सत्य का अनुसरण कैसे करें (15) भाग चार

III. तीसरी विशेषता : बुराई

आओ, दानवों से पुनर्जन्म लेने वालों में विकृति की अभिव्यक्तियों पर संगति समाप्त करने के बाद अब उनकी एक और अभिव्यक्ति—बुराई—पर संगति करें। बुराई की अभिव्यक्तियाँ विकृति की अभिव्यक्तियों से समानताएँ रखती हैं, लेकिन उनमें अंतर भी हैं। विकृति की अभिव्यक्तियाँ सामान्य मानवता की सोच, जमीर, विवेक या सहज प्रवृत्तियों के अनुरूप नहीं होतीं, न ही वे सृजित मनुष्यों के लिए सामान्य मानवता की परमेश्वर द्वारा निर्धारित विभिन्न जन्मजात स्थितियों के अनुरूप होती हैं; बल्कि वे सामान्य मानवता की इन विभिन्न जन्मजात स्थितियों के पार निकल जाती हैं। समग्र अभिव्यक्ति असामान्य, अलौकिक, चरम और विचित्र होना है। अर्थात् सामान्य मानवता के जमीर और विवेक वाले लोग ऐसे व्यक्तियों को उनकी अभिव्यक्तियों और व्यवहारों के साथ-साथ उनके विचारों और दृष्टिकोणों के संदर्भ में भी बहुत अजीब पाते हैं। तुम थाह ही नहीं पा सकते कि वे इस तरह क्यों सोचते हैं या इस तरह क्रियाकलाप क्यों करते हैं। अब, संगति के माध्यम से, तुम समझते हो। तो इसकी जड़ कहाँ निहित है? वह उनके प्रकृति सार और दानवी लक्षण में निहित है। ये मूलतः विकृति की अभिव्यक्तियाँ हैं। लेकिन दानवों की बुराई में सिर्फ कुछ सामान्य रूप से दिखाई देने वाली बाहरी अभिव्यक्तियाँ ही शामिल नहीं होतीं; बल्कि उसमें सीधे तौर पर ऐसे व्यक्ति का सत्य के प्रति दृष्टिकोण शामिल होता है। यह विकृति से भी घृणित और ज्यादा गंभीर है। बुराई की अभिव्यक्तियाँ, निस्संदेह, इस बात से भी चिह्नित होती हैं कि ऐसे लोग सत्य के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। पहले तो, जो लोग दानव होते हैं वे सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण होते हैं; यह बुराई की पहली अभिव्यक्ति है। बुराई की दूसरी अभिव्यक्ति यह है कि सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखने के अलावा, दानव अग्रसक्रिय रूप से उस पर आक्रमण भी करते हैं। बुराई की तीसरी अभिव्यक्ति यह है कि सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण होने और उस पर आक्रमण करने के अलावा दानव एक कदम आगे बढ़कर सत्य की जगह लेना चाहते हैं। बुराई की उनकी अभिव्यक्तियाँ सिर्फ सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण होने और उस पर आक्रमण करने तक ही सीमित नहीं रहेंगी; बल्कि इन दो अभिव्यक्तियों की नींव पर वे सत्य की जगह लेना भी चाहते हैं। यही उनका सार है। दानवों में बुराई की कई अभिव्यक्तियाँ मसीह-विरोधियों के सार वाले लोगों की अभिव्यक्तियों के समान ही होती हैं, जिन पर हम पहले संगति कर चुके हैं, इसलिए इन पहलुओं में गहरे जाने की जरूरत नहीं है। आज हम मुख्य रूप से दानवों में बुराई की इन तीन अभिव्यक्तियों का गहन-विश्लेषण करेंगे : सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण होना, सत्य पर आक्रमण करना और सत्य की जगह लेने का प्रयास करना।

क. सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण होना

आओ, पहले उन लोगों में सत्य के प्रति शत्रुता की अभिव्यक्ति पर संगति करें, जो दानव हैं। हम सत्य के प्रति शत्रुता के विषय पर पहले काफी संगति कर चुके हैं; तुम लोगों के सामने यह विषय पहली बार नहीं आया है। सत्य के प्रति शत्रुता की अभिव्यक्ति उन लोगों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जो दानव हैं। अर्थात् वे कोई भी सकारात्मक चीज, कोई भी ऐसी चीज नहीं स्वीकार सकते जो सही और मानवता के जमीर और विवेक के अनुरूप है। खासकर जब वह ऐसी चीज है जिसमें सत्य सिद्धांत