सत्य का अनुसरण कैसे करें (13) भाग तीन

पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग भी ठीक दानवों की तरह झूठ बोलते हैं क्योंकि उनमें भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, लेकिन फटकारे जाने पर वे अपने दिलों में इसे कुछ हद तक स्वीकार लेते हैं। वैसे तो वे इसे स्वीकार सकते हैं, लेकिन अपने पाशविक गुण के कारण वे सत्य नहीं समझ सकते हैं, इसलिए वे कभी भी यह ठीक से नहीं समझते हैं कि झूठ नहीं बोलने का क्या मतलब है या सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने का क्या मतलब है। अगर वे कहें, “मैं फिर कभी झूठ नहीं बोलूँगा, मैं सच बोलना चाहता हूँ” तो भी जब वे इसे अभ्यास में लाने का प्रयास करते हैं तब वे बहुत ही अनाड़ी और बुद्धू लगते हैं। दूसरों को यह दृश्य हास्यकर लगता है और वे कहते हैं, “इस तरह से सत्य का अभ्यास कौन करता है? ऐसा तो मैंने पहली बार देखा है—इससे सचमुच मेरे ज्ञान के दायरे का विस्तार हुआ है!” यह ऐसा है जैसे कोई पशु मनुष्य की तरह उठ खड़ा हुआ हो और बिल्कुल सीधा चल रहा हो; यह बहुत ही अटपटा और अजीब लगता है। पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए कुछ लोग ईमानदार भी होना चाहते हैं और कुछ अच्छी चीजें भी करना चाहते हैं, लेकिन वे अभ्यास के सटीक सिद्धांत ढूँढ़ नहीं सकते हैं। जब वे अभ्यास करते हैं तब यह बहुत ही बेतुका लगता है और एक मजाक बन जाता है। दूसरों को यह दृश्य हास्यकर लगता है, लेकिन फिर भी ये लोग सोचते हैं कि वे ईमानदार हैं। क्या यह बेहूदा नहीं है? मान लो कि तुम उनसे कहते हो, “अगर तुम ईमानदार व्यक्ति बनना चाहते हो तो तुम्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि तुम झूठ नहीं बोल रहे हो, बहाने नहीं बना रहे हो, खुद को सही ठहराने का प्रयास नहीं कर रहे हो या अनुचित रूप से बहस नहीं कर रहे हो। यह करना पर्याप्त है। यही ईमानदार होना है। अगर तुम ऐसी चीजें करते हो जो सत्य का उल्लंघन करती हैं और इस तरह से तुम अपराध करते हो तो तुम खुलकर बात कर सकते हो और सबके सामने खुद को उजागर कर सकते हो। कोई भी व्यक्ति ऐसा कुछ भी कहे जो सत्य के हिसाब से है तो उसे स्वीकार लो। तर्कहीन या बेहूदा चीजें मत करो।” लेकिन वे इसे नहीं समझते हैं। जब वे इसे अभ्यास में लाते हैं तब वे गलती करते हैं। तुम लोगों की राय में इस प्रकार के व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या क्या है? वह यह है कि वह सामान्य मनुष्यों के मानक पर खरा नहीं उतरता है। क्या पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों और दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में कोई अंतर है? (हाँ।) यह अंतर कहाँ निहित है? (उनका विरूपित अभ्यास इसलिए नहीं है क्योंकि वे दानवी प्रकृति के दानव हैं, बल्कि मुख्य रूप से इसलिए है क्योंकि उनमें काबिलियत की कमी है और वे वह सामान्य सोच और विवेक हासिल नहीं कर सकते जो मनुष्यों में होना चाहिए।) सही कहा, उनकी काबिलियत कम पड़ जाती है। हो सकता है कि खराब काबिलियत वाले लोग व्यक्तिपरक रूप से सत्य का अभ्यास करना चाहें, लेकिन वे सिद्धांतों पर पकड़ नहीं बना सकते; वे सिर्फ विनियमों को ही पकड़कर रख सकते हैं। इसलिए उनका अभ्यास उग्र, मूर्खतापूर्ण और बेवकूफी भरा होता है। लोग उनकी मदद करना चाहते हैं, लेकिन उनका स्वभाव काँटेदार साही जैसा होता है जिससे लोग यह समझ नहीं पाते हैं कि शुरुआत कहाँ से करें। उनसे सत्य की संगति चाहे कैसे भी की जाए, वे इसे समझने में या इस पर पकड़ बनाने में असमर्थ लगते हैं। पाँच-छह वर्षों की मदद और सहारे के बाद वे सिर्फ कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत ही समझते हैं और अब भी सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते। उनकी काबिलियत बहुत ही ज्यादा खराब है। फिर भी ये बेवकूफ लोग हमेशा घिनौनी चीजें करते रहते हैं। जब यह बड़े या उचित मामलों से संबंधित न हो तब शिष्टाचार या सम्मान की चिंता के कारण तुम अब भी उनसे बात करने के लिए खुद को तैयार कर सकते हो। लेकिन जैसे ही उचित मामले शामिल होते हैं, उदाहरण के लिए, कर्तव्यों या कार्य के निर्वहन पर चर्चा करते समय, तुम्हें एक अटपटा, असहज एहसास होता है, तुम डरते हो कि वे किसी तरीके से प्रतिरोध करेंगे या आपत्ति करेंगे और तुम्हें शर्मिंदा करेंगे। इस प्रकार का व्यक्ति उचित विषयों पर चर्चा करने के योग्य नहीं है। तुम बस उनसे मेलजोल रख ही नहीं सकते; उनके साथ मेलजोल रखने से बहुत ही ज्यादा समस्याएँ आती हैं और यह उचित विषयों को भी प्रभावित करेगा। वे हमेशा टेढ़ी-मेढ़ी दलीलें और विषय से हटकर टिप्पणियाँ देते रहते हैं जिन्हें सुनना बस घिनौना लगता है। इस प्रकार के व्यक्ति ने और कौन-सी विरूपित चीजें की हैं? अगर उनमें विपरीत लिंग के किसी व्यक्ति के लिए भावनाएँ जाग उठती हैं और उनमें दुष्ट काम-वासना होती है तो वे सोचते हैं कि उन्हें ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए, इस बारे में खुलकर बात करनी चाहिए और इसे अपने भीतर दबाकर नहीं रखा जा सकता, इसलिए किसी सभा में वे इस