अनुसरण नहीं कर रही हूँ, मैं बस रुतबे और प्रतिष्ठा के लिए होड़ करती हूँ और मैंने तुम्हारे खिलाफ विद्रोह और प्रतिरोध किया है। प्रिय परमेश्वर, मैं अब इस तरह से आगे नहीं बढ़ना चाहती और पश्चात्ताप करने के लिए तैयार हूँ। कृपया मुझे प्रबुद्ध करो ताकि मैं स्वयं को जान सकूँ।”

एक बार भक्ति के दौरान मुझे परमेश्वर के वचनों का यह अंश मिला : “जब शैतानी स्वभाव लोगों में जड़ जमा चुके होते हैं और उनकी प्रकृति बन जाते हैं, तो यह उनके दिलों को अंधकारमय और बुरा बनाने के लिए और ऐसा बनाने के लिए पर्याप्त है कि वे जो कुछ भी अनुसरण करते हैं और जो भी मार्ग चुनते हैं, वह गलत होता है। भ्रष्ट शैतानी स्वभावों की प्रेरक शक्ति के तहत, लोगों की आकांक्षाएँ, आशाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, जीवन के लक्ष्य और दिशाएँ क्या हैं? क्या वे सकारात्मक चीजों के विपरीत नहीं चलते? उदाहरण के लिए, लोग हमेशा मशहूर हस्तियाँ या सितारे बनना चाहते हैं; वे बहुत प्रसिद्धि पाना और दूसरों की नजर में आना चाहते हैं और अपने पूर्वजों का सम्मान बढ़ाना चाहते हैं। क्या ये सकारात्मक चीजें हैं? ये सकारात्मक चीजों के अनुरूप बिल्कुल भी नहीं हैं; यही नहीं, ये मानवजाति की नियति पर परमेश्वर की संप्रभुता रखने वाले नियम के विरुद्ध हैं। ... क्या तुम लोग हमेशा दूसरों से श्रेष्ठ बनना चाहते हो, अपने पंख फैलाकर उड़ना चाहते हो और एक नन्ही चिड़िया के बजाय चील बनना चाहते हो? यह कौन-सा स्वभाव है? क्या यह स्व-आचरण का सिद्धांत है? तुम्हारा स्व-आचरण परमेश्वर के वचनों के अनुसार होना चाहिए; केवल परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं। तुम लोग शैतान द्वारा बुरी तरह से भ्रष्ट कर दिए गए हो और हमेशा पारंपरिक संस्कृति यानी शैतान की बातों को सत्य समझते हो, उसे ही अपना लक्ष्य समझते हो, जिससे तुम्हारा गलत रास्ते पर निकल जाना, परमेश्वर-विरोधी मार्ग पर चलना आसान हो जाता है। भ्रष्ट इंसान के विचार, उसका दृष्टिकोण और जिन चीजों का वह अनुसरण करता है, वे सब परमेश्वर की इच्छाओं के विपरीत, सत्य के विपरीत और हर चीज पर परमेश्वर की संप्रभुता, उसके द्वारा हर चीज के आयोजन और इंसान की नियति पर उसके नियंत्रण वाले सिद्धांत के विपरीत होते हैं। इसलिए इंसानी विचारों और धारणाओं के अनुसार तुम्हारा अनुसरण कितना भी उपयुक्त और उचित क्यों न हो, परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से यह सकारात्मक चीज नहीं है और न ही यह उसके इरादों के अनुरूप है। चूँकि तुम मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता की सच्चाई के खिलाफ जाते हो और तुम अपना रास्ता खुद बनाना चाहते हो, अपना भाग्य अपने हाथ में लेकर अकेले चलना चाहते हो, इसलिए तुम हमेशा दीवार से इतनी जोर से टकराते हो कि तुम घायल और जख्मी हो जाते हो और कुछ भी कभी तुम्हारे काम नहीं आता। कुछ भी तुम्हारे काम क्यों नहीं आता? क्योंकि परमेश्वर ने यह जो सिद्धांत बनाया है उसे कोई भी सृजित प्राणी बदल नहीं सकता; परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य सबसे ऊपर हैं और किसी भी सृजित प्राणी द्वारा उनका उल्लंघन नहीं किया जा सकता। लोग अपनी क्षमताओं को बहुत ज्यादा आँकते हैं। किस वजह से लोग हमेशा परमेश्वर की संप्रभुता से मुक्त होने की कामना करते हैं और हमेशा अपने भाग्य को पकड़ना और अपने भविष्य की योजना बनाना चाहते हैं, और अपनी संभावनाएँ, दिशा और जीवन-लक्ष्य नियंत्रित करना चाहते हैं? यह प्रेरणा कहाँ से आती है? (भ्रष्ट शैतानी स्वभावों से।) तो फिर भ्रष्ट शैतानी स्वभाव लोगों के लिए क्या लाते हैं? (परमेश्वर के खिलाफ लड़ाई।) जो लोग परमेश्वर के खिलाफ लड़ते हैं, उनका क्या होता है? (उन्हें पीड़ा मिलती है।) पीड़ा तो इसकी आधी भी नहीं है—यह विनाश है! जो तुम अपनी आँखों के सामने देखते हो वह पीड़ा, नकारात्मकता और दुर्बलता है, ये प्रतिरोध और शिकायतें हैं—परमेश्वर से लड़ने का क्या परिणाम होगा? सर्वनाश! यह कोई तुच्छ बात नहीं और यह कोई खिलवाड़ नहीं है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भ्रष्‍ट स्‍वभावों का समाधान केवल सत्य स्वीकार करके ही किया जा सकता है)। परमेश्वर के वचनों के उजागर किए जाने से मुझे एहसास हुआ कि मनुष्य जब शैतान के द्वारा भ्रष्ट हो जाता है तो उसके बाद उसका जीवन अहंकार, दंभ, दुष्टता और कपट से युक्त शैतानी भ्रष्ट स्वभाव से संचालित होता है। वह अब परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण नहीं कर पाता और हमेशा महत्वाकांक्षा और इच्छा से भरा रहता है, एक महान, प्रसिद्ध व्यक्ति बनना चाहता है और ऊँचा रुतबा पाने और सबसे महान व्यक्ति बनने की कोशिश करता है। “आदमी ऊपर की ओर जाने के लिए संघर्ष करता है; पानी नीचे की ओर बहता है” और “जो सैनिक सेनानायक नहीं बनना चाहता वह अच्छा सैनिक नहीं है” जैसे शैतानी फलसफे बहुत पहले ही मेरे दिल में जड़ें जमा चुके थे, जिससे मैं शोहरत और रुतबे के अनुसरण को एक वैध लक्ष्य के रूप में देखने लगी। स्कूल में मैं अव्वल छात्रा बनने का प्रयास करती थी और अगर मैं परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती तो कई दिनों तक उदास रहती थी। स्नातक होने के बाद जब मैं काम करने लगी तो मैंने सबसे अच्छे कर्मचारियों में जगह बनाने के लिए लगन से काम किया—मैं ओवरटाइम काम करने के लिए तैयार रहती थी और सबसे कठिन काम चुनती थी ताकि बॉस की कृपा पाने और तरक्की का मौका पा सकूँ। जब मैंने आस्था में प्रवेश किया तो मुझे लगा कि मैं कलीसिया में पर्यवेक्षक या अगुआ बनकर दूसरों का सम्मान और साथ पा सकती हूँ और इसलिए मैंने ऊँचा रुतबा पाने का प्रयास किया। खासकर एक समूह अगुआ बनने और अपने भाई-बहनों की स्वीकृति पाने के बाद मेरी महत्वाकांक्षा और इच्छा नई ऊँचाइयों पर पहुँच गई। मैं बहुत घमंडी हो गई, मुझे लगा कि मेरे पास पर्यवेक्षक या यहाँ तक कि अगुआ के रूप में तरक्की पाने की पूँजी और योग्यता है। जब अगुआ ने मेरी जगह एडेल को तरक्की दी तो मैंने प्रतिरोध और नाराजगी महसूस की और मैं हमारे काम में उसका समर्थन और सहयोग करने के लिए तैयार नहीं हुई। मैं हमेशा उसके साथ प्रतिस्पर्धा करने की कोशिश भी करती थी। मैं अक्सर मौके का फायदा उठाकर दिखाती थी कि मैं समस्याओं को कैसे सुलझा सकती हूँ—एक तरफ मैं एडेल को जताना चाहती थी कि वह मेरे स्तर की नहीं है, दूसरी ओर मैं भाई-बहनों को यह दिखाने की कोशिश कर रही थी कि मैं उससे ज्यादा प्रतिभाशाली हूँ। इस तरह मुझे उम्मीद थी कि जब भी कोई समस्या होगी तो वे मेरे पास आएँगे और अगर कोई दूसरा चुनाव होगा तो वे सबसे पहले मेरे बारे में सोचेंगे। मैंने रुतबे को किसी भी चीज से ज्यादा महत्वपूर्ण माना और कभी आत्म-चिंतन नहीं किया, भले ही मुझे बार-बार असफलताएँ मिलीं। इतना ही नहीं, मैं नाराज और क्रोधित थी, सोच रही थी कि मेरे पास पूँजी है क्योंकि मैं कुछ काम ठीक से कर सकती हूँ और मुझे दूसरों का अगुआ बनाया जाना चाहिए। मैं अविश्वसनीय रूप से घमंडी और बेशर्म थी! इस पर विचार करते हुए मुझे एहसास हुआ कि मैं केवल रुतबा पाने के लिए परमेश्वर में विश्वास रखती थी। मैंने सत्य का अनुसरण करने को प्राथमिकता नहीं दी और मेरे पास सत्य वास्तविकता बहुत कम थी—ऐसे में मैं ऐसा कोई भी महत्वपूर्ण काम नहीं कर पाती जो अगुआओं और कार्यकर्ताओं को करना चाहिए। मेरी मानवता भी खराब थी जिससे मैं अगुआ बनने के लिए और भी कम योग्य हो गई। अगर मुझे अगुआ चुन लिया जाता तो इससे भाई-बहनों और कलीसिया दोनों को नुकसान होता!

उसके बाद मैंने परमेश्वर के वचनों के दो और अंश पढ़े जिससे मुझे शोहरत और रुतबे के पीछे भागने की प्रकृति और दुष्परिणामों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिली। परमेश्वर के वचन कहते हैं : “यदि कोई कहता है कि उसे सत्य से प्रेम है और वह सत्य का अनुसरण करता है, लेकिन सार में जो लक्ष्य वह हासिल करना चाहता है वह अपनी अलग पहचान बनाना, दिखावा करना, लोगों का सम्मान प्राप्त करना और अपने हित साधना है और उसके लिए अपने कर्तव्य का पालन करने का अर्थ परमेश्वर के प्रति समर्पण करना या उसे संतुष्ट करना नहीं बल्कि शोहरत, लाभ और रुतबा प्राप्त करना है तो फिर उसका अनुसरण अनुचित है। ऐसा होने पर जब कलीसिया के कार्य की बात आती है तो उसके कार्यकलाप एक बाधा होते हैं या आगे बढ़ने में मददगार होते हैं? वे स्पष्ट रूप से बाधा होते हैं; वे उसे आगे नहीं बढ़ाते। कुछ लोग कलीसिया का कार्य करने का झंडा लहराते फिरते हैं, लेकिन अपनी व्यक्तिगत शोहरत, लाभ और रुतबे के पीछे भागते हैं, अपना उद्यम चलाते हैं, अपना एक छोटा-सा समूह, अपना एक छोटा-सा साम्राज्य बना लेते हैं—क्या इस प्रकार का व्यक्ति अपना कर्तव्य कर रहा है? वे जो भी कार्य करते हैं वह अनिवार्य रूप से कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी और बाधा पहुँचाता है और इसे खराब करता है। उनके शोहरत, लाभ और रुतबे के पीछे भागने का क्या परिणाम होता है? पहला, यह इस बात को प्रभावित करता है कि परमेश्वर के चुने हुए लोग सामान्य रूप से परमेश्वर के वचनों को कैसे खाते-पीते हैं और सत्य को कैसे समझते हैं, यह उनके जीवन