शामिल हैं, तब वे उसे स्वीकारने में और भी कम समर्थ होते हैं। स्वीकारने में उनकी असमर्थता सिर्फ उनके सिर हिलाकर मना करने का मामला नहीं है; बल्कि वे अपने दिल में विकर्षण और जुगुप्सा के साथ-साथ घृणा भी महसूस करते हैं। उनकी घृणा कितनी गहरी होती है? अगर कोई व्यक्ति विशिष्ट रूप से और वास्तविकता के साथ सत्य पर संगति करता है, तो वह व्यक्ति उन्हें अप्रिय लगता है। यह थोड़ी-सी ईर्ष्या मात्र नहीं है—यह शत्रुता है। शत्रुता क्या होती है? इसका अर्थ है तुम्हारे साथ ऐसा व्यवहार करना मानो तुमने उनके पिता की हत्या कर दी हो। दरअसल, हो सकता है तुम्हारा उनके साथ कोई गहरा मेलजोल न हुआ हो, न ही वे अनिवार्य रूप से तुम्हें जानते हों, लेकिन अगर तुम सत्य समझते हो और सत्य पर संगति करते हो तो वे अपने दिलों में विकर्षण महसूस करते हैं। वे किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति विकर्षण महसूस नहीं करते जो शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलता है, लेकिन उस व्यक्ति के प्रति प्रबलता से विकर्षण महसूस करते हैं जो उनके साथ सत्य पर संगति करता है, उन्हें लगता है मानो वह उनकी हत्या कर रहा हो—उनकी घृणा इस हद तक पहुँच जाती है। उनकी विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ क्या होती हैं? जब दूसरे लोग सत्य सिद्धांतों या परमेश्वर के इरादों पर संगति करते हैं, तो वे इसे सुनकर विमुख हो जाते हैं और शांत नहीं बैठ सकते। कुछ लोग कोई बहाना बनाकर चले जाते हैं, जबकि दूसरे लोग बिना किसी झिझक के उठकर चले जाते हैं। दूसरी ओर, सामान्य मानवता के जमीर और विवेक वाले लोग भले ही सही शब्दों की—खासकर सत्य के अनुरूप शब्दों की—लालसा न रखते हों या उनका अनुमोदन न करते हों—ज्यादा से ज्यादा उन्हें अपने दिलों में स्वीकार नहीं करेंगे, लेकिन फिर भी वे अपनी इज्जत बचाने के लिए शांत बैठे रह सकते हैं। लेकिन जो शैतान हैं वे शांत नहीं बैठ सकते। वे सत्य सुनते ही अपने दिलों में विकर्षण और व्याकुलता महसूस करते हैं और जब वे इतने व्याकुल हो जाते हैं तब वहाँ रुक नहीं सकते, बाहर निकल जाते हैं। अगर वे ऐसा नहीं कर सकते तो ऑनलाइन जाकर वीडियो देखते हैं, अपने मन को भटकने देते हैं और कुछ ध्यान भटकाने वाले क्रियाकलापों में लगने देते हैं, विषय बदलकर बेकार की बातें करने में लग जाते हैं या दूसरों को नीचा दिखाते हुए और भाषण झाड़ते हुए अपने “गौरवशाली” इतिहास की बड़ाई करने लगते हैं और उसकी गवाही देने लगते हैं। संक्षेप में, अगर तुम सत्य पर संगति करते हो तो वे विकर्षण महसूस करते हैं; सत्य के प्रति उनका रवैया चरम शत्रुता का होता है। अगर तुम सत्य पर संगति नहीं करते, बल्कि सिर्फ कुछ प्रशासनिक या सामान्य कार्यों के बारे में संगति करते हो, सुसमाचार का प्रचार करने के कुछ किस्से साझा करते हो या बाहरी मामलों के बारे में बातचीत करते हो, तो वे शांत बैठकर बाकी सभी के साथ बातचीत करने में समर्थ होते हैं और काफी सामंजस्यपूर्ण दिखते हैं। लेकिन जैसे ही सत्य पर संगति की जाती है, खासकर जब परमेश्वर के वचन पढ़े जाते हैं तब उनका सार और असली चेहरा सामने आ जाता है। वे उत्तेजित हो जाते हैं और अगर थोड़ा भी और सुन लिया तो उन्हें लगता है जैसे उनका सिर फट जाएगा। जितना ज्यादा तुम परमेश्वर के वचन पढ़ते हो, उतना ही ज्यादा उन्हें लगता है कि उनका न्याय किया जा रहा है और उतना ही ज्यादा उन्हें लगता है कि उनकी निंदा की जाएगी और उन्हें हटा दिया जाएगा, और उनकी जान जोखिम में है। जितने ज्यादा तुम परमेश्वर के वचन पढ़ते हो, उतना ही ज्यादा विकर्षण और जुगुप्सा वे अपने दिलों में महसूस करते हैं, मानो उन्हें कोई बीमारी लग गई हो। मुझे बताओ, क्या यह समस्या बहुत गंभीर नहीं है? क्या ऐसे लोगों को अब भी बचाया जा सकता है? खासकर जब बात सत्य का अभ्यास करने और एक ईमानदार इंसान बनने की आती है, तब जो लोग सत्य का अनुसरण करते हैं, चूँकि वे ईमानदार बनना चाहते हैं इसलिए, वे सच बोलने, खुलकर अपनी बात कहने और अपनी असलियत उजागर करने के लिए खुद को प्रशिक्षित करते हैं। जब दानव यह सुनते हैं तो उनके दिलों में विकर्षण पैदा होता है, वे तुम्हारा तिरस्कार करते हैं और तुमसे घृणा करते हैं। उन्हें लगता है कि तुम सत्य का अभ्यास करने के कारण नीच हो, जबकि वे सत्य का अभ्यास न करने के कारण सम्माननीय—और तुमसे ज्यादा नेक और महान—हैं। यह कैसा दृष्टिकोण है? क्या यह काले को सफेद में बदलना नहीं है? सत्य के प्रति शत्रुता रखने वाले लोग ऐसे ही होते हैं। अगर तुम सत्य पर या अभ्यास के किसी सिद्धांत पर संगति करते हो, तो वे न सिर्फ अपने दिल में तुम्हारा तिरस्कार करते हैं, बल्कि तुमसे विकर्षण भी महसूस करते हैं; वे तुमसे आँखें भी नहीं मिलाते। अगर तुम उनसे कलीसिया के कार्य के बारे में चर्चा करना चाहो, तो वे हमेशा तुमसे बचते हैं; वे तुमसे बात नहीं करना चाहते और उन्हें लगता है कि तुम दोनों में कोई चीज समान नहीं है। तुम उनसे किसी भी विषय पर बात कर सकते हो, सिवाय उन विषयों के जो सत्य या मनुष्य को बचाने के परमेश्वर के कार्य से संबंधित हों; वे इन विषयों पर चर्चा नहीं करना चाहते। उदाहरण के लिए, अगर तुम उनसे कहते हो, “आओ, इस बारे में संगति करें कि अपना कर्तव्य वफादारीपूर्वक कैसे निभाएँ, और इस चरण में अपना कर्तव्य निभाने में अभी भी क्या समस्याएँ हैं और उनका समाधान कैसे करें,” तो यह सुनकर उन्हें ऐसा लगता है जैसे उनका सिर फट जाएगा, वे अपने दिलों में चरम विकर्षण महसूस करते हैं, और उनकी आँखों में आग भी भड़क सकती है क्योंकि वे तुम्हारे प्रति विरोधी हो जाते हैं। वे शैतान के प्रति वफादार रहने के लिए कोई भी कष्ट सहने को तैयार रहते हैं, लेकिन परमेश्वर और सत्य से उन्हें विशेष रूप से घृणा होती है, वे सत्य जरा भी नहीं स्वीकारते। चाहे जो भी उनके साथ सत्य पर संगति करे, वे उसे ग्रहण नहीं कर सकते। अगर तुम उन्हें ज्ञान या प्रसिद्ध साहित्यिक कृतियों का अध्ययन करने के लिए कहो, तो वे बहुत इच्छुक होते हैं और खुद को बहुत अभिजात समझते हैं। लेकिन जब वे धर्मोपदेश या दूसरों को सत्य पर संगति करते हुए सुनते हैं तो ऐसा लगता है मानो उनके साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा हो या उन पर अदालत में मुकदमा चलाया जा रहा हो। वे जिस चीज के सबसे ज्यादा अनिच्छुक होते हैं, वह है परमेश्वर के वचन पढ़ना और सत्य पर संगति करना। इसलिए अपने दैनिक जीवन में वे कुछ सामान्य मामलों का कार्य और ऐसी चीजें तो करते हैं जिनसे उनका रुतबा, प्रतिष्ठा और आशीष पाने की संभावनाएँ बढ़ती हैं, लेकिन ऐसे लोग कभी परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ते या आध्यात्मिक भक्ति में संलग्न नहीं होते। वे सभाओं के दौरान सत्य पर संगति भी नहीं करते और कभी अपना व्यक्तिगत अनुभवजन्य ज्ञान साझा नहीं करते; सभाओं में उनकी उपस्थिति एक औपचारिकता भर होती है। अगर तुम उनसे परमेश्वर के वचनों के अपने ज्ञान पर या सत्य पर संगति करने के लिए कहो, तो वे एक शब्द भी नहीं बोल सकते और यह सोचकर अपने दिलों में विकर्षण महसूस करते हैं, “परमेश्वर के वचनों और सत्य पर संगति करना गृहिणियों और समाज के निचले तबके के लोगों का काम है। मेरे जैसा महान व्यक्ति ऐसा कैसे कर सकता है? मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जो