सत्य का अनुसरण कैसे करें (15) भाग दो
ग. विचित्रता
दानवों से पुनर्जन्म लेने वालों में विकृति के भीतर लंपटता, व्यभिचारिता और कामोत्तेजकता की अभिव्यक्तियों के बारे में संगति करने के बाद आओ, विकृति की एक और अभिव्यक्ति—विचित्रता—के बारे में संगति करें। “विचित्र” शब्द बहुत विषयवस्तु समेटे हुए है, जिसका निश्चित रूप से विचित्रता की विशिष्ट अभिव्यक्तियों से कुछ संबंध है। विचित्र होने के अलावा अलौकिक, अतिवादी और असामान्य होने जैसी अभिव्यक्तियाँ भी हैं; ये सभी उन लोगों की विकृत अभिव्यक्तियाँ हैं जो शैतान और दानव हैं। ये पहलू—विचित्र, अलौकिक, अतिवादी और असामान्य होना—ऐसी चीजें हैं जिन्हें लोग समय-समय पर दैनिक जीवन में या दूसरों के साथ अपने मेल-जोल में देखते हैं। आओ, सबसे गंभीर मामलों से शुरू करें, फिर औसत दर्जे के मामलों पर चर्चा करेंगे। हर हाल में, चाहे यह किसी भी रूप में अभिव्यक्त हो, इन सबमें विकृति का प्रकृति सार शामिल है। सबसे गंभीर स्थिति बार-बार अनजान भाषाओं में बोलना है। यह विशेष रूप से सभाओं में प्रार्थना के दौरान होता है, जहाँ वे कुछ ऐसी विचित्र भाषाएँ बोल सकते हैं जो किसी भी जातीय समूह की भाषाएँ नहीं होतीं और जिन्हें कोई नहीं समझ सकता। जब ऐसा होता है, तब यह व्यक्ति स्वयं नहीं बोल रहा होता, बल्कि किसी और आत्मा के वशीभूत होता है। उसे खुद नहीं पता होता कि वह क्या कह रहा है; उसने उसे सीखा नहीं होता, न ही किसी ने उसे सिखाया होता है, फिर भी किसी खास स्थिति में वह बस बोल उठता है। वह अनजान भाषाओं में कभी अग्रसक्रिय रूप से, कभी निष्क्रिय रूप से, कभी सचेत रूप से, कभी अनजाने ही बोल पड़ता है। क्या यह बहुत अजीब नहीं है? उसके बोलना समाप्त करने के बाद अगर तुम उसे दोबारा ऐसा करने के लिए कहो, तो वह नहीं कर सकता। अगर तुम उससे पूछो कि उसने क्या कहा, तो इसका भी उसे पता नहीं होता। यह एक तरह की स्थिति है। ऐसे लोग भी हैं जो अक्सर ऐसी आवाजें सुनते हैं जिन्हें सामान्य लोग नहीं सुन सकते। उदाहरण के लिए, वे किसी को अपने आसपास बोलते हुए सुन सकते हैं, लेकिन दूसरे लोग ऐसे किसी व्यक्ति को देख या सुन नहीं सकते। असल में वे अनजान प्राणियों से बातचीत कर रहे और बोल रहे होते हैं। वे बड़े उत्साह से बोलते हैं और तुम उन्हें बीच में टोक नहीं सकते या एक शब्द भी बोल नहीं सकते। इसके अलावा, उनकी बातचीत की विषयवस्तु बेतरतीब होती है; शब्द अचानक बेमेल ढंग से और बिना किसी कारण के निकल पड़ते हैं। एक दर्शक के रूप में इसे देखकर तुम्हें डर लगता है और तुम्हारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। क्या ऐसी अभिव्यक्तियाँ बहुत विचित्र नहीं हैं? (हाँ, हैं।) ऐसे व्यक्ति को अक्सर अजीबोगरीब चीजें भी दिखाई देती हैं, ऐसी चीजें जो भौतिक संसार में खुली आँखों से दिखाई नहीं देतीं। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों को उनके दिवंगत रिश्तेदार हाथ हिलाते हुए, मुस्कुराते हुए, सिर हिलाते हुए, यहाँ तक कि उनका अभिवादन करते हुए भी दिखते हैं। यह देखकर वे विशेष रूप से उत्साहित हो जाते हैं। कुछ लोग तो अक्सर काले कपड़े पहनी आकृतियों को अपने पास आते और उनके हाथ-पैर बाँधते हुए भी देखते हैं; वे संघर्ष करते हैं और कह उठते हैं, “मुझे छोड़ दो! मैं नहीं जाऊँगा! मैं कहीं नहीं जा रहा!” उनके आसपास के लोग पूछते हैं कि क्या हुआ, लेकिन उन्हें यह आभास ही नहीं होता कि कोई उनसे बात कर रहा है और वे बस यह चिल्लाते हुए संघर्ष करते रहते हैं, “हे परमेश्वर, मुझे बचाओ! ...” काले कपड़े पहनी आकृतियाँ डरकर भाग जाती हैं और फिर वे वापस सामान्य हो जाते हैं। होश में आने के बाद वे अपने आसपास के लोगों से पूछते हैं कि क्या उन्होंने काले रंग की आकृतियाँ देखीं। सामान्य लोग उन्हें नहीं देख सकते; अगर देख सकते तो यह एक गंभीर समस्या होती। लेकिन ये लोग उन्हें देख सकते हैं और महसूस कर सकते हैं। एक और तरह की स्थिति होती है : कुछ लोग आमतौर पर शांत रहते हैं, मजाक करना या धींगामस्ती करना पसंद नहीं करते, लेकिन किसी तरह अचानक वे अपनी जगह पर घूमना शुरू कर देते हैं, रोने लगते हैं, हँसने लगते हैं, हंगामा मचाने लगते हैं और उन्हें बहुत पसीना आ जाता है। कुछ तो अचानक साँपों की तरह जमीन पर रेंगने भी लगते हैं या कुछ लोग बत्तखों की तरह चलने लगते हैं। अचानक एक जीवित इंसान जानवर में बदल जाता है; उसकी चाल-ढाल और क्रियाकलाप बिल्कुल जानवर जैसे, इंसान से बिल्कुल अलग, हो जाते हैं। वह समय-समय पर ये अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करता है। क्या यह विचित्र नहीं है? (हाँ, है।) क्या ये विचित्र अभिव्यक्तियाँ अलौकिक नहीं हैं? (हाँ, हैं।) ये अभिव्यक्तियाँ बहुत अलौकिक हैं। अलौकिक का अर्थ है असामान्य, प्राकृतिक या सामान्य परिस्थितियों से परे—इसे अलौकिक कहते हैं। यह असाधारण है, साधारण लोगों की सामान्य अभिव्यक्तियों से अलग है; यह असामान्य है। इसे विचित्र, अलौकिक, असामान्य होना कहते हैं। बेशक, इन अभिव्यक्तियों का अतिवादी होने से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन विचित्र, अलौकिक और असामान्य होने की प्रकृति को देखते हुए इन अभिव्यक्तियों में विकृत सार है और ये देह वाले सामान्य भ्रष्ट मनुष्यों की अभिव्यक्तियों के अनुरूप नहीं हैं। देह वाले सामान्य मनुष्य इंसानी प्रवृत्तियों, स्वतंत्र इच्छा, सामान्य सोच, विवेक और विभिन्न सामान्य इंसानी क्षमताओं द्वारा सीमित, संयमित और नियंत्रित होते हैं। लेकिन जो दानव हैं, उनमें ये विचित्र, अलौकिक, असामान्य अभिव्यक्तियाँ पहले ही सामान्य इंसानी प्रवृत्तियों, स्वतंत्र इच्छा, क्षमताओं, सामान्य सोच और सामान्य समझ के दायरे से परे जा चुकी होती हैं। अर्थात्, वे अब सामान्य मानवता द्वारा नियंत्रित नहीं होतीं; वे नियंत्रण से बाहर हैं। नियंत्रण से बाहर होने का अर्थ है असामान्य ढंग से क्रियाकलाप करना। उनमें कुछ असामान्य अभिव्यक्तियाँ और अभ्यास दिखाई देते हैं जो सामान्य लोगों को प्रदर्शित नहीं करने चाहिए। इसका अर्थ है कि ऐसे लोग सामान्य समझ, सामान्य सोच या स्वतंत्र इच्छा से नियंत्रित नहीं होते, बल्कि किसी बाहरी चीज या किसी दुष्ट आत्मा से नियंत्रित और संचालित होते हैं, जिससे वे सामान्य मानवता से परे की चीजें करते हैं, ऐसी चीजें जो अथाह, हैरान करने वाली और दूसरों के लिए सिहरन पैदा करने वाली तक होती हैं। इसे विचित्र, अलौकिक, असामान्य होना कहते हैं। मुझे बताओ, क्या ये अभिव्यक्तियाँ विकृत नहीं हैं? (हाँ, हैं।) ये विचित्र अभिव्यक्तियाँ निश्चित रूप से विकृत कही जा सकती हैं। दानवों से पुनर्जन्म लेने वालों में कई विचित्र अभिव्यक्तियाँ होती हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग अक्सर अपने साथ किसी को ऊलजलूल ढंग से बोलते सुनते हैं, लेकिन दूसरे इसे नहीं सुन सकते हैं। वे अक्सर अपने मन में एक आवाज भी सुनते हैं जो उनसे बात करती है, उन्हें यह या वह करने का निर्देश देती है। कुछ लोग हमेशा ऐसी चीजें देख सकते हैं जिन्हें सामान्य लोग नहीं देख सकते या महसूस नहीं कर सकते। वे कहते हैं, “मैंने सड़क पर तोपों और टैंकों के साथ सैनिकों की एक टुकड़ी गुजरते देखी, जिनकी संख्या एक-दो हजार नहीं तो तीन सौ से पाँच सौ जरूर होगी—वहाँ काफी हलचल थी!” दूसरे लोग ये चीजें नहीं देख सकते, लेकिन वे देख सकते हैं। हमें इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि वे जो देखते हैं वह तथ्यपरक है या आध्यात्मिक क्षेत्र की कोई परिघटना; यह तथ्य कि वे ये चीजें देख सकते हैं, बहुत असामान्य है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह असामान्य है? मैं क्यों कहता हूँ कि यह विकृति की अभिव्यक्ति है? क्योंकि किसी भी सामान्य व्यक्ति की परमेश्वर द्वारा सृजित ज्ञानेंद्रिय की निश्चित सीमाएँ हैं कि वह क्या अनुभव कर सकती है, चाहे वह आसपास का परिवेश हो या उसके आसपास के लोग, घटनाएँ और चीजें। ये सब देह की सहज प्रवृत्तियों द्वारा प्राप्य सीमा के भीतर अनुभव की जाती हैं; चाहे वे देह द्वारा देखी जा सकने वाली चीजें हों, सुनी जा सकने वाली चीजें हों, सूँघी जा सकने वाली चीजें हों या महसूस की जा सकने वाली चीजें हों, उनकी सीमाएँ होती हैं। ये सीमाएँ किसे संदर्भित करती हैं? ये भौतिक जगत के दायरे तक सीमित होने को संदर्भित करती हैं। तो फिर, परमेश्वर ने लोगों को ऐसी ज्ञानेंद्रियाँ क्यों दीं? इसलिए कि कोई भी चीज जो भौतिक जगत से संबंधित नहीं है, चाहे वह आध्यात्मिक क्षेत्र की कोई सकारात्मक चीज हो या नकारात्मक, लोगों के जीवन में हस्तक्षेप न करे, लोगों की किसी भी ज्ञानेंद्रिय में दखल न दे और भौतिक जगत में लोगों के जीवन के क्रम और प्रतिरूपों को प्रभावित न करे। इसलिए मनुष्य इस भौतिक जगत में रहते हैं, और भौतिक जगत के बाहर चाहे और जो कुछ भी मौजूद हो, परमेश्वर तुम्हें तुम्हारी दैहिक ज्ञानेंद्रियों के दायरे से बाहर इन चीजों को देखने, सुनने या महसूस करने नहीं देगा। यह तुम्हारे मन और विवेक को भौतिक जगत के बाहर के किसी भी प्राणी के हस्तक्षेप से बचाने के लिए है, ताकि तुम सामान्य रूप से जी सको। जब तक व्यक्ति का मन और विवेक सामान्य है, तब तक उसकी स्वतंत्र इच्छा सामान्य रूप से कार्य करेगी, उसका निर्णय सामान्य रहेगा और उसकी जन्मजात इंसानी स्थितियों के तमाम पहलू अपनी मूल अवस्था में, अक्षुण्ण रहेंगे। अक्षुण्ण होने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि तुम्हारा तंत्रिका-तंत्र, तुम्हारी ज्ञानेंद्रियाँ, तुम्हारी काबिलियत और तुम्हारी जन्मजात स्थितियों के तमाम दूसरे पहलू दैहिक जीवन के दायरे में सामान्य और सुदृढ़ हैं। जब मन और विवेक सामान्य होते हैं, तब व्यक्ति के ये तमाम पहलू सामान्य रहेंगे और अपनी मूल अवस्था बनाए रख पाएँगे। लोगों की ज्ञानेंद्रियाँ जो अनुभव कर सकती हैं, अगर वह देह द्वारा प्राप्य सीमा को पार कर जाती है और अब इस बाधा से बँधी नहीं रहती है, तो उनके मन और विवेक के साथ समस्याएँ उत्पन्न होंगी; वे भौतिक संसार से बाहर की चीजों से प्रभावित, क्षतिग्रस्त और बाधित होंगे। फिर उनकी तंत्रिकाओं के साथ समस्याएँ उत्पन्न होंगी और उनके मन अव्यवस्थित हो जाएँगे। इससे किस तरह की स्थिति उत्पन्न होगी? वे मानसिक रूप से बीमार हो जाएँगे; वे पागल हो जाएँगे, बकवास करेंगे, बेशर्मी से इधर-उधर भागेंगे, रोएँगे और हंगामा करेंगे। तब ऐसा व्यक्ति पूरी तरह से बर्बाद हो जाता है। बर्बाद होने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि व्यक्ति के दिल में कोई और चीज प्रवेश कर गई है, जो उसके मन और विवेक को परेशान और क्षतिग्रस्त कर रही है, जिससे उसका दिल सामान्य समझ से नहीं, बल्कि किसी और चीज से नियंत्रित हो रहा है। एक बार जब वह दूसरी चीज किसी व्यक्ति को नियंत्रित कर लेती है, तो चिकित्सकीय भाषा में, इसकी बाहरी अभिव्यक्ति सिजोफ्रेनिया होती है। एक बार जब कोई व्यक्ति सिजोफ्रेनिया से ग्रस्त हो जाता है, तो क्या वह अब भी एक सामान्य व्यक्ति रहता है? (नहीं।) वह अब एक सामान्य व्यक्ति नहीं रहता, और परमेश्वर ऐसे लोगों पर कार्य नहीं करेगा। समझे? (समझ गए।)
परमेश्वर लोगों को जो स्वतंत्र इच्छा, सामान्य सोच और जमीर और विवेक प्रदान करता है वे उनके लिए क्या भूमिका निभाते हैं? क्या वे लोगों के मन और विवेक की रक्षा करने की भूमिका नहीं निभाते? (हाँ।) लोगों के मन और विवेक की रक्षा करने की भूमिका निभाना लोगों की रक्षा करने की भूमिका निभाने के समान है; वे सुनिश्चित करते हैं कि लोगों की मानसिक स्थिति और विवेक सामान्य रहें, उनमें भौतिक संसार से बाहर की चीजों का हस्तक्षेप न हो, न ही वे भौतिक संसार से बाहर की किसी ध्वनि या छवि से बाधित हों। इससे लोग शांतिपूर्वक परमेश्वर में विश्वास कर पाते हैं और सामान्य रूप से जी पाते हैं और उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा सुनिश्चित होती है। यह एक अच्छी चीज है। लेकिन विचित्र, अलौकिक और असामान्य अभिव्यक्तियों से भरे लोगों में सामान्य लोगों जैसी स्वतंत्र इच्छा, सामान्य सोच और जमीर और विवेक नहीं होते। वे कभी भी, कहीं भी साधारण लोगों को दिखाई न देने वाली विचित्र चीजें या दृश्य देख सकते हैं, साधारण लोगों को सुनाई न देने वाली ध्वनियाँ सुन सकते हैं या साधारण लोगों द्वारा न की जा सकने वाली चीजें कर सकते हैं, विचित्र व्यवहार प्रदर्शित कर सकते हैं। उनके आसपास के लोग इसे नहीं समझ सकते और वे ऐसे मामलों के सार की असलियत जानने में असमर्थ होते हैं। ऐसे व्यक्ति का किसी दानव से पुनर्जन्म हुआ होता है; वह मानवजाति का हिस्सा नहीं होता। ऐसा नहीं है कि शैतान ने उन्हें जीवन में बाद में बंदी बनाया हो; ऐसा व्यक्ति मूल रूप से ही दानव होता है। सरल शब्दों में कहें तो, जो व्यक्ति दानव होता है, उसका मन और विवेक जन्म से ही सामान्य नहीं होते; अर्थात् उसकी स्वतंत्र इच्छा, सोच और विवेक, सब खराब होते हैं। अगर वह शिक्षा प्राप्त कर ले, तो भी उसमें सामान्य मानवता की ये चीजें नहीं होतीं। तुम उसे विशिष्ट परिस्थितियों में, जब उसे कोई दौरा नहीं पड़ता, अपेक्षाकृत सामान्य रूप से बोलते हुए देखते हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह सामान्य व्यक्ति है। उसमें ये विचित्र अभिव्यक्तियाँ होना दर्शाता है कि वह सामान्य व्यक्ति नहीं है, बल्कि अमानवीय है—दानव है। उसकी ये रहस्यमय, अलौकिक और असामान्य अभिव्यक्तियाँ किसी से सीखी नहीं गई होतीं, न ही किसी के द्वारा संप्रेषित की गई होती हैं। तो फिर ये कैसे घटित हुईं? ये जन्मजात होती हैं; ऐसे व्यक्ति का लक्षण दानव का होता है। दानव का लक्षण होने का क्या अर्थ है? इसके दो अर्थ हैं। पहला अर्थ यह है कि ऐसे व्यक्ति का पुनर्जन्म दानव से हुआ होता है। दूसरा यह है कि वह बिना मानव आत्मा के जन्म लेता है और बाद में कोई दानव उस पर कब्जा कर लेता है। संक्षेप में, ऐसे लोगों का प्रकृति सार दानव का होता है, इंसान का नहीं। चूँकि वे इंसान नहीं होते, ठीक इसलिए उनकी ज्ञानेंद्रियाँ और उनकी जन्मजात स्थितियों के तमाम पहलू सामान्य लोगों से भिन्न और विशिष्ट होते हैं। ज्ञानेंद्रियों के संदर्भ में, वे अक्सर ऐसी चीजें अनुभव कर सकते हैं जिन्हें सामान्य लोग अनुभव नहीं कर सकते, देख नहीं सकते या सुन नहीं सकते। दैहिक प्रवृत्तियों के संदर्भ में, वे चीजें जो वे करते या कहते हैं, उनकी कुछ अभिव्यक्तियाँ अक्सर लोगों को यह एहसास कराती हैं कि वे सामान्य इंसानी प्रवृत्तियों के दायरे से परे हैं; वे बहुत अलौकिक होती हैं। अलौकिक का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है दैहिक प्रवृत्तियों से परे जाना। सामान्य लोग दैहिक प्रवृत्तियों की पहुँच के दायरे से बाहर नहीं जा सकते हैं, लेकिन ये व्यक्ति ऐसा आसानी से कर लेते हैं; ये दैहिक प्रवृत्तियों द्वारा नियंत्रित या सीमित नहीं होते, इसलिए वे स्वाभाविक रूप से अक्सर विचित्र, अलौकिक और असामान्य व्यवहार या अभ्यास प्रदर्शित करते हैं। क्या अब तुम ऐसे व्यक्ति के सार के बारे में स्पष्ट हो? (हाँ।) क्या तुम लोग ऐसे व्यक्ति से ईर्ष्या करते हो? (नहीं।) क्या उससे ईर्ष्या करना अच्छी चीज है? (नहीं।) कुछ लोग कहते हैं, “देखो, वे प्रार्थना के दौरान अनजान भाषाओं में बोल सकते हैं; हम उसे समझ या बोल नहीं सकते। और वे बिना सीखे ही कई भाषाएँ जानते हैं। वे कभी बीमार नहीं पड़ते, कई दिनों तक बिना खाए रहने पर भी भूख महसूस नहीं करते और कई दिनों तक बिना सोए रहने पर भी थकान महसूस नहीं करते।” दूसरे कहते हैं, “यह आदमी सक्षम है; यह अतीत में झाँक सकता है और भविष्यवाणी कर सकता है, खगोलविज्ञान से लेकर भूगोल तक सब कुछ जानता है, लोगों के चेहरों से उनके भाग्य पढ़ सकता है और भविष्य बता सकता है। व्यक्ति चाहे कैसा भी दिखता हो, यह एक नजर में ही उसका भाग्य जान लेता है। यह सचमुच उस्ताद है! रात में तुम इसे सोता हुआ देखते हो, लेकिन असल में यह सेवक के रूप में काम करने के लिए रसातल गया होता है।” कुछ लोग ऐसे व्यक्ति की क्षमताओं के कारण उससे ईर्ष्या करते हैं। क्या ऐसे लोगों से ईर्ष्या करना मूर्खता नहीं है? (हाँ, है।) क्या तुम लोगों ने कभी इन विशेष शक्तियों वाले अलौकिक लोगों से यह कहते हुए ईर्ष्या की है, “मेरे पास कोई विशेष शक्ति नहीं है। काश मुझे थोड़ा-सा जादू आता; अगर गर्मी होती और मुझे आइसक्रीम चाहिए होती, तो मैं अपने हाथ के एक इशारे से कुछ आइसक्रीम बार बना सकता—चॉकलेट, स्ट्रॉबेरी, जो भी फ्लेवर मुझे चाहिए होता”? क्या तुम लोगों के मन में कभी ऐसे विचार आए हैं? हर किसी के मन में बचकाने विचार आते हैं; जब लोग स्पष्ट रूप से देख लेते हैं कि ये विचार गलत हैं, तब वे प्राकृतिक रूप से उन्हें त्याग सकते हैं। परमेश्वर बस यही चाहता है कि सामान्य लोग जीवन का अनुभव करें, जीवन का स्वाद लें, जीवन के सुख-दुख, उसकी विभिन्न कठिनाइयों और निराशाओं का अनुभव करें, और अनुभव करने की प्रक्रिया में परमेश्वर की संप्रभुता को सराहें, सृष्टिकर्ता के प्रति सृजित प्राणियों के विभिन्न गलत रवैये पहचानें, और फिर सही मार्ग पर लौट आएँ, परमेश्वर की आराधना और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण हासिल करें। जब लोगों को जीवन के ये अनुभव होंगे, तब उन्हें इस तथ्य का एहसास होगा कि सृष्टिकर्ता मनुष्य की नियति पर संप्रभुता रखता है, फिर वे इस तथ्य को स्वीकारेंगे, इस पर विश्वास करेंगे और इस तथ्य के प्रति समर्पण करेंगे कि सृष्टिकर्ता मनुष्य की नियति पर संप्रभुता रखता है। इसके बाद वे सही मार्ग पर लौट सकते हैं और सही सृजित प्राणी बन सकते हैं। किन्हीं अवास्तविक विचारों के अनुसार मत जियो; वे चीजें कभी वास्तविकता नहीं बनेंगी। वे अलौकिक, विचित्र और असामान्य चीजें हमेशा शैतानों और दानवों का अनन्य क्षेत्र हैं; उनका सामान्य मनुष्यों से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए, चाहे जब भी हो, कभी भी अलौकिक व्यक्ति, विशेष शक्तियों से संपन्न व्यक्ति बनने के बारे में मत सोचो, न ही अपनी प्रवृत्तियाँ या अपनी सीमाएँ लाँघने के बारे में सोचो। बस जमीन पर पैर रखने वाले एक साधारण व्यक्ति बनो, अपने उचित स्थान पर रहो और अपना कर्तव्य निभाओ। लोगों को यही करना चाहिए।
जो लोग दानव हैं, क्या उनमें विचित्रता की अभिव्यक्तियाँ अब मूलतः स्पष्ट हो गई हैं? ये कुछ अभिव्यक्तियाँ हैं जो सबसे गंभीर हैं। ये स्पष्ट रूप से लोगों को यह एहसास और बोध कराती हैं कि ऐसे लोग सामान्य लोगों जैसे नहीं हैं। सामान्य लोगों के बीच वे अत्यधिक भटके हुए प्रतीत होते हैं। यह भटकाव लोगों को यह एहसास कराता है कि उनका व्यवहार और चाल-ढाल और साथ ही दैनिक जीवन में उनकी विभिन्न अभिव्यक्तियाँ विशेष रूप से विचित्र, अलौकिक और असामान्य हैं—वे बस साधारण लोगों से भिन्न हैं। वे देह की सहज प्रवृत्तियों से सीमित नहीं होते और अपने अतार्किक व्यवहारों पर लगाम नहीं लगा सकते, और बिल्कुल भी सचेत प्रतीत नहीं होते, मानो दुष्ट आत्माओं के कब्जे में हों। इसका निरूपण दानवों के विकृत प्रकृति सार के एक पहलू के रूप में करना चाहिए, एक ऐसी चीज के रूप में जिसे लोगों को नकार देना चाहिए। इन अलौकिक और असामान्य चीजों से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए और उनका अनुसरण तो बिल्कुल नहीं करना चाहिए। अगर तुम कभी अलौकिक व्यक्ति बनने या ये अलौकिक चीजें करने का इरादा रखते थे, तो अब रुक जाओ। पीछे मुड़ो, और किनारा नजदीक है। ऐसा व्यक्ति बनने की योजना मत बनाओ। एक बार जब तुम इस रास्ते पर चल पड़ते हो और तुम्हारे मन में दानव घुस जाता है, तो फिर परमेश्वर तुम्हें नहीं चाहेगा और तुम बर्बाद हो जाओगे। मैं क्यों कहता हूँ कि तुम बर्बाद हो जाओगे? क्योंकि एक बार जब दानव तुम पर कब्जा कर लेता है और तुम्हारे मन को नियंत्रित कर लेता है, तो तुम चौपट हो जाओगे। एक बार जब दानव तुम पर कब्जा कर लेता है, तो वह तुम्हारे अंदर हस्तक्षेप करना शुरू कर देता है, तुम्हारे विचारों और मन को बाधित कर देता है। वह तुम्हारे दैनिक जीवन में भाग लेता है और लोगों, घटनाओं और चीजों पर विचार करते समय तुम्हारी विचार-प्रक्रिया में भी भाग लेता है। अगर तुम उसके हस्तक्षेप को नकार नहीं सकते, तो तुम धीरे-धीरे अपनी इच्छाशक्ति खो दोगे और अंत में तुम दब्बूपन के साथ समर्पण कर दोगे। जब कोई दानव तुम्हें पूरी तरह से नियंत्रित कर लेता है, तो चिकित्सकीय भाषा में, तुम्हारा निदान सिजोफ्रेनिया से ग्रस्त व्यक्ति के रूप में किया जाएगा और परमेश्वर के घर में तुम्हें मौत की सजा दी जाएगी। तुम खत्म हो जाओगे। बर्बाद हो जाओगे। क्या वह व्यक्ति, जिसका निदान सिजोफ्रेनिया से ग्रस्त व्यक्ति के रूप में किया जाता है, एक सामान्य व्यक्ति होता है? (नहीं।) क्या परमेश्वर अब भी ऐसे व्यक्ति को चाहता है? परमेश्वर की नजर में यह कैसा व्यक्ति होता है? (एक गैर-मानव।) परमेश्वर की नजर में तुम पर शैतान ने कब्जा कर लिया है। यह थोड़ा अमूर्त लग सकता है। सीधे शब्दों में कहें तो, इसका मतलब है कि शैतान तुम्हारे दिल पर नियंत्रण रखता है। इसका मतलब है कि शैतान तुम्हारे दिल पर राज करता है और उस पर शक्ति रखता है और तुम शैतान की कठपुतली बन गए हो। इसका मतलब है कि शैतान ने तुम पर कब्जा कर लिया है। एक बार जब शैतान किसी पर कब्जा कर लेता है, तो वह उन लोगों जैसा ही बन जाता है जो दानव हैं और जल्दी ही विचित्र, अलौकिक और असामान्य हो जाता है। ऐसे लोग बचाए नहीं जा सकते। इससे मेरा क्या मतलब है? मैं तुमसे कह रहा हूँ कि तुम्हें उन लोगों की विचित्र अभिव्यक्तियों का भेद पहचानना चाहिए जो दानव हैं। भेद पहचानने के बाद तुम्हें ऐसे लोगों से दूर रहना चाहिए और उनके करीब नहीं जाना चाहिए। चाहे कुछ भी हो, उनकी बातों और कामों में मत पड़ो। उन्हें गंभीरता से मत लो। उदाहरण के लिए, मान लो वे किसी ऐसी चीज के बारे में बोलते हैं जिसे तुम बिल्कुल भी देख नहीं सकते या महसूस नहीं कर सकते। तुम्हें यह बताने का उनका उद्देश्य तुम्हारे करीब आना और तुम्हें फुसलाना है। अगर तुम उत्सुक होते हो और उत्साहपूर्वक उनसे ईर्ष्या करते हो और उनका अनुसरण करते हो, तो तुम बहुत खतरे में हो। मैं क्यों कहता हूँ कि तुम खतरे में हो? क्योंकि यह शैतान है जो लोगों को गुमराह कर रहा है और फुसला रहा है और उन आत्माओं को खोज रहा है जिन्हें वह निगल सकता है। अगर तुम जरा भी शैतान का भेद नहीं पहचानते और अभी भी उत्सुक और ईर्ष्यालु हो, तो तुम पहले ही प्रलोभन में पड़ चुके हो और बहुत संभव है कि शैतान तुम पर काम करने का मौका लपक लेगा। इसलिए तुम बहुत खतरे में हो। तुम बिना किसी सतर्कता के शैतान के पास जाते हो—क्या यह मूर्खता नहीं है? (हाँ, है।) जब शैतान देखता है कि तुममें उसके प्रति कोई सतर्कता नहीं है, तो वह किसी बदमाश की तरह लगातार तुम्हें छेड़ने और लुभाने की कोशिश करेगा। अगर तुम मना नहीं करते हो, तो वह मान लेता है कि तुम मौन सहमति दे रहे हो, इसलिए वह फिर और आगे बढ़ेगा। अगर तुम हमेशा उन लोगों द्वारा, जो कि शैतान हैं, कही गई विचित्र, अलौकिक और असामान्य चीजों के बारे में जानने के लिए उत्सुक रहते हो, यहाँ तक कि उनके बारे में पूछते हो और पूछताछ भी करते हो, तो क्या यह साबित नहीं करता कि तुम ऐसी चीजों में रुचि रखते हो, और उनसे घृणा नहीं करते हो? ऐसी चीजों में रुचि रखना कोई अच्छा संकेत नहीं है। अगर तुम इन चीजों में रुचि रखते हो, तो शैतान की नजर में इसका मतलब है कि तुम परमेश्वर, सत्य या सकारात्मक चीजों में रुचि नहीं रखते। इससे वह प्रसन्न होता है और प्राकृतिक रूप से, वह तुम पर काम करने के इरादे से खुशी-खुशी तुम्हारी ओर “दोस्ताना” हाथ बढ़ाएगा। इस तरह, तुम खतरे में हो। इसलिए ऐसे लोगों से सामना होने पर उनके करीब मत जाओ और उनमें रुचि मत लो। इसके बजाय, तुम्हें भेद पहचानना चाहिए, उनसे सावधान रहना चाहिए और उनसे दूरी बनानी चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, “अगर हम उनके पास न जाएँ या उनमें रुचि न लें, तो हम उन्हें कैसे पहचान सकते हैं? जैसे कि कहावत है, ‘खुद को जानो और अपने दुश्मन को जानो, और तुम कभी पराजित नहीं होगे।’ अगर हम दुश्मन में घुसपैठ नहीं करते, तो हम खुद को और अपने दुश्मन को कैसे जान सकते हैं?” क्या यह कथन सही है? यह वैसा ही है जैसे, जब कोई महामारी फैलती है तो कुछ वैज्ञानिक और शोधकर्ता वायरस पर हाथ डालने और उसका अध्ययन करने पर जोर देते हैं, और नतीजतन, उनमें से कुछ खुद वायरस से संक्रमित होकर मर जाते हैं। इसलिए, तुम्हें उन दानवों से बेहद सतर्क रहना चाहिए जो विचित्र और अलौकिक अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करते हैं। बेहतर यह है कि तुम उनसे अत्यंत सतर्क रहो, बजाय इसके कि तुम उन्हें यह मौका दो कि वे तुम्हें नुकसान पहुँचाएँ। अभ्यास करने का यही होशियार तरीका है। एक तो उनमें रुचि मत लो, और उनसे संपर्क मत करो और उनके करीब मत जाओ। दूसरे, उनकी विचित्र, अलौकिक अभिव्यक्तियों का अनुसरण या अनुकरण मत करो। तुम्हें भी इसी तरह अभ्यास करना चाहिए। अगर तुम अक्सर इन अलौकिक, विचित्र और असामान्य लोगों के संपर्क में आते हो और अपनी असतर्कता की वजह से तुम उनसे प्रभावित हो जाते हो और लगातार उनकी अभिव्यक्तियों के बारे में सुनते और उन्हें देखते रहते हो, तो अनजाने ही उनकी विचित्र अभिव्यक्तियाँ तुम्हारे हृदय और स्मृति में सुरक्षित हो जाएँगी। फिर, अनजाने ही तुम उनका अनुसरण और अनुकरण करना चाहोगे। यह और भी ज्यादा खतरनाक संकेत है। एक बार जब तुम उनका अनुसरण और अनुकरण करना चाहते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम्हारे हृदय की सुरक्षा पूरी तरह से ध्वस्त हो गई है। यह शैतान के तुम पर नियंत्रण करने और तुम्हें अपने कब्जे में लेने के लिए तुम्हारे हृदय में प्रवेश करने देने पर तुम्हारे सहमत होने के बराबर है। ऐसा करके तुम खुद को शैतान के हवाले कर रहे होते हो और इस तरह शैतान जल्दी से तुम पर नियंत्रण कर सकता है। तब क्या तुम बर्बाद नहीं हो गए हो? अपना हृदय परमेश्वर को देना लोगों के लिए सचमुच कठिन है। परमेश्वर के लिए लोगों के हृदय में सत्तासीन होना आसान नहीं है। परमेश्वर आसानी से लोगों के हृदय का प्रभार नहीं लेता और उसमें सत्तासीन नहीं होता। परमेश्वर मानवजाति पर जो कार्य करता है, उसमें मनुष्यों की जन्मजात स्थितियों के आधार पर उनका सिंचन करना, उनकी चरवाही करना, उनका प्रबोधन करना, उन्हें रोशन करना, उनका मार्गदर्शन और उनकी सुरक्षा करना शामिल है। इसके अलावा, परमेश्वर उन्हें अनुशासित करता है, ताड़ित करता है, उन्हें ताड़ना देता है और उनका न्याय करता है, साथ ही लोगों के लिए विभिन्न प्रकार की स्थितियों का इंतजाम भी करता है। यह उन्हें, जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, वस्तुनिष्ठ स्थितियों में धीरे-धीरे परमेश्वर के कार्य और सत्य के विभिन्न पहलुओं का ज्ञान प्राप्त करने देता है। फिर, धीरे-धीरे—सामान्य मनुष्य की सोच के अनुसार—परमेश्वर के वचन और सत्य उनके हृदय में जड़ जमा लेते हैं और उनका जीवन बन जाते हैं, और इस तरह, ये लोग परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए जाते हैं। इस सबकी एक प्रक्रिया है। लेकिन शैतान द्वारा लोगों को गुमराह और भ्रष्ट करना अलग है। हम क्यों कहते हैं कि शैतान का सार विकृत है? वह लोगों पर बलपूर्वक कब्जा कर लेता है और उन्हें नियंत्रित करता है। यह पहलू यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि शैतान का सार विकृत है। यह ठोस प्रमाण है। जब तुम ऐसा व्यक्ति बनने का अनुसरण करते हो जो दानव है, और जब तुम इन विचित्र, अलौकिक और असामान्य अभिव्यक्तियों, व्यवहारों और क्षमताओं का अनुसरण करते हो, तो तुम्हारा हृदय शैतान के लिए खुल जाता है। यह ऐसा है जैसे तुम अपने हृदय में शैतान से कह रहे हो : “अंदर आ जाओ, मैंने तुम्हारे लिए एक स्थान आरक्षित कर रखा है। तुम मेरे पूरे अस्तित्व को नियंत्रित कर सकते हो।” शैतान तुमसे क्या कहेगा? “अगर तुम मेरी बात सुनो और मुझे अपने हृदय में सत्तासीन होने दो, तो तुम वह सब कुछ सीख सकते हो जो तुम प्राप्त करना चाहते हो। तुममें सभी विचित्र, अलौकिक चीजें होंगी, तुम साधारण लोगों से आगे निकल जाओगे और तुम आम लोगों से भी आगे निकल जाओगे।” लोगों का इन विचित्र, अलौकिक और असामान्य व्यवहारों, अभिव्यक्तियों या क्षमताओं का अनुसरण करना उनका शैतान से बातचीत करने के बराबर है और यह उनका अपने हृदय में शैतान को अपनाने के बराबर भी है। अगर तुम इन विचित्र, अलौकिक चीजों का अनुसरण करोगे, तो शैतान तुम्हारे हृदय में तेजी से काम करना शुरू कर देगा। इस समय, जब तुम परमेश्वर के वचन फिर से सुनोगे, तो तुम्हारे विचार, दृष्टिकोण और रवैये सामान्य व्यक्ति के नहीं रहेंगे, बल्कि तुम 180 डिग्री पर मुड़ चुके होगे। सत्य के प्रति तुम्हारा रवैया सामान्य व्यक्ति के रवैये से पूरी तरह अलग होगा। तुम जो अभिव्यक्त करोगे, वह सत्य से विमुखता और सत्य के प्रति शत्रुता होगी। यह ऐसा ही है। अगर तुम सत्य से विमुख और उसके प्रति शत्रुतापूर्ण हो, तो क्या तुम अभी भी सत्य प्राप्त कर सकते हो? नहीं कर सकते। तुम पर शैतान द्वारा कब्जा कर लिया गया है। इसलिए जहाँ तक दानवों से पुनर्जन्म लेने वालों की विचित्र, अलौकिक और असामान्य अभिव्यक्तियों का संबंध है, लोगों को उनसे सख्ती से सतर्क रहना चाहिए, उनके साथ सावधानी और समझदारी से पेश आना चाहिए और उन्हें महत्वहीन समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यानी इन अभिव्यक्तियों के प्रति तुममें विवेकशीलता जरूर होनी चाहिए। इनमें रुचि मत लो या ऐसे लोगों के करीब मत जाओ, अपने दिल में गुपचुप तरीके से उनके लिए रश्क रखना, उन्हें सराहना या फिर उनका अनुसरण और अनुकरण करना तो दूर की बात है। इसके बजाय, तुम्हें ऐसे लोगों से दूर रहना चाहिए, उनका भेद पहचानना चाहिए, उनके प्रति स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए और उनके और अपने बीच एक स्पष्ट सीमा खींचनी चाहिए। समझे? (समझ गए।)
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?