अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (18) खंड तीन
पूरे इतिहास में, मानवजाति ने लगातार परमेश्वर की बदनामी और ईश-निंदा की है, और अंत के दिनों में, परमेश्वर की बदनामी और निंदा करने वाले लोगों की आवाजें अधिक होने के साथ ही पूरी मानवजाति में परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाली ताकतें और अधिक ताकतवर हो गई हैं। मानवजाति परमेश्वर की बदनामी करने और उस पर हमला करने के लिए अखबारों, टेलीविजन, इंटरनेट, और अन्य मीडिया के माध्यम से विभिन्न तरीकों का उपयोग करती है। लेकिन क्या हमने कभी अपनी सारी सभाओं में इन अफवाहों का गहन-विश्लेषण किया है? (नहीं किया।) क्यों नहीं किया? कुछ लोगों का कहना है, “ऐसा इसलिए है क्योंकि निर्दोष इंसान निर्दोष ही रहता है, और बुद्धिमान व्यक्ति के पास पहुँचने पर अफवाहें दम तोड़ देती हैं?” क्या यही कारण है? (ये अफवाहें मूलभूत रूप से परमेश्वर के कार्य को प्रभावित नहीं कर सकती हैं। चाहे शैतान कैसे भी बाधा डाले, वह परमेश्वर के कार्य और उसकी योजना की प्रगति को नष्ट या बाधित नहीं कर सकता है।) शैतान ऐसी ही चीज है; जब तक परमेश्वर कार्रवाई करता है, जब तक परमेश्वर कार्य करता है, यह बाधा डालने आता है। वास्तव में यही वो भूमिका है जो वह निभाता है। क्या इसे कार्य करने से रोकना तुम्हारे लिए ठीक है? तुम्हें इसे काम करने के लिए पर्याप्त स्थान, पर्याप्त मंच, पर्याप्त अवसर देना होगा। जब वह पर्याप्त काम कर चुका होगा, अपनी उथल-पुथल से थक चुका होगा, और काफी बुराइयाँ कर चुका होगा, तो उसका समय बीत चुका होगा। हमें इन अफवाहों का भंडाफोड़ करने के लिए उसकी विभिन्न अफवाहों और बुरे कर्मों का गहन-विश्लेषण करने में कीमती समय बर्बाद करने की जरूरत नहीं है; ऐसा करना व्यर्थ और बेकार है। उनका गहन-विश्लेषण करने का क्या लाभ होगा? क्या यह सत्य समझने वाले लोगों को दर्शा सकता है? बहुत से सत्य हैं जिन्हें लोगों को समझना चाहिए; वे इन सभी सत्य को सुन भी नहीं सकते हैं, इन अफवाहों का भंडाफोड़ करना तो दूर की बात है। क्या लोगों के पास इतना फालतू समय है? सच कहूँ तो मुझे वास्तव में उन मामलों में कोई दिलचस्पी नहीं है, न ही मैं उनका उल्लेख करने या उन पर ध्यान देने को तैयार हूँ। कुछ लोग कहते हैं, “इन वर्षों में, क्या ऐसा है कि तुम कहीं जाने की हिम्मत नहीं कर पाते हो? क्या ऐसा इसलिए है कि इतनी सारी अफवाहें उड़ रही हैं कि तुम जहाँ भी जाते हो, हमेशा चिंतित और डरे हुए रहते हो?” मेरा कहना है कि मुझे कुछ भी महसूस नहीं होता। कुछ लोग कहते हैं, “क्या तुम उन चीजों के खिलाफ अपना बचाव नहीं करना चाहते जो तुमने नहीं की हैं?” बचाव करने के लिए क्या है? मैं तो अपने काम के साथ तालमेल बनाकर भी नहीं चल सकता! मैं लोगों से, सृजित प्राणियों से बात करता हूँ, दानवों से नहीं। कुछ लोग पूछते हैं, “क्या ये अफवाहें सुनकर तुम्हें गुस्सा नहीं आता?” मैं कहता हूँ कि मुझे उनके प्रति कुछ भी महसूस नहीं होता, वे मुझे कुछ भी महसूस नहीं करा पाती हैं; मैं इन मामलों से परेशान नहीं होता। कुछ लोग पूछते हैं, “क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है?” मैं कहता हूँ कि मुझे ऐसा नहीं लगता कि मेरे साथ अन्याय हुआ है, इसमें अन्याय लगने की क्या बात है? मैं जो कर सकता हूँ, जो करना चाहिए, वह करूँ, जो कर सकता हूँ और करना चाहिए, उसे अच्छे से करूँ, अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करूँ—यही सबसे अच्छी बात है, यही सार्थक है। मैं उन अर्थहीन, बेकार की चीजों से विचलित नहीं होऊँगा या उन पर समय नष्ट नहीं करूँगा। मेरे पास उन मामलों को लेकर चिंता करने का समय नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, “जब तुम्हारे पास खाली समय होगा, तो क्या तब तुम उनके बारे में चिंता करोगे?” नहीं, तब भी नहीं जब मेरे पास खाली समय होगा। मैं दानवों से बात करने के बजाय अपने कुत्ते से बात करना पसंद करूँगा। अगर तुम्हें स्पष्ट रूप से पता है कि दानव अपनी शैतानी बातें कर रहा है, तो इससे परेशान क्यों होना? तुम्हें बिल्कुल भी परेशान नहीं होना चाहिए; दानव को पूरी तरह से शर्मिंदा होने देना ही सही काम है। संक्षेप में, इन अफवाहों के प्रति परमेश्वर का रवैया इस