सत्य का अनुसरण कैसे करें (14) भाग चार
वास्तविक जीवन में लोगों के सामने अक्सर कुछ लम्पट और व्यभिचारी व्यक्ति आ जाते हैं। आज इन शब्दों पर संगति करने के बाद, चूँकि तुम लोग इस प्रकार के व्यक्ति का भेद पहचानने में क्षमता प्राप्त कर चुके हो और तुम जानते हो कि वे सामान्य लोग नहीं बल्कि दानव हैं, इसलिए जब वे तुम्हारा मन मोहने का प्रयास करें तो तुम उन्हें दृढ़ता से अस्वीकार कर सकते हो। उन्हें अव्यक्त रूप से और चतुराई से मत अस्वीकार करना या इतना ज्यादा शर्मिंदा मत महसूस करना कि उन्हें अस्वीकार ही ना कर पाओ, और ऐसे लोगों से मत डरना। यकीनन अगर तुम्हें इस बात की परवाह नहीं है कि वे दानव हैं और तुम कहते हो, “मैं पहले से ही तीस-चालीस वर्ष का हो चुका हूँ और अभी तक मैंने शादी का अनुभव नहीं किया है; अगर वाकई किसी को इस तरह से मेरी जरूरत है तो मुझे स्वीकारने में खुशी होगी” तो चूँकि तुम्हें इस बात की परवाह नहीं है कि इससे क्या नतीजे उत्पन्न हो सकते हैं और न ही मनोवैज्ञानिक घावों की परवाह है, इसलिए मैं और कुछ नहीं कहूँगा। ऐसा कहने का मेरा उद्देश्य है कुछ बेवकूफ लोगों को, जिनमें विपरीत लिंग के बहकावे के प्रति कोई सतर्कता या सावधानी नहीं है, यह बताना कि जब उनके सामने प्रलोभन आए तब उन्हें क्या सही रवैया अपनाना चाहिए। अगर तुम्हें इस बात की परवाह नहीं है कि कोई व्यक्ति लम्पट और व्यभिचारी है, इस बात की परवाह नहीं है कि वह दानव है और तुम सिर्फ इसलिए बहुत सम्मानित महसूस करते हो क्योंकि वह तुम्हें पसंद करता है—ठीक वैसे ही जैसे अविश्वासी लोगों की यह कहावत है : “एक पुरुष किसी ऐसे व्यक्ति के लिए अपने जीवन की आहुति दे देता है जो उसे समझता है, जबकि एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है”—और तुम सोचती हो, “एक महिला होने के नाते अगर कोई मुझे सचमुच पसंद करता है, तो यह दर्शाता है कि मेरा रूप स्वीकार्य है, इसलिए मुझे बेहद सम्मानित महसूस करना चाहिए। तो फिर, उसे मेरे पास बेधड़क आने दो; मैं उसका स्वागत करूँगी और खुली बाहों से उसे गले लगाऊँगी”—यह कैसा रवैया है? मुझे बताओ, क्या “एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है” यह कहावत महिलाओं के प्रति सम्मानजनक है? (नहीं।) एक पुरुष को उन लोगों के लिए अपनी जान कुर्बान कर देनी चाहिए जो उसे समझते हैं और एक महिला को अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाना-सँवारना चाहिए—क्या यह कहावत सही है? (नहीं।) महिलाएँ इतनी घटिया क्यों हैं? पुरुष भी अपनी इज्जत को महत्व नहीं देते हैं। इसलिए पुरुषों को दूसरों के लिए अपनी जान देनी पड़ती है। जो भी तुम्हारा विश्वासपात्र है, वह तुम्हारा मालिक है जिसके लिए तुम्हें अपने जीवन की कुर्बानी देनी होगी—तुम्हारा जीवन इतना बेकार क्यों है? क्या ऐसा हो सकता है कि तुम्हारा जीवन दूसरों का है, तुम्हारा नहीं? परमेश्वर मानव जीवन को सबसे बहुमूल्य मानता है क्योंकि यह जीवन, यह साँस परमेश्वर द्वारा दी गई है; सृजित देह के चलने-फिरने और जीवित प्राणी बनने में समर्थ होने के लिए यह मूलभूत शर्त है। अगर तुम अपने जीवन को संजोकर नहीं रखते हो, बल्कि उसे यूँ ही दूसरों को दे देते हो और उनके लिए कुर्बान कर देते हो, तो यह क्या दर्शाता है? क्या यह नहीं दर्शाता कि तुम अपनी इज्जत को महत्व नहीं देते हो? (हाँ।) यह दर्शाता है कि तुम्हारे जीवन का कोई मूल्य नहीं है। तुम अपना जीवन नहीं सँजोते हो, तुम अपने जीवन का उपयोग सबसे सार्थक और मूल्यवान चीजें करने के लिए नहीं करते हो, लेकिन जो भी तुम्हें समझता है, तुम उसके लिए यूँ ही मर सकते हो। यह दर्शाता है कि तुम्हारा जीवन बहुत ही सस्ता है; यह बस एक सड़ा हुआ जीवन है, उतना ही बेकार है जितना कि कुत्ते, बिल्ली या मुर्गी का जीवन होता है। तो क्या “एक पुरुष किसी ऐसे व्यक्ति के लिए अपने जीवन की आहुति दे देता है जो उसे समझता है” यह कहावत सही है? (नहीं।) यह कहावत लोगों को नीचा दिखाती है, उनका अनादर करती है; यह कहावत जीवन को नहीं सँजोती। दूसरों के लिए आसानी से मर जाना—क्या मानव जीवन आसानी से मिलता है? जीवन आसानी से नहीं मिलता; कोई बस इतनी आसानी से नहीं मर सकता। इसलिए, “एक पुरुष किसी ऐसे व्यक्ति के लिए अपने जीवन की आहुति दे देता है जो उसे समझता है” यह कहावत गलत और असमर्थनीय है। तो फिर क्या “एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है” यह कहावत सही है? (यह भी सही नहीं है।) यह किस तरीके से गलत है? क्या तुम लोगों को किसी समय यह कहावत वाकई पसंद थी, तुमने इसे स्वीकारा था, यहाँ तक कि इसे सत्य, आदर्श वाक्य भी माना था? क्या कभी कोई ऐसा व्यक्ति हुआ है जिसने तुम्हारी सराहना की है? अगर तुम्हारी सराहना करने वाला व्यक्ति कोई ऐसा था जिसे तुम पसंद करती थी तो क्या तुम्हें सम्मानित महसूस हुआ था? (वास्तव में सम्मानित तो नहीं, शायद अंदर से खुशी हुई हो।) तो यह सम्मानित महसूस होने से भिन्न नहीं है। क्या यह खुशी अच्छी है? (नहीं।) क्यों नहीं? (किसी महिला का किसी पुरुष की तारीफ और स्नेह के लिए सजना-सँवरना, सिर्फ पुरुषों के लिए जीना, अपने सारे विचार इसी में लगा देना—मुझे लगता है कि इस तरह से जीना बहुत ही घटिया है।) क्या यहाँ इससे अलग विचार हैं? “एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है” यह कहावत खुद ही महिलाओं को पुरुषों की तुलना में असमान दर्जा देती है। यह महिलाओं से अपेक्षा करती है कि वे पुरुषों को खुश करने के लिए खुद को सजाएँ-सँवारें, पुरुषों की खुशी के लिए जीएँ और जब कोई उन्हें पसंद करे और उनकी तारीफ करे तो वे सम्मानित महसूस करें। यह असमान है; यह खुद ही महिलाओं के निम्न रुतबे का सच्चा प्रतिबिम्ब है। “एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है” इस कहावत का निहितार्थ यह है कि एक महिला को दूसरों द्वारा पसंद किए जाने पर खुश और सम्मानित महसूस करना चाहिए, चाहे वह अपने अच्छे रंग-रूप के कारण दूसरों को पसंद आती हो या वह पुरुषों का स्नेह इसलिए आकर्षित करती हो क्योंकि वह आँखों को भाने के लिए खुद को सजाना-सँवारना जानती है। यह खुद ही महिलाओं को नीचा दिखाता है। यह कहावत महिलाओं को बताती है कि उनके अस्तित्व का मूल्य, उनकी खुशी का स्रोत किसी ऐसे व्यक्ति का होना है जो उन्हें पसंद करता है और अगर ऐसा नहीं है तो उन्हें बदकिस्मत और दुखी महसूस करना चाहिए और इस पर चिंतन करना चाहिए कि कोई उन्हें क्यों पसंद नहीं करता है और क्या महिलाएँ होने के नाते वे बेकार और असफल जीवन जी रही हैं। तो क्या “एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है” यह कहावत महिलाओं को नीचा नहीं दिखाती है? (हाँ।) “एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है” इस कहावत में क्या आमतौर पर कद्रदान का मतलब किसी पुरुष से नहीं होता है? यह कहावत खुद ही पुरुषों को महिलाओं से ऊपर, मालिक के पद पर बिठाती है। इसका मतलब है कि एक महिला को इस बात पर सम्मानित महसूस करना चाहिए कि एक पुरुष—एक मालिक—उसे पसंद करता है और उसकी तारीफ करता है। अगर एक पुरुष—एक मालिक—उसे पसंद नहीं करता है तो उसमें कुछ गड़बड़ है, वह प्रेम किए जाने लायक नहीं है, वह जीवन में असफल है और वह महिला होने के योग्य नहीं है। तुम देखो, यह अनजाने में पुरुषों का रुतबा ऊँचा कर देता है जिससे उन्हें महिलाओं की गर्दन पर पैर रखने और उन पर हावी होने की अनुमति मिल जाती है। यहीं पर “एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है” इस कहावत में गलती है। इसके अलावा, क्या पुरुष महिलाओं को सिर्फ उनके रूप-रंग और बनाव-शृंगार के लिए पसंद करते हैं? या वे महिलाओं को सिर्फ इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि वे देखते हैं कि महिलाएँ सौम्य, गुणवान, गरिमामयी और परिष्कृत होती हैं? क्या पुरुष सिर्फ अपनी आँखों को खुश करने के लिए महिलाओं को पसंद करते हैं? (नहीं, यह देह की यौन इच्छा को संतुष्ट करने के लिए है।) तो फिर पुरुषों को संतुष्ट करने और खुश करने के पीछे महिलाओं का क्या मकसद होता है? (यह भी देह की यौन इच्छा को तुष्ट करने के लिए है।) यानी जब एक-दूसरे की बात आती है, तो पुरुष और महिला दोनों की ही जरूरतें होती हैं और इनमें सबसे मूलभूत जरूरत देह की यौन इच्छा है। पुरुष की महिला के लिए जरूरत सिर्फ उसके रूप-रंग को पसंद करना नहीं है, बल्कि उसके आधार पर उसे शारीरिक रूप से प्राप्त करना भी है—और ज्यादा स्पष्ट रूप से कहा जाए तो अपनी यौन इच्छा को संतुष्ट करने के लिए उसका शरीर प्राप्त करना है। इसलिए, “एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है” इस कहावत के पीछे का मकसद वास्तव में पुरुषों की यौन इच्छा को संतुष्ट करना है। इसके लिए महिलाओं को न सिर्फ अपने रूप-रंग और बनाव-शृंगार को पुरुषों के लिए दिलकश बनाने की जरूरत पड़ती है, बल्कि उनकी यौन इच्छा को भी संतुष्ट करना होता है। क्या यह जीने का बहुत ही घटिया तरीका नहीं है? अगर महिलाएँ अब भी यही मानती हैं कि यह कहावत सही है, यह कुछ ऐसा है जिसे उन्हें हासिल करना चाहिए और जिसका पालन करना चाहिए, तो महिलाएँ खुद को नीचा दिखा रही हैं। पुरुषों की महिलाओं के प्रति यौन इच्छा होती है और वे महिलाओं के शरीर से खेलना चाहते हैं; अगर महिलाएँ इसे निंदनीय और घिनौना मानने के बजाय अपने कद्रदानों के लिए खुद को अभी भी सजाती-सँवारती हैं, सोचती हैं कि यह उनके जीवन का सबसे बड़ा सम्मान है, सर्वोच्च सम्मान है, तो क्या वे खुद को नीचा नहीं दिखा रही हैं? (हाँ।) यह महिलाओं से उनके हक पूरी तरह छीन लेना है। यह न सिर्फ महिलाओं से उनके अस्तित्व का हक, उनकी गरिमा और उनके मानवाधिकार छीन लेता है, बल्कि उन्हें यह सोचने के लिए भी मजबूर करता है कि यह सबसे बड़ा सम्मान है। क्या यह क्रूर नहीं है? यह बेहद क्रूर है! कोई स्वायत्तता और कोई भी मानवाधिकार नहीं होने के अलावा, एक महिला की खुशी, आनंद और प्रसन्नता सिर्फ पुरुषों को खुश करने और उन्हें पूरी तरह से संतुष्ट करने के आधार पर ही हासिल हो सकती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि महिलाएँ किस तरह का अमानवीय व्यवहार सहती हैं, उनसे अब भी इस पर गर्व करने की अपेक्षा की जाती है। क्या यह महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करना और उन्हें गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाना नहीं है? चाहे आधुनिक महिलाएँ हों या प्राचीन, वे सभी “एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है” इस कहावत को अपना आदर्श वाक्य, अपना जीवन लक्ष्य मानती हैं। क्या यह पूरी तरह से गलत नहीं है? क्या यह शैतान द्वारा लोगों के साथ दुर्व्यवहार करने और उन्हें गुमराह करने के लिए उपयोग की जाने वाली चाल नहीं है? (हाँ।) अगर तुम एक महिला हो और एक पुरुष तुमसे सुख प्राप्त करता है, उसका दिल तुम्हारे लिए दुष्ट वासना से भरा रहता है तो क्या तुम यह जानकर घिनौना महसूस करोगी या बेहद सम्मानित महसूस करोगी? (घिनौना।) जब वह तुम्हारे बारे में सोचता है, तो वह सिर्फ तुम्हारे शरीर और तुम्हारे रूप-रंग के बारे में सोचता है, साथ ही वह अपनी यौन इच्छा भी अभिव्यक्त करता है। जितना ज्यादा वह तुमसे सुख प्राप्त करता है, उतना ही ज्यादा वह तुम्हारे लिए यौन इच्छा से भर जाता है; जब तुम्हारी बात आती है तो उसके अंदर जो चीजें हिलोरें मारती हैं वे पूरी तरह से कामुक विचार हैं। यहाँ तक कि वह तुम्हें हासिल करने के लिए हर उपाय आजमाता है ताकि वह तुम्हारे शरीर का आनंद ले सके, अपनी यौन इच्छा को पूरी तरह से संतुष्ट कर सके और अपनी यौन इच्छा को अभिव्यक्त कर सके। अगर तुम्हें यह पता होता कि तुम्हारे प्रति उसके ऐसे इरादे हैं, तो क्या तुम तब भी यही सोचती कि “एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है” यह कहावत सही है? क्या तुम तब भी किसी के द्वारा पसंद किए जाने और तारीफ किए जाने को सम्मान की बात समझती? (नहीं।) अगर तुम एक ऐसी महिला हो जिसमें शर्म और गरिमा का बोध है, तो तुम्हें यह कहावत घिनौनी लगनी चाहिए और तुम्हें ऐसे लोगों द्वारा पसंद किए जाने से नफरत करनी चाहिए और उसे अस्वीकार करना चाहिए। सिर्फ इसी तरीके से जीने से ही तुममें गरिमा होती है। जो तुम्हारा सही मायने में आनंद लेता है और तुम्हारी सही मायने में तारीफ करता है, वह ऐसा तुम्हारे चरित्र की गुणवत्ता, तुम्हारे लक्ष्यों के कारण करता है क्योंकि तुम सत्य समझती हो और वह तुमसे कुछ नैतिक उन्नति और सहायता भी प्राप्त करना चाहता है—इसलिए नहीं कि वह तुम्हारे शरीर की तारीफ अपनी यौन इच्छा में लिप्त होने और उसे संतुष्ट करने के लिए करना चाहता है। अगर कोई इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारा चरित्र कैसा है या तुम सत्य का अनुसरण करती हो या नहीं, तुम्हारी तारीफ करता है और ऐसा सिर्फ इसलिए करता है क्योंकि तुम्हारा रूप-रंग और शारीरिक गठन आँखों को भाता है और उसकी यौन इच्छा को पूरी तरह से संतुष्ट कर सकता है, और फिर भी तुम्हें इससे कोई विकर्षण या नफरत नहीं होती है, बल्कि तुम्हें लगता है कि वह तुम्हें पसंद करता है—विशेष रूप से, क्योंकि उसने तुम्हारे साथ शारीरिक संपर्क बनाने के संकेत दिए हैं इसलिए तुम्हें यह और भी ज्यादा लगता है कि वह तुम्हें पसंद करता है—और तुम इससे सम्मानित भी महसूस करती हो तो तुम खुद को नीचा दिखा रही हो। चाहे किसी का तुम्हारे शरीर के लिए कोई मंसूबा हो या उसके प्रति कोई दुष्ट इरादा हो, अगर तुम्हें इसकी परवाह नहीं है और जब तक वह तुम्हें पसंद करता है तब तक तुम इसे अपना विशेष सम्मान मानती हो और इससे सम्मानित महसूस करती हो तो तुम सत्यनिष्ठा और गरिमा वाली महिला नहीं हो और न ही तुम एक अच्छी महिला हो। मान लो कि किसी की तुम्हारे प्रति कामुक जरूरतें हैं और तुम्हें लगता है कि तुम्हें कोई ऐसा मिल गया है जो तुम्हें समझता है और तुम्हें अपनी यौन इच्छा को अभिव्यक्त करने का एक अवसर भी मिल गया है; ताली दोनों हाथों से बजती है और तुम दोनों इसलिए एक साथ होते हो क्योंकि तुम दोनों एक ही गंदी मिट्टी के बने हो। इस मामले में, तुम सत्यनिष्ठा और गरिमा रहित व्यक्ति हो, तुम पसंद किए जाने लायक नहीं हो; तुम भी लम्पट और व्यभिचारी लोगों के प्रकार की ही हो। अगर तुम सही मायने में एक गरिमामयी महिला हो तो तुम्हें ऐसे लम्पट और व्यभिचारी लोगों द्वारा पसंद किए जाने पर नफरत, विकर्षण और घिनौनापन महसूस होना चाहिए। यकीनन अगर कोई तुम्हें सही मायने में तुम्हारी मानवता, तुम्हारे लक्ष्यों के कारण पसंद करता है या इसलिए पसंद करता है क्योंकि तुममें कुछ खूबी है तो वह भी सम्मानित महसूस करने लायक बात नहीं है। लोगों के यह कहने कि “एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है” का मकसद निश्चित रूप से उतना सरल नहीं है जितना कि एक पुरुष का किसी महिला की तारीफ करना है। यह पुरुषों को पूरी तरह से महिलाओं से ऊँची स्थिति में रखता है, अधिक सटीक रूप से कहें तो यह कहावत उस लोकाचार के तहत उत्पन्न हुई कि पुरुष श्रेष्ठ हैं और महिलाएँ कमतर हैं। इसके अलावा, हकीकत यह है कि किसी भी सामाजिक व्यवस्था के तहत महिलाएँ कमजोर समूह होती हैं जिन्हें पुरुषों की सहायक वस्तुएँ और खिलौने माना जाता है। इसलिए, “एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है” यह कहावत सभी महिलाओं के लिए पूरी तरह से अपमानजनक है। अगर महिलाएँ विशेष रूप से इस कहावत को स्वीकारती हैं, तो यह महिलाओं के लिए अफसोस की बात है और हमें उन सभी महिलाओं के लिए तिरस्कार महसूस करना चाहिए जो इसे स्वीकारती हैं। तो फिर क्या पुरुषों को “एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है” इस दृष्टिकोण को स्वीकारना चाहिए? (नहीं।) अगर कोई पुरुष किसी महिला को अपने कद्रदान के लिए सजते-सँवरते देखता है, तो क्या उसे ऐसा नहीं लगता है कि ऐसी महिला बहुत अपमानजनक तरीके से जीवन जी रही है और क्या वह भी ऐसी महिला को नीची नजर से नहीं देखेगा? (हाँ।)
क्या अब तुम्हें स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है कि “एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है” यह कहावत सही है या नहीं? (यह गलत है।) यह कहावत कोई सकारात्मक चीज नहीं है और न ही यह कोई सही विचार या दृष्टिकोण है। बाइबल में और परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों में देखो—क्या इनमें ऐसा कोई वाक्य है जो महिलाओं से कहता हो कि उन्हें उन लोगों के लिए खुद को सजाना-सँवारना चाहिए जो उनकी सराहना करते हैं? क्या ऐसा कोई वाक्य है जो पुरुषों और महिलाओं के रुतबों को स्तरों में विभाजित करता हो, और यह कहता हो कि पुरुष महिलाओं से ऊपर हैं? नहीं, ऐसा कोई वाक्य नहीं है। बाइबल में उत्पत्ति की पुस्तक में यह दर्ज है कि महिला पुरुष की हड्डियों की हड्डी है और उसके देह का देह है। पुरुष और महिला दोनों ही परमेश्वर द्वारा सृजित मनुष्य हैं; वे परमेश्वर के आगे बराबर हैं, उनमें स्तरों का कोई विभाजन नहीं है, श्रेष्ठ और निम्न का कोई अंतर नहीं है। लोगों को श्रेष्ठ और निम्न में विभाजित करना और रुतबे के स्तरों में अंतर करना कुछ ऐसा है जो शैतान करता है; यह शैतान द्वारा महिलाओं के दमन और उत्पीड़न का वास्तविक प्रमाण है। शुरू में जब से परमेश्वर ने मानवजाति बनाई तब से परमेश्वर की नजर में पुरुष और महिला बराबर रहे हैं। दोनों ही सृजित प्राणी हैं और परमेश्वर के उद्धार के लक्ष्य हैं। परमेश्वर ने यह कभी नहीं कहा कि पुरुष श्रेष्ठ हैं और महिलाएँ निम्न हैं और न ही उसने यह कहा है कि पुरुषों को महिलाओं का मुखिया या उनका स्वामी होना चाहिए, पुरुषों को महिलाओं से ऊपर रहना चाहिए, किसी भी कार्य में पुरुषों को महिलाओं से ज्यादा महत्व मिलना चाहिए या पुरुषों की अपनी राय होती है और वे ही आधार स्तंभ हैं जबकि महिलाओं को पुरुषों की ज्यादा बातें माननी चाहिए। परमेश्वर ने ऐसी बातें कभी नहीं कहीं। सिर्फ शैतान की भ्रष्टता के कारण ही लोगों में पुरुषों के श्रेष्ठ होने और महिलाओं के निम्न होने की कहावतें उत्पन्न हुईं और फिर यह चलन पूरे समाज और पूरी मानवजाति में विकसित हुआ जिसने पुरुषों के अधिकार के अधीन महिलाओं का निरंतर दमन किया। सत्य की समझ नहीं होने के कारण जब महिलाएँ शैतान के सभी प्रकार के बुरे चलनों द्वारा प्रभावित और गुमराह हो जाती हैं, उसके बाद वे खुद को पुरुषों से गौण या रुतबे में उनसे निम्नतर महसूस करती हैं। यही कारण है कि आज भी बहुत-सी महिलाएँ यह मानती हैं कि “एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है” यह कहावत सही है। यह बहुत अफसोस की बात है। अगर लोग सत्य नहीं समझते हैं तो वे अभी भी कई विशिष्ट मामलों में शैतान के विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों द्वारा गुमराह और नियंत्रित होते हैं। यहाँ तक कि यह छोटा-सा मामला भी बहुत उदाहरणात्मक है, है ना? (हाँ।) इसका क्या कारण है कि महिलाएँ स्वेच्छा से खुद को नीचा दिखाती हैं? इसका कारण यह है कि समग्र सामाजिक परिवेश ऐसा बना देता है कि महिलाओं को पुरुषों के बराबर रुतबा नहीं मिल सकता, और इसलिए महिलाओं को पुरुषों को रास्ता देना पड़ता है और उनके लिए अनुकूल स्थितियाँ बनानी पड़ती हैं और पुरुषों को संतुष्ट करने के लिए कई कुर्बानियाँ देनी पड़ती हैं और एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। ऐसा समाज के कारण, शैतान द्वारा संचालित विभिन्न बुरे चलनों के कारण होता है। तो अब इस लिहाज से सत्य समझने के बाद क्या “एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है” इस कहावत के बारे में एक निश्चित निष्कर्ष नहीं निकलता है? (हाँ।) यह कहावत भ्रामक है और सत्य के अनुरूप नहीं है, है ना? (हाँ।) वास्तविक स्थिति सुनने के बाद क्या महिलाओं को ऐसा नहीं लगता है कि उन्होंने इन सारे वर्षों में बहुत दुःखी और घुटन भरा जीवन जिया है? तो क्या अब भी महिलाओं को अपने कद्रदानों के लिए सजना-सँवरना चाहिए? (नहीं।) सृजित मानवजाति की सदस्य होने के नाते महिलाएँ पुरुषों से सिर्फ लिंग और शरीर-रचना में अलग होती हैं; दूसरे पहलुओं में उनमें बिल्कुल कोई भी अंतर नहीं है। परमेश्वर की नजर में पुरुषों और महिलाओं के रुतबे में किसी प्रकार का कोई अंतर नहीं है। परमेश्वर ने कभी भी, किसी भी हालात में, महिलाओं से ऐसी अपेक्षाएँ नहीं रखी हैं जो पुरुषों से उसकी अपेक्षाओं से अलग हों। परमेश्वर द्वारा चुने गए लोगों की संख्या, उद्धार की उम्मीद, कर्तव्यों को करने के उनके अवसर, उनके द्वारा निर्वहन किए जा सकने वाले कर्तव्य और उनके द्वारा किए जा सकने वाले कार्य जैसे पहलुओं में महिलाएँ मूल रूप से पुरुषों के बराबर हैं; महिलाएँ पुरुषों से कमतर नहीं हैं। यही वास्तविक स्थिति है।
इससे पहले हमने उन दुष्ट लोगों की लम्पटता, व्यभिचारिता और उत्तेजकता की अभिव्यक्तियों के बारे में बात की थी जिनमें दानवों का प्रकृति सार है और इस बारे में भी बात की थी कि जब रूमानी रिश्ते बनाने या जीवन-साथी तलाश करने की बात आती है, तो अगर दुष्ट लोग सामने आ जाते हैं तो उनसे कैसे पेश आना है। क्या तुम लोग ऐसे व्यक्ति से मिलने की उम्मीद करते हो ताकि तुम एक बार प्रेम लीला का अनुभव कर सको, एक बार बेपरवाह होकर कार्य कर सको और एक बार खुद को तुष्ट कर सको? (नहीं।) तो क्या तुम लोग अपने सपनों के प्रेमी, अपने हमसफर, अपने आदर्श पुरुष या आदर्श महिला से मिलने की उम्मीद करते हो? (नहीं।) इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम इसकी उम्मीद करते हो या नहीं। यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि तुममें इन लम्पट, व्यभिचारी और उत्तेजक लोगों का भेद पहचानने की क्षमता होनी चाहिए, जिनका प्रकृति सार दुष्ट है, और तुम्हें उनसे दूर रहना चाहिए। अविश्वासी लोगों के शब्दों में कहा जाए तो इनमें से ज्यादातर लोग अनुभवी खिलाड़ी, बाँके और रूमानी होते हैं। ज्यादातर वयस्कों में इस प्रकार के लोगों के सामने आते ही उन्हें पहचान लेने की क्षमता होनी चाहिए; शायद एक-दो बार बातचीत के बाद ज्यादातर वयस्क यह जान जाएँगे कि वे इस प्रकार के हैं। इस तरह का व्यक्ति जब डोरे डालता है तब भेद नहीं करता है; तुम्हारी उम्र चाहे कितनी भी हो, जब तक तुम देखने में यथोचित रूप से सुंदर हो, वह तुम पर डोरे डाल सकता है जिससे रत्ती भर भी यह पता चले बिना कि क्या चल रहा है तुम उसके जाल में फँस सकते हो। वह तुमसे हमेशा कोमल और सौम्य शब्द बोलता है और तुम्हारे प्रति चिंता, परवाह दिखाता और ध्यान देता है। वह तुम्हें कामुक नजरों से देखने के, तुम्हें चाय या पानी पिलाने के और कभी-कभी तुम्हारे लिए छोटे-मोटे तोहफे, चॉकलेट वगैरह तक खरीदने के मौके ढूँढ़ लेता है। जब तुम पूरी तरह से असावधान होते हो तो वह तुम्हारी सुरक्षा की दीवारों को भेदकर तुम्हारे दिल में प्रवेश कर जाता है। अनजाने में उसके बारे में सोचने भर से ही तुम्हारे दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं; अगर तुम कुछ दिन उसे नहीं देखते हो तो तुम्हें लगता है जैसे कहीं कुछ कमी है और तुम सोचते हो, “मेरे आस-पास कोई भी मेरी उतनी परवाह नहीं करता जितनी वह करता है। लगता है मुझे उससे प्रेम हो गया है। क्या उसे भी मुझसे प्रेम हो गया है?” यह किस तरह की अवस्था है? (प्रलोभन में पड़ना।) कुछ अनुभवी खिलाड़ी दूसरों को जाने देकर उन्हें शीशे में उतारने में माहिर होते हैं; कुछ समय तक तुम्हारे प्रति चिंता दिखाने और तुम्हारी भूख बढ़ाने के बाद वे तुमसे सारे संपर्क तोड़ देते हैं और तुम्हें खुद ही उनके जाल में फँसने के लिए मजबूर कर देते हैं। जब तुम्हें एहसास होता है कि तुम्हें उनसे प्रेम हो गया है और तुम उनके बिना जी नहीं सकते, तो इसका मतलब है कि तुम उनके प्रेम जाल में फँस चुके हो और तुम सम्मोहित हो चुके हो। एक बार सम्मोहित हो जाने पर तुम पूरी तरह से उनके चंगुल में फँस जाते हो। यह प्रेम जाल क्या है जिसमें लोग फँस जाते हैं? यह पारिवारिक स्नेह, दोस्ती या लोगों में आपस में परवाह और प्रेम नहीं है, बल्कि यौन इच्छा का जाल है। एक बार जब तुम यौन इच्छा के जाल में फँस जाते हो तो तुम आसानी से नियंत्रण खो सकते हो। पंचानवे प्रतिशत से ज्यादा लोग, विशेष रूप से युवा, इससे उबर नहीं पाते हैं और ऐसे जाल से मुक्त नहीं हो पाते हैं। तो फिर क्या करना चाहिए? चूँकि तुम जानते हो कि ऐसे जाल से मुक्त होना बहुत मुश्किल है, इसलिए खुद को इसमें फँसने ही मत दो। उन लोगों, चीजों या परिवेशों से दूर रहने के सारे संभव प्रयास करो जो तुम्हें इस जाल में ले जा सकते हैं। कुछ समय के लिए अपनी दूरी बनाए रखो और परमेश्वर से प्रार्थना करो और परमेश्वर के वचन पढ़ो। धीरे-धीरे तुम्हारी यौन जरूरतें हल्की पड़ जाएँगी और गायब हो जाएँगी, तुम पर अब इस जाल का नियंत्रण और नहीं रहेगा और तुम लगभग इस प्रलोभन पर काबू पा चुके होगे। हालाँकि यह नहीं पता कि अगली बार जब तुम्हारे सामने ऐसे प्रलोभन और जाल आएँगे तो तुम कैसा करोगे, तुम उन पर काबू पा सकोगे या नहीं। एकमात्र तरीका है प्रार्थना करने और सत्य की तलाश करने के लिए बार-बार परमेश्वर के सामने आना और विभिन्न प्रलोभनों से दूर रहना। यकीनन खुद को सत्य से सुसज्जित करना और सत्य समझना सबसे मूलभूत चीजें हैं। लेकिन खुद को सत्य से सुसज्जित करना आसान नहीं है; इसके लिए तुमसे कुछ अनुभवों से गुजरने की अपेक्षा की जाती है और तुम्हारा आध्यात्मिक कद इतनी जल्दी नहीं बढ़ता, इसलिए विभिन्न पहलुओं में तुम्हारे बचाव भी इतनी जल्दी स्थापित नहीं किए जा सकते हैं। तो फिर क्या करना चाहिए? तुम्हें अक्सर परमेश्वर के सामने रहना चाहिए, तुम्हारे पास परमेश्वर के वचनों का मार्गदर्शन, पवित्र आत्मा का कार्य और परमेश्वर की सुरक्षा होनी चाहिए। ये सभी चीजें मौजूद होने से और साथ ही तुम्हारे व्यक्तिगत संकल्प से, ऐसे प्रलोभनों से सामना होने पर तुम्हारे पास बचाव के उपाय होंगे। इसके अलावा, जब तुम मामले की प्रकृति और उसके दुष्परिणामों को जानते हो तो तुम जानबूझकर ऐसे परिवेशों से बचोगे जिससे यह साबित होगा कि तुममें ऐसे प्रलोभनों को अस्वीकार करने का संकल्प है। तब तुम्हारे रवैये और तुम्हारी व्यक्तिपरक इच्छा के कारण परमेश्वर ऐसे प्रलोभनों से बचने में तुम्हारी मदद करेगा। अगर तुम्हारे सामने ऐसा परिवेश आ जाता है और तुम अपने दिल में विमुखता और नफरत महसूस करते हो, लेकिन तुम्हें नहीं पता कि कैसे मना करना है, तो परमेश्वर से प्रार्थना करो, उससे तुम्हारी रक्षा करने और तुम्हारे लिए ऐसे परिवेश को हटाने के लिए कहो। जब तुम्हारे पास ऐसी प्रार्थनाएँ और इच्छाएँ होती हैं तो शायद कलीसियाई कार्य की जरूरतों के कारण जो व्यक्ति तुम्हारे लिए खतरनाक प्रलोभन पेश करता है, उसे तुमसे हटा दिया जाएगा जिससे उसके लिए तुमसे दोबारा संपर्क करना असुविधाजनक हो जाएगा और फिर वह तुम्हारे सामने और नहीं आएगा। यह परमेश्वर द्वारा तुम्हारी मदद करना है; यह परमेश्वर की सुरक्षा है। क्योंकि परमेश्वर तुम्हारी व्यक्तिगत इच्छा, रवैये, दृढ़ निश्चय और संकल्प को देखता है, इसलिए वह तुम्हारी इच्छा पूरी करने में सक्रियता से और पूरी तरह से तुम्हारी मदद करेगा जिससे तुम्हारी रक्षा करने का नतीजा प्राप्त होगा। जब यह व्यक्ति चला जाता है और तुम्हें अब और परेशान नहीं करता है, तो हो सकता है कि तुम अंदर से जरा-सा खालीपन महसूस करो, यह सोचो कि अफसोस कि वह चला गया और यहाँ तक कि यह ख्वाब भी देखो, “काश वह अब भी यहाँ होता तो क्या हम अच्छी तरह साथ निभा पाते?” कभी-कभार ऐसे विचार आ सकते हैं, लेकिन परमेश्वर की सुरक्षा के कारण अंत में तुम्हें प्रलोभन से दूर रखा जाता है। अनजाने ही यह मामला धीरे-धीरे तुम्हारे दिल में धुंधला पड़ जाता है, यह धीरे-धीरे तुमसे दूर चला जाता है और समय के साथ तुम अपनी शांति वापस पा लेते हो, अपने जीवन की पुरानी स्थिति और सामान्य मानसिकता में लौट आते हो। इस मौके पर यह मामला समाप्त हो जाता है। इसने तुम्हारे लिए कोई खतरा या विघ्न खड़ा नहीं किया है, बल्कि यह शैतान पर तुम्हारी जीत और दानव से तुम्हारे दूर रहने और उसे अस्वीकार करने का एक तगड़ा प्रमाण और गवाही बन गया है। क्या यह बहुत अच्छा नहीं है? (हाँ।) जब यह प्रलोभन तुम्हारे लिए खतरा बनने ही वाला था, उस खतरनाक क्षण में, तुम्हारे रवैये और सहयोग के कारण, परमेश्वर ने तुम्हारी रक्षा की। परमेश्वर ने तुम्हारे लिए एक उपयुक्त परिवेश तैयार किया, जिससे तुम दृढ़ रह सको। यह तुम्हारे आध्यात्मिक कद के विकास को बढ़ावा देता है; यह तुम्हारे विश्वास को बढ़ाएगा, सत्य का अभ्यास करने के तुम्हारे संकल्प और तुम्हारी इच्छा को बढ़ाएगा, तुम्हें प्रेरणा देगा और तुम्हारे आध्यात्मिक कद को बढ़ने देगा। जब यह प्रलोभन तुम्हारे सामने आता है तो यदि तुम इसे अस्वीकार करने या इससे बचने के अनिच्छुक होते हो, तुममें सत्य का अभ्यास करने की इच्छा की कमी होती है, तुम इसे स्वतंत्र रूप से विकसित होने देते हो और इस प्रलोभन को स्वीकार करने के इच्छुक हो, यहाँ तक कि शैतान के उत्पीड़न और जाल में फँसाए जाने को स्वीकार करने के इच्छुक हो, और तुम इस तरह की स्थिति का अधिकाधिक आनंद लेने लगते हो, ऐसे परिवेश में रहने के इच्छुक हो और तुम सक्रिय रूप से परमेश्वर से ऐसे परिवेश को हटाने के लिए प्रार्थना नहीं करते हो—तो यह देखते हुए कि इस मामले के प्रति तुम्हारा रवैया ऐसा है, परमेश्वर तुम्हें मजबूर नहीं करेगा। परमेश्वर अपने क्रियाकलापों में कभी किसी को बाध्य नहीं करता है। चूँकि तुम इस व्यक्ति को बहुत पसंद करते हो, चूँकि तुम महसूस करते हो कि वह तुम्हें बहुत बड़ी खुशी और आनंद दे सकता है, तुम्हें सुख दे सकता है, इसलिए परमेश्वर तुम्हें इस खुशी और आनंद से वंचित नहीं करेगा और न ही परमेश्वर इस व्यक्ति को तुमसे दूर करेगा। जहाँ तक नतीजों की बात है, तो उन्हें तुम्हें अकेले ही भुगतना पड़ेगा। होता यह है कि धीरे-धीरे तुम दानवों के, दुष्टों के, लम्पट और व्यभिचारी लोगों के प्रलोभन और वासना भरे अनुचित संबंधों में फँसते चले जाते हो और अंत में अपने जमीर की निंदा और परमेश्वर की मौजूदगी खो बैठते हो। देह की यौन इच्छाओं में लिप्त होने की खुशी और आनंद का मजा लेने के बाद तुम्हें कोई शर्म महसूस नहीं होती है और तुम खुद को ऐसे प्रलोभन से दूर नहीं कर पाते हो—इसे ही खुद को अनैतिकता के हवाले कर देना कहते हैं। तुम्हें लगता है कि तुम सबसे खुश व्यक्ति हो, तुम इस खुशी और आनंद का भरपूर मजा लेते हो, ऐसी खुशी और आनंद पाकर खुद को खुशकिस्मत समझते हो और ऐसे प्रेम जाल में फँसे रहकर बहुत संतुष्ट रहते हो। तो फिर अब भी परमेश्वर क्या कर सकता है या क्या कह सकता है? परमेश्वर तुम्हें कोई संकेत नहीं देगा, किसी बात की चेतावनी नहीं देगा और कुछ भी नहीं करेगा। बस आगे बढ़ो और मजे करो। यौन इच्छाओं के जाल में फँसे लोगों के अंतिम नतीजों का पहले से अनुमान लगाया जा सकता है। कोई भी व्यक्ति जो प्रेम जाल में फँसता है, अंत में खुश या आनंदित नहीं होता है; इसके विपरीत, इसका परिणाम सिर्फ दर्दनाक और दुखद ही हो सकता है। ऐसे नतीजे अकेले तुम्हें ही भुगतने पड़ेंगे और तुम्हें ही इन्हें भुगतना चाहिए। क्या परमेश्वर सिद्धांतों से कार्य करता है? (हाँ।) परमेश्वर तुम्हारे चुनावों का सम्मान करता है। यह मत सोचो, “परमेश्वर मुझ पर नजर रखेगा और मुझे काबू में रखेगा; वह मुझे डेट पर नहीं जाने देगा और न ही मुझे अपनी यौन जरूरतें पूरी करने देगा।” तुम गलत समझ रहे हो; परमेश्वर तुम्हारे मामलों में दखल नहीं देता है। परमेश्वर प्रलोभन में पड़ने से, कुकर्मियों द्वारा गुमराह किए जाने से, शैतान द्वारा बरबाद किए जाने और बुरी तरह से नुकसान पहुँचाए जाने से तुम्हारी रक्षा करना चाहता है। लेकिन अगर तुम शैतान से सहमत होने का चुनाव करते हो तो परमेश्वर कहता है कि यह तुम्हारी आजादी और तुम्हारा चुनाव है; जब तक तुम इच्छुक हो, जब तक तुम्हें इसका पछतावा नहीं होता है, तब तक परमेश्वर तुम्हें बाध्य नहीं करेगा; तुम जो बोओगे वही तुम अकेले काटोगे और जब समय आएगा और तुम फूट-फूटकर रो रहे होगे, तब यह शिकायत मत करना कि परमेश्वर ने तुम्हें याद नहीं दिलाया और यह शिकायत मत करना कि परमेश्वर ने तुम्हारी रक्षा नहीं की। परमेश्वर तुम्हारी रक्षा करना चाहता है, परमेश्वर चाहता है कि तुम प्रलोभन से दूर रहो, लेकिन तुम मना कर देते हो। अगर परमेश्वर उस व्यक्ति को तुमसे दूर कर दे जिसे तुम पसंद करते हो, जिसके साथ तुम प्रेम जाल में उलझे हुए हो, तो तुम उसे ढूँढ़ने निकल पड़ोगे, तुम पागलों की तरह कार्य करोगे, तुम काबू खो दोगे, तुम परमेश्वर के बारे में शिकायत करोगे, परमेश्वर को तुम्हारी भावनाओं के प्रति विचारशील नहीं होने और तुम्हारी कठिनाइयों को नहीं समझने के लिए बुरी तरह फटकारोगे। इसलिए परमेश्वर ऐसा नहीं करेगा; परमेश्वर लोगों से वे चीजें नहीं करवाएगा जिन्हें करने के वे इच्छुक नहीं हैं। चूँकि तुमने वह मार्ग खुद चुना, इसलिए अंत में उत्पन्न होने वाले भयानक नतीजे अकेले तुम्हें ही भुगतने पड़ेंगे। तुम्हारी तरफ से यह वार कोई नहीं सहेगा। क्या अब यह मामला स्पष्ट है? (हाँ।)
अगर कुछ लोग दानवों और शैतानों द्वारा—दुष्ट लोगों द्वारा—जाल में फँसाए जाने का सामना करते हैं और उन्हें अस्वीकार नहीं करते हैं, बल्कि उनके साथ अपना जीवन बिताने के इच्छुक होते हैं, तो यह उनका अपना चुनाव है। जब अंत में इसके कड़वे नतीजे निकलते हैं तब उन्हें दूसरों पर इल्जाम नहीं लगाना चाहिए; खुद बहुत ही घटिया और बहुत ही विकृत होने के कारण उन्हें खुद से नफरत करनी चाहिए और अपने गाल पर तमाचे मारने चाहिए और खुद को कोसना चाहिए। अंत में तुम जिस कड़वे फल की फसल काटते हो, उसका परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं है। यह मत कहना, “परमेश्वर ने मेरी रक्षा क्यों नहीं की? परमेश्वर ने मुझे उस समय क्यों नहीं रोका?” मैं तुम्हें बताता हूँ, परमेश्वर का ऐसा कोई दायित्व नहीं है; उसे तुमसे जो कहना चाहिए वह उसने तुम्हें पहले ही स्पष्ट रूप से बता दिया है। तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसके पास स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता है; परमेश्वर ने तुम्हें स्वतंत्र इच्छा दी है और तुम्हें स्वतंत्र रूप से चुनने का अधिकार है। इसलिए जब तुम्हारे सामने कोई चीज आती है तो परमेश्वर तुम्हें चुनने का अधिकार देता है। चूँकि तुम्हें चुनने का अधिकार है, इसलिए अंत में तुम्हें जो कड़वा फल मिलेगा, वह तुम्हारे अपने चुनाव से उपजा होता है, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं करनी चाहिए या जहाँ भी हो सके इल्जाम नहीं लगाना चाहिए। परमेश्वर तुम्हें सत्य बताने और उद्धार का मार्ग दिखाने का कार्य करता है। जहाँ तक यह प्रश्न है कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करना चुनते हो या शैतान का, वह तुम्हारी मर्जी है। अगर तुम एक धन्य व्यक्ति हो और सत्य का अनुसरण करने के इच्छुक हो तो फिर परमेश्वर का अनुसरण करो। अगर तुम सत्य से प्रेम नहीं करते हो, बल्कि दुनिया और दुष्टता से प्रेम करते हो—अगर तुम्हारा जीवन सिर्फ एक बेकार जीवन है—तो शैतान का अनुसरण करना चुनो; तुम्हें कोई नहीं रोक रहा है। आज भी कुछ लोग परमेश्वर और परमेश्वर के घर को गलत समझते हैं, हमेशा शिकायत करते रहते हैं, “मेरी उम्र पहले ही तीस-चालीस वर्ष हो चुकी है, मैंने डेटिंग या शादी नहीं की है—परमेश्वर का घर इसकी अनुमति नहीं देता!” परमेश्वर के घर ने कब किसी को डेट पर जाने या शादी करने से प्रतिबंधित किया है? यह तुम्हारी आजादी है; परमेश्वर का घर इसमें दखल नहीं देता है। हालाँकि एक शर्त है : अगर तुम ऐसा करते हो तो फिर तुम पूर्णकालिक कर्तव्य वाली कलीसिया में अपना कर्तव्य नहीं कर सकते क्योंकि रूमानी रिश्ते में होने से और अपना कर्तव्य करने का अब और मन नहीं होने से कलीसिया के कार्य में बाधा आएगी। अगर तुम सचमुच डेट पर जाना और शादी करना चाहते हो तो फिर पहले वह कार्य किसी और को सौंप दो जिसके लिए तुम जिम्मेदार हो और हम अस्थायी तौर पर अपने रास्ते अलग कर लेंगे। क्या हर किसी को इस बारे में सिद्धांत स्पष्ट हैं? (हाँ।) अगर कोई डेटिंग या शादी करना चाहता है तो यह बिल्कुल ठीक है; कोई भी इसे प्रतिबंधित नहीं करता है। हालाँकि विपरीत लिंग के लोगों पर बिना किसी भेद विचार के डोरे डालना और कलीसियाई जीवन में बाधा डालना स्वीकार्य नहीं है। जो लोग दूसरों पर बिना किसी भेद विचार के डोरे डालते हैं, वे दानव हैं; वे दुष्ट, लम्पट और व्यभिचारी लोग हैं और परमेश्वर का घर ऐसे लोगों की मौजूदगी की बिल्कुल भी अनुमति नहीं देता है। इस प्रकार का व्यक्ति चाहे लोगों के किसी भी समूह में हो, वह बिना किसी भेद विचार के दूसरों पर डोरे डालता है और उनका उत्पीड़न करता है। वह एक अभिशाप की तरह आतंक फैलाता है और लोगों को हमेशा बेचैन और असहज महसूस करवाता है। वह जहाँ भी कलीसियाई जीवन जीता है, उसकी बाधाएँ गंदा परिवेश बनाती हैं और कलीसिया को अव्यवस्थित गंदगी में बदल देती हैं। वह न सिर्फ कलीसिया के कार्य को तहस-नहस करता है, बल्कि अपना कर्तव्य करने वाले भाई-बहनों की सामान्य व्यवस्था में भी बाधा डालता है। ऐसे लोगों पर कड़ी नजर रखनी चाहिए और उन्हें प्रतिबंधित करना चाहिए और जो लोग गंभीर प्रभाव डालते हैं उन्हें अलग-थलग कर देना चाहिए या बाहर निकाल देना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, “मैंने सिर्फ कुछ ही लोगों को नुकसान पहुँचाया है—यह कोई बड़ी समस्या नहीं है, है ना?” अगर तुम कुछ लोगों को नुकसान पहुँचा सकते हो तो तुम दर्जनों लोगों को भी नुकसान पहुँचाने में सक्षम हो। तुम बस इसी किस्म की घटिया चीज हो। कलीसिया में बेतहाशा दूसरों पर डोरे डालना और अनुचित तरीके से यौन इच्छा अभिव्यक्त करना—इस तरह से लोगों को नुकसान पहुँचाना—अस्वीकार्य है। अगर तुम लोगों पर डोरे डालना चाहते हो तो अविश्वासी लोगों की दुनिया में ऐयाशी की जगहों पर चले जाओ; वहाँ तुम्हें कोई नहीं रोकेगा। लेकिन परमेश्वर का घर, वह जगह जहाँ भाई-बहन अपने कर्तव्य करते हैं, गंभीर, शांत और पवित्र है; यह किसी भी दानव या शैतान को इसमें बाधा डालने या तोड़-फोड़ करने की अनुमति नहीं देता है। अगर कोई कलीसिया को डेटिंग करने की या अनैतिकता की जगह में बदलना चाहता है, अपनी इच्छानुसार यौन इच्छा में लिप्त होना चाहता है तो यह बिल्कुल अस्वीकार्य है! यह कलीसिया है, परमेश्वर के कार्य का स्थल है, वह जगह है जहाँ पवित्र आत्मा लोगों को शुद्ध करने और पूर्ण बनाने के लिए कार्य करता है। चाहे पुरुष हो या महिला, सभी को गरिमापूर्ण और सभ्य होना चाहिए और उचित कार्य करना चाहिए। दूसरों पर बिना किसी भेद विचार के डोरे डालने की अनुमति नहीं है और न ही अनुचित रूप से यौन इच्छा अभिव्यक्त करने की अनुमति है। अगर तुम अपनी यौन इच्छा को नियंत्रित नहीं कर सकते और बस उसे अभिव्यक्त करना चाहते हो तो शादी के लिए कोई उपयुक्त व्यक्ति चुन लो; कलीसिया में दूसरों पर बिना किसी भेद विचार के डोरे मत डालो। जो कोई भी बिना किसी भेद विचार के डोरे डालता है और भाई-बहनों की नाराजगी को उकसाता है उसे तुरंत बहिष्कृत या निष्कासित कर देना चाहिए ताकि वह कलीसियाई जीवन में बाधा न डाले। समझे? (समझ आ गया।) पुरुषों और महिलाओं के बीच सीमाएँ होनी चाहिए। अगर कोई पुरुष हमेशा महिलाओं के समूह में घूमता रहता है, कार्य के कारणों से नहीं और न ही इस कारण से कि ऐसे महत्वपूर्ण मामले हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है, बल्कि महिलाओं के बीच अपना दिखावा करने, यौन इच्छा अभिव्यक्त करने और उन पर बिना किसी भेद विचार के डोरे डालने के लिए, तो यह उत्पीड़न है। अगर कोई महिला किसी कारणवश या बिना किसी कारण के हमेशा पुरुषों के समूहों में घूमती रहती है, हमेशा उन पर बेतहाशा डोरे डालती है, उन्हें कामूक नजरों से देखती है और अपने आकर्षण का प्रदर्शन करती है तो उससे भी दानव की तरह निपटा जाना चाहिए। अगर तुम सामान्य रूप से कार्य पर चर्चा या संगति कर रहे हो तो यह स्वीकार्य है, लेकिन दूसरों पर बिना किसी भेद विचार के डोरे डालना और इश्कबाजी करना स्वीकार्य नहीं है। ऐसा कोई भी व्यवहार जिससे हंगामा होता है वह कलीसियाई जीवन में बाधा डालने वाला और कलीसियाई कार्य की सामान्य व्यवस्था को नष्ट करने वाला व्यवहार होता है और परमेश्वर के घर में इसकी अनुमति नहीं है। सभी को इन लम्पट, व्यभिचारी, यौन उत्तेजक दानवों को अस्वीकार करना चाहिए और उनसे दूर रहना चाहिए। जब ज्यादातर लोग उन्हें अस्वीकार करने, उजागर करने और उनसे दूर रहने के लिए उठ खड़े होंगे, यह सुनिश्चित करेंगे कि दूसरों पर डोरे डालने के उनके प्रयास विफल हो जाएँ और ऐसा कर देंगे कि वे किसी भी परिस्थिति में अपनी मनमानी न कर पाएँ, तो वे धीरे-धीरे अपनी हरकतें बंद कर देंगे। अगर वे सामान्य रूप से अपना कर्तव्य नहीं कर सकते हैं और जब भी उन्हें खाली समय मिलता है, वे बस बेतहाशा दूसरों पर डोरे डालते हैं और उन्हें परेशान करते हैं, रूमानी रिश्तों में लिप्त रहने के लिए भाग-दौड़ करते रहते हैं और रूमानी रिश्ते में होने के एहसास का मजा लेते हैं, तो उन्हें तुरंत बाहर निकाल दो। जल्दी से इस पेचीदा गुत्थी को सुलझा डालो और इन अनैतिक व्यक्तियों से निपटो—उन्हें लोगों को बाधित करने का कोई मौका मत दो। क्या हमारी संगति के जरिये अब यह मामला स्पष्ट हो गया है? (हाँ।) क्या तुम लोगों ने कुछ प्राप्त किया है? क्या तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग है? क्या अब तुम्हारे पास इस प्रकार के लम्पट और व्यभिचारी व्यक्ति का भेद पहचानने की क्षमता है? (हाँ।) क्या तुम इस बात पर स्पष्ट हो कि तुम्हें कैसे आचरण करना है, अपने उचित स्थान पर कैसे बने रहना है और सामान्य मानवता में तुम्हें जो करना चाहिए, उसे कैसे करना है? (हाँ।) इसमें ऐसे सत्य हैं जो लोगों को समझने चाहिए और भेद पहचानने के ऐसे सिद्धांत हैं जिन पर उन्हें स्पष्ट होना चाहिए और यकीनन ऐसे सत्य सिद्धांत भी हैं जिनका लोगों को अभ्यास करना चाहिए और ऐसे मार्ग हैं जिन्हें उन्हें अपनाना चाहिए। इन सब बातों को स्पष्ट कर दिए जाने से यह मामला पूरी तरह से प्रस्तुत कर दिया गया है।
आज की हमारी संगति के लिए बस इतना ही। अलविदा!
11 फरवरी 2024
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?