सत्य का अनुसरण कैसे करें (13) भाग चार

II. दूसरी विशेषता : विकृति

दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की दूसरी विशेषता “विकृति” है। चूँकि यह एक विशेषता है, यह कोई अस्थायी अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि एक ऐसी चीज है जो उनकी प्रकृति से अक्सर प्रकट होती है और यह पूरी तरह से उनके विचारों, नजरियों, स्वभावों और सार का प्रतिनिधित्व कर सकती है। तो, जो लोग दानव हैं उनकी “विकृति” वाली विशेषता की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? विकृति क्या है? विकृति के साथ अक्सर कौन-सा शब्द प्रयोग किया जाता है? (दुष्टता।) और कौन-सा शब्द प्रयोग किया जाता है? (विरूपित प्रकृति।) विरूपित प्रकृति, दुष्ट काम-वासना। कौन-सी दूसरी अभिव्यक्तियाँ विकृति हैं? कुटिल और असामान्य होना, है ना? (हाँ।) कुटिल और असामान्य होने के अलावा और क्या है? (अत्यधिक जोड़-भाग करने वाला और रहस्यमय होना, अनुभवी षड्यंत्रकारी होना, कुछ हद तक अथाह होने का एहसास देना।) ये लगभग सभी इसमें शामिल हैं। कुटिल, धूर्त, चालाक, जोड़-भाग करने वाला और रहस्यमय होना और घाघ षड्यंत्रकारी होना—ये सभी विकृति की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ और विशेषताएँ हैं। तो फिर, किन मामलों में दानव ये विशेषताएँ अभिव्यक्त करते हैं? सारतः, लोग जो सोचते हैं—कुटिलता, धूर्तता, चालाकी वगैरह, जो स्वभाव से संबंधित हैं या आचरण करने और मामले सँभालने की विधियों में अभिव्यक्त होती हैं—उनके अलावा एक और तरह की विकृति क्या है? यह लोगों की दुष्ट काम-वासना है; इस तरह की विकृति को लम्पटता कहा जाना चाहिए। चूँकि “विकृति” शब्द का उपयोग किया गया है, इसलिए हम देह की सामान्य शारीरिक जरूरतों या प्रतिक्रियाओं की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि लम्पटता की बात कर रहे हैं—इसे भी विकृति कहा जाता है। अभी-अभी जिक्र की गई कुटिलता, धूर्तता वगैरह स्वभाव से संबंधित हैं; लम्पटता देह से संबंधित विकृति है। क्या “लम्पटता” शब्द काफी उपयुक्त नहीं है? (हाँ।) यहाँ एक और शब्द है जो और भी ज्यादा उपयुक्त है—यौन उत्तेजकता। अविश्वासी लोग अक्सर कहते हैं कि कोई व्यक्ति गुप्त रूप से कामुक है, फूहड़ है; ये सभी शब्द दुष्ट काम-वासना के पहलू को संदर्भित करते हैं। लम्पटता और यौन उत्तेजकता के अलावा क्या और भी शब्द हैं? (क्या नीचता उनमें से एक है?) नीचता उनमें से एक नहीं है; नीचता लम्पटता से अलग है। नीचता व्यक्ति की गरिमा और सत्यनिष्ठा से संबंधित है, जबकि लम्पटता और यौन उत्तेजकता मुख्य रूप से व्यक्ति के अंतर्वैयक्तिक आचरण से संबंधित हैं। हमने अभी-अभी विकृति के दो पहलुओं के बारे में बात की : एक पहलू स्वभाव से संबंधित है, दूसरा पहलू दैहिक वासना से संबंधित है। एक और पहलू है, जो यह है कि इस प्रकार का व्यक्ति अक्सर श्रवण-संबंधी और दूसरे संवेदी मतिभ्रमों का अनुभव करता है—उसमें हमेशा कुछ असामान्य अभिव्यक्तियाँ होती हैं। उदाहरण के लिए, वह अक्सर कहता है, “परमेश्वर ने मुझे प्रकट किया कि आज सुबह छह बजे मुझे पूर्व दिशा में जाना होगा; वहाँ एक संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ता मुझसे मिलना चाहता है।” “कल रात मैंने एक सपना देखा; शायद आज दो भाई या बहन मेरे घर आएँगे।” उसे अक्सर श्रवण-संबंधी और दूसरे संवेदी मतिभ्रम होते हैं, वह हमेशा असामान्य सपनों, दर्शनों या अचानक शब्द कौंध उठने जैसी परिघटनाओं के आधार पर अपना जीवन जीता है और जब कुछ सामान्य से परे घटता है तो वह असामान्य तरीके से व्यवहार करता है—वह विशेष रूप से अतिवादी है। कभी-कभी वह प्रार्थना करने और परमेश्वर के वचन पढ़ने के लिए सुबह तीन-चार बजे उठ जाता है; कभी-कभी रात को जब बाकी सभी लोग आराम कर रहे होते हैं तब वह आधी रात तक जगा रहता है, परमेश्वर के वचन पढ़ने या भजन सीखने पर अड़ जाता है। वह तब सोता है जब दूसरे लोग भोजन कर रहे होते हैं या कार्य कर रहे होते हैं और जब दूसरे लोग आराम कर रहे होते हैं तब वह ऊर्जावान हो जाता है; वह हमेशा असामान्य होता है, हमेशा सामान्य लोगों से अलग होता है। क्या इसे भी विकृति की अभिव्यक्ति मानी जा सकती है? (हाँ।) क्या इस असामान्यता का वर्णन करने के लिए कोई उपयुक्त शब्द है? मान लो कि कोई व्यक्ति बाहर से सामान्य दिखता है, लेकिन वह चीजों को हमेशा एक विशेष रूप से विरूपित और अतिवादी ढंग से करता और समझता है; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम उसके साथ कैसे संगति करते हो, वह समझ ही नहीं सकता है। कभी-कभी उसे श्रवण-संबंधी और दूसरे संवेदी मतिभ्रमों का अनुभव होता है; दूसरे समय, वैसे तो कोई स्पष्ट वाणी या कथन सुनाई नहीं देता है, फिर भी उसके भीतर अजीब विचार आते हैं जो उसे कुछ न कुछ करने के लिए कहते हैं। लेकिन वह चाहे जो भी करे, उसका सत्य से कोई लेना-देना नहीं होता और यह विनियमों का पालन करने के मानक तक को पूरा नहीं करता। तुम लोग इस प्रकार के व्यक्ति का वर्णन करने के लिए कोई उपयुक्त शब्द नहीं सोच सकते, है ना? (नहीं, हम नहीं सोच सकते।) क्या तुम लोगों को लगता है कि “विचित्र” शब्द उपयुक्त है? उसका बाहरी व्यवहार विशेष रूप से अजीब और असामान्य लगता है और वह हमेशा अस्थिर और घबराया हुआ रहता है। लेकिन अगर तुम उसकी निंदा करते हो तो तुम उसमें कोई बड़ी समस्या नहीं गिना सकते और अगर तुम उसे अच्छा व्यक्ति मानते हो तो भी वह कुछ हद तक सनकी लगता है—तुम कुछ हद तक उसकी असलियत नहीं देख पाते हो। जब तुम बस कभी-कभार उसे बोलते हुए सुनते हो तब वह ठीक लगता है, लेकिन अगर तुम उसे चुपके से देखो तो तुम पाओगे कि उसके क्रियाकलाप बहुत ही सनकी, बहुत ही असंगत हैं। यह अच्छा संकेत नहीं है; यह कहा ही नहीं जा सकता कि वह क्या कर सकता है। बाद में पता चलता है कि वह प्रार्थना के दौरान दूसरी भाषाओं में बोल सकता है; आमतौर पर वह खुद से भी लगातार बातें करता रहता है, मानो वह किसी से गपशप कर रहा हो और ऐसा करते हुए वह हँसता भी है, जिसे देखकर सनसनाहट-सी होने लगती है। यह भी विकृति की अभिव्यक्ति है। चलो, अभी के लिए हम इस पहलू का वर्णन करने के लिए “विचित्र” शब्द का उपयोग करते हैं। संक्षेप में, हम दानवों की विकृति की अभिव्यक्तियों का सारांश प्रस्तुत कर चुके हैं। इसमें कुल मिलाकर तीन पहलू हैं : एक है देह की दुष्ट काम-वासना; एक है हमेशा कुछ असामान्य अभिव्यक्तियाँ होना, विशेष रूप से विचित्र होना; और एक अन्य पहलू स्वभाव से संबंधित है—बहुत कुटिल होना। कुटिलता का मतलब है कि इस प्रकार का व्यक्ति एक निश्चित हद तक धोखेबाज और शातिर होता है, जिसकी थाह पाना साधारण लोगों के लिए असंभव है। जब लोग इस प्रकार के व्यक्ति से मेलजोल रखते हैं तो वे अक्सर चिंतित, बेचैन और भयभीत महसूस करते हैं; उन्हें अक्सर यह डर रहता है कि अंत में वे उसके द्वारा बेच दिए जाएँगे और तब भी वे उसकी चिल्लर गिनने में उसकी मदद कर रहे होंगे—वे उसके जाल में फँस जाने से डरते हैं। इस प्रकार का व्यक्ति विशेष रूप से धूर्त और चालाक होता है। हो सकता है कि वह तुम्हारे सामने बहुत विनम्र और परिष्कृत ढंग से बात करे, लेकिन वह तुम्हारे पीठ पीछे तुम्हारे खिलाफ साजिश रचे जा रहा है, बिना तुम्हें पता लगने दिए तुम्हारे खिलाफ लंबे समय से लड़ाई लड़ रहा है। जब तुम्हें इसका पता चलेगा तब तुम्हारे पसीने छूट जाएँगे और तुम सोचोगे, “खुशकिस्मती से परमेश्वर ने मेरी रक्षा की! अगर मैं परमेश्वर में विश्वास नहीं रखता तो वह मुझे नुकसान पहुँचा देता; यहाँ तक कि मेरी जान भी जा सकती थी!” यही इस प्रकार के दानव की दुष्टता है। मैं क्यों कहता हूँ कि ऐसे लोग विकृत होते हैं? वे बाहर से जैसे दिखते हैं उससे यह बताना सच में आसान नहीं है; तुम्हें उन चीजों से शुरुआत करनी होगी जिन्हें करने की वे योजना बनाते हैं और उन शब्दों से शुरुआत करनी होगी जिन्हें वे हर रोज प्रकट करते हैं—यह तुम्हारे लिए इस प्रकार के व्यक्ति के विकृत सार और प्रकृति को स्पष्ट रूप से देखने के लिए पर्याप्त है।

क. कुटिलता

दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग हर रोज किस बारे में सोचते हैं? उदाहरण के लिए, मान लो कि एक बहन को अगुआ बनाने के लिए पदोन्नत किया जाता है। तो वे विचार करते हैं, “वह लड़की इतनी कम उम्र में पदोन्नत होकर अगुआ बन गई। वह मुझसे कैसे बेहतर है? मैं तो उसे नीची नजर से देखता था, मैंने कभी उसकी लल्लो-चप्पो नहीं की और न ही उसके साथ अच्छा रिश्ता बनाया। अब वह अगुआ है, मेरी प्रत्यक्ष वरिष्ठ है, इसलिए मुझे उसकी लल्लो-चप्पो करनी ही पड़ेगी। मुझे यह देखना होगा कि क्या उसे अपने दैनिक जीवन में, भौतिक या आध्यात्मिक रूप से, किसी मदद की जरूरत है। अगर वह इस झाँसे में नहीं आई, अगर मैं उसे राजी नहीं कर सका तो मैं दूसरे नरम तरीके आजमाऊँगा—मैं उसके सामने कुछ कोमल शब्द, कुछ विनम्र शब्द, कुछ खुशामदी शब्द कहूँगा। मुझे पहले यह देखना होगा कि उस पर कौन-सा तरीका काम करता है। क्या वह लल्लो-चप्पो के झाँसे में आती है या बुरे लोगों की दुष्ट युक्तियों के? क्या उसे भोजन पसंद है या मौज-मस्ती? क्या उसे कपड़े पसंद हैं या गहने? उसे क्या पसंद है? मुझे उसे समझना होगा, उसके करीब जाना होगा, उसकी लल्लो-चप्पो करनी होगी, उसके साथ अच्छा रिश्ता बनाना होगा और उसके इरादों और राय की टोह लेने का प्रयास करना होगा।” चाहे कोई भी अगुआ बने, वे यही सोचते हैं कि उस अगुआ के करीब कैसे पहुँचा जाए और उसके साथ अच्छा रिश्ता कैसे बनाया जाए। इससे पहले जब यह बहन अगुआ नहीं थी तब वह जो भी कहती थी उसके बारे में वे अवज्ञापूर्ण होते थे। उदाहरण के लिए, अगर वह कहती, “आओ, अब से हम हफ्ते में एक बार इकट्ठे हों” तो यह सुनने के बाद वे विचार करते थे, “बाकी कलीसियाएँ हफ्ते में दो बार जुटती हैं, लेकिन हम तो सिर्फ एक बार इकट्ठे होने वाले हैं। हम तुम्हारी बात क्यों मानें? तुम खुद को समझती क्या हो?” चूँकि अब यह बहन अगुआ है, इसलिए जब वह बोलती है तो उनकी प्रतिक्रिया अलग होती है; अब वे पहले की तरह खंडन करने वाले शब्द नहीं बोलते हैं, बल्कि कहते हैं, “वह बहन जो कहती है वही सत्य है!” बाहर से वे बहुत आज्ञाकारी ढंग से कार्य करते हैं, मानो वे ऐसे हों जो आज्ञा मान सकते हों, लेकिन अंदर ही अंदर वे कहते हैं, “तुम्हें