सत्य का अनुसरण कैसे करें (13) भाग दो
दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशेषताएँ
पिछली बार हमने जिक्र किया था कि लोग मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में विभाजित किए जाते हैं। इन तीन श्रेणियों में कैसे भेद स्पष्ट किया जाता है? उनकी उत्पत्ति के आधार पर उनमें भेद स्पष्ट किया जाता है। पहली श्रेणी वे हैं जिन्होंने पशुओं से पुनर्जन्म लिया है, दूसरी श्रेणी वे हैं जिन्होंने दानवों से पुनर्जन्म लिया है और तीसरी श्रेणी वे हैं जिन्होंने मनुष्यों से पुनर्जन्म लिया है। हमने उन लोगों की विशेषताओं पर चर्चा समाप्त कर ली है जिन्होंने पशुओं से पुनर्जन्म लिया है और अब आओ, हम उन लोगों की विशेषताओं के बारे में बात करें जिन्होंने दानवों से पुनर्जन्म लिया है। तुम लोग दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की कौन-सी मुख्य विशेषताएँ सोच सकते हो? (वे सत्य और परमेश्वर के प्रबल विरोधी होते हैं।) यह कुछ हद तक एक सामान्य कथन है; तुम्हें उनकी मूलभूत अभिव्यक्तियों का वर्णन करना होगा और तुम्हें इस प्रकार के लोगों के जीवन के दैनिक खुलासों और उनकी विशिष्ट अभिव्यक्तियों का उपयोग करके उनकी विशेषताएँ निकालनी होंगी। क्या तुम जानते हो कि विशेषता क्या होती है? विशेषता एक अभिव्यक्ति है जो एक निश्चित प्रकार के व्यक्ति का सार दर्शाती है। अगर किसी में एक निश्चित प्रकार के व्यक्ति की विशेषताएँ हैं तो उसमें उस प्रकार के व्यक्ति का सार है और अगर कोई उस प्रकार का व्यक्ति है तो उसमें स्वाभाविक रूप से वे विशेषताएँ होंगी—कोई भी अपवाद नहीं है। विशेषता यही होती है। क्या तुम लोग दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशेषताएँ सोच सकते हो? (वे सत्य से विशेष रूप से विमुख होते हैं और उससे नफरत करते हैं। सत्य सुनने पर वे गुस्से और विकर्षण से प्रतिक्रिया करते हैं।) सत्य देखकर गुस्से और विकर्षण से प्रतिक्रिया करना एक विशिष्ट अभिव्यक्ति है। तुम और क्या सोच सकते हो? (वे दुष्ट और कपटी होते हैं। मुझे नहीं पता कि इसे विशेषता माना जाएगा या नहीं?) यह कुछ हद तक प्रासंगिक है। (वे निष्ठुर और अहंकारी भी होते हैं।) निष्ठुरता एक और विशिष्ट अभिव्यक्ति है। अहंकार एक आम विशेषता है जो भ्रष्ट मनुष्यों में होती है और यह सिर्फ दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में ही नहीं होती; यह पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों और मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों—इन दोनों प्रकार के लोगों—में भी होती है। उन विशिष्ट शैतानी भ्रष्ट स्वभावों के अलावा, दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में उनकी मानवता के लिहाज से कौन-सी विशिष्ट विशेषताएँ होती हैं? यानी वे अपने दैनिक जीवन में जो प्रकट करते हैं, कहते हैं और करते हैं, उसकी मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? (क्रूरता।) यह एक विशेषता है। और कौन-सी विशेषताएँ हैं? दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों और पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों दोनों में कुछ विशेष और मूलभूत विशेषताएँ होती हैं, लेकिन इन दोनों प्रकारों की विशेषताएँ पूरी तरह से भिन्न होती हैं। पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशेषताएँ विरूपित समझ, सुन्नता, भ्रमित होना और बेवकूफी हैं। ये विशेषताएँ ही क्यों? ये विशेषताएँ यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं कि इस प्रकार का व्यक्ति अपने सार के लिहाज से मानवीय विशेषताओं की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है और उसमें वह बुद्धिमत्ता तथा सोच का वह तरीका नहीं होता जो एक इंसान में होता है। इसलिए, ये ठेठ विशेषताएँ प्रमाणित करती हैं कि इस किस्म के लोग पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए होते हैं। दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों से भिन्न होते हैं। उनकी विशेषताएँ क्या हैं? चूँकि वे दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए होते हैं, इसलिए वे दानव हैं जो मनुष्य बन गए हैं। उनका आंतरिक सार वही होता है जो एक दानव का होता है। वैसे तो वे पशु नहीं होते हैं—वे बेवकूफ या सुन्न नहीं होते हैं और शायद उनमें विरूपित समझ नहीं होती है—लेकिन वे मनुष्य भी नहीं होते हैं और उनमें मनुष्यों की सामान्य सोच नहीं होती है। क्योंकि वे दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए होते हैं, इसलिए वे सार और वास्तविक रूप के लिहाज से बिना किसी अंतर के निश्चित रूप से दानवों के साथ पूरी तरह से संगत होते हैं और उनके जैसे होते हैं। तो दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की क्या विशेषताएँ हैं? पहली विशेषता यह है कि वे आदतन झूठ बोलते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे किस तरह से झूठ बोलते हैं, उनके चेहरे लाल नहीं होते हैं, उनके दिलों की धड़कनें तेज नहीं होती हैं और वे बिना कोई गलती किए या कमजोर पड़े, बेहद सामान्य और स्वाभाविक रूप से कार्य करते हैं। कोई भी यह भेद पहचान नहीं सकता कि उनके कौन-से शब्द सच्चे हैं और कौन-से झूठे। दूसरी विशेषता है विकृति। तुम लोगों ने अभी-अभी तीसरी विशेषता का जिक्र किया, जो कि बुराई है। दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में तीन विशेषताएँ होती हैं—वैसे तो पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की तुलना में उनमें एक विशेषता कम होती है, लेकिन फिर भी वे लोगों को जिस विनाशकारी शक्ति से और जिस मात्रा में निर्दयतापूर्वक चोट पहुँचाते हैं, वह पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों द्वारा पहुँचाई गई चोट या क्षति से कहीं ज्यादा होती है, क्योंकि वे दानव होते हैं। मात्रा के लिहाज से, लोगों को निर्दयतापूर्वक चोट पहुँचाने के दानवों के साधन पशुओं द्वारा लोगों को चोट पहुँचाने के साधनों से कहीं ज्यादा तीव्र होते हैं। लोगों को जाल में फँसाना, कुचल डालना, सुन्न करना, गुमराह करना और निर्दयतापूर्वक चोट पहुँचाना दानवों में जन्मजात है; यह उनका प्रकृति सार है। जहाँ तक पशुओं का प्रश्न है, जब तक वे खूंखार नहीं होते हैं तब तक आमतौर पर उनमें मनुष्यों के प्रति कोई बड़ी विनाशकारी शक्ति नहीं होती है; सिर्फ कुछ खास जानवर ही लोगों को कुछ हद तक निर्दयतापूर्वक चोट पहुँचाते हैं, मनुष्यों का माँस खाते हैं या सहज प्रवृत्ति के कारण लोगों को नुकसान पहुँचाते हैं। दानव भिन्न