मामले के बारे में खुलेआम बात करते हैं। जिस विपरीत लिंग के व्यक्ति के लिए उनके मन में भावनाएँ होती हैं, उसे यह सुनकर अजीब और असहज महसूस होता है और वह शर्मिंदा महसूस करता है। अगर तुम उन्हें रोकने का प्रयास करते हो तो वे परेशान हो जाते हैं, कहते हैं, “मैं दिल से बोल रहा हूँ और ईमानदारी बरत रहा हूँ। तुम्हें मुझे सत्य का अभ्यास करने से रोकने का क्या अधिकार है? यह मेरा अधिकार है! मैंने आखिरकार इस बारे में बोलने की हिम्मत जुटा ही ली, फिर भी तुम मुझे रोक रहे हो! परमेश्वर भी मुझे नहीं रोकता, तो फिर तुम्हें ऐसा करने का क्या अधिकार है? परमेश्वर तो मुझे ईमानदार व्यक्ति बनने का मौका भी देता है; यह तो बस तुम ही हो जो मुझे नीची नजर से देखते हो और ईमानदार नहीं होने देते। अगर मैं इस मामले को अपने भीतर ही दबाए रखूँ और इसके बारे में बात न करूँ तो क्या यह तथ्यों को छिपाना नहीं है? क्या यह धोखेबाज व्यक्ति होना नहीं है? तब मैं ईमानदार व्यक्ति नहीं होऊँगा। अगर मैं ईमानदार व्यक्ति नहीं हूँ तो क्या फिर भी परमेश्वर मुझे बचाएगा?” जैसा कि तुम देख सकते हो, सुनने वाला हर व्यक्ति असहज और शर्मिंदा महसूस करता है, फिर भी यह व्यक्ति विस्तार से बताने पर अड़ जाता है और तुम उसे रोक भी नहीं सकते। मुझे बताओ, इस मामले के संबंध में क्या किसी को सहनशील और धैर्यवान होना चाहिए या उसे रोकने के लिए सत्य सिद्धांतों की संगति करनी चाहिए? (हमें उसे रोकने के लिए सत्य सिद्धांतों की संगति करनी चाहिए।) अगर कोई प्रेमवश मदद करने का प्रयास करता है, उसे भविष्य में ऐसी बातें नहीं कहने के लिए समझाता है जिनसे दूसरों की नैतिक उन्नति नहीं होती है तो क्या वह इसे समझने और स्वीकारने में समर्थ होगा? (नहीं।) तो इस प्रकार के व्यक्ति का विरूपणों के प्रति झुकाव है, वह कुछ हद तक मूर्ख है और उसका विवेक बहुत दुरुस्त नहीं है, इसलिए उसे सिर्फ रोकने का ही सहारा लिया जा सकता है। हर किसी में दुष्ट काम-वासना होती है और कभी-कभार व्यक्ति के मन में विपरीत लिंग के किसी व्यक्ति के लिए कुछ भावनाएँ हो सकती हैं या वह उसके प्रति कुछ विचार रख सकता है। इसे निजी रूप से खुद पहचान लेना ही पर्याप्त है। अगर चीजें गलत दिशा में जा रही हैं तो उस व्यक्ति के साथ संपर्क कम-से-कम कर देना चाहिए या भविष्य में उसके साथ अकेले रहने से बचना चाहिए। सामान्य मानवता वाले लोग ऐसे मामलों से निपटते समय बुद्धिमानी भरी विधियों का उपयोग करेंगे और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करेंगे। वे जानते हैं कि इस तरह के मामलों को ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए केवल अभ्यास के सिद्धांत लागू करके नहीं सँभाला जा सकता और इसके लिए बुद्धिमानी के कुछ सिद्धांत भी लागू करने होंगे। लेकिन पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग ऐसे मामलों को सँभालना नहीं जानते हैं और यहाँ तक कि वे ऐसी चीजों के बारे में खुलेआम बात करने को भी ईमानदार होना मानते हैं। उन्हें नहीं पता कि यह क्या नतीजे लेकर आएगा। जब वे ईमानदार होने का प्रयास करते हैं तब वे बस एक विनियम और औपचारिकता का पालन करते हैं। और नतीजा क्या होता है? वे खुद पर, जिसके लिए उनमें भावनाएँ हैं उस पर और बाकी सभी पर मुसीबत ले आते हैं। जिस व्यक्ति के लिए उनमें भावनाएँ हैं वह इस मामले से प्रभावित और बेबस हो जाता है और परिस्थिति का सामना करने में असमर्थ महसूस करता है। इसे सुनकर बाकी सभी लोग भी थोड़ी शर्मिंदगी महसूस करते हैं, सोचते हैं, “अगर हम सुनते हैं तो ऐसा लगता है जैसे हम किसी की निजता में ताक-झाँक कर रहे हों; लेकिन अगर हम नहीं सुनते हैं तो वे तब भी बात करने पर अड़े रहेंगे, और यह विश्वास करेंगे कि वे ईमानदार हो रहे हैं।” देखो, सभी को यह मामला पेचीदा और परेशान करने वाला लगता है। क्या तुम यह नहीं कहोगे कि इस प्रकार का व्यक्ति एक बहुत बड़ी मुसीबत है? अगर तुम सिद्धांतों की संगति करते हो तो वह उसे स्वीकार नहीं करता है, और कहता है : “जब तुम लोग ईमानदार हो रहे होते हो और खुलकर बात करते हो तब तुम कुछ भी कह सकते हो, लेकिन जब मैं कुछ कहता हूँ तब यह ठीक नहीं होता है। क्या मैं भी ईमानदार नहीं हो रहा हूँ? मुझे बोलने का अधिकार क्यों नहीं है?” यहाँ तक कि वह इस बात पर भी ध्यान नहीं देता कि दूसरे लोग क्या कह रहे हैं। क्या उसका यह मामला खुलेआम संगति करने के लिए उपयुक्त है? इस प्रकार का व्यक्ति इसकी असलियत जान ही नहीं पाता है और ईमानदार होने के सिद्धांत नहीं समझता है। अंत में वह सभी को यह महसूस करवा देता है कि स्थिति को सँभालना काफी मुश्किल है। उसके प्रकार के लोग उसकी नकल करेंगे, कहेंगे, “देखो, वह ऐसी चीजों तक के बारे में संगति कर सकता है। उसमें सच में संकल्प है, वह सच में ईमानदार हो रहा है!” शुद्ध समझ वाले लोग यह सुनने पर जान जाते हैं कि उसका अभ्यास गलत है और यह पथभ्रष्ट हो गया है। अगर तुम उसकी मदद करना चाहो तो वह इसे स्वीकार ही नहीं करेगा। वह क्या कहेगा? “तुम मेरी मदद नहीं कर पाओगे। मेरी समझ तुम्हारी समझ से अलग है। मैं तो बस इसी तरीके से अभ्यास करने वाला हूँ।” तो फिर क्या किया जा सकता है? क्या तुम उसकी मदद करने में समर्थ हो? (नहीं।) अगर तुम वाकई उसकी मदद करने का प्रयास करोगे तो आखिर में तुम बस हालात को और बिगाड़ दोगे; न सिर्फ वह इसे स्वीकार नहीं करेगा, बल्कि वह तुमसे बहस भी करेगा और उलझेगा भी। क्या यह परेशानी वाली बात नहीं है? (हाँ।)

पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग भी झूठ बोलने की अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करते हैं, लेकिन उनका झूठ बोलना ठीक वैसे अभिव्यक्त नहीं होता जैसे कि दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों का होता है। झूठ बोलने के प्रति उनका रवैया और झूठ बोलने के लिए वे जो विधियाँ अपनाते हैं वे भी अलग होती हैं। जब दानवों द्वारा बोले गए झूठ उजागर किए जाते हैं तब कोई विकल्प नहीं होने पर अगर वे बाहर से यह स्वीकार लें कि उन्होंने झूठ बोला था तो भी वे अभी भी पूरी तरह से जायज महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि यह कोई बड़ी बात नहीं है। या अगर वे अपना रुख व्यक्त करें और सबके सामने यह मान लें कि उनका झूठ बोलना गलत था तो भी पर्दे के पीछे वे अभी भी वैसे ही झूठ बोलते हैं और धोखा देते हैं, वे जरा भी नहीं बदलते। वे झूठ बोलने को कोई दुष्ट मामला या नकारात्मक चीज नहीं मानते। यह उनके जीवित रहने का हथियार है—वे इसे कैसे छोड़ सकते हैं? जो लोग आदतन झूठ बोलते हैं, वे मानते हैं, “इस मानव दुनिया में रहते हुए अगर व्यक्ति झूठ न बोले, अगर वह खुलकर बात करे और दूसरों के सामने खुद को उजागर कर दे और अगर दूसरे लोग सब कुछ जान जाएँ और सब कुछ उनकी मुट्ठी में आ जाए, तो क्या तब भी उसका कोई अस्तित्व होगा? क्या तब भी जीवन का कोई मतलब होगा? क्या तब भी उसमें गरिमा होगी? इसके अलावा, अगर व्यक्ति हमेशा हर चीज के बारे में कोरा सच बोले तो जीवन कितना नीरस और फीका हो जाएगा! झूठ बोलना ही पड़ता है, चाहे कोई कारण हो या न हो।” किसी भी परिप्रेक्ष्य से, चाहे वे जानबूझकर झूठ बोलते हों या अनजाने में, यह उनकी प्रकृति का स्वाभाविक खुलासा है। संक्षेप में, आदतन झूठ बोलना दानवों की एक प्रमुख विशेषता है—यह निस्संदेह निश्चित है। अकेले इसी बिंदु से इस पर विचार किया जाए तो इस प्रकार के लोगों के लिए सत्य स्वीकारना और ईमानदार होना बिल्कुल असंभव है; वे ऐसा बिल्कुल नहीं कर सकते। इसके अलावा, वे ईमानदार व्यक्ति होने की परमेश्वर की अपेक्षा के प्रति तिरस्कार महसूस करते हैं। चाहे उनका सामना किसी विशिष्ट मामले से हो या न हो, लोगों के ईमानदार होने की परमेश्वर की अपेक्षा के प्रति उनका रवैया हमेशा तिरस्कार, उपहास, विकर्षण और बेहद नफरत का होता है। वे ईमानदार व्यक्ति होने के संबंध में परमेश्वर की अपेक्षा और स्व-आचरण के सिद्धांत को अवहेलना से देखते हैं। अपने दिलों की गहराइयों से वे सत्य के प्रति विमुख होते हैं और उसे अस्वीकार करते हैं; यहाँ तक कि वे ईमानदार व्यक्ति होने का भी सीधा विरोध करते हैं और ऐसा होने से इनकार भी करते हैं।

दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में आदतन झूठ बोलना एक बहुत ही स्पष्ट विशेषता है। जब तक तुम्हारा उनसे करीबी संपर्क रहता है, जब तक तुम कार्य या जीवन में उनसे बातचीत करते हो, संप्रेषण करते हो और मेलजोल रखते हो तब तक उनकी इस आदतन झूठ बोलने की विशेषता या असली चेहरा धीरे-धीरे उजागर होता जाएगा। इसलिए, इस प्रकार के व्यक्ति की असलियत जानना बहुत आसान है। तुम्हें दूसरे लोगों, घटनाओं या चीजों के बारे में व्यक्ति के विचारों और नजरियों को देखने की जरूरत नहीं है। जब तक तुम यह पता लगा लेते हो कि वह आदतन झूठा है तब तक तुम अकेले इसी बिंदु के आधार पर सौ प्रतिशत निश्चितता के साथ कह सकते हो कि वह दानव है, मनुष्य नहीं। कुछ लोग पूछते हैं, “क्या इसकी एक प्रतिशत भी संभावना है कि जो व्यक्ति आदतन झूठ बोलता है वह दानव न हो और अभी भी उसके पास उद्धार प्राप्त करने की उम्मीद हो?” मैं तुम्हें बताता हूँ, इसकी बिल्कुल कोई संभावना नहीं है। जो कोई भी आदतन झूठ बोलता है वह सौ प्रतिशत दानव है; कुछ और होने की एक प्रतिशत भी संभावना नहीं है। समझे? कुछ लोग कहते हैं, “क्या ऐसा हो सकता है कि कुछ लोग इसलिए आदतन झूठ बोलते हैं क्योंकि वे बहुत गहराई से भ्रष्ट हो चुके हैं, वे समाज के बुरे रुझानों से बहुत ही बुरी तरह से प्रभावित हो चुके हैं और उनकी मानवता का जमीर और विवेक दब चुका है या वे दानवों द्वारा पूरी तरह से आत्मसात कर लिए गए हैं और इसी कारण से वे आदतन झूठ बोलते हैं? अगर भाई-बहनों की मदद और सहारे की एक अवधि के बाद और परमेश्वर के वचनों से सींचे और पोषित किए जाने के बाद उनका जमीर धीरे-धीरे जाग सके और उनका विवेक धीरे-धीरे ठीक हो सके तो क्या वे बदल नहीं जाएँगे और आदतन झूठ बोलना बंद नहीं कर देंगे?” मैं तुम्हें बताता हूँ, ऐसी कोई संभावना नहीं है, करोड़ों में एक की भी संभावना नहीं है। इसलिए, जो कोई भी आदतन झूठ बोलता है, वह दानव है, बिल्कुल भी मनुष्य नहीं है, उसमें जरा-सी भी सामान्य मानवता नहीं है। समझे? (समझ गए।) यह निश्चित है; इसमें कोई अपवाद नहीं हैं और कोई विशेष परिस्थितियाँ नहीं हैं। तुम लोगों को इस मामले को स्पष्ट रूप से देखना होगा। शायद तुम किसी ऐसे व्यक्ति को देखो जो किसी मामले को सँभालते समय अविश्वासियों से कुछ असत्य कह देता है—झूठ जैसा कुछ—ताकि वह परमेश्वर के घर के हितों का बचाव कर सके और भाई-बहनों की रक्षा कर सके। तब तुम्हें इस मामले के बारे में संदेह होगा, तुम सोचोगे, “इससे पहले मुझे लगता था कि वह सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति है, तो फिर वह इतने बड़े मुद्दे के बारे में झूठ कैसे बोल सका? अगर वह इस बड़े मुद्दे के बारे में झूठ बोल सकता है तो क्या वह दानव है? क्या सत्य का उसका अनुसरण एक मुखौटा है?” क्या समझने का यह तरीका सही है? (नहीं।) इसमें क्या गलत है? इस मामले को सही ढंग से कैसे देखा जाना चाहिए? (उसने उस व्यक्ति के क्रियाकलापों के पीछे के इरादे या हासिल किए गए प्रभाव का भेद नहीं पहचाना है। अगर कोई कुछ असत्य कहता है, लेकिन वह ऐसा कोई सकारात्मक प्रभाव हासिल करने के लिए—परमेश्वर के घर के हितों का बचाव करने और भाई-बहनों की रक्षा करने के लिए—करता है तो यह झूठ बोलना नहीं है; यह एक तरह की बुद्धिमानी है। उसने झूठ बोलने और बुद्धिमानी का उपयोग करने में अंतर का भेद नहीं पहचाना।) तुम्हें झूठ बोलने की प्रकृति को स्पष्ट रूप से देखना होगा। देखो कि कोई झूठ किस सिद्धांत पर आधारित है और यह क्या उद्देश्य हासिल करने का लक्ष्य रखता है। अगर कोई व्यक्ति कोई सकारात्मक प्रभाव हासिल करने और सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए कुछ असत्य कहता है तो यह झूठ बोलना नहीं है—यह बुद्धिमानी है। इसके अलावा देखो कि क्या वह ऐसा व्यक्ति है जो दैनिक जीवन में आदतन झूठ बोलता है। अगर उसने सिर्फ एक घटना में झूठ बोला तो तुम यह तय नहीं कर सकते कि वह झूठा है या वह आदतन झूठ बोलता है, है ना? (हाँ।) अगर किसी बड़े मामले में उसने परमेश्वर के घर के हितों का बचाव करने के लिए कुछ असत्य कहा हो और तुम उसे ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित कर देते हो जो आदतन झूठ बोलता है तो यह विरूपित होना है। लोगों को इस तरह से निरूपित करना और देखना सिद्धांतों के हिसाब से नहीं है। अगर उसने अपना खुद का सम्मान और प्रतिष्ठा बचाने के लिए एक घटना में झूठ बोला, लेकिन वह आमतौर पर ज्यादातर मामलों में झूठ नहीं बोलता है और अगर वह झूठ बोलता भी है तो अगर वह बाद में उसे सुधार सकता है तो ऐसे व्यक्ति को भी आदतन झूठ बोलने वाला तय नहीं किया जा सकता। सिर्फ दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग ही आदतन झूठ बोलते हैं। कुछ लोग कहते हैं, “तुम कहते हो कि वे आदतन झूठ बोलते हैं, लेकिन कभी-कभी वे सच भी बोलते हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने कुछ खरीदा और जब किसी ने उसकी कीमत पूछी तब उन्होंने सच-सच बता दिया; उन्होंने उस बारे में झूठ नहीं बोला। तो तुम कैसे कह सकते हो कि वे आदतन झूठ बोलते हैं?” जब निजता, हित, रुतबा या सम्मान का प्रश्न न हो तब उन्हें झूठ बोलने की कोई जरूरत नहीं होती है। झूठ बोलना उनके लिए भी थकाऊ होता है, इसलिए परेशानी से बचने के लिए वे मामूली चीजों के बारे में झूठ नहीं बोलते हैं। हालाँकि, सिर्फ इसलिए कि वे एक अवसर पर झूठ नहीं बोलते हैं या मामूली चीजों के बारे में झूठ नहीं बोलते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि वे आदतन झूठ नहीं बोलते हैं। तुम्हें बस यह देखने की जरूरत है कि क्या वे दूसरों से संप्रेषण करते समय, बड़ी घटनाओं का वर्णन करते समय या उनका ब्यौरा देते समय, जब उनके अपने हित, शोहरत, फायदा, रुतबा, संभावनाएँ या जिम्मेदारियाँ शामिल होती हैं या जब उनके अपने विचार शामिल होते हैं तब क्या वे झूठ बोलते हैं या नहीं। ऐसी स्थिति में देखो कि उनके शब्दों में कितनी असत्यता है, कितनी सच्चाई है और कितनी विश्वसनीयता है। अगर उनके शब्दों में बहुत ही ज्यादा असत्यता है, जो व्यावहारिक रूप से काले को सफेद में बदल देते हैं, अचानक कहीं से चीजें गढ़ लेते हैं, दोष को दूसरों के मत्थे मढ़ देते हैं; अगर वे अपनी की गई बुरी चीजों का आरोप दूसरों पर लगा देते हैं और दूसरों द्वारा की गई अच्छी चीजों का श्रेय खुद ले लेते हैं; अगर उन्होंने किसी मामले में गलती की और इसके लिए उन्हें जिम्मेदार होना चाहिए, लेकिन वे अपनी बातों से बहला-फुसलाकर बच निकलते हैं, अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह से पल्ला झाड़ लेते हैं और इसे दूसरों पर मढ़ देते हैं; अगर उन्होंने अपना कार्य अच्छी तरह से नहीं किया या कोई कीमत नहीं चुकाई या अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की या उन्होंने ऐसा इसलिए नहीं किया क्योंकि उन्हें खतरे का डर था और उन्होंने झूठ बोला, सच्चाई छिपाने और खुद को जिम्मेदारी से मुक्त करने के लिए अपेक्षाकृत उचित बहाना दिया—क्या ये झूठ नहीं हैं? (हाँ, हैं।) ये सब झूठ हैं। यह आदतन झूठ बोलना है। यानी जब भी मामलों में उनके निजी हित, जिम्मेदारियाँ, सम्मान, रुतबा वगैरह जुड़े होते हैं तब वे इन सभी में झूठ बोलते हैं। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति ने एक मेजबान परिवार के लिए सत्तर युआन की एक कुर्सी खरीदी। लौटने के बाद खर्च की रिपोर्ट देते समय उसने सोचा, “यह सफर काफी थकाऊ था और ऐसा तो हो नहीं सकता कि मैंने बेकार ही दौड़-धूप की हो। मुझे किसी भी तरह से तीस युआन कमाने ही होंगे। यह तीस युआन श्रम के लिए, इस दौड़-धूप के लिए है।” तो उसने कहा कि कुर्सी की कीमत सौ युआन है। देखो, उसने झूठ बोला, है ना? उसने झूठ क्यों बोला? (वह थोड़ा फायदा लेना चाहता था।) वह थोड़ा-सा मुनाफा कमाना चाहता था। मान लो कि वह भाई-बहनों के साथ मिलकर कर्तव्य कर रहा है और दो लोगों को मिलजुलकर रहते देख वह सोचता है, “मेरे साथ किसी की दोस्ती नहीं है, सब मुझे नीची नजर से देखते हैं और कोई भी मेरे साथ मिलजुलकर नहीं रहता। चलो मैं तुम दोनों के बीच झगडा शुरू करवा देता हूँ और तुम लोगों के रिश्ते में कुछ कलह के बीज बो देता हूँ।” तो वह उनमें से एक व्यक्ति से कहता है, “अमुक ने कहा कि तुम खुद को अच्छा पढ़ा-लिखा समझते हो और अगर तुम इतने ही पढ़े-लिखे हो तो ऐसा क्यों है कि तुम लेख नहीं लिख सकते?” फिर वह दूसरे व्यक्ति के पास जाता है और कहता है, “अमुक व्यक्ति ने कहा कि वैसे तो तुम लंबे हो, लेकिन तुम्हारा शरीर सुडौल नहीं है और तुम्हारे शरीर के ऊपर का और नीचे का हिस्सा अनुपात में नहीं हैं।” इन कुछ शब्दों से वह दोनों के बीच कलह के बीज बो देता है। जब वे दोनों फिर से मिलते हैं तब वे फूट डालने वाले शब्दों को याद करके एक-दूसरे को नापसंदगी से देखते हैं और अटपटा महसूस करते हैं। उकसाने वाले को क्या हासिल हुआ? बाहर से ऐसा लगता है कि उसे कुछ हासिल नहीं हुआ, लेकिन यह देखकर कि दोनों एक-दूसरे से दूर हो गए हैं और उनके रिश्ते में खटास आ गई है वह अंदर से सुकून महसूस करता है और अब उसे और जलन नहीं होती। तब उसे लगता है कि उसने कोई फायदा हासिल किया है। इसलिए, वह इस मामले में झूठ तक बोलता है। हो सकता है कि कोई कहे, “क्या यह अपना फायदा किए बिना दूसरों को नुकसान पहुँचाना नहीं है? अगर वे दोनों आपस में बात कर लें तो क्या उन्हें पता नहीं चल जाएगा कि तुमने उनके बीच आग लगाई है? क्या इससे तुम खुद पर आपदा नहीं ले आओगे?” क्या उसे इसकी परवाह है? उसे परवाह नहीं है। जब तक वे दोनों अलग रहते हैं तब तक उसे जलन नहीं होती और उसे लगता है कि उसने कोई फायदा हासिल किया है। क्या ऐसा दानव नहीं करते हैं? (हाँ।) दानव ठीक ऐसे ही कार्य करते हैं।

हो सकता है कि दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग छोटे-मोटे, मामूली मामलों के बारे में सच-सच बोलें, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनमें झूठ बोलने की प्रकृति नहीं होती। सभी मामलों में, चाहे वे महत्वपूर्ण हों या आम, जब तक उन्हें लगता है कि उनकी छवि जुड़ी हुई है, जब तक वे असहज महसूस करते हैं या वे कोई फायदा पाना चाहते हैं या कोई लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं—जब तक उनका कोई इरादा है और वे कार्य करना चाहते हैं—तब तक उसे पूरा करने के लिए उनका तरीका निश्चित रूप से झूठ का उपयोग करने का होगा। यह आदतन झूठ बोलना है। जब भोजन, कपड़ों या आश्रय की बात आती है तब वे शायद झूठ नहीं बोलते हैं; आमतौर पर वे छोटी-मोटी बातों की खातिर झूठ बोलने के लिए दिमागी ऊर्जा खर्च करने का कष्ट नहीं करते हैं। इसके अलावा, उनकी नजर में कुछ लोग बस उनके स्तर या दर्जे के होते ही नहीं हैं, वे उनके अस्तित्व को स्वीकारने की भी परवाह नहीं करते हैं और उनके साथ खिलवाड़ करने या हेरा फेरी करने से उन्हें उपलब्धि का कोई बोध नहीं होता है, इसलिए वे किसी भी तरीके से उनके खिलाफ कार्य करने की परवाह नहीं करते। अगर वे किसी के खिलाफ कार्य करने जा रहे हैं तो वह जरूर कोई ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जिसे वे अपने स्तर का समझते हों, जिसके साथ वे खेल खेल सकें और जो उनका प्रतिद्वंद्वी हो—सिर्फ तभी वे उस व्यक्ति के अस्तित्व को स्वीकारेंगे। यह दानवों की एक और विशेषता है। अगर तुम साधारण व्यक्ति हो तो वे मानते हैं कि तुममें बुद्धिमत्ता की कमी है, तुम उनके साथ खेल खेलने के लिए सक्षम या योग्य नहीं हो और उन्हें यह बात गैर-दिलचस्प लगती है, इसलिए वे तुम्हें नजरअंदाज कर देते हैं। दानव इस बारे में बहुत चयनशील होते हैं कि वे किसके साथ खिलवाड़ करते हैं। जब वे तुम्हारे साथ रहते हैं तब शायद तुम उन्हें कभी झूठ बोलते न देखो या उन्हें जानबूझकर किसी भी चीज के बारे में झूठ बोलते न पाओ, लेकिन जब तक वे दानव हैं तब तक वे निश्चित रूप से झूठ बोलेंगे; यह दानवों की जन्मजात प्रकृति है। अगर वे तुमसे झूठ नहीं बोलते हैं तो शायद वह इसलिए क्योंकि वे तुम्हें इस योग्य नहीं समझते हैं। वे सोचते हैं, “हुँह! मैं तो तुमसे झूठ बोलने तक की जहमत भी न उठाऊँ, और फिर भी तुम डरते हो कि मैं तुम्हारे साथ खिलवाड़ करूँगा। तुम हो कौन? तुम्हें लगता है कि तुम कोई हो?” उनके मन में तुम्हारे लिए कोई सम्मान नहीं है; झूठ बोलना तो भूल ही जाओ, तुमसे बात करने तक के लिए उन्हें