क्या पता? तुम्हें अगुआ बने तो बस कुछ ही दिन हुए हैं! यह कार्य पहले मैं किया करता था, लेकिन अब तुम अगुआ हो। ठीक है, अगुआ का फैसला ही अंतिम होता है। मैं पहले तुम्हारी बात से सहमत होऊँगा, लेकिन मैं तुम्हारे पीठ पीछे कैसे कार्य करता हूँ, यह मेरा अपना फैसला है। मैं बस तुम्हारे साथ खिलवाड़ करूँगा!” कुछ लोग अगुआ चुने जाते हैं और जब उनसे पूछा जाता है, “क्या तुम लोगों की कलीसिया में अगुआओं का चुनाव सिद्धांतों के अनुसार हुआ था?” तो वे सोच में पड़ जाते हैं, “अगर यह सिद्धांतों के अनुसार हुआ होता तो क्या तब भी मैं अगुआ बन सकता था? लेकिन मैं तुम्हें सच नहीं बता सकता।” तो वे कहते हैं, “यह सिद्धांतों के अनुसार किया गया था। मैंने कलीसियाई अगुआ के रूप में सेवा करते हुए दो कार्यकाल पूरे किए हैं। शुरू में मैं इसे फिर से नहीं करना चाहता था; मुझे डर था कि अगर मैंने ऐसा किया तो भाई-बहन आपत्ति करेंगे, इसलिए मैंने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। लेकिन फिर भी अंत में, भाई-बहनों ने मुझे चुना, इसलिए मैं इसे अनिच्छा से कर रहा हूँ। जब भी अगुआ बनने के लिए कोई नया उम्मीदवार आएगा, मैं इस्तीफा दे दूँगा।” सुनने में यह अच्छा लगता है, लेकिन क्या वे वास्तव में ऐसा करने का इरादा रखते हैं? उनका ऐसा करने का बिल्कुल कोई इरादा नहीं है। वे बस झूठ बोल रहे हैं और तुम्हारे साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, सिर्फ वही चीजें कह रहे हैं जो सुखद लगती हैं, जो तुम्हें संतुष्ट करती हैं, जो तुम्हें धोखा दे सकती हैं और गुमराह कर सकती हैं। जब बात ऊपरी स्तर के अगुआओं की आती है तो वे यह विचार करते हैं कि उनकी लल्लो-चप्पो कैसे करें, उनकी खुशामद कैसे करें और उन्हें कैसे गुमराह करें ताकि ये अगुआ उन्हें महत्व दें और उन्हें पदोन्नत करें। अगर वे पदोन्नत नहीं हो सकते हैं तो वे यह विचार करते हैं कि इससे पहले कार्य करते समय उनसे जो खामियाँ, विचलन और गलतियाँ हुईं, साथ ही पर्दे के पीछे उन्होंने जो अपराध और कपटपूर्ण व्यवहार किए, उन्हें अगुआओं से कैसे छिपाया जा सकता है ताकि उन्हें उनके बारे में पता न चले, वे बिना कोई जिम्मेदारी उठाए इन चीजों से कैसे बच निकल सकते हैं। क्या ये वही अभिव्यक्तियाँ हैं जो मानवता में होनी चाहिए? क्या ये सकारात्मक हैं या नकारात्मक? (नकारात्मक।) ये किस हद तक नकारात्मक हैं? इस हद तक कि किसी के द्वारा उनके कार्य पर अनुवर्ती कार्यवाही या उसका निरीक्षण किए जाने से पहले ही वे अपने मन में इन चीजों पर विचार कर चुके होते हैं, वे लंबे समय से मानसिक रूप से तैयार रहते हैं—उनके मन लंबे समय से इन चीजों से भरे होते हैं। मुझे बताओ, क्या यह कुटिल नहीं है? (हाँ।) इस प्रकार का व्यक्ति अपने श्रोताओं के हिसाब से चालाकी से बोलता है, अलग-अलग अगुआओं से अलग-अलग चीजें कहता है। अगर अगुआ महिला है तो वह उसकी तारीफ एक देवी के रूप में करता है; अगर अगुआ पुरुष है तो वह उसकी तारीफ एक आकर्षक, सुंदर पुरुष के रूप में करता है। क्या यह कुटिल नहीं है? (हाँ।) यह विकृति की एक प्रमुख विशेषता है। अगुआओं के प्रति उसका रवैया और अभिव्यक्तियाँ ऐसी ही होती हैं—बहुत ही कुटिल और बहुत ही धूर्त। उसकी आंतरिक दुनिया बेहद जटिल होती है; वहाँ ढेरों विचार ठसाठस भरे होते हैं, लेकिन उनमें से कोई भी सकारात्मक नहीं होता। वह मानवता, सत्य या सही मार्ग पर चिंतन नहीं करता है; वह बस इसी पर चिंतन करता है कि अगुआओं की लल्लो-चप्पो और चापलूसी कैसे की जाए, अपना खुद का रुतबा कैसे बचाए रखा जाए, चीजों से कैसे बच निकला जाए, कैसे निठल्ले ही बने रहा जाए, बिना पता लगे, बिना कोई जिम्मेदारी उठाए, कैसे कलीसिया पर पलता रहे, खाता-पीता रहे और बदले में कुछ भी न दे। अपने मन में वह बस इन्हीं मुद्दों के बारे में योजनाएँ बनाता है, षडयंत्र रचता है और सोचता है; वह सभी किस्म की चालें चलता है और उसका जमीर कभी कोई फटकार या आरोप महसूस नहीं करता। जब वह लोगों के समूह में आता है तब वह उन्हें अपनी आँखों से बारीकी से जाँचता है : “उन कुछ गृहिणियों में अंतर्दृष्टि की कमी है; उनमें मेरा भेद पहचानने की संभवतः कोई क्षमता नहीं हो सकती। मैं जो चालें चलता हूँ वे उनका कुछ भी मतलब नहीं निकाल पाएँगी। अगर वे ऐसा कर भी लेती हैं तो भी मुझे नीचे नहीं गिरा पाएँगी। नन्हीं मछलियाँ बड़ी लहरें पैदा नहीं कर सकतीं; वे समस्या नहीं होंगी। उनके अस्तित्व को स्वीकार करने की कोई जरूरत नहीं है। जहाँ तक बाकी कुछ लोगों की बात है, उनमें से एक व्यक्ति कलीसियाई अगुआ है, दूसरा व्यक्ति एक उम्रदराज बहन है जिसे परमेश्वर में विश्वास रखते हुए कई वर्ष हो गए हैं और फिर एक युवा बहन है जिसके बारे में सुना है कि उसने विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की पढ़ाई की है। इन कुछ लोगों से मुझे जरा-सा खतरा है। मुझे पहले किससे निपटना चाहिए? मुझे पहले किससे मेलजोल रखना चाहिए और किसका दिल जीतना चाहिए? मैं उनमें से एक कैसे बन सकता हूँ? मैं प्रतिष्ठा कैसे स्थापित कर सकता हूँ? कौन मेरा सहायक होगा और कौन मेरा विरोधी होगा? मुझे किससे दोस्ती करनी चाहिए, किससे