सत्य का अनुसरण कैसे करें (11) भाग दो

हर कोई आशीष पाना चाहता है। कोई भी नष्ट किया जाना और नरक भेजा जाना नहीं चाहता है, लेकिन न चाहते हुए भी बहुत-से लोग बार-बार बुराई करते हैं, उस मार्ग पर तेज रफ्तार से आगे बढ़ते हैं जो नरक की तरफ ले जाता है। कुछ लोग बार-बार परमेश्वर के घर द्वारा अपना कर्तव्य निभाने के दिए गए अवसरों को अनदेखा करते हैं, जब पवित्र आत्मा उन्हें प्रेरित करता है और धिक्कारता है, तो उसे अनदेखा करते हैं और परमेश्वर के घर की मदद और अपेक्षाओं को अनदेखा करते हैं। वे लापरवाही करने, अनियंत्रित होकर बुरे काम करने, मनमाने ढंग से और निरंकुश होकर काम करने और कलीसिया के काम में गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा करने पर अड़े रहते हैं और जरा भी आत्म-चिंतन नहीं करते। क्या वे बस चिकने घड़े, बेशर्म लोग नहीं हैं? तुम लगातार इस तरह बुराई करते हो। ऐसा नहीं है कि दूसरे तुम्हें ऐसा करने के लिए मजबूर करते हैं—यह स्पष्ट रूप से तुम्हारी व्यक्तिगत पसंद है, कुछ ऐसा जिसे तुम व्यक्तिगत रूप से पसंद करते हो और जिसे करने में खुश होते हो। अगर कोई कहता है कि तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो वह परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला और नरक की ओर ले जाने वाला मार्ग है, तो तुम परेशान और नकारात्मक महसूस करते हो। तुम किस बात को लेकर नकारात्मक महसूस कर रहे हो? क्या तुमने खुद ही यह मुसीबत मोल नहीं ली और जो बोया वही नहीं काटा? क्या यह तुम्हारे किए का ही फल नहीं है? कुछ लोग कहते हैं, “मैं न चाहते हुए भी बुराई करता हूँ। हर बार, मैं चीजों को अच्छी तरह से करना चाहता हूँ, लेकिन मेरे करने के बाद, मैं पाता हूँ कि मेरे क्रियाकलापों के परिणाम बहुत अच्छे नहीं हैं।” तुमने बुराई की है, गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा की हैं और कलीसिया के काम को नुकसान पहुँचाया है। भले ही तुम्हारे अपराधों के लिए तुम्हें जवाबदेह न ठहराया जाए, लेकिन उन्होंने अपने पीछे छिपे हुए खतरे छोड़ दिए हैं और तुम भविष्य में उन्हें फिर से कर सकते हो। यह बहुत खतरनाक है। यह बिल्कुल उस रास्ते की तरह है जिस पर कोई व्यक्ति चला हो—वह जहाँ भी चला है, उसके निशान छूटना तय है। क्या तुम उन अपराधों को पहचानते हो जो तुमने किए हैं? क्या तुम उनके लिए पछतावा महसूस करते हो? क्या तुम ऋणी और दुखी महसूस करते हो? क्या तुम उनके कारण फूट-फूटकर रोते हो? क्या तुम बदल चुके हो? क्या तुम सचमुच अपने बुरे कर्मों से नफरत करते हो? क्या तुमने अपने हाथों की बुराई को छोड़ दिया है और परमेश्वर के सामने सचमुच पश्चात्ताप कर लिया है? कुछ लोग कहते हैं : “मुझे भी खुद से नफरत है। मैंने एकांत में अनगिनत बार अपने चेहरे पर थप्पड़ मारे हैं और मैं परमेश्वर के सामने घुटने टेककर, प्रार्थना में फूट-फूटकर रोया भी हूँ।” तुम शायद इन प्रक्रियाओं से गुजरे होगे, लेकिन परमेश्वर इन प्रक्रियाओं को नहीं देखता है। परमेश्वर तुम्हारी अभिव्यक्तियों को देखता है। जब वही स्थिति फिर से उत्पन्न होती है या वही कर्तव्य फिर से तुम्हारे हिस्से में आता है, तो तुम उसके साथ कैसा व्यवहार करते हो? क्या तुममें सच्चाई और वफादारी होती है? क्या तुम कीमत चुका सकते हो? क्या तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य कर सकते हो? तुम्हारे बदलने की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? क्या तुमने अपनी मौजूदा बुराई को छोड़ दिया है? क्या तुम अब भी वही बुरे काम कर रहे हो जो तुमने अतीत में किए थे? क्या तुम अब भी झूठ बोल रहे हो, अब भी मनमाने ढंग से और निरंकुश होकर काम कर रहे हो, अब भी कार्य-व्यवस्थाओं और सत्य सिद्धांतों के खिलाफ जा रहे हो, अब भी अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं के अनुसार काम कर रहे हो और अब भी कलीसिया के काम में गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा करने के लिए बुरे लोगों के साथ साँठ-गाँठ कर रहे हो? अगर तुम अब भी ऐसा ही करते हो, तो तुम्हारा पश्चात्ताप और फूट-फूटकर रोना झूठा और लापरवाही भरा है। लापरवाही भरे, झूठे पश्चात्ताप को किस रूप में निरूपित किया जाता है? (पाखंड।) क्या इसे पाखंड के रूप में निरूपित किया जाता है? इसे धोखे के रूप में निरूपित किया जाता है। क्या यह कथन सटीक है? (हाँ।) परमेश्वर की नजर में, इस तरह फूट-फूटकर रोना और ऐसा पश्चात्ताप धोखा है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर कहता है, “मुझे इस साल की फसल से दस पाउंड चावल भेंट करो।” कुछ लोग इसे भेंट करने के इच्छुक नहीं होते और इसे खाने के लिए अपने पास रखना चाहते हैं, इसलिए वे दस पाउंड चावल की भूसी लेते हैं और उसे वेदी पर रख देते हैं। जब पूछा जाता है कि यह क्या है, तो वे कहते हैं कि यह धान है। परमेश्वर कहता है, “क्या मैंने तुमसे चावल नहीं माँगा था?” वे कहते हैं, “धान ही चावल है।” क्या यह धोखा है? (हाँ।) यह बेशर्मी भरा धोखा है। बुराई करने के बाद, तुम अपना पाप कबूल करते हो, बार-बार कहते हो कि तुम परमेश्वर के ऋणी हो और यहाँ तक कि फूट-फूटकर रोते भी हो, लेकिन बाद में, तुम ऐसा व्यवहार करते हो जैसे कुछ हुआ ही न हो और पहले की तरह ही काम करना जारी रखते हो। परमेश्वर इस तरह के व्यवहार को धोखे के रूप में निरूपित करता है। परमेश्वर की नजर में, इस तरह का धोखेबाज व्यवहार बुरे कर्मों के बराबर है। अगर तुममें सचमुच बदलने और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने का दृढ़ संकल्प है, तो तुम्हें संकल्प लेने या फूट-फूटकर रोने की जरूरत नहीं है। पहले इसे करो—जब तुम इसे कर सको तब परमेश्वर के सामने कसम खाओ। अगर तुम इसे नहीं कर सकते, तो तुम्हें बिल्कुल भी कसम नहीं खानी चाहिए। अगर तुम कसम खाते हो, तो परमेश्वर इसे गंभीरता से लेगा और तुमने जो कसम खाई है उसका नतीजा माँगेगा। अगर तुम इसे पूरा नहीं कर सकते, तो परमेश्वर की नजर में वह धोखा है—परमेश्वर को धोखा देना तुम्हारे खिलाफ दर्ज एक और बुरा कर्म बन जाता है। इसलिए, यदि तुम सचमुच पश्चात्ताप नहीं कर सकते और इसके बजाय अपनी कसमों से परमेश्वर को धोखा देते हो, तो जिस रास्ते पर तुम चल रहे हो वह विनाश की ओर ले जाता है। तुम्हारा हर बुरा कर्म नरक के फाटकों पर एक प्रहार है; शायद इन प्रहारों में से कोई एक अंत में उन्हें खोल देगा और तब तुम्हारी मृत्यु का समय आ चुका होगा। यह कहा जा सकता है कि कुछ लोगों के लिए, जब से उन्होंने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया है तब से लेकर अब तक, उनके सभी क्रियाकलाप और व्यवहार लगातार बुरे कर्मों को जमा करने और नरक के फाटकों पर प्रहार करने वाले रहे हैं और साथ ही, परमेश्वर के क्रोध को संचित करने वाले भी रहे हैं; वे अपने ऊपर परमेश्वर के दण्ड के उतरने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। लेकिन, अन्य लोग परमेश्वर में विश्वास करने की प्रक्रिया में एक सकारात्मक और सही दिशा में प्रगति कर रहे हैं। वे जिस मार्ग पर चलते हैं वह स्वर्ग के राज्य का मार्ग है। इस अवधि के दौरान, यद्यपि वे विद्रोही होते हैं और भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं, बेशक परमेश्वर के बारे में उनकी धारणाएँ और कल्पनाएँ भी होती हैं और अपना कर्तव्य करने में उनकी अपनी इच्छा होती है, इन अभिव्यक्तियों को प्रकट करते हुए या इन व्यवहारों में शामिल होते हुए भी वे लगातार सत्य को स्वीकार कर रहे होते हैं और लगातार अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ रहे होते हैं और उन्हें बदल रहे होते हैं; वे सचमुच बदल चुके होते हैं और उनमें सत्य को स्वीकार करने और उसके प्रति समर्पण करने की अभिव्यक्तियाँ और वास्तविकता होती है। यद्यपि ऐसे लोगों ने कभी कई अपराध किए थे और कुछ ऐसी चीजें की थीं जिनसे परमेश्वर घृणा करता है और जिनकी निंदा करता है, लेकिन सत्य को समझने और बदलने के बाद वे धीरे-धीरे अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ देते हैं और अब बुराई नहीं करते हैं। अपने बदलाव से और सत्य के लिए कष्ट सहने और कीमत चुकाने के अपने दृढ़ संकल्प और निश्चय से, वे परमेश्वर को द्रवित कर देते हैं। साथ ही, उनके प्रयास और क्रियाकलाप और उनके द्वारा तैयार किए गए अच्छे कर्म धीरे-धीरे परमेश्वर की स्वीकृति और अनुमोदन प्राप्त कर लेते हैं और इन चीजों को परमेश्वर द्वारा याद भी रखा जाता है। ऐसे लोगों की समग्र अभिव्यक्तियों को देखते हुए, वे—जैसा कि तुम लोग अक्सर कहते हो—मूलतः सही लोग हैं। ये सही लोग जिस मार्ग पर चलते हैं, वह स्वर्ग के राज्य की ओर ले जाने वाला मार्ग है, वह मार्ग जो उद्धार की ओर ले जाता है। ऐसे लोग उद्धार के मार्ग पर चल रहे हैं। बेशक, इन लोगों की अभिव्यक्तियाँ बुनियादी रूप से दूसरों द्वारा आगे बढ़ाए जाने, उनके पर्यवेक्षण, प्रबंधन या काट-छाँट का नतीजा नहीं होती हैं और न ही कलीसिया के प्रशासनिक आदेशों के विनियम का नतीजा होती हैं। इसके बजाय, वे सक्रिय रूप से बदलते हैं और अपने जीवन प्रवेश में, उनकी अपनी व्यक्तिगत योजनाएँ और रूपरेखाएँ होती हैं, साथ ही उनका अपना सक्रिय दृढ़ संकल्प होता है। ये लोग जिस मार्ग पर चलते हैं वह सही मार्ग है। वे इन सकारात्मक, सक्रिय अभिव्यक्तियों के साथ अपनी मंजिल के लिए अच्छे कर्म तैयार कर रहे हैं। यह उनका व्यक्तिगत, व्यक्तिपरक अनुसरण है जो उनके द्वारा अपनाए जाने वाले मार्ग को निर्धारित करता है और उनके प्रति परमेश्वर का रवैया निर्धारित करता है। अंततः, अपने व्यक्तिगत, व्यक्तिपरक अनुसरण के कारण, वे परमेश्वर से एक उपयुक्त फैसला और एक उपयुक्त मंजिल प्राप्त करने में सक्षम होते हैं।

मुझे बताओ, लोगों को न्यायसंगत कर्म कैसे करने चाहिए और उन्हें ये ऐसी किस दशा और स्थिति में करने चाहिए ताकि इसे अच्छे कर्म तैयार करना माना जाए? कम से कम, उन्हें सकारात्मक और सक्रिय रवैया रखना चाहिए और अपना कर्तव्य करते समय वफादार होना ही चाहिए, सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने में समर्थ होना चाहिए और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करनी चाहिए। सकारात्मक और सक्रिय होना सबसे महत्वपूर्ण है। अगर तुम हमेशा निष्क्रिय रहते हो तो यह समस्या वाली बात है। यह ऐसा है मानो तुम परमेश्वर के घर के सदस्य नहीं हो; तुम अपना कर्तव्य नहीं कर रहे हो, बल्कि तुम्हारे पास वेतन पाने के लिए अपने नियोक्ता के आदेश पर इसे करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है—तुम इसे स्वेच्छा से नहीं करते हो। अगर तुम इसे थोड़ा-बहुत करते भी हो, तो तुम इसे इसलिए कर रहे हो क्योंकि तुम्हें करना पड़ता है और तुम इसे निष्क्रिय रूप से कर रहे हो। अगर इसमें तुम्हारे हित शामिल नहीं होते, तो तुम इसे बिल्कुल नहीं करते या अगर कोई तुम्हारा पर्यवेक्षण नहीं करता, तो तुम इसे बिल्कुल नहीं करते। ऐसे नकारात्मक और निष्क्रिय कार्य अच्छे कर्म नहीं हैं। इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति बहुत मूर्ख है। वह सकारात्मक चीजें करने और जो उसे करना चाहिए उसे करने में बहुत निष्क्रिय होता है—वह वे चीजें नहीं करता जो वह सोच सकता है और न ही वह वे चीजें करता है जिन्हें करने में वह सक्षम है और जिनमें समय और ऊर्जा की आवश्यकता होती है, वह बस इंतजार करता है और किनारे खड़े होकर देखता है, यह सोचते हुए कि अगर दूसरे उन्हें करें, तो यह सबसे अच्छा है। यह परेशानी भरा है और उसके लिए अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करना बहुत मुश्किल है। सबसे पहली बात, ऐसा नहीं है कि तुम्हारी काबिलियत अपर्याप्त है; दूसरी बात, ऐसा नहीं है कि तुम्हारा अनुभव अपर्याप्त है; तीसरी बात, ऐसा नहीं है कि तुम्हारे पास इसे करने की उचित स्थितियाँ नहीं हैं। तुम्हारे पास यह कार्य करने की काबिलियत है और अगर तुम समय और ऊर्जा लगाओ तो इसे करने में सक्षम होगे, लेकिन तुम ऐसा नहीं करते, तुम अच्छे कर्म तैयार करने में असफल रहते हो। यह बहुत अफसोसजनक है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह अफसोसजनक है? ऐसा इसलिए कि अगर तुम कई वर्षों बाद वापस इस पर नजर डालो तो तुम्हें अफसोस होगा और तब अगर तुम उस वर्ष, उस महीने और उस दिन पर वापस जाकर उस कार्य को करना चाहो तो चीजें बदल चुकी होंगी और वह समय पहले ही गुजर चुका होगा। तुम्हें उस जैसा दूसरा मौका नहीं मिलेगा; जब वह मौका गुजर जाता है तो वह गुजर जाता है, जब वह खो जाता है तो वह खो जाता है। अगर तुम बढ़िया खाना खाने या बढ़िया कपड़े पहनने जैसे दैहिक सुखों से वंचित रह जाते हो तो इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि ये चीजें खोखली हैं और इनका तुम्हारे जीवन प्रवेश या अच्छे कर्मों की तैयारी या तुम्हारे गंतव्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। लेकिन, अगर कोई चीज परमेश्वर के तुम्हारे प्रति रवैये और मूल्यांकन से जुड़ी है या यहाँ तक कि तुम जिस मार्ग पर चलते हो उससे और तुम्हारे गंतव्य से भी जुड़ी है तो इसे करने का अवसर खो देना बहुत ही अफसोसजनक है। वह इसलिए क्योंकि यह भविष्य में तुम्हारे अस्तित्व के मार्ग पर एक दाग छोड़ जाएगा और पछतावा उत्पन्न करेगा और तुम्हें अपने पूरे जीवन में इसकी भरपाई करने का कभी कोई दूसरा मौका नहीं मिलेगा। क्या यह अफसोसजनक नहीं है? अगर तुम्हारी काबिलियत बहुत खराब है और तुम यह कार्य नहीं कर सकते हो तो यह अफसोसजनक नहीं है—परमेश्वर का घर इसे करने के लिए किसी दूसरे की व्यवस्था कर सकता है। अगर तुम इसे अच्छी तरह से करने में सक्षम हो, लेकिन तुम इसे नहीं करते हो तो यह बहुत ही अफसोसजनक है। यह अवसर तुम्हें परमेश्वर ने दिया है, लेकिन तुम इसे गंभीरता से नहीं लेते हो, तुम इस अवसर का फायदा नहीं उठाते हो और इसे हाथ से फिसलने देते हो—यह अत्यंत अफसोसजनक है! तुम्हारे लिए यह अफसोसजनक है; परमेश्वर के लिए यह निराशाजनक है। परमेश्वर ने तुम्हें पर्याप्त काबिलियत और श्रेष्ठतर स्थितियाँ दी हैं जो तुम्हें कुछ चीजें स्पष्टता से देखने देती हैं और इस कार्य के लिए योग्य बनने देती हैं। लेकिन तुम अपने कर्तव्य के प्रति सही रवैया नहीं रखते, तुममें कोई ईमानदारी नहीं है, लगन की तो बात ही दूर है और तुम इसे अच्छी तरह से करने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास नहीं करना चाहते हो। यह परमेश्वर को बहुत ही निराश करता है। तो, यदि तुम आलसी हो और हमेशा यह महसूस करते हो कि तुम्हें सौंपा गया कार्य परेशानी भरा है और तुम उसे करना नहीं चाहते हो और मन ही मन बड़बड़ाते हो, “मुझसे यह करने के लिए क्यों कहा जा रहा है, किसी और से क्यों नहीं?” तो यह एक मूर्खतापूर्ण विचार है। जब कोई कर्तव्य तुम्हारे हिस्से में आता है, तो यह कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं है, यह एक सम्मान है और यह परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उत्कर्ष है। तुम्हें इसे खुशी-खुशी स्वीकार करना चाहिए और वह कर्तव्य करना चाहिए जो तुम्हें करने की जरूरत है; यह तुम्हें नहीं थकाएगा। बल्कि, अगर तुम अपना कर्तव्य अच्छे से निभाते हो, सत्य को समझते हो और समस्याओं का समाधान करते हो, तो तुम अपने मन में शांति और सुकून महसूस करोगे और तुमने परमेश्वर को निराश नहीं किया होगा। परमेश्वर के सामने, तुममें आस्था होगी और तुम सिर उठाकर आचरण कर सकोगे। अगर तुमने अपना कर्तव्य अच्छे से नहीं निभाया है और हमेशा अनमने रहते हो, तो यह एक अपराध है और भले ही तुम्हारे कारण कोई नुकसान न हुआ हो, इस अपराध के कारण तुम्हारे दिल में जीवन भर का पछतावा होगा। यह अपराध एक अथाह काले गड्ढे जैसा होगा; जब भी तुम इसके बारे में सोचोगे, तुम्हें दर्द और बेचैनी महसूस होगी, एक ऐसी वेदना जो दिल में चुभती है। तुम्हें न केवल जरा भी शांति या आनंद नहीं मिलेगा, बल्कि इसके विपरीत, पछतावे और यंत्रणा का यह दर्द तुम्हारे पूरे जीवन भर साथ रहेगा और इसे कभी मिटाया नहीं जा सकेगा। क्या यह अनंत पछतावा नहीं है? तो परमेश्वर की नजर से क्या? परमेश्वर इस मामले को निरूपित करने के लिए सत्य सिद्धांतों का उपयोग करता है, इसलिए इसकी प्रकृति उससे कहीं ज्यादा गंभीर है जो तुम महसूस करते हो। क्या तुम यह समझते हो? (हाँ।) तो, तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो उसे देखने के लिए परमेश्वर तुम्हारे सामान्य कार्य-प्रदर्शन पर और सत्य और तुम्हारे कर्तव्य के प्रति तुम्हारे रवैये पर समग्र सोच-विचार करेगा। मान लो कि सत्य और अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा रवैया हमेशा लापरवाह होता है और तुम सतही तौर पर वादे करते हो, लेकिन पर्दे के पीछे उन पर अमल नहीं करते, तुम टालमटोल करते हो, ढिलाई बरतते हो और तुममें परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होने का सकारात्मक रवैया नहीं होता। भले ही बाहरी तौर पर तुम गड़बड़ी और बाधाएँ पैदा नहीं करते, बुरा काम नहीं करते हो, मनमानी और लापरवाही से काम नहीं करते हो या बुरे कर्म करते हुए निरंकुश नहीं दौड़ते हो और देखने में तुम एक नियम का पालन करने वाले काफी शिष्ट व्यक्ति लगते हो, लेकिन तुम परमेश्वर द्वारा तुमसे जो करने की माँग की जाती है उसे सकारात्मक और सक्रिय रूप से नहीं करते, बल्कि तुम धूर्त हो और कामचोरी करते हो और वास्तविक कार्य करने से बचते हो। ऐसे में आखिर तुम वाकई किस मार्ग पर चल रहे हो? अगर यह मसीह-विरोधी का मार्ग न भी हो, तो भी कम से कम यह नकली अगुआ का मार्ग तो है ही।

कुछ लोगों को देखकर लगता है कि अपना कर्तव्य करने में उनमें समर्पण है, ऊपरवाला जो भी व्यवस्था करता है वे उसे करते हुए लगते हैं। लेकिन जब उनसे पूछा जाता है, “क्या तुम अपना कर्तव्य लापरवाही से करते हो? क्या तुम इसे सिद्धांतों के अनुसार करते हो?” तो वे कोई निश्चित उत्तर नहीं दे पाते हैं, बस इतना कहते हैं, “मैं वैसा ही करता हूँ जैसा ऊपरवाला निर्देश देता है और बेतहाशा गलत कर्म करने की हिम्मत नहीं करता।” जब उनसे पूछा जाता है कि क्या उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी की है तो वे कहते हैं, “खैर, मैं वही कर रहा हूँ जो मुझे करना चाहिए।” अपना कर्तव्य निभाने में वह हमेशा इसी तरह का रवैया रखता है, बिना किसी जल्दबाजी के और उदासीन। यद्यपि कोई स्पष्ट समस्या उत्पन्न नहीं हुई है, लेकिन अगर सत्य सिद्धांतों के अनुसार मापा जाए, तो उसका कर्तव्य निर्वहन अकुशल है और यह मानक स्तर का नहीं है। लेकिन उसे कोई परवाह नहीं है। वह अब भी उसी लापरवाही भरे तरीके से काम करता है जैसे उसने अतीत में किया था और जिन चीजों को करने के लिए उसे पहल करनी चाहिए, उनके मामले में वह अब भी उतना ही निष्क्रिय है—वह बिल्कुल नहीं बदला है। क्या वे चिकने घड़े नहीं होते हैं? वे हमेशा यही रवैया बनाए रखते हैं : “तुम्हारे पास हजारों शानदार योजनाएँ हो सकती हैं, लेकिन मेरे अपने कुछ नियम हैं। मैं बस ऐसा ही हूँ! देखते हैं तुम मेरे साथ क्या कर सकते हो। मेरा यही रवैया है!” उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है जो अत्यंत विश्वासघाती या बुरा हो, लेकिन उन्होंने शायद ही कोई अच्छे कर्म किए हैं। तुम क्या कहोगे कि वे किस मार्ग पर चल रहे हैं? क्या परमेश्वर में विश्वास और अपने कर्तव्य के प्रति इस तरह का रवैया अच्छा है? (नहीं।) बाइबल में प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में परमेश्वर यह कहता है : “इसलिये कि तू गुनगुना है, और न ठंडा है और न गर्म, मैं तुझे अपने मुँह में से उगलने पर हूँ” (प्रकाशितवाक्य 3:16)। गुनगुना होना, यानी न ठंडा होना और न ही गर्म—क्या यह रवैया अच्छा है? (नहीं।) इस प्रकार का व्यक्ति अपने मन में अपना खुद का हिसाब-किताब भी रखता है : “जब तक मैं अपना कर्तव्य निभाने में कोई बुराई नहीं करता या कलीसिया के काम में गड़बड़ी पैदा नहीं करता, तब तक मुझे दोषी नहीं ठहराया जाएगा। अगर अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करना बहुत थका देने वाला है और इसमें बहुत अधिक कष्ट सहने की आवश्यकता है, तो मैं इसे नहीं करूँगा। मैं खुद को नहीं थकाऊँगा, लेकिन मैं कोई बड़ी गलती भी नहीं करूँगा। इस तरह, मुझे बाहर नहीं निकाला जाएगा या हटाया नहीं जाएगा और मैं अब भी उन लोगों से बहुत बेहतर हूँ जो कोई कर्तव्य नहीं करते हैं। इसलिए मैं गुनगुना रहता हूँ, न ठंडा और न ही गर्म। तुम मुझसे जो भी करने को कहोगे, मैं उसे करूँगा। लेकिन अगर तुम मुझे कुछ करने को नहीं कहोगे तो मैं दखल नहीं दूँगा। इस तरह से मुझे थकान नहीं होगी और इसके अलावा, लोग मुझमें कोई गलती नहीं ढूँढ़ पाएँगे। यह तरीका बढ़िया है!” क्या आचरण करने का यह तरीका अच्छा है? (नहीं।) तुम जानते हो कि यह अच्छा नहीं है, तो तुम्हारे अभ्यास में कैसा बदलाव आना चाहिए? यदि तुम सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलने का प्रयास कभी नहीं करते और फिर भी शैतान के फलसफों के अनुसार जीते रहते हो, तो तुम्हारे उद्धार पाने की कोई आशा न होना तय है। अगर तुम दुनिया में इस तरह से आचरण करते हो, तो तुम्हें वाकई फायदा होगा। सांसारिक आचरण का तुम्हारा फलसफा और रवैया तुम्हारी रक्षा करेगा और तुम लोगों को नाराज भी नहीं करोगे। इसके अलावा, प्रतिष्ठा और शोहरत वाले वे उच्च वर्ग के लोग यह महसूस नहीं करेंगे कि तुम उनके लिए कोई खतरा हो और वे सभी तुम्हारी बहुत सराहना करेंगे। बिना रुतबे वाले वे निम्न वर्ग के लोग भी तुम्हें नाराज करने की हिम्मत नहीं करेंगे। इसलिए, तुम काफी लोकप्रिय होगे—निम्न वर्ग के लोगों और उच्च वर्ग के लोगों, दोनों के लिए तुम ऐसे व्यक्ति होगे जिसे वे अपने पक्ष में करना चाहेंगे, तुम बहुत माँग में रहने वाले व्यक्ति होगे और तुम ऊँचे और नीचे, अच्छे और बुरे, सभी वर्गों में आसानी से ढल सकोगे। लेकिन, अगर तुम परमेश्वर के घर में और परमेश्वर के सामने सांसारिक आचरण के प्रति अब भी इसी तरह के रवैये का उपयोग करते हो, तो यह काम नहीं करेगा। सत्य से जुड़े सभी विभिन्न सिद्धांतों को तुमसे एक रवैये की आवश्यकता होती है और यह रवैया या तो सही होता है या गलत, यह या तो काला होता है या सफेद, सच होता है या झूठ—यह विशेष रूप से स्पष्ट है और विशेष रूप से सिद्धांतवादी है। उन्हें तुम्हारे रुख और तुम्हारे सटीक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, न कि तुम्हारे बीच के रास्ते वाले दृष्टिकोण की। जो लोग बीच का रास्ता अपनाते हैं वे सत्य के सामने मजबूती से खड़े नहीं रह सकते। ऐसा मत सोचो, “देखो मेरे जीने का तरीका कितना चतुराई भरा है। मैंने बचपन से ही इस तरीके का उपयोग करके खुद की रक्षा करना सीखा है और अब तक के अपने जीवन पर पीछे मुड़कर देखने पर, मुझे लगता है कि यह तरीका बहुत व्यावहारिक है। परमेश्वर में विश्वास करने के बाद, मैं अब भी इसी तरीके से जीता हूँ। परमेश्वर में विश्वास करने के इन वर्षों में, मेरी काट-छाँट नहीं की गई है, मैं अपना कर्तव्य निभाने में गंभीर रूप से विफल नहीं हुआ हूँ, मुझे किसी बड़े शोधन या परीक्षण का सामना नहीं करना पड़ा है और परमेश्वर ने कभी मेरी निंदा नहीं की है या मेरा तिरस्कार नहीं किया है। देखो, मैं अपने आचरण में कितना सफल हूँ, मैं इसमें कितना कुशल हूँ!” तुम गलत हो! तुम नहीं जानते कि आचरण कैसे करना है—तुम हर मामले से निपटने और सत्य के साथ पेश आने के लिए एक धूर्त तरीके का उपयोग करते हो। यह तरीका पूरी तरह से गलत है और ऐसा करके तुम मजबूती से खड़े नहीं रह सकते। किस्मत पर भरोसा करने की मानसिकता मत रखो, यह सोचते हुए, “मैं ऐसा किया करता था और हमेशा सफल होता था। मैं कभी विफल नहीं हुआ और मैंने कभी अपना सम्मान नहीं खोया या अपनी अज्ञानता नहीं दिखाई। अब जबकि मैं परमेश्वर में विश्वास करता हूँ, मैं अब भी सांसारिक आचरण की इस सबसे परिष्कृत रणनीति पर कायम रहूँगा।” मैं कहता हूँ कि यह तुम्हारी मूर्खता है! परमेश्वर लोगों को बचाने के लिए इतने सारे वचन क्यों बोलता है? यह ठीक इसलिए है ताकि लोग इन वचनों के मार्गदर्शन में यह समझ सकें कि जीवन में सही मार्ग क्या है और लोगों को किस तरह के मार्ग पर चलना चाहिए; यह तुम्हें चुनने देने के लिए है—यह तुम्हें यहाँ अवसरवादी बनकर काम निकालने देने के लिए नहीं है। अगर यह तुम्हें अवसरवादी बनकर काम निकालने देने के लिए होता, तो परमेश्वर ये वचन नहीं बोलता या यह कार्य नहीं करता। ऐसा क्यों है कि विभिन्न मामलों के बारे में हमारी संगति में, सत्य के खिलाफ जाने वाली सभी चीजों को बिल्कुल स्पष्ट कर दिया जाता है? यह ठीक तुम्हें यह बताने के लिए है कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं, ताकि तुम उनके बीच स्पष्ट रूप से अंतर कर सको और उन्हें साफ-साफ देख सको। सकारात्मक चीजें और नकारात्मक चीजें परमेश्वर के सामने पूरी तरह से खुली, प्रकट और पारदर्शी हैं—वे अस्पष्ट नहीं हैं। इसलिए, परमेश्वर तुमसे कुछ भी करने और अपना मार्ग चुनने में स्पष्ट होने की अपेक्षा करता है—तुम्हारा रवैया स्पष्ट होना चाहिए और तुम्हारे विचार और दृष्टिकोण स्पष्ट होने चाहिए; कुछ भी अस्पष्ट नहीं होना चाहिए। जिसमें सत्य और सत्य सिद्धांत शामिल हैं उसमें कुछ भी अस्पष्ट नहीं है—काला काला है, सफेद सफेद है, हाँ का मतलब हाँ है, ना का मतलब ना है। एक झूठ, भले ही हजार बार बोला जाए, फिर भी झूठ ही रहता है और कभी सत्य नहीं बन सकता। सत्य, भले ही दुनिया में कम लोग इसे स्वीकार करें या भले ही कई राष्ट्र इसे अस्वीकार करें और इसकी निंदा करें, सत्य ही रहता है। सत्य हमेशा सत्य होता है और यह बिल्कुल भी कोई भ्रांति या विधर्म नहीं बनेगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितने लोग शैतान की नकारात्मक चीजों का अनुसरण करते हैं या वे कितने वर्षों से एक सांसारिक प्रवृत्ति बन गई हैं, वे अब भी नकारात्मक चीजें हैं और अब भी शैतान की हैं—वे कभी सकारात्मक चीजों में नहीं बदलेंगी। इसके विपरीत, सकारात्मक चीजें, भले ही इस दुनिया में उन पर हमला किया जाए, उन्हें दबाया जाए और उनकी निंदा की जाए, सकारात्मक चीजें ही रहती हैं और कभी नकारात्मक चीजें नहीं बनेंगी। परमेश्वर हमेशा परमेश्वर है, हमेशा न्याय का प्रतिरूप है और हमेशा सभी सकारात्मक चीजों का प्रतिनिधि है। परमेश्वर का दर्जा अपरिवर्तनीय है और उसका सार अपरिवर्तनीय है। इस बीच, शैतान हमेशा शैतान है, हमेशा बुराई का प्रतिरूप है, हमेशा बुराई की धुरी का प्रतिनिधि है, हमेशा नकारात्मक है और यह कभी सकारात्मक चीज नहीं बनेगा।

कुछ लोग कहते हैं, “कलीसिया में रहते हुए तुम्हें लचीला होना चाहिए। किसी भी दिशा में बहुत अधिक मत झुको। सत्य को स्वीकार मत करो, लेकिन इसे नापसंद भी मत करो; सकारात्मक या नकारात्मक लोगों को नाराज मत करो। बस तटस्थ रहना ही सबसे अच्छा है। मैं सकारात्मक चीजों का विरोध नहीं करता और मैं नकारात्मक चीजों की आलोचना नहीं करता। मैं सत्य का अनुसरण करने वाले लोगों की चापलूसी नहीं करता या उनका पक्ष लेने की कोशिश नहीं करता और न ही मैं उनके करीब जाता हूँ। मैं मसीह-विरोधियों से भी खुद को दूर नहीं करता। तुम मेरा क्या कर सकते हो? देखो मैं जीवन को कितनी स्पष्टता से समझता हूँ!” क्या यह स्पष्टता से समझना है? यह स्पष्टता से समझना नहीं है; यह मूर्खता है। यह भ्रमित होना और सही-गलत के बीच अंतर करने में असमर्थ होना है। ऐसा व्यक्ति एक भ्रमित व्यक्ति है। मैं तुम्हें बताता हूँ, इस तरह का दोगला व्यक्ति बिल्कुल भी अच्छा नहीं है। इस तरह से जीने का अंतिम नतीजा क्या होगा? (उसका कोई परिणाम और कोई गंतव्य नहीं होगा।) उसने अपना खुद का गंतव्य बर्बाद कर लिया होगा। यद्यपि वह सकारात्मक चीजों का विरोध नहीं करता है, लेकिन सार रूप में, उसने सकारात्मक चीजों को स्वीकार भी नहीं किया है। विरोध न करना स्वीकार करने के समान नहीं है और नकारात्मक चीजों की आलोचना न करना उन्हें जाने देने के समान नहीं है। क्या तुम्हें लगता है कि सकारात्मक चीजों को स्वीकार न करके और नकारात्मक चीजों की आलोचना न करके, तुमने नकारात्मक चीजों और नकारात्मक दृष्टिकोणों को छोड़ दिया है? तुम उन्हें नहीं छोड़ सकते। केवल सकारात्मक चीजों को स्वीकार करके और सत्य को स्वीकार करके ही लोगों के नकारात्मक विचारों और दृष्टिकोणों को, साथ ही शैतान के दुष्ट विचारों और दृष्टिकोणों को, धीरे-धीरे छोड़ा और तोड़ा जा सकता है; केवल तभी लोग सत्य सिद्धांतों के अनुरूप अभ्यासों, अंतर्दृष्टि, समझ और कसौटियों के साथ-साथ सकारात्मक विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकार कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, अगर तुम सकारात्मक विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकार करना चाहते हो, अगर तुम सत्य को स्वीकार करना चाहते हो, अगर तुम चाहते हो कि सत्य तुम्हारे भीतर प्रवेश करे और तुम्हारा जीवन बन जाए, तो तुम्हें सबसे पहले अपने भीतर जो कुछ है उसे खाली करना होगा और फिर सत्य को स्वीकार करना होगा और सत्य को अपने भीतर प्रवेश करने और अपने दिल में सत्ता सँभालने की अनुमति देनी होगी। यह सत्य को जीवन के रूप में पाना है। सत्य का अनुसरण करने का अभ्यास इसी तरह किया जाता है। परमेश्वर में विश्वास करने का प्राथमिक उद्देश्य सत्य प्राप्त करना है। तुम्हें सत्य के खिलाफ जाने वाले विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों का भेद पहचानने में समर्थ होना चाहिए। विशेष रूप से अगर तुम ऐसे व्यक्ति हो जो शैतान के फलसफे का अनुसरण करता है, तो तुम्हें बीच का रास्ता अपनाने वाले दृष्टिकोण के धूर्त विचारों और दृष्टिकोणों को छोड़ देना चाहिए और सचेत रूप से उनके खिलाफ विद्रोह करना चाहिए। जब तुम्हारे सामने आने वाली स्थितियों में ऐसे विचार और दृष्टिकोण उत्पन्न होते हैं, तो तुम्हें यह एहसास करना चाहिए कि वे गलत हैं और तुम्हें सोचना चाहिए : “परमेश्वर के वचन क्या कहते हैं? परमेश्वर क्या अपेक्षा करता है? कार्य करने का जो भी तरीका सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होगा, मैं पहल करूँगा और उसी के अनुसार कार्य करने का प्रयास करूँगा, बीच का रास्ता अपनाने वाले नजरिए के विचारों और दृष्टिकोणों को खुद पर हावी नहीं होने दूँगा या सत्य का अभ्यास करने में बाधा नहीं बनने दूँगा। इसके बजाय, मुझे परमेश्वर के वचनों को, सत्य को अपने आचरण और क्रियाकलापों के लिए और अपना कर्तव्य निभाने के लिए कसौटी बनने देना होगा।” इस तरह से अभ्यास करने से एक अलग नतीजा सामने आएगा। भले ही यह बहुत छोटा मामला हो और परमेश्वर द्वारा याद रखे जाने के लायक न हो, कम से कम, परमेश्वर इसकी निंदा नहीं करेगा। जैसे-जैसे तुम्हारे क्रियाकलाप इस तरह थोड़ा-थोड़ा करके जमा होते हैं, तुम्हारे अच्छे कर्म धीरे-धीरे तैयार होते जाएँगे। अगर तुम्हारे क्रियाकलापों को परमेश्वर की नजर में अच्छे कर्म माना जा सकता है, तो तुम्हारे पास उम्मीद होगी। तुम्हारे पास एक सही और सकारात्मक दिशा और लक्ष्य होना शुरू हो जाएगा और तुम एक सकारात्मक व्यक्ति, एक सही व्यक्ति बनना शुरू कर दोगे। इस तरह, तुमने खुद को नरक की ओर ले जाने वाले विनाश के मार्ग से दूर कर लिया होगा और धीरे-धीरे स्वर्ग के राज्य की ओर ले जाने वाले मार्ग की ओर मुड़ गए होगे। यह किसी व्यक्ति के बदलने में सक्षम होने का एक अच्छा नतीजा है। क्या इसे हासिल करना आसान है? यह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति सत्य से किस हद तक प्रेम करता है। अगर तुम कोई गलती करते हो और सिर्फ यही कहते हो : “मुझे वाकई खुद से नफरत है! मैं ऐसी नीच, घिनौनी चीज कैसे कर सकता हूँ? मुझे वाकई अपने गालों पर थप्पड़ मारने की बेचैनी हो रही है!” सिर्फ खुद से नफरत करना, इससे कोई फायदा नहीं होगा। मुख्य चीज यह है कि जब तुम कोई गलती करते हो तो तुम्हें यह भेद पहचानने में समर्थ होना चाहिए कि इसमें क्या गलत है, किस चीज ने तुम्हें ऐसा करने के लिए उकसाया है, तुम सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ क्यों हो, इसका मूल कारण क्या है और तुम्हारे क्रियाकलापों का आधार और सिद्धांत क्या हैं। मुख्य चीज यह भी है कि किसी मामले का सामना करने पर क्या तुम सचेत रूप से परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य कर रहे हो और सचेत रूप से अपने शैतानी विचारों और नजरियों, अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं और अपने इरादों और योजनाओं के खिलाफ विद्रोह कर रहे हो या नहीं। अगर तुमने सचेत रूप से ये सभी चीजें की हैं तो तुमने अच्छे कर्मों की तैयारी की है और यह एक बहुत अच्छी चीज है और तुमने कुछ प्राप्त किया है। क्या इस तरह का नतीजा अच्छा है? क्या तुम लोग यही नतीजा देखना चाहते हो? क्या तुम लोग इसी का अनुसरण करना चाहते हो? (हाँ।) अब अधिकांश लोगों का दृष्टिकोण कैसा है? वह यह है : “मैं बुराई नहीं करता या गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा नहीं करता। जब तक मुझे पूर्णकालिक कर्तव्य वाली कलीसिया से बाहर नहीं निकाला जाता, तब तक सब ठीक है। यद्यपि मैंने बहुत-से अच्छे कर्म तैयार नहीं किए हैं और अपने कर्तव्य में मैं बहुत वफादार नहीं हूँ, मुझमें बहुत सच्चाई नहीं है और मैं सत्य सिद्धांतों के अनुसार गंभीरता से अभ्यास नहीं करता, लेकिन जब तक मैं बुराई नहीं करता या गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा नहीं करता, क्या उतना पर्याप्त नहीं है?” यह दृष्टिकोण कैसा है? यह एक पतित विचार और दृष्टिकोण है—यह ऐसा दृष्टिकोण है जो प्रगति नहीं चाहता। तुम्हें बिल्कुल नहीं सोचना चाहिए कि जब तक तुम बुराई नहीं करते या गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा नहीं करते, तब तक तुम एक अच्छे व्यक्ति हो, एक सत्यनिष्ठ व्यक्ति हो, तुम अडिग रह सकते हो और तुम जो करते हो वह सत्य के अनुरूप है। मैं तुम्हें बताता हूँ, यह गलत है—यह सोचने का एक मूर्खतापूर्ण तरीका है! बुराई न करना अच्छे कर्मों की तैयारी करने के बराबर नहीं है। बुराई न करना और अच्छे कर्मों की तैयारी करना दो अलग-अलग अवधारणाएँ हैं। बुराई किए बिना कोई कर्तव्य निभाना वही है जो एक सृजित प्राणी को करना चाहिए; यह एक अभिव्यक्ति है जो उन लोगों में होनी चाहिए जिनमें सामान्य मानवता का जमीर और विवेक है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग कहते हैं : “ऐसे भी लोग हैं जो हत्या कर देते हैं, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया है; उस व्यक्ति ने दूसरों की चीजें चुराई हैं, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया है। इसका मतलब है कि मैं एक अच्छा व्यक्ति हूँ।” क्या यह डींग हाँकने लायक चीज है? क्या उनका जोर देकर यह कहना सही है? (नहीं है।) यह अवधारणाओं का मिश्रण करना है। चोर न होना, हत्या या आगजनी न करना और अवैध यौन संबंधों में लिप्त न होना एक अच्छा व्यक्ति होने के बराबर नहीं है। बुराई न करना या कानून न तोड़ना एक अच्छा व्यक्ति होने से भिन्न अवधारणा है। एक अच्छा व्यक्ति होने के अपने मानक होते हैं। बुराई न करना और अच्छे कर्मों की तैयारी करना भी दो अलग अवधारणाएँ हैं। बुराई किए बिना अपना कर्तव्य निभाना कुछ ऐसा है जिसे तुम्हें एक सामान्य व्यक्ति के रूप में प्राप्त करना चाहिए। लेकिन अच्छे कर्मों की तैयारी करने का मतलब है कि तुम्हें सक्रिय और सकारात्मक रूप से सत्य का अभ्यास करना चाहिए और परमेश्वर की अपेक्षाओं और सत्य सिद्धांतों के अनुसार अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। तुममें निष्ठा होनी चाहिए, तुम्हें कष्ट सहने और कीमत चुकाने को तैयार रहना चाहिए, जिम्मेदारी लेने को तैयार रहना चाहिए और सकारात्मक और सक्रिय रूप से कार्य करने में समर्थ होना चाहिए। इन सिद्धांतों के अनुसार किए गए सभी क्रियाकलाप बुनियादी रूप से अच्छे कर्म हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे बड़े मामले हैं या छोटे, वे लोगों द्वारा याद किए जाने लायक हैं या नहीं, उन्हें लोगों से बहुत सम्मान मिलता है या वे महत्वहीन माने जाते हैं या क्या लोग उन्हें ध्यान देने योग्य समझते हैं, परमेश्वर की नजर में वे सभी अच्छे कर्म हैं। अगर तुमने अच्छे कर्म तैयार किए हैं, तो अंत में यह तुम्हारे लिए आशीषें लेकर आएगा, विपत्तियाँ लेकर नहीं। कुछ लोग किसी अच्छे कर्म की तैयारी बिल्कुल भी नहीं करते और बस इस बात से संतुष्ट रहते हैं : “मुझे जो भी करने को कहा जाता है, मैं करता हूँ और मुझे जहाँ भी जाने को कहा जाता है, मैं चला जाता हूँ। मैं कभी भी मनमाने ढंग से कुछ नहीं बोलता या कोई कार्य नहीं करता और मैं कभी भी शरारत की भावना से परेशानी खड़ी नहीं करता या गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा नहीं करता। मैं वास्तव में आज्ञाकारी और शिष्ट हूँ।” वे हमेशा इसी तरह का रवैया रखते हैं। वे सक्रिय रूप से सत्य की खोज नहीं करते या अपना कर्तव्य निभाने में सिद्धांतों का पालन नहीं करते। जब उन्हें अपने विचलनों और गलतियों का पता चलता है, तो वे उन्हें तुरंत नहीं सुधारते या नहीं बदलते। जब उन्हें पता चलता है कि वे विद्रोही रहे हैं और उन्होंने भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किए हैं, तो वे कभी आत्म-चिंतन नहीं करते और न ही वे समस्या को हल करने के लिए सक्रिय रूप से सत्य की खोज करते हैं; इसके बजाय, वे बस वही करते हैं जो वे करना चाहते हैं। यद्यपि उन्होंने कोई ऐसी बड़ी बुराई नहीं की है जिससे परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचे, लेकिन फिर भी उन्होंने कलीसिया के काम की प्रगति को प्रभावित किया है। ज्यादा से ज्यादा, उनका कर्तव्य निर्वहन सिर्फ मजदूरी करना है और मजदूरी करना, अपनी प्रकृति से, एक अच्छा कर्म होने से कमतर है। तो आखिरकार अच्छे कर्मों को कैसे परिभाषित किया जाता है? इस तरह कि तुम जो करते हो वह कम से कम तुम्हारे और भाई-बहनों के जीवन प्रवेश के लिए उपयोगी होता है और परमेश्वर के घर के कार्य के लिए लाभदायक होता है। अगर यह तुम्हारे लिए, दूसरों के लिए और परमेश्वर के घर के लिए लाभदायक है, तो तुम्हारा समग्र व्यवहार परमेश्वर के सामने प्रभावी और परमेश्वर द्वारा अनुमोदित है। परमेश्वर तुम्हें अंक देगा। इसलिए इन चीजों का मूल्यांकन करो : तुमने बीते वर्षों में कितने अच्छे कर्म तैयार किए हैं? क्या ये अच्छे कर्म तुम्हारे अपराधों की भरपाई कर सकते हैं? उनकी भरपाई करने के बाद कितने अच्छे कर्म बचते हैं? तुम्हें खुद को अंक देने और इस पर मजबूत पकड़ बनाने की जरूरत है; तुम्हें इस मामले को लेकर मानसिक भ्रम की स्थिति में नहीं होना चाहिए।

मुझे बताओ, क्या इन मामलों पर मेरी संगति आवश्यक है? (हाँ।) मुझे तुम लोगों से ये वचन कहने चाहिए और तुम लोगों को कुछ निर्देश देने चाहिए। तुम लोगों को निर्देश देने का उद्देश्य तुम लोगों का उत्साह कम करना नहीं है, न ही तुम लोगों पर हँसना है, तुम लोगों की निंदा करना तो बिल्कुल नहीं है, बल्कि तुम लोगों को याद दिलाना है, खतरे की घंटी बजाना है, ताकि तुम लोग जान सको—ठीक अभी, वर्तमान में, इस समय—कि तुम लोग किस स्थिति में हो, तुम लोगों की दशा क्या है और संभावित खतरे क्या हैं। तुम्हें अपने दिलों में इन चीजों के बारे में स्पष्ट होना चाहिए। परमेश्वर में अपने विश्वास में, लोगों को लगातार और बार-बार जाँच करनी चाहिए कि परमेश्वर के सामने उनकी दशा क्या है। उन्हें लगातार और स्पष्ट रूप से जानना चाहिए कि परमेश्वर के साथ उनका रिश्ता कैसा है, क्या उनके और परमेश्वर के बीच टकराव और बाधाएँ मौजूद हैं, क्या परमेश्वर के बारे में उनकी धारणाएँ और गलतफहमियाँ हैं, क्या परमेश्वर से उनकी अनुचित माँगें हैं और परमेश्वर उनकी समग्र अभिव्यक्तियों को कैसे देखता है। लोगों को इन चीजों को समझना और जानना चाहिए; यह उनके जीवन प्रवेश के लिए बहुत लाभदायक है। इस तरह से अभ्यास करने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लोग परमेश्वर के इरादों के अनुसार सटीक रूप से कार्य कर सकें। कोई गलत कदम मत उठाओ, आत्म-संतुष्ट महसूस मत करो और खुद को और दूसरों को धोखा मत दो। कोई गलत कदम न उठाने का मतलब है अपने खुद के भटके हुए मार्ग पर न चलना। तुम सोचते हो कि परमेश्वर में विश्वास करने में तुम्हारा यह प्रदर्शन काफी अच्छा है, इसलिए तुम इस मार्ग पर चलना जारी रखते हो। लेकिन, पता चलता है कि तुम सही मार्ग से भटक गए हो; परमेश्वर ने तुम्हें बहुत पहले ही छोड़ दिया है और पवित्र आत्मा ने तुममें काम करना बंद कर दिया है। परमेश्वर तुमसे घृणा करता है, फिर भी तुम सोचते हो कि तुम अपने विश्वास में अच्छा कर रहे हो : “मैंने परमेश्वर में विश्वास करने से चीजें प्राप्त की हैं। मैं अब कष्ट सह सकता हूँ, मैं अब बुराई नहीं करता, मैं जानता हूँ कि गड़बड़ियाँ पैदा करने से कैसे बचा जाए और अब मैं जानता हूँ कि गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा करने वालों को बाहर क्यों निकाल दिया जाता है या अलग-थलग क्यों कर दिया जाता है और उन्हें कोई कर्तव्य क्यों नहीं करने दिया जाता है।” इन चीजों को जानना पर्याप्त नहीं है। तुम्हें जानना चाहिए कि परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने के लिए कैसे कार्य करना है, सही मार्ग पर चलने के लिए कैसे अभ्यास करना है और उद्धार पाने में सक्षम होने के लिए कैसे कार्य करना है। ये सभी बहुत महत्वपूर्ण हैं; तुम्हें नियमित अंतराल पर समीक्षाएँ करनी चाहिए और निष्कर्ष निकालने चाहिए। इस विषय के लिए बस इतना ही। आओ हम उस विषय पर संगति करना जारी रखें जिस पर हम इस अवधि के दौरान संगति करते रहे हैं।

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