बड़ी चीजें और बड़ा कार्य करता है, ऐसा व्यक्ति जिसे बड़े आशीष प्राप्त होंगे। जब मैं राज्य में प्रवेश करूँगा, तो मैं परमेश्वर के राज्य में एक स्तंभ और आधार बनूँगा। मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जो बड़ी जिम्मेदारियाँ उठाता है। तुम लोग खुद को क्या समझते हो? तुम लोगों के साथ एक ही कलीसिया में सभाओं में भाग लेना भी मुझे नीचा दिखाता है!” देखो, वे कितने घमंडी हैं! सत्य के प्रति उनकी शत्रुता सत्य से जुड़े तमाम लोगों और चीजों के प्रति, और साथ ही सत्य से जुड़े अभ्यासों और कथनों के प्रति भी, शत्रुता है; यहाँ तक कि वे सकारात्मक चीजों के प्रति भी शत्रुता रखते हैं।

ख. सत्य पर आक्रमण करना

जब कोई यह उल्लेख करता है कि कलीसिया में भाई-बहनों को संतों जैसी मर्यादा रखनी चाहिए, स्त्री-पुरुषों के बीच मेलजोल—चाहे काम पर हो या रोजमर्रा की जिंदगी में—कुछ सीमाओं के भीतर होना चाहिए, हर किसी को गरिमापूर्ण और सभ्य होना चाहिए, असावधानीवश छेड़खानी में संलग्न नहीं होना चाहिए, और स्त्री-पुरुष के बीच के रिश्तों का सम्मान करना चाहिए और विवाह का सम्मान करना चाहिए, इस संबंध में परमेश्वर के वचनों के अनुसार आचरण करना चाहिए, और परमेश्वर का घर यौन मुक्ति की वकालत नहीं करता, तो यह सुनकर दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग क्या सोचेंगे? “यह एक पुरानी कहावत है, एक घिसा-पिटा मुहावरा। अभी हम किस जमाने में जी रहे हैं, अभी भी स्त्री-पुरुष के बीच संतों जैसी मर्यादा और सीमाओं की बात कर रहे हैं! अतीत में सम्राटों के महलों में पूरे हरम हुआ करते थे—कितना शानदार था वह! अगर मेरे पास क्षमता और साधन होते, तो भले ही मेरे पास हरम न होता, टाँका भिड़ाने के लिए कम से कम मेरे पास कुछ लोग तो होते!” वे कभी कोई सकारात्मक चीज, कोई सही कथन, खासकर सत्य के वचन नहीं स्वीकारते, यहाँ तक कि उनसे काफी विकर्षित भी होते हैं और नफरत भी करते हैं। इसलिए, सत्य के प्रति अपनी शत्रुता की बुनियाद पर ये लोग लगातार सत्य और सकारात्मक चीजों पर हमला करते हैं। चाहे सत्य के किसी भी पहलू या परमेश्वर की किसी भी विशिष्ट अपेक्षा पर संगति की जाए, उनके पास हमेशा उसकी आलोचना और राय बनाने के लिए पाखंडों और भ्रांतियों का एक समुच्चय होता है। क्या यह आलोचना और राय एक हमला नहीं है? (हाँ, है।) चाहे कितने भी लोग सत्य और सकारात्मक चीजें स्वीकार लें, वे कभी नहीं स्वीकारेंगे। वे मानते हैं कि परमेश्वर का घर जिनकी वकालत करता है और सत्य लोगों से जिनका अभ्यास करने की अपेक्षा करता है, वे सब नारे और औपचारिकताएँ हैं, और जो वास्तव में मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं, वे सांसारिक प्रवृत्तियाँ हैं; सांसारिक प्रवृत्तियाँ अब जिसकी भी वकालत करती हैं, वही सर्वोच्च सत्य है। क्या यह बुराई की पूजा करना नहीं है? इसलिए, चाहे तुम सत्य के किसी भी पहलू पर संगति करो, वे व्यक्तिपरक रूप से उसके प्रति शत्रुतापूर्ण होते हैं, और इसके अलावा, वे उसकी आलोचना करेंगे, उस पर आक्रमण करेंगे और उसकी निंदा करेंगे। उदाहरण के लिए, परमेश्वर लोगों से ईमानदार होने की अपेक्षा करता है। वे ईमानदार व्यक्ति होने को कैसे परिभाषित करते हैं? “ईमानदार होना मूर्खों का काम है; सिर्फ मूर्ख ही ईमानदार व्यक्ति होने का अभ्यास करते हैं। सिर्फ मूर्ख ही दूसरों को बताते हैं कि वे अपने दिलों में क्या सोचते हैं, उनके निजी मामले क्या हैं। सिर्फ मूर्ख ही सच बोलते हैं। सिर्फ मूर्ख ही अपना भाग्य नियंत्रित करने के लिए दूसरों को सौंपते हैं। मैं मूर्ख नहीं हूँ; मेरा भाग्य मेरे हाथों में है और दूसरों