परेशान नहीं किया जा सकता। यह ऐसा है कि जब तुम किसी भ्रमित व्यक्ति से किसी के साथ उसके रिश्ते के बारे में पूछो और वह कहे, “मैं उसके स्तर का नहीं हूँ। उसमें मुझसे बेहतर काबिलियत है, उसमें दिमाग है। मैं तुच्छ व्यक्ति हूँ, उसके जितना नेक नहीं हूँ। वह मेरे साथ मेलजोल नहीं रखना चाहता।” यहाँ तक कि भ्रमित लोग भी ऐसा महसूस करते हैं। आओ, अब देखें कि दानव किसके साथ खिलवाड़ करना पसंद करते हैं, किसके साथ विवाद करना पसंद करते हैं, किसे गुमराह करना, किसका शोषण करना और किसके साथ हेरा फेरी करना पसंद करते हैं। क्या उनके भी मानक और एक निश्चित दायरा नहीं होता है? (हाँ।) जब वे लोगों का एक समूह चुनते हैं तब वे लोग ऐसे होने चाहिए जो उन्हीं की तरह दिमागी खेल खेलते हों और चालें चलते हों। सिर्फ ऐसे लोगों से मेलजोल रखते समय ही उन्हें खुशी होती है और मजा आता है, और सिर्फ तभी उन्हें अपने खेलों से कुछ उपलब्धि का बोध होता है। इसलिए, जब दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की बात आती है तब उनके आदतन झूठ बोलने की विशेषता और सार की असलियत जाननी चाहिए। सिर्फ इसलिए कि उन्होंने तुमसे झूठ नहीं बोला है, इसका मतलब यह नहीं है कि वे झूठ नहीं बोलते हैं और इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी झूठ बोलने की प्रकृति नहीं है। अगर वे तुमसे करीब से मेलजोल नहीं रखते हैं और तुम्हारे अस्तित्व को स्वीकारते तक नहीं हैं और उन्हें बस लगता है कि तुम कोई साधारण-से विश्वासी हो, तुम कोई उच्च-शिक्षित व्यक्ति नहीं हो—बस एक गृहिणी या किसान हो—और उनके मन में तुम्हारे लिए कोई सम्मान नहीं है तो फिर वे सोचेंगे कि तुमसे झूठ बोलने का मतलब खुद को नीचे गिराना होगा, यह उनकी दिमागी कोशिकाओं को बरबाद करना होगा और वे तुमसे झूठ बोलने तक का कष्ट नहीं करेंगे। तो फिर तुम ऐसे व्यक्ति की असलियत कैसे जान सकते हो? चूँकि वे ऐसे दानव हैं जो आदतन झूठ बोलते हैं, इसलिए उनकी प्रकृति भले ही इस स्थिति में बेनकाब न हो, वह दूसरी उपयुक्त स्थितियों में बेनकाब हो जाएगी। सिर्फ इसलिए कि उन्होंने तुमसे झूठ नहीं बोला है, इसका मतलब यह नहीं है कि वे झूठ नहीं बोलेंगे। जब तक उनमें दानव का सार है तब तक उनकी झूठ बोलने की प्रकृति निश्चित रूप से उजागर होगी; यह छिपी नहीं रह सकती। चाहे वे इसे अच्छी तरह से छिपाएँ या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसका कितना हिस्सा उजागर होता है, जब तक उनकी झूठ बोलने की प्रकृति है और वे बार-बार झूठ बोलते हैं तब तक वे दानव हैं; वे बिल्कुल भी मनुष्य नहीं हैं। सच्चे मनुष्य बार-बार झूठ नहीं बोलते हैं; कहने का मतलब यह है कि मनुष्य से पुनर्जन्म लिए हुए लोग बार-बार झूठ नहीं बोलते हैं। मैं क्यों कहता हूँ कि वे बार-बार झूठ नहीं बोलते हैं? क्योंकि जैसे ही वे झूठ बोलते हैं, उनका जमीर उन्हें फटकारता है और उन पर आरोप लगाता है। अगर वे कोई ऐसा बड़ा झूठ बोल दें जिसके बुरे नतीजे हों तो उन्हें जीवन भर खुद से घिन आएगी; उनके दिलों में झूठ बोलने के प्रति विकर्षण होने लगेगा और वे अनावश्यक चीजों के बारे में झूठ नहीं बोलेंगे। इस प्रकार उनका झूठ बोलना लगातार कम होता जाएगा। क्योंकि उनका जमीर उन्हें फटकारता है, इसलिए वे खुद पर संयम रखेंगे ताकि वे इसी तरह की गलतियाँ कम करें और अंततः उन्हें बिल्कुल न करने की हद तक पहुँच जाएँ। यह कुछ ऐसा है जिसे मनुष्य हासिल कर सकते हैं। लेकिन दानव इसे हासिल नहीं कर सकते। झूठ बोलने के बाद उन्हें कोई फटकार महसूस नहीं होती है, इसलिए जब वे झूठ बोलना चाहते हैं तब कोई अंकुश नहीं होता है; कोई भी चीज उन पर अंकुश नहीं लगा सकती—कोई भी माहौल उन पर अंकुश नहीं लगा सकता और न ही कोई प्रतिष्ठा या रुतबे वाला व्यक्ति उन पर अंकुश लगा सकता है और यकीनन सत्य में भी उन पर अंकुश लगाने की कोई शक्ति नहीं होती है। उन्हें उजागर करने वाले दूसरे लोग संभवतः उन पर अंकुश नहीं लगा सकते, सत्य की तो बात ही रहने दो, जो उनके लिए बस कागज पर लिखा हुआ पाठ है, बस धर्म-सिद्धांत और विनियम है और उन पर बिल्कुल भी अंकुश नहीं लगा सकता है। अंकुशों के बिना उनका झूठ बोलना उनका प्राकृतिक खुलासा है; वे कभी भी, कहीं भी, जरूरत के अनुसार तरह-तरह के भिन्न-भिन्न झूठ बोल सकते हैं। यह उनकी प्रकृति है; यह कभी भी, किसी भी समय नहीं बदलेगी। तो फिर उनकी प्रकृति की असलियत कैसे जानी जा सकती है? देखो कि उनके आस-पास के लोग उनका मूल्यांकन कैसे करते हैं। अगर उनसे परिचित लोग कहते हैं, “वह आदमी आदतन झूठ बोलता है, उसके मुँह से निकलने वाली हर चीज झूठ होती है, वह अपना चेहरा लाल किए या दिल की धड़कन तेज किए बिना झूठ बोलता है और वह किसी भी चीज के बारे में झूठ बोल सकता है; कोई भी उसकी एक भी बात पर विश्वास करने की हिम्मत नहीं करता है” तो यह तय किया जा सकता है कि वह दानव है, मनुष्य नहीं है। अब जब मैंने इतना कुछ कह दिया है तब क्या तुम लोग दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में आदतन झूठ बोलने की इस विशेषता की असलियत जान सकते हो और उनमें इसकी मौजूदगी की पुष्टि कर सकते हो? यह नियम, यह निष्कर्ष—“जो लोग आदतन झूठ बोलते हैं वे दानवों के समतुल्य हैं”—हमेशा अपरिवर्तित रहता है। समझे? (समझ गए।)

क्या दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की पहली विशेषता—आदतन झूठ बोलना—की स्पष्ट रूप से संगति हो गई है? (हाँ, यह स्पष्ट है।) इस विषयवस्तु को स्वीकारना और समझना आसान होना चाहिए। क्यों? क्योंकि अपने दैनिक जीवन में तुम्हें अक्सर इस प्रकार का व्यक्ति दिखाई देता है; बस यही है कि इससे पहले तुम उनके झूठ बोलने की अभिव्यक्तियों को भ्रष्टता के सामान्य प्रकाशन मानते थे। अब संगति के जरिए तुम जान गए हो कि उनकी झूठ बोलने की प्रकृति और झूठ बोलने की अभिव्यक्तियाँ कभी भी क्यों नहीं बदलतीं—यह पता चला है कि यह उनके गुण से तय होता है, इसलिए इस प्रकार का व्यक्ति नहीं बदल सकता। भविष्य में ऐसे लोगों से सामना होने पर क्या किया जाना चाहिए? (ऐसे लोगों के साथ संगति करने या उनकी मदद करने की कोई जरूरत नहीं है। अगर वे पर्यवेक्षक हैं तो उन्हें बर्खास्त कर देना चाहिए। अगर वे पहले से ही बुरे कर्मों की कुछ अभिव्यक्तियाँ दिखा चुके हैं और उन्होंने कलीसिया के कार्य में गड़बड़ करना और बाधा डालना शुरू कर दिया है तो उन्हें जरूरत के अनुसार दूर कर दिया जाना चाहिए और उन्हें कलीसिया में एक और दिन भी रहने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।) दानव आदतन झूठ बोलते हैं; यह निश्चित है कि वे नहीं बदल सकते। हालाँकि एक प्रकार का दानव ऐसा है जिसके पास विशेष क्षेत्रों में कुछ गुण या ताकतें होती हैं। अगर वह सेवा करने का इच्छुक है तो उसका उपयोग सेवा के लिए किया जा सकता है। परमेश्वर अपने कार्य में सेवा करने के लिए सभी चीजों का उपयोग करता है; बड़ा लाल अजगर ऐसा ही एक सेवा करने वाला और विषमता है। परमेश्वर के घर में कार्य करने के लिए व्यक्ति में बुद्धिमानी होनी चाहिए; यह भी एक सिद्धांत है। अगर दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग सेवा करने के इच्छुक हैं या उसके लिए उपयुक्त हैं तो सेवा करने के लिए उनका उपयोग करो। अगर वे सेवा भी नहीं कर सकते या उनकी सेवा से लाभ की तुलना में हानि ज्यादा होती है और बहुत ही ज्यादा क्षति पहुँचती है और उनका उपयोग करने से परमेश्वर के घर को कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं मिलता है, बल्कि उसे उनके बारे में चिंता करनी पड़ती है तो फिर वे सेवा करने के लिए उपयुक्त नहीं हैं, इसलिए सेवा करने की उनकी योग्यता रद्द कर दी जानी चाहिए। क्या यह करना उचित है? (हाँ, ऐसा करना सिद्धांतनिष्ठ है।) उनसे सिद्धांतों के अनुसार पेश आना चाहिए। भेद पहचानने की क्षमता एक चीज है, लेकिन जब उन्हें सँभालने की बात आती है तब तुम्हारे पास बुद्धिमानी और सिद्धांत होने चाहिए और ऐसा वास्तविक स्थिति के आधार पर करो। इन मामलों की संगति करने का यह लक्ष्य है कि तुम भेद पहचानने की क्षमता प्राप्त करो, तुम यह स्पष्ट रूप से जान लो कि विभिन्न प्रकार के लोगों के सार क्या हैं और व्यक्ति के सार के जरिए यह तय करो कि क्या वह सत्य स्वीकार सकता है और उद्धार प्राप्त कर सकता है या नहीं। हालाँकि, यह तुमसे “सभी को एक ही साँचे में ढालने” वाला तरीका लागू करवाने के लिए नहीं है, दानव के रूप में निरूपित किए गए सभी लोगों को हटाकर उन्हें सँभालने के लिए नहीं है। बल्कि यह तुमसे परमेश्वर के घर के कार्य के सिद्धांतों और जरूरतों के अनुसार सेवा करने के लिए दानवों का प्रभावी रूप से उपयोग करवाने के लिए है। मान लो कि कुछ दानव कहते हैं, “यह देखकर कि मैं दानव हूँ, तुम सेवा करने के लिए मेरा उपयोग करना चाहते हो। अगर मुझे उद्धार नहीं मिल सकता है तो मैं सेवा नहीं करूँगा!” इस स्थिति में क्या किया जाना चाहिए? (अगर वे सेवा करने के अनिच्छुक हैं तो उन्हें जाने दो।) अगर वे सेवा करने तक के इच्छुक नहीं हैं तो उन्हें जल्दी से चले जाने दो। कुछ दानव कहते हैं, “तुम सेवा करने के लिए मेरा उपयोग करना चाहते हो? हरगिज नहीं! मैं तुम्हारे लिए सेवा नहीं करूँगा! मैं कुछ भी बुरा नहीं करूँगा, मैं परमेश्वर के घर में बस जैसे-तैसे समय काटता रहूँगा। जब कार्य करने का समय आएगा तब मैं बस लापरवाह रहूँगा, सिर्फ औपचारिकताएँ निभाऊँगा; मैं तुम्हारे लिए इसे निष्ठापूर्वक नहीं करूँगा!” ऐसे लोगों का पता लगने पर क्या किया जाना चाहिए? (उन्हें दूर कर देना चाहिए।) जैसे ही दानव की स्पष्ट रूप से पहचान हो जाती है, उसे तुरंत दूर कर दो; कोई दया मत दिखाओ। अगर कुछ दानव अच्छे-से व्यवहार करते हैं और जानते हैं कि वे आदतन झूठ बोलते हैं और दानव हैं और वे ईमानदार लोग नहीं हो सकते और उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते क्योंकि उनकी प्रकृति यही तय करती है, लेकिन बहुत-से वर्षों तक सत्य सुनने के बाद वे भी परमेश्वर का अनुसरण करना और अंततः आशीष प्राप्त करना चाहते हैं और वे वही करते हैं जो परमेश्वर का घर उनसे करने के लिए कहता है—अगर ऐसे लोग विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न नहीं करते हैं और उनके लिए उपयुक्त कार्य हैं तो उन्हें सेवा करने का अवसर दिया जा सकता है। जब सृष्टिकर्ता द्वारा दिए गए कर्तव्य की बात आती है तब सभी सृजित प्राणियों को, भले ही जिस श्रेणी से वे संबंधित हैं उसके गुण कुछ भी हों, इसे अपना खुद का कर्तव्य मानना चाहिए; यह कुछ ऐसी चीज है जिससे बचा नहीं जा सकता। भले ही कोई व्यक्ति दानव और शैतान हो, अगर वह खुशी-खुशी परमेश्वर के लिए सेवा करता है तो परमेश्वर उससे अन्यायपूर्ण रूप से पेश नहीं आएगा; यह सभी सृजित प्राणियों के साथ व्यवहार करने का परमेश्वर का सिद्धांत है। अगर तुम खुद को एक सृजित प्राणी मानते हो और तुम्हारा गुण चाहे कोई भी हो, तुम सृष्टिकर्ता की आराधना करने, सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के तहत आत्मसमर्पण करने और एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य पूरा करने के इच्छुक हो और तुम सेवा करने के इच्छुक हो, भले ही अंत में तुम्हारे लिए कोई अच्छा परिणाम या गंतव्य न हो, तो इसकी भी अनुमति है। परमेश्वर इसे अस्वीकार नहीं करता; परमेश्वर लोगों को सेवा करने का अवसर देता है। यह बस इस बात पर निर्भर करता है कि लोग इस मामले को कैसे सँभालते हैं। कुछ लोग कहते हैं, “चूँकि मेरा जन्मजात गुण अच्छा नहीं है और मैं चाहे कोई भी कर्तव्य क्यों न करूँ, मेरी उद्धार प्राप्त करने की कोई उम्मीद नहीं है, इसलिए मैं अब और कोई कर्तव्य नहीं करूँगा, मैं सेवा नहीं करूँगा! तुम सेवा के लिए मेरा उपयोग करना चाहते हो और अंत में तुम लोग आशीष प्राप्त करोगे और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करोगे, लेकिन मेरे लिए कोई हिस्सा नहीं होगा, इसलिए मैं अब और विश्वास नहीं रखने वाला!” यह बिल्कुल सही है। अगर दानव जाना चाहते हैं तो उन्हें जाने दो। अगर वे नहीं जाते हैं तो उन्हें हटा देना पूरी तरह से सिद्धांतों के अनुसार है। कुछ दानव कहते हैं, “मैं इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि मैं आदतन झूठ बोलता हूँ, मैं सबसे झूठ बोलता हूँ, यहाँ तक कि परमेश्वर से भी। लेकिन चाहे परमेश्वर का घर मुझसे सेवा करवाए या मुझसे एक विषमता की तरह कार्य करवाए—चाहे मेरे साथ कैसा भी व्यवहार किया जाए, भले ही मुझसे मनुष्य की तरह पेश न आया जाए, मुझे कोई शिकायत नहीं है। इस तथ्य को नहीं बदला जा सकता कि मैं दानव हूँ, है ना? मुझसे जो भी सेवा करने के लिए कहा जाता है, मुझसे जो भी प्रयास करने के लिए कहा जाता है, मैं उसे करने के लिए इच्छुक हूँ।” क्या ऐसे लोगों को स्वीकार किया जाना चाहिए? (हाँ।) सैद्धांतिक रूप से, उन्हें भी स्वीकार किया जा सकता है। जब तक उनके उद्धार के लिए उम्मीद की एक किरण है तब तक उन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए। चाहे वे यह बात स्वीकार करें या न करें कि वे दानव हैं, उनमें कम-से-कम कुछ आत्म-ज्ञान तो है, वे सेवा करने के इच्छुक हैं और उनमें जरा-सा समर्पण है; यह स्वीकृति की शर्तों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। जहाँ तक यह प्रश्न है कि क्या वे अपना कर्तव्य मानक स्तर के तरीके से कर सकते हैं, तो यह देखना बाकी है, है ना? (हाँ।) संक्षेप में, कोई व्यक्ति चाहे किसी भी प्रकार का हो, भले ही उसके गुण का भेद पहचान लिया गया हो, तो भी उस व्यक्ति से पेश आने में सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चाहिए। यकीनन यहाँ सिर्फ एक ही सिद्धांत नहीं है—ऐसा नहीं है कि सभी दानवों को अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए और बाहर निकाल दिया जाना चाहिए, सभी दानवों को नरक में डाल दिया जाना चाहिए; यही एकमात्र सिद्धांत नहीं है। परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है और सेवा करने के लिए सभी चीजों का उपयोग करता है। कौन-सी चीजें सेवा कर सकती हैं, कौन-सी चीजें क्या सेवा करती हैं और वे कैसे सेवा करती हैं, वे किस चरण में सेवा करती हैं, वे कितने समय तक सेवा करती हैं, वे कितनी सेवा करती हैं, किन हालातों में उनका उपयोग अब और नहीं किया जाता है और किन परिस्थितियों में उनका उपयोग जारी रह सकता है—इन सब के लिए सिद्धांत हैं और इन सब में परमेश्वर की बुद्धि निहित है। लोग इस मामले के साथ उतावलेपन से पेश नहीं आ सकते; उन्हें सिद्धांतों की तलाश करनी होगी। अगर सभी यह मानते हैं कि एक विशेष तरीके से कार्य करना सही है और यह सिद्धांतों के अनुरूप है तो उसी तरीके से कार्य करो; तुम्हें जिस भी तरीके से कार्य करना चाहिए, तुम उसी तरीके से कार्य करो। सिद्धांतों का उल्लंघन करना, क्षणिक गुस्से के आधार पर किसी व्यक्ति को आँख मूँदकर और बेबुनियाद ढंग से सँभालना, सत्य और परमेश्वर के वचनों के प्रति सख्त नहीं होने का रवैया है; सच पूछो तो यह परमेश्वर का भय मानने वाले दिल की कमी की भी अभिव्यक्ति है, इसलिए इस तरह से बिल्कुल कार्य मत करो। दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की पहली विशेषता—आदतन झूठ बोलना—पर संगति करने के लिए मूल रूप से यही है; सिद्धांत सभी पहलुओं से स्पष्ट रूप से समझा दिए गए हैं।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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