दूर रहना चाहिए और किससे चौकस रहना चाहिए? इन मामलों के लिए लंबे समय से योजना बनाने की जरूरत पड़ती है; मुझे इन पर विचार करना होगा।” कुछ दिनों तक देखने के बाद वे समझ जाते हैं कि उन्हें किसके साथ मेलजोल रखना चाहिए और साँठ-गाँठ करनी चाहिए, किसे फुसलाया जा सकता है और किसका शोषण किया जा सकता है, कौन उनकी विरोधी शक्ति है और कौन सत्य समझता है और सिद्धांतों को बनाए रखता है और किससे चौकस रहना चाहिए—वे ये सब चीजें समझ लेते हैं। वे अपने दिल में चिंतन करते हैं, “मुझे उन लोगों से चौकस रहना चाहिए जिनमें मेरा भेद पहचानने की क्षमता है। मैं उन्हें नाराज नहीं कर सकता और न ही मुझे उनके करीब जाना चाहिए। मुझे उनसे पूरी तरह से दूर रहना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि मैं गलती कर दूँ और वे मेरी असलियत देख लें। उनकी मौजूदगी में मुझे बिल्कुल भी लापरवाही से बात नहीं करनी चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि उन्हें मेरे खिलाफ कुछ ऐसा मिल जाए जिसका उपयोग वे कलीसिया में मुझे उजागर करने और मेरा गहन-विश्लेषण करने के लिए कर सकें। अगर भाई-बहनों ने भेद पहचानने की क्षमता प्राप्त कर ली तो वे मुझे दूर कर देंगे। यह नहीं चलेगा!” हर रोज वह बस इन्हीं चीजों के बारे में सोचता है। किससे जूझना है और कैसे जूझना है ताकि यश हासिल कर सके और खुद को अच्छा दिखा सके, किससे मेलजोल रखना है ताकि वह बिना नुकसान उठाए फायदे हासिल कर सके, कुछ मामलों में उसे जो नुकसान हुए हैं उनकी भरपाई कैसे करनी है—वह दिन भर बस इन्हीं चीजों पर चिंतन करता है। यह तक हो सकता है कि वह आधा दिन यह सोचते हुए बिता दे कि किसी ने उसे किस नजर से देखा है : “कल फलाँ ने मुझे बहुत भेदती नजर से देखा। उसका क्या मतलब था? क्या उसमें मेरा भेद पहचानने की क्षमता है? यह अच्छा संकेत नहीं है। उसने मेरी कौन-सी समस्या देख ली है? मुझे अगले कुछ दिन सावधान रहना होगा और कोई भी सुराग नहीं छोड़ना है। इसके अलावा, मुझे दूसरों की आँखों के भावों से चीजों को पढ़ना सीखने की जरूरत है और मुझे लापरवाह नहीं होना चाहिए। पिछले दो दिनों से मेरी पलक फड़क रही है; ऐसा लग रहा है जैसे कुछ बुरा होने वाला है। मुझे सावधान रहना होगा, मैं सचमुच उम्मीद करता हूँ कि कुछ भी गड़बड़ न हो; अगर मैं सावधान नहीं रहा तो हो सकता है कि मुझे दूर कर दिया जाए।” वह लोगों से कैसे मेलजोल रखता है, इसमें बाहर से देखने पर कोई समस्या नजर नहीं आती। उसके भोजन, नींद और कार्य सब सामान्य लगते हैं। लेकिन उसके दिल और मन में जो है वह सामान्य नहीं है। इस असामान्यता की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? वह यह है कि वह जिन चीजों के बारे में सोचता है वे सब बहुत ही कुटिल और दूसरों की समझ से परे होती हैं।

दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग बहुत ही संदिग्ध तरीके से जीते हैं। उनके विचारों में निहित हर चीज पर सिर्फ अँधेरे कोनों में ही चिंतन किया जा सकता है, गणना की जा सकती है, योजना बनाई जा सकती है और पूर्व-चिंतन किया जा सकता है। उनके दिल पूरी तरह से शोहरत और लाभ के लिए होड़, षड्यंत्र, तुलना, ईर्ष्या, विवाद, प्रतिशोध जैसी चीजों से भरे होते हैं। वे सत्य की रत्ती भर भी तलाश नहीं करते हैं। चाहे वे किसी भी मामले को सँभाल रहे हों, वे उस पर संगति करने और उसके बारे में खुलकर और ईमानदारी से कोई फैसला लेने के लिए उसे सबके सामने प्रस्तुत नहीं करते हैं; इसके बजाय वे गुप्त रूप से कुछ लोगों की तलाश कर लेते हैं और उनके साथ फैसले लेते हैं। हर कलीसिया में इस किस्म के कुछ लोग होते हैं। वे अल्पभाषी होते हैं और कोई भावना नहीं दिखाते; उनका सामना चाहे किसी भी चीज से हो, वे चुप रहने का चुनाव करते हैं और कभी भी आसानी से अपना रुख व्यक्त नहीं करते। बाहर से वे लोगों से विनम्रता से बात करते हैं, लेकिन वे कभी भी सच नहीं बोलते या यह प्रकट नहीं करते कि उनके दिलों में सच में क्या है; उनके पास किसी के लिए भी कोई सच्चा शब्द नहीं होता है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग चाहे वे किसी से भी मेलजोल रखें, अपने अंतरतम विचारों को कभी प्रकट नहीं करते; यहाँ तक कि उनके परिवार के सबसे करीबी सदस्य भी नहीं जानते कि वे हर रोज क्या सोचते हैं। उनका परिवार तक उन्हें नहीं समझता, फिर बाहर के लोगों की तो बात ही छोड़ दो। अगर तुम उनके जिगरी दोस्त, बचपन के दोस्त, बरसों पुराने दोस्त या कार्यस्थल के अच्छे सहकर्मी हो तो भी तुम्हें नहीं पता होता कि वे क्या सोच रहे हैं; कोई भी उनकी थाह नहीं ले सकता है। वे चाहे कैसे भी बोलें या कार्य करें, कोई भी उनकी असलियत नहीं देख सकता। लेकिन कभी-कभार, हो सकता है कि वे मुँह से कुछ शब्द निकल जाने दें : “फलाँ मुझसे बेहतर है, तो क्या हुआ! एक दिन मैं उससे आगे निकल जाऊँगा, तुम बस देखते जाओ!” इन “तुम बस देखते जाओ” शब्दों के पीछे एक गहरा अर्थ निहित है; इसका मतलब है कि वे हर रोज अपने दिलों और मनों में चिंतन-मनन कर रहे होते हैं। बाहर से वे शांत और सौम्य जान पड़ते हैं, लेकिन उनके दिलों में तूफान और अशांति मची