प्रकार है : कुछ भी करने या हर वाक्य कहने में, परमेश्वर यह कहकर कि वह निर्मल और निर्दोष है, और दोषरहित है, स्वयं को सही नहीं ठहरा रहा है, न ही मानवजाति के सामने स्वयं को साबित कर रहा है, और निश्चित रूप से शैतान, अपने दुश्मन के सामने स्वयं को सही नहीं ठहरा रहा है। परमेश्वर हर काम अपने प्रबंधन के लिए करता है, उन मानवों को बचाने के लिए करता है जिन्हें उसका इरादा बचाने का होता है। वह कदम-दर-कदम अपनी प्रबंधन योजना का अनुसरण करता है; वह यह काम किसी को कुछ भी प्रदर्शित करने के लिए नहीं करता, न ही अपनी पहचान की पुष्टि करने के लिए करता है। मानवीय शब्दों में कहें तो परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह बिना किसी कपट या निष्क्रियता के सहज रूप से करता है। परमेश्वर द्वारा सहज रूप से इन सभी कार्यों को पूरा करना उसकी पहचान और उसके सार की पुष्टि करता है। मानवजाति परमेश्वर की योजना को बदल नहीं सकती, न ही वह परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य से बढ़कर कुछ कर सकती है; यह सच है। इसलिए, परमेश्वर उन अफवाहों और शैतानी शब्दों की उपेक्षा करता है जो मानवजाति के भीतर किसी भी पक्ष से उस पर हमला करती हैं और उसे बदनाम करती हैं। मुझे बताओ, क्या परमेश्वर के लिए दुनिया में नास्तिक सत्तारूढ़ दलों और धार्मिक संसार द्वारा परमेश्वर के खिलाफ किए जा रहे हमलों और प्रतिरोध के विरोध में वचनों का एक अध्याय बोलना या निंदा लिखना बहुत आसान नहीं होगा? लेकिन परमेश्वर शैतान के साथ इस तरह से व्यवहार नहीं करेगा। परमेश्वर सिद्धांतों के अनुसार काम करता है; जब परमेश्वर द्वारा शैतान की बुरी ताकतों को नष्ट करने की बात आती है, तो उसका अपना समय होता है। परमेश्वर के लिए, कार्य करना बहुत आसान है। परमेश्वर स्वर्ग में कुछ चमत्कारिक कार्य कर सकता है, और अचानक स्वर्ग फट जाएगा और एक आवाज सुनाई देगी, “मैं ही एकमात्र सच्चा परमेश्वर हूँ जिसे तुम लोग बदनाम करते हो, जिस पर हमला करते हो, और जिसका तिरस्कार करते हो; मैं ही वह सर्वशक्तिमान हूँ जिसकी तुम लोग फिलहाल बदनामी और तिरस्कार कर रहे हो!” यह सुनकर, मानवजाति तुरंत स्तब्ध और हैरान हो जाएगी, केवल जमीन पर दण्डवत होकर रोएगी और अपने दाँत पीसेगी। यह एक वाक्य सब कुछ हल कर देगा, सब कुछ साबित कर देगा; क्या तब कोई परमेश्वर का अपमान करने का साहस करेगा? क्या धार्मिक संसार के वे दानव डरकर पूरी तरह गायब नहीं हो जाएँगे? शैतान परमेश्वर के बारे में अफवाहें गढ़ता है, परमेश्वर को बदनाम करता है और उस पर हमले करता है, जिससे परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग क्रोधित और घृणास्पद हो जाते हैं, वे खाने या सोने में असमर्थ हो जाते हैं, वे इसका खंडन करने के लिए लेख लिखना और कार्यक्रम बनाना चाहते हैं, जबकि परमेश्वर सरलता से कार्य करता है—वह बस कुछ वाक्य बोल सकता है और फिर सारी मानवजाति पूरी तरह से आत्मसमर्पण कर देगी, और उस पर हमला करने या उसका तिरस्कार करने का साहस नहीं करेगी। पौलुस को आज्ञाकारी कैसे बनाया गया था? (परमेश्वर ने दमिश्क के रास्ते पर उसे दर्शन दिए।) परमेश्वर ने उसे दर्शन दिए। वास्तव में उसने कुछ भी नहीं देखा; वहाँ केवल एक प्रकाश था जिसने पौलुस को इतना डरा दिया कि वह जमीन पर दण्डवत हो गया, और उसने अब यीशु को सताने की हिम्मत नहीं की। शैतान से निपटना इतना सरल है; वास्तव में, यह परमेश्वर के लिए बहुत आसान है। परमेश्वर इसे केवल एक वचन से सुलझा सकता है। ऐसा करना तुम लोगों से दशकों तक बात करने और तुम लोगों पर यह सब कोशिश करने से कहीं अधिक आसान होगा, लेकिन परमेश्वर इस तरह से कार्य नहीं करता है। क्यों? यह एक रहस्य है जो मुझे तुम लोगों को बताना चाहिए : परमेश्वर इंसानों को बचाता है, अर्थात्, वे लोग जिन्हें परमेश्वर ने चुना है; बाकी, जिन्हें परमेश्वर ने नहीं चुना है, उन्हें मनुष्य नहीं माना जाता है, बल्कि वे जानवर हैं, दानव हैं, जो परमेश्वर की वाणी सुनने, परमेश्वर का चेहरा देखने के योग्य नहीं हैं, या परमेश्वर के बारे में कुछ भी जानने लायक तो और भी नहीं हैं। इसलिए, परमेश्वर इस तरह से कार्य नहीं करता है। परमेश्वर की पहचान सम्माननीय है; कोई भी व्यक्ति जो उसे देखना चाहता है, वह ऐसा नहीं कर सकता, और वह किसी के सामने इसलिए प्रकट नहीं होगा क्योंकि वह हमेशा ध्यानपूर्वक, उत्सुकता से, और पूरे दिल से आकाश में एक निश्चित स्थान की ओर देख रहा है। क्या तुम सोचते हो कि कोई भी व्यक्ति जो परमेश्वर को देखना चाहता है, उसे देख सकता है? परमेश्वर में गरिमा है; परमेश्वर उन लोगों के सामने प्रकट होता है जो उसका भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं, वह पवित्र स्थानों में प्रकट होता है और गंदी जगहों से छिपता है। क्या पूरी मानवजाति गंदी है या पवित्र है, इस पर चर्चा की आवश्यकता नहीं है। यह मानवजाति परमेश्वर को देखने के योग्य नहीं है; लोग यह स्वीकार नहीं करते कि कोई परमेश्वर है, तो परमेश्वर उनके सामने क्यों प्रकट होगा? वे इस लायक नहीं हैं! परमेश्वर चीजें करने में सक्षम है लेकिन उन्हें करता नहीं है; यह परमेश्वर की विनम्रता और गुप्तता, और उसकी पहचान की सम्माननीयता की पुष्टि करता है। मुझे बताओ, अगर शैतान उन चीजों को कर सकता, तो वह उन्हें दिन में कितनी बार करता, वह कितना दिखावा करता? जब शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए मनुष्य कोई छोटा-मोटा पद धारण करते हैं और थोड़ी-बहुत ताकत रखते हैं, तो कौन जानता है कि वे किस हद तक इस ताकत का दिखावा करेंगे—शैतान की तो बात ही छोड़ दो, जो अपनी किसी भी ताकत का अकल्पनीय तरीकों से दुरुपयोग और दिखावा करेगा। परमेश्वर इस तरह से कार्य नहीं करता; परमेश्वर को शैतान के तर्क से मत मापो, यह एक भारी गलती होगी। जहाँ तक परमेश्वर के कार्य करने की बात है, यह परमेश्वर पर निर्भर करता है कि वह इसे करना चाहता है या नहीं; यदि परमेश्वर चाहे, तो यह एक पल में हो सकता है, और यदि वह नहीं चाहे, तो कोई भी उसे मजबूर नहीं कर सकता। अफवाहों के प्रति परमेश्वर का रवैया बस यही है—वह उन्हें नजरंदाज करता है। परमेश्वर अभी भी वही करता है जो उसे करना चाहिए, जो वह करने का इरादा रखता है; कोई भी व्यक्ति, कोई भी ताकत उसकी योजना को बिगाड़ या बदल नहीं सकती। परमेश्वर पर हमला करने, उसे बदनाम करने और नीचा दिखाने वाली ये अफवाहें कुछ भी नहीं बदलतीं। अफवाहें, आखिरकार, सिर्फ अफवाहें ही हैं और कभी तथ्य नहीं बन सकतीं। भले ही वे मानवीय फलसफे, विज्ञान, नैतिकता, सिद्धांत आदि के अनुरूप हो जाएँ, भले ही पूरी मानवजाति परमेश्वर पर हमला करने के लिए उठ खड़ी हो, लेकिन सत्य मानवजाति के साथ खड़ा नहीं होगा, न ही मानवजाति सत्य की स्वामी बनेगी। परमेश्वर सदा के लिए परमेश्वर है; उसकी पहचान और स्थिति कभी नहीं बदलती। इस प्रकार, चाहे शैतान कितना भी परेशान करे, परमेश्वर का कार्य अभी भी व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ता है, क्योंकि यह परमेश्वर का कार्य है। यदि यह मानवीय कार्य होता, तो शैतान का शासन ऐसी गड़बड़ियाँ पैदा करता और विभिन्न सामाजिक ताकतें ऐसे हमला करतीं और बदनाम करना शुरू करतीं, जो पहले ही इसे ध्वस्त कर देतीं और इसका अस्तित्व समाप्त हो जाता। केवल जब परमेश्वर बोलता है और कार्य करता है, केवल जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, तभी कलीसिया अधिक से अधिक समृद्ध होती है। क्या यह एक तथ्य नहीं है? क्या तुम लोगों ने इस तथ्य को देखा है? (हाँ, हमने देखा है।) तुमने क्या देखा है? (राज्य का सुसमाचार पहले ही दर्जनों देशों में फैल चुका है, और शैतान द्वारा गढ़ी और फैलाई गई उन अफवाहों ने सत्य से प्रेम करने वालों को परमेश्वर की ओर मुड़ने से बिल्कुल भी नहीं रोका है।) यह परमेश्वर का कार्य है; परमेश्वर का कार्य इस प्रभाव को प्राप्त कर सकता है, परमेश्वर के वचन इस प्रभाव को प्राप्त कर सकते हैं—यह शैतान की अपेक्षाओं से परे है। परमेश्वर के वचनों में इतनी अपार सामर्थ्य है; सुसमाचार एक अच्छी दिशा में फैल रहा है और सब कुछ परमेश्वर की योजना के अनुसार व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ रहा है, वह भी बिना किसी विसंगति के। परमेश्वर का कार्य और परमेश्वर के वचन परमेश्वर के चुने हुए लोगों के बीच फैल रहे हैं, जैसा कि लंबे समय से पूर्वनिर्धारित है। सुसमाचार का प्रचार करने से प्राप्त लोगों की संख्या और सच्चे मार्ग की छानबीन करने वाले लोगों की संख्या महीने-दर-महीने बढ़ रही है। क्या यह नहीं दिखाता कि सुसमाचार का कार्य कैसे फैल गया है? यदि यह परमेश्वर का कार्य नहीं होता, तो चाहे कितने भी लोग कितनी भी बड़ी कीमत चुकाएँ, वे इस प्रभाव को प्राप्त नहीं कर सकते थे। यह परमेश्वर की शक्ति है, परमेश्वर के वचनों की सामर्थ्य से हासिल किया गया प्रभाव है।
आओ फिर से उस बारे में बात करें कि लोग विभिन्न अफवाहों के प्रति कैसे पेश आते हैं। लोग विभिन्न अफवाहों के प्रति परमेश्वर जैसा रवैया नहीं अपना सकते। उन्हें परमेश्वर के इरादे समझ नहीं आते हैं और अफवाहें सुनने पर उन्हें हमेशा यही लगता है : “यदि मैं कुछ नहीं करता हूँ, तो मेरा जमीर मुझे धिक्कारता है। यदि अफवाहें गढ़ने वाले लोग हावी हो गए तो मैं असहज, असंतुष्ट और आक्रोश महसूस करूँगा, असंतुलन महसूस करूँगा, इसलिए मुझे उनका खंडन करना होगा। मुझे अफवाहों का स्पष्टीकरण देने के लिए वीडियो बनाना चाहिए या लेख लिखना चाहिए।” यह विचार करने लायक है कि क्या ऐसी मानसिकता के तहत काम करना परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है, क्या यह सत्य सिद्धांतों के अनुरूप है। यदि कलीसिया का काम करने और अपना कर्तव्य निभाने में तुम लोगों का उद्देश्य और मंतव्य केवल अफवाहों के प्रति स्पष्टीकरण देना है और स्पष्ट रूप से यह समझाना है कि यही वह सच्चा परमेश्वर है जिसमें तुम लोग विश्वास रखते हो, कि तुम लोग जीवन में सही मार्ग पर हो, और तुम सभी ने सुसमाचार का प्रचार करने और परमेश्वर की गवाही देने के लिए जो कुछ भी किया है वह न्यायसंगत है—और यह न्यायसंगत इसलिए है क्योंकि दुनिया इन सभी तथ्यों के सत्य को जानती या समझती नहीं है कि उन्होंने तुम लोगों पर कई निराधार अपराधों का आरोप लगाया है—और इस तरह तुम लोग आशा करते हो कि जब सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा, तो दुनिया तुम लोगों को निर्दोष के रूप में पहचान लेगी, दुनिया के सभी पक्ष सार्वभौमिक रूप से स्वीकारेंगे कि “यही वह सच्चा परमेश्वर है जिसमें तुम लोग विश्वास रखते हो, तुम लोग जीवन में सही मार्ग पर हो, और परमेश्वर ने तुम लोगों से जो कुछ भी करने के लिए कहा है वह सही है और एक न्यायसंगत कारण है,” तो क्या? क्या तब तुम लोग अपने विश्वास में सहज और न्यायसंगत महसूस करोगे? क्या तुम लोग परमेश्वर में विश्वास रखने के सही मार्ग पर चल चुके होगे? क्या तुम लोग बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के उद्धार के मार्ग पर चल चुके होगे? क्या तुम लोगों में परमेश्वर का भय मानने वाला दिल विकसित हो चुका होगा? क्या तब तुम लोग परमेश्वर के प्रति समर्पण प्राप्त कर सकते हो? क्या तब तुम लोग परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर सकते हो? (नहीं।) क्या यह संभव है कि लोगों के मन में तुम्हारे बारे में कोई गलतफहमी न रहे और वे केवल तुम्हारी प्रशंसा और आदर करें, जिसके बाद तुम शुद्ध अंतःकरण के साथ परमेश्वर में विश्वास कर सको? बिल्कुल नहीं! बेशक, लोग अफवाहों के प्रति परमेश्वर जैसा रवैया नहीं अपना सकते, लेकिन व्यक्ति का यह कहते हुए सही परिप्रेक्ष्य, सही रवैया और रुख होना चाहिए : “ये अफवाहें सचमुच घृणास्पद और घिनौनी हैं। इन अफवाहों से, यह देखा जा सकता है कि यह भ्रष्ट मानवजाति सचमुच परमेश्वर की शत्रु है; यह बिल्कुल सही है! मुझे शैतान की अफवाहों के आधार पर यह राय नहीं बनानी चाहिए कि परमेश्वर का कार्य सही है या गलत। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने और अपना कर्तव्य निभाने के दौरान हुए अनुभवों के माध्यम से, मैं यह पुष्टि करता हूँ कि परमेश्वर के सभी वचन सत्य हैं, और वह जो कुछ भी करता है वह लोगों को बचाए जाने में सक्षम बनाता है। आज परमेश्वर के सामने आकर उसके उद्धार को स्वीकारते हुए, मुझे अपना कर्तव्य निभाना चाहिए; परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने, उसके नाम का गुणगान करने और परमेश्वर के कार्य और उसके इरादों की गवाही देने के अपने दायित्वों और जिम्मेदारियों को पूरा करना चाहिए, ताकि परमेश्वर द्वारा चुने हुए लोग परमेश्वर के घर लौट सकें, उसकी वाणी सुन सकें और जितनी जल्दी हो उससे वचनों और जीवन की आपूर्ति प्राप्त कर सकें। यह मेरा दायित्व है, मेरी जिम्मेदारी है। मैं परमेश्वर के कार्य में सहयोग कर रहा हूँ, लेकिन यह साबित करने के लिए नहीं कि मैं जिस मार्ग पर चल रहा हूँ वह सही है या मैं जिस उद्देश्य को अपना रहा हूँ वह न्यायसंगत है—इन चीजों के लिए नहीं। मैं परमेश्वर पर शैतान के हमलों और उसकी बदनामी करने का बदला लेने के लिए अपना कर्तव्य नहीं निभा रहा हूँ। इसके बजाय, मैं परमेश्वर के प्रेम का मूल्य चुकाने, परमेश्वर के आदेश को स्वीकारने और परमेश्वर के कार्य में सहयोग करने के लिए अपने स्वयं के दायित्वों और जिम्मेदारियों को, और बेशक अपनी स्वयं की निष्ठा को पूरा कर रहा हूँ।” क्या यह सही परिप्रेक्ष्य है? क्या लोगों को यह परिप्रेक्ष्य अपनाना चाहिए? (हाँ।) इस दृष्टिकोण से, विभिन्न कार्यक्रम बनाते समय, चाहे वह भजन गाना हो, नृत्य करना हो, फिल्म बनाना हो या अनुभवजन्य गवाहियों के बारे में मंच नाटकों का निर्माण करना हो, क्या लोगों के रुख, जिस दृष्टिकोण से वे देखते हैं, और उनके द्वारा दिए गए कुछ विशिष्ट बयानों में कुछ बदलाव नहीं होने चाहिए? (हाँ, होने चाहिए।) हालाँकि, अधिकांश लोगों ने ये सभी कार्य करते समय, ऐसा आवेग और घृणा, और मानवीय भावनाओं के मेल से किया है। इसलिए, उन्होंने अविश्वासियों, सत्तारूढ़ दल और धार्मिक संसार के क्रियाकलापों और व्यवहारों के बारे में बहुत कुछ उजागर किया है, और उनके शब्द बहुत कठोर हैं, जिससे ऐसे कार्यक्रमों को देखने के बाद दूसरों पर कुछ हद तक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसका कारण सरल है : लोग ये सभी गतिविधियाँ एक निश्चित भावना के साथ करते हैं, बिल्कुल सही दृष्टिकोण से नहीं। और लोगों को अभी भी लगता है कि यह बिल्कुल न्यायसंगत है, वे कहते हैं : “वे हम पर हमला करते हैं, हमें नीचा दिखाते हैं और हमारे बारे में अफवाहें गढ़ते हैं; उन्हें उजागर करने में क्या गलत है? यह वैध आत्मरक्षा है! वैध तरीके से खुद का बचाव करना गैरकानूनी नहीं है, न ही हम कोई बात गढ़ रहे हैं; हम सभी तथ्यों के आधार पर चीजों का गहन-विश्लेषण कर रहे हैं। वे बिना किसी कारण के हमारे बारे में अफवाहें गढ़ते हैं; क्या हमारे लिए उन्हें उजागर करना और उनका गहन-विश्लेषण करना गलत है? क्या हम बदला नहीं ले सकते?” बदला लेने का क्या फायदा? शैतान झूठ से भरे होते हैं और कभी भी एक भी सत्य कथन नहीं बोलते; लगातार उनके झूठ का गहन-विश्लेषण करने से उन्हें पता चलता है कि वे जो कहते हैं वह झूठ है और इसलिए यह मान लेने के बाद कि उन्होंने झूठ बोला है वे फिर कभी झूठ न बोलें—क्या इसमें कोई मूल्य है? क्या वे इसे हासिल कर सकते हैं? (नहीं।) क्या यह नजरिया मूर्खतापूर्ण और अज्ञानतापूर्ण नहीं है? मैंने बहुत पहले कहा है कि हमारा मुख्य कार्य परमेश्वर के कार्य, उसके कार्य द्वारा हासिल प्रभावों, उसके वचनों और लोगों पर उसके वचनों के प्रभाव की गवाही देना है; साथ ही, सत्तारूढ़ दल द्वारा दमन और उत्पीड़न, धार्मिक संसार द्वारा प्रतिरोध और निंदा के संबंध में, इसमें शामिल कुछ पृष्ठभूमि का संक्षेप में उल्लेख करना ही काफी है। लेकिन लोग इसे कैसे भी सुनें, वे इसे समझ नहीं पाते। वे हमेशा इन मुद्दों को उग्रता से लेते हैं और बहस करना चाहते हैं। और इसका नतीजा क्या होता है? इसका कोई प्रभाव नहीं होता, क्योंकि शैतान की बुरी ताकतें तर्क से परे हैं। क्या यह लोगों की मूर्खता और अज्ञानता नहीं है?
अफवाहों को स्पष्ट करने और जो सत्य है उसके बारे में लोगों को बताने, परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाली अंधेरी दुनिया और बुरे इंसानों के खिलाफ युद्ध छेड़ने की एकमात्र प्रेरणा के साथ कुछ लोग सुसमाचार का प्रचार करते हैं, कुछ तकनीकी पेशा सीखते हैं या खास तरह का कर्तव्य करते हैं। क्या यह न्याय का कार्य है? क्या तुम यह काम करने में सही हो या गलत, तुम्हें यह समझने की जरूरत है : क्या परमेश्वर उन दुष्ट लोगों को बचा सकता है जो उसके वैरी हैं? क्या तुम्हारे ऐसा करने का कोई मोल है? यदि तुम्हें समझ नहीं है कि परमेश्वर किस तरह के इंसानों को बचाता है और हमेशा कोई न कोई ऐसा दृष्टिकोण व्यक्त करते हो जो सही प्रतीत होते हैं लेकिन वास्तव में गलत हैं, तो क्या यह तुम्हारे अपने उद्धार में बाधा नहीं पहुँचा रहा है? कुछ लोग अपना कर्तव्य केवल परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाली बुरी ताकतों के खिलाफ लड़ने के लिए और दुनियावी रुझानों का विरोध करने के लिए निभाते हैं। “उनका कहना है कि हम अपने परिवारों को नजरंदाज करते हैं और सामान्य जीवन नहीं जीते हैं, इसलिए मैं अपना कर्तव्य अच्छे से निभाकर स्वयं को साबित करना चाहता हूँ। भविष्य में, जब मैं स्वर्ग जाऊँगा और राज्य में प्रवेश करूँगा और उनका न्याय किया जाएगा, तो वे देख पाएँगे कि मैं सही हूँ!” खुद को इस तरह साबित करने का क्या फायदा है? भले ही तुमने खुद को साबित कर दिया हो, इससे क्या भला हो सकता है? यह क्या दिखाता है? उसका क्या मोल है? यदि यह सचमुच तुम्हें राज्य में प्रवेश करने और परमेश्वर की स्वीकृति हासिल करने देता है, तो यह लाभकारी होगा और तुम्हारा मार्ग सही होगा। लेकिन दुर्भाग्य से, यह मार्ग साध्य नहीं है। यह वो मार्ग नहीं है जो परमेश्वर ने लोगों के लिए पूर्व-निर्धारित किया है, और परमेश्वर लोगों से इस तरह कार्य करने की अपेक्षा नहीं करता है। लोग हमेशा मूर्ख होते हैं, यह सोचते हैं कि चूँकि वे सत्य के पक्ष में खड़े हैं और उनके पास सत्य है, इसलिए उन्हें उचित कार्य करना चाहिए, इस बुरी दुनिया और अफवाहें गढ़ने वाले उन सभी लोगों के खिलाफ युद्ध छेड़ देना चाहिए : “हम परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, हम अपना कर्तव्य निभाते हैं—हम तुम लोगों को दिखाएँगे कि कौन सही मार्ग पर है!” क्या यह उतावलापन नहीं है? क्या इन बातों पर बहस करने से कोई फायदा है? इसका कोई मोल नहीं है। अगर तुम्हारे पास वास्तव में समय और ऊर्जा है, तो किसी पेशे के बारे में कुछ और सीखना, उस पेशे से जुड़ी कुछ और जानकारी और सामान्य ज्ञान का अध्ययन करना बेहतर होगा। यह तुम्हारे कर्तव्य पालन के लिए लाभकारी और सहायक है। तुम हमेशा दुनिया की बुरी ताकतों से क्यों जूझते रहते हो? हमेशा अफवाहों से क्यों जूझते रहते हो? क्या यह उस जगह प्रयास करना नहीं है जहाँ इसकी आवश्यकता नहीं है? चाहे दूसरे तुम पर कैसे भी हमला करें, उन पर ध्यान देने की कोई आवश्यकता नहीं है। वे शैतानी प्रकृति के हैं और जानवर हैं, वे बस उसी तरह की चीज हैं; परमेश्वर उन्हें बचाता नहीं है, उन्हें बदलता नहीं है, और उनसे बात नहीं करता है। परमेश्वर उन्हें अनदेखा करता है, तो क्या तुम्हें उन पर ध्यान देने की जरूरत है? अगर लोग हठपूर्वक वही करने पर अड़े रहते हैं जो परमेश्वर नहीं करता है, तो क्या यह थोड़ी मूर्खता और बुद्धि की कमी नहीं है? कम से कम, तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसके पास परमेश्वर के प्रति समर्पण वाला दिल नहीं है, और तुम परमेश्वर जिससे प्रेम करता है उससे प्रेम नहीं करते, और जिससे वह घृणा करता है उससे घृणा नहीं करते। तुम नहीं देखते कि इन चीजों के प्रति परमेश्वर का रवैया क्या है—परमेश्वर उन्हें अनदेखा करता है; तुम्हें यह भी एहसास नहीं होता कि ऐसा क्यों है। परमेश्वर के कार्य के तीनों चरणों में से प्रत्येक में, परमेश्वर ने कई वचन कहे हैं। परमेश्वर और मानवजाति के बीच कई संवाद हैं, और इन संवादों से, कोई भी परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर के स्वभाव और सार को देख सकता है। हालाँकि, परमेश्वर कभी भी इस बारे में बात नहीं करता है कि वह कुछ विशिष्ट मामलों में किस प्रकार शैतान के साथ बातचीत करता है, और इस प्रकार शैतान को उजागर करता है, जिससे मानवजाति को शैतान का असली चेहरा स्पष्ट रूप से देखने, और यह स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है कि शैतान परमेश्वर के साथ कैसा व्यवहार करता है। ऐसे बहुत से मामले हैं, लेकिन परमेश्वर उनका जिक्र नहीं करता। परमेश्वर उनका जिक्र क्यों नहीं करता? क्योंकि उन चीजों के बारे में बात करना तुम्हारे लिए कोई फायदे की बात नहीं है। तुम्हारे लिए जो सबसे ज्यादा लाभकारी है, वह है परमेश्वर के जीवन के वचन; ये वचन जो तुम्हें परमेश्वर के सामने आने और परमेश्वर के प्रति समर्पित होने, परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने वाला व्यक्ति बनने में सक्षम बना सकते हैं, तुम्हारे लिए सबसे ज्यादा लाभकारी हैं। परमेश्वर तुम्हें बताता है कि कैसे जीना है और कैसे बोलना है, और साथ ही लोगों और मामलों को कैसे पहचानना है और सत्य का अभ्यास करना कैसे सीखना है और विभिन्न परिवेशों और स्थितियों में कैसे बुद्धिमान बनना है—ये सभी तुम्हारे लिए लाभकारी हैं। परमेश्वर जो भी कहता और करता है वह तुम्हारे लिए लाभकारी है। परमेश्वर एक भी वचन ऐसा नहीं कहता जो तुम्हारे लिए लाभकारी नहीं है। क्या परमेश्वर के लिए उन वचनों को कहना बहुत आसान नहीं होगा? तो वह उन्हें क्यों नहीं कहता है? क्योंकि भ्रष्ट मानवजाति को उन वचनों की जरूरत नहीं है। ये अफवाहें दानवों और शैतान के शब्दों के बराबर हैं, और परमेश्वर उन्हें अनदेखा करता है, इसलिए तुम्हें भी उनसे संघर्ष नहीं करना चाहिए। समझे? (समझ गया।) एक बार जब तुम समझ जाते हो, तो तुम्हें पता है कि अभ्यास कैसे करना है, है न? अफवाहों का गहन-विश्लेषण करने, अफवाहों का खंडन करने, अफवाहों के स्रोतों की खोज करने वगैरह में मेहनत मत करो। यदि तुम में वास्तव में परमेश्वर के लिए गवाही देने वाला दिल है और तुम अपनी गवाही में दृढ़ रहना चाहते हो और परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करना चाहते हो, तो ऐसे बहुत से शब्द हैं जो तुम कह सकते हो और बहुत सी चीजें कर सकते हो। परमेश्वर द्वारा लोगों को दिए जाने वाले वचनों और सत्य के लिए तुम्हें उन पर विचार करने और उनका अनुभव करने की आवश्यकता होती है, ताकि वे तुम्हारे अपने सिद्धांत और अभ्यास के मार्ग बन जाएँ, और अंततः तुम्हारा अपना जीवन बन जाएँ। इसे कार्यान्वित करने के लिए तुम्हें समय और ऊर्जा लगानी पड़ेगी। यदि तुम मूर्ख और बेवकूफ हो, हमेशा अफवाहों पर मेहनत करते हो, हमेशा खुद को निर्दोष साबित करने और दुनिया को अपने बारे में सफाई देने की कोशिश करते हो, जिससे मुसीबत आ जाती है, तो तुम सत्य प्राप्त नहीं कर पाओगे और तुम इन दुनियावी अफवाहों में बुरी तरह उलझकर बेहाल हो जाओगे। अंत में, तुम चीजों के बारे में स्पष्ट रूप से नहीं बता पाओगे। तुम चीजों के बारे में स्पष्ट रूप से क्यों नहीं बता पाओगे? क्योंकि तुम दानव का सामना कर रहे हो, और यह सरासर झूठ बोलता है। दानव अब क्या कहता है? बड़ा लाल अजगर कहता है, “चीन विश्व व्यवस्था का रक्षक है, विश्व शांति का रक्षक है और विश्व शांति एवं व्यवस्था बनाए रखने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है।” इसके कहे शब्दों में से कौन से शब्द तथ्य हैं? क्या ये शब्द तथ्य हैं? जब तुम इन शब्दों को सुनते हो, तो क्या तुम्हें नाराजगी महसूस नहीं होती है? इसे सुनने के बाद, तुम सोचते हो कि शैतान इतना बेशर्म है कि वह अब ये बातें भी कहेगा। तुम उससे बहस क्यों करते हो? क्या तुम मूर्खता नहीं कर रहे हो? यह बिल्कुल ऐसी ही चीज है—परमेश्वर इसका उपयोग केवल सेवा प्रदान करने के लिए करता है, उसका इसे बचाने या बदलने का बिल्कुल भी इरादा नहीं है। क्या उससे बहस करना मूर्खता नहीं है? ऐसी बेवकूफी की बातें मत करो। बुद्धिमान लोग इन अफवाहों को नहीं सुनते, न ही वे उनसे बेबस होते हैं। कुछ लोग कहते हैं, “अफवाहें सुनने के बाद, मैं परेशान हो जाता हूँ!” फिर तुम्हें मन में प्रार्थना करनी चाहिए, भेद पहचानने के लिए सत्य का उपयोग करना चाहिए, और फिर उन दानवों और शैतानों को धिक्कारना चाहिए, और फिर इन अफवाहों का तुम्हारे दिल पर कोई असर नहीं होगा। एक दूसरा तरीका भी है : तुम्हें उसके सार से असलियत जाननी चाहिए। तुम कहते हो, “भले ही परमेश्वर के क्रियाकलाप मेरी धारणाओं के अनुरूप न हों और भ्रष्ट मानवजाति द्वारा उनकी निंदा की जाती हो और उन्हें अस्वीकार किया जाता हो, मुझे दिखाई देता है कि वह सत्य है और दानवों और शैतान के पास कोई सत्य नहीं है। मैं परमेश्वर में विश्वास रखने के लिए कृतसंकल्प हूँ! केवल परमेश्वर मुझे बचा सकता है। उसमें परमेश्वर का सार है, वह परमेश्वर है, और उसका सार कभी नहीं बदलता। चाहे दानव और शैतान परमेश्वर का कितना ही प्रतिरोध कर लें, उनके पास कोई सत्य नहीं है, और मैं दानवों और शैतान के शब्दों पर विश्वास नहीं करता हूँ!” क्या तुम में इतनी आस्था है? (हाँ, है।) यदि तुम में यह आस्था है, तो तुम्हें किसी भी व्यक्ति, घटना या चीज से विचलित नहीं होना चाहिए, और शैतान द्वारा तुम्हें गुमराह या आक्रमण किए जाने की चिंता तो और भी कम होनी चाहिए। फिर, तुम्हें क्या करना चाहिए? इसे नजरंदाज करो; और बस सत्य के अनुसरण पर ध्यान केंद्रित करो और अपनी गवाही में अडिग खड़े रहो, और शैतान शर्मिंदा हो जाएगा।
अभी-अभी, हमने कलीसिया के भीतर अफवाहें फैलाने से संबंधित कुछ मुद्दों पर संगति की। अधिकांश लोगों ने चीनी कम्युनिस्ट सरकार और धार्मिक संसार से कुछ अफवाहें सुनी हैं; हमने अभी-अभी इस बारे में भी संगति की कि इन अफवाहों के प्रति कैसे पेश आएँ और उनसे कैसे निपटा जाए। एक बार जब लोग सत्य सिद्धांतों को समझ लेंगे, तो वे अफवाहों से गुमराह या परेशान नहीं होंगे। जब कोई व्यक्ति कलीसिया में अफवाहें फैलाता दिखता है, चाहे वह किसी भी तरीके से या किसी भी लहजे में किसी भी तरह की अफवाहें फैलाए, हमें उससे कैसे निपटना चाहिए? क्या हमें हस्तक्षेप किए बिना ऐसा होने देना चाहिए, या उस व्यक्ति को उजागर करना चाहिए, उसका गहन-विश्लेषण करना चाहिए और उससे निपटना चाहिए? कौन सा तरीका सिद्धांतों के अनुरूप है? कुछ लोग कहते हैं, “क्या बोलने की स्वतंत्रता नहीं है? उस व्यक्ति को बोलने क्यों नहीं दिया जाता? बस उसे बोलने दो। अफवाहों को सुनने के बाद, एक बार जब हर कोई उसे पहचान लेगा कि वह क्या है, तो वे इन शैतानी शब्दों पर विश्वास नहीं करेंगे, और अफवाहें स्वाभाविक रूप से ध्वस्त हो जाएँगी।” अन्य लोग कहते हैं, “उनके लिए अफवाहें फैलाना और परमेश्वर की निंदा करना अस्वीकार्य है। हम उसे ऐसा कुछ नहीं करने दे सकते जिससे परमेश्वर की निंदा हो। हमें उसे होश में लाने के लिए सबक सिखाना चाहिए। परमेश्वर ने हमें बचाने के लिए बोलने और काम करने के लिए बहुत कष्ट सहे हैं, फिर भी वह अफवाहें फैला रहा है। उसके पास कोई जमीर नहीं है! केवल उसे धिक्कार कर ही हम अपनी नफरत को कम कर सकते हैं; अगर हम उससे नहीं निपटेंगे, तो हम परमेश्वर को निराश करेंगे।” कौन सा तरीका सही है? इनमें से कोई भी तरीका अच्छा नहीं है। जैसी कि हमने पहले भी संगति की है, जो लोग अफवाहें फैलाते हैं, वे निश्चित रूप से अच्छे नहीं हैं, और ऐसे व्यक्तियों को पहचाने जाने की आवश्यकता है। यदि वे कभी-कभार ही अफवाहें फैलाते हैं, तो उन्हें चेतावनी दी जानी चाहिए। यदि वे लगातार अफवाहें फैलाते हैं, तो उन्हें उजागर किया जाना चाहिए, उनका गहन-विश्लेषण किया जाना चाहिए, और फिर उन्हें कलीसिया से बाहर निकाल दिया जाना चाहिए, ताकि वे अब लोगों को गुमराह न कर सकें या उन्हें नुकसान न पहुँचा सकें। क्या इस मामले से निपटना आसान है? क्या तुम लोग इससे इस तरह से निपटोगे, या तुम लोग कलीसिया अगुआओं के आदेश की प्रतीक्षा करोगे? एक बार जब यह पता चल जाता है कि कोई व्यक्ति लगातार अफवाहें फैला रहा है, और हर बार जब वह किसी सभा में आता है तो वह इन चीजों के बारे में बात करता है, कभी भी परमेश्वर के वचनों को नहीं पढ़ता है, कभी भी प्रार्थना नहीं करता है, भजन नहीं सीखता है, और इससे भी अधिक, वह परमेश्वर के वचनों की अपनी अनुभवजन्य समझ को साझा नहीं करता है, और जब भी कोई परमेश्वर के वचनों के बारे में संगति करता है और अनुभवजन्य गवाही साझा करता है, तो वह इससे घृणा और विरक्ति महसूस करता है, लेकिन अविश्वासियों की अफवाहों के प्रति ऐसी कोई विरक्ति महसूस नहीं करता है, और उनके बारे में जानने को बहुत उत्साहित हो जाता है—एक बार जब यह सब पता चल जाता है, तो ऐसे व्यक्ति के प्रति कोई भद्रता क्यों दिखायी जाए? यह स्पष्ट है कि वह शैतान का सेवक है जिसने परमेश्वर के चुने हुए लोगों को परमेश्वर का अनुसरण करने से रोकने के लिए कलीसिया में घुसपैठ की है। क्या तुम उसके व्यवधान को अनदेखा कर देते हो? (नहीं।) यदि तुम इसे अनदेखा नहीं करते हो, तो खड़े होकर कहो, “फलाँ व्यक्ति कलीसिया में आता है और हमेशा अफवाहें फैलाता है, परमेश्वर के वचनों को नहीं पढ़ता है, और परमेश्वर के वचनों की अपनी अनुभवजन्य समझ को साझा नहीं करता है। वह छद्म-विश्वासी है और उसे कलीसिया से बाहर निकाल दिया जाना चाहिए। क्या किसी को कोई आपत्ति है?” यदि हर कोई कहता है कि उसे कोई आपत्ति नहीं है और सहमति में अपने हाथ उठाता है, तो उस व्यक्ति को बाहर निकाल दिया जाना चाहिए। क्या इस तरह से अफवाह फैलाने वाले से निपटना संतोषजनक नहीं है? (हाँ, है।) ऐसे लोगों से इसी तरह से निपटा जाना चाहिए।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?