बूढ़े अब भी परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं

07 दिसम्बर, 2022

लियू एन, चीन

मैंने 62 वर्ष की उम्र में प्रभु यीशु पर विश्वास करना शुरू किया। यह जानकर कि प्रभु अपने अनुयायियों को स्वर्ग के राज्य में प्रवेश और अनंत जीवन देने का वादा करता है, मुझे लगा कि इस जीवन में मेरे पास आशा है और ऐसा महान आशीष पाने के विचार से मेरा दिल बाग-बाग हो गया। मैं हर दिन असीम ऊर्जा के साथ कड़ी मेहनत करने लगा और प्रभु के लिए खुद को खपाने लगा। तीन साल बाद मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकारने का सौभाग्य मिला। मैं प्रभु की वापसी का स्वागत करने और पूरी तरह से बचाए जाने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश पाने की उम्मीद से उत्साहित था। इसलिए मैं अनुसरण करते हुए और भी ज्यादा मेहनत करने लगा, और भी ज्यादा त्याग करने और खुद को खपाने लगा, सक्रियता से सुसमाचार का प्रचार करने और अपना कर्तव्य निभाने लगा और यहाँ तक कि शाम को सुसमाचार प्रचार करने के लिए बाहर भी जाने लगा। बाद में भाई-बहनों ने मुझे कलीसिया अगुआ और फिर उपदेशक चुन लिया। अपने बुढ़ापे में ऐसे महत्वपूर्ण कर्तव्य निभाने का मौका पाकर मैं बहुत खुश था। मैंने यह देखकर खुद को खासकर सम्मानित महसूस किया कि भले ही मैं सभाओं में सबसे बूढ़ा था, फिर भी मैं सभाओं की मेजबानी और दूसरों की समस्याएँ सुलझाने में मदद कर सकता था। मैंने सोचा कि अगर मैं अनुसरण के दौरान कड़ी मेहनत करता रहा तो मुझे भी युवा लोगों की तरह बचाया जा सकता है, इसलिए मैंने अपना पूरा दिल अपने कर्तव्य में लगा दिया।

पलक झपकते ही सात-आठ साल बीत गए और मेरी सेहत और ऊर्जा पहले जैसी नहीं रही। फिर 73 साल की उम्र में मुझे स्ट्रोक पड़ा, लेकिन कुछ दिनों तक आईवी ड्रिप पर रहने के बाद मेरे लक्षण लगभग पूरी तरह से गायब हो गए और कोई भी शेष समस्या नहीं रही। मुझे लगा कि परमेश्वर ने देखा होगा कि मैं उसके लिए पूरे दिल से खुद को खपाने के लिए तैयार हूँ, इसलिए उसने मुझे आशीष दिया और मेरी रक्षा की। मैं वाकई आभारी था और अपना कर्तव्य निभाता रहा। लेकिन मेरी सेहत को देखते हुए अगुआ ने मेरा कर्तव्य बदलकर मुझे घर पर अन्य भाई-बहनों की मेजबानी करने में लगा दिया। यह जानते हुए कि ऐसे कई कर्तव्य हैं जो मैं अब नहीं कर पाऊँगा और सिर्फ घर पर भाई-बहनों की मेजबानी ही करूँगा, मैं उदास हो गया। मुझे सभी युवा भाई-बहनों से ईर्ष्या हुई, जो ऊर्जा से भरपूर थे और हर तरह के कर्तव्यों में व्यस्त रहते थे। मैंने सोचा, “मैं बूढ़ा हो गया हूँ और मेरा स्वास्थ्य खराब है। मैं अब चाहकर भी भाग-दौड़ नहीं कर सकता और ऐसे कई कर्तव्य हैं जिन्हें मैं अब और नहीं कर सकता। क्या इसका मतलब यह नहीं है कि मैं बेकार हूँ? काश मैं 10-20 साल पीछे जाकर उनकी तरह हर तरह के अलग-अलग कर्तव्य कर पाता। तब मुझे आशीष और उद्धार मिलने की संभावनाएँ बहुत ज्यादा होतीं! हालाँकि अभी बूढ़ा होने के नाते मैं युवाओं के साथ अपनी तुलना नहीं कर सकता।” इस विचार ने मुझे प्रेरणाहीन बना दिया और इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, मैं हताश हो गया। मैंने यह भी सोचा कि कैसे मुझे स्ट्रोक पड़ा था और यह एक ऐसी बीमारी है जो बार-बार होती है तो अगर मुझे किसी दिन फिर से दौरा पड़ा तो यह मेरा अंत हो सकता है और मैं परमेश्वर की महिमा का दिन नहीं देख पाऊँगा। तब मुझे कैसे बचाया जा सकेगा? तो फिर परमेश्वर में विश्वास करने का क्या मतलब है? ये मेरे लिए उदास, हताश करने वाले विचार थे। कुछ समय के लिए मैं परमेश्वर के वचन भी नहीं पढ़ पाया या भजन तक नहीं सुन पाया। अपनी दुखद स्थिति में मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर! मुझे लगता है कि अब मेरे पास उद्धार की कोई उम्मीद नहीं है। मैं बहुत नकारात्मक हो गया हूँ और मेरी सारी जीवन-शक्ति खत्म हो गई है। परमेश्वर, मैं खुद को तुमसे दूर नहीं करना चाहता। मुझे पता है कि मेरी दशा ठीक नहीं है, लेकिन मुझे नहीं पता कि इसे कैसे सुधारा जाए। इस गलत दशा से बाहर निकालने के लिए मेरा मार्गदर्शन करो।”

इन नकारात्मक विचारों के वश में न आने के लिए मैंने खुद को फिर से परमेश्वर के वचन पढ़ने के लिए प्रेरित किया। मैंने एक दिन परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : “प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर की इच्छा है कि उसे पूर्ण बनाया जाए, अंततः उसके द्वारा उसे प्राप्त किया जाए, उसके द्वारा उसे पूरी तरह से शुद्ध किया जाए, और वह ऐसा इंसान बने जिससे वह प्रेम करता है। चाहे मैं तुम लोगों को पिछड़ा हुआ कहता हूँ या खराब काबिलियत वाला—यह सब तथ्य है। हालाँकि मेरा ऐसा कहना यह प्रमाणित नहीं करता कि मेरा तुम लोगों को त्यागने का इरादा है, कि मैंने तुम लोगों में आशा खो दी है, और यह तो बिल्कुल नहीं कि मैं तुम लोगों को बचाना नहीं चाहता। आज मैं तुम लोगों के उद्धार का कार्य करने के लिए आया हूँ, जिसका तात्पर्य है कि जो कार्य मैं करता हूँ, वह उद्धार के कार्य की निरंतरता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर होता है : बशर्ते तुम इच्छुक हो, बशर्ते तुम अनुसरण करते हो, अंत में तुम इस परिणाम को प्राप्त करने में समर्थ होगे और तुममें से किसी एक को भी छोड़ नहीं दिया जाएगा। यदि तुम कम काबिलियत के हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी कम काबिलियत के अनुसार होंगी; यदि तुम उच्च काबिलियत के हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उच्च काबिलियत के अनुसार होंगी; यदि तुम अज्ञानी और निरक्षर हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ इसी अनुसार होंगी; यदि तुम साक्षर हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारे साक्षर होने के अनुसार होंगी; यदि तुम उम्रदराज हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उम्र के अनुसार होंगी; यदि तुम मेजबानी का कर्तव्य निभाने में सक्षम हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ इसी अनुसार होंगी; यदि तुम कहते हो कि तुम मेजबानी का कर्तव्य नहीं निभा सकते हो और केवल एक निश्चित भूमिका ही निभा सकते हो, चाहे वह सुसमाचार प्रचार का कार्य हो या कलीसिया की देखरेख करने का कार्य या अन्य सामान्य मामलों को करने का कार्य, तो मेरे द्वारा तुम्हारी पूर्णता भी उस कार्य के अनुसार होगी जो तुम करते हो। वफादार होना, बिल्कुल अंत तक समर्पण करना और परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम रखने का प्रयास करना—ये चीजें तुम्हें अवश्य हासिल करनी चाहिए, बस ये तीन चीजें और यही सर्वोत्तम अभ्यास हैं(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना)। परमेश्वर के वचनों ने मेरे लिए तुरंत ही चीजें साफ कर दीं। परमेश्वर लोगों के परिणामों का निर्धारण इस आधार पर नहीं करता कि उन्होंने उसके लिए कितना कष्ट सहा है, उनकी वरिष्ठता कितनी है या उनके कर्तव्यों का दायरा क्या है। जब तक वे वाकई उसके लिए खुद को खपाते हैं, सत्य का अनुसरण करते हैं, उसके प्रति सच्चा समर्पण प्रदर्शित करते हैं, अपने कर्तव्य मानक स्तर पर निभाते हैं और उसके लिए सच्ची गवाही देते हैं, तब तक वह उन्हें स्वीकृति देगा। लेकिन मैं उसका इरादा नहीं समझ पाया था और यह नहीं जानता था कि वह किस तरह के लोगों को बचाता है। मैंने हमेशा यही माना कि परमेश्वर के लिए खुद को खपाने, कष्ट सहने और कीमत चुकाने और बहुत काम करने से मुझे परमेश्वर की स्वीकृति मिल जाएगी। लेकिन चूँकि मैं बूढ़ा हो रहा था और युवाओं की तरह कड़ी मेहनत नहीं कर सकता था, मैंने पहले ही मान लिया था कि मेरा उद्धार नहीं होगा। मैं नकारात्मकता और गलतफहमियों में उलझ गया था; मैं परमेश्वर के खिलाफ इतना विद्रोही था! असलियत में भले ही मैं बूढ़ा था और युवाओं की तरह कई कर्तव्य नहीं कर सकता था, परमेश्वर ने मुझसे उन जैसी अपेक्षाएँ नहीं की थीं। वह मुझे सत्य का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य निभाने के अवसरों से भी वंचित नहीं कर रहा था। मेरा दिमाग और विवेक अभी भी बरकरार थे; मैं अभी भी परमेश्वर के वचन पढ़ सकता था और अपनी क्षमता के अनुसार कर्तव्य कर सकता था। लेकिन परमेश्वर का इरादा खोजे बिना ही मैंने खुद को बूढ़ा और बेकार करार दे दिया था, मानो मैं परमेश्वर की कृपा से बाहर हो गया हूँ। क्या यह परमेश्वर के बारे में मनमाना अनुमान लगाना नहीं था? परमेश्वर ने कभी नहीं कहा कि बहुत सारे कर्तव्य करने से व्यक्ति को बचा लिया जाएगा या एक बार जब कोई बूढ़ा हो जाता है तो वह उसे निकाल देगा और उसे फिर कभी नहीं बचाएगा। वह वाकई इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट था कि बूढ़े लोगों को सत्य का अनुसरण कैसे करना चाहिए और अपने कर्तव्य कैसे निभाने चाहिए। जब तक मैं अंत तक वफादार और समर्पित हूँ और मैं परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास कर सकता हूँ, मेरा उद्धार होने की उम्मीद है। परमेश्वर के वचनों के आधार पर चीजों को न देखना मेरी बड़ी मूर्खता थी। मैंने अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को सत्य मान लिया था और हमेशा परमेश्वर के इरादे को गलत समझा था। इसका एहसास होने पर मुझे अपराध बोध हुआ और मैंने परमेश्वर के सामने आकर प्रार्थना की, “हे परमेश्वर! मैं अपने गलत विचारों के कारण नकारात्मक और प्रतिरोधी होना बंद कर दूँगा। जब तक मेरे पास एक और दिन अपना कर्तव्य निभाने की क्षमता है, मैं आगे बढ़ता रहूँगा और सत्य का अनुसरण करने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करूँगा।” प्रार्थना और परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन ने मुझे कुछ सांत्वना दी—मैं अब इतना परेशान नहीं था। मैंने सोचा, “जब तक मेरा होश-हवास ठीक है और मैं चल-फिर सकता हूँ, मैं परमेश्वर पर भरोसा करूँगा कि मैं अपने भाई-बहनों के लिए एक अच्छा मेजबान बन सकूँ, अपना कर्तव्य भरसक निभाऊँ और परमेश्वर को अपनी हार्दिक सेवा अर्पित करूँ।”

लेकिन अभी भी कुछ ऐसा था जो मेरी समझ में नहीं आता था। जब मैंने देखा कि मैं युवाओं की तरह सक्षम नहीं हूँ तो मैं इस हद तक नकारात्मक क्यों हो गया था कि मैंने परमेश्वर को धोखा देने के बारे में भी सोच लिया? उसका मूल कारण क्या था? मैंने खोज के दौरान परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : “सभी लोग आशीषें, पुरस्कार और मुकुट पाने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं। क्या हर व्यक्ति के दिल में यह इरादा नहीं होता? वास्तव में, हर व्यक्ति के दिल में यही होता है। यह एक तथ्य है। यद्यपि लोग अक्सर इसके बारे में बात नहीं करते और यहाँ तक कि आशीषें प्राप्त करने के अपने इरादे और इच्छा को छिपाते भी हैं, यह इच्छा, यह इरादा और उद्देश्य जो लोगों के दिलों में गहराई तक निहित है, कभी भी डगमगाया नहीं है। चाहे लोग कितना भी आध्यात्मिक सिद्धांत समझें, उनके पास कोई भी अनुभवजन्य ज्ञान हो, वे कोई भी कर्तव्य कर सकते हों, वे कितना भी कष्ट सहें या वे कितनी भी कीमत चुकाएँ, वे कभी भी आशीषें प्राप्त करने के उस इरादे को नहीं छोड़ते जो उनके दिलों में गहराई से छिपा हुआ है, वे हमेशा चुपचाप इसकी सेवा में मेहनत और भाग-दौड़ करते रहते हैं। क्या यही वह चीज नहीं है जो लोगों के दिलों में सबसे गहराई में दबी हुई है? आशीषें प्राप्त करने के इस इरादे के बिना, तुम लोगों को कैसा महसूस होगा? तुम किस रवैये से अपना कर्तव्य निभाओगे और परमेश्वर का अनुसरण करोगे? यदि आशीषें प्राप्त करने का यह इरादा जो उनके दिलों में छिपा है, पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाए तो लोगों का क्या होगा? यह संभव है कि बहुत-से लोग नकारात्मक हो जाएँगे, कुछ लोग अपने कर्तव्यों में उत्साहहीन हो जाएँगे और परमेश्वर में अपने विश्वास में रुचि खो देंगे। वे ऐसे लगने लगेंगे जैसे उन्होंने अपनी आत्मा खो दी हो और ऐसा प्रतीत होगा जैसे उनके दिल छीन लिए गए हों। इसीलिए मैं कहता हूँ कि आशीषें प्राप्त करने का इरादा कुछ ऐसा है जो लोगों के दिलों में गहराई से छिपा हुआ है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, जीवन संवृद्धि के छह संकेतक)। “मसीह-विरोधी केवल लाभ और आशीष प्राप्त करने के उद्देश्य से परमेश्वर पर विश्वास करते हैं। यहाँ तक कि अगर वे कुछ कष्ट सहते हैं या कुछ कीमत चुकाते हैं, तो वह सब भी परमेश्वर के साथ सौदा करने के लिए होता है। आशीष और पुरस्कार प्राप्त करने की उनकी मंशा और इच्छा बहुत बड़ी होती है, और वे उससे कसकर चिपके रहते हैं। वे परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए अनेक सत्यों में से किसी को भी स्वीकार नहीं करते और अपने हृदय में हमेशा सोचते हैं कि परमेश्वर पर विश्वास करना आशीष प्राप्त करने और एक अच्छी मंजिल सुनिश्चित करने के लिए है, यही सर्वोच्च सिद्धांत है और इससे बढ़कर कुछ भी नहीं हो सकता। वे सोचते हैं कि लोगों को आशीष प्राप्त करने के अलावा परमेश्वर पर विश्वास नहीं करना चाहिए और अगर यह सब आशीष के लिए नहीं है, तो परमेश्वर पर विश्वास का कोई अर्थ या महत्व नहीं होगा, यह अपना अर्थ और मूल्य खो देगा। क्या ये विचार मसीह-विरोधियों में किसी और ने डाले थे? क्या ये किसी अन्य की शिक्षा या प्रभाव से निकले हैं? नहीं, वे मसीह-विरोधियों के अंतर्निहित प्रकृति सार द्वारा निर्धारित होते हैं, जिसे कोई भी नहीं बदल सकता। आज देहधारी परमेश्वर के इतने सारे वचन बोलने के बावजूद, मसीह-विरोधी उनमें से किसी को भी स्वीकार नहीं करते, बल्कि उनका विरोध करते हैं और उनकी निंदा करते हैं। सत्य के प्रति उनके विमुख होने और सत्य से घृणा करने की प्रकृति कभी नहीं बदल सकती। अगर वे बदल नहीं सकते, तो यह क्या संकेत करता है? यह संकेत करता है कि उनकी प्रकृति दुष्ट है। यह सत्य का अनुसरण करने या न करने का मुद्दा नहीं है; यह दुष्ट स्वभाव है, यह निर्लज्ज होकर परमेश्वर के विरुद्ध हल्ला मचाना और परमेश्वर का विरोध करना है। यह मसीह-विरोधियों का प्रकृति सार है; यह उनका असली चेहरा है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद सात : वे दुष्ट, धूर्त और कपटी हैं (भाग दो))। “मसीह-विरोधी अपने कर्तव्य को एक लेन-देन मानते हैं। वे लेन-देन करने और आशीष पाने के इरादे के साथ अपना कर्तव्य करते हैं। वे सोचते हैं कि परमेश्वर पर विश्वास आशीष पाने की खातिर किया जाना चाहिए और अपना कर्तव्य करने के जरिए आशीष पाना उचित है। वे अपना कर्तव्य निभाने जैसी सकारात्मक चीज को विकृत करते हैं और एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने के मूल्य और महत्व को कम करते हैं; साथ ही, वे ऐसा करने की वैधता को भी कम करते हैं; जो कर्तव्य सृजित प्राणियों को स्वाभाविक रूप से निभाना चाहिए, वे उसे एक लेन-देन में बदल देते हैं(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग सात))। मैंने परमेश्वर के वचनों से देखा कि मसीह-विरोधी सिर्फ इसलिए परमेश्वर पर विश्वास करते हैं ताकि उन्हें आशीष मिल सके; उनकी लेन-देन की मानसिकता कभी नहीं बदलती और चाहे कितनी भी मुश्किल या दुखद परिस्थितियाँ क्यों न आ जाएँ, वे हार नहीं मानते। अगर वे आशीष पाने की सारी उम्मीद खो देते हैं तो ऐसा लगता है कि उन्होंने अपना जीवन पूरी तरह गँवा दिया है। उन्हें लगता है कि परमेश्वर पर विश्वास करना निरर्थक है और वे परमेश्वर के खिलाफ लड़ते हैं और उसका प्रतिरोध करते हैं। अपनी तुलना परमेश्वर के वचनों के आधार पर करने पर मैंने देखा कि मैं बिल्कुल मसीह-विरोधी की तरह काम कर रहा था। जब मैंने प्रभु पर विश्वास किया था तो मैं यह सुनकर बहुत खुश हुआ था कि प्रभु पर मेरा विश्वास मुझे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश दिला सकता है। मुझे लगा था कि इस जीवन में अनुग्रह पाने के लिए, फिर आने वाले संसार में अनंत जीवन पाने के लिए प्रभु के लिए कोई भी कष्ट उठाना सार्थक होगा। आशीष पाना और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना मेरी आस्था का लक्ष्य बन गया था और मैंने सोचा था कि जितना ज्यादा मैं त्याग करूँगा और खुद को खपाऊँगा, भविष्य में मुझे उतना ही ज्यादा आशीष मिलेगा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकारने के बाद मुझे और भी ज्यादा लगा कि आशीष पाने का मेरा सपना सच हो जाएगा और मुझे कर्तव्य के प्रति और भी ज्यादा जोश आ गया। भले ही मैं उस समय 66 वर्ष का था, फिर भी मैं खुद को बिल्कुल भी उतना बूढ़ा नहीं मानता था। मैं बस अपने कर्तव्य में कड़ी मेहनत करता था। मैं सभाओं के लिए अपनी साइकिल से हर जगह जाता था और बाद में मुझे स्ट्रोक पड़ा भी तो भी मैंने इसकी परवाह नहीं की। मैं बस अपना कर्तव्य निभाने की पूरी कोशिश करना चाहता था, अपने माथे के पसीने और पीड़ा को आशीष के बदले पूँजी के रूप में इस्तेमाल करना चाहता था। लेकिन जब मैंने देखा कि मैं बूढ़ा हो गया हूँ और अब उतने कर्तव्य नहीं निभा सकता, मैं पहले की तरह इधर-उधर नहीं घूम सकता और धीरे-धीरे कुछ भी करने में असमर्थ होता जा रहा हूँ तो मुझे लगा कि आशीष पाने की मेरी उम्मीदें कम होती जा रही हैं। मैं इसे स्वीकारना नहीं चाहता था। भले ही मैंने कुछ नहीं कहा, लेकिन अपने दिल में मैंने परमेश्वर के बारे में शिकायत की; मैं परमेश्वर की संप्रभुता नहीं स्वीकारना चाहता था, इसलिए मैं नकारात्मक, प्रतिरोधी और अतार्किक हो गया। मेरी आस्था का उद्देश्य आशीष पाना था, जो परमेश्वर के साथ लेन-देन करना था। क्या यह परमेश्वर में विश्वास के बारे में एक मसीह-विरोधी का भ्रामक नजरिया नहीं था? मैंने कर्तव्य निर्वहन जैसी सकारात्मक और अद्भुत चीज को तोड़-मरोड़ दिया था। मैं सिर्फ यह जानता था कि अपने कर्तव्य का निर्वहन करने और विभिन्न स्थानों पर यात्रा करने का इस्तेमाल कैसे स्वर्ग के राज्य के आशीष के बदले परमेश्वर के साथ लेन-देन करने के लिए करूँ, और अपने कर्तव्य को अपनी महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ पूरी करने के लिए एक औजार और सौदेबाजी की पूँजी की तरह मानता था। मैं सचमुच आशीष पाने की अपनी इच्छा से अभिभूत हो गया था और सिर्फ स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के बारे में सोच सकता था। मुझे सिर्फ इस बात की परवाह थी कि क्या मुझे आशीष मिलेगा और मेरा परिणाम और गंतव्य क्या होगा। मेरे मन में परमेश्वर के प्रेम का बदला चुकाने या उसके श्रमसाध्य इरादे समझने के बारे में कोई विचार नहीं था। क्या मुझमें अंतरात्मा नाम की कोई चीज भी थी? परमेश्वर ने मुझे जीवन की साँस और कर्तव्य करने का मौका दिया है। यह मेरे लिए पहले से ही उसका महान अनुग्रह है। फिर भी मैंने परमेश्वर के बारे में शिकायत की, हमेशा उसके साथ बहस की, मैं नकारात्मक और प्रतिरोधी रहा। मैं इतना विद्रोही था और अगर परमेश्वर मेरे प्राण भी ले लेता तो भी यह उसकी धार्मिकता होती। इस सबका एहसास होने पर मैंने अपने दिल में परमेश्वर से प्रार्थना की, उससे मार्गदर्शन माँगा कि मैं आशीष के लिए अपनी मंशा त्याग सकूँ और उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर सकूँ। मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंजिल उसकी आयु, वरिष्ठता और उसके द्वारा सही गई पीड़ा की मात्रा के आधार पर निर्धारित नहीं करता और इस आधार पर तो और भी नहीं कि वह कितना दयनीय है, बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि उनके पास सत्य है या नहीं। इसके अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे होश में आने में मदद की। मुझे एहसास हुआ कि जब परमेश्वर हमारा परिणाम और गंतव्य निर्धारित करता है तो इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं होता है कि हमने उसके लिए कितना त्याग किया है या खुद को कितना खपाया है, हमने कितना काम किया है या कितना कष्ट सहा है। यह इस बात पर आधारित है कि हमने सत्य हासिल किया है या नहीं और क्या हमारे स्वभावों में बदलाव आया है या नहीं। बहुत सारे कर्तव्य निभाने का मतलब यह नहीं है कि हमारे पास सत्य है या हमारे स्वभाव में बदलाव आ गया है। चाहे मैं कितने भी कर्तव्य करूँ, मुख्य बात यह है कि क्या मैं सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर हूँ। पहले मैं बहुत सारे कर्तव्य निभाता था और कर्तव्य के लिए विभिन्न स्थानों पर जाता था, लेकिन मैंने कभी सत्य की खोज नहीं की। मैं एक अच्छे गंतव्य के बदले में अपने सतही प्रयासों का इस्तेमाल करना चाहता था। मैंने परमेश्वर के प्रति अपने भीतर मौजूद लेन-देन वाली और विरोधी मानसिकता को नहीं देखा था। आखिरकार जब आशीष पाने की मेरी इच्छा चकनाचूर हो गई तो मैंने परमेश्वर से बहस की और उसके खिलाफ हो गया। सच में अगर मैं सत्य का अनुसरण किए बिना सिर्फ इधर-उधर भागता रहता और खुद को खपाता रहता तो मैं और ज्यादा स्वार्थी और अहंकारी बन जाता और कभी भी स्वभावगत बदलाव हासिल नहीं कर पाता। मैं अपने द्वारा किए गए काम के बारे में परमेश्वर से तर्क-वितर्क और बहस करता रहता और ज्यादा से ज्यादा बुरा बनता जाता। यह पौलुस की तरह ही है—उसने बहुत काम किया और उसने महान काम किया, लेकिन उसने वह काम सिर्फ धार्मिकता के मुकुट के बदले में किया। यह हमेशा परमेश्वर के साथ एक लेन-देन था। उसने मृत्यु की कगार पर भी पश्चात्ताप नहीं किया और अंत में उसे परमेश्वर ने दंडित किया। दूसरी ओर पतरस ने बहुत काम नहीं किया, लेकिन अपनी आस्था में उसने पूरे दिल से सत्य का अनुसरण किया और सभी चीजों में परमेश्वर का इरादा खोजा और उसके प्रति समर्पित होने की कोशिश की। उसकी कोई शर्त नहीं थी और उसने इस बात पर विचार नहीं किया कि उसे आशीष मिलेगा या नहीं। अंत में उसने परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम प्राप्त किया, मृत्युपर्यंत परमेश्वर के प्रति समर्पण प्राप्त किया, परमेश्वर की स्वीकृति पाई और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया। पौलुस और पतरस दोनों ही विश्वासी थे, लेकिन अनुसरण करते हुए उनके उद्देश्य और दृष्टिकोण अलग थे और इसीलिए उनके परिणाम भी अलग थे। इससे हम देख सकते हैं कि परमेश्वर धार्मिक है और जब हम सत्य का अनुसरण करते हैं और स्वभावगत परिवर्तन लाते हैं, तभी हम परमेश्वर के इरादे के अनुरूप हो सकते हैं। मेरे अनुसरण के पीछे का दृष्टिकोण और जिस रास्ते पर मैं चल रहा था, वे पौलुस की तरह ही बेतुके और गलत थे और मेरा परिणाम निश्चित रूप से उसके जैसा ही होता। शुक्र है कि परमेश्वर के वचनों ने मेरा प्रबोधन और मार्गदर्शन किया कि मैं उसका इरादा समझूँ और अपनी आस्था के प्रति कैसा दृष्टिकोण रखूँ। मैंने परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना और एक विवेकशील सृजित प्राणी बनना भी सीखा। यह परमेश्वर का प्रेम है। परमेश्वर का इरादा समझने के बाद मेरी दशा में बहुत सुधार हुआ और मैं उसका बहुत आभारी था। इसके बाद जब भाई-बहन सभा करने आते थे तो मैं उनका सत्कार करता था। जब वे नहीं आते थे तो मैं शांत होकर परमेश्वर के वचन पढ़ता था और अपनी दशा के अनुसार सत्य खोजता था।

मैंने एक दिन परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के जन्म से लेकर वर्तमान तक के दशकों के दौरान केवल उसके लिए कीमत ही नहीं चुकाता। परमेश्वर के अनुसार, तुम अनगिनत बार इस दुनिया में आए हो, और अनगिनत बार तुम्हारा पुनर्जन्म हुआ है। इसका प्रभारी कौन है? परमेश्वर इसका प्रभारी है। तुम्हारे पास इन चीजों को जानने का कोई तरीका नहीं है। हर बार जब तुम इस दुनिया में आते हो, परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से तुम्हारे लिए व्यवस्थाएं करता है : वह व्यवस्था करता है कि तुम कितने साल जियोगे, किस तरह के परिवार में पैदा होगे, कब तुम अपना घर और करियर बनाओगे, और साथ ही, तुम इस दुनिया में क्या करोगे और कैसे अपनी आजीविका चलाओगे। परमेश्वर तुम्हारे लिए आजीविका चलाने के तरीके की व्यवस्था करता है, ताकि तुम इस जीवन में अपना मिशन सुचारु रूप से पूरा कर सको। जहाँ तक यह बात है कि तुम अपने अगले पुनर्जन्म में क्या करोगे, तुम्हारे लिए उस जीवन की व्यवस्था परमेश्वर करता है और ऐसा इस अनुसार करता है कि तुम्हारे पास क्या होना चाहिए और तुम्हें क्या दिया जाना चाहिए...। परमेश्वर तुम्हारे लिए ये व्यवस्थाएँ कितनी ही बार कर चुका है और आखिरकार तुम अंत के दिनों के युग में अपने वर्तमान परिवार में पैदा हुए हो। परमेश्वर ने तुम्हारे लिए एक ऐसे परिवेश की व्यवस्था की कि तुम उसमें विश्वास करो; उसने तुम्हें अपनी वाणी सुनने और अपने सामने वापस आने की अनुमति दी, ताकि तुम उसका अनुसरण कर सको और उसके घर में कर्तव्य निभा सको। परमेश्वर के ऐसे मार्गदर्शन की बदौलत ही तुम आज तक जीवित रहे। तुम नहीं जानते कि तुम कितनी बार इस संसार में आए हो, न ही तुम यह जानते हो कि कितनी बार तुम्हारा स्वरूप बदला है, तुम कितने परिवारों से होकर गुजरे हो, तुम कितने युगों और कितने वंशों को जी चुके हो—लेकिन इन सबके दौरान हर पल परमेश्वर का हाथ तुम्हें सहारा देता रहा है और वह हमेशा तुम पर निगाह रखता रहा है। एक व्यक्ति की खातिर परमेश्वर कितना अधिक प्रयास करता है! कुछ लोग कहते हैं, ‘मैं साठ साल का हूँ। साठ साल से परमेश्वर मुझ पर निगाह रख रहा है, मेरी रक्षा और मेरा मार्गदर्शन कर रहा है। बूढ़ा होने पर अगर मैं कोई कर्तव्य नहीं निभा पाया और कुछ करने लायक नहीं रहा—क्या परमेश्वर तब भी मेरी परवाह करेगा?’ क्या यह कहना मूर्खता नहीं है? ऐसा नहीं है कि परमेश्वर बस एक जीवनकाल के लिए एक व्यक्ति पर नजर रखता और उसकी रक्षा करता और उसके भाग्य पर उसकी संप्रभुता होती है। अगर यह केवल एक जीवनकाल की, एक ही जीवन की बात होती तो इससे यह प्रदर्शित नहीं हो पाता कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और सभी चीजों पर उसकी संप्रभुता है। किसी के लिए प्रयास करने और कीमत चुकाने में, परमेश्वर केवल यह व्यवस्था नहीं करता है कि वह इस जीवन में क्या करेगा—वह उसके लिए अनगिनत जीवनकालों की व्यवस्था करता है। परमेश्वर हर उस आत्मा की पूरी ज़िम्मेदारी लेता है जिसका पुनर्जन्म होता है। वह अपने दिल से कार्य करता है, अपने जीवन की कीमत चुकाता है, हर व्यक्ति का मार्गदर्शन करता है और उनमें से हरेक के जीवन की व्यवस्था करता है। यह देखते हुए कि परमेश्वर मनुष्य की खातिर इतना प्रयास करता है और इतनी कीमत चुकाता है और मनुष्य को ये सभी सत्य और यह जीवन प्रदान करता है, यदि इन अंतिम दिनों में लोग सृजित प्राणियों का कर्तव्य नहीं निभाते हैं और सृष्टिकर्ता के सामने नहीं लौटते हैं—यदि चाहे वे कितने भी जीवन और पीढ़ियों से गुज़रे हों, वे अंततः अपने कर्तव्यों को अच्छे ढंग से निभाने और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने में असफल रहते हैं—तो क्या परमेश्वर के प्रति उनका ऋण बहुत ज़्यादा नहीं हो जाएगा? क्या वे उन सारी कीमतों के अयोग्य नहीं होंगे जो परमेश्वर ने चुकाई हैं? उनमें जमीर का इतना अभाव होगा कि वे इंसान कहलाने लायक नहीं रहेंगे, क्योंकि परमेश्वर के प्रति उनका ऋण बहुत बड़ा हो जाएगा। ... परमेश्वर मनुष्य पर जो अनुग्रह, प्रेम और दया दिखाता है वह केवल एक रवैया भर नहीं है—वे वास्तव में तथ्य भी हैं। वह तथ्य क्या है? वह यह है कि परमेश्वर अपने वचन तुम्हारे अंदर डालता है, तुम्हें प्रबुद्ध करता है, तुम्हें यह देखने देता है कि उसके बारे में क्या मनोहर है और वास्तव में इस दुनिया का सार क्या है, तुम्हें अत्यंत मानसिक स्पष्टता देता है और अपने वचन और सत्य समझने देता है। इस तरह, अनजाने ही, तुम सत्य प्राप्त कर लेते हो। परमेश्वर बहुत वास्तविक तरीके से तुम पर बहुत सारा काम करता है, तुम्हें सत्य प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। जब तुम सत्य प्राप्त कर लेते हो, जब तुम सबसे अनमोल चीज, अर्थात् अनंत जीवन प्राप्त कर लेते हो, तब परमेश्वर के इरादे पूरे होते हैं। जब परमेश्वर देखता है कि लोग सत्य का अनुसरण कर रहे हैं और उसके साथ सहयोग करने के लिए तैयार हैं, तो वह खुश और संतुष्ट होता है। वह तब एक निश्चित रवैया रखता है और जब उसके पास यह रवैया होता है तो वह कार्रवाई करता है और मनुष्य का अनुमोदन करता है और उसे आशीष देता है। वह कहता है, ‘मैं तुम्हें इनाम दूँगा। ये वे आशीष हैं जिनके तुम पात्र हो।’ और तब तुम सत्य और जीवन प्राप्त कर लोगे। जब तुम्हें सृष्टिकर्ता का ज्ञान होता है और तुम उससे प्रशंसा प्राप्त कर लेते हो, तब भी क्या तुम अपने दिल में खालीपन महसूस करोगे? तुम नहीं करोगे। तुम संतुष्ट महसूस करोगे और तुममें आनंद की भावना होगी। क्या यह एक मूल्यवान जीवन जीना नहीं है? यह सबसे मूल्यवान और सार्थक जीवन है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य प्राप्त करने के लिए कीमत चुकाना बहुत महत्वपूर्ण है)। परमेश्वर के वचन मेरे लिए अविश्वसनीय रूप से सांत्वना देने वाले और मार्मिक थे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरी उम्र कितनी है या मेरी सेहत कैसी है; जब तक मैं सत्य से प्रेम और उसका अनुसरण करता हूँ, परमेश्वर मेरा तिरस्कार नहीं करेगा। दुर्भाग्य से मैंने परमेश्वर के इरादे को गलत समझा था। मैं सोचता था कि चूँकि मैं बूढ़ा और बेकार हूँ, इसलिए मैं अब उतने कर्तव्य नहीं निभा सकता। मैं सोचता था कि एक दिन मैं गंभीर रूप से बीमार पड़ सकता हूँ और अचानक मर सकता हूँ और तब मेरे उद्धार की कोई आशा नहीं रहेगी। मुझे लगता था कि परमेश्वर में विश्वास करने का कोई मतलब नहीं है और मैं आगे बढ़ने के लिए प्रयास नहीं करना चाहता था। अपने गलत दृष्टिकोण से प्रभावित होकर मैं परमेश्वर के इरादे को गलत समझ रहा था। मैं एक कमजोर और नकारात्मक दशा में फँस गया था और शैतान का खिलौना बन गया था। पहले मुझे नहीं पता था कि एक सृजित प्राणी के रूप में मुझे परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए और उसे संतुष्ट करना चाहिए। उस समझ के बिना मैं सिर्फ अनुग्रह और आशीष पाने के बदले में अपनी आस्था बनाए रखता था—मैं परमेश्वर के साथ सौदेबाजी कर रहा था। अब मैं देख सकता था कि ऐसा अनुसरण करते हुए भले ही मैं सौ साल और जी लूँ, इसका कोई अर्थ या मूल्य नहीं होगा। जैसे जब अय्यूब ने उन सभी आपदाओं का सामना किया था तो उसने कभी नहीं सोचा था कि उसने क्या पाया या क्या खोया। जब उसके शरीर पर फोड़े-फुंसियाँ निकलीं और जीवन असहनीय हो गया तो भी उसने कभी परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं की। उसे परमेश्वर में सच्चा विश्वास था, उसने उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण किया और उसके नाम की स्तुति की। उसने शैतान के सामने परमेश्वर के लिए जोरदार गवाही दी और आखिरकार उसे परमेश्वर ने आशीष दिया। पतरस भी था, जिसने जीवनभर परमेश्वर से प्रेम करने और उसे संतुष्ट करने का प्रयास किया और अपने वास्तविक जीवन में प्रभु के वचनों का अभ्यास करने पर ध्यान केंद्रित किया। आखिरकार उसे परमेश्वर के लिए सूली पर उल्टा लटका दिया गया और ऐसा करके उसने परमेश्वर के प्रति अपना सर्वोच्च प्रेम और परम समर्पण दिखाया, एक अर्थपूर्ण जीवन जिया और परमेश्वर की स्वीकृति पाई। अब मैं समझ गया था कि एक विश्वासी के रूप में परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और हर चीज में परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास करना, एक सृजित प्राणी के कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाना, अपने कर्तव्य पूरे करने के दौरान सत्य को समझना और पाना और परमेश्वर के प्रति समर्पण और प्रेम करना एक खोखला जीवन न जीने और एक सार्थक जीवन जीने का तरीका है। परमेश्वर की स्वीकृति पाने का यही एकमात्र तरीका है। हमेशा परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश करना और स्वर्ग के राज्य के आशीष के बदले में कड़ी मेहनत करना और खुद को खपाना घिनौना व्यवहार है और इसका नतीजा एक ऐसा जीवन है जिसका कोई अर्थ या मूल्य नहीं है। मैं इस बारे में सोचता नहीं रह सकता था कि मुझे भविष्य में आशीष मिलेगा या नहीं। मुझे बस अपने बचे हुए हर दिन सत्य का अनुसरण करना चाहिए, परमेश्वर पर भरोसा करके अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाने की भरसक कोशिश करनी चाहिए और अपने स्वभाव में बदलाव लाना चाहिए। भले ही एक दिन मैं गंभीर रूप से बीमार हो जाऊँ और मौत का सामना करूँ और अपना कर्तव्य करने में असमर्थ हो जाऊँ, फिर भी मैं परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करूँगा। अब मुझे इस जीवनकाल में सर्वश्रेष्ठ तरीके से अपना कर्तव्य निभाने और अपनी जिम्मेदारी पूरी करने पर ध्यान देना चाहिए। मेरा परिणाम चाहे जो भी हो, चाहे जीवन हो या मृत्यु, यह परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था पर निर्भर है। एक सृजित प्राणी के रूप में मुझे इस पर विचार नहीं करना चाहिए। जब मैंने इस बारे में इस तरह सोचा तो मुझे बहुत सुकून मिला।

उसके बाद मैंने नियमित रूप से परमेश्वर के वचन पढ़े और हर दिन भजन सुने। जब मुझे एहसास होता था कि मैं भ्रष्टता प्रकट करता हूँ तो मैं प्रार्थना करता था, सत्य खोजता था, अपने शैतानी स्वभावों की पहचान करता था और भाई-बहनों के साथ खोज और संगति में खुलकर बात करता था। मैंने धीरे-धीरे इन सब से थोड़ा लाभ उठाया। आम तौर पर जब मेरे लिए कोई कर्तव्य होता था तो मैं सक्रियता से जुट जाता था और जितना संभव हो सके अपने आस-पास के लोगों में सुसमाचार का प्रचार करता था। जब मैंने भाई-बहनों को अनुभवात्मक गवाही लेख लिखते देखा तो मैंने भी परमेश्वर की गवाही देने के लिए अपने अनुभवों को लेखों में लिखने का अभ्यास किया। यह सब करने से मुझे संतुष्टि और शांति का एहसास हुआ।

एक दिन मैंने परमेश्वर के वचनों का यह भजन सुना : “एक सृजित प्राणी को परमेश्वर के आयोजन की दया पर होना चाहिए।” मैं इससे बहुत प्रभावित हुआ। पतरस के अनुभव का उल्लेख करने वाला दूसरा अंश मेरे लिए विशेष रूप से मार्मिक था। परमेश्वर के वचन कहते हैं : “अतीत में, पतरस को परमेश्वर के लिए क्रूस पर उलटा लटका दिया गया था; परंतु तुम्हें इन अंतिम दिनों में परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए, और उसके लिए अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर देनी चाहिए। कोई सृजित प्राणी परमेश्वर के लिए क्या कर सकता है? तुम्हें पहले से ही अपने आपको परमेश्वर को सौंप देना चाहिए, ताकि वह अपनी इच्छा के अनुसार तुम्हारी योजना बना सके। जब तक इससे परमेश्वर खुश और प्रसन्न होता हो, तो उसे तुम्हारे साथ जो चाहे करने दो। मनुष्य को शिकायत के शब्द बोलने का क्या अधिकार है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों के खुलासे, अध्याय 41)। मैंने इसे बार-बार सुना और मेरा मन ही नहीं भरा। इसकी हर एक पंक्ति मेरे लिए प्रेरणादायक और मार्मिक थी और मैं अपने आँसू रोक नहीं पाया। मैं एक सृजित प्राणी था जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया था और इतने बुढ़ापे तक जीवित था, फिर भी मेरे पास परमेश्वर का अनुसरण करने और उसके कार्य का अनुभव करने, अपना कर्तव्य निभाने और परमेश्वर के लिए गवाही देने का मौका था। क्या शानदार आशीष है! अब परमेश्वर के वचन खाने और पीने से मैं अपनी भ्रष्टता समझ गया हूँ और मैंने आशीष के लिए अपने स्वार्थी और नीच इरादों को बदल दिया है। यह परमेश्वर का अनुग्रह है! मैं अंत तक परमेश्वर की स्तुति करूँगा, भले ही वह मुझे कुछ भी न दे। मेरा जीवन फिर भी सार्थक होगा! मैं एक ऐसा सृजित प्राणी बनने का प्रयास करूँगा जो विवेकशील हो और परमेश्वर के प्रति समर्पित हो। चाहे मेरा स्वास्थ्य कैसा भी हो या मेरा परिणाम कुछ भी हो, मैं परमेश्वर को उसकी इच्छानुसार आयोजन करने देने के लिए तैयार हूँ।

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