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अब जाकर मैं समझी हूँ कि जीवन प्रवेश क्या होता है

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युलु, पुर्तगाल

2017 के आरंभ में, मैं कलीसिया में अगुवा के तौर पर काम कर रही थी। कुछ समय के प्रशिक्षण के बाद, कुछ भा‌ई-बहनों ने मेरे बारे में राय दी: उन्होंने कहा कि मुझे उनके हालातों और मुश्किलों की बहुत कम समझ है, और मैंने कोई वास्तविक कार्य नहीं किया है। इस भूल को सुधारने के लिये, मैंने अनुवर्ती कार्रवाई की तैयारी की ताकि कलीसिया के सभी भाई-बहनों की स्थितियों को समझ सकूँ। इस काम को करने के लिये, मैं रोज़ाना कलीसिया के चक्कर लगाती, भाई-बहनों के साथ सहभागिता में व्यस्त रहती, उन्हें सहायता और सहयोग देती। जब उनकी स्थितियों में थोड़ा-बहुत सुधार आया और उनकी मुश्किलें दूर हुईं, तो मैं इस नतीजे पर पहुँची कि मैं थोड़ा-बहुत वास्तविक काम करने के योग्य तो हूँ। इस बात से मुझे काफ़ी संतोष मिला। मुझे तब बड़ा आश्चर्य हुआ जब एक दिन सिंचन दल की अगुवा ने मुझसे कहा, "आज की सभा में, हमारी स्थिति को समझने के बाद, ऊपरी-स्तर की अगुवा का कहना था कि हम लोग हाल के दिनों में सिर्फ़ काम में व्यस्त रहे हैं, जीवन प्रवेश में नहीं...।" मुझे यह सुनकर बड़ा झटका लगा, मैंने सोचा, "मुझे तो लगा था कि सभा के दौरान भाई-बहनों ने अपनी स्थिति बता दी थी और अपने बारे में कुछ जानकारी हासिल कर ली थी, तो ऐसा कैसे कहा जा सकता है कि उनमें कोई जीवन प्रवेश नहीं है? अगर उनमें से किसी को भी जीवन प्रवेश प्राप्त नहीं हुआ है, और उनके काम के लिये मैं ज़िम्मेदार हूँ, तो क्या इसका मतलब यह नहीं हुआ कि मुझे भी जीवन प्रवेश प्राप्त नहीं हुआ है?" मेरे मन में संघर्ष चलने लगा, और मैं अपने वरिष्ठों की सलाह को स्वीकर नहीं कर पाई।

कुछ दिनों के पश्चात, एक सभा के बाद बहन ली मेरे पास आई और बड़े मायूसी भरे लहजे में मुझ से बोली, "आज आपकी सहभागिता सुनकर, मुझे आनंद नहीं महसूस हुआ। आपने अपनी बात में कहा कि ऊपरी-स्तर के अगुवाओं का कहना था कि सिंचन दल के भाई-बहनों को जीवन प्रवेश हासिल नहीं हुआ—तो इस बारे में आपको कैसे पता? क्या आपने हाल ही में अपने जीवन प्रवेश पर कोई ध्यान दिया है? आपको थोड़े समय आत्म-चिंतन करना चाहिये।" उस बहन के शब्द ऐसे थे जैसे किसी ने मेरे ऊपर बर्फ़ीले पानी की बाल्टी उड़ेल दी हो। इसे स्वीकार करने में स्वयं को नाकाम पाते हुए मैंने सोचा, "मैं हर रोज़ भाई-बहनों के साथ बैठकें और संगति करती हूँ, उनकी स्थिति चाहे जो भी हो, उन्हें अपनी सहायता और सहयोग दे पाती हूँ। परमेश्वर के वचनों को बताते समय, मैं उनके साथ अपने निजी अनुभवों को भी जोड़ देती हूँ और उनके बारे में बात करती हूँ, तो आप यह कैसे कह सकती हैं कि मुझे जीवन प्रवेश हासिल नहीं हुआ है? क्या आप वाकई पहचान सकती हैं कि मुझ में जीवन प्रवेश है या नहीं? आपको मुझसे कुछ ज़्यादा ही अपेक्षाएँ हैं। मेरी राय में, जब आप सहभागिता करती हैं, तो आप में समझ की उतनी भी गहराई नहीं होती है जितनी मुझ में है; अगर मैं आपकी अपेक्षाओं के हिसाब से चलूँ, तो मेरी समझ में नहीं आता कि मैं कैसे सहभागिता करूँगी।" उस बहन की बातें मेरे दिमाग में घूमती रहीं। मैं उन पर जितना सोचती, मेरा गुस्सा उतना ही बढ़ता जाता। मैं अब बहन ली की तरफ़ नज़र उठाकर भी नहीं देखना चाहती थी। दूसरे दिन सुबह, मेरी साथी, बहन वांग, ने मुझसे कहा, "कल शाम को बहन झांग ने भी मुझसे पूछा था कि क्या हमने कुछ समय से जीवन प्रवेश हासिल करने पर ध्यान न दे कर सिर्फ़ काम करने पर ही ध्यान दिया है।" यह सुनकर, मैं कुछ ज़्यादा ही परेशान हो गई। मैंने सोचा, "बहन झांग भी वही बात कैसे कह सकती है? मैं अक्सर उसके साथ सभा करती हूँ। मैं अपनी सहभागिता में हमेशा अपने अनुभवों को जोड़ती हूँ, और ख़ुद बहन झांग ने मुझे ऐसा कहते हुए सुना है—तो वह कैसे कह सकती है कि मुझे कोई जीवन प्रवेश हासिल नहीं हुआ है? अब दो बहनें एक ही बात कह चुकी हैं; कहीं ऐसा तो नहीं कि मुझे वास्तव में कोई जीवन प्रवेश हासिल नहीं हुआ है? अगर ऐसा है, तो मैं भाई-बहनों का सिंचन कैसे कर सकती हूँ? क्या मैं इस कर्तव्य को करने के योग्य नहीं हूँ?" मेरी हालत पिचके हुए गुब्बारे जैसी हो गई थी; मेरा सारा जोश ख़त्म हो चुका था। अपनी पीड़ा के बीच, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर! मेरा मन इस वक्त बहुत दुःखी है। मुझे नहीं पता कि मैं इस परिवेश को कैसे सहूँ, न यह जानती हूँ कि इससे क्या सबक लूँ। हे परमेश्वर! मैं आपसे याचना करती हूँ कि आप मुझे राह दिखाएँ; मुझे शक्ति दें कि मैं आपकी इच्छा को समझ सकूँ...।"

प्रार्थना के बाद, मुझे सहभागिता में एक अंश का ख़्याल आया, "परमेश्वर की इच्छा बहुत ही सरल है। यह हर परिवेश का, हर तरह के भाई-बहनों का, और हर तरह की परेशानियों का इस्तेमाल तुम्हारा इम्तहान लेने, तुम्हें दुर्गम अवरोधों से गुज़ारने, तुम्हें शुद्धिकरण से गुज़ारने और फिर तुम्हें स्वयं को समझाने के लिए करती है। अंतत:, तुम सचमुच अपने आपको जान जाओगे और देखोगे कि तुम कुछ भी नहीं हो, तब तुम सच्चाई को प्रसन्नता से स्वीकार लोगे, निपटे जाने और काट-छाँट को स्वीकार लोगे, और अपनी आस्था में सही मार्ग में प्रवेश करने के लिये परमेश्वर के कार्य का आज्ञापालन कर लोगे। यह परमेश्वर की इच्छा है। परमेश्वर की इच्छा यह नहीं है कि वह परिवेश का इस्तेमाल करके तुम्हें गिरा दे ताकि तुम उठ न सको और मर जाओ। ऐसा कुछ नहीं है। यह इसलिये है ताकि तुम अपने आपको समझकर शीघ्रता से खुद को पीछे खींच लो और सत्य का अनुसरण करो। ऐसा इसलिये है क्योंकि लोग केवल हताशा की स्थिति में ही परमेश्वर पर आश्रित होते हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं।... क्या तुम्हें तैयार करने और तुम्हारी काट-छाँट करने का मकसद तुम्हें थोड़े समय के लिये आराम देना है या तुम्हें इस्तेमाल करने के लिये और अधिक उपयुक्त बनाना है? तुम्हारे अंदर जो सत्य और वास्तविकता का अभाव है, उसे उजागर करने का उद्देश्य तुम्हारा न्याय या तिरस्कार करना है, या तुम्हें खड़ा करना और तुम्हें सत्य से लैस करना और तुमसे सत्य का अनुसरण करवाना है? अगर तुम इस बात पर निरंतर विचार करोगे, तो क्या तुम परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझोगे?" (जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति (VIII) में "प्रश्न और उत्तर")। इस धर्मोपदेश पर विचार करने के बाद, अचानक मुझे एहसास हुआ कि जिन अप्रिय लोगों, घटनाओं और बातों से हाल ही में एक-एक करके मेरा सामना हुआ है, वे बातें दरअसल परमेश्वर द्वारा मेरी काट-छाँट और मेरे साथ किये गये व्यवहार से निकल कर आईं थीं; वे परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव थीं, जो मुझ पर प्रकट हुईं, उनमें परमेश्वर के अच्छे इरादे थे। उनकी इच्छा मुझे नकारात्मकता में ले जाने की नहीं थी, न ही मुझे सही और गलत पर बहस करने की स्थिति में रखना थी; बल्कि उस इच्छा का लक्ष्य मुझे आत्म-चिंतन में परमेश्वर के सामने लाना था, ताकि मैं अपने आपको जान सकूँ, सत्य के अनुसरण पर ध्यान दे सकूँ, और अपने स्वभाव को रूपांतरित करने का प्रयास कर सकूँ। लेकिन, जब मेरी काट-छाँट हुई और मुझ से निपटा गया, तो मैंने आत्म-चिंतन करने से या सत्य की खोज से इनकार कर दिया। मेरा दिल संघर्ष और अवज्ञा से भर गया था। मैंने तो यहाँ तक सोच लिया था कि इस तरह के परिवेश में ढकेले जाने का उद्देश्य यह उजागर करने के लिए था कि मैं इस तरह का कर्तव्य निभाने के काबिल नहीं हूँ, और इसलिए, मैं एक नकारात्मक निष्क्रियता की स्थिति में जी रही थी। मेरे दिमाग में सचमुच कोई तर्क नहीं घुस रहा था! मैंने इस बारे में सोचा कि कैसे पिछले कुछ दिनों में, कुछ बहनों ने मुझे कहा था कि मैंने जीवन प्रवेश हासिल नहीं किया है, और मुझे यह एहसास हुआ कि परमेश्वर उनका इस्तेमाल करके, मुझे यह याद दिला रहे हैं कि मैं शांत हो जाऊँ और पूरी लगन से अपने आप पर चिंतन करके यह पता लगाऊँ कि मेरी समस्याएँ क्या थीं, बहनों ने ऐसा क्यों कहा कि मैंने जीवन प्रवेश हासिल नहीं किया है, और यह जानूँ कि जीवन प्रवेश के आखिर मायने क्या हैं?

बाद में, सहभागिता में मैंने निम्न बातें पढ़ी "जीवन में प्रवेश करना और जीवन में प्रवेश करने का मार्ग क्या है": "जीवन में प्रवेश करने का अर्थ है सत्य में और परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करना। इसका अर्थ है लोगों की भ्रष्टता के सत्य और उनकी भ्रष्टता के सार को समझना, फिर सत्य को और परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने के योग्य बनना, उन्हें अपना जीवन बना लेना। केवल इस प्रकार के अनुभव से संबंधित कोई चीज़ ही जीवन में प्रवेश है।" "जीवन में प्रवेश का अर्थ है सत्य में प्रवेश। सत्य में प्रवेश, लोगों के परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने और सत्य की समझ तक पहुँचने पर आधारित होता है।" "जब हमें परमेश्वर का सच्चा ज्ञान होता है, तो यह इस बात को सिद्ध करता है कि परमेश्वर के वचनों में सचमुच हमारा प्रवेश हो गया है। जब हमें अपने स्वयं के भ्रष्ट सार का, और अपनी स्वयं की भ्रष्टता के सत्य का सच्चा ज्ञान होता है, तो इससे भी साबित होता है कि परमेश्वर के वचनों में सचमुच हमारा प्रवेश हो गया है। जब हम सचमुच परमेश्वर के कार्य के प्रति, उनकी वास्तविकता के प्रति, और उनके सार के प्रति आज्ञाकारी होते हैं, जब हम सचमुच उनकी अपेक्षाओं को संतुष्ट करते हैं, तो इससे भी साबित होता है कि उनके वचनों में सचमुच हमारा प्रवेश हो गया है। अगर परमेश्वर के वचनों के आधार पर सच्चा प्रवेश हुआ है, जो कि सत्य में सच्चा प्रवेश है, और जो परिणाम प्राप्त करने चाहिए, वे प्राप्त कर लिये गए हैं, तो इसका अर्थ यह हुआ कि हम जीवन में प्रवेश की वास्तविकता को धारण करते हैं" (जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति (II))। इन वचनों से मुझे अचानक एक अंतर्दृष्टि प्राप्त हुई: इन बातों से एक बात यह स्पष्ट हुई कि जीवन प्रवेश का अर्थ लोगों द्वारा परमेश्वर के वचनों का अनुभव करना, सत्य की समझ को हासिल करना, और सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करना है। दूसरे शब्दों में, इसका अर्थ है कि परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते समय, जब तक उन्हें परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य का, और साथ ही अपनी स्वयं की भ्रष्ट प्रकृति और सार की वास्तविक समझ और अपनी भ्रष्टता के असली चेहरे का ज्ञान न हो जाए, तब तक वे उसके वचनों को अभ्यास में ला सकते थे और धीरे-धीरे सत्य को समझ सकते थे। इसका अर्थ है कि वे अपने आप से घृणा कर सकते थे, अपनी त्रुटिपूर्ण मंशाओं और शैतानी प्रकृति से मुँह मोड़ सकते थे, सत्य को कार्यान्वित कर सकते थे, परमेश्वर के प्रति समर्पित हो सकते थे, उनकी इच्छा और अपेक्षाओं के अनुसार उन्हें संतुष्ट कर सकते थे। केवल इसी तरीके से उन लोगों को जीवन प्रवेश को हासिल करने वालों में गिना जा सकता था। अपनी तुलना इन स्थितियों और प्रकाशनों से करके, मैं अपनी हालिया स्थिति पर आत्म-चिंतन करने से अपने आपको रोक नहीं पाई: जब से भाई-बहनों ने मेरे बारे में यह राय व्यक्त की है कि मैंने न तो अपने दायित्व का वहन किया, न ही उनकी समस्याओं को सुलझाने की ओर ध्यान दिया है, तब से, उन्हें मेरे बारे में ऐसी बातें कहने से रोकने के लिये, मैंने न केवल भाई-बहनों की स्थितियों पर अनुवर्ती कार्रवाई करने में अपने आप को व्यस्त कर लिया था, बल्कि आध्यात्मिक प्रार्थनाओं के लिए रखे समय का उपयोग भी मैं परमेश्वर के वचनों के उन अंशों को खोजने में करने लगी थी, जो उनकी समस्याओं का समाधान कर सकते थे। शायद ही कभी, मैंने शांति से बैठकर परमेश्वर के वचनों पर चिंतन किया, या उन कथनों में सत्य और परमेश्वर की इच्छा की खोज की थी। अपने कर्तव्यों को पूरा करने की धुन में, मैंने ख़ुद अपनी सोच या विचारों पर कोई ध्यान नहीं दिया, न ही मैं यह पता लगाने के लिये आत्म-चिंतन कर पाई कि मैंने कौन-से भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किए थे और मुझे किन सत्यों में प्रवेश करने की आवश्यकता थी, इस बात पर तो मैं बिल्कुल ही ध्यान नहीं दे पाई कि जिस मार्ग पर मैं चल रही हूँ वह सही है या गलत। सभाओं में हर बार जब भी मैंने उन लोगों के साथ सहभागिता की, तो मैंने सिर्फ़ परमेश्वर के वचनों को ही भाई-बहनों तक पहुँचाया ताकि वे सत्य का अभ्यास कर सकें। मगर मैंने ख़ुद इन अवसरों का उपयोग आत्म-चिंतन करने के लिए या उनके साथ परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करने के लिए नहीं लिया। कभी-कभी, जब मेरा भ्रष्ट स्वभाव थोड़ा-बहुत प्रकट हो जाता, तो मैं केवल परमेश्वर के वचनों से उसका मिलान करती या किसी ऐसे अंश को ढूँढ़ती जिससे मुझे उत्साह या दिलासा मिले। इससे मेरे बेचैन दिल को संतुष्टि मिलती, लेकिन मैंने अपने भ्रष्ट सार को जानने के लिए शायद ही परमेश्वर के कथनों के अनुसार अपना आत्म-चिंतन या विश्लेषण किया। इसका नतीजा यह हुआ कि मैंने अपने आप से घृणा नहीं की, और इसके बाद, सत्य के अभ्यास पर ध्यान केन्द्रित नहीं किया। आगे ऐसे और परिवेशों का सामना करते हुए, मैंने फिर से वही भ्रष्टता प्रकट की। मुझमें इन तमाम साफ़ संकेतों के चलते, मैं कैसे कह सकती थी कि मैंने जीवन प्रवेश प्राप्त कर लिया है? पद-प्रतिष्ठा की ख़ातिर, काम के प्रति अपने आपको समर्पित करने के लिये, मैं जो कुछ भी कर सकती थी, मैंने सब किया, लेकिन फिर भी आम तौर पर परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते समय, मैंने उन पर चिंतन करने को महत्व नहीं दिया। मैंने मात्र सैद्धांतिक ज्ञान से स्वयं को संतुष्ट किया, लेकिन मैंने न तो सच्चे अर्थों में उनकी इच्छा और अपेक्षाओं को समझा, न ही इस बात को समझा कि वह अपने बोले हुए वचनों से क्या परिणाम हासिल करना चाहते हैं। मैंने सचमुच ही सत्य को नहीं समझा था, परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने की गवाही तो मेरे पास बिल्कुल नहीं थी। मुझे वाकई में कोई वास्तविक अनुभव नहीं था, और मैंने कोई जीवन प्रवेश हासिल नहीं किया था! जब मैंने इस बात पर विचार किया कि हाल ही में किस तरह ऊपरी-स्तर के अगुवाओं और भाई-बहनों ने मेरी काट-छाँट की थी और वे लोग मेरे साथ किस तरह निपटे थे, तो मैंने जाना कि मैं विरोधाभासी, अवज्ञाकारी, और बहस करने वाली प्रकट हुई थी। अगर मैंने सचमुच जीवन प्रवेश पा लिया होता, तो अपनी काट-छाँट और निपटे जाने पर, मैं सत्य की खोज करने की स्थिति में होती, और आत्म-चिंतन करने में समर्थ होती, और अपने आप को नकारात्मकता और ज़िद्दीपन में जीते हुए नहीं पाती। अब जाकर मुझे पूर्णतः यकीन हुआ कि मैंने वाकई जीवन प्रवेश प्राप्त नहीं किया था। भाई-बहनों के साथ अपनी सहभागिता में, मैं वचनों और सिद्धांतों के बारे में केवल बड़ी-बड़ी बातें करती थी। जैसे कि कहावत है, "यथा राजा, तथा प्रजा।" चूँकि जब मैंने ही जीवन प्रवेश हासिल नहीं किया, तो मैं अपने भाई-बहनों को परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में कैसे ला सकती थी? क्या मेरे काम का यह तरीका भाई-बहनों को फँसाने वाला और उन्हें तबाह करने वाला नहीं था? इस एहसास ने मुझे डरा दिय़ा। ख़ुशकिस्मती यह रही कि परमेश्वर ने उन बहनों के ज़रिये मुझे सही वक्त पर आत्म-चिंतन की याद दिलाई ताकि मैं ख़ुद को जान सकूँ; वरना तो मैं बाहरी और रोज़मर्रा के काम-काज में ही लगी रहती, जीवन प्रवेश तो हासिल ही न कर पाती, और इस तरह, मेरे जीवन स्वभाव में रत्ती भर भी बदलाव न आ पाता—और परमेश्वर द्वारा मुझे उजागर करके, हटा दिया जाता। मैं परमेश्वर को उनके मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद देती हूँ! परमेश्वर ने मेरे लिये ऐसे लोगों, घटनाओं और चीज़ों की जो व्यवस्था की थी, वह अद्भुत थी, और ठीक वैसी ही थी जैसी मुझे आवश्यकता थी। केवल उस तरीके से काट-छाँट किए जाने और निपटाये जाने के द्वारा ही मुझे समझ में आया कि वास्तविक जीवन प्रवेश क्या होता है। इससे मैं अपनी असली स्थिति का ज्ञान प्राप्त कर सकी। मैंने जाना कि सत्य का अनुसरण किये बिना, या जीवन प्रवेश हासिल करने की ओर ध्यान दिये बिना, मैं यूँ ही अपनी आस्था बनाए रखती, तो अंतत:, मैं असफल हो जाती।

उसके बाद, मैंने समझ-बूझ के साथ अपने प्रवेश पर ध्यान दिया। मैं हर दिन अपनी आध्यात्मिक भक्ति के दौरान, तत्परता से परमेश्वर के वचनों का चिंतन करने का प्रयास करती और उनमें सत्य को खोजने, और साथ ही उन्हें वास्तविक जीवन में कार्यान्वित करने पर ध्यान देती थी। लोगों से, घटनाओं और चीज़ों से मेरा सामना होने पर मैंने अपनी सोच और विचारों को ग्रहण करने पर ध्यान दिया और अपने कर्तव्यों के निर्वाह में अपने इरादों और अशुद्धियों पर आत्म-चिंतन करने, अपनी प्रकृति और सार का विश्लेषण करने, अभ्यास करने और जीवन प्रवेश के लिए परमेश्वर के वचनों से मार्ग खोजने पर ध्यान केन्द्रित किया। अपने भाई-बहनों की समस्याओं का निवारण करते समय, उनकी स्थितियों का समाधान करने के लिये मैं मात्र सहभागिता नहीं करती थी; बल्कि यह जानने के लिये कि मेरी भी वही समस्याएँ हैं या नहीं, मैं आत्म-चिंतन करने और ख़ुद को जानने पर ध्यान देती थी, ताकि अपने भा‌ई-बहनों के साथ शायद मुझे भी प्रवेश प्राप्त हो जाए। ऐसा करने के कुछ समय बाद, मैंने महसूस किया कि परमेश्वर के साथ मेरे संबंध कहीं अधिक घनिष्ठ हो गए हैं, मुझे उनके वचनों का थोड़ा-बहुत अनुभव और ज्ञान भी हो गया है। मुझे कलीसिया के लिये अपने काम में कुछ परिणाम भी हासिल हुए। बाद में, अपने भाई-बहनों की संगति से मैंने देखा कि किसी समस्या का सामना करते समय, वे लोग अपने इरादों और अशुद्धियों पर आत्म-चिंतन करने लगे थे, अपनी स्वयं की प्रकृति और सार का विश्लेषण करने लगे थे। वे लोग भी, परमेश्वर के कुछ वचनों में प्रवेश करने में समर्थ हो गए थे। परमेश्वर का धन्यवाद!

काट-छाँट और निपटाए जाने के इस घटना के बाद, मुझे इस बारे में कुछ वास्तविक ज्ञान हो गया था कि जीवन प्रवेश क्या है, और मैं अपनी कमियों को भी थोड़ा ज़्यादा साफ़ देखने लगी थी। अपने कर्तव्य का निर्वाह करते समय, मैं अपने प्रवेश पर ध्यान देने लगी। मैंने इस बात का स्वाद पा लिया था कि सत्य का अनुसरण करना और इस पर अमल करना कितना मधुर है। परमेश्वर ने मुझ पर जो कार्य किया था, ये सब उसी का असर था। परमेश्वर का धन्यवाद! अब से मैं जिस किसी भी चीज़ का अनुभव करती हूँ, तो मैं उम्मीद करती हूँ कि मैं सत्य की अपनी खोज में अडिग और यथार्थवादी रहूँ, और एक दिन जल्दी ही अपने स्वभाव में रूपांतरण प्राप्त करने का प्रयास करूँ।

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