को उसमें हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है! मैं अपने दिल में जो सोचता हूँ, उसे कहना चाहूँ या नहीं, दूसरों को इसमें हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। अगर कोई चीज ऐसी नहीं है जो मैं लोगों को बताना चाहता हूँ, तो यह जानने का सपना भी मत देखना कि वह क्या है!” क्या यह सत्य से विमुख होना और सत्य से घृणा करना नहीं है? (हाँ, है।) जो लोग दानव हैं, वे सत्य नहीं स्वीकारते और उसका अभ्यास नहीं करते। सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण होने और उस पर आक्रमण करने के अलावा वे एक कदम और आगे बढ़कर सत्य की जगह लेने के लिए शैतान के विभिन्न शैतानी विषों, दृष्टिकोणों और अभ्यासों का इस्तेमाल करते हैं। उदाहरण के लिए, वे आशीष पाने और परमेश्वर से सौदेबाजी करने की शर्तों के रूप में दूसरों को गुमराह करने के लिए षड्यंत्रों, झूठों, विभिन्न साधनों या कष्ट सहने और कीमत चुकाने के दिखावे का इस्तेमाल करते हैं। वे सोचते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने में किसी को ईमानदार व्यक्ति होने की जरूरत नहीं है, अपने कर्तव्य के प्रति वफादार होने की जरूरत नहीं है और सत्य स्वीकारने और उसका अभ्यास करने की जरूरत नहीं है; जब तक व्यक्ति ज्यादा कष्ट सहता है, ज्यादा कीमत चुकाता है, ज्यादा कार्य करता है, ज्यादा अच्छे क्रियाकलाप करता है और ज्यादा पुण्य संचित करता है, ज्यादा ऐसी चीजें करता है जिन्हें लोगों का अनुमोदन और उच्च सम्मान प्राप्त होता है और इन उपायों के जरिये भाई-बहनों का भरोसा और साथ ही उनसे बड़ाई और समर्थन प्राप्त करता है, तब तक वह इन सबके बदले में स्वर्ग के राज्य के आशीष प्राप्त करने का लक्ष्य हासिल कर सकता है। क्या यह दृष्टिकोण अत्यंत हास्यास्पद नहीं है? (हाँ, है।)

चाहे सत्य की आलोचना और निंदा करना हो, सत्य के प्रति शत्रुता रखना और उस पर आक्रमण करना हो या हमेशा सत्य की जगह लेने के लिए शैतान के पाखंडों और भ्रांतियों का इस्तेमाल करने की चाहत रखना हो, ये सब इस बात की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ हैं कि दानव सत्य के साथ कैसे पेश आते हैं। वे चाहे जो भी अभिव्यक्तियाँ हों, वे सब दानवों के बुरे सार को पूरी तरह से उजागर करती हैं। सत्य के प्रति शत्रुता रखना, सत्य पर आक्रमण करना और सत्य की जगह लेने का प्रयास करना—ये ऐसे क्रियाकलाप हैं जिन्हें सिर्फ दानव ही कर सकते हैं। सिर्फ दानव ही सत्य और परमेश्वर के साथ इतनी घृणा, आलोचना और निंदा का व्यवहार करते हैं और लोगों को गुमराह करने के लिए, धोखा देने के लिए और उन्हें सत्य और परमेश्वर से दूर करने हेतु फुसलाने के लिए किसी भी हद तक गिरने में सक्षम हैं। सिर्फ दानव ही लोगों के दिलों में परमेश्वर की जगह लेने के प्रयास में धोखे से लोगों का भरोसा, समर्थन और प्रशंसा जीतने, लोगों के दिल खरीदकर उन्हें नियंत्रित करने का अपना लक्ष्य हासिल करने का हर संभव तरीका सोचेंगे। संक्षेप में, यह तथ्य कि दानव सत्य के प्रति और सत्य का अनुसरण करने वालों के प्रति ऐसा रवैया अपनाते हैं, यह उजागर करता है कि उनका सार बुरा है। सभी सृजित मनुष्य सकारात्मक चीजों और सत्य की लालसा रखते हैं और उनसे प्रेम करते हैं, और ये लोगों द्वारा सँजोए जाने योग्य भी हैं। निस्संदेह, ये वे चीजें भी हैं जिनकी सृजित मनुष्यों को सबसे ज्यादा जरूरत है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सत्य मानवजाति के लिए शैतान के प्रभाव से मुक्त होने के लिए, सही मार्ग पर चलने के लिए और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में समर्थ होने के लिए