रहती है। वे किन चीजों के बारे में सोचते हैं? अगर ये खुले और ईमानदार मामले होते, सकारात्मक बातें होतीं जैसे कि जीवन में सही मार्ग, सत्य का अभ्यास, जमीर के अनुसार कार्य करना, आचरण कैसे करना है, परमेश्वर से प्रेम कैसे करना है और लगन से अपना कर्तव्य कैसे करना है—अगर वे इन चीजों के बारे में बार-बार सोचते, उनकी तलाश करते, उन पर चिंतन करते, उन्हें जाँचते और अपने दिल में उन्हें समझने का प्रयास करते तो उनके आंतरिक दिल बहुत शांत होते और उनमें शांति होती और आनंद होता और वे अधिकाधिक सामान्य जीवन जीते, कुटिलता से नहीं जीते। इन सकारात्मक अवस्थाओं में रहने वाले लोग समय-समय पर अपने आस-पास के लोगों से और जिनके वे अपेक्षाकृत करीब हैं उनसे आध्यात्मिक अनुनाद और संवाद करेंगे। लेकिन दानव अपने दिलों में जिन बातों पर चिंतन करते हैं और जिनके बारे में सोचते हैं वे सभी कुटिल चीजें होती हैं। कुटिलता का मतलब वे अमूर्त चीजें हैं जिन्हें सामान्य लोग नहीं देख सकते, वे बल्कि असामान्य चीजें हैं, अँधेरे कोनों में छिपी चीजें हैं जिन्हें खोजना और समझना लोगों के लिए मुश्किल होता है, ऐसी चीजें हैं जिनकी सामान्य लोगों को जरूरत नहीं होती है। ये अँधेरे कोने दानवों की आंतरिक दुनियाएँ हैं। उनके दिल इन कुटिल चीजों से भरे हुए हैं। हर रोज वे दूसरों से तुलना करते हैं, दूसरों से विवाद करते हैं, दूसरों के विरुद्ध साजिशें करते हैं और चालें चलते हैं, रुतबे, सम्मान और अंतिम फैसले के लिए होड़ करते हैं; वे सिर्फ इन्हीं मामलों के बारे में सोचते हैं। अगर तुम उनसे पूछते हो कि क्या अब उनके पास ईमानदार व्यक्ति होने का कोई मार्ग है तो वे तुम्हें उत्तर नहीं देंगे, तुम्हारी उपस्थिति को स्वीकार नहीं करेंगे और इसका जिक्र नहीं करना चाहेंगे। वह इसलिए क्योंकि उनके दिल इन नकारात्मक, कुटिल मामलों से भरे हुए हैं; वे सिर्फ इन्हीं चीजों के बारे में सोचते हैं। जब कभी-कभार उन्हें तकनीकी या पेशेवर पहलुओं से संबंधित मुद्दों पर जरा-सा सोचना पड़ता है तब वे अपने कार्य या जीवन की जरूरतों के कारण ऐसा सिर्फ अस्थायी तौर पर करते हैं। जैसे ही इस पहलू का उनका कार्य पूरा हो जाता है, वे तुरंत उन कुटिल मामलों के बारे में फिर से सोचने लगते हैं, उन पर चिंतन करते हैं, “किसके गुण मेरे गुणों से ज्यादा महान हैं? मैं किस पहलू में उससे ज्यादा शक्तिशाली हूँ, किस पहलू में वह मुझसे कमतर है? क्या फलाँ व्यक्ति ने पिछली बार मुझसे बात करते समय मुझे जानबूझकर नीचा नहीं दिखाया था? ऐसा लगता है कि उन दोनों लोगों ने लंबे समय से सामान्य रूप से बातचीत नहीं की है—उनके बीच क्या हुआ? अगर उनके बीच कोई टकराव या समस्या उत्पन्न हुई है तो क्या मुझे उससे कुछ फायदा हासिल हो सकता है? उनमें से एक मेरे लिए फायदेमंद है और मेरी मदद कर सकता है और मैं सच में उस व्यक्ति से मेलजोल रखना चाहता हूँ, लेकिन वह मेरी उपस्थिति कभी स्वीकार ही नहीं करता। अगर उन दोनों के बीच कोई टकराव है तो क्या मैं इस मौके का फायदा उठा सकता हूँ और उस व्यक्ति के साथ संपर्क स्थापित करने के इस अच्छे अवसर का उपयोग कर सकता हूँ?” वे अपने दिलों में जिस भी चीज पर चिंतन करते हैं और सोचते हैं, उसका सकारात्मक चीजों से कोई लेना-देना नहीं होता और परमेश्वर में विश्वास रखने और सत्य का अनुसरण करने से कोई लेना-देना नहीं होता। क्या इस प्रकार का व्यक्ति डरावना है? (हाँ।) अगर तुम उससे मेलजोल रखते हो तो यह दानव से मेलजोल रखने के समान है। तुम उसके खिलाफ कोई साजिश नहीं रचते, लेकिन वह तुम्हारे खिलाफ साजिशें रच रहा है और हर रोज तुम्हें देख रहा है, तुम्हारे बारे में सोच-विचार कर रहा है और तुम्हारे पीठ पीछे तुम्हें बारीकी से जाँच रहा है : “उसके वैसा कहने का क्या मतलब था? क्या उसका निशाना मेरी तरफ है? मैं किस तरह से उत्तर दूँ ताकि वह मेरी असलियत न देख सके? मैं किस तरह से उत्तर दूँ जिससे मुझे फायदा हो? अगर मैंने उत्तर नहीं दिया तो क्या वह सोचेगा कि मैं बेवकूफ हूँ, मुझे आसानी से डराया-धमकाया जा सकता है या मैं सचमुच परमेश्वर में विश्वास नहीं रखता? क्या वह ऐसा सोच सकता है? मुझे यह पता लगाने की जरूरत है कि उसके दिमाग में सच में क्या चल रहा है।” जब तुम लगातार उसकी साजिशों के बीच जीते हो तब क्या तुम दिल में सहज महसूस करते हो? (नहीं।) यह ऐसा है जैसे तुम्हारे बगल में कोई अदृश्य राक्षस हो; तुम शांति या आनंद महसूस नहीं कर सकते। जब तुम उससे मेलजोल रखते हो तब तुम्हें बस एक ही एहसास होता है : लगातार असहजता का बोध। यह असहजता बहुत सामान्य है क्योंकि सामान्य लोगों का अंतर्ज्ञान या छठी इंद्रिय उन्हें दानवों के प्रति, अपने आस-पास मौजूद असामान्य प्राणियों के प्रति असहजता महसूस करवाती है। भले ही तुम उसे सच में अच्छी तरह से नहीं जानते और यह समझा नहीं सकते कि आखिर क्या गलत है, तो भी जब तुम उसके साथ होते हो तब तुम्हें हमेशा असहजता महसूस होती है, मानो कुछ बुरा होने वाला हो। यह इस चीज को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि उसके मन में बुरे इरादे हैं, वह तुम्हारे खिलाफ साजिशें रच रहा है और उसकी तुम्हें लेकर गुप्त योजनाएँ हैं। तुम उसकी जासूसी करती निगाहों के नीचे जीते हो और वह हर रोज तुम्हारा बारीकी से अध्ययन करता है—यह तुम्हें अपने बगल में कोई बाघ या शेर होने से भी ज्यादा असहज महसूस करवाता है। अगर इस बाघ या शेर को तुमने पाला-पोसा होता तो भले ही यह भयंकर जानवर हो, फिर भी तुम कभी भी असहज महसूस नहीं करते। लेकिन अगर तुम्हारे आस-पास कोई दानव हो तो, क्योंकि उसमें विकृत प्रकृति सार है, इसलिए तुम असहज महसूस करोगे। यह असहजता आत्मा में निहित भावना है; यह दानव के कार्य में लगे होने के कारण होती है। शायद दानव तुम्हें किसी भी हद तक कष्टदायक ढंग से नुकसान पहुँचाने का व्यक्तिपरक रूप से इरादा न रखता हो, लेकिन बस उसकी तुम्हारे खिलाफ लगातार साजिशें रचना और तुम्हारी जासूसी करना तुम्हारी आत्मा को असहज बना देगा। अपने बगल में एक दानव के होते हुए तुम शांति और आनंद से बिल्कुल नहीं रह पाओगे, जब तक वह दानव न हो या तुम्हारे पास पर्याप्त आध्यात्मिक कद और परमेश्वर में पर्याप्त आस्था हो या तुम्हारे पास जीवन के रूप में सत्य हो—जब तक इनमें से कोई एक शर्त पूरी नहीं होती है, ऐसी स्थिति में वह तुम्हारे लिए कोई खतरा उत्पन्न नहीं करेगा या तुम पर कोई प्रभाव नहीं डालेगा और तुम असहज महसूस नहीं करोगे। अगर इनमें से कोई भी शर्त पूरी नहीं होती है तो जब कोई दानव लगातार तुम पर जासूसी करेगा तब तुम असहज महसूस करोगे। यह धीरे-धीरे किस हद तक बढ़ जाएगा? तुम उसके प्रति विकर्षण महसूस करोगे और उससे चौकस रहोगे, तुम भीतर से अशांत रहोगे और तुम बहुत-से मामलों में परेशान, बाधित और बँधे होगे। अगर वह पास में है तो जब तुम कुछ चीजें करोगे या बोलोगे तब तुम्हें हमेशा उसकी आँखों के भाव, उसके आचरण या उसकी राय पर विचार करना होगा। हो सकता है कि तुम लगातार यह पता लगाने का प्रयास करो, “वह मेरे बारे में क्या सोचेगा? ऐसा क्यों है कि मैं उसकी असलियत नहीं देख सकता? मुझे ऐसा क्यों लगता है कि वह जोड़-भाग करने वाला और रहस्यमय है? वह मुस्कान ऐसी क्यों लगती है मानो वह स्वीकृति की मुस्कान न हो? मैं इतना डरा हुआ क्यों हूँ? मैं उससे इतना प्रभावित क्यों हूँ?” अगर तुम सत्य नहीं समझते और तुममें भेद पहचानने की क्षमता बिल्कुल नहीं है तो इस प्रकार के व्यक्ति के साथ कुछ समय तक मेलजोल रखने के बाद तुम स्वाभाविक रूप से उससे प्रभावित हो जाओगे और अंत में ऐसी स्थिति में पहुँच जाओगे जो बहुत ही भयावह है।

दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग अपने दैनिक जीवन में प्राकृतिक रूप से जो प्रकट करते हैं और अपने दिल में जो सोचते हैं उन्हें देखा जाए तो उन्हें विकृत सार वाले लोगों के रूप में निरूपित किया जा सकता है। अगर तुम्हारा उनसे और गहरा, और आगे संपर्क नहीं रहा हो तो शायद तुम उनकी आंतरिक दुनियाओं को नहीं समझते, लेकिन इस प्रकार के व्यक्ति का भेद पहचानने का सबसे सीधा और सरल तरीका उसके बाहरी रूप-रंग की एक विशेषता है : वह अक्सर अपनी आँखों में एक दुष्ट भाव और एक धूर्त मुस्कान प्रकट करता है। उसकी आँखों में उस दुष्ट भाव का मतलब एक चोर नजर है, एक ऐसी नजर जो बहुत साफ और स्पष्ट नहीं है और न ही बहुत ईमानदार और निष्कपट है, बल्कि एक ऐसी नजर जिसकी थाह पाना मुश्किल प्रतीत होता है। तुम्हें लगता है कि इस नजर में कोई छिपा हुआ अर्थ है, लेकिन वह बस तुम्हें बताएगा ही नहीं कि वह क्या है। इसके अतिरिक्त, जब वह बोलता है तब वह गूढ़ तरीके से चीजों का संकेत देकर तुम्हें अटकलें लगाने के लिए प्रेरित करता है, चीजों की तरफ इशारा करने के लिए शब्दों का उपयोग करता है और तुम्हें गलती से यह विश्वास दिलाता है कि वह एक विशेष तरीके से सोचता है, लेकिन वास्तव में यह ध्यान भटकाने के लिए एक चाल है। तुम जो समझते हो, वह उसका असली अर्थ बिल्कुल नहीं होता; वह बस तुम्हारे साथ छल करना चाहता है और तुम्हारी हँसी उड़ाना चाहता है। तुम्हें उसकी नजर में कोई ईमानदारी नहीं मिल सकती; यह एक चोर नजर, और भटकने वाली नजर है, इसमें एक अस्पष्ट, मायावी एहसास है। जैसे ही तुम उसकी आँखों में यह भाव देखते हो, तुम्हारे दिल में अचानक शंका जाग उठती है और तुम्हें संदेह होता है कि तुमने जो कहा या किया वह गलत था। अगर तुम उसकी आँखों में यह भाव नहीं देखते हो तो तुम्हें लगता है कि तुम्हारी राय सही है, तुम्हारी अपनी समझ शुद्ध है, कि ये बातें सत्य सिद्धांतों के हिसाब से हैं और तुम्हें एक निश्चित तरीके से कार्य करना चाहिए और तुममें ऐसा करने का दृढ़ विश्वास है। लेकिन जैसे ही तुम उससे नजरें मिलाते हो या वह तुम्हें उस दुष्ट भाव से घूरता है, तो अनजाने में तुम्हें अपने पूरे शरीर में बर्फीली सिहरन-सी महसूस होती है। हालाँकि कोई स्पष्ट शब्द नहीं बोले जाते हैं, लेकिन उसकी आँखों में वह दुष्ट भाव तुम्हें एक मनोवैज्ञानिक संकेत देता है, वह तुम्हें गुमराह करता है जिससे तुम्हें तुरंत खुद पर संदेह होने लगता है : “क्या मैंने कुछ गलत कह दिया? कुछ गलत कर दिया? मैंने कहाँ गलती कर दी?” विचाराधीन मामला और सिद्धांत स्पष्ट रूप से बहुत स्पष्ट और असंदिग्ध हैं और तुम निश्चित थे कि इसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए था और यह सही था, लेकिन उससे नजरें मिलाने के बाद तुम संदेह में पड़ गए। इस तरह का भाव दानव का भाव है। यह एक पहलू है : उसकी आँखों के दुष्ट भाव के कारण तुम्हें संदेह होने लगता है। दूसरा पहलू यह है कि कभी-कभी उसकी आँखों के उस दुष्ट भाव में एक विशेष अर्थ निहित होता है—तिरस्कार। तुम युवा हो, तुम्हारे पास उथला अनुभव है, तुम्हारे पास जीवन अनुभव की कमी है और हो सकता है कि तुममें मानवता के कुछ दोष भी हों, इसलिए जब उसकी नजरें तुम्हारी नजरों से मिलती हैं तब तुम तुरंत आत्मविश्वास खो देते हो, तुम चूर-चूर हो जाते हो और तुरंत खुद पर संदेह करने लगते हो, खुद को बहुत मामूली समझने लगते हो, उससे कमतर समझने लगते हो और उसके सामने बौने हो जाते हो। यह दानव का भाव है। यह दुष्ट भाव कभी-कभी लोगों के विचारों को भ्रमित कर देता है, कभी-कभी लोगों के आत्मविश्वास को हिला देता है और कभी-कभी लोगों को नकारात्मक और निराश भी महसूस करवाता है।

जब दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों का भेद पहचानने की बात आती है तब अगर अभी भी तुम्हारे पास उनकी आँखों का भाव देखकर उनका भेद पहचानने का अनुभव नहीं है तो यह देखो कि वे हर रोज किस बारे में सोचते हैं, यह देखो कि वे हर रोज लोगों से क्या बातें करते हैं और क्या सामान्य संवाद होता है या नहीं। अगर कोई सामान्य संवाद नहीं होता है और ज्यादातर लोग उन्हें समझ नहीं पाते हैं और ज्यादातर लोगों से मेलजोल रखने का उनका सिद्धांत मौन रहना है और उनके सबसे करीबी लोग भी यह नहीं जानते कि वे हर रोज किस बारे में सोचते हैं और वे उनके सटीक विचारों और नजरियों पर आसानी से पकड़ नहीं बना पाते या यह थाह नहीं ले पाते कि वे वास्तव में क्या सोच रहे हैं तो यह स्पष्ट है कि ऐसे लोग वाकई जोड़-भाग करने वाले और रहस्यमय हैं। उनकी चुप्पी का मतलब यह नहीं है कि उनका कोई विचार या नजरिया नहीं है; दरअसल उनके वास्तविक विचार उनके मन में छिपे होते हैं, बस वे उन्हें व्यक्त नहीं करते। अगर वे उन्हें व्यक्त नहीं करते हैं तो तुम यह कैसे पता लगा सकते हो कि वे शातिर हैं? उनकी एक तरह की मक्कारी भरी मुस्कान होती है; वे अक्सर एक बनावटी मुस्कान धारण करते हैं। जब वे तुम्हारे आमने-सामने होते हैं तब वे एक बनावटी मुस्कान प्रदर्शित करते हैं, लेकिन जब वे मुड़ जाते हैं तब उनका चेहरा भावशून्य, मुस्कान रहित हो जाता है। इस प्रकार के व्यक्ति खौफनाक, डरावने होते हैं; वे दानव होते हैं। समझे? (समझ गए।) उदाहरण के लिए, मान लो कि तुम उनसे किसी विषय पर चर्चा करते हो। जब तुम अपना नजरिया बता देते हो, उसके बाद वे अपना रुख व्यक्त नहीं करते हैं, बल्कि एक मक्कारी भरी मुस्कान प्रकट करते हैं। क्या तुम्हें पता है कि मक्कारी भरी मुस्कान का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि तुम्हें नहीं पता होता कि यह मुस्कान स्वीकृति की है या अस्वीकृति की, और तुम्हें नहीं पता होता कि वे वास्तव में तुम्हारे कहने का मतलब समझ रहे हैं या नहीं। वे बस “हे हे” करके हँसते हैं। तुमने जो कहा उस बारे में वे यह नहीं कहते कि वह सही है या वह गलत है, वे यह नहीं कहते कि वे उसे समझते हैं या वे उसे नहीं समझते, और इसलिए तुम बूझ नहीं सकते कि इस हँसी का सच में क्या मतलब है। उन्होंने तुम्हें उत्तर दे दिया है, लेकिन यह उत्तर कोई उत्तर नहीं देने के समान है। अगर उन्होंने उत्तर नहीं दिया होता तो तुम अनुमान लगाते कि शायद उन्हें समझ नहीं आया; लेकिन उनका इस तरह से उत्तर देना तुम्हें चक्कर में डाल देता है। तुम्हें नहीं पता होता कि यह हँसी उपहास, तिरस्कार, मजाक दर्शाती है या सहमति और स्वीकृति। अगर तुम उनसे उनका नजरिया पूछते हो तो वे फिर से “हे हे” करके हँसते हैं, “ठीक है, ठीक है” कहते हैं, और बोलने के बाद उनके चेहरे का भाव अचानक उतर जाता है। यह तुम पर अदृश्य रूप से अत्यधिक दबाव डालता है। अगर तुम्हारा आध्यात्मिक कद छोटा है और तुम्हारे पास कोई वास्तविक रुख या सही विचार और नजरिया नहीं है तो तुम उनसे डर सकते हो। यही कारण है कि उनकी इस मुस्कान को मक्कारी भरी मुस्कान कहते हैं—कुटिल और शातिर होने को मक्कार होना कहते हैं। वे आसानी से अपने नजरिए प्रकट नहीं करते हैं। वे मानते हैं कि एक शब्द कहना बहुत ही कम है, दो शब्द कहना बहुत ही ज्यादा है और एक बार कोई विचार स्पष्ट रूप से कह दिया जाए या उसका मतलब कोई विशिष्ट चीज हो तो वह विफलता है, गलती है। इसलिए उनके लिए सबसे अच्छा तरीका है मुस्कुराना और तुम्हें कयास लगाने देना—तुम जो भी अर्थ निकालना चाहो, वही कयास लगा सकते हो, तुम्हें जैसे पसंद हो वैसे कयास लगा सकते हो, लेकिन कम-से-कम तुम्हें यह एहसास होता है कि वे तुम्हारे प्रति शत्रुतापूर्ण नहीं हैं और इस प्रकार उनका लक्ष्य हासिल हो जाता है। उन घाघ लोगों को देखो जो षड्यंत्रकारी और अत्यधिक शातिर हैं और उन लोगों को देखो जो कपटी और धूर्त हैं और निष्ठुर युक्तियों का उपयोग करते हैं : वे ज्यादा कुछ नहीं कहते और न ही उनके चेहरे पर ज्यादा भाव होते हैं, लेकिन उनकी नजर और उनकी मुस्कानें विरूपित होती