होते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे बड़े दानव हैं या छोटे—विभिन्न प्रकार के दानवों के बीच भेद करने की कोई जरूरत नहीं है—वे सभी लोगों को एक जैसा नुकसान और निर्दयतापूर्वक चोट पहुँचाते हैं। कोई भी तथाकथित अंतर सिर्फ साधनों या विधियों में अभिव्यक्त होता है, लेकिन दानवों के सार के लिहाज से यह हमेशा लोगों को निर्दयतापूर्वक चोट पहुँचाना होता है। चाहे तुमने उन्हें उकसाया हो या नहीं, उनका प्रकृति सार हमेशा लोगों को चोट पहुँचाना होता है। जब तक तुम उनके करीब रहते हो, जब तक तुम्हारे जीवन के बड़े या छोटे मामले उनसे जुड़े होते हैं तब तक तुम्हें उनसे नुकसान पहुँचने की संभावना रहती है। अगर तुम कुछ सत्य समझते हो, तुम्हारे पास कुछ सत्य वास्तविकताएँ हैं और तुममें इन दानवों के संबंध में भेद पहचानने की क्षमता है तो तुम्हें जिस मात्रा में उनके द्वारा नुकसान पहुँचाया जाएगा वह अपेक्षाकृत कम हो जाएगी या घट जाएगी। लेकिन अगर तुम्हारा आध्यात्मिक कद छोटा है, तुम सत्य नहीं समझते हो और तुम सत्य और जीवन से रहित व्यक्ति हो तो तुम्हें जिस मात्रा में नुकसान पहुँचाया जाएगा, उसका आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है—वे तुम्हें जिस भी तरीके से नुकसान पहुँचाना चाहेंगे, वे तुम्हें उसी तरीके से नुकसान पहुँचाएँगे और वे जिस भी हद तक तुम्हें नुकसान पहुँचाना चाहेंगे, तुम्हें उसी हद तक नुकसान पहुँचाया जाएगा। यही वह नुकसान है जो दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों द्वारा दूसरे लोगों को पहुँचाया जाता है। देखो, जब दानव सत्ता में होते हैं तब अगर तुम उनका समर्थन करते हो तो भी तुम्हें उनके द्वारा नुकसान पहुँचाया जाएगा और अगर तुम उनका समर्थन नहीं करते हो या उनका विरोध करते हो तो भी तुम्हें नुकसान पहुँचाया जाएगा। जब तक तुम उनके द्वारा शासित हो, जब तक तुम उनकी शक्ति के अधीन हो, जब तक तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, लेकिन तुमने सत्य प्राप्त नहीं किया है या तुम परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त नहीं किए गए हो तब तक तुम पूरी तरह से दानवों के पराजित प्रतिद्वंद्वी हो, उनके शिकार हो और कोई भी इसका अपवाद नहीं है। यह बड़े दानवों के बारे में है। जहाँ तक दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों का प्रश्न है, वे वास्तविक जीवन के छोटे दानव हैं, वे विभिन्न प्रकार के दानव हैं। अगर तुम उनके साथ रहते हो तो सबसे आम घटनाओं में से एक यह होगी कि वे आदतन झूठ बोलेंगे। तुम हमेशा उनके द्वारा छले जाओगे और हमेशा उनके द्वारा ठगे जाओगे; तुम नहीं जानोगे कि उनके कौन-से शब्द सच्चे हैं और कौन-से झूठे और तुम इस हद तक परेशान हो जाओगे कि तुम हर रोज असहज महसूस करोगे। “क्या उन्होंने यह जो चीज कही वह सच्ची है या झूठी? क्या वे मुझे फिर से छलने का प्रयास कर रहे हैं? मैं कैसे यह भेद पहचान सकता हूँ कि वे जो कहते हैं वह सही है या गलत?” देखो, अगर तुम उनके साथ रहोगे तो तुम उनके नुकसान से बहुत ज्यादा कष्ट सहोगे। उनके लगातार झूठ बोलने का यह मामला ही तुम्हें इस हद तक परेशान कर देगा कि तुम पूरी तरह से अव्यवस्थित हो जाओगे और हर दिन तुम्हारे दिल में न तो शांति होगी, न सुकून होगा और न ही खुशी होगी।
I. पहली विशेषता : आदतन झूठ बोलना
दानव से पुनर्जन्म लिए हुए प्रकार का व्यक्ति आदतन झूठ बोलता है और वह जो भी चीज करता है वह बहुत ही कपटपूर्ण होती है। वह दूसरों से गुप्त रूप से जो कुछ भी कहता है या पर्दे के पीछे जो कुछ भी करता है, उसके बारे में बाद में सच नहीं बताता; बल्कि वह एक अलग ही कहानी पेश करता है। वह तुम्हारे सामने दूसरों को बुरा-भला कहता है और दूसरों के सामने तुम्हें बुरा-भला कहता है। नतीजतन तुम्हारे और उन दूसरे लोगों के बीच रुकावटें उत्पन्न हो जाती हैं और तुम एक-दूसरे के बारे में बुरा सोचते हो। दरअसल तुम लोग एक-दूसरे से बिल्कुल भी परिचित नहीं हो और तुम एक-दूसरे के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते। इस दानव ने तुम लोगों के बीच कलह के बीज बोने के लिए कहानियाँ बनाईं, ठीक इसी कारण से तुम लोग दुश्मन बन गए हो। शैतान ने तुम्हें उल्लू बनाया है, लेकिन फिर भी तुम्हें नहीं पता कि क्या चल रहा है और तुम्हें लगता है कि दानव ने जो कहा वह सच है और वह तुम्हारे प्रति अच्छा है। देखो, जो व्यक्ति आदतन झूठा है, वह लोगों को इस हद तक उल्लू बना सकता है। वह लगातार झूठ बोलता है; वह जब तुम्हारे साथ होता है तब अक्सर चुगली करता है, कलह के बीज बोता है और कहानियों को बढ़ा-चढ़ाकर और नमक-मिर्च लगाकर मनमाने ढंग से अफवाहें गढ़ता है और बेबुनियाद दावे करता है। यह बात तुम्हें इस हद तक परेशान कर देती है कि तुम असहज महसूस करते हो, तुम्हें लगातार भेद पहचानना पड़ता है और चौकस रहना पड़ता है : “अमुक ने मेरे बारे में क्या बुरी चीजें कहीं? मुझे अमुक के साथ कैसे पेश आना चाहिए?” वह तुम्हें इस हद तक परेशान कर देता है कि तुम पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो जाते हो जिससे तुम्हारे जीवन की लय, तुम्हारे जीने के तरीके और तुम्हारी मौजूदा स्थिति बिगड़ जाती है। जब तुम्हारा आध्यात्मिक कद छोटा होता है और तुम सत्य नहीं समझते हो और जब तुमने अभी तक सत्य प्राप्त नहीं किया होता है तब तुम अक्सर उसके प्रभाव में आ जाते हो और यहाँ तक कि उसकी कुछ झूठी बातों से गुमराह, परेशान और बाधित हो जाते हो और बँध जाते हो। उदाहरण के लिए, मान लो कि तुम कलीसियाई अगुआ के रूप में चुने जाते हो और वह तुमसे कहता है, “अमुक व्यक्ति ने तुम्हारे बारे में यह कहा : ‘वह आदमी सोचता है कि वह अगुआ बन सकता है? वास्तव में वह कुछ भी नहीं है, फिर भी उसमें लोगों के साथ सत्य पर संगति करने का दुस्साहस है!’” दरअसल उस व्यक्ति ने ऐसा बिल्कुल नहीं कहा; यह बात तो दानव कहना चाहता था और वह इसका दोष किसी और के मत्थे मढ़ रहा है। उसकी बस यह एक टिप्पणी ही तुम्हें कमजोर महसूस करवा देती है और तुम परमेश्वर के सामने आते हो और प्रार्थना करते हो, “हे परमेश्वर, मेरा आध्यात्मिक कद सच में छोटा है और मैं इस कार्य की जिम्मेदारी नहीं उठा सकता। मैं तुम्हारा ऋणी हूँ, मैंने अपना कार्य ठीक से नहीं किया है। मैं इस्तीफा देना चाहता हूँ, लेकिन मुझे डर है कि यह निष्ठाहीनता होगी। मुझे क्या करना चाहिए?” उसने तुम्हें इस हद तक परेशान कर दिया है कि तुम अपना कार्य जारी नहीं रख सकते हो; अगर तुम आगे बढ़ते हो तो भी तुम ऐसा एक तरह की नकारात्मक भावना के साथ करते हो जिससे धीरे-धीरे तुम कलीसिया के कार्य के प्रति अपने दायित्व का बोध खोते जाते हो जब तक कि अंततः यह कार्य ठप नहीं पड़ जाता। तुम परेशान कर दिए गए हो, है ना? (हाँ।) इस प्रकार के व्यक्ति के साथ रहना, मेलजोल रखना और कार्य करना वाकई परेशानी वाली बात है। उसके शब्दों में बहुत ही ज्यादा असत्यता, बहुत ही ज्यादा मिलावट, उसकी अपनी खुद की बहुत ही ज्यादा इच्छा और उसके अपने बहुत ही ज्यादा मकसद होते हैं; वह जो कुछ भी कहता है वह झूठ होता है। तुम्हें लगातार यह भेद पहचानना होगा : “उसके कौन-से शब्द सच्चे हैं और कौन-से झूठे? उसने पर्दे के पीछे वास्तव में क्या किया है और क्या नहीं किया है? क्या वह परमेश्वर में सच्चा विश्वासी है? वह कहता है कि वह भविष्य में अपना कर्तव्य निश्चित रूप से अच्छी तरह से करेगा और परमेश्वर के घर ने उसे जो पदोन्नति दी है वह उसकी कसौटी पर निश्चित रूप से खरा उतरेगा—क्या ये शब्द सच में दिल से निकले हैं? क्या उसने जो शपथ ली और उसने जो संकल्प व्यक्त किया वह उन्हीं के अनुसार कार्य करेगा?” जब तुम उसका व्यवहार देखते हो तब तुम्हारा मन प्रश्नों की एक शृंखला से भर जाता है। तुम्हें अक्सर लगता है कि वह डरावना है, लेकिन उसके शब्द काफी भरोसेमंद और उचित लगते हैं। फिर भी रात को सपनों में तुम देखते हो कि उसका चेहरा एक दानव के चेहरे में बदल गया है, वह अपने नुकीले दाँत दिखा रहा है और अपने पंजे लहरा रहा है और तुम सोचते हो, “क्या वह वास्तव में मनुष्य है? उसके कौन-से शब्द सच्चे हैं और कौन-से झूठे? ऐसा क्यों है कि मैं उसकी असलियत नहीं जान सकता? इस प्रकार का व्यक्ति बहुत ही ज्यादा डरावना है!” तुम्हें लगता है कि वह डरावना और गैर-भरोसेमंद है, लेकिन जब तुम उसके कार्य की जाँच करते हो तब वह मूल रूप से ठीक-ठाक होता है और जब तुम उसे बोलते हुए सुनते हो तब तुम्हें कोई गलती दिखाई नहीं पड़ती। लेकिन तुम उसकी असलियत बस जान ही नहीं पाते हो—तुम्हारी आत्मा में एक बेनाम संदेह है और तुम हमेशा अपने दिल में महसूस करते हो कि वह परेशानी खड़ी कर सकता है, हमेशा महसूस करते हो कि उसके शब्द निष्ठाहीन हैं और पूरी तरह से सच्चे नहीं हैं। शायद एक दिन उसकी झूठ बोलने वाली प्रकृति उजागर हो जाए और उसके बारे में तुम्हारी भावना की पुष्टि हो जाए : तुम्हें पता चले कि उस समय उसके बारे में तुम्हारा संदेह और तुम्हारी भावना सही थी और वैसे तो उसके कहे शब्द सुनने में बहुत अच्छे और भरोसे के लायक थे, लेकिन वे सब झूठे और भ्रामक थे; उसने पर्दे के पीछे कोई वास्तविक कार्य किया ही नहीं। तो क्या इस प्रकार के व्यक्ति पर अब भी भरोसा किया जा सकता है? (नहीं।) वैसे तो तुम्हें अपने दिल में लगता है कि अब उस पर और भरोसा नहीं किया जा सकता, लेकिन जब तुम उससे दोबारा मिलते हो और उसे बोलते हुए सुनते हो तब उसकी समझ बिल्कुल शुद्ध लगती है, उसकी बातें सुनने में अच्छी लगती हैं और तुम उसके शब्दों में कोई समस्या नहीं पाते हो और बाहर से वह कष्ट भी सह सकता है और कीमत भी चुका सकता है। तुम सोच में पड़ जाते हो, “यहाँ चल क्या रहा है? शायद मैंने उसे गलत समझा, शायद मेरी सोच नीचतापूर्ण थी। चलो, मैं उस पर एक बार और भरोसा कर लेता हूँ। बहरहाल, अभी मुझे इस कार्य में उसकी जगह लेने के लिए कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिल रहा है, इसलिए मैं एक बार और उसका उपयोग करूँगा।” फिर तुम उसका उपयोग करना जारी रखते हो और अंतिम नतीजा अब भी वही होता है : तुम्हें पता चलता है कि तुम उससे दोबारा धोखा खा गए हो। वह अच्छे तरीके से बोलता है, लेकिन वास्तव में पर्दे के पीछे वह बस अपना ही उद्यम चला रहा होता है और कुछ भी वास्तविक नहीं करता है। अगर वह सुसमाचार प्रचार के दौरान एक महीने में दस लोग प्राप्त करता है तो वह यह कहने पर अड़ जाता है कि वे पचास थे। वह बस सच बोलेगा ही नहीं। वह आदतन झूठा है, झूठ बोलने में माहिर है। तुम उस पर भरोसा करते हो और बार-बार उसका उपयोग करते हो और नतीजतन तुम्हें बार-बार बेवकूफ बनाया जाता है। और अंत में नुकसान किसका होता है? यकीनन इन चीजों का अनुभव करने के जरिए लोगों में दूसरों के संबंध में भेद पहचानने की क्षमता विकसित होती है, उनकी अंतर्दृष्टि बढ़ती है, उनके अनुभव में बढ़ोतरी होती है और वे लोगों का आकलन करने में बेहतर हो जाते हैं, लेकिन सचमुच नुकसान किस चीज का होता है? कलीसिया के कार्य का। तो मुझे बताओ, क्या दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों का बस यह एक प्रकृति सार—जो कि आदतन झूठा होना है—दूसरों को बहुत नुकसान पहुँचाता है या नहीं? (हाँ, पहुँचाता है।) यह नुकसान कितना बड़ा है? क्या वह तुम्हें गुमराह कर सकता है? (हाँ, हमें गुमराह किया जा सकता है और हमारा शोषण किया जा सकता है।) तुम्हें गुमराह किया जा सकता है, तुम्हारा शोषण किया जा सकता है और तुम्हें परेशान किया जा सकता है—क्या यह तुम्हारे साथ हेरा फेरी किए जाने की हद तक पहुँच सकता है? (हाँ।) अगर तुम जवान हो, तुममें अनुभव की कमी है और तुम सत्य नहीं समझते हो और मामलों की असलियत नहीं जान सकते हो तो तुम्हारे साथ उनके द्वारा हेरा फेरी की जा सकती है। उनके द्वारा हेरा फेरी किए जाने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि तुम उनके सामने बेबस हो जाते हो, तुम उनके द्वारा नियंत्रित हो जाते हो, उनके द्वारा तुम्हारे हाथ-पैर बाँध दिए जाते हैं, चीजों के बारे में तुम्हारे सोचने का तरीका और तुम्हारे विचार और नजरिए उनके द्वारा प्रभावित हो जाते हैं और उनके प्रभाव में डगमगा जाते हैं, तुम आगे जो भी करते हो वह पूरी तरह से उनकी योजना के अनुसार आगे बढ़ता है और तुम पूरी तरह से उस जाल में फँस जाते हो जो उन्होंने तुम्हारे लिए बनाया है—हेरा फेरी किए जाने का यही मतलब है। वे पर्दे के पीछे पहले से ही इसकी पूरी योजना बना लेते हैं, तुम्हारे खिलाफ साजिश रचने के लिए हर किस्म की युक्तियों का उपयोग करते हैं। वे तुम्हारी असलियत पूरी तरह से जानते है—तुम क्या समझते हो और तुम किसकी असलियत नहीं जान सकते हो, किन मामलों में तुम्हारे पास भेद पहचानने की क्षमता है और किन मामलों में नहीं, तुम्हारी सीमाएँ क्या हैं, तुम्हारा किस तरह से शोषण किया जा सकता है और कौन-से शब्द तुम्हें गुमराह कर सकते हैं। अंत में वे झूठ गढ़ने और तुम्हें बेवकूफ बनाने के लिए तुम्हारे दोषों और विभिन्न कमजोर पक्षों का फायदा उठाते हैं। तुम अपने दिल में यह स्पष्ट रूप से जानते हो कि उन्होंने जो किया वह गलत था या उन्होंने जो कहा उसमें एक समस्या थी और वे झूठ बोल रहे थे, लेकिन तुम्हारे पास इससे निपटने के लिए बुद्धिमानी नहीं है; तुम दुखी तो हो, लेकिन उनके सामने बेबस हो और तुम उनके द्वारा सिर्फ नकेल पकड़कर चलाए जा सकते हो। क्या यह उनके द्वारा हेरा फेरी किया जाना नहीं है? (हाँ।) अंततः स्थिति जिस दिशा में विकसित होती है, वह बिल्कुल अंतिम नतीजे तक उनकी योजना के अनुसार आगे बढ़ती है—इसका मतलब है कि उनके द्वारा तुम्हारे साथ हेरा फेरी की जाती है। यानी तुम स्थिति के विकास की दिशा को नियंत्रित करने की क्षमता पूरी तरह से खो बैठते हो और पूरी तरह से उनके द्वारा नकेल पकड़कर चलाए जाते हो। वे जो भी लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं, वे जो भी पूरा करना चाहते हैं, वे जिसका भी शोषण करना चाहते हैं और वे जिस भी तरीके से चीजें करना चाहते हैं, उस लिहाज से अंततः वे अपना रास्ता प्राप्त कर ही लेते हैं। मुझे बताओ, क्या यह उनके द्वारा हेरा फेरी किया जाना नहीं है? (हाँ, है।)
