अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (18) खंड दो
ग. परमेश्वर की बदनामी और उस पर हमला करने वाली सीसीपी की सरकार और धार्मिक दुनिया की निराधार अफवाहों से कैसे निपटें
चीनी कम्युनिस्ट सरकार और धार्मिक संसार ने यह दावा करते हुए परमेश्वर के घर के बारे में अनेक निराधार अफवाहें गढ़ी हैं कि भाई-बहन सुसमाचार स्वीकारने के लिए लोगों से जबरदस्ती करते हैं, वगैरह। इन अफवाहों को सुनने के बाद तुम लोगों को कैसा लगता है? (गुस्सा आता है, आक्रोश होता है।) ये अफवाहें तुम लोगों के बारे में हैं, और तुम लोग आक्रोश महसूस करते हो। तुम किस हद तक आक्रोश महसूस करते हो? क्या तुम अफवाहें गढ़ने वाले लोगों को ढूँढ़ना, उनसे बहस करना, और उन्हें सबक भी सिखाना चाहते हो? (हाँ।) ये अफवाहें सतही तौर पर कलीसिया को निशाना बनाती हैं, लेकिन वास्तव में, वे कलीसिया के प्रत्येक सदस्य और प्रत्येक सदस्य की प्रतिष्ठा और सत्यनिष्ठा को शामिल कर लेती हैं। उन्हें सुनने के बाद तुम लोग आक्रोश महसूस करते हो, और कहते हो, “हमने वो सब नहीं किया! हमने सत्य सिद्धांतों के अनुसार सुसमाचार का प्रचार किया था। जो लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं करना चाहते हैं, हमने कभी भी उनके साथ जबरदस्ती नहीं की। विश्वास स्वैच्छिक है। हम कभी भी किसी को मजबूर नहीं करते, लोगों को नुकसान पहुँचाने या उनसे बदला लेने की तो बिल्कुल भी नहीं सोचते हैं। इसके विपरीत, हम में से जो लोग सुसमाचार का प्रचार करते हैं उन्हें धार्मिक लोगों द्वारा बुरी तरह पीटा गया और पुलिस में उनकी रिपोर्ट की गई, यातना देने के लिए बड़े लाल अजगर को सौंप दिया गया; हम में से बहुतों को जेल में डाल दिया गया, और कुछ को धार्मिक लोगों द्वारा बनाई गई निजी जेलों में बंद करके रखा गया। हमारे साथ गलत हुआ है!” ये अफवाहें सुनने के बाद, तुम लोग आक्रोश महसूस करते हो और हमेशा उनसे बहस करना चाहते हो। तुम लोगों की यह प्रतिक्रिया आई क्योंकि ये अफवाहें सीधे कलीसिया और परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर हमला करती हैं और उन्हें नीचा दिखाती हैं। तुम्हें कैसा महसूस होता है जब तुम लोग ऐसी अफवाहें सुनते हो जो परमेश्वर को नीचा दिखाती हैं और उसकी आलोचना करती हैं? इनमें तुम लोगों के निजी हित या तुम्हारी सत्यनिष्ठा और गरिमा शामिल नहीं है; वे परमेश्वर से जुड़ी अफवाहें हैं। उदाहरण के लिए, जब पहले तुमने यीशु पर विश्वास किया था, तो कुछ लोगों ने कहा कि यीशु एक कुँवारी की कोख से पैदा हुआ था और उसका कोई पिता नहीं था। जब तुमने यह सुना तो तुम्हें कैसा महसूस हुआ था? क्या तुम उनके साथ बहस करना चाहते थे? “यह परमेश्वर है जिसमें हम विश्वास करते हैं!” फिर तुमने इस बारे में सोचा : “मरियम कुँवारी थी और यीशु पवित्र आत्मा द्वारा गर्भधारण करके एक कुँवारी से पैदा हुआ था। यह सच है, लेकिन अविश्वासी इसके बारे में भद्दे ढंग से बात करते हैं, और मुझे वह सुनना अच्छा नहीं लगता!” ज्यादा से ज्यादा तुम्हारे अंदर ऐसी भावनाएँ उत्पन्न हुई होंगी, लेकिन अपने दिल में, तुमने अभी भी महसूस किया होगा कि पवित्र आत्मा द्वारा गर्भधारण मानवीय धारणाओं का दृढ़ता से खंडन करता है। तुम इस बात में विश्वास नहीं कर पाते क्योंकि तुम विज्ञान में विश्वास करते हो; तुम दिल से परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता पर विश्वास नहीं करते, न ही तुम इस बात में विश्वास करते हो कि जो भी परमेश्वर कहता और करता है वह सत्य है, और फिर तुम छद्म-विश्वासियों की शैतानी बातों का खंडन नहीं करोगे। क्योंकि तुम्हारे पास सत्य नहीं है और तुम सत्य नहीं समझते हो, ज्यादा से ज्यादा, अफवाहें फैलाने वाले लोगों की बातें तुम्हें सुनने में खराब लग सकती हैं, और तुम सोचते हो कि लोगों को इस तरीके से बात नहीं करनी चाहिए क्योंकि इन अफवाहों में तुम्हारी प्रतिष्ठा शामिल है; तुम सोचते हो, “अविश्वासी इतने घृणित और घिनौने हैं! वे लोग कोई भी गंदी बात कहने की हिम्मत रखते हैं; वे लोग वास्तव में छद्म-विश्वासी हैं! वे लोग वास्तव में दानव हैं!” बस इतना ही, और तुम अधिकतम इतना ही प्राप्त कर सकते हो। उनसे ऐसी अफवाहें सुनने के बाद तुम उत्तेजित क्यों महसूस करते हो और अविश्वासियों को घृणित और घिनौना क्यों मानते हो? क्योंकि उनसे तुम्हारी प्रतिष्ठा जुड़ी होती है; ये अफवाहें तुम्हारे दिल को भड़काती हैं, तुम्हें अपमानित महसूस कराती हैं, इसलिए वे तुम्हारे क्रोध को भड़काती हैं, और तुम खंडन में कुछ सकारात्मक शब्द कहने के लिए खड़े हो जाते हो। क्या ऐसा खंडन पूरी तरह से परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना है? क्या यह परमेश्वर की गवाही का बचाव करना है? नहीं, यह पूरी तरह से अपनी इज्जत और गरिमा का बचाव करना है। ऐसा क्यों कहते हो? क्योंकि तुमने समस्या के सार की असलियत नहीं जानी है; इससे भी ज्यादा, तुम परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते हो या यह नहीं समझते हो कि परमेश्वर तुमसे क्या अपेक्षा करता है। तुम जो समझते और महसूस करते हो वह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं है; यह सिर्फ मानवीय आवेग और मानव का अच्छा व्यवहार है। मानव का अच्छा व्यवहार परमेश्वर के लिए तुम्हारी गवाही का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। तुम अपनी गवाही में अडिग नहीं रह पाते हो; तुम सिर्फ अपनी इज्जत और गरिमा बचा रहे हो, तुम अपने जमीर को थोड़ा सुकून देने के लिए अफवाहों का खंडन कर रहे हो—तुम परमेश्वर की ओर से बोलने के लिए उसके पक्ष में नहीं खड़े हो रहे हो, न ही तुम अफवाहों का खंडन करने और परमेश्वर की गवाही देने के लिए सत्य या तथ्यों का उपयोग कर रहे हो। तुम परमेश्वर के लिए नहीं बोल रहे हो, और जो तुम कहते हो वह निश्चित रूप से सत्य के अनुरूप नहीं होता है; यह केवल तुम्हारे दैहिक हितों के अनुरूप है—इससे केवल तुम्हारा दिल थोड़ा कम परेशान होता है, ताकि तुम्हें प्रभु यीशु में विश्वास करना शर्मनाक न लगे। बस इतना ही। इसलिए, जब तुम लोग किसी को परमेश्वर पर हमला करते और उसकी निंदा करते, परमेश्वर की कलीसिया को बदनाम करते और उसकी आलोचना करते या यहाँ तक कि तुम लोगों की निंदा करते सुनते हो, तो तुम लोग विशेष रूप से आक्रोश महसूस करते हो और अपनी प्रतिष्ठा को बहाल करने और इन बातों को स्पष्ट करने के लिए उनसे बहस और वाद-विवाद करना चाहते हो। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि तुम लोग अपनी गवाही में अडिग हो? यह उससे कमतर है; सत्य को समझे बिना, कोई गवाही नहीं होती है!
जब तुम लोग बाहरी दुनिया में फैली हुई ऐसी अफवाहें सुनते हो जो परमेश्वर को बदनाम करती हैं और उस पर हमला करती हैं, तो चाहे वे स्वर्ग के परमेश्वर पर हमला कर रही हों या धरती के देहधारी परमेश्वर पर, तब तुम लोग कैसा महसूस करते हो? क्या तुम उदासीन रहते हो या तुम्हें थोड़ा दर्द महसूस होता है? क्या तुम इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते और इससे समझौता नहीं कर पाते या तुम असहाय होते हो? कुछ लोग, इन अफवाहों को सुनने के बाद सोचते हैं, “परमेश्वर निर्दोष है; परमेश्वर ने ये काम नहीं किए। दुनिया और धार्मिक संसार उस पर इस तरह के हमले क्यों कर रहा है और उसे बदनाम क्यों किया जा रहा है? हमें निष्ठापूर्वक खुद को खपाना चाहिए, अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, और परमेश्वर के नाम की रक्षा करनी चाहिए। जब परमेश्वर का महान कार्य पूरा हो जाएगा, तो हर चीज का सत्य सामने आ जाएगा, और दुनिया के सभी लोग देखेंगे कि जिस देहधारी परमेश्वर में हम विश्वास करते हैं, वही एकमात्र सच्चा परमेश्वर है, स्वर्ग का परमेश्वर है, और यह बिल्कुल भी गलत नहीं है!” अन्य लोग सोचते हैं, “परमेश्वर ने इतने सारे सत्यों को व्यक्त किया है, और ये अविश्वासी बुरे लोग और दानव अच्छी तरह से जानते हैं कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, फिर भी वे परमेश्वर को बदनाम करते हैं और उस पर हमला करते हैं। परमेश्वर को कब तक कष्ट झेलना पड़ेगा?” अभी भी अन्य लोग कहते हैं, “लोग जो चाहे वह कह सकते हैं; हम उन पर कोई ध्यान नहीं देते। परमेश्वर ने उसकी बदनामी करने वाली अफवाहों का कभी भी खंडन नहीं किया है; वह उनका जवाब नहीं देता है। फिर हम मामूली इंसान के तौर पर क्या कर सकते हैं? क्या परमेश्वर को हमेशा इसी तरह मानवजाति द्वारा गलत नहीं समझा गया है, उस पर हमला नहीं किया गया है, उसका तिरस्कार नहीं किया गया है और उसे ठुकराया नहीं गया है? जो भी हो परमेश्वर की कोई शिकायते नहीं हैं, और वह अभी भी लोगों को बचाता है। समय को सब खुलासा करने दो; परमेश्वर अपनी गवाही खुद देगा!” तुम लोगों का दृष्टिकोण क्या है? अभी-अभी मैंने जिक्र किया कि किसी के आगे न झुकना, आक्रोश में आना, उससे समझौता न करना, असहाय होना—तुम लोगों को इनमें से कौन सी भावना महसूस होती है? कौन सी भावना सबसे सही है? इन मामलों में सत्य सिद्धांतों के अनुसार कैसे व्यवहार किया जाना चाहिए? जब तुम लोग इन अफवाहों को सुनते हो तो तुम लोगों को कैसा महसूस होता है? (आक्रोश।) आक्रोश, और फिर तुम इन अफवाहें गढ़ने वालों, इन धार्मिक धोखेबाजों और धर्म के बुरे लोगों के खिलाफ निंदा पत्र लिखना चाहते हो। क्या तुम्हारे ऐसे विचार हैं? तुम्हें ऐसा नहीं लगेगा कि क्रोध में अपनी मुट्ठी बंद कर लेना ही काफी है, है न? क्या तुम्हें इस बारे में कुछ करने की उत्तेजना महसूस होती है? या यह सिर्फ खोखला आक्रोश है? (घृणा और अस्वीकृति भी है।) आक्रोश, घृणा, अस्वीकृति—ये ऐसी भावनाएँ हैं जो बिना किसी विशिष्ट शब्द, व्यवहार या क्रियाकलाप के, मानसिक गतिविधियों से उत्पन्न होती हैं; वे सिर्फ भावनाएँ हैं, और निश्चित रूप से वे कुछ रवैयों को भी दर्शाती हैं। (आक्रोश महसूस करने के अलावा, कभी-कभार हम तथ्यों को स्पष्ट करने और यह उजागर करने के लिए लेख लिखते हैं या कार्यक्रम तैयार करते हैं कि उनके क्रियाकलापों का सार सत्य और परमेश्वर से घृणा करना है, ताकि लोग सही तथ्य देख सकें।) क्या वे लोग सही तथ्य देखने के बाद इसे स्वीकारेंगे? भले ही वे यह स्वीकारें कि तुम लोग जो कहते हो वह सही है और फिर निष्पक्ष टिप्पणी करते हुए कहें, “तुम लोगों का विश्वास सही है; विश्वास करते रहो, हम तुम्हारा समर्थन करते हैं!” और धार्मिक धोखेबाज शर्मिंदा महसूस करते हुए कहते हैं, “क्षमा करना, हम गलत थे, हमने जो कहा वह तथ्यात्मक नहीं था; अब से, तुम लोग अपने तरीके से विश्वास करो, और हम अपने तरीके से विश्वास करेंगे,” क्या इससे तुम लोग सहज महसूस करोगे? क्या यही एकमात्र लक्ष्य है जिसे तुम लोग प्राप्त करना चाहते हो? (हम परमेश्वर की गवाही भी देना चाहते हैं ताकि जो लोग सच्चे मार्ग की छानबीन कर रहे हैं और जो सत्य के प्यासे हैं वे स्पष्ट रूप से सही और गलत का भेद पहचान सकें और सच्चे मार्ग को स्वीकार सकें।) यह एक मार्ग है; यह अभ्यास का एक सकारात्मक तरीका है। क्या सिर्फ गुस्सा और नफरत करना लाभकारी है? तुम लोगों के गुस्से और नफरत का क्या कारण है? गुस्सा और नफरत क्यों करना? (परमेश्वर लोगों को बचाने के लिए देहधारी हुआ है, जो कि सबसे उचित बात है, लेकिन वे परमेश्वर की आलोचना करने और उसे नीचा दिखाने के लिए अफवाहें फैलाते हैं। हम यह सोचकर बहुत आक्रोश महसूस करते हैं कि वे वास्तव में सही और गलत को उलट-पुलट कर रहे हैं और बकवास कर रहे हैं।) क्या तुम लोग सोचते हो कि मानवजाति और संसार द्वारा परमेश्वर को ठुकराना और परमेश्वर के प्रति उनका रवैया केवल परमेश्वर के इस देहधारण की अवधि के दौरान ही ऐसा है? परमेश्वर के प्रति मानवजाति और संसार का रवैया शुरू से अंत तक हमेशा एक जैसा रहा है, हमेशा से उसकी निंदा, बदनामी, हमला और तिरस्कार किया गया है। जब से परमेश्वर ने अपना कार्य आरंभ किया है, तब से लेकर अब तक, परमेश्वर ने जो कुछ भी किया है, उसके प्रति और देहधारी परमेश्वर के प्रति मानवजाति का रवैया नहीं बदला है। यह केवल परमेश्वर के प्रथम देहधारण के बाद ही नहीं था कि मानवजाति ने परमेश्वर पर हमला किया, उसका तिरस्कार किया और देहधारी परमेश्वर के बारे में विभिन्न अफवाहें गढ़ना आरंभ कर दिया—यह सब तब से हो रहा है जब से परमेश्वर ने अपना कार्य आरंभ किया है, जब से मानवजाति पहली बार परमेश्वर और उसके कार्य के संपर्क में आई है, और यह अब तक जारी है। और जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, उन्हें हमेशा शैतान के शासन और परमेश्वर और कलीसिया के खिलाफ काम करने वाली धार्मिक मसीह-विरोधी ताकतों की ओर से मानहानि, हमले, आलोचनाएँ, तिरस्कार, विभिन्न अफवाहें और बहुत कुछ सहना पड़ता है। क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर के अनुयायियों को ये सब सहना पड़े? कुछ लोग कहते हैं, “हमें इन अफवाहों में कोई रुचि नहीं है क्योंकि वे तथ्यों को पूरी तरह से तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं और सही-गलत को उलट-पुलट कर देते हैं। जैसे ही हम उन्हें सुनते हैं, हमें गुस्सा आ जाता है और अपने दिल की गहराई से हम उन लोगों से नफरत करते हैं जो अफवाहें गढ़ते और उन्हें फैलाते हैं। चाहे ये अफवाहें धार्मिक संसार से आती हों या शैतानी सीसीपी सरकार से, हमारा एक ही रवैया है, और वह है नफरत और गुस्सा; और फिर हम उनका खंडन करना चाहते हैं और सब कुछ स्पष्ट करना चाहते हैं।” कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं, “हम इन दानवों और मसीह-विरोधियों के साथ वाद-विवाद करना चाहते हैं ताकि हम शैतान को शर्मिंदा कर सकें और उसे अपमानित कर सकें!” क्या यह अधिकांश लोगों का दृष्टिकोण है? क्या यह दृष्टिकोण सही है? अगर सामान्य मानवता के परिप्रेक्ष्य से देखा जाए, तो यह उचित है। लोगों में थोड़ी ईमानदारी और भावनाओं का सामान्य दायरा होना चाहिए; उन्हें स्पष्ट रूप से प्यार और नफरत करनी चाहिए, जिससे प्यार किया जाना चाहिए उससे प्यार करना चाहिए और जिससे नफरत की जानी चाहिए उससे नफरत करनी चाहिए। सामान्य मानवता वाले लोगों में ये गुण होने चाहिए। लेकिन, क्या केवल सामान्य मानवता के परिप्रेक्ष्य से खड़े होना ही सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होने के लिए पर्याप्त है? इसे और अधिक स्पष्ट रूप से कहें तो क्या यह नजरिया परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है? या फिर, क्या यह एक ऐसा रवैया और नजरिया है जिससे परमेश्वर प्रसन्न होता है? जब मैं यह कहता हूँ, तो ज्यादातर लोग यह सोचते हुए कुछ समझ सकते हैं, “तुमने कहा कि यह सिर्फ सामान्य मानवता के परिप्रेक्ष्य से चीजों को देखना है। तुमने जो कहा उसके निहितार्थों को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि यह नजरिया उतावला होने का है, यह सत्य सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप भी नहीं है।” परमेश्वर के इरादों के अनुरूप न होने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि परमेश्वर नहीं चाहता कि लोग इस तरह से काम करें; परमेश्वर की इच्छाएँ और लोगों के लिए उसके अपेक्षित मानक ऐसे नहीं हैं। यदि तुम इस तरह से काम करते हो, तो भले ही परमेश्वर अपने परिप्रेक्ष्य से इसकी निंदा नहीं करता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि तुम उसकी इच्छा का पालन कर रहे हो, और वह इसे स्वीकार नहीं करता है। सतही तौर पर, ऐसा लगता है कि तुम इन कामों को सूझ-बूझ से कर रहे हो, नफरत और प्यार दोनों रखते हो, परमेश्वर के लिए इन तथ्यों को स्पष्ट करना चाहते हो ताकि पूरी दुनिया जान सके कि परमेश्वर परमेश्वर है, परमेश्वर सारी मानवजाति का परमेश्वर है, और सभी को परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और परमेश्वर के उद्धार को स्वीकारना चाहिए। सतही तौर पर, ऐसा लगता है कि तुम जो कर रहे हो वह त्रुटिहीन, उचित, व्यवस्था के अनुरूप, मानवता के अनुरूप, नैतिकता के अनुरूप और इससे भी बढ़कर, सभी लोगों की पसंद के अनुरूप है। लेकिन क्या तुमने परमेश्वर से इस बारे में पूछा है? क्या तुमने परमेश्वर की तलाश की है? क्या तुमने परमेश्वर के वचनों में उन कार्य सिद्धांतों को पाया है जिनकी परमेश्वर लोगों से अपेक्षा करता है? परमेश्वर के इरादे वास्तव में क्या हैं? कुछ लोगों का कहना है, “परमेश्वर के वचन बहुत सारे हैं; हर मामले में लोगों के लिए परमेश्वर की विशिष्ट अपेक्षाओं को ढूँढ़ पाना आसान नहीं है।” चूँकि तुम्हें परमेश्वर के स्पष्ट वचन नहीं मिले हैं, इसलिए तुम इस तरह की अफवाहों के प्रति परमेश्वर के रवैये से संकेत ढूँढ़ सकते हो। तो क्या तुम यह निर्धारित नहीं कर सकते कि इस मामले के प्रति लोगों का रवैया क्या होना चाहिए और उन्हें किन सिद्धांतों का अभ्यास करना चाहिए जो इस मामले के प्रति परमेश्वर के रवैये पर आधारित हैं? (बिल्कुल।) तो आओ देखें कि इस मामले के प्रति परमेश्वर का रवैया वास्तव में क्या है।
मानवजाति का परमेश्वर के कार्य से सामना होने की शुरुआत से ही, लोगों ने परमेश्वर के बारे में शिकायत की है और उससे असंतुष्ट रहे हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर के प्रति गुप्त रूप से संदेह, शंका, और अस्वीकृति जैसे अनेकों घृणास्पद शब्द भी बोले हैं। सत्तारूढ़ दल और धार्मिक संसार की ओर से भी विभिन्न अफवाहें फैलाई जा रही हैं, जो तथ्यों या सत्य के बिल्कुल भी अनुरूप नहीं हैं। परमेश्वर के लिए इन शब्दों के क्या मायने हैं? चाहे वे शंकाएँ, गलतफहमियाँ या शिकायतें हों, वे परमेश्वर के खिलाफ हमलों, बदनामी और तिरस्कार से भरी हुई हैं, और वे थोड़ा सा भी परमेश्वर का भय मानने वाले दिल को नहीं दर्शाती हैं; शुरुआत से ही यह इसी तरह का रहा है। कलीसिया में हमेशा कुछ ऐसे लोग रहे हैं जो सत्य से प्रेम नहीं करते। ये छद्म-विश्वासी हैं, जो परमेश्वर के वचनों और सत्य पर शक करते हैं, परमेश्वर के प्रति इस तरह का रवैया प्रदर्शित करते हैं। इससे भी बढ़कर उन अविश्वासियों और नास्तिक सत्तारूढ़ दलों के लिए, जो लोग सत्य से विमुख हैं—परमेश्वर के प्रति उनके रवैये के लिए कोई सफाई देने की जरूरत नहीं है; वे अनैतिक ढंग से हमला और आलोचना करते हैं, और जो भी चाहते हैं वो कहते हैं। विशेष रूप से, धार्मिक संसार के वे फरीसी लोग इस अवसर का लाभ मनमाने ढंग से आलोचना और निंदा करने के लिए उठाते हैं। ये सभी टिप्पणियाँ सकारात्मक नहीं हैं, और वे निश्चित तौर पर वस्तुनिष्ठ और सटीक नहीं हैं। फिर, इन टिप्पणियों का क्या सार है? परमेश्वर के लिए, ये शब्द केवल बयान या दृष्टिकोण नहीं हैं, बल्कि उसके खिलाफ अपमान, हमले, बदनामी और ईश-निंदा भी करते हैं। मैंने “परमेश्वर के लिए” क्यों कहा है? क्योंकि परमेश्वर इन सब को बेहद सटीकता से आंकता है, हम केवल एक उपसर्ग जोड़ सकते हैं। पूरे इतिहास में, परमेश्वर के प्रति मानवजाति का रवैया ऐसा ही रहा है; लोगों के शब्द बहुत अधिक रहे हैं जिनसे वे परमेश्वर पर हमला और उसका अपमान करते हैं, उनमें से एक भी शब्द नेक इरादे वाला नहीं रहा है। आज भी, तुम लोगों के कान जो सुनते हैं और तुम्हारी आँखें जो देखती हैं वो एक समान है। शुरुआत से, परमेश्वर के प्रति संपूर्ण मानवजाति का रवैया बदला नहीं है। परमेश्वर इन मामलों से कैसे निपटता है? क्या परमेश्वर के पास स्वयं का बचाव करने, अपने कार्य के वास्तविक तथ्यों को स्पष्ट करने, और मानवजाति के समक्ष स्वयं को उचित ठहराने के लिए वैश्विक धार्मिक सम्मेलन बुलाने की परिस्थितियाँ या क्षमता है? क्या परमेश्वर ने ऐसा किया है? नहीं, परमेश्वर चुप रहता है, वह संपूर्ण स्थिति को स्पष्ट नहीं करता है, न ही वह स्वयं का बचाव करता है या स्वयं को सही ठहराता है। हालाँकि, उन लोगों के लिए जो परमेश्वर पर खासकर घृणित तरीके से हमला करते हैं, परमेश्वर ने कुछ सजा का प्रबंध किया है, कुछ तथ्यों को उनके सामने आने दिया है। जहाँ तक लोगों के हमलों, बदनामी और ईश-निंदा की बात है, परमेश्वर का रवैया क्या है? परमेश्वर इससे कैसे निपटता है? वह इसे नजरंदाज कर देता है; वह वही काम करता है जो करना जरूरी है, वह इसे उसी तरीके से करता है जिस तरीके से इसे किया जाना चाहिए, उसे चुनता है जिसका चुनाव किया जाना चाहिए, उसका मार्गदर्शन करता है जिसका उसे मार्गदर्शन करना चाहिए। सारा संसार परमेश्वर के हाथों में व्यवस्थित है; उसने मानव के हमलों, बदनामी या ईश-निंदा के कारण कभी भी अपनी योजनाओं में कोई बाधा नहीं डाली या उनमें बदलाव नहीं किया। जब शैतान की बुरी ताकतें परमेश्वर के चुने हुए लोगों को दबाती और हिरासत में लेती हैं, तो चाहे वे कितनी भी उन्मादी क्यों न हों, परमेश्वर ने कभी भी अपनी योजनाओं या अपने मन में कोई बदलाव नहीं किया है। उसकी सोच और उसके विचार पूरी तरह से अपरिवर्तित रहते हैं; वह हमेशा की तरह अपनी मानवजाति का प्रबंधन करते हुए अपना कार्य जारी रखता है, जिसे वह करना चाहता है। परमेश्वर के लिए, इन हमलों, बदनामी और ईश-निंदा ने कभी भी कोई हस्तक्षेप नहीं किया है; परमेश्वर उन पर कोई ध्यान नहीं देता। परमेश्वर खुद को सही क्यों नहीं ठहराता या खुद का बचाव क्यों नहीं करता। परमेश्वर के लिए, ये चीजें पूरी तरह से सामान्य हैं। मानव केवल मानव है, और शैतान सिर्फ शैतान। सत्य या वास्तविक तथ्यों को नहीं समझने वाले इंसानों के लिए ऐसी चीजें करना बहुत सामान्य है। क्या यह परमेश्वर के कार्य के चरणों को प्रभावित करता है? यह प्रभावित नहीं करता है। परमेश्वर के पास महान सामर्थ्य है; वह सभी पर संप्रभुता रखता है। सभी चीजें और सब कुछ परमेश्वर के वचनों के भीतर, परमेश्वर के विचारों के भीतर, और परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन व्यवस्थित रूप से संचालित होता है; चाहे मानवजाति कुछ भी कहे या करे, यह किसी भी तरह से परमेश्वर के कार्य को प्रभावित नहीं कर सकती है—यह वही है जो दिव्य सार वाला परमेश्वर करने में सक्षम है। परमेश्वर समय आने पर कार्य करता है, बिना किसी भी विसंगति के अपनी योजनाओं को पूरा करता है, और कोई भी इसे बदल नहीं सकता। मानवीय टिप्पणियाँ और परमेश्वर पर कोई भी मानवीय हमला या बदनामी, चाहे वे परमेश्वर के कार्य को बाधित और नष्ट करने के लिए जानबूझकर किए गए प्रयास हों या अनजाने में परमेश्वर के कार्य में बाधा डालने और उसे नष्ट करने के लिए किए गए प्रयास हों, कभी भी अपने इच्छित लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाए हैं। क्यों? यह परमेश्वर का अधिकार है; यह पुष्टि करता है कि परमेश्वर का अधिकार अनूठा है; कोई भी ताकत उसकी जगह नहीं ले सकती है, और कोई भी ताकत उससे बढ़कर नहीं है। यह सच है। परमेश्वर के पास यह अधिकार और यह सामर्थ्य है, परमेश्वर के पास उसकी सच्ची पहचान है, और कोई भी ताकत कुछ भी नहीं बदल सकती, तो परमेश्वर को लोगों के छोटे-मोटे हमलों और बदनामी से क्यों परेशान होना चाहिए? परमेश्वर के लिए, चाहे कितनी भी महत्वपूर्ण हस्तियाँ या मानवजाति में कितनी भी बड़ी ताकत उसके काम में हस्तक्षेप करने, उसे बदनाम करने, उस पर हमला करने या उसका तिरस्कार करने की कोशिश करे, यह परमेश्वर के काम को थोड़ा भी बाधित नहीं कर सकती। बल्कि, ये क्रियाकलाप केवल परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव और सर्वशक्तिमत्ता पर रोशनी डालने का काम करते हैं। शैतान की बुरी ताकतों द्वारा पैदा की गई गड़बड़ी मानव इतिहास के दौरान एक छोटी सी घटना मात्र है। जो समस्त मानवजाति पर संप्रभुता रख सकता है, समस्त मानवजाति को प्रभावित कर सकता है, और समस्त मानवजाति को परिवर्तित कर सकता है, वह है परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर की योजना, और परमेश्वर की महान सामर्थ्य और अधिकार। यह सच है। इसके विपरीत, क्या परमेश्वर को लोगों द्वारा की गई उसकी निंदा, उस पर किए गए हमलों, उसकी बदनामी और उसके खिलाफ किए गए तिरस्कार से परेशान होने की आवश्यकता है? नहीं। क्योंकि परमेश्वर के पास अधिकार है, परमेश्वर के लिए, उसका कथन, “जो मैं कहता हूँ वही मेरा अर्थ होता है, जो मैं कहता हूँ वह किया जाएगा और जो मैं करता हूँ वह हमेशा के लिए बना रहेगा,” हमेशा सच रहेगा; यह हर दिन सच हो रहा है और पूरा हो रहा है। यह परमेश्वर का अधिकार है। कुछ लोग पूछते हैं, “क्या यह परमेश्वर का आत्मविश्वास, उसकी आस्था है?” तुम गलत हो! मनुष्यों में आत्मविश्वास होता है, मनुष्यों को आस्था की आवश्यकता होती है, लेकिन परमेश्वर को नहीं। क्यों? क्योंकि परमेश्वर के पास अधिकार और सामर्थ्य है, और चाहे मानवजाति उसकी कितनी भी बदनामी करे या उसकी निंदा करे, चाहे शैतान की शत्रुतापूर्ण ताकतें उसे कितना भी बाधित करें और उसकी चीजों को कितना भी नुकसान पहुँचाएँ, कुछ भी नहीं बदलेगा। इसलिए, परमेश्वर को अपना कार्य करने से पहले भ्रष्ट मानवजाति के बीच से उन शत्रुतापूर्ण ताकतों को खत्म करने की आवश्यकता नहीं है जो उस पर हमला करती हैं, उसकी बदनामी करती हैं और उसका तिरस्कार करती हैं। परमेश्वर किन परिस्थितियों में कार्य करता है? वह किन परिस्थितियों में विजय प्राप्त करता है? वह किन परिस्थितियों में अपना कार्य पूरा करता है? यह समस्त मानवजाति और सभी शत्रुतापूर्ण ताकतों के हमलों, बदनामी और तिरस्कार के कोलाहल के बीच किया जाता है; वह ऐसे परिवेश और पृष्ठभूमि में अपना कार्य पूरा करता है। क्या यह परमेश्वर की महान सामर्थ्य का प्रदर्शन नहीं है? क्या यह परमेश्वर का अधिकार नहीं है? (बिल्कुल है।) इस तथ्य से कौन इनकार कर सकता है? क्या तुम में इस तथ्य को स्वीकार नहीं करने की हिम्मत है?
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?