आवश्यक चीज है। सामान्य लोगों द्वारा उद्धार प्राप्त करने के लिए सत्य का अनुसरण करना, सत्य स्वीकारना और सत्य का अभ्यास करना एक आवश्यक प्रक्रिया है; इसका कोई दूसरा रास्ता नहीं है। अपने भ्रष्ट स्वभाव होने के कारण अगर उनके लिए सत्य स्वीकारना और उसका अभ्यास करना कठिन हो, तो भी अपने अंतरतम अस्तित्व और अपनी व्यक्तिपरक इच्छा के परिप्रेक्ष्य से वे सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण नहीं होते; उनका व्यक्तिपरक रवैया सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण नहीं होता, न ही उनका रवैया जानबूझकर सत्य पर हमला करने का या सत्य की जगह लेने के लिए किसी भी पाखंड और भ्रांति का इस्तेमाल करने के लिए हर साधन आजमाने का होता है। सिर्फ शैतान ही ऐसा कर सकता है; सत्य के प्रति उसकी शत्रुता का सार बड़े लाल अजगर के सार के समान ही होता है। जो भी सकारात्मक चीज है, जिसमें भी सत्य शामिल है, शैतान उसे नकारता है, उसकी निंदा करता है और उसे अस्वीकार करता है। अगर ये सत्य उसके लिए खतरा न हों, तो भी वह इनसे शत्रुता रखता है और घृणा करता है; यह उसकी प्रकृति द्वारा आदेशित है। चूँकि दानवों में बुरी प्रकृति होती है, इसलिए उनकी नजर में सत्य उनका शत्रु होता है। “शत्रु” शब्द का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि शत्रु कभी सुसंगत नहीं हो सकते, कभी मित्र नहीं हो सकते, कभी हमखयाल साथी नहीं हो सकते। यह बड़े लाल अजगर की तरह होता है। वह परमेश्वर में विश्वास करने वालों के साथ विशेष घृणा और शत्रुता का व्यवहार करता है। यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करना छोड़ देते हो और परमेश्वर का अपमान करते हो, तो तुम समाज में कोई भी बुराई कर सकते हो—तुम चाहे चोरी करो, डकैती करो या व्यभिचार में लिप्त रहो, उसे कोई परवाह नहीं; तुम उसके साथ साँठगाँठ करके कोई भी बुरा काम कर सकते हो। लेकिन अगर तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो और सही मार्ग पर चलते हो, तो वह तुम्हें इसकी अनुमति नहीं देगा; वह तुम्हें गिरफ्तार करेगा, तुम्हें सताएगा, यहाँ तक कि तुम्हें मौत के घाट भी उतार देगा। वह तुम्हें जीवित ही नहीं रहने देगा। जब तक तुम जीवित हो, तब तक तुम उसके लिए जी का जंजाल हो; हर दिन जब तुम जीवित रहते हो, वह अंदर से व्यथित और बेचैन महसूस करता है। सिर्फ जब वह तुम्हें नष्ट कर देता है, जब तुम जीवित नहीं रहते, तभी वह विजयी, सहज और शांत महसूस करता है। जो लोग दानव हैं, उनका सत्य के प्रति रवैया प्रकृति में बड़े लाल अजगर की सत्य के प्रति घृणा के समान ही होता है। अगर तुम सत्य का अनुसरण करते हो, सत्य का अभ्यास करते हो, सब कुछ सिद्धांतों के अनुसार करते हो, एक रवैया रखते हो और सिद्धांत कायम रखते हो, तो वे तुम्हें नापसंद करेंगे और तुमसे घृणा करेंगे। अगर वे अगुआ बन गए और सत्ता पा गए, तो वे तुम्हें सताने के लिए तुममें गलती ढूँढ़ने का हर संभव उपाय सोचेंगे, यहाँ तक कि तुम्हें दूर करने के लिए किसी अपराध में भी फँसा देंगे। जब सत्य का अनुसरण करने वाले उनके द्वारा अलग-थलग कर दिए जाते हैं और कलीसिया में बचे हुए तमाम लोग भ्रमित होते हैं और वे लोग होते हैं जो सत्य जरा भी नहीं समझते, तो वे सुरक्षित महसूस करते हैं, वे महसूस करते हैं कि उन्हें कोई खतरा नहीं है और उनके दिन आसानी से कटेंगे। इसलिए, जो लोग दानव हैं वे न सिर्फ सत्य के प्रति शत्रुता रखते हैं, बल्कि उन लोगों के प्रति भी शत्रुता रखते हैं जो सत्य से प्रेम करते हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं। क्या ये नहीं दर्शाता कि उनकी प्रकृति बुरी