मुझे बताओ, दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों के आदतन झूठे होने की प्रकृति के लिहाज से, क्या वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों को और विशेष रूप से कलीसिया के कार्य को जो नुकसान पहुँचाते हैं, वह बहुत बड़ा होता है या नहीं? (वह बहुत बड़ा होता है।) यह नुकसान बहुत ही बड़ा होता है! तो कुछ व्यक्तियों के दैनिक जीवन को प्रभावित करने के अलावा वे लोगों को दूसरा कौन-सा बड़ा नुकसान पहुँचाते हैं? (दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों के क्रियाकलापों से उनके आस-पास के लोगों के लिए जो विघ्न-बाधा उत्पन्न होती है, वह बहुत ही गंभीर होती है। मेरा इससे पहले ऐसे ही एक व्यक्ति से सामना हुआ था; वह जहाँ भी होता था, वह जगह साजिशों से और शक्ति और रुतबे के लिए होड़ से भर जाती थी, लोगों के बीच रुकावटें उत्पन्न हो जाती थीं और भाई-बहन भी अपने दिलों में अंधकार महसूस करते थे।) इससे अव्यवस्था उत्पन्न हुई, है ना? (हाँ।) यह लोगों को एक-दूसरे पर संदेह करने, एक-दूसरे से लड़ने और अव्यवस्था की अवस्था में प्रवेश करने का कारण बना—यह बहुत ही बड़ा नुकसान है! तो बाद में क्या सभी ने इस दानव का भेद पहचानने की क्षमता प्राप्त की थी? (हाँ।) क्या उसे दूर कर दिया गया था? (उसे दूर कर दिया गया था।) जब उसे दूर कर दिया गया, उसके बाद क्या सभी ने चीजों का सारांश प्रस्तुत किया था? उसके झूठ बोलने की मुख्य विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ, उसने जो झूठ बोले, उसने जिन चीजों की खातिर झूठ बोले, जब उसने झूठ बोले तब उसने जिन विधियों और आवाज के जिस लहजे का उपयोग किया, वह जो उद्देश्य हासिल करना चाहता था—क्या तुम सभी लोगों ने इन विशिष्ट विधियों और अभिव्यक्तियों का सारांश प्रस्तुत किया था? (हमने किया था। उदाहरण के लिए, वह आदतन झूठा है; उसके शब्दों में सही और गलत में भ्रम पैदा करने और काले को सफेद कहकर बुलाने की, सकारात्मक व्यक्तियों को नकारात्मक और नकारात्मक व्यक्तियों को सकारात्मक बनाने की प्रकृति है। वह जिससे भी ईर्ष्या या नफरत करता था, उस पर बेबुनियाद आरोप लगाता था और भाई-बहनों को उसका विरोध करने के लिए उकसाता था जिससे अव्यवस्था उत्पन्न होती थी। उसने कुछ अच्छे लोगों का या उन लोगों का भी दमन किया था जिन्हें अपने कर्तव्यों में नतीजे मिले थे, जबकि उन लोगों की पदोन्नति की थी जिन पर वह कृपादृष्टि रखता था और जिन्होंने उसकी खुशामद की थी।) यह मसीह-विरोधी है, है ना? (हाँ।) इस प्रकार के व्यक्ति द्वारा झूठ बोलने की मुख्य विधियाँ क्या हैं? अचानक कहीं से मनगढ़ंत बातें बनाना, कहानियों को बढ़ा-चढ़ाकर और उनमें नमक-मिर्च लगाकर बताना, दोष को दूसरों के मत्थे मढ़ देना, झगड़े करवाने के लिए कहानियाँ सुनाना और कलह के बीज बोना—और क्या? (आग भड़काना।) आग भड़काना और झगड़े बढ़ाना। उदाहरण के लिए, दो लोग आपस में बहुत अच्छी तरह से मिलजुलकर रह रहे हैं, वे किसी भी बात पर बहस नहीं करना चाहते या किसी से भी दुश्मनी नहीं करना चाहते, लेकिन इस प्रकार का व्यक्ति उनके बीच आग लगाकर उन्हें आपस में लड़ना शुरू करवा देता है। अगर वह उन दो लोगों को लड़ते हुए देखता है तो उसे खुशी होती है, और उसकी साजिश सफल हो चुकी होती है। हर समूह में इस किस्म के कुछ लोग होते हैं। हर किसी में भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, लेकिन क्या मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग ये चीजें करेंगे? (नहीं।) क्यों नहीं? उनमें और दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में क्या अंतर है? (सामान्य लोगों में जमीर का न्यूनतम मानक होता है।) सही कहा। उनमें जमीर का न्यूनतम मानक होता है; वे अपने स्व-आचरण में जमीर द्वारा संयमित होते हैं। वे ये नैतिक रूप से भ्रष्ट चीजें नहीं करेंगे, ये चीजें जिनका मतलब है सत्यनिष्ठा और गरिमा को खोना या ये चीजें जो दूसरों को नुकसान पहुँचाती हैं और खुद को लाभ पहुँचाती हैं। जमीर होने का मतलब है कि उनमें एक न्यूनतम मानक है और इस प्रकार उनके क्रियाकलाप संयमित होते हैं। तो क्या दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए इन लोगों में जमीर होता है? (नहीं।) तो फिर उनके पास किस तरह के दिल होते हैं? (दुर्भावनापूर्ण दिल।) उनके पास दुर्भावनापूर्ण और दुष्ट दिल होते हैं और इसलिए वे आदतन झूठ बोल सकते हैं और वे चाहे कैसे भी झूठ बोलें, वे भीतर से असहज महसूस नहीं करते हैं। वे असहज क्यों नहीं महसूस करते हैं? क्योंकि वे दानव हैं और उनमें जमीर नहीं है, इसलिए जब वे झूठ बोलते हैं और बुराई करते हैं तब उन्हें न तो असहज महसूस होता है और न ही वे ग्लानि महसूस करते हैं। इसके विपरीत, अगर वे झूठ नहीं बोलते हैं और अगर—वे जहाँ हैं—वहाँ वे कोई बुराई नहीं करते हैं या कोई हंगामा नहीं मचाते हैं और अव्यवस्था नहीं फैलाते हैं और हर कोई शांति और आनंद से जीता है और हर कोई परमेश्वर के सामने जीता है तो वे भीतर से परेशान और असहज महसूस करते हैं। वे असहज क्यों महसूस करते हैं? वह इसलिए क्योंकि हर कोई परमेश्वर के सामने आता है, उसके वचनों पर सोच-विचार करता है, उसके वचनों और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है, सामान्य मानवता के भीतर जीता है और उनकी आराधना नहीं करता है; वे लोगों के बीच अलग से दिखाई नहीं देते हैं या महत्वपूर्ण महसूस नहीं करते हैं, इसलिए वे सोचते हैं, “इस तरह से जीना बहुत ही उबाऊ है, इसमें कोई मजा नहीं है!” मौज-मस्ती करने, जीवन को रोचक बनाने, सम्मानपूर्वक और महत्व की भावना के साथ जीने के लिए उन्हें लोगों के बीच कुछ न कुछ बखेड़ा खड़ा करना पड़ता है, कुछ समस्याएँ उत्पन्न करनी पड़ती हैं, कुछ हलचल मचानी पड़ती है और कुछ अशांति और अव्यवस्था फैलानी पड़ती है। वह कहावत क्या है? तूफान खड़ा कर देना। इस प्रकार का व्यक्ति जहाँ भी हो वहीं तूफान खड़ा करना पसंद करता है; वह अपनी मर्यादा में रहना पसंद नहीं करता। सामान्य लोग अपनी मर्यादा में रहना चाहते हैं—स्थिर जीवन जीना चाहते हैं और नियमित रूप से वह करना चाहते हैं जो उन्हें करना चाहिए—वे तूफान खड़ा करना पसंद नहीं करते हैं। जो लोग दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए होते हैं वे अपनी मर्यादा में नहीं रहते हैं। वे अपनी मर्यादा में क्यों नहीं रहते हैं? क्योंकि इस प्रकार के व्यक्ति के भीतर एक दानव बसता है और दानव जिस भी समूह में शामिल होते हैं, उसमें समस्याएँ उत्पन्न करना पसंद करते हैं। भले ही तुमने उन्हें उकसाया नहीं हो या नाराज नहीं किया हो, तो भी वे बस अपने आप ही परेशानी खड़ी करने लगते हैं—यह तूफान खड़ा करना है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस प्रकार का व्यक्ति किस समूह में शामिल है, चाहे तुम उसे दूर से देखो या उसके सदस्यों की परिस्थितियों के बारे में पूछताछ करो, तुम्हें हमेशा ऐसा लगता है कि वहाँ राक्षसी माहौल है। समय-समय पर तुम सुनते हो कि व्यक्ति A का व्यक्ति B से कोई झगड़ा है, व्यक्ति C और व्यक्ति D की आपस में नहीं निभ रही है और वे एक-दूसरे को नजरअंदाज कर रहे हैं, व्यक्ति E का व्यक्ति F से अपने कार्य में विवाद हैं, व्यक्ति G हमेशा रुतबे के लिए होड़ करता रहता है और उसके काम को हमेशा नए सिरे से करने की जरूरत होती है। अगर तुम्हें कोई ऐसी कलीसिया दिखाई पड़ती है जहाँ हमेशा अव्यवस्थित और गंदा माहौल रहता है, जहाँ बिल्कुल शांति नहीं है, जहाँ लोग हमेशा एक-दूसरे के साथ निभाने या सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग करने में असमर्थ हैं तो वहाँ एक या यहाँ तक कि एक से अधिक दानव हैं जो उसके भीतर विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न कर रहे हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कलीसिया में कितने दानव विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न कर रहे हैं, वे दूसरे लोग जिनमें न्यूनतम मानक का जमीर है और जो सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चाहते हैं, उन सभी को इनसे बुरी तरह से नुकसान पहुँचता है। जैसे ही सभी प्रकार के दानवों को दूर कर दिया जाता है, जब सब लोग फिर से इकट्ठे कलीसियाई जीवन जीते हैं और अपने कर्तव्य करते हैं तब माहौल अलग ही होता है। वैसे तो तुम यह नहीं कह सकते कि हर कोई बेहद जोश में होता है, लेकिन कम-से-कम सभी को यह तो लगता ही है कि वहाँ के लोगों में मानवीय गर्मजोशी है और वे परेशानी खड़ी नहीं करते हैं; वहाँ का माहौल राक्षसी नहीं है, बल्कि यह मानवीय माहौल है। जिन जगहों पर माहौल राक्षसी होता है, वहाँ जब लोग इकट्ठे बात करते हैं तब उनकी आँखों के भाव में कुछ गड़बड़ होती है, और साथ ही बोलते समय उनकी आवाज के लहजे में और माहौल में कुछ गड़बड़ होती है। जब वे बात करते हैं तब वे नजरें नहीं मिलाते हैं; इसके अलावा, वे जो कहते हैं वह बहुत ही सरल होता है, उनमें से कोई भी दिल से बोलने को तैयार नहीं होता और कोई मौखिक संवाद नहीं होता है। ऐसा लगता है जैसे उनके बीच कोई दीवार हो। उनके बीच कोई संवाद नहीं होता; वे अपने दिलों में नफरत रखते हैं। हो सकता है कि ये लोग पीड़ित हों। चाहे ये लोग पीड़ित हों या पीड़क, संक्षेप में कहें तो, इस समूह में दानव घुले-मिले हुए हैं और विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न कर रहे हैं, लोगों के दिलों को इस हद तक परेशान कर रहे हैं कि वे उलझन में पड़े हुए हैं और उन्हें कोई शांति नहीं मिल रही है। जब इस समूह के लोग एक साथ रहते हैं तब उन्हें हमेशा लगता है कि चीजें असंतोषजनक हैं और सुचारू रूप से नहीं चल रही हैं, वे सामंजस्यपूर्ण ढंग से एक साथ नहीं रह सकते हैं और यकीनन सामंजस्यपूर्ण सहयोग का तो और भी प्रश्न नहीं उठता। इस समूह में बोलते, कार्य करते और अपने कर्तव्य करते समय लोग हमेशा भीतर से नाखुश महसूस करते हैं और उनके बीच रुकावटें भी होती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस समूह में विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करने वाले दानव हैं और इसलिए हर कोई बेबस है और दुखी महसूस करता है।
कुछ लोगों ने दानवों द्वारा भारी विघ्न-बाधाओं का अनुभव किया और मूलतः उनके साथ दानवों ने हेरा फेरी की। जब मैंने उन्हें एक-दो महीने बाद देखा तब उनके चेहरे किसी तरह से उतरे हुए लग रहे थे, मानो उन्हें बेवकूफ बनाया गया हो। क्या ऐसा हो सकता है कि उनमें पवित्र आत्मा के कार्य और परमेश्वर की मौजूदगी की कमी थी? वे क्यों इतने अजीब लग रहे थे? बाद में सावधानी से की गई पूछताछ के जरिए मुझे पता लगा कि सचमुच कुछ घटित हुआ था : दो दानवों ने इन सभी लोगों को नियंत्रित किया था। दानवों ने किस हद तक उन्हें नियंत्रित किया था? दानवों ने जो भी चाहा वह किया; ऊपरवाले द्वारा जारी कार्य-व्यवस्थाएँ और ऊपरवाले द्वारा संगति किए गए सिद्धांत कार्यान्वित नहीं किए जा सके—वे सभी वहाँ सिर्फ नाम के लिए मौजूद थे। इन दो दानवों द्वारा रास्ता रोकने के कारण किसी ने भी अपनी राय व्यक्त करने या समस्याओं की रिपोर्ट करने की हिम्मत नहीं की। बाद में जब इन दोनों दानवों का जिक्र किया गया तब कुछ लोगों को इतना गुस्सा आया कि वे फूट-फूट कर रोने लगे। तुमने उन्हें उस समय क्यों उजागर नहीं किया? वहाँ इतने सारे लोगों के होते हुए भी किसी ने भी उठ खड़े होने और दानवों को उजागर करने की हिम्मत नहीं की—उन दानवों में कितनी ज्यादा शक्ति रही होगी? बाहर से वे मनुष्य लगते हैं, लेकिन उनका सार वास्तव में दानव का सार है। इस प्रकार का व्यक्ति जहाँ भी जाता है, दूसरे लोग उससे डरते हैं। उसके संपर्क में आने भर से ही लोगों को डर महसूस होता है, वे सिहरन महसूस करते हैं। अगर कोई बच्चा इस तरह के व्यक्ति से मिले तो वह इतना डर जाएगा कि रोने लगेगा। जब निष्कपट लोग इस प्रकार के व्यक्ति से मिलते हैं तब वे किस हद तक डर जाते हैं? जब वे उनके सामने होते हैं तब वे जोर से साँस लेने या ऊँची आवाज में बोलने की हिम्मत नहीं करते हैं और यहाँ तक कि रास्ता बदलकर जल्दी से उनसे बचने का प्रयास भी करते हैं। किसी ने देखा कि ये दानव कार्य को कार्य-व्यवस्थाओं के अनुसार कार्यान्वित नहीं कर रहे हैं और कहा, “इसे इस तरह से करना सही नहीं है; यह ऊपरवाले द्वारा संगति किए गए सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।” उन दानवों में से एक ने पलटकर उत्तर दिया, “यहाँ मेरी मर्जी चलती है। अगर तुमने अपनी हद पार की तो मानो या न मानो, मैं तुम्हें इसी समय निष्कासित कर सकता हूँ!” इससे वह व्यक्ति इतना ज्यादा डर गया कि उसका चेहरा फीका पड़ गया और उसने फिर से अपनी राय व्यक्त करने की हिम्मत नहीं की और रोते हुए कहा, “मैं गलत था। बस ऐसे दिखाओ जैसे मैंने कुछ कहा ही न हो। तुमसे बार-बार विनती है कि मुझे निष्कासित मत करना!” दूसरों ने यह देखा और कहा, “वह बहुत ही डरावना है, उसकी शक्ति बहुत ही ज्यादा है! जो उसकी बात नहीं मानेगा, उसे वह निष्कासित कर देगा! हमें परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य करने का अवसर बड़ी मुश्किल से मिला। अगर उसने हमें निष्कासित कर दिया तो हम अपने मामले की गुहार कहाँ लगाएँगे? क्या हमारा काम तमाम नहीं हो जाएगा? क्या हमारे उद्धार की उम्मीद चली नहीं जाएगी? हमें वाकई अपनी राय व्यक्त नहीं करनी चाहिए; एक पल की लापरवाही के कारण हमें निष्कासित नहीं होना चाहिए।” देखो, वे इस हद तक भयभीत थे। अंततः जब दानवों को उजागर किया जा रहा था तब कुछ लोगों ने यह उजागर किया कि किस तरह से दानवों ने कलह के बीज बोए थे और गुटबाजी की थी, जबकि दूसरे लोगों ने उन भ्रांतियों को उजागर किया जो लोगों को गुमराह करने के लिए दानवों ने फैलाई थीं। दरअसल इन लोगों ने उस समय दानवों द्वारा की गई बुराई को स्पष्ट रूप से देखा था; बस यही था कि किसी ने एक भी शब्द कहने या प्रतिरोध करने की हिम्मत नहीं की थी। यहाँ तक कि कुछ लोग बोलते-बोलते रोने भी लगे, वे काफी दयनीय लग रहे थे। लेकिन जब दानव उनके साथ हेरा फेरी और उन्हें नियंत्रित कर रहे थे तब उन्होंने प्रतिरोध क्यों नहीं किया? तब वे शक्तिहीन क्यों हो गए थे? अब जब ऊपरवाला दानवों से निपटने वाला था तब उन्हें अपनी शक्ति मिल गई। मुझे बताओ, अगर परमेश्वर ने इन छोटे आध्यात्मिक कद और सत्य नहीं समझने वाले लोगों की देखभाल और रक्षा नहीं की होती और अगर उन्हें परमेश्वर का बचाव नहीं मिला होता तो क्या वे दानवों द्वारा इस हद तक गंभीर रूप से नुकसान नहीं पहुँचाए गए होते कि उनका काम तमाम हो जाता? क्या ऐसा ही नहीं है? (हाँ।) देखो, लोग परमेश्वर से उतना नहीं डरते हैं, लेकिन जब दानव और शैतान लोगों को सताते हैं तब वे इतने भयभीत हो जाते हैं कि वे सिर से पैर तक काँप उठते हैं और स्पष्ट रूप से रो भी नहीं पाते हैं—वे कितनी बुरी तरह से डरे होते हैं! जब ऊपरवाले ने इन दोनों दानवों को उजागर किया और वह उनसे निपटा, तब उन लोगों ने यह खबर सुनी और आखिरकार उन्हें आजादी महसूस हुई। उन कुछ महीनों के दौरान वे दानवों द्वारा नियंत्रित किए जा रहे थे और शैतान की शक्ति के अधीन जी रहे थे, वे अंधकार में डूब चुके थे जहाँ आशा की कोई किरण नजर नहीं आ रही थी, और वे शून्य में चीख-चीखकर रोए जा रहे थे। उनके जीवन कितने दयनीय थे! आखिरकार इन दोनों दानवों को बाहर निकाल दिया गया और हर कोई आजाद और खुश हो गया। मैंने सोचा, “ऊपरवाले ने इस बार इन दोनों दानवों को बाहर निकाल दिया है, तो अगर इन लोगों का सामना बुराई करने वाले और लोगों को नियंत्रित करने वाले दानवों से फिर से होता है तो क्या वे उनका भेद पहचान पाएँगे? क्या वे खुद दानवों को उनके पदों से हटा पाएँगे और ऊपरवाले को आगे आकर मामले को सुलझाने की जरूरत नहीं पड़ेगी? क्या वे सब इकट्ठे होकर दानवों को उजागर करने, उनके सारे बुरे कर्मों का सारांश प्रस्तुत करने और फिर उन्हें उनके पदों से हटाने और उनकी बात नहीं सुनने, उनके द्वारा अपने कर्तव्य करने में बाधित नहीं होने और उन्हें कलीसिया से लात मारकर बाहर निकालने में सक्षम होंगे?” लेकिन उनके आध्यात्मिक कद को देखा जाए तो मुझे लगता है, वे उसे हासिल नहीं कर सकेंगे। वैसे तो ये लोग सच्चाई से परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, उनमें कष्ट सहने का संकल्प है, वे लगन से अपना कर्तव्य करने के इच्छुक हैं और सत्य का अनुसरण करने के इच्छुक हैं, लेकिन वे बस बहुत ही ज्यादा कायर हैं। जब सिर्फ एक छोटा-सा दानव विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करने के लिए सामने आया तब ये लोग, चाहे उनकी उम्र कितनी भी रही हो, बिदककर पीछे हट गए और डर गए, वे सब उसके नियंत्रण में आ गए और प्रतिरोध करने की हिम्मत नहीं कर सके। यह देखकर मुझे लगा कि ये लोग तो बहुत ही दयनीय हैं। अगर परमेश्वर लोगों की रक्षा नहीं करता, उनके लिए चिंतित नहीं रहता और उनकी देखभाल नहीं करता तो इस मानवजाति के पास जिंदा बचने का कोई रास्ता नहीं होता। वास्तविक जीवन में घटने वाली इन घटनाओं को देखो : विभिन्न दानवों का व्यवहार, उनके मकसद और चीजें करने की उनकी विधियाँ और युक्तियाँ लगभग समान होती हैं और उनका भेद पहचानना आसान होता है, फिर भी जब विभिन्न दानव गड़बड़ियाँ और विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करने और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को बाधित करने, नियंत्रित करने, बाँधने और गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाने के लिए बाहर आते हैं तब कम ही लोग खड़े होने और प्रतिरोध करने की हिम्मत करते हैं, कोई भी इन दानवों को उजागर करने, उन्हें उनके पदों से हटाने और उन्हें कलीसिया से दूर करने की पहल नहीं करता है; वे बस दानवों को परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नियंत्रित करने और कलीसिया के कार्य में व्यवधान डालने और तोड़फोड़ करने देते हैं। ये दयनीय लोग यह सब बस सहते रहते हैं; वे अपने दिलों में परेशान महसूस करते हैं और परमेश्वर से प्रार्थना करते समय फूट-फूटकर रोते हैं, लेकिन उनके पास कोई समाधान नहीं होता है; उनके पास कोई बुद्धिमानी भरी विधि नहीं होती है और वे दानवों का प्रतिरोध करने, उनसे लड़ने और उनसे निपटने के लिए सत्य का उपयोग एक शक्तिशाली हथियार के रूप में नहीं करते हैं। कोई भी ऐसा नहीं करता है और न ही ऐसा करने की हिम्मत करता है; उनमें दानवों का सामना करने तक का साहस नहीं होता है। किसी भी कलीसिया में अगर लोगों को नियंत्रित करने और कलीसिया के कार्य में गड़बड़ करने और बाधा डालने के लिए बुरे लोग या दानव प्रकट होते हैं तो ज्यादातर लोग इसे बस सहते रहते हैं। अंत में परमेश्वर का घर ही इन विभिन्न प्रकार के दानवों से निपटने के लिए आगे आता है और उनका भाग्य समाप्त कर देता है, जिससे भाई-बहन सुरक्षित रहने, सामान्य रूप से कलीसियाई जीवन जीने, परमेश्वर के वचनों को सामान्य रूप से खाने-पीने और अपने कर्तव्य सामान्य रूप से करने में समर्थ हो जाते हैं और कलीसिया के कार्य की विभिन्न मदें सुव्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ने में समर्थ हो जाती हैं। पूरी तरह से, परमेश्वर द्वारा लोगों को भेजने और परमेश्वर के घर द्वारा व्यक्तिगत रूप से इस विशिष्ट कार्य के निर्वहन की व्यवस्था और मार्गदर्शन करने के जरिए ही इन अपरिपक्व, जाहिल और कमजोर लोगों की बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह किए जाने और गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाए जाने से रक्षा होती है। सत्य नहीं समझने वाले ये बेवकूफ और जाहिल कितने दयनीय होते हैं! व्यापक परिवेश में पूरी मानवजाति शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दी गई है; विशिष्ट जीवनयापन के परिवेशों में लोगों को विभिन्न दानवों द्वारा परेशान और नियंत्रित किया जाता है और गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाया जाता है। कुछ लोग आध्यात्मिक कद में छोटे होते हैं और उनके पास उथली नींव होती है, इसलिए जब उनका सामना बुरे लोगों की विघ्न-बाधाओं से होता है तब वे इन चीजों की असलियत नहीं जान सकते हैं। वे हमेशा यही सोचते हैं कि कलीसिया में बुरे लोग मौजूद नहीं होने चाहिए और सोचते हैं कि लोगों के बीच कोई प्रेम या मानवीय गर्मजोशी नहीं है। कुछ लोग तो अपना कर्तव्य तक अब और नहीं करना चाहते, कहते हैं, “इससे तो घर पर रहकर परमेश्वर में विश्वास रखना बेहतर होगा। ऐसे लोगों को कलीसिया में मौजूद रहने की अनुमति क्यों दी जाती है?” जो लोग सत्य नहीं समझते हैं, वे इन चीजों की असलियत नहीं जान सकते हैं। वे इन मामलों से सबक नहीं सीख पाते हैं; उन्हें नहीं पता कि उनका ऐसी चीजों से सामना होने के पीछे परमेश्वर के अच्छे इरादे हैं; वे नहीं जानते कि उन्हें किसके पक्ष में खड़ा होना चाहिए या सत्य सिद्धांतों का उपयोग करते हुए इन मामलों से कैसे पेश आना चाहिए; वे दानवों का विरोध करने और उनसे लड़ने के लिए सच्चे भाई-बहनों के साथ एकजुट होने में समर्थ नहीं हैं। क्या यह आध्यात्मिक कद में छोटा होना नहीं है? क्या यह दयनीय नहीं है? (हाँ, है।)
दानव से पुनर्जन्म लिए हुए प्रकार के व्यक्ति की पहली विशेषता जो उसके दैनिक जीवन में प्रकट होती है वह आदतन झूठ बोलना है। इस बात पर ध्यान दिए बगैर कि व्यक्ति की उम्र, लिंग या पृष्ठभूमि क्या है और वह कितने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखे हुए है, जब तक उसकी बातों में हमेशा झूठ होते हैं, जब तक वह झूठ से भरा होता है और आदतन झूठ बोलता है तब तक वह दानव से पुनर्जन्म लिया हुआ है; वह मनुष्य नहीं है। मनुष्य भी झूठ बोलते हैं क्योंकि उनमें भ्रष्ट स्वभाव होते हैं; भ्रष्ट स्वभावों के भीतर निहित धोखेबाजी और दुष्टता मनुष्य के झूठ बोलने का कारण बन सकती हैं। लेकिन मनुष्य के झूठ बोलने की हद दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों के झूठ बोलने की हद से भिन्न होती है। अगर कोई व्यक्ति आदतन झूठ बोलता है तो अकेला यह तथ्य ही यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि वह अपने सार में मनुष्य नहीं है, बल्कि एक दानव है। जमीर के प्रभाव के कारण मनुष्यों के लिए आदतन झूठ बोलने की हद तक पहुँचना बिल्कुल असंभव है। वैसे तो ऐसे समय भी आते हैं जब मनुष्य झूठ बोलते हैं और धूर्तता करते हैं, लेकिन उनका झूठ बोलना भ्रष्ट स्वभाव का एक सामान्य प्रकाशन भर है; इसमें कुछ खास मामलों के संबंध में कभी-कभार झूठ बोलना शामिल होता है। वैसे तो बाहर से मनुष्यों का झूठ बोलना और दानवों का झूठ बोलना एक जैसा लग सकता है, लेकिन सार में, उनमें अंतर होता है। जब दानव झूठ बोलते हैं तब उन्हें कभी भी आत्मग्लानि या पछतावा महसूस नहीं होता है। इसके अलावा, वे अपने आप से खुश होते हैं, संतुष्ट महसूस करते हैं और वे जो झूठ बोलते हैं और जो धोखे वाले कार्य करते हैं उनके संबंध में उन्हें उपलब्धि का बोध होता है। अगर कोई झूठ असफल हो जाए तो वे ज्यादा लोगों को धोखा देने के लिए ज्यादा झूठ बोलने और ज्यादा उन्नत भ्रामक युक्तियाँ अपनाने के अपने प्रयास उत्तरोत्तर बढ़ा देंगे। लेकिन जब भ्रष्ट स्वभावों वाले सामान्य मनुष्य झूठ बोलते हैं, उसके बाद उनका जमीर असहज हो जाता है और वे ग्लानि महसूस करते हैं और इतने ज्यादा कलंकित महसूस करते हैं कि जीना ही नहीं चाहते। अगर उन्होंने किसी को धोखा दिया है तो उस व्यक्ति से दोबारा मिलने पर उन्हें कुछ हद तक शर्मिंदगी महसूस होती है। अगर उनसे सार्वजनिक रूप से अपना झूठ स्वीकार करने और फिर कभी झूठ नहीं बोलने और सिर्फ सच बोलने का वादा करने के लिए कहा जाए, तो उनका मौजूदा आध्यात्मिक कद अभी तक उस स्तर तक नहीं पहुँचा है। हालाँकि उनमें एक आंतरिक जागरूकता होती है; उन्होंने जो झूठ बोले उनके लिए वे शर्म, अपराधबोध और असहजता महसूस करते हैं; उनकी अंतरात्मा उन्हें दोषी ठहराती है। लेकिन किसी दानव से पुनर्जन्म लिया हुआ इस प्रकार का व्यक्ति आदतन झूठ बोलता है। वह झूठ बोलने के बाद न तो कोई आंतरिक आरोप और न ही कोई अपराधबोध महसूस करता है। वह अपराधबोध क्यों महसूस नहीं करता है? क्योंकि वह दानव है। लोगों या परमेश्वर के प्रति अपराधबोध महसूस करना, अपने दिल में अंतरात्मा का आरोप महसूस करना—यह तो मनुष्य की सामान्य जागरूकता है। चूँकि वह दानव है, इसलिए उसमें ऐसी जागरूकता नहीं है। इसलिए वह झूठ बोलना जारी रख सकता है और यहाँ तक कि अपने प्रयास भी उत्तरोत्तर बढ़ा सकता है; वह झूठ बोलता ही रहेगा और कभी नहीं बदलेगा। अंततः उसका झूठ बोलना कब बंद होता है? सिर्फ अपने भौतिक जीवन की अंतिम साँस के बाद, जब वह और नहीं बोल सकता तब जाकर उसका झूठ बोलना बंद होता है। लेकिन उसके भीतर बसे झूठ बोलने वाले दानव की आत्मा किसी दूसरे व्यक्ति में पुनर्जन्म ले लेती है और फिर वह व्यक्ति झूठ बोलना जारी रखता है। इसलिए, दानवों की झूठ बोलने वाली प्रकृति कभी नहीं बदलती। यह आदतन झूठ बोलना है। दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग किसी को भी धोखा दे सकते हैं और कोई भी झूठ बोल सकते हैं। वे किसी भी परिस्थिति में और किसी भी मामले के बारे में झूठ बोल सकते हैं और उनकी झूठ बोलने की युक्तियाँ विशेष रूप से परिष्कृत होती हैं; कोई भी नहीं देख सकता कि वे झूठ बोल रहे हैं। देखो, जब अक्सर झूठ बोलने वाले लोग कोई झूठ बोलते हैं तब यह एक सामान्य व्यक्ति के सच बोलने जैसा होता है—यह बहुत स्वाभाविक लगता है जिसमें कोई प्रत्यक्ष खामी नहीं होती है। तुम्हें ऐसा लग सकता है कि वे सच बोल रहे हैं। अगर तुम उनके झूठ को सच मान लोगे तो वे मन ही मन तुम पर हँसेंगे और सोचेंगे, “बेवकूफ, मैं तो बस मजाक कर रहा था और तुमने उसे सच मान लिया? तुम वाकई निरे बेवकूफ हो!” अगली बार जब वे तुमसे मिलेंगे तब भी वे झूठ ही बोलेंगे और तुम्हारे साथ खिलवाड़ करेंगे, सिर्फ यह देखने के लिए कि वह झूठ सुनने के बाद तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया होती है। अगर तुम इसे फिर से सच मान लोगे तो वे और भी खुश हो जाएँगे, उन्हें उपलब्धि का और भी ज्यादा बोध होगा और उन्हें और भी ज्यादा लगेगा कि वे जिस तरह से आचरण करते हैं उसमें वे सफल हैं। मुझे बताओ, क्या वे मनुष्य हैं? क्या उनमें मानवीय जागरूकता है? क्या उनमें मानवीय जमीर का बोध है? जाहिर तौर पर नहीं है। उनके झूठ जितने ज्यादा प्रभावी होंगे, वे भीतर से उतने ही ज्यादा खुश और प्रसन्न होंगे, उन्हें अपनी उपलब्धि का बोध उतना ही ज्यादा होगा और वे उतने ही ज्यादा सक्षम महसूस करेंगे। अगर कोई दिन ऐसा गुजर जाता है जब उन्होंने किसी को धोखा देने या किसी के साथ खिलवाड़ करने के लिए झूठ न बोला हो तो उन्हें लगता है कि वह दिन असहज था और बेकार चला गया, और उन्हें लोगों को धोखा देने का कोई न कोई अवसर ढूँढ़ना ही पड़ता है। उदाहरण के लिए, अगर कोई दानव देखता है कि दो लोगों के बीच अच्छा रिश्ता है और वे अपने कर्तव्यों में सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग कर रहे हैं तो वे भीतर से असहज महसूस करते हैं और सोच-विचार करते हैं, “चलो, मैं कुछ कलह के बीज बो दूँ और कुछ अफवाहें फैला दूँ ताकि तुम दोनों एक दूसरे के खिलाफ हो जाओ, और फिर तुम चाहकर भी वापस अच्छा रिश्ता नहीं बना पाओगे।” बस कुछ ही शब्दों से यह दानव उन दो लोगों को भ्रम के जाल में फाँस लेता है और फिर उनके बीच मतभेद और विवाद हो जाते हैं और अब वे पहले जैसे सामंजस्यपूर्ण ढंग से नहीं रहते हैं जिससे यह दानव आनंदित होता है, वह असाधारण रूप से खुश हो जाता है। कलीसिया में छिपे दानव हमेशा इस तरह की चीजें करते रहते हैं। अविश्वासी दुनिया के दानव भाई-बहनों को बेरहमी से गिरफ्तार करते हैं। जब तक तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर में अब और विश्वास नहीं रखते या उसका अनुसरण नहीं करते या अगर तुम परमेश्वर के बारे में शिकायत करते हो या परमेश्वर को धोखा देते हो तब तक वे खुश हैं। तुम कुछ भी कर सकते हो—तुम खा-पी सकते हो, वेश्यावृत्ति कर सकते हो और जुआ खेल सकते हो; तुम आगजनी, हत्या और लूटपाट कर सकते हो; तुम कोई भी अपराध कर सकते हो—जब तक तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते तब तक वे खुश हैं। क्या मनुष्यों के बीच दानवों द्वारा की जाने वाली चीजों और आध्यात्मिक लोक में शैतान द्वारा की जाने वाली चीजों के बीच कोई संबंध है? क्या इसमें कोई समानता है? ये दानव उन लोगों से विशेष रूप से नफरत करते हैं जो परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और सही मार्ग पर चलते हैं। जो कोई भी सत्य का अनुसरण करता है या हमेशा सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने पर अड़ जाता है या अक्सर परमेश्वर की गवाही देता है या लगन से अपना कर्तव्य करता है—जब वे ऐसे लोगों को देखते हैं तब उन्हें गुस्सा आ जाता है और वे उन्हें दुश्मन मान लेते हैं। यह जलन नहीं है; यह नफरत है। तबाही का उद्देश्य हासिल करने के लिए वे जो विधियाँ अपनाते हैं उनमें से एक है तुम्हें परेशान करने, गुमराह करने और घसीटकर नीचे गिराने के लिए झूठ बोलकर धोखा देना। हो सकता है कि ऐसा करने से उन्हें कोई लाभ न पहुँचे, लेकिन एक बार जब वे तुम्हें घसीटकर नीचे गिरा चुके होते हैं ताकि तुम परमेश्वर में आस्था खो दो, नकारात्मक और कमजोर हो जाओ और अपना कर्तव्य करने के अनिच्छुक हो जाओ या दूसरों के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से अब और सहयोग न कर सको तब उनका उद्देश्य हासिल हो चुका होता है, वे खुश हो जाते हैं और उनकी चिंताएँ गायब हो जाती हैं। क्या दानव यही चीज नहीं करते हैं? (हाँ।) यह तथ्य निश्चित है कि दानव आदतन झूठे होते हैं, यह सभी संदेहों से परे है। किसी भी व्यक्ति को ले लो—चाहे उसकी जाति कोई भी हो, उसका रूप-रंग कैसा भी हो, चाहे वह लंबा हो या ठिगना, मोटा हो या दुबला, बदसूरत हो या सुंदर, चाहे उसकी शिक्षा का स्तर कोई भी हो या उसका व्यक्तित्व कैसा भी हो, चाहे उसकी प्रतिभाएँ बड़ी हों या छोटी, चाहे उसमें खूबियाँ हों या नहीं, चाहे उसकी रुचियाँ और शौक कुछ भी हों—उसमें बस एक विशेषता होने की जरूरत है, कि वह आदतन झूठ बोल सके और कभी भी न बदले। यह कभी-कभार झूठ बोलना नहीं है, न ही यह कोई और विकल्प नहीं होना है और न ही यह किसी विशेष मामले में बुद्धिमानी का उपयोग करने की जरूरत होना है, बल्कि वह जरूरत पर ध्यान दिए बगैर, स्थिति या पृष्ठभूमि पर ध्यान दिए बगैर, मामले पर ध्यान दिए बगैर झूठ बोलने, मनगढ़ंत बातें बनाने, चालें चलने और तुच्छ चालबाजियों में संलग्न होने पर अड़ जाता है। अगर उसमें यह विशेषता है तो इस किस्म का व्यक्ति पूरी तरह से दानव है। यह विश्वास बिल्कुल मत करना कि वह एक अच्छा व्यक्ति बन सकता है और उसके मुँह से निकलने वाली सुखद बातों पर तो बिल्कुल विश्वास मत करना। भले ही वह संकल्प व्यक्त करे या भयानक कसमें खाए, उस पर विश्वास मत करना क्योंकि वह दानव है, मनुष्य नहीं है। भले ही दानव भयानक कसमें खाएँ, यह सिर्फ कुछ समय के लिए स्थिति से निपटने के लिए होता है; यह सब धोखा है। वे अपनी खाई कसमों के अनुसार कार्य करने में मूल रूप से असमर्थ होते हैं। अगर तुम उन पर विश्वास करते हो तो तुम बेवकूफ हो; तुम दानवों के सार की असलियत नहीं जान सकते। वे किसी भी चीज के बारे में झूठ बोल सकते हैं, इसलिए वे जो भयानक कसमें खाते हैं वे भी झूठ होते हैं। क्योंकि वे कभी यह विश्वास नहीं करते हैं कि परमेश्वर हर चीज की पड़ताल करता है और यह विश्वास नहीं करते हैं कि परमेश्वर हर व्यक्ति के क्रियाकलापों के अनुसार प्रतिफल देगा—वे यह विश्वास नहीं करते हैं कि परमेश्वर इस तरीके से कार्य कर सकता है, इसलिए वे अपने क्रियाकलापों में सिर्फ अपनी इच्छा का पालन करते हैं, अपनी मर्जी से झूठ बोलते हैं और धोखा देते हैं; वे अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए कुछ भी करने में सक्षम हैं। यह दानवों की विशेषता है और उनका प्रकृति सार भी। अब तुम इस मामले को स्पष्ट रूप से देख रहे हो, है ना? (हाँ।)
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?