प्रवेश में बाधा डालता है, उन्हें परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश करने से रोकता है और उन्हें गलत मार्ग पर ले जाता है—जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नुकसान पहुँचाता है और उन्हें बरबाद कर देता है। और यह अंततः कलीसिया के कार्य के साथ क्या करता है? बाधा, हानि और विघटन। लोगों के शोहरत, लाभ और रुतबे के पीछे भागने का यही परिणाम है। जब वे इस तरह से अपना कर्तव्य करते हैं तो क्या इसे मसीह-विरोधी के मार्ग पर चलना नहीं कहा जा सकता? जब परमेश्वर कहता है कि लोग शोहरत, लाभ और रुतबे का त्याग कर दें तो ऐसा नहीं है कि वह लोगों के स्वतंत्र रूप से चुनने के अधिकार को खत्म कर रहा है; बल्कि यह इस कारण कहता है कि शोहरत, लाभ और रुतबे के पीछे भागते हुए लोग कलीसिया के कार्य और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश में गड़बड़ी और बाधा पहुँचाते हैं, यहाँ तक कि वे और ज्यादा लोगों के द्वारा परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने, सत्य को समझने और परमेश्वर का उद्धार प्राप्त करने पर भी प्रभाव डाल सकते हैं। यह एक अकाट्य तथ्य है। जब लोग अपनी शोहरत, लाभ और रुतबे के पीछे भागते हैं तो यह निश्चित है कि वे सत्य का अनुसरण नहीं करेंगे और वे समर्पित होकर अपना कर्तव्य पूरा नहीं करेंगे। वे सिर्फ शोहरत, लाभ और रुतबे की खातिर ही बोलेंगे और कार्य करेंगे और वे जो भी काम करते हैं, वह बिना किसी अपवाद के इन्हीं चीजों की खातिर होता है। इस तरह से व्यवहार और कार्य करना निस्संदेह मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चलना है; यह परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी करना और बाधा डालना है; इसके सभी विभिन्न परिणाम राज्य के सुसमाचार को फैलाने और कलीसिया के भीतर परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित करने में बाधा डालना हैं। इसलिए यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि जो शोहरत, लाभ और रुतबे के पीछे भागते हैं वे परमेश्वर के प्रतिरोध के मार्ग पर चल रहे हैं; वे जानबूझकर उसका प्रतिरोध कर रहे हैं और उसे नकार रहे हैं, और परमेश्वर का प्रतिरोध करने और उसके विरोध में खड़े होने में शैतान के साथ सहयोग कर रहे हैं। लोगों की शोहरत, लाभ और रुतबे के पीछे भागने की यही प्रकृति है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग एक))। “जब लोग रुतबे के पीछे भागते हैं तो परमेश्वर को इससे सबसे अधिक घृणा होती है, क्योंकि रुतबे के पीछे भागना शैतानी स्वभाव है, यह एक गलत मार्ग है, यह शैतान की भ्रष्टता से पैदा होता है, परमेश्वर इसे दोषी ठहराता है और परमेश्वर इसी चीज का न्याय और शुद्धिकरण करेगा। लोगों के रुतबे के पीछे भागने से परमेश्वर को सबसे ज्यादा घृणा है और फिर भी तुम अड़ियल बनकर रुतबे के लिए होड़ करते हो, उसे हमेशा सँजोए और संरक्षित किए रहते हो, उसे हासिल करने की कोशिश करते रहते हो। क्या इन सभी में थोड़ा-सा परमेश्वर-विरोधी होने का गुण नहीं है? लोगों के लिए रुतबे को परमेश्वर ने नियत नहीं किया है; परमेश्वर लोगों को सत्य, मार्ग और जीवन प्रदान करता है, ताकि वे अंततः मानक स्तर के सृजित प्राणी, एक छोटा और नगण्य सृजित प्राणी बन जाएँ—वह इंसान को ऐसा व्यक्ति नहीं बनाता जिसके पास रुतबा और प्रतिष्ठा हो और जिस पर हजारों लोग श्रद्धा रखें। और इसलिए इसे चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य से देखा जाए, रुतबे के पीछे भागने का मतलब बरबादी के रास्ते पर चलना है। रुतबे के पीछे भागने का तुम्हारा बहाना चाहे जितना भी उचित हो, यह मार्ग फिर भी गलत है और परमेश्वर इसे स्वीकृति नहीं देता। तुम चाहे कितना भी प्रयास करो या कितनी बड़ी कीमत चुकाओ, अगर तुम रुतबा चाहते हो तो परमेश्वर तुम्हें वह नहीं देगा; अगर परमेश्वर तुम्हें यह नहीं देता है तो तुम उसे पाने की लड़ाई में नाकाम रहोगे और अगर तुम लड़ाई करते ही रहोगे तो उसका केवल एक ही परिणाम होगा : तुम्हें बेनकाब करके हटा दिया जाएगा—तुम बरबादी के रास्ते पर चल पड़ोगे। तुम इसे समझते हो, है न?(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग तीन))। परमेश्वर के वचन पढ़कर रुतबे और शोहरत के पीछे भागने वालों का उसका गहन-विश्लेषण और चरित्र चित्रण देखना वाकई मेरे दिल को चीर गया। मुझे सचमुच एहसास नहीं था कि रुतबे और शोहरत के पीछे भागने की प्रकृति और दुष्परिणाम कितने गंभीर थे। जब लोग इन चीजों के पीछे भागते हैं तो वे सीधे कलीसिया के कार्य को नष्ट और बर्बाद कर देते हैं और शैतान के सेवक बन जाते हैं। परमेश्वर ऐसे कार्यकलापों की निंदा करता है। रुतबा खोजना परमेश्वर की अपेक्षाओं के खिलाफ है और यह सीधे उसका विरोध करना है—इस तरह से व्यवहार करना बर्बादी का मार्ग है! हमारे पिछले पर्यवेक्षक को वास्तविक काम न करने के कारण बर्खास्त किया गया था, इसलिए जब एडेल आई तो यह कलीसिया के काम के लिए बहुत फायदेमंद रहा क्योंकि वह सत्य का अनुसरण करती थी और जब चीजें उस पर आ पडीं, तो उसने वाकई सत्य सिद्धांतों की खोज को प्राथमिकता दी और वह कुछ वास्तविक काम कर पाई। मुझे उसका समर्थन और सहयोग करना चाहिए था। लेकिन क्योंकि मुझ पर शोहरत का जुनून सवार था, मैं यह स्वीकार ही नहीं पाई कि एडेल को पर्यवेक्षक बनाया गया था। जब भी उसने प्रस्ताव दिया कि हम साथ मिलकर काम पर चर्चा करें, तो मैंने बार-बार उसका साथ देने से इनकार कर दिया। इससे एडेल ने खुद को बाधित और नकारात्मक महसूस किया और कलीसिया के काम पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। न केवल मैं आत्म-चिंतन करने में नाकाम रही, बल्कि मैंने उसके साथ जो कुछ भी किया था, उसकी जिम्मेदारी भी नहीं ली, यह सोचते हुए कि वह सिर्फ इसलिए नकारात्मक हो गई थी क्योंकि वह पर्यवेक्षक की भूमिका के लिए उपयुक्त नहीं थी। मुझे इस बात का भी बेसब्री से इंतजार था कि आखिर कब उसे एहसास होगा कि यह उसके लिए बहुत ज्यादा है और वह पद छोड़ देगी, क्योंकि तब मैं उसकी जगह ले सकूँगी। क्या मैं कलीसिया के काम में बाधा और गड़बड़ी पैदा नहीं कर रही थी? मैंने खुद को अलग दिखाने के लिए काम पर चर्चा करने और भाई-बहनों की मदद करने के अवसरों का भी फायदा उठाया, ताकि जब उन्हें कोई समस्या हो तो वे मेरे पास आएँ, जिससे एडेल सिर्फ एक नाममात्र की पर्यवेक्षक रह जाए। मैं शैतान की सेवक बनकर काम कर रही थी और कलीसिया के काम को बाधित और नष्ट कर रही थी। मैं बुराई कर रही थी और परमेश्वर का विरोध कर रही थी! परमेश्वर के वचन कहते हैं : “तुम चाहे कितना भी प्रयास करो या कितनी बड़ी कीमत चुकाओ, अगर तुम रुतबा चाहते हो तो परमेश्वर तुम्हें वह नहीं देगा; अगर परमेश्वर तुम्हें यह नहीं देता है तो तुम उसे पाने की लड़ाई में नाकाम रहोगे और अगर तुम लड़ाई करते ही रहोगे तो उसका केवल एक ही परिणाम होगा : तुम्हें बेनकाब करके हटा दिया जाएगा—तुम बरबादी के रास्ते पर चल पड़ोगे।” मुझे एहसास हुआ कि रुतबे की चाह में मैं परमेश्वर के प्रतिरोध के मार्ग पर चल रही थी और इसका एकमात्र नतीजा मृत्यु होगी। इससे मैं डर गई। रुतबे और शोहरत की मेरी चाह एक गंभीर समस्या बन गई थी और अगर मैं इसी तरह चलती रही तो मेरी महत्वाकांक्षा और इच्छा बढ़ती रहेगी। किसे पता कि अगर वाकई मुझे रुतबा मिल जाए तो मैं क्या-क्या कुकर्म करूँगी। अगर मैंने जल्दी ही पश्चात्ताप नहीं किया और अनुसरण के उस गलत मार्ग पर चलती रही तो मैं अंततः कोई बड़ी बुराई कर बैठूँगी और परमेश्वर मुझे हटा देगा और दंडित करेगा।

बाद में एक सभा के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश देखा : “सृजित मानवता के एक सदस्य के रूप में, तुम्हें अपनी उचित स्थिति बनाए रखनी चाहिए और अनुशासित आचरण करना चाहिए। सृष्टिकर्ता द्वारा तुम्हें जो सौंपा गया है उस पर कर्तव्यपरायणता से टिके रहो। अपनी सीमाएँ मत लांघो, न ऐसे कार्य करो जो तुम्हारी क्षमता के दायरे से बाहर हों या जो परमेश्वर के लिए घृणित हों। एक महान व्यक्ति, अतिमानव या एक भव्य व्यक्ति बनने का प्रयास मत करो और परमेश्वर बनने का प्रयास मत करो। ये सब ऐसी इच्छाएँ हैं जो लोगों में नहीं होनी चाहिए। महान व्यक्ति या अतिमानव बनने का प्रयास करना बेतुका है। परमेश्वर बनने का प्रयास करना तो और भी ज्यादा शर्मनाक है; यह घृणित और निंदनीय है। जो सचमुच मूल्यवान है और जिस पर सृजित प्राणियों को किसी भी चीज से ज्यादा कायम रहना चाहिए, वह है एक सच्चा सृजित प्राणी बनना; यही एकमात्र लक्ष्य है जिसका सभी लोगों को अनुसरण करना चाहिए(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I)। परमेश्वर के वचनों के माध्यम से मुझे एहसास हुआ कि मनुष्य मात्र सृजित प्राणी है और हमें अपने नियुक्त पदों पर बने रहना चाहिए और अपने वर्तमान कर्तव्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। मनुष्य की महत्वाकांक्षा, इच्छा और शैतानी स्वभाव के कारण ही वह हमेशा एक असाधारण व्यक्ति बनने की इच्छा रखता है, जिसका रुतबा बहुत ऊँचा हो। कलीसिया अगुआ के रूप में नियुक्त होने का मतलब तुम्हें रुतबा देना नहीं है, बल्कि सत्य सिद्धांतों के अनुसार अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना है। चाहे मेरे पास कोई रुतबा हो या न हो, मुझे अभी भी कर्तव्यनिष्ठा से आचरण करना था और अपना कर्तव्य निभाना था। मैंने एक मौन संकल्प लिया कि चाहे कोई भी अगुआ चुना जाए, मैं अपने वर्तमान पद पर दृढ़ रहूँगी और कर्तव्यनिष्ठा से अपनी जिम्मेदारी निभाऊँगी। चाहे मुझे चुना जाए या नहीं, मुझे ऊँचा रुतबा मिले या नहीं, मैं अगुआ के काम में साथ दूँगी और दिल और दिमाग से एकजुट होकर सभी अन्य लोगों के साथ ठीक से कर्तव्य निभाऊँगी। कुछ दिनों बाद जब नवनिर्वाचित अगुआ हमारे काम के बारे में मुझसे जानकारी लेने आया तो मैंने सब कुछ यथासंभव विस्तार से समझाया, ताकि अगुआ को काम की अच्छी समझ मिले और वह कुशलता से आगे बढ़ सके। काम पर चर्चा करते समय मैंने विचार किया कि कौन-सा तरीका हमारे काम के लिए सबसे अधिक फायदेमंद होगा और मेरे पास जो भी अच्छे सुझाव होते, उन्हें तुरंत सामने रख देती थी। चाहे कोई भी अगुआ हो, महत्वपूर्ण बात यह थी कि हम अपने काम में सहयोग करें और जो भी समस्याएँ सामने आएँ, उनका समाधान करें। एक बार जब मैंने अपने काम पर ध्यान देना शुरू किया और सबसे कुशल तरीके से अपना कर्तव्य निभाने के लिए सभी के साथ भागीदारी शुरू की तो मुझे बहुत सुकून मिला।

दो महीने बाद अगुआ को दूसरा कर्तव्य सौंपा गया और नए चुनाव में आखिरकार मुझे अगुआ चुन लिया गया। एक बहन ने मुझसे कहा “दरअसल तुममें असाधारण कार्यक्षमता है और तुम हमेशा अपने कर्तव्य में जिम्मेदार रही हो, लेकिन बात बस इतनी है कि पहले तुम सत्य का अनुसरण नहीं कर रही थी, इसलिए हमने तुम्हें वोट देने की हिम्मत नहीं की। अब हमने देखा है कि परमेश्वर के वचनों के न्याय और प्रकाशन का अनुभव करने के बाद तुम अपना भ्रष्ट स्वभाव जान गई हो और कुछ बदलाव किए हैं, अपनी कथनी और करनी में अधिक स्थिर और शांत हो गई हो और तुमने सभाओं के दौरान अपनी संगति में अधिक अंतरतम और व्यावहारिक विचार साझा किए हैं। तुम्हारे ये मामूली बदलाव करने के बाद भी हर किसी को फर्क नजर आया था और इसलिए हमने तुम्हें वोट दिया।” बहन के स्नेहपूर्ण शब्द सुनकर मैंने परमेश्वर के प्रति बहुत आभार महसूस किया। यह परमेश्वर के वचनों के न्याय और प्रकाशन के कारण ही था जिसने मुझे मेरे असली आध्यात्मिक कद, रुतबे और पहचान का एहसास करने में मदद की। मैं बस एक तुच्छ प्राणी हूँ जिसे शैतान ने गहराई से भ्रष्ट कर दिया है और जिसमें कोई सत्य वास्तविकता नहीं है। भले ही मेरे पास प्रतिभा और काबिलियत थी, मैं अन्य भाई-बहनों से बेहतर नहीं थी। धीरे-धीरे मेरी महत्वाकांक्षा और रुतबा पाने की इच्छा कमजोर हो गई और मैं अधिक विनम्र ढंग से आचरण करने लगी। अगुआ चुने जाने के बाद मैं आत्म-संतुष्टि में नहीं डूबी—इसके बजाय मैंने अपने कर्तव्य का भार और जिम्मेदारी की भावना महसूस की। यह सब परमेश्वर के उद्धार के कारण ही संभव हो पाया कि मैं यह छोटा-सा परिवर्तन कर सकी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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