हैं। सामान्य भ्रष्ट मनुष्य और जानवरों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग, ये सभी दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों से दूर भागते हैं; वे ऐसे लोगों से मेलजोल रखने को तैयार नहीं होते और ऐसे लोगों के साथ रहना उन्हें डरावना लगता है, इससे उनमें सिहरन-सी होने लगती है। इससे उनमें सिहरन-सी क्यों होने लगती है? क्योंकि ऐसे लोग मनुष्य नहीं होते, वे दानव होते हैं और दानव कुछ भी करने में सक्षम होते हैं। जब सामान्य मनुष्य किसी के साथ मेलजोल रखते हैं तब उनके कारण उस व्यक्ति में सिहरन नहीं होती है। सामान्य लोगों में जमीर और विवेक होता है, वे संयम और अंकुश से कार्य करते हैं और उनके पास न्यूनतम मानक होते हैं। ज्यादा-से-ज्यादा, जब वे गुस्से में होते हैं तब हो सकता है कि वे तुम्हें जरा-सा कोसें और कुछ ऐसी अप्रिय बातें कह दें जो तुम्हारे आत्म-सम्मान को कुछ हद तक ठेस पहुँचाती हों। लेकिन दानव अलग होते हैं; वे तुम्हें कोसते नहीं हैं या तुम्हारे आत्म-सम्मान को ठेस नहीं पहुँचाते हैं, लेकिन वे तुम्हें नुकसान जरूर पहुँचाते हैं। वे तुम्हारे पीठ पीछे यह सोच-विचार करते हैं कि तुम्हें कैसे गुमराह किया जाए; वे एक गड्ढा खोदते हैं और तुम्हें खुद उसमें छलाँग लगाने के लिए उकसाते हैं। जब तुम उसमें छलाँग लगा देते हो तब वे ऊपर से तुम्हें देखते हैं, तुम्हारी बदकिस्मती पर मन ही मन खुश होते हैं और साथ ही एक अच्छा व्यक्ति होने का ढोंग करते हुए कहते हैं, “मैं तुम्हें बचाऊँगा! तुम इसमें कैसे गिर गए? मुझे लगा कि ज्यादातर लोगों को पता है कि यहाँ एक गड्ढा है।” यहाँ तक कि वे अच्छे आदमी का किरदार भी निभाना चाहते हैं जिससे तुम उनकी बातों पर विश्वास कर लो। क्या इस तरह का व्यक्ति डरावना नहीं होता? वह गड्ढा उसने खोदा था और उसने उसे विशेष रूप से तुम्हारे लिए तैयार किया था; अगर उसमें तुम छलाँग नहीं लगाओगे तो कौन लगाएगा? जब तुम गड्ढे में छलाँग लगा देते हो उसके बाद वह तुम्हें बचाने के लिए हाथ बढ़ाता है और तुम्हें बचाते हुए कहता है, “तुमने छलाँग क्यों लगाई?” तुम्हारी बदकिस्मती पर मन ही मन खुश होते हुए वह ऐसा भी बना देता है कि तुम्हें एहसास नहीं होता कि यह गड्ढा उसी ने खोदा था। स्पष्ट रूप से उसी ने तुम्हें नुकसान पहुँचाया, फिर भी वह तुम्हें उसके प्रति अत्यंत आभारी महसूस करवा देता है। क्या यह विकृति नहीं है? (हाँ।) यह सरासर विकृति है!

एक चीज है जो दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग अक्सर करते हैं, जिसे सभी ने देखा है : दानव लोगों को खुश करने के लिए सुखद चीजें कहने में सबसे माहिर होते हैं। उदाहरण के लिए, जब ऐसा कोई व्यक्ति तुम्हें कार्य करते हुए देखता है तब वह भीतर छिप जाता है और देखता रहता है। जब तुम कार्य समाप्त कर लेते हो तब वह बाहर आकर कहता है, “ओह, तुम कब से कार्य कर रहे हो! तुमने मुझे बताया क्यों नहीं? मैं तुम्हारी मदद कर सकता था और बोझ बाँट सकता था। अगर थकान हो रही है तो हम साथ मिलकर इसे निपटा सकते हैं। अगली बार जब तुम कार्य करो तब बस मुझे बता देना—यह तो छोटी-सी बात है। मुझसे मदद माँगने में संकोच मत करना!” जब तुम यह सुनते हो तब तुम्हारे दिल में एक गर्माहट महसूस होती है और तुम सोचते हो कि हालाँकि उसने मदद नहीं की, लेकिन उसका ऐसा करने का इरादा था और उसके शब्द ही पर्याप्त हैं। वह अपनी सुखद बातों से तुम्हें धोखा देता है। देखो, वह ऐसी चीजें कहने के लिए वास्तव में हिम्मत कर सकता है और उसे ऐसा करने में बिल्कुल शर्म नहीं आती। तो तुम यह कैसे जान सकते हो कि उसकी बातें झूठी हैं? अगली बार जब तुम अपने काम पूरे कर लेते हो तब वह आता है और फिर से सुखद बातें कहता है : “तुमने मुझे बताया क्यों नहीं कि तुम कार्य कर रहे हो? हर बार तुम मुझसे मदद नहीं माँगते; तुम सच में मुझसे परायों की तरह पेश आ रहे हो। तुम मेरे साथ इतनी औपचारिकता क्यों कर रहे हो?” दो-तीन बार ऐसा होने के बाद तुम जान जाते हो कि वह कार्य में वास्तव में तुम्हारी मदद नहीं करना चाहता और वह तुम्हें बस धोखा देने और खुश करने के लिए कुछ सुखद चीजें कह रहा है। जब सच में कोई ऐसी चीज होती है जिसमें उसकी मदद की जरूरत पड़ती है तब उसका कहीं कोई अता-पता नहीं होता। यह किस तरह का व्यक्ति है? यह दानव है, मनुष्य तो बिल्कुल नहीं है। दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग खुद से मिलने वाले हर व्यक्ति को धोखा देने और अपने खुद के उद्देश्य हासिल करने के लिए उनसे सुखद चीजें कहेंगे। वे धूर्त चालों से भरे होते हैं; वे मनुष्य नहीं बल्कि दानव हैं। क्या ऐसे लोगों से मेलजोल रखने के कोई मायने हैं? तुम्हें उन पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देना चाहिए। क्या तुम्हारे दैनिक जीवन में ऐसे लोग हैं? (हाँ।) ऐसे लोग इस मामले में इसी तरह से व्यवहार करते हैं और दूसरे मामलों में भी वे इसी तरीके से व्यवहार करते हैं—वे हमेशा लोगों को धोखा देते हैं। वे इतने ही ज्यादा विकृत होते हैं; वे लोगों के प्रति ईमानदार नहीं होते।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें