सत्य का अनुसरण कैसे करें (12) भाग पाँच

IV. चौथी विशेषता : बेवकूफी

हमने अभी-अभी जिस पर संगति की वह पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की तीसरी अभिव्यक्ति थी—कि वे भ्रमित होते हैं। एक और अभिव्यक्ति है, जो यह है कि वे बेवकूफ होते हैं। बेवकूफी भी बुद्धिमत्ता से संबंधित है—तो आखिर ये लोग कितने बेवकूफ होते हैं? कौन-सी अभिव्यक्तियाँ बेवकूफी दर्शाती हैं? कुछ लोग सुसमाचार का प्रचार करते समय कहते हैं, “परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहो! परमेश्वर के पास सिर रखने तक की कोई जगह नहीं है। परमेश्वर के इरादे श्रमसाध्य हैं! परमेश्वर का कार्य आसान नहीं है—यह दुष्कर है!” जब अविश्वासी यह सुनते हैं तो वे कहते हैं, “तुम यह क्या बड़बड़ कर रहे हो?” ये शब्द अविश्वासियों की समझ से परे हैं। वे परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते, इसलिए वे नहीं जानते कि इन शब्दों का क्या मतलब है या इनकी पृष्ठभूमि क्या है। तो क्या तुम्हारा ये चीजें कहना बेवकूफी भरा नहीं है? (हाँ।) यह किस तरीके से बेवकूफी भरा है? ये चीजें गलत श्रोताओं को संबोधित की गई हैं, है ना? (हाँ।) कुछ भ्रमित लोगों को गिरफ्तार करने के बाद दुष्ट पुलिस पूछताछ करती है : “तुम लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हो—परमेश्वर तुम लोगों से क्या करने के लिए कहता है? क्या तुम नहीं जानते कि परमेश्वर में विश्वास रखना गैर-कानूनी है? तुम लोगों ने कानून का उल्लंघन किया है। राज्य ऐसे विश्वास की अनुमति नहीं देता है!” दरअसल ये दुष्ट पुलिस अधिकारी बस कुछ कीचड़ ढूँढ़ रहे हैं जिसका वे परमेश्वर में विश्वास रखने वालों को अपराधी ठहराने के लिए उपयोग कर सकें, लेकिन इस तरह का बेवकूफ व्यक्ति इसकी असलियत देखने में विफल हो जाता है। वह कहता है, “परमेश्वर में हमारा विश्वास गैर-कानूनी नहीं है। परमेश्वर हमें ईमानदार लोग बनने, सही मार्ग पर चलने और अच्छा व्यक्ति बनने के लिए कहता है।” जब दानव यह बात सुनते हैं तब वे कहते हैं, “चूँकि परमेश्वर तुम लोगों से ईमानदार लोग बनने के लिए कहता है, तो फिर हमें बताओ—तुम लोगों की कलीसिया के अगुआ कौन हैं? तुम लोगों की कलीसिया का पैसा कहाँ रखा है? ईमानदारी से बोलो! अगर तुम ईमानदारी से नहीं बोले तो तुम्हारा परमेश्वर तुम्हारी निंदा करेगा!” यह सुनकर इस तरह का बेवकूफ व्यक्ति हक्का-बक्का रह जाता है। क्या यह बेवकूफ होना नहीं है? कोई दानवों से ईमानदारी से कैसे बात कर सकता है? कोई दानवों को परमेश्वर का सत्य कैसे बता सकता है? चाहे कुछ भी हो जाए, उन्हें कभी नहीं बताना चाहिए। ऐसे बेवकूफ लोग भी होते हैं जो पुलिस से पूछते हैं, “तुम लोग हमेशा हमें क्यों गिरफ्तार करते हो? तुम हमेशा हम परमेश्वर में विश्वासी लोगों के लिए चीजें मुश्किल क्यों बना देते हो? तुम हमेशा हमारे बारे में अफवाहें क्यों गढ़ते हो?” क्या वे वास्तव में नहीं जानते कि वे ऐसा क्यों करते हैं? क्या वे उनसे उत्तर पाने की उम्मीद करते हैं? क्या उन्हें उत्तर मिलेगा? उनसे कारण पूछना—क्या यह बेतुका नहीं है, क्या यह बेवकूफ होना नहीं है? लेकिन ये बेवकूफ लोग सचमुच में ऐसी बेवकूफी भरी चीजें पूछ सकते हैं। वे बस समझते ही नहीं हैं और पूछते रहते हैं, “सीसीपी क्यों हमेशा हमें सताती है? वह क्यों हमेशा हम परमेश्वर में विश्वासी लोगों को गिरफ्तार करती है और यहाँ तक कि हमारे बारे में अफवाहें भी गढ़ती है? हमें स्पष्ट रूप से सताया जा रहा है और हम घर नहीं लौट सकते हैं, फिर भी वह कहती है कि हमने अपने परिवारों को छोड़ दिया है। ये दानव अपने शब्दों को तथ्यों पर आधारित नहीं करते! क्या यह पूरी तरह से मनगढ़ंत नहीं है? हम तो बस परमेश्वर की गवाही देने और परमेश्वर के वचनों का प्रसार करने के लिए कुछ कलात्मक प्रदर्शन वीडियो बनाते हैं—दानव और शैतान क्यों इससे इतनी ज्यादा नफरत करते हैं? वे हमेशा मेरे परिवार और रिश्तेदारों को डराने-धमकाने के लिए मेरे घर जाते हैं, यहाँ तक कि निगरानी कैमरे भी लगाते हैं—क्यों?” क्या यह पूछने की जरूरत भी है? क्या यह कहना बेवकूफी नहीं है? अगर तुमने अभी-अभी परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया हो तो यह नहीं समझना कि क्या चल रहा है, एक सामान्य बात होगी। लेकिन तुम्हें परमेश्वर में विश्वास रखते हुए बहुत सारे वर्ष हो चुके हैं—फिर भी तुम्हें कैसे नहीं पता? और अगर तुम्हें पता है तो फिर तुम पूछते क्यों हो? कुछ लोग अभी भी नहीं समझ सकते : “हमने कभी भी पार्टी या राज्य का विरोध नहीं किया है, हम कभी भी राजनीतिक गतिविधियों में शामिल नहीं हुए हैं, हमने कभी भी सरकार या उसके शासन का तख्ता पलटने का प्रयास नहीं किया है, हमने कभी भी उसके शासन के लिए कोई खतरा उत्पन्न नहीं किया है—तो फिर सीसीपी क्यों हमेशा हमें गिरफ्तार करती है और सताती है? हम हमेशा छिपे रहते हैं, चाहकर भी घर नहीं जा पाते या अपने परिवारों को फोन नहीं कर पाते। मुझे समझ नहीं आता—सीसीपी क्यों हमेशा हमारे लिए चीजें मुश्किल बना देती है?” अगर तुम सच में इसकी असलियत नहीं देख सकते तो फिर तुम हद से ज्यादा जाहिल हो—तुम सच में बेवकूफ हो। मान लो, एक महिला है जो एक अविश्वासी व्यक्ति से शादी करती है। जब वे डेट कर रहे थे तब उसने कहा था, “मैं भी तुम्हारे साथ विश्वास रखूँगा—हम एक साथ स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे।” वह बहुत अच्छी तरह से बोला था, लेकिन दरअसल वह एक छद्म-विश्वासी है, एक दानव है—वह बस उसे झूठे वादों से बहका रहा था। लेकिन जब वह परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के लिए सब कुछ छोड़ देती है तब वह आगबबूला हो जाता है। वह उसे सभाओं में शामिल नहीं होने देता, उसे अपना कर्तव्य नहीं करने देता और उसे परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ने देता। यह बेवकूफ महिला अब भी हैरान होती है, “वह पहले तो ऐसा नहीं था। वह मुझसे बहुत प्रेम करता था, मेरी बहुत परवाह करता था, मुझे बहुत अच्छी तरह से समझता था और परमेश्वर में मेरे विश्वास का पूरा समर्थन करता था। अब वह एक बिल्कुल अलग व्यक्ति जैसा क्यों लगता है? पहले तो वह भी विश्वास रखता था—वह क्यों ऐसा बन गया है?” कई वर्षों के दौरान जब वह अपना कर्तव्य करते हुए घर से दूर है तब वह लगातार इस मामले पर विचार करती है : “मेरा पति कोई और महिला ढूँढ़ ही नहीं सकता। वह सबसे ज्यादा मुझसे प्रेम करता है। मैं उसकी इकलौती हूँ, मैं उसका पहला प्रेम हूँ। वह कभी किसी और महिला से प्रेम नहीं करेगा। इसके अलावा, मेरा पति एक सीधा-सादा पुरुष है और उसके पास कोई विशेष योग्यता या कौशल नहीं है—आखिर कौन उसके साथ रहना चाहेगा?” दरअसल वह जब ऐसा सोचती है तब भी अपने दिल में असहज महसूस करती है। वह उम्मीद करती है कि उसका पति अभी भी उसकी प्रतीक्षा कर रहा होगा। लेकिन वास्तव में, जब वह घर पर ही थी तब भी, क्योंकि वह हर रोज परमेश्वर में विश्वास रखने और अपना कर्तव्य करने में व्यस्त रहती थी, उसके पति को पहले ही कोई दूसरी महिला मिल चुकी थी। फिर भी वह सोचती है कि यह असंभव है : “और कोई भी व्यक्ति दूसरी महिला ढूँढ़ सकता है, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकता। वह उस तरह का व्यक्ति है ही नहीं! जब मैं घर पर थी, तब उसने यह तक कहा था कि वह परमेश्वर में विश्वास रखना चाहता है!” मुझे बताओ, क्या वह बहुत ही ज्यादा बेवकूफ नहीं बन रही है? (हाँ।) कई वर्षों से वह घर पर नहीं रही है—न सिर्फ उसका पति किसी और को ढूँढ़ चुका है, बल्कि उसके बच्चे और माता-पिता भी उसे ठुकरा चुके हैं। उसे बहुत पहले ही उस परिवार का सदस्य मानना बंद कर दिया गया है। कौन जाने वे उसके पीठ पीछे उसका कितना अपमान करते हैं या उससे कितनी गहरी नफरत करते हैं। फिर भी वह इसकी असलियत नहीं देख सकती है—मुझे बताओ, क्या यह बेवकूफी नहीं है? (हाँ।) वह किस हद तक बेवकूफ है? इस हद तक कि उसमें सामान्य मानवीय बुद्धिमत्ता की पूरी तरह से कमी है; इसलिए वह लोगों और चीजों को देखने के लिए सामान्य मानवीय सोच का उपयोग नहीं कर सकती है। वह चीजों को देखने और मापने के लिए हमेशा अपने बचकाने, विरूपित, मूर्खतापूर्ण विचारों और दृष्टिकोणों का उपयोग करती है। अंत में वह अक्सर खुद को मुश्किल स्थितियों में फँसा लेती है, बहुत निष्क्रिय हो जाती है और बहुत जाहिल तरीके से कार्य करती है। क्या यह बेवकूफी नहीं है? (हाँ।) इस तरह के कुछ बेवकूफ लोग हैं। बेवकूफ होने का मतलब है कि उनमें सामान्य मानवता की बुद्धिमत्ता नहीं होती है, इसलिए लोगों और चीजों को देखते समय या मामलों को सँभालते समय उन्हें अच्छे नतीजे हासिल करने में समर्थ बनाने के लिए उनके पास मूलभूत सिद्धांतों का सहारा नहीं होता है, है ना? (हाँ।)

संक्षेप में, अगर पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों को मानक के रूप में सत्य का उपयोग करते हुए मापा जाए तो उनकी प्राथमिक विशेषता यह है कि वे मूलतः उस पर खरे नहीं उतरते हैं—यह एक उच्च मानक है। अगर उन्हें सामान्य मानवता की बुद्धिमत्ता से मापा जाता है तो वे अपने दैनिक जीवन में सामने आने वाले लोगों, घटनाओं, चीजों या स्थितियों को सामान्य मानवता की सोच से देखने तक में असमर्थ होते हैं। सच पूछो तो दैनिक जीवन में ऐसे लोग अपने भोजन, कपड़े, आश्रय या परिवहन का स्वतंत्र रूप से प्रबंध तक नहीं कर सकते हैं और न ही वे इन मुद्दों के प्रति स्वतंत्र रूप से प्रतिक्रिया कर सकते हैं और उन्हें सँभाल सकते हैं। अगर वे भूख से दम तोड़े बिना जैसे-तैसे गुजारा करने में कामयाब हो जाते हैं तो भी विभिन्न मामलों को सँभालने में अपनी अभिव्यक्तियों से, ऐसे लोग बहुत मूर्ख और अनाड़ी लगते हैं, वे सच्ची सामान्य मानवता वाले लोग होने से बहुत दूर होते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ पशुओं को ही ले लो—उन्हें अपने आप यह नहीं पता होता है कि उनके लिए कितनी मात्रा में खाना उचित है। अगर लोग उन्हें निश्चित समय पर और नपी-तुली मात्रा में चारा खिलाएँ, सिर्फ तभी वे स्वस्थ तरीके से खा सकते हैं। उदाहरण के लिए, कुत्तों की ही बात ले लो, अगर उन्हें खुलकर खाने को छोड़ दिया जाए, मात्रा पर कोई पाबंदी न रहे तो वे बहुत ही ज्यादा खा लेंगे। वे तब तक खाते रहेंगे जब तक कि वे अपना पेट ठसाठस भर नहीं लेते और शारीरिक रूप से और खाने में असमर्थ नहीं हो जाते। इसलिए पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की एक बहुत ही स्पष्ट विशेषता यह है कि वे अपने जीवन के बहुत सारे पहलुओं को स्वतंत्र रूप से सँभाल नहीं सकते हैं। वे ऐसा स्वतंत्र रूप से क्यों नहीं कर सकते? वह इसलिए क्योंकि उन्हें कभी पता नहीं होता कि ऐसी चीजें करने के क्या सिद्धांत हैं, मूलभूत स्थितियाँ क्या हैं या उन्हें कौन-सी सीमाएँ नहीं लाँघनी चाहिए। यह ठीक कुछ पशुओं जैसा है जब वे खाना खाते हैं—उन्हें पता नहीं होता कि खाने की कितनी मात्रा उचित है। अगर लोग उनका ध्यान न रखें तो वे तब तक खाते रहेंगे जब तक कि उनका पेट ठसाठस भर नहीं जाता और वे मर नहीं जाते। अगर उनका ध्यान रखने और उन्हें खाना खिलाने के लिए कोई है तो हो सकता है कि उनकी सेहत ठीक रहे। यह विशेषता पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में भी बहुत स्पष्ट होती है। ठीक वैसे ही जैसे कुछ लोग कहते हैं : “वे बिना यह जाने कि वे भूखे हैं या उनका पेट भरा हुआ है, खाते हैं और बिना यह जाने कि दिन है या रात, सोते हैं।” तो क्या ऐसे लोगों में मानवता की बुद्धिमत्ता होती है? यह बहुत स्पष्ट है कि उनमें नहीं होती है। जहाँ तक इस तरह के विचार हैं जैसे कि साल के चारों मौसमों में जैसे-जैसे शरीर विभिन्न स्थितियों का अनुभव करता है तो अपने स्वास्थ्य को नियंत्रित करने के लिए किस तरह से भोजन करना चाहिए, किस मौसम में कौन-से खाद्य पदार्थ स्वास्थ्यकर हैं और कौन-से अस्वास्थ्यकर, जीवन जीने के कौन-से तरीके स्वास्थ्यकर हैं और कौन-से अस्वास्थ्यकर—सामान्य व्यक्ति को बीस वर्ष की आयु में शायद इन बातों का पता न हो, लेकिन तीस वर्ष की आयु में उसे इनमें से कुछ बातें पता होती हैं और चालीस वर्ष की आयु में तो उसे इससे भी ज्यादा बातें पता होती हैं। पचास वर्ष की आयु में वे अपनी वास्तविक शारीरिक स्थिति के आधार पर जीने की ऐसी नियमावली संक्षेप में बना चुके होंगे जो उनके लिए उपयुक्त है, और यह मूलतः स्थापित और निश्चित हो चुकी होगी और आगे इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा। लेकिन पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग भले ही अस्सी वर्ष तक जीवित रहें, फिर भी वे जीने की नियमावली संक्षेप में नहीं बना सकते। वे या तो बहुत ज्यादा भोजन करते हैं या फिर बहुत ही कम और या तो उनका पेट खराब हो जाता है या उन्हें बदहजमी हो जाती है। उन्हें पता ही नहीं होता कि कौन-सी स्वास्थ्य समस्याएँ जीवनशैली की किन आदतों या किन खाद्य पदार्थों के कारण होती हैं—वे बस बेहूदगी से भोजन करते हैं। अगर तुम उनसे उनके शारीरिक गठन के लिए उपयुक्त या अनुपयुक्त खाद्य पदार्थों और विभिन्न जानकारियों के आधार पर उपयुक्त आहार नियम या आहार का तरीका संक्षेप में बताने के लिए कहो तो वे ऐसा नहीं कर सकेंगे। उदाहरण के लिए, कोई ऑनलाइन व्यक्ति कहता है कि अंडे के छिलकों में ज्यादा मात्रा में कैल्शियम होता है और अंडे के छिलके खाने से उनकी कैल्शियम की पूर्ति हो सकती है तो वे इस पर सोच-विचार करते हैं : “मैं ज्यादा लंबा नहीं हूँ क्योंकि मुझमें कैल्शियम की कमी है—मैं कैल्शियम की पूर्ति करने के लिए अंडे के छिलके खाऊँगा।” लेकिन जैसा कि पता चलता है, कुछ समय तक अंडे के छिलके खाने के बाद ऐसा लगता है कि उनके कैल्शियम के स्तर में कोई सुधार नहीं हुआ है। मुझे बताओ, क्या यह विरूपित नहीं है? जब तुम्हें ऑनलाइन ऐसी जानकारी मिलती है कि अंडे के छिलकों में ज्यादा मात्रा में कैल्शियम होता है और इसे कैल्शियम अनुपूरक के रूप में उपयोग किया जा सकता है तो तुम्हें इसे कैसे समझना चाहिए? यह बिल्कुल स्पष्ट है कि जो लोग अंडे के छिलके खाते हैं उनमें विरूपण की संभावना होती है। उनकी समझ गलत है, इसलिए उनका अभ्यास विरूपित, चरम और मूर्खतापूर्ण होता है। तो फिर इसे समझने का सही तरीका क्या है? भले ही अंडे के छिलकों में ज्यादा मात्रा में कैल्शियम हो, लेकिन वे ऐसी चीजें नहीं हैं जिन्हें हम खा सकें। वे वास्तव में कैल्शियम के अनुपूरक के समान प्रभाव दे सकते हैं या नहीं, यह अभी भी अज्ञात है और भले ही ये तुम्हारे कैल्शियम के स्तर को बढ़ा सकते हों तो भी तुम इसे अवशोषित कर सकोगे या नहीं यह भी अनिश्चित है। इसके अलावा, क्या ऐसा कोई प्रमाण है कि अंडे के छिलके कैल्शियम के अनुपूरक हो सकते हैं? क्या इस दावे को सत्यापित किया गया है? दरअसल ऐसी बहुत-सी चीजें हैं जो कैल्शियम की पूर्ति कर सकती हैं और ये सभी चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित हैं। अगर तुम इन प्रमाणित विधियों को स्वीकारने से इनकार करते हो तो तुम बेहूदे व्यक्ति हो। क्या तुम कैल्शियम की पूर्ति करने के लिए बस कैल्शियम की गोलियाँ नहीं ले सकते? यह सबसे आसान विधि है। ये पेट या दाँतों को नुकसान नहीं पहुँचाती हैं, इनका स्वाद अच्छा होता है और तुम इनके प्रभाव महसूस कर सकते हो। क्या यह सही समझ नहीं है? (हाँ।) लेकिन विरूपित समझ वाले लोग इसे इस तरीके से नहीं समझते—वे चीजों को चरम पर ले जाते हैं। उनका मानना है, “अगर कोई कहता है कि अंडे के छिलके तुम्हारी कैल्शियम की पूर्ति कर सकते हैं तो अंडे के छिलके खाना ठीक ही होगा। अगर तुम्हें अपनी कैल्शियम की पूर्ति करनी है तो तुम्हें अंडे के छिलके खाने ही होंगे।” वे इस बात पर भी विचार नहीं करते कि क्या इन्हें खाने के बाद शरीर इन्हें अवशोषित कर सकता है या नहीं। यह विरूपित समझ को दर्शाता है, यह अति करना है। अगर कोई कहे, “केले के छिलके में ज्यादा मात्रा में विटामिन होते हैं और इसे खाने से तुम्हारी सुंदरता निखर सकती है” तो क्या तुम लोग इसे खाओगे? (नहीं।) क्यों नहीं? (क्योंकि परमेश्वर द्वारा बनाए गए कुछ खाद्य पदार्थों को प्राकृतिक व्यवस्था के अनुसार छीलने के बाद खाना चाहिए। छिलका खाने पर जोर देना चीजों को चरम पर ले जाना है। अगर कोई अपनी सुंदरता बढ़ाने के लिए अपनी विटामिन की पूर्ति बढ़ाना चाहता है तो उसे ऐसे खाद्य पदार्थ खाने चाहिए जो सामान्य रूप से खाने योग्य हैं और साथ ही सुंदरता बढ़ाने वाले प्रभाव भी रखते हैं।) यह सही समझ है। लेकिन उस अतिवादी बेवकूफ को देखो—वह इसे इस तरीके से नहीं समझता। वह छिलका खाने के लिए खुद को मजबूर करने पर अड़ा है और यहाँ तक कहता है, “मुझे अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करना होगा। मुझे एक विशिष्ट पोषक तत्व का स्तर बढ़ाने के लिए केले का छिलका खाना होगा।” लेकिन वह यह नहीं सोचता, “केले के छिलके का स्वाद अच्छा नहीं होता है। यह भोजन नहीं है। मैं इसे नहीं खाऊँगा। इसके बजाय मैं ऐसा कुछ और क्यों नहीं खा लेता जिसमें यह पोषक तत्व है?” क्या यह सही समझ नहीं है? (हाँ।) अगर तुम इस तरह से फर्क कर सकते हो, अगर तुम चीजों को इस तरह से समझ सकते हो तो यह प्रमाणित करता है कि तुममें मानवीय बुद्धिमत्ता है। लेकिन अगर तुम इस तरह से फर्क नहीं कर सकते और जैसे ही तुम सुनते हो कि केले के छिलके में एक खास पोषक तत्व होता है, तुम उसे खाने की जिद करते हो, भले ही उसका स्वाद खराब हो—तो तुम बेवकूफ हो, तुम किसी पशु से पुनर्जन्म लिए हुए व्यक्ति हो और तुममें सामान्य मानवता की सोच नहीं है। कोई भी पाखंड या भ्रांति ऐसे लोगों को गुमराह कर सकती है और वे विभिन्न सूचनाओं की सटीकता या सत्यता का भेद पहचानने में बस असमर्थ होते हैं—वे हमेशा धोखा खा जाते हैं। यह सब कुछ इस बात की अभिव्यक्ति है कि पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग विभिन्न विशिष्ट मामलों से कैसे पेश आते हैं—वे बेहद बेवकूफ होते हैं, उनकी समझ विरूपित और बेतुकी होती है और वे हर चीज को चरम पर ले जाते हैं। जब लोग कहते हैं कि शोध किसी चीज को खाने योग्य बताता है तब इसका मतलब यह नहीं है कि तुम्हें उसे खाना ही होगा और न ही इसका मतलब यह है कि कोई और चीज उसकी जगह नहीं ले सकती। अगर तुम कहते हो कि सत्य की जगह कोई सैद्धांतिकी नहीं ले सकती है तो यह वस्तुनिष्ठ और सटीक है। लेकिन ये पोषक तत्व भौतिक पदार्थ हैं—यह असंभव है कि इनका कोई विकल्प ही न हो। परमेश्वर ने नाना प्रकार के खाद्य पदार्थ बनाए हैं और ऐसे बहुत सारे खाद्य पदार्थ हैं जिनमें विभिन्न पोषक तत्व होते हैं। लोग अपने व्यक्तिगत शारीरिक गठन, आयु वर्ग और वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर सटीक चयन कर सकते हैं—विनियमों पर कायम रहने की कोई जरूरत नहीं है। जो लोग चरम पर चले जाते हैं वे कोई जानकारी सुनने के बाद उससे सही ढंग से पेश नहीं आ सकते और न ही उसका भेद पहचान सकते हैं। वे हमेशा इन चीजों से गुमराह हो जाते हैं और अंत में कहते हैं, “ऑनलाइन सब कुछ झूठ होता है—एक भी शब्द सच नहीं होता!” देखो, अब वे दूसरे चरम पर चले गए हैं। तुम ऑनलाइन जाकर जानकारी ढूँढ़ सकते हो, लेकिन इसका भेद पहचानने के लिए और क्या उपयोग में लाना है और क्या खारिज करना है इसका सही विकल्प चुनने के लिए तुम्हें यह पता होना चाहिए कि मानव बुद्धि का और मानव सोच के सही तरीके का उपयोग कैसे करना है। अगर कोई चीज तुम्हारे लिए लाभदायक है तो तुम उसका उपयोग कर सकते हो; अगर यह तुम्हारे लिए लाभदायक या उपयुक्त नहीं है तो तुम उसे एक संदर्भ या एक प्रकार का सामान्य ज्ञान मान सकते हो। मानव सोच वाले लोग इसी तरीके से अभ्यास करते हैं। जिन लोगों में मानव सोच नहीं होती है, वे एक ऐसे तरीके से अभ्यास करते हैं जो या तो बाईं तरफ भटक जाता है या दाईं तरफ—वे या तो धोखा खाते हैं या हर बात पर पूरी तरह से अविश्वास करते हैं। वे ऐसे मामलों का ध्यान से भेद पहचानने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग जिस तरीके से विभिन्न तरह की सूचनाओं से पेश आते हैं या वास्तविक जीवन के मामलों को सँभालते हैं उसमें वे विशेष रूप से जिद्दी, बेहूदे, भ्रमित और मूर्ख दिखाई देते हैं। जो लोग इतने मूर्ख होते हैं, जो उचित-अनुचित या सही-गलत में भेद नहीं पहचान सकते—वे अपने जीवन का हर दिन कैसे गुजारते हैं? उनके व्यवहार करने के तरीके को देखकर ही तुम्हें चिंता होने लगती है—क्या अब भी तुम कोई उम्मीद कर सकते हो कि वे सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर पाएँगे?

एक महिला ने एक घटिया बदमाश से शादी की और वह सोचती है, “मेरा पति मुझसे बहुत प्रेम करता है। मुझे सच्चा प्रेम मिल गया है, मुझे प्रेम हो गया है” और वह बहुत आनंदित महसूस करती है। लेकिन दूसरे लोग उसके पति की तरफ देखते हैं और समझ जाते हैं कि वह तो मनुष्य तक नहीं है—वह एक दानव है—और ताज्जुब करते हैं कि कैसे वह अब भी नशे में चूर हो सकती है और इतना आनंद ले सकती है। वे भी उसके लिए चिंतित रहते हैं और उसकी तरफ से आशंकित रहते हैं। अंत में उस आदमी से उसके बच्चे होने के बाद उसे लात मारकर एक तरफ कर दिया जाता है और उसके पास कोई सहारा नहीं होता है—उसका जीवन असहनीय रूप से मुश्किल हो जाता है! पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों द्वारा की गई बेवकूफियों से यह स्पष्ट है कि वे जैसे-तैसे जीने और गुजारा करने में जो कामयाब होते हैं यह काफी हद तक परमेश्वर के अनुग्रह के कारण होता है। परमेश्वर उन्हें साँस देता है ताकि वे जीवित रह सकें और उन्हें भोजन देता है ताकि वे गुजारा कर सकें। आसमान में पक्षियों, जमीन पर छोटे पशुओं और यहाँ तक कि चींटियों के पास भी खाने के लिए भोजन होता है—मनुष्यों के लिए तो यह और भी कितना ज्यादा सच है? चूँकि तुमने मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लिया है, इसलिए परमेश्वर तुम्हें गुजारा करने के लिए साधन देता है। या तो कोई तुम्हारा भरण-पोषण करता है या तुम्हारे पास कोई ऐसा कौशल होता है जो तुम्हें अपनी आजीविका बनाए रखने देता है। यह परमेश्वर का अनुग्रह है। परमेश्वर तुम्हें भूखा मरने नहीं देता है, बल्कि तुम्हें गुजारा करने का एक तरीका देता है ताकि तुम बुढ़ापे तक, अंत तक जी सको। परमेश्वर के अनुग्रह के बिना और फिर जिस काबिलियत के साथ पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग जन्म लेते हैं, उनमें सामान्य सोच की गैर-मौजूदगी और समस्याओं को सँभालने की जरा-सी भी क्षमता की गैर-मौजूदगी, इन सबके चलते वे अपने लिए आजीविका कमा सकने में भी कामयाब नहीं हो सकते थे। दूसरे परिप्रेक्ष्य से, पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग वास्तव में बहुत धन्य होते हैं। सभी पहलुओं में उनकी क्षमताओं और उनकी बुद्धिमत्ता पर विचार करते हुए, उनके लिए इस जटिल और दुष्ट संसार में आजीविका कमाना लगभग असंभव होगा। लेकिन क्योंकि परमेश्वर सभी सृजित प्राणियों पर अनुग्रह दिखाता है और उसमें सभी सृजित प्राणियों के लिए दया है, इसलिए तुमने चाहे किसी पशु से पुनर्जन्म लिया हो या मनुष्य से, परमेश्वर की दृष्टि में अगर तुम एक सृजित प्राणी हो और उसने तुम्हें साँस दी है तो वह तुम्हें सामान्य रूप से वह प्रदान करता है जो तुम्हें जीने और गुजारा करने के लिए चाहिए, जो तुम्हारे जीवन को निरंतर बने रहने देता है और तुम्हें जीना जारी रखने में समर्थ बनाता है। इसलिए अगर तुम कहते हो, “मैं पैसे कमाने के लिए बाहर गया हूँ और मैंने संघर्ष किया है, अपना भरण-पोषण किया है ताकि मैं सुपोषित और स्वस्थ रहूँ—क्या मैं ठीक-ठाक नहीं कर रहा हूँ? क्या तुम मुझे बेवकूफ कहकर मेरा अपमान नहीं कर रहे हो?” तो तुम गलत हो। यह तथ्य कि तुम पैसे कमा सकते हो और अपना भरण-पोषण कर सकते हो आवश्यक रूप से, सही मायने में तुम्हारी अपनी क्षमता के कारण नहीं है—इसमें निन्यानवे प्रतिशत परमेश्वर का अनुग्रह है। परमेश्वर तुम्हें कुछ ताकत देता है और इस तरह से तुम्हें भोजन के लिए पैसे कमाने के लिए कड़ी मेहनत करने में समर्थ बनाता है; वह तुम्हें एक विशेष कौशल और साथ ही स्वस्थ शरीर देता है और इस तरह से तुम्हें नौकरी करने, पैसा कमाने, परिवार का भरण-पोषण करने और गुजारा करने में समर्थ बनाता है। इन चीजों को करने में तुम्हारे समर्थ होने का आधार क्या है? यह सब परमेश्वर द्वारा तुम्हें वह सबसे मूलभूत जन्मजात स्थिति देने पर आधारित है जो तुम्हें सामान्य मानव श्रम करने में समर्थ बनाती है, जो अंततः तुम्हें अपना भरण-पोषण करने और अपनी आजीविका बनाए रखने देती है। संक्षेप में, चाहे कुछ भी हो, चाहे तुम बेवकूफ हो या भ्रमित, इस समय मनुष्य के बाहरी रूप-रंग वाले सृजित प्राणी के रूप में तुम्हें अपनी पहचान और अपना मूल्य पता होना चाहिए। इसके अलावा, तुम्हें सही ढंग से समझना चाहिए कि परमेश्वर ने तुम्हें क्या प्रदान किया है, परमेश्वर ने तुम्हारा क्या भरण-पोषण किया है और परमेश्वर का अनुग्रह और दया क्या हैं। अगर तुम पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की कई विशेषताओं से मेल खाते हो और तुम्हें लगता है कि तुम निश्चित रूप से लोगों की इस श्रेणी से संबंधित हो तो तुम्हें क्या करना चाहिए? इसे सँभालना आसान है : चाहे तुम्हारी उत्पत्ति कुछ भी हो, चाहे तुममें स्वाभाविक रूप से मानवीय बुद्धिमत्ता और मानवीय सोच हो या नहीं हो, सच्चाई यह है कि अब तुम्हारी एक मानवीय पहचान है। चूँकि तुम्हारी एक मानवीय पहचान है, इसलिए तुम्हें मानव का कर्तव्य पूरा करना चाहिए—अपनी भरसक क्षमता से जितना हो सके उतना करो और जो एक मानव को करना चाहिए उसे अधिकतम संभव सीमा तक पूरा करो और अच्छी तरह से करो। कुछ लोग कहते हैं, “तुमने कहा कि पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में विरूपित समझ, सुन्नता, भ्रमित होने और बेवकूफी जैसी विशेषताएँ होती हैं—इसका मतलब है कि उनमें मानवीय बुद्धिमत्ता नहीं होती है। इनमें से ज्यादातर लोग सत्य बिल्कुल नहीं समझते—वे अपना कर्तव्य अच्छी तरह से और उचित रूप से कैसे कर सकते हैं?” अगर तुमसे सख्त मानकों की अपेक्षा नहीं की जाती है तो तुम इसे अच्छी तरह से और उचित ढंग से कर सकते हो क्योंकि आखिरकार अब तुम्हारी एक मानवीय पहचान है; जब तक तुम आज्ञाकारी हो और उलझी हुई दलीलें नहीं बकते हो तब तक तुम इसे हासिल कर सकते हो। अगर तुम ये दो बातें भी पूरी नहीं कर सकते तो मैं कहता हूँ कि तुम सच में खतरे में हो और तुम्हें कलीसिया से दूर कर देना ही पड़ेगा। अगर तुम कहते हो, “मैं ये दोनों बातें पूरी कर सकता हूँ। मैं उलझी हुई दलीलें नहीं बकूँगा और मैं सही कथन स्वीकारता हूँ। मुझे जो भी करने को कहा जाएगा, मैं करूँगा; और मुझे यह जैसे भी करने को कहा जाएगा, मैं वैसे ही करूँगा”—अगर तुम सच में इस तरह से अभ्यास कर सकते हो तो फिर तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह से और उचित ढंग से पूरा करने में समर्थ होगे। कुछ लोग कहते हैं, “मैंने अपना कर्तव्य अच्छी तरह से और उचित ढंग से किया है और मैं इसे सत्य सिद्धांतों के अनुसार भी करना चाहता हूँ।” अगर अपना कर्तव्य अच्छी तरह से और उचित ढंग से करने में समर्थ होने की नींव पर सत्य सिद्धांतों की तरफ प्रयास करने का तुम्हारा सही मायने में इरादा है तो तुम जिस भी स्तर तक पहुँच सकते हो, वह ठीक है—इसके लिए कोई अपेक्षा नहीं है। जब तक तुम जिद्दी और मूर्ख नहीं हो, उलझी हुई दलीलें नहीं बकते हो, अपने खुद के तर्कों पर जोर नहीं देते रहते हो, भ्रमित तरीके से कार्य नहीं करते हो और कोई बेवकूफी करने पर उसे मान लेने से इनकार नहीं करते हो तब तक यह काफी है। जहाँ तक सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने का प्रश्न है, तुम जितना करने में समर्थ हो, उतना कर सकते हो; जो भी तुम्हें लगता है कि तुम कर सकते हो, बस वही करो। इस प्रकार के व्यक्ति के लिए अपेक्षाएँ ऊँची नहीं हैं क्योंकि उसके लिए सत्य सिद्धांतों को प्राप्त करना कुछ हद तक मुश्किल होता है। इसलिए, उसकी जन्मजात स्थितियों के आधार पर उससे सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने की सख्ती से अपेक्षा नहीं की जाती है। उससे अपेक्षा क्यों नहीं की जाती है? क्योंकि वह ऐसा करने में अक्षम होता है। अगर तुम इस अपेक्षा पर अड़ जाते हो कि वह सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करे तो यह एक मछली को जमीन पर रहने के लिए मजबूर करने जैसा होगा। उदाहरण के लिए, कुछ पशुओं को ले लो—अगर तुम उनसे हर बार सही मात्रा में खाने और बहुत ज्यादा नहीं खाने और अपना पेट नहीं बढ़ाने की अपेक्षा करते हो तो क्या वे ऐसा कर सकते हैं? वे नहीं कर सकते हैं। वे एक ही बार में जितना हो सके उतना खाते जाते हैं जब तक कि शारीरिक रूप से वे और नहीं खा सकते। पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग भी ऐसे ही होते हैं। अगर तुम उनसे सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने की अपेक्षा करते हो तो वे ऐसा नहीं कर सकते। तो क्या इसका मतलब है कि ऐसे लोगों से उम्मीद छोड़ दी है? नहीं, उनसे उम्मीद नहीं छोड़ी है। लेकिन उनसे उम्मीद नहीं छोड़ देने का मतलब उनसे सत्य सिद्धांतों को समझने या उन्हें आत्मसात करने की अपेक्षा करना नहीं है। इसका मतलब बस उनसे सही ढंग से पेश आना है, उन्हें वह करने देना है जो करने में वे सक्षम हैं। यह उनके कर्तव्य करने की योग्यताओं को रद्द करना नहीं है और न ही यह सत्य का अनुसरण करने की उनकी योग्यताओं को रद्द करना है और यह उद्धार प्राप्त करने की उनकी योग्यताओं को रद्द करना तो और भी कम है। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि उनसे सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने की सख्ती से अपेक्षा नहीं की जाती है और न ही उनसे सभी चीजों में सत्य सिद्धांतों को प्राप्त करने की सख्ती से अपेक्षा की जाती है। यानी उन्हें उतना ही करना चाहिए जितना करने में वे सक्षम हैं। जब तक वे जानबूझकर गड़बड़ियाँ उत्पन्न करने का प्रयास नहीं करते, सिद्धांत के महत्वपूर्ण मामलों की बात आने पर उलझी हुई दलीलें नहीं बकते या बेतहाशा गलत कर्म नहीं करते हैं तब तक यह काफी है। ऐसे लोगों के लिए अपेक्षाएँ ज्यादा नहीं हैं। तुम समझ रहे हो? (हाँ।)

जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है जिन्होंने पशुओं से पुनर्जन्म लिया है, तो हमने उनके सार की कुछ अभिव्यक्तियों पर संगति की है। यकीनन ऐसी कुछ अभिव्यक्तियाँ हैं जिनके बारे में हमने ज्यादा विस्तार से बात नहीं की है। अगर हम उनके बारे में ज्यादा विस्तार से बात करें तो हो सकता है कि कुछ लोग इसे बर्दाश्त न कर पाएँ, इसलिए हमने ज्यादा सामान्य तौर पर बात की है और कुछ बातें अनकही छोड़ दी हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा पुनर्जन्म किससे हुआ है, अंततः अब तुम्हारी एक मानवीय पहचान है। चूँकि तुम्हारी एक मानवीय पहचान है, इसलिए तुम अपनी छवि और अपनी गरिमा की परवाह करते हो, इसलिए हम तुम्हारी थोड़ी गरिमा बचा लेंगे—हम इस पहलू पर बहुत ज्यादा विस्तार से बात नहीं करेंगे। हम पहले जिस पर चर्चा कर चुके हैं, मूलतः चीजें वैसी ही हैं—उससे अपनी तुलना करो। मान लो कि तुम्हारी अभिव्यक्तियाँ उन लोगों की अभिव्यक्तियों से मेल खाती हैं जिन्होंने पशुओं से पुनर्जन्म लिया है और तुम अपने दिल में काफी परेशान महसूस करते हो—यह महसूस करते हो कि चूँकि तुम्हारी इस तरह की पहचान है, एक लिहाज से तुम्हारा मूल्य घट गया है और दूसरे लिहाज से तुम्हारी सत्यनिष्ठा का अपमान हुआ है और तुम्हारी गरिमा को चुनौती दी गई है। तुम नहीं जानते कि परमेश्वर से अपने रिश्ते को कैसे सँभालना है और अचानक तुम्हें महसूस होता है कि तुम्हारा रुतबा गिर गया है, तुम दूसरों से नीचे हो, अब तुम अपने बारे में कुछ भी सम्मानजनक महसूस नहीं करते, अब तुम ऐसा महसूस नहीं करते कि तुम्हारा चरित्र नेक है या तुम सम्मान के योग्य हो और अचानक तुम्हें अपने दिल में महसूस होता है कि तुम्हारे पास कोई उम्मीद या सहारा नहीं है और तुम्हारा भावी गंतव्य अधर में लटका हुआ है। क्या ये अच्छी अभिव्यक्तियाँ होंगी? (नहीं।) तो क्या तुम्हें सकारात्मक बदलाव नहीं लाना चाहिए? (हाँ।) चूँकि ये अभिव्यक्तियाँ अच्छी नहीं हैं और न ही इस तरह की समझ अच्छी है, तो क्या किया जाना चाहिए? हमें ऐसे लोगों के लिए कोई रास्ता ढूँढ़ निकालना होगा ताकि उन्हें थोड़ा बेहतर महसूस हो। यह उन्हें शांत करने या बेवकूफ बनाने के बारे में नहीं है—यह उन्हें इस मामले से सही ढंग से पेश आने और सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने का प्रयास करने में समर्थ बनाने के बारे में है। तो उन्हें क्या करना चाहिए? पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों को इस मामले को कैसे समझना चाहिए? सबसे पहले, परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी व्यक्ति का पुनर्जन्म किससे हुआ है, यह परमेश्वर द्वारा नियत होता है—लोगों को इस फैसले में राय देने का कोई अधिकार नहीं है। मान लो कि तुम इन लोगों में से एक हो। अगर तुमसे चुनने के लिए कहा जाए तो क्या तुम पशु के रूप में पुनर्जन्म लेना चुनोगे या मनुष्य के रूप में? (मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लेना।) तुम उसे क्यों चुनोगे? (क्योंकि सिर्फ अगर हम मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लें तो ही हमें परमेश्वर जो कहता है वह सुनने और उसके वचनों को समझने का अवसर मिल सकता है।) और अगर तुमने पशु के रूप में पुनर्जन्म लिया तो? (तो हमारे पास परमेश्वर के वचन सुनने का कोई अवसर नहीं होगा।) इसका मतलब है कि तुम्हें परमेश्वर की आवाज सुनने का कभी मौका नहीं मिलेगा। इसलिए, चूँकि तुम जानते हो कि एक जानवर का मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लेना अच्छी चीज है, इसलिए तुम्हें परमेश्वर का और ज्यादा धन्यवाद करना चाहिए—तुम्हें उसके बारे में शिकायत नहीं करनी चाहिए। तुम्हें मनुष्य होने का अवसर देने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए—और वह भी एक हजार वर्ष में एक बार मिलने वाला अवसर है। आखिर परमेश्वर लोगों को बचाने के लिए देहधारी हुआ और ज्यादातर लोगों को उद्धार का यह अनुग्रह प्राप्त नहीं हुआ है, जबकि तुम्हें प्राप्त हुआ है—तुम्हें परमेश्वर की आवाज सुनने और परमेश्वर को सत्य व्यक्त करते हुए सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। यह तुम्हारा आशीष है। यह कुछ ऐसा है जो तुम एक सृजित जीवरूप में कई जन्मों या कई युगों में भी प्राप्त नहीं कर सकते थे, भले ही तुम इसके लिए भीख ही क्यों न माँगते। परमेश्वर ने तुम्हें ठीक इस युग में चुना, तुम्हें मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लेने, परमेश्वर के घर में रहने और मानवजाति के साथ मिलकर एक सृजित प्राणी का कर्तव्य करने की अनुमति दी, तुम्हारी पहचान को पशु से मानवजाति के सदस्य में रूपांतरित किया और तुम्हें मनुष्य का कर्तव्य करने की अनुमति दी। यह बहुत ही बड़ा सम्मान और विशेषाधिकार है! यह कुछ ऐसा है जिसकी बहुत सारे सृजित जीवरूप सिर्फ कामना ही कर सकते हैं, उसे कभी प्राप्त नहीं कर सकते—और फिर भी तुमने इसे प्राप्त किया है और आज इसका आनंद ले रहे हो। यह अवसर अत्यंत दुर्लभ है; किसी भी सृजित जीवरूप के लिए यह एक हजार वर्ष में एक बार मिलने वाला अवसर है। इसलिए, तुम्हें न सिर्फ निराशा में नहीं डूबना चाहिए और शिकायत नहीं करनी चाहिए, और न ही परेशान होना चाहिए या यह सोचना चाहिए कि तुम्हारा रुतबा दूसरों से नीचा है, बल्कि इसके विपरीत तुम्हें वास्तव में सौभाग्यशाली महसूस करना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए—उस अवसर के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करो जो उसने तुम्हें दिया है, उसके द्वारा तुम्हारे उन्नयन के लिए उसका धन्यवाद करो, क्योंकि उसने जो किया है वह बहुत ही महान है : उसने जो किया है वह सृजित प्राणियों के प्रति सच में अनुग्रह और दया है। परमेश्वर से इस अनुग्रह को स्वीकारने के बाद तुम्हें एहसानमंद महसूस करना चाहिए कि उसने तुम्हारी पहचान और तुम्हारी श्रेणी बदल दी है। लेकिन तुम सिर्फ उसका धन्यवाद करके इस बात को समाप्त नहीं कर सकते—तुम्हें उसका धन्यवाद करने से आगे यह भी सोचना होगा कि इस अवसर का लाभ कैसे उठाया जाए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारी मूल पहचान क्या थी, अब जब तुम मनुष्य के रूप में अपना कर्तव्य कर सकते हो तब यह अपनी पहचान बदलने और एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी श्रेणी बदलने का अच्छा अवसर है। तो तुम यह बदलाव कैसे कर सकते हो? पहला मुख्य बिंदु अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से करना है। अगर तुम अपनी जन्मजात स्थितियों की विभिन्न सीमाओं के कारण सिर्फ कड़ी मेहनत और शारीरिक श्रम करने, गंदे और थकाऊ कार्य करने में ही सक्षम हो और तुम्हारी पहचान और मूल्य के आधार पर तुम जो कर्तव्य कर सकते हो वह हमेशा सिर्फ इसी दायरे के भीतर रह सकता है जिसमें किसी राहत या सुधार की संभावना नहीं है तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें किस सिद्धांत का पालन करना चाहिए? हम चाहे किसी भी अभिव्यक्ति को देखें, चाहे यह तुम्हारी बुद्धिमत्ता हो, तुम्हारा चरित्र हो या तुम्हारी जन्मजात स्थितियाँ हों, अगर लोगों के बीच तुम्हारा मूल्य हमेशा ऐसा ही रहेगा—तुम हमेशा विरूपित समझ वाले निकम्मे, बेवकूफ, भ्रमित, सुन्न, मंदबुद्धि व्यक्ति ही रहोगे और तुम्हारा मूल्य कभी नहीं बढ़ेगा—तो तुम्हें अपने कर्तव्य से कैसे पेश आना चाहिए? यह सबसे महत्वपूर्ण है। मान लो कि तुम्हारा मूल्य कभी नहीं बढ़ेगा और लोगों के बीच तुम्हारी कभी कोई गरिमा नहीं होगी। परमेश्वर की नजर में तुम हमेशा के लिए एक ही स्थान पर स्थिर हो—तुम बस यही हो। तुम्हारी श्रेणी की कुछ स्पष्ट विशेषताएँ हो सकती हैं जो तुममें ऊपरी तौर पर दिखाई देती हैं और तुम कभी भी पशु से सच्चे मनुष्य में नहीं बदलोगे। तुम्हारे पास उद्धार प्राप्त करने की कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि तुम सत्य नहीं समझ सकते और तुममें मानवीय बुद्धिमत्ता तक नहीं है। तुम दर्शनों के सत्य नहीं समझते और परमेश्वर के घर में तुम्हें नहीं पता कि सुसमाचार का प्रचार कैसे करना है, तुम पेशेवर कौशलों से संबंधित हर तरह के कर्तव्य पर खरे नहीं उतरते हो और उसके मानक पूरे नहीं करते हो—तुम हमेशा गंदे और थकाऊ कामों को करने में ही फँसे रहोगे और तुम्हारे पास अपनी स्थिति को सकारात्मक दिशा देने का कोई रास्ता नहीं है। यह मानते हुए कि तुम ऐसे ही हो, तुम क्या करोगे? क्या तुम परमेश्वर में विश्वास रखना बंद कर दोगे? क्या तुम खुद से हार मान लोगे? यहाँ तक कि क्या कुछ लोग अपनी जान भी ले लेंगे? क्या वे कहेंगे, “मैं अब और जीना नहीं चाहता। वैसे भी मेरे पास बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है—इस तरह से जीने का क्या मतलब है?” तुम चाहे कितना भी प्रयास करो, कितने भी कर्मठ हो, कितना भी संघर्ष करो या कितनी भी बड़ी कीमत चुकाओ, अगर तुम्हारा मूल्य कभी नहीं बदलेगा और परमेश्वर के घर में तुम हमेशा एक ऐसे व्यक्ति के रूप में रहोगे जो कड़ी मेहनत करता है और खून-पसीना बहाता है, एक ऐसा दीन-हीन व्यक्ति जिसके पास कोई गरिमा नहीं है और जिसे हर कोई नीची नजर से देखता है, तो जब यह बात आती है कि तुम अपने कर्तव्य, परमेश्वर के आदेश और सृष्टिकर्ता की विभिन्न अपेक्षाओं से कैसे पेश आते हो तब तुम्हें अभ्यास का कौन-सा तरीका चुनना चाहिए? यही सबसे महत्वपूर्ण है। साधारण तौर पर और सैद्धांतिक रूप से तुम्हारा मूल्य और पहचान निर्दिष्ट हैं, लेकिन दरअसल अभी लोगों के बीच और परमेश्वर की नजरों में तुम्हारी सच्ची पहचान वही है जो मनुष्य की होती है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह वही है जो मनुष्य की होती है? क्योंकि तुम जो कर्तव्य कर सकते हो, तुम्हारे दैनिक प्रकाशन और तुम्हारी जन्मजात स्थितियों की विभिन्न सहज क्षमताएँ, मनुष्य के लिए जो सामान्य है उसी के मूलभूत दायरे में आती हैं—तुममें मनुष्य होने की ये मूलभूत स्थितियाँ हैं। बस इस बिंदु के लिहाज से तुम्हें अपने कर्तव्य से कैसे पेश आना चाहिए? पशु सत्य सिद्धांत नहीं समझते, वे नहीं जानते कि अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से कैसे करना है, अपने कर्तव्य को मजबूती से कैसे पकड़कर रखना है या अपने कर्तव्य को पूरी लगन से कैसे करना है और अंत तक सेवा करने में लगे रहना है—पशु ये बातें नहीं समझते हैं। लेकिन अब, एक मनुष्य के रूप में तुम ये चीजें समझते हो और जानते हो, इसलिए तुम्हें इन्हें हासिल करना चाहिए। चूँकि तुम इन चीजों को हासिल करने में सक्षम हो, इसलिए परमेश्वर इस सिद्धांत के आधार पर तुमसे अपेक्षाएँ रखेगा। हालाँकि, क्योंकि तुम अपनी पहचान से असंतुष्ट हो और तुम्हें लगता है कि परमेश्वर अन्यायी है, इसलिए अगर तुम हतोत्साहित हो जाते हो, उसके बारे में शिकायत करते हो, यह महसूस करते हो कि तुम्हारा जीवन अपमानजनक और अशोभनीय है और फिर अपना कर्तव्य करना छोड़ देते हो, यहाँ तक कि जिसे करने में तुम सक्षम हो उसे भी करने से इनकार कर देते हो—तो तुम पूरी तरह से विद्रोही हो। परमेश्वर की नजर में तुम एक सृजित प्राणी के रूप में मानक-स्तर के नहीं हो; तुम एक विचलन हो। तो तुम्हें क्या करना चाहिए? चाहे तुम्हारा मूल्य सम्मानजनक हो या नीचा और चाहे तुम कहीं से भी आए हो या तुम्हारी जन्मजात स्थितियों में कोई भी समस्या क्यों न हो, संक्षेप में, तुम जो कुछ भी करने में सक्षम हो, उसे करने का भरसक प्रयास करो और उसे अच्छी तरह से करने का भरसक प्रयास करो। अगर भरसक प्रयास करने के बाद भी तुम सत्य सिद्धांतों पर खरे नहीं उतरते हो तो परमेश्वर का एक न्यूनतम मानक है जो सभी तरह के लोगों से अपेक्षित है : जब तक तुम अपना सर्वस्व देते हो, अपनी ईमानदारी दिखाते हो और अपनी निष्ठा अर्पित करते हो तब तक तुम मानक स्तर के होगे। परमेश्वर हर व्यक्ति से सौ प्रतिशत हासिल किए जाने की अपेक्षा नहीं करता—साठ प्रतिशत पर्याप्त है। परमेश्वर क्या चाहता है? परमेश्वर एक रवैया चाहता है—अगर तुम्हारा रवैया यह इच्छा करना है कि तुम एक सृजित प्राणी का कर्तव्य करो, तुम्हें जो चीजें करनी चाहिए और हासिल करनी चाहिए, उन्हें बिना कोई पछतावा रखे अच्छी तरह से करो तो यह रवैया परमेश्वर द्वारा स्वीकार किया जाता है। परमेश्वर इस रवैये को स्वीकृति देगा, और यह तुम्हारी रक्षा करेगा ताकि तुम मार्ग के अंत तक पहुँच सको। कुछ लोग कहते हैं, “जब मैं मार्ग के अंत तक पहुँच जाऊँगा तब क्या होगा?” मैं तुम्हें अभी नहीं बताऊँगा—मैं तुम्हें बाद में बताऊँगा। जब तुम मार्ग के अंत तक पहुँच जाओगे तब तुम्हें पता चल जाएगा। संक्षेप में, अभी जो चीज सबसे ज्यादा मायने रखती है वह यह है कि तुम इस मामले से कैसे पेश आते हो, तुम उस कर्तव्य से कैसे पेश आते हो जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है और तुम उस कर्तव्य को कैसे पूरा करते हो जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है। यह कर्तव्य चाहे कुछ भी हो, जब तक यह ऐसा कुछ है जो परमेश्वर के घर द्वारा तुम्हें सौंपा गया है तब तक तुम्हें इसे पूरा करने के लिए अपना सर्वस्व देना होगा। जब तुम अपनी समस्याओं को पहचान लेते हो तब तुम्हें यह भरसक प्रयास करना होगा कि तुम उलझे हुए तर्क न दो, ऐसी चीजें न करो जो परमेश्वर को ठेस पहुँचाती हैं और ऐसी बातें न करो जो परमेश्वर को नाराज करती हैं; बल्कि तुम्हें ऐसी चीजें करनी होंगी जो लोगों और परमेश्वर के घर को लाभ पहुँचाती हैं और ऐसी चीजें कहनी होंगी जो लोगों और परमेश्वर के घर को लाभ पहुँचाती हैं। तुममें से कुछ लोग कहते हैं, “अब भी मैं फिलहाल इसके लिए सक्षम नहीं हूँ।” तो फिर अपना समय लो—अधीर मत हो। अगर तुम इसे आज नहीं कर सकते तो इसे कल करना। अगर तुम इसे इस वर्ष नहीं कर सकते तो इसे अगले वर्ष करने का प्रयास करना। बस अपना समय लो। लेकिन अगर जिस समय लोगों के परिणामों की घोषणा की जाती है उस समय तक भी तुमने इसे हासिल नहीं किया तो तुम्हें खुद ही इसके नतीजे भुगतने होंगे। तुम्हारे व्यवहार का हिसाब कोई और नहीं चुकाएगा। समझे? (हाँ।) इस मामले को हल करना आसान होना चाहिए—यह सब व्यक्ति की तार्किकता और इस पर निर्भर करता है कि वह इन वचनों को समझ सकता है या नहीं। अगर तुम उन्हें समझ सकते हो तो इन चीजों को हल करना बहुत आसान होगा। भले ही कुछ व्यक्ति कहें कि यह थोड़ा मुश्किल है, लेकिन जब तक वे इस दिशा में प्रयास करते रहेंगे तब तक उन्हें अंततः कुछ परिणाम अवश्य मिलेंगे। अगर तुम इस मार्ग पर नहीं चलते हो तो शायद तब भी तुम बचे रह पाओ, लेकिन जहाँ तक यह प्रश्न है कि अंत में कौन-सा परिणाम तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा होगा—यह कहना मुश्किल है; कोई भी इसकी गारंटी नहीं दे सकता और न ही कोई तुम्हें इस बारे में कोई आश्वासन देगा।

आज का विषय सुनकर तुम लोग कैसा महसूस कर रहे हो? तुम लोग शायद भावनात्मक रूप से काफी परेशान महसूस कर रहे हो, है ना? परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करने के बाद से लोग जिन विषयों का सामना करने के सबसे कम इच्छुक होते हैं, यह उनमें से एक है, है ना? क्या यह सेवाकर्मी होने के विषय से भी ज्यादा चिंताजनक और स्वीकारने में कठिन नहीं है? क्या इसे स्वीकारना मुश्किल है? तुम वास्तव में स्वीकारने में समर्थ हो, है ना? (सही कहा।) अगर लोग परमेश्वर की पहचान के बारे में निश्चित हैं और उन्हें अपनी खुद की जगह मिल गई है तो ये वचन और इस तरह का मुद्दा लोगों के लिए बहुत ज्यादा कठिन नहीं होने चाहिए—बस कुछ व्यक्तियों को ही इनसे कुछ मुश्किल हो सकती है। लेकिन यह सुनने के बाद ज्यादातर लोगों की इस खोज में लग जाने की संभावना नहीं है कि उनका मूल्य और पहचान सच में क्या हैं। अगर वे पशुओं से पुनर्जन्म लेने वाले लोगों की कुछ अभिव्यक्तियों से सच में मेल खाते हैं तो भी वे इससे सही ढंग से पेश आने में समर्थ होंगे और कुछ समय बाद उन्हें ठीक महसूस होगा, है ना? (हाँ।) तो आज के लिए हम यहीं तक संगति करेंगे। अलविदा!

20 जनवरी 2024

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें