अलग-थलग किए जाने के बाद आत्म-चिंतन
लोरेन, अमेरिकामार्च 2023 में, हमारे जिले में जिला अगुआ चुनने के लिए उप-चुनाव हो रहा था। मैंने मन ही मन सोचा, “भले ही मेरा जीवन प्रवेश सबसे...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
2018 में मैं कलीसिया में वीडियो बना रहा था। चूँकि मैंने अपने पेशेवर कौशल में तेजी से सुधार किया और आमतौर पर भाई-बहनों को कुछ समस्याएँ और कठिनाइयाँ सुलझाने में मदद की, हर किसी ने मेरे बारे में अच्छी धारणा बनाई और अगुआओं द्वारा मुझे कुछ महत्वपूर्ण कार्य सौंपे गए। अगुआओं से मान्यता और भाई-बहनों से उच्च सम्मान मिलने के कारण मुझे खूब उपलब्धि का एहसास हुआ और मेरा उत्साह बढ़ गया। हालाँकि मैं टीम अगुआ नहीं था, लेकिन मैं अपने काम में समस्याओं की तुरंत पहचान और विश्लेषण करता था। मैंने हमेशा अगुआओं और टीम अगुआओं द्वारा सौंपे गए कार्यों को पूरा करने की पूरी कोशिश की, इसलिए मुझे लगा कि मेरे पास अपने कर्तव्य के लिए काफी बोझ है और मैं अपेक्षाकृत आज्ञाकारी था। खासकर जब मैंने अपने आस-पास के कुछ भाई-बहनों को नकारात्मक होते, अपने कर्तव्यों में ढिलाई बरतते और अपने कर्तव्यों को समुचित ढंग से नहीं करते देखा क्योंकि वे कलीसिया द्वारा सौंपे गए कार्यों से असंतुष्ट थे तो मैंने सोचा कि अगर मुझे ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा तो मैं उनके जैसा व्यवहार नहीं करूँगा; मैं तब भी आज्ञाकारी रहूँगा।
2022 में एक दिन समूह अगुआ ने मुझे बताया कि पाठ-आधारित कार्य के लिए लोगों की कमी थी। चूँकि हमारे समूह में काम का बोझ बहुत ज्यादा नहीं था और मुझमें कुछ लेखन कौशल था और मैं आमतौर पर कुछ समस्याओं को सुलझाने के लिए सत्य पर संगति कर सकता था, एक व्यापक मूल्यांकन के बाद अगुआओं ने मुझे पाठ-आधारित कार्य में लगाने का फैसला किया। जब मैंने यह समाचार सुना तो मुझे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ। मैंने सोचा, “क्या वे मेरे कर्तव्य में बदलाव करने जा रहे हैं? मैं इस समूह में ही ठीक हूँ। मेरे बारे में भाई-बहनों की अच्छी राय है और दूसरे समूहों के लोग भी सलाह के लिए मेरे पास आते हैं। इससे मेरी खूब अच्छी छवि दिखती है! अगर मैं पाठ-आधारित कार्य करने जाता हूँ और सिद्धांतों को समझ नहीं पाता हूँ और मुझे नहीं पता कि मुझे दूसरों के बराबर पहुँचने में कितना समय लगेगा क्योंकि मैं शून्य से शुरू कर रहा हूँ तो क्या मैं अपने समूह में सबसे फिसड्डी नहीं हो जाऊँगा? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि उन्होंने मुझे ही क्यों चुना?” मैंने कुछ बहनों के बारे में सोचा जिन्हें मैं जानता था जिनके पास अच्छा लेखन कौशल था। पाठ-आधारित कार्य करने के कुछ समय बाद ही उन्हें बदल दिया गया क्योंकि वे इस काम के लायक नहीं थीं। मुझे लगा कि मैं उनके जितना अच्छा नहीं हूँ और अगर मैं काम अच्छी तरह से नहीं कर पाया तो यह अपमानजनक होगा। चाहे मैंने दोनों की तुलना कैसे भी की हो, मुझे लगा कि मेरा वर्तमान कर्तव्य अधिक स्थिर और प्रतिष्ठित है। जितना अधिक मैंने इस तरह से सोचा, उतना ही मुझे लगा कि अगुआ बहुत हड़बड़ी कर रहे हैं, कि उन्होंने मुझे स्थानांतरित करने से पहले मेरी खूबियों को बखूबी नहीं समझा था। मैंने टीम अगुआ से शिकायत की, “क्या अगुआओं ने इस मामले का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन नहीं किया है? मैं वीडियो बनाने में बेहतर हूँ। पाठ-आधारित कार्य मेरी खूबी नहीं है; अगर मुझे जाना पड़ा तो मैं इसे अच्छी तरह से नहीं कर पाऊँगा। क्या उन्हें मेरी खूबी के आधार पर पुनर्विचार नहीं करना चाहिए?” मैंने सोचा कि टीम अगुआ मेरे दृष्टिकोण से मेरे साथ सहानुभूति रखेगी और शायद मेरे कर्तव्य में बदलाव पर पुनर्विचार करने के बारे में अगुआओं से बात करेगी। लेकिन उसने मेरे साथ संगति कर कहा कि मुझे सबसे पहले कलीसिया के कार्य की जरूरतों की परवाह करनी चाहिए। मुझे एहसास हुआ कि मुझे बहस नहीं करनी चाहिए और पहले आज्ञा माननी चाहिए।
बाद में मैंने कर्तव्य में बदलाव के संबंध में सिद्धांतों को देखा। परमेश्वर के वचन कहते हैं : “परमेश्वर का घर लोगों के लिए कुछ कर्तव्य निभाने की व्यवस्था उनकी प्राथमिकताओं के आधार पर नहीं करता है, बल्कि कार्य की जरूरतों और इस आधार पर करता है कि कोई व्यक्ति उस कर्तव्य को निभाते हुए नतीजे हासिल कर सकता है या नहीं। क्या तुम लोग यह कहते हो कि परमेश्वर के घर को व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के आधार पर कर्तव्यों की व्यवस्था करनी चाहिए? क्या उसे लोगों का उपयोग उनकी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को संतुष्ट करने की शर्त के आधार पर करना चाहिए? (नहीं।) इनमें से कौन-सा आधार लोगों का उपयोग करने में परमेश्वर के घर के सिद्धांतों के अनुरूप है? कौन-सा सत्य सिद्धांतों के अनुरूप है? यही कि लोगों का चयन परमेश्वर के घर में कार्य की जरूरतों और उनके कर्तव्य निर्वहन के नतीजे के अनुसार करना” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद बारह : जब उनके पास कोई रुतबा नहीं होता या आशीष पाने की आशा नहीं होती तो वे पीछे हटना चाहते हैं)। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद मुझे समझ आया : कलीसिया में व्यक्तिगत खूबियों के अनुसार कर्तव्य सौंपना केवल एक पहलू है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे कलीसिया के काम की जरूरतों के आधार पर किया जाए। इस समय पाठ-आधारित कार्य के लिए लोगों की कमी है और मेरे समूह के भीतर काम का बोझ ज्यादा नहीं है। भले ही मैं यहाँ न रहूँ, इससे काम नहीं टलेगा। मुझे अपनी व्यक्तिगत पसंद और माँगों को अलग रखकर पहले कलीसिया के काम पर विचार करना चाहिए। अगर मैं केवल अपनी प्राथमिकताएँ पूरी करता हूँ तो यह बहुत स्वार्थ की बात होगी। यह जानकर मुझे अब अपने दिल में इतना प्रतिरोध महसूस नहीं हुआ।
बाद में मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “यदि कोई परमेश्वर में विश्वास करता है लेकिन उसके वचनों पर ध्यान नहीं देता, सत्य को स्वीकार नहीं करता, या उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं को समर्पित नहीं होता; यदि वे केवल कुछ अच्छे व्यवहार प्रदर्शित करते हैं, लेकिन शरीर के खिलाफ विद्रोह करने में असमर्थ होते हैं और अपने हितों या अहंकार का बिल्कुल त्याग नहीं करते; यद्यपि दिखावे के लिए वे अपना कर्तव्य कर रहे हैं, लेकिन अगर वे अभी भी अपने शैतानी स्वभावों से जीते हैं और उन्होंने अपने शैतानी फलसफों और अस्तित्व में रहने के तरीकों को जरा-सा भी नहीं छोड़ा है या बदला है तो यह आखिर परमेश्वर में विश्वास करना कैसे है? ... उन्होंने कितने ही बरस परमेश्वर में विश्वास क्यों न किया हो, उन्होंने परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध नहीं बनाया है; वे चाहे कुछ भी करें या उनके साथ कुछ भी घटे, वे सबसे पहले यह सोचते हैं : ‘मैं फलाँ-फलाँ तरीके से कार्य करना चाहता हूँ। कौन-सा तरीका मेरे हित में होगा और कौन-सा तरीका नहीं होगा? अगर मैंने फलाँ-फलाँ चीज की तो क्या हो सकता है?’ ये वे चीजें हैं जो वे सबसे पहले सोचते हैं। वे इस पर कोई विचार नहीं करते कि किस तरह का अभ्यास परमेश्वर को महिमा देने और उसकी गवाही देने का काम करेगा, या परमेश्वर के इरादों को पूरा करेगा, न ही वे प्रार्थना करते और खोजते हैं कि परमेश्वर की अपेक्षाएँ क्या हैं और उसके वचन क्या कहते हैं। वे कभी भी परमेश्वर के इरादे या अपेक्षाएँ जानने पर या परमेश्वर को संतुष्ट करने वाला अभ्यास का तरीका जानने पर ध्यान नहीं देते। भले ही वे कभी-कभी परमेश्वर के सम्मुख प्रार्थना करें और उसके साथ संगति करें, पर वे मात्र खुद से बात कर रहे होते हैं, न कि ईमानदारी से सत्य की खोज करते हैं। जब वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं और उसके वचन पढ़ते हैं, तो वे इसे अपने वास्तविक जीवन के मामलों से जोड़कर नहीं देखते। तो, परमेश्वर द्वारा खड़े किए गए परिवेश में वे उसकी संप्रभुता, व्यवस्थाओं और आयोजनों से कैसे पेश आते हैं? जब वे ऐसी चीजों का सामना करते हैं जो उनकी इच्छा के अनुरूप नहीं होतीं तो वे अपने दिलों में उनका प्रतिरोध करते हैं और उनसे बचने की कोशिश करते हैं। जब वे ऐसी चीजों का सामना करते हैं जिनमें उनके हित शामिल होते हैं तो वे अपना दिमाग खपाते हैं और अपने हितों की रक्षा के लिए हर संभव तरीके के बारे में सोचते हैं—भले ही वे कोई लाभ न उठा सकें, लेकिन वे अपने हितों को नुकसान नहीं होने दे सकते। वे परमेश्वर के इरादों को पूरा करने का प्रयास नहीं करते, बल्कि केवल अपनी इच्छाओं को पूरा करने का प्रयास करते हैं। क्या यह परमेश्वर में विश्वास करना है? क्या ऐसे लोगों का परमेश्वर के साथ कोई नाता होता है? नहीं, नहीं होता। वे एक नीच, अत्यधिक मलिन, कठोर-हृदयी और कुरूप तरीके से जीते हैं। न सिर्फ उनका परमेश्वर के साथ कोई नाता नहीं होता है, बल्कि वे हर मौके पर परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के खिलाफ जाते हैं। वे बार-बार कहते हैं, ‘परमेश्वर मेरी जिंदगी की हर चीज पर संप्रभुता रखे और नियंत्रण करे। मैं परमेश्वर को सिंहासन पर बिठाने और उसे अपने दिल पर राज और हुकूमत करने देने के लिए तैयार हूँ। मैं परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण के लिए तैयार हूँ।’ हालाँकि, जब वे ऐसी चीजों का सामना करते हैं जो उनके हितों को नुकसान पहुँचा सकती हैं तो वे समर्पण करने को तैयार नहीं होते हैं। परमेश्वर ने जिस स्थिति का इंतजाम किया है, उसमें सत्य खोजने के बजाय वे उस स्थिति को पलटना या उससे भागना चाहते हैं। वे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना नहीं चाहते; वे अपनी ही इच्छा के अनुसार चीजें करना चाहते हैं और उनके हितों पर जरा-भी आंच नहीं आनी चाहिए। वे परमेश्वर के इरादों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं, और सिर्फ खुद के हितों और खुद के हालात के बारे में और अपनी मनोदशा और भावनाओं के बारे में सोचते हैं। क्या यह परमेश्वर में विश्वास रखना हुआ? (नहीं।)” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, धर्म में विश्वास रखने या धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होने मात्र से किसी को नहीं बचाया जा सकता)। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि जब परमेश्वर के सच्चे विश्वासियों को ऐसी चीजों का सामना करना पड़ता है जो उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं होती हैं या जब उनके हितों को नुकसान पहुँचता है तो वे अपनी भ्रष्टता दूर करने के लिए सक्रिय रूप से सत्य की तलाश करेंगे, परमेश्वर के वचनों में उत्तर पाएँगे और परमेश्वर के प्रबोधन और मार्गदर्शन की प्रतीक्षा करेंगे। जो लोग सत्य नहीं खोजते और अविवेकी हैं वे अपनी धारणाओं से मेल न खाने वाली चीजों से सामना होने पर लोगों या परिस्थितियों पर ही अटक जाएँगे और वे यहाँ तक कि परमेश्वर के बारे में शिकायत कर सकते हैं और परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने से इनकार कर सकते हैं। इसे अपने आप से जोड़ते हुए जब भी मैंने सोचा कि पाठ-आधारित कार्य करते समय दूसरों से सम्मान नहीं पाया जा सकता है और निकम्मे के रूप में बेनकाब हुआ जा सकता है तो मैंने अपने आप को सही ठहराने और बहाने बनाने की कोशिश की, कौशल की कमी का आवरण ओढ़कर खुद को छिपाने की कोशिश की, मैंने सोच-समझकर अपनी कमजोरियाँ बताकर यह उम्मीद की कि टीम अगुआ मुझसे सहानुभूति रखेगी और मुझे समझेगी, ताकि मैं उसी समूह में रहकर अपना रुतबा कायम रख सकूँ। जब तक चीजें मेरे रास्ते में नहीं आई थीं और मैं अपनी प्रतिष्ठा का आनंद ले रहा था, मैं दावा करता था कि मैं परमेश्वर के प्रति समर्पित हूँ और उससे चीजें स्वीकारता हूँ। लेकिन जब ऐसी चीजों का सामना करना पड़ा जो मेरी धारणाओं के अनुरूप नहीं थीं या मेरे व्यक्तिगत हितों को नुकसान पहुँचाती थीं तो मैंने बहस की और प्रतिरोध किया, परमेश्वर के आयोजनों के प्रति अवज्ञा और असंतुष्टि महसूस की। इसके अतिरिक्त, मैंने दूसरों में दोष ढूँढ़े और दावा किया कि अगुआओं की व्यवस्थाएँ अविवेकपूर्ण थीं। इसके बारे में ध्यान से सोचने पर अगुआ स्पष्ट रूप से कार्य की जरूरतों के आधार पर उचित बदलाव कर रहे थे और मुझमें कुछ लेखन कौशल तो था ही; मैं कोई निपट अकुशल तो था नहीं। लेकिन चूँकि मुझे लगा कि यह बदलाव मेरी प्रतिष्ठा और रुतबे को नुकसान पहुँचाएगा, इसलिए मैंने शिकायत की और विरोध किया। यह वास्तव में मेरा अनुचित रवैया था! इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, मैं उससे पाठ-आधारित कार्य स्वीकार कर समर्पण करने और इसे भरसक प्रयास लगाकर करने के लिए तैयार था।
अपने कर्तव्य के बदलाव के बाद मैंने देखा कि वहाँ के अधिकांश भाई-बहनों के पास मुझसे बेहतर लेखन कौशल था। कुछ लोग पहले अगुआ रह चुके थे और कुछ लोग वर्षों से पाठ-आधारित कार्य कर रहे थे, उन्हें सिद्धांतों की अच्छी समझ थी और वे समस्याओं पर स्पष्ट रूप से और अंतर्दृष्टि के साथ चर्चा करते थे और अपने विचार व्यक्त करते थे। मुझे काफी ईर्ष्या महसूस हुई। अनजाने में मैं थोड़ा कुंठित हो गया और सोचने लगा कि मैंने तो अभी-अभी शुरुआत की है और मैं पहले ही उनसे बहुत पीछे हूँ, मैंने सोचा, “मैं उनके स्तर तक कब पहुँच पाऊँगा?” लेकिन मैं बहुत निराश नहीं हुआ। यह जानकर कि सिद्धांतों, पेशे और दूसरे पहलुओं के मामले में मुझमें काफी कमी थी, मैंने खुद को सिद्धांतों से परिचित करने में समय बिताया और जब मुझे कुछ समझ में नहीं आया तो मैंने भाई-बहनों से मार्गदर्शन माँगा और सीखा। चूँकि मेरे लिए यह नया कर्तव्य था, इसलिए भाई-बहनों के साथ समस्याओं पर चर्चा करते समय मेरे पास कोई अच्छी अंतर्दृष्टि नहीं होती थी। कभी-कभार जब मैं कुछ विचार व्यक्त करता भी था तो वे अनुचित होते थे और मुझे काफी शर्मिंदगी होती थी। इस हिसाब से मैं जितना ज्यादा कार्य करूँगा उतना ही बेकार दिखूँगा—लोगों से सम्मान पाने की बात तो छोड़ ही दो। मुझे चिंता थी कि भाई-बहनों को लगेगा कि मेरी काबिलियत बहुत कम है और मैं विकसित किए जाने लायक नहीं हूँ। यह देखते हुए कि यह कार्य कितना महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण था, मैं अच्छा न कर पाने और किसी और कर्तव्य में लगा दिए जाने को लेकर और भी अधिक परेशान हो गया। यह बहुत ही अपमानजनक होगा। तब से मैं हमेशा आधे-अधूरे मन से अपना कर्तव्य निभा रहा था। मैं कंप्यूटर स्क्रीन को ताकता रहता था, मेरा दिमाग खाली रहता। पेशे को सीखने के लिए मुझमें रुचि और प्रेरणा की कमी थी। मेरे मन में निरंतर हताशा की ऐसी भावना होती थी जिसे बयान नहीं किया जा सकता। कभी-कभी तो मैं उस समय की कल्पना तक करने लगता कि शायद अगुआ अपना मन बदल लें और मुझे वापस भेज दें, मैं यह सोचता था कि यहाँ निकम्मा बनकर बेनकाब होने और गुमनाम रहने से तो बेहतर पुरानी जगह लौटना रहेगा। बाद में मुझे नए पेशे के गुर सिखाने वाली बहन ने मेरे कर्तव्यों में सिद्धांत संबंधी कुछ समस्याओं की पहचान की। इनका विश्लेषण करने के बाद उसने इन समस्याओं और विचलनों को टीम के सामने भी रखा। इससे मैं बहुत शर्मिंदा हुआ। अनजाने में उस समय की यादें दिमाग में आ गईं जब मैं वीडियो बनाता था। उस समय मैं प्रतिष्ठित था। लोग मेरे पास सवाल लेकर आते थे और मैं ही ज्यादातर समय दूसरों की गलतियाँ बताता था। लेकिन अब मैं एक नकारात्मक मिसाल बन गया था और मुझे लगातार मेरी गलतियाँ बताई जा रही थीं। यह वास्तव में दो चरम सीमाएँ थीं! इस विरोधाभास ने मुझे और भी नकारात्मक बना दिया। मैंने अगुआओं को यह बताने के बारे में भी सोचा कि मैं इस काम के लिए सक्षम नहीं हूँ और वीडियो बनाने के लिए वापस जाना चाहता हूँ। लेकिन मुझे डर था कि दूसरे कहेंगे कि मैं आज्ञाकारी नहीं हूँ, इसलिए मैं अनिच्छा से अपने कर्तव्य निभाता रहा।
एक दिन अचानक मुझे परमेश्वर के ये वचन याद आए : “अगर तुम समस्याएँ उत्पन्न होते देखते हो और उन्हें हल करने के लिए तुरंत सत्य नहीं खोजते और उनके जमा होने और काम में बाधा डालने तक इंतजार करते हो और तुम्हारे पास जो थोड़ा-बहुत संकल्प है वह भी अपना कर्तव्य निभाने के दबाव में पहले ही टिका नहीं रह पाता है तो तुम इतने नकारात्मक हो जाओगे कि ढह जाओगे और तुम निश्चित रूप से अडिग नहीं रह पाओगे” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (11))। मुझे एहसास हुआ कि इस नकारात्मक दशा से न निपटना बहुत ही खतरनाक है। भले ही मैं ऊपरी तौर पर अपना कर्तव्य निभाता था, इसमें मेरा मन नहीं लगता था। मैं अक्सर उन दिनों को याद करता था जब दूसरे लोग मेरा सम्मान करते थे और मेरी प्रशंसा करते थे और मैंने कभी भी इसमें अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास नहीं किया। मुझे एहसास हुआ कि इस समस्या का समाधान होना चाहिए और मैं इस तरह से लापरवाह नहीं रह सकता और खुद को धोखा नहीं दे सकता। बाद में आत्म-चिंतन करते हुए मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “लोगों को स्वयं को बहुत पूर्ण, बहुत प्रतिष्ठित, बहुत कुलीन या दूसरों से बहुत भिन्न नहीं समझना चाहिए; यह सब मनुष्य के अभिमानी स्वभाव और अज्ञानता से उत्पन्न होता है। हमेशा अपने आप को दूसरों से अलग समझना—यह अभिमानी स्वभाव के कारण होता है; कभी भी अपनी कमियाँ स्वीकार न कर पाना और कभी भी अपनी भूलों और असफलताओं का सामना न कर पाना—यह अभिमानी स्वभाव के कारण होता है; कभी भी दूसरों को अपने से श्रेष्ठ नहीं होने देना या अपने से बेहतर नहीं होने देना—ऐसा अभिमानी स्वभाव के कारण होता है; दूसरों की खूबियों को कभी खुद से श्रेष्ठ या बेहतर न होने देना—यह अभिमानी स्वभाव के कारण होता है; कभी दूसरों को अपने से बेहतर विचार, सुझाव और दृष्टिकोण न रखने देना और दूसरे लोगों के बेहतर होने का पता चलने पर खुद नकारात्मक हो जाना, बोलने की इच्छा न रखना, व्यथित और निराश महसूस करना और परेशान हो जाना—ये सभी चीजें अभिमानी स्वभाव के ही कारण होती हैं। अभिमानी स्वभाव तुम्हें अपनी प्रतिष्ठा के प्रति रक्षात्मक होने के कारण दूसरों के सुधारों को स्वीकार करने में असमर्थ बना सकता है, अपनी कमियों का सामना करने तथा अपनी असफलताओं और गलतियों को स्वीकार करने में असमर्थ बना सकता है। इसके अतिरिक्त, जब कोई व्यक्ति तुमसे बेहतर होता है, तो यह तुम्हारे दिल में घृणा और जलन पैदा कर सकता है, और तुम स्वयं को बाधित महसूस कर सकते हो, यहाँ तक कि तुम अपना कर्तव्य करना नहीं चाहते और इसे निभाने में अनमने हो जाते हो। अभिमानी स्वभाव के कारण तुम्हारे अंदर ये व्यवहार और आदतें प्रकट हो जाती हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, व्यक्ति के स्व-आचरण का मार्गदर्शन करने वाले सिद्धांत)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे मेरी नकारात्मकता का कारण खोजने में मदद की। मैं खुद को हमेशा काबिल मानता था और बहुत ऊँचा आँकता था, मैं चाहता था कि मैं प्रमुख पद पर रहूँ और जहाँ भी जाऊँ लोग मेरे चक्कर काटें और मेरी प्रशंसा करें। जब मैं दूसरों से सम्मान न पा सका या सुर्खियों में नहीं आ पाया तो मैं नकारात्मक हो गया और इस स्थिति से निकलना चाहता था। यह सब मेरी प्रकृति बहुत ही घमंडी होने के कारण था। मैंने पाठ-आधारित कार्य का अभ्यास करना अभी-अभी शुरू किया था और ऐसी बहुत-सी चीजें थीं जिन्हें मैं समझता नहीं था या करना नहीं जानता था। कोई भी सिद्धांत केवल कुछ बार सुनने या पढ़ने से नहीं सीखा जा सकता है; इसे एक अरसे तक व्यावहारिक रूप से सीखना पड़ता है। इस दौरान गलतियाँ और असफलताएँ अपरिहार्य हैं। जिन लोगों के पास वाकई विवेक है वे सब इन चीजों के साथ सही तरीके से निपट सकते हैं। लेकिन मुझमें बिल्कुल भी आत्म-जागरूकता नहीं थी। मैं जहाँ कहीं जाता था, खुद को खास दिखाना चाहता था। मैं वास्तव में अभी-अभी शुरुआत कर रहा था, लेकिन अपनी योग्यता दिखाने के लिए कुछ हासिल करने की उतावली में था, ताकि मेरे भाई-बहन देख सकें कि मेरे पास अच्छी काबिलियत है। जब मैं अच्छा नहीं कर पाया, खरा नहीं उतर पाया या सुर्खियों में नहीं रहा तो मैं नकारात्मक होकर ढिलाई बरतने लगा और नया पेशा सीखने के लिए उत्साह गँवा बैठा। मैंने अपना कर्तव्य छोड़कर जाने के बारे में भी सोचा। मुझे एहसास हुआ कि मैं वाकई घमंडी था और सोचता था कि मैं इतना बड़ा आदमी हूँ। मैं जो पीड़ा भोग रहा था वह मेरी अपनी करनी का नतीजा था।
मैं सोचने लगा, “पहले वीडियो बनाते समय मुझमें इतना उत्साह क्यों होता था, लेकिन अब जब मैं पाठ-आधारित काम कर रहा हूँ तो मैं कभी भी उत्साह नहीं जुटा पाता?” बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और अपनी मनोदशा के बारे में कुछ समझ हासिल की। परमेश्वर के वचन कहते हैं : “यदि लोगों के पास सत्य से प्रेम करने वाला दिल है, तो उनमें सत्य का अनुसरण करने की प्रेरणा होगी और वे सत्य का अभ्यास करने में कड़ी मेहनत कर पाएँगे। वे उसे त्याग पाएँगे जिसे त्याग दिया जाना चाहिए और उसे छोड़ पाएँगे जिसे छोड़ दिया जाना चाहिए। विशेष रूप से जब बात उनकी अपनी प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे से संबंधित चीजों की आती है तो वे उन चीजों को भी छोड़ पाते हैं। यदि तुम स्वार्थ, प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे को नहीं छोड़ सकते तो इसका मतलब है कि तुम सत्य से प्रेम नहीं करते और तुममें सत्य का अनुसरण करने की प्रेरणा नहीं है। जब तुम्हारे साथ चीजें घटित होती हैं तो तुम्हें सत्य की तलाश करनी चाहिए और सत्य का अभ्यास करना चाहिए। यदि उन समयों पर जब तुम्हें सत्य का अभ्यास करने की आवश्यकता होती है, तब हमेशा तुम्हारी स्वार्थी मंशाएँ होती हैं और तुम अपने स्वार्थ को नहीं छोड़ सकते तो तुम सत्य को अभ्यास में नहीं ला पाओगे। यदि चाहे तुम पर जो भी आ पड़े, तुम न तो सत्य की तलाश करते हो और न ही उसे अभ्यास में लाते हो तो तुम सत्य से प्रेम करने वाले व्यक्ति नहीं हो। चाहे तुम कितने भी वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करो, तुम सत्य प्राप्त नहीं करोगे। कुछ लोग हमेशा प्रसिद्धि, लाभ और स्वार्थ का पीछा करते हैं। कलीसिया उनके लिए जो भी काम करने की व्यवस्था करती है, वे हमेशा विचार करते हैं : ‘क्या ऐसा करना मेरे लिए फायदेमंद या लाभकारी होगा? यदि होगा, तो मैं करूँगा; यदि नहीं, तो मैं नहीं करूँगा।’ इस तरह का व्यक्ति सत्य का अभ्यास नहीं करता—तो क्या वह अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कर सकता है? वह निश्चित रूप से नहीं कर सकता। भले ही तुम बाहरी तौर पर बुराई करते हुए न दिखो, तुम फिर भी सत्य का अभ्यास करने वाले व्यक्ति नहीं हो। तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते, तुम सकारात्मक चीजों से प्रेम नहीं करते और चाहे तुम्हारे साथ कुछ भी हो, तुम केवल अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे, अपने स्वार्थ और तुम क्या लाभ प्राप्त कर सकते हो, इसकी परवाह करते हो—इसका मतलब है कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो सबसे चीजों से अधिक लाभ की तलाश करता है और जो स्वार्थी और नीच भी है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचन कहते हैं कि यदि लोगों के पास सत्य से प्रेम करने वाला हृदय है, तो जब उन पर ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जो उनके मिथ्याभिमान, रुतबे और हितों को प्रभावित करती हैं, वे इसे छोड़ सकते हैं और सत्य का अभ्यास करने के लिए अपनी देह के खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं। मैंने इस बात पर विचार किया कि जब मैं वीडियो बना रहा था तो मुझे लगता था कि मैं बोझ उठाता हूँ और आज्ञाकारी हूँ और खुद को एक ऐसा व्यक्ति मानता था जो सत्य का अनुसरण करता है। वास्तविकता का सामना होने पर ही मुझे एहसास हुआ कि मैं पहले जो करता था वह कोई परमेश्वर को संतुष्ट करने की कोशिश नहीं होती थी, मैं बस तभी कुछ कार्य कर रहा होता था जब इसमें मेरे हित शामिल नहीं होते थे। अब मैं वीडियो निर्माण में लौटने के लिए उतावला था तो इसलिए नहीं कि मुझे यह कर्तव्य पसंद था, बल्कि इसलिए कि मैं अपने भाई-बहनों का समर्थन और सम्मान नहीं त्याग सकता था। भले ही देखने में मेरे पास टीम अगुआ की उपाधि नहीं थी, फिर भी भाई-बहनों के मन पर मैंने अपनी अच्छी छाप बना रखी थी। जब भी मैंने कोई समस्या हल की या कुछ अच्छा किया, मुझे उनसे सम्मान और प्रशंसा मिली, जिसका मैंने भरपूर आनंद लिया। इसलिए चाहे मैंने कितनी भी कीमत चुकाई हो या मुझे कितना भी कष्ट सहना पड़ा हो, मुझे कोई शिकायत नहीं थी। इसके विपरीत पाठ-आधारित कार्य करने से मैं अपमानित हुआ। यहाँ मुझे सब कुछ शुरू से सीखना था और कोई भी मेरी ओर ध्यान नहीं देता था। मेरे लिए पहले की तरह दूसरों का उस्ताद बनना असंभव था। मुझे न केवल खुद को परे रखना था और दूसरों से बुनियादी बातें पूछनी थीं, बल्कि इस नए पेशे में मुझमें इतनी कमी थी कि मुझे लगातार मार्गदर्शन भी लेते रहना था। मैं अपनी कमियों का सामना नहीं करना चाहता था; मैं बस दूसरों से फूलमालाएँ और तालियाँ बटोरकर सम्मान और प्रशंसा के मजे लेना चाहता था। मैंने यह भी कल्पना की थी कि एक दिन अगुआ मुझे फिर से वीडियो बनाने देंगे, ताकि मैं लोगों से घिरा रहूँ और उनकी प्रशंसा पाता रहूँ। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। इसके बजाय मेरी भ्रष्टता और कमियाँ निरंतर बेनकाब होती गईं। इसलिए मैं नकारात्मक और परेशान हो गया और अपना कर्तव्य निभाने में उत्साह खो बैठा। इस बिंदु पर मुझे एहसास हुआ कि पहले मैंने अपना कर्तव्य केवल प्रतिष्ठा और रुतबे के लिए किया था और मैंने अपने कर्तव्य को बिल्कुल भी जिम्मेदारी नहीं माना था।
उस दौरान मैंने बार-बार खोज कर अपनी दशा पर आत्म-चिंतन किया। मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “मसीह-विरोधियों के लिए रुतबा और प्रतिष्ठा उनका जीवन हैं। चाहे वे कैसे भी जीते हों, चाहे वे किसी भी परिवेश में रहते हों, चाहे वे कोई भी काम करते हों, चाहे वे किसी भी चीज का अनुसरण करते हों, उनके कोई भी लक्ष्य हों, उनके जीवन की कोई भी दिशा हो, यह सब अच्छी प्रतिष्ठा और ऊँचा रुतबा पाने के इर्द-गिर्द घूमता है। और यह लक्ष्य बदलता नहीं है; वे कभी ऐसी चीजों को दरकिनार नहीं कर सकते हैं। यह मसीह-विरोधियों का असली चेहरा और सार है। तुम उन्हें पहाड़ों की गहराई में किसी घने-पुराने जंगल में छोड़ दो, फिर भी वे प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे दौड़ना नहीं छोड़ेंगे। तुम उन्हें लोगों के किसी भी समूह में रख दो, फिर भी वे सिर्फ प्रतिष्ठा और रुतबे के बारे में ही सोचेंगे। यूँ तो मसीह-विरोधी परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन वे प्रतिष्ठा और रुतबे के अनुसरण को परमेश्वर में आस्था के समकक्ष रखते हैं और दोनों चीजों को समान पायदान पर रखते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब वे परमेश्वर में आस्था के मार्ग पर चलते हैं तो वे प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण भी करते हैं। यह कहा जा सकता है कि मसीह-विरोधियों के दिलों में, परमेश्वर में विश्वास करने में सत्य का अनुसरण ही प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण करना है और प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण सत्य का अनुसरण करना भी है—प्रतिष्ठा और रुतबा हासिल करना सत्य और जीवन हासिल करना है। अगर उन्हें लगता है कि उन्होंने प्रसिद्धि, लाभ या रुतबा हासिल नहीं किया है, कि कोई उनका आदर नहीं करता, उन्हें उच्च सम्मान नहीं देता है या उनका अनुसरण नहीं करता है तो वे बहुत उदास हो जाते हैं, वे मानते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने की कोई तुक नहीं है, इसका कोई मूल्य नहीं है और वे मन-ही-मन सोचते हैं, ‘क्या मैं परमेश्वर में इस तरह विश्वास कर विफल रहा हूँ? क्या मेरे लिए कोई आशा नहीं है?’ वे अक्सर अपने दिलों में ऐसी चीजों का हिसाब-किताब लगाते हैं। वे यह हिसाब-किताब लगाते हैं कि वे कैसे परमेश्वर के घर में अपने लिए जगह बना सकते हैं, वे कैसे कलीसिया में उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं, जब वे बात करें तो वे कैसे खुद को सुनने के लिए लोगों को जुटा सकते हैं और जब वे कार्य करें तो कैसे उनसे अपनी प्रशंसा के गीत गवा सकते हैं, वे जहाँ कहीं भी हों वे कैसे अपना अनुसरण करने के लिए लोगों को जुटा सकते हैं और उनके पास कैसे कलीसिया में एक प्रभावी आवाज हो सकती है और उनके पास कैसे शोहरत, लाभ और रुतबा हो सकता है—वे वास्तव में अपने दिलों में ऐसी चीजों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। ऐसे लोग इन्हीं चीजों के पीछे भागते हैं। वे हमेशा ऐसी चीजों को महत्व क्यों देते रहते हैं? परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, उपदेश सुनने के बाद क्या वे वाकई यह सब नहीं समझते, क्या वे वाकई इन सबका भेद नहीं पहचान पाते? क्या परमेश्वर के वचन और सत्य वास्तव में उनकी धारणाएँ, विचार और मत बदलने में सक्षम नहीं हैं? मामला ऐसा बिल्कुल नहीं है। समस्या उनमें ही है, यह पूरी तरह से इसलिए है क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते, क्योंकि अपने दिल में वे सत्य से विमुख हो चुके हैं और परिणामस्वरूप वे सत्य के प्रति बिल्कुल भी ग्रहणशील नहीं होते—जो उनके प्रकृति सार से निर्धारित होता है” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग तीन))। परमेश्वर के वचन यह उजागर करते हैं कि मसीह-विरोधी प्रतिष्ठा और रुतबे से अत्यंत प्रेम करते हैं। वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, चीजें त्यागते हैं और प्रतिष्ठा और रुतबे के लिए अपना सब कुछ खपाते हैं। एक बार जब वे अपना पद गँवा देते हैं तो ऐसा लगता है जैसे उनका जीवन छीन लिया गया है; वे हर चीज में रुचि और प्रेरणा खो देते हैं। खुद के व्यवहार पर विचार करते हुए मुझे एहसास हुआ कि मैं भी मसीह-विरोधी की तरह ही था, दूसरों से सराहना पाने और अपनी आराधना कराने के लिए लालायित रहता था और प्रतिष्ठा और रुतबे के अनुसरण को भी सकारात्मक चीज मानता था। कई सालों से मैं इसके पीछे भाग रहा था। घर में मेरे पिता अक्सर मुझसे यह कहते थे कि “भीड़ से ऊपर उठो” और “परिवार का नाम रोशन करो” और सफल व्यक्ति बनना ही अपना भविष्य सँवारने का एकमात्र तरीका है। स्कूल में शिक्षकों ने मेरे मन में यह विचार बैठाया कि “आदमी ऊपर की ओर जाने के लिए संघर्ष करता है; पानी नीचे की ओर बहता है।” ये बातें लगातार मेरे विचारों में डाली गईं, जिससे मैं प्रतिष्ठा और रुतबे के प्रति अधिकाधिक आकर्षित हुआ और इसके लिए कोई भी कठिनाई सहने को तैयार हो गया। अपने स्कूली वर्षों के दौरान अच्छे ग्रेड पाने और शिक्षकों और सहपाठियों की प्रशंसा और सराहना पाने के लिए मैं देर रात तक काम करने के लिए कॉफी पीता था और बीमारी के दौरान भी कक्षाओं में जाता था। पिछले कुछ सालों से कलीसिया में वीडियो बनाते समय मैंने बाहरी तौर पर मुश्किलें झेलीं और कीमत चुकाई, कौशल सीखा और अधिक काम किया, यह सब दूसरों से प्रशंसा पाने के लक्ष्य के साथ किया। जब मेरा कर्तव्य बदल दिया गया और मुझे दूसरों से सराहना मिलनी बंद हो गई और मेरी गलतियों ने मेरी कमियाँ और अपर्याप्तताएँ तक प्रकट कर दीं तो मैं हतोत्साहित हो गया, मुझे गलतफहमी हो गई और मैं परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित परिस्थितियों से कुढ़ गया और मैंने अपना कर्तव्य निभाने में प्रेरणा खो दी। मैंने देखा कि मैं प्रतिष्ठा और रुतबे के लिए जी रहा था, लगातार दूसरों से प्रशंसा पाने के बारे में सोचता रहता था। मैं जो अनुसरण कर रहा था वह परमेश्वर की अपेक्षाओं के बिल्कुल विपरीत था। मैंने परमेश्वर के इन वचनों के बारे में सोचा : “लोगों के रुतबे के पीछे भागने से परमेश्वर को सबसे ज्यादा घृणा है और फिर भी तुम अड़ियल बनकर रुतबे के लिए होड़ करते हो, उसे हमेशा सँजोए और संरक्षित किए रहते हो, उसे हासिल करने की कोशिश करते रहते हो। क्या इन सभी में थोड़ा-सा परमेश्वर-विरोधी होने का गुण नहीं है?” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग तीन))। हालाँकि मैंने अभी तक लोगों को जीतने, खुद को स्थापित करने या मसीह-विरोधी की तरह रुतबे के लिए एक स्वतंत्र राज्य बनाने का सहारा नहीं लिया है और अभी तक कोई स्पष्ट बुरे कृत्य नहीं किए हैं, लेकिन अनुसरण के पीछे के मेरे इरादे और विचार गलत थे। मैं लगातार लोगों के दिलों में जगह बनाने की कोशिश करता रहा। इस रास्ते पर चलते रहना खतरनाक है और परमेश्वर के लिए घृणित है। यह महसूस करते हुए मैं परमेश्वर की सुरक्षा के लिए बहुत आभारी था।
अपने कर्तव्य में इस बदलाव के माध्यम से मैं उस गलत रास्ते पर विचार करने और समय रहते पीछे मुड़ने के लिए प्रेरित हुआ। यह मेरे लिए परमेश्वर का उद्धार है। भले ही मुझे अब अलग दिखने और सुर्खियों में आने का अवसर नहीं मिला, फिर भी मैं ईमानदारी से समर्पण करने में सक्षम था। मुझे पिछले कुछ वर्षों में इतना समय बर्बाद करने के लिए थोड़ा पछतावा भी हुआ। अगर मैंने रुतबे की तलाश करने के बजाय सत्य का अनुसरण करने और खुद को जानने में वही प्रयास किया होता तो मैं अधिक विवेकशील, परमेश्वर के प्रति अधिक आज्ञाकारी होता और अब जितना विद्रोही और भ्रष्ट नहीं होता। इन समस्याओं को हल करने के लिए मैंने परमेश्वर के वचनों के दो और अंश पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “यदि तुम सभी चीजों में समर्पित होना और परमेश्वर के इरादे पूरे करना चाहते हो, तो तुम इसे केवल एक कर्तव्य निभाकर नहीं कर सकते हो; तुम्हें परमेश्वर द्वारा दिए गए हर आदेश को स्वीकार करना होगा। चाहे वह तुम्हारी पसंद के अनुसार हो और तुम्हारी रुचियों से मेल खाता हो या कुछ ऐसा हो जो तुम्हें पसंद नहीं है या जो तुमने पहले कभी नहीं किया हो और जो तुम्हें कठिन लगता हो, तो तुम्हें इसे स्वीकार करना चाहिए और समर्पण करना चाहिए। तुम्हें न केवल इसे स्वीकार करना चाहिए, बल्कि तुम्हें सक्रिय रूप से सहयोग भी करना चाहिए, पेशेवर कौशल सीखना चाहिए, अनुभव प्राप्त करना और प्रवेश करना चाहिए। भले ही तुम्हें कष्ट, थकान, अपमान या बहिष्कार झेलना पड़े, फिर भी तुम्हें इसे लगन से करना चाहिए। केवल इस तरह से अभ्यास करके ही तुम सभी चीजों में समर्पित हो पाओगे और परमेश्वर के इरादे पूरे कर पाओगे। तुम्हें इसे अपना उद्यम नहीं, बल्कि अपना कर्तव्य मानकर निभाना चाहिए। तुम्हें कर्तव्य को कैसे समझना चाहिए? कर्तव्य कोई ऐसी चीज है जो सृष्टिकर्ता—परमेश्वर—किसी व्यक्ति को करने के लिए देता है; लोगों के कर्तव्य ऐसे ही उत्पन्न होते हैं। परमेश्वर जो आदेश तुम्हें देता है, वह तुम्हारा कर्तव्य होता है, और यह पूरी तरह स्वाभाविक और उचित है कि तुम परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार अपना कर्तव्य निभाओ। अगर तुम्हें यह स्पष्ट है कि यह कर्तव्य परमेश्वर का आदेश है, कि यह तुम पर परमेश्वर के प्रेम और आशीष का आगमन है, तो तुम परमेश्वर से प्रेम करने वाले हृदय के साथ अपना कर्तव्य स्वीकार कर सकोगे, और तुम अपना कर्तव्य निभाते हुए परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहोगे और तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सभी मुश्किलों से उबरने में सफल रहोगे। जो लोग वास्तव में परमेश्वर के लिए खुद को खपाते हैं उन्हें कभी भी परमेश्वर के आदेश से इनकार नहीं करना चाहिए; उन्हें कभी किसी कर्तव्य से इनकार नहीं करना चाहिए। चाहे परमेश्वर तुम्हें कोई भी कर्तव्य सौंपे, चाहे उसमें जो भी कठिनाइयाँ शामिल हों, तुम्हें उससे इनकार नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे स्वीकार करना चाहिए। यही अभ्यास का मार्ग है, यानी परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सभी चीजों में सत्य का अभ्यास करना और समर्पित होना। यहाँ मुख्य बात क्या है? ये शब्द—‘सभी चीजों में’ मुख्य बात हैं। ‘सभी चीजें’ आवश्यक रूप से तुम्हारी इच्छाओं के अनुरूप नहीं होतीं, और वे आवश्यक रूप से हमेशा ऐसी चीजें नहीं होतीं जिन्हें तुम करना पसंद करते हो या जिन्हें स्वीकार करके तुम्हें खुशी महसूस होती है। कुछ काम ऐसे होते हैं जिनमें तुम निपुण नहीं होते और तुम्हें उन्हें करना सीखना पड़ता है; कुछ ऐसे होते हैं जो कठिन होते हैं; अन्य ऐसे होते हैं जिनमें तुम्हें पीड़ा सहनी पड़ती है। लेकिन चाहे वह कुछ भी हो, जब तक यह कुछ ऐसा है जो परमेश्वर ने तुम्हें सौंपा है, तुम्हें इसे परमेश्वर से स्वीकारना चाहिए; तुम्हें इस कर्तव्य को उठाना चाहिए, और इसे अच्छे से निभाने में अपना दिल झोंकना चाहिए, ताकि तुम अपनी भक्ति अर्पित कर सको और परमेश्वर के इरादों को पूरा कर सको। यही अभ्यास का मार्ग है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। “यूँ तो तुमने अपनी जग-हँसाई करा दी, लेकिन इससे तुम यह सीख सकते हो कि तुम्हारी समस्याएँ और कमियाँ क्या हैं, तुम यह सीख सकते हो कि तुममें मिथ्याभिमान के लिए प्यार है और तुम यह समझ सकते हो कि तुम एक पूर्ण व्यक्ति नहीं हो। यह तुम्हारे आत्म-ज्ञान के लिए फायदेमंद है, इसलिए अपनी जग-हँसाई कराना कोई बुरी बात नहीं है। कोई भी पूर्ण व्यक्ति नहीं होता है; सारे लोगों में भ्रष्ट स्वभाव होता है, साथ ही कमियाँ और अपर्याप्तताएँ भी होती हैं और सभी लोग भ्रष्टता प्रकट करते हैं, ऐसी चीजें कहते और करते हैं जो गलत हैं और झटकों और असफलताओं का सामना करते हैं। इसलिए वे सभी ऐसे समय का अनुभव करते हैं जब वे अपनी जग-हँसाई करा बैठते हैं और शर्मिंदा होते हैं। यह बहुत सामान्य है। लोग अपनी जग-हँसाई कराने से मुख्य रूप से इसलिए डरते हैं क्योंकि वे बहुत मिथ्याभिमानी होते हैं। जब तुम अपने मिथ्याभिमान को छोड़ सकते हो और इस मामले को सही ढंग से देख सकते हो तो अगली बार अपनी जग-हँसाई कराने पर तुम्हें अब और शर्म महसूस नहीं होगी, तुम्हें इसकी परवाह नहीं होगी कि यह तुम्हारी प्रतिष्ठा पर असर डालता है और तुम इसके कारण अब और हताश नहीं होगे। इस समय तुम्हारी मानवता परिपक्व हो चुकी होगी। क्या यह एक अच्छी बात नहीं है? (है।) इसलिए जब अपनी जग-हँसाई करा बैठते हो तो यह मत सोचो कि तुम्हारी किस्मत खराब है और अपने मिथ्याभिमान और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए बहाने मत खोजो। जब दूसरे अपनी जग-हँसाई करा बैठें तो उन पर भी मत हँसो। ये चीजें बहुत सामान्य हैं और हर कोई इनका अनुभव करेगा। जब तुम बहुत सारे झटकों और असफलताओं का अनुभव करते हो तो तुम्हारी मानवता धीरे-धीरे परिपक्व और मँजी हुई हो जाती है और फिर जब तुम दोबारा इन चीजों का सामना करते हो तो तुम अब और बाधित नहीं होगे और तुम सामान्य रूप से अपना कर्तव्य निभा सकोगे। इस समय तुम्हारी मानवता सामान्य होगी और तुम्हारा विवेक भी सामान्य होगा” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (2))। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद मुझे इस परिस्थिति में अभ्यास करने का एक मार्ग मिला। चाहे मुझे दूसरों से प्रशंसा मिले या न मिले या दूसरों से अलग दिखने के मौके मिलें या न मिलें, मुझे परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित वातावरण के प्रति समर्पित होना चाहिए और अपने कर्तव्य को ईमानदारी से निभाना चाहिए, अपना दिल और ताकत उसमें लगानी चाहिए। यह मेरी जिम्मेदारी थी और मुझे यही करना चाहिए। बाद में भले ही मेरे काम में अभी भी कभी-कभी गलतियाँ छूट जाती थीं और दूसरे लोग मेरी कई समस्याएँ बताते थे तो मुझे बुरा लगता था, लेकिन मैंने नकारात्मक ढंग से प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया। जितनी अधिक गलतियाँ और असफलताएँ मुझे मिलीं, उतना ही उन्होंने मुझे समय रहते परमेश्वर के पास लौटने के लिए प्रेरित किया ताकि मैं अपनी भ्रष्टता को जान सकूँ, अपने विचलन और कमियों का विश्लेषण और चिंतन कर सकूँ। इससे मुझे कुछ सिद्धांत और ज्यादा याद हो गए जिससे मेरे कर्तव्य निर्वहन और मेरे जीवन प्रवेश दोनों को लाभ हुआ। इस समझ के कारण मेरी मानसिकता सुधर गई और अब मुझे इस बात की उतनी परवाह नहीं थी कि दूसरे मुझे कैसे देखते हैं। पेशे के संदर्भ में मैंने अपने विचलन और समस्याओं का विश्लेषण किया, जब मुझे कुछ समझ में नहीं आता था तो भाई-बहनों से मदद माँगी और प्रासंगिक सिद्धांतों की तलाश की और उनमें प्रवेश किया। मैंने दूसरों की अच्छी परिपाटियों से भी सीखा। जहाँ तक मेरी दशा का सवाल है, मैंने अपना खाली समय चिंतन-मनन करने में लगाया और खुद को परमेश्वर के उन वचनों के आधार पर जाना जो मेरी प्रकट भ्रष्टताओं से संबंधित थे। कुछ समय तक इसका अभ्यास करने के बाद मुझे अपना वर्तमान कर्तव्य पसंद आने लगा और मेरे कर्तव्य के नतीजे पहले से बेहतर होते गए। इस प्रक्रिया पर पीछे मुड़कर देखने पर मुझे परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों का एहसास हुआ। इस माहौल में अपना कर्तव्य निभाने से मुझे कई लाभ प्राप्त हुए हैं। इन असफलताओं और खुलासों के जरिए ही मैं अपनी कमियों और वास्तविक आध्यात्मिक कद के अभाव को स्पष्ट रूप से देख पाया, परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना और अपने कर्तव्यों में सिद्धांतों की और अधिक खोज करना सीख सका। यही नहीं, इस माहौल में लगातार तपने के कारण मेरी मानवता परिपक्व हो गई मेरे अंदर आवेग और नाजुकपन घट गया, मैं अपनी कमियों का सही उपचार करने में सक्षम हो गया और परमेश्वर के इरादों और सत्य सिद्धांतों की खोज करना सीखने लगा। ये सभी मेरे लिए प्रशिक्षण और पूर्णता हैं।
अपने कर्तव्य में इस बदलाव का अनुभव करते हुए मैं समझ गया हूँ कि इससे फर्क नहीं पड़ता कि हम कौन-सा कर्तव्य निभा रहे हैं, हमारी प्रतिष्ठा कायम है या नहीं या दूसरे हमारी प्रशंसा कर रहे हैं या नहीं, ये बातें महत्वपूर्ण नहीं हैं। महत्वपूर्ण यह है कि हम परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हैं या नहीं और हमारे पास सत्य का अभ्यास करने की गवाहियाँ हैं या नहीं। पहले जब मैंने दूसरों को उनके कर्तव्यों में बदलाव के बाद नकारात्मक और अवज्ञाकारी बनते देखा तो मैंने उन्हें तुच्छ समझा और सोचा कि मैं बेहतर हूँ। अब सच्चाई सामने आई तो मैंने देखा कि मेरी बहुत ही अहंकारी प्रकृति थी और परमेश्वर के प्रति मैं कोई दूसरों से अधिक समर्पित नहीं था। परमेश्वर द्वारा इंतजाम की गई इन परिस्थितियों से प्रकट होने के माध्यम से मैंने अपने बारे में कुछ ज्ञान पाया है और कुछ बदलावों से गुजरा हूँ। परमेश्वर के हाथों उद्धार के लिए मैं वास्तव में तहेदिल से आभारी हूँ!
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
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