है? (हाँ।) दानवों द्वारा निंदित, अलग-थलग और प्रताड़ित किए जाने के बाद कुछ लोग कहते हैं, “मैंने उन्हें नाराज नहीं किया, फिर भी वे मुझे नापसंद क्यों करते हैं?” क्या यह भ्रमित बात नहीं है? क्या यह चीजों की असलियत जानने में विफल होना और लोगों का भेद पहचानने में असमर्थ होना नहीं है? क्या बड़ा लाल अजगर ईसाइयों को इसलिए गिरफ्तार करता है और सताता है क्योंकि ईसाई कानून तोड़ते हैं और अपराध करते हैं? या इसलिए क्योंकि ईसाई उसे उखाड़ फेंकने और उसकी राजनीतिक सत्ता हथियाने के लिए राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेते हैं? (दोनों में से कोई भी नहीं।) तो फिर वह ऐसा क्यों करता है? हम राजनीति में भाग नहीं लेते, न ही उसका विरोध या पर्दाफाश करते हैं, उसकी सत्ता हथियाने के लिए राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना तो दूर की बात है। तो फिर वह हममें से उन लोगों को, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, इस तरह क्यों दबाता है और गिरफ्तार करता है? सिर्फ इसलिए कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, सत्य स्वीकारते हो, परमेश्वर को महान मानते हो और उसकी आराधना करते हो, वह तुमसे घृणा करता है। वह मानता है कि तुमने उसके साथ विश्वासघात किया है; तुम उसका अनुसरण, उसकी आराधना और उसके प्रति समर्पण नहीं करते, इसलिए वह तुमसे घृणा करता है। इसलिए वह तुम्हें दबाना और हटाना चाहता है, ताकि तुम्हें गायब करने का उद्देश्य हासिल कर ले। चूँकि वह एक दुष्ट दानव है और उसकी प्रकृति सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण है, इसलिए अगर तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो तो वह तुम्हारे प्रति शत्रुता रखेगा, तुमसे घृणा करेगा और तुम्हें सताने, हटाने और परमेश्वर के पास से छीनने का हर संभव उपाय करेगा। यही उसका उद्देश्य है। अगर तुम परमेश्वर का अनुसरण करना छोड़ दो, तो वह तुम्हारे प्रति इतनी शत्रुता नहीं रखेगा। बेशक, वह अभी भी तुम्हें बर्बाद करने, भ्रष्ट करने, तुम्हारे साथ खिलवाड़ करने और तुम्हें नियंत्रित करने का प्रयास करेगा। अगर तुम उसकी आराधना और अनुसरण कर सको, तो वह प्रसन्न होगा और तुम्हें यातना नहीं देगा, लेकिन अंत में तुम सिर्फ उसके साथ दफनाए ही जाओगे। शैतान की आराधना करने वाले किसी भी व्यक्ति का अंत कभी अच्छा नहीं होता!

परमेश्वर का विरोध करने की शैतान की प्रकृति कभी नहीं बदलेगी। शैतान के वे लोग, जो मसीह-विरोधी हैं, सत्य और परमेश्वर के प्रति इतने शत्रुतापूर्ण क्यों हैं? मुझे बताओ, उनका प्रकृति सार कितना बुरा है! वे निरपवाद रूप से सत्य, परमेश्वर का कार्य, कोई भी सकारात्मक चीज या सही कथन और अभ्यास नहीं स्वीकारते। वे न सिर्फ अपने दिलों में विकर्षण महसूस करते हैं और उन्हें स्वीकारने से इनकार करते हैं, बल्कि वे परमेश्वर का प्रतिरोध करने के लिए सक्रिय रूप से बुरे कर्म भी करते हैं और सत्य और सकारात्मक चीजों की निंदा करने के लिए तरह-तरह की निराधार अफवाहें और भ्रांतियाँ फैलाते हैं। ऐसे बुरे लोग परमेश्वर में विश्वास करके आशीष भी प्राप्त करना चाहते हैं; वे छल-कपट से परमेश्वर के घर में पैठ बना लेते हैं, लेकिन चूँकि वे सत्य जरा भी नहीं स्वीकारते, इसलिए उन्हें बेनकाब कर दिया जाता है और हटा दिया जाता है। उदाहरण के लिए, काट-छाँट स्वीकारना एक सकारात्मक चीज है। जब सामान्य लोग गलत काम करते हैं और उनकी काट-छाँट की जाती है, तो वे आत्म-चिंतन करेंगे। अगर उनका गलत काम गलत इरादों या भ्रष्ट स्वभाव के कारण था, तो वे उसका समाधान करने के लिए सत्य खोजेंगे। अगर उनका गलत काम उनकी खराब काबिलियत और चीजें स्पष्ट रूप से न देखने के कारण हुआ है, तो वे अग्रसक्रिय रूप से उसका समाधान करने के लिए कोई मार्ग भी खोजेंगे और अच्छी काबिलियत वाले ऐसे लोगों को ढूँढ़ेंगे जो सत्य समझते हों, ताकि वे उनकी मदद और मार्गदर्शन कर सकें। संक्षेप में, अपने जमीर और विवेक के मार्गदर्शन और विनियमन के तहत वे काट-छाँट किए जाने को सही तरीके से लेंगे। लेकिन जो दानव होते हैं, वे काट-छाँट किए जाने को कैसे लेते हैं? दानव खुद सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण होते हैं, लेकिन अपनी बुरी प्रकृति के कारण वे सिर्फ शत्रुता पर ही नहीं रुकेंगे; वे सत्य की निंदा, प्रतिरोध और ईश-निंदा भी करेंगे। इसलिए जब उनकी काट-छाँट की जाती है, तब वे जोर-शोर से बहस करने और अपना बचाव करने की कोशिश करते हैं। वे न सिर्फ सत्य को नकारते हैं, बल्कि उन लोगों पर हमला और उनकी निंदा भी करते हैं जो उनकी काट-छाँट करते हैं, यहाँ तक कि ऐसे शब्द भी फैलाते हैं : “परमेश्वर में विश्वास करना बहुत कठिन है! हममें से खराब काबिलियत वालों को जो सत्य नहीं समझते, अंततः बाहर निकाल दिया जाएगा। परमेश्वर के घर पर पलना आसान नहीं है! खराब काबिलियत वाले लोगों के पास आगे का कोई रास्ता नहीं है; हम दूसरों द्वारा सताए जाने के अलावा कुछ नहीं कर सकते। दूसरे हमारे साथ चाहे कैसे भी दुर्व्यवहार करें, हमें बस सहना होगा। हम अपनी खराब काबिलियत के अलावा किसे दोष दे सकते हैं? अगर तुम्हारी काबिलियत खराब है, तो तुम दूसरों से कमतर हो!” न सिर्फ वे काट-छाँट नहीं स्वीकारते या आत्म-चिंतन नहीं करते और खुद को नहीं जानते, बल्कि वे इस समस्या के समाधान के लिए अभ्यास के सिद्धांत या अभ्यास का मार्ग भी नहीं खोजते। अगर उनकी काबिलियत वाकई खराब है, तो वे अपनी अंतर्निहित स्थितियों की बुनियाद पर अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने और अपनी वफादारी अर्पित करने के लिए अपना सर्वोत्तम कैसे दे सकते हैं? क्या वे इस तरह सोचेंगे? वे सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण होते हैं, इसलिए वे इस तरह बिल्कुल नहीं सोचेंगे। इतना ही नहीं, वे चीजों को अगले स्तर तक ले जाएँगे और आलोचना और बदनामी में लग जाएँगे, यहाँ तक कि अपने दिल में गुप्त रूप से उन लोगों को कोसेंगे, जो उनकी काट-छाँट करते हैं : “हम्म! तुमने आज मुझे असहज कर दिया है। एक दिन मैं तुम्हें दिखाऊँगा कि हकीकत क्या है! तुम्हें लगता है कि मेरी काबिलियत खराब है? मैं कई सालों से परमेश्वर में विश्वास करता आया हूँ, जबकि तुमने बस कुछ ही साल विश्वास किया है! तुम मुझे नापसंद करते हो? एक दिन मैं तुम्हें इसके नतीजे भुगतवाऊँगा, तुम्हें एक भयानक मौत मरवाऊँगा!” देखो, जब उनकी काट-छाँट की जाती है, तब हालाँकि वे कुछ कहते नहीं, यहाँ तक कि मुस्कुराते भी हैं, लेकिन उनके दिल आक्रोश, घृणा और शापों से भरे रहते हैं। कुछ लोग काट-छाँट स्वीकारने में अपनी अनिच्छा दिखाते हैं, समय-समय पर शिकायत, हमले या आलोचना के शब्द बोलते हैं। वे न सिर्फ काट-छाँट के प्रति शत्रुतापूर्ण होते हैं, बल्कि वे उन लोगों पर हमला करने की पहल भी करते हैं जो उनकी काट-छाँट करते हैं, जो भी ऐसा करता है उसे बख्शने से इनकार कर देते हैं। कुछ महिलाएँ थोड़ी पिद्दी-सी हो सकती हैं और बाहर से काफी नाजुक दिख सकती हैं, लेकिन जब कोई सचमुच उनकी काट-छाँट करता है, तब वे आगबबूला हो जाती हैं : “मैंने इन तमाम सालों में परमेश्वर में विश्वास करते हुए बहुत कष्ट सहे हैं—क्या यह आसान रहा है? तुम मुझे नापसंद करते हो—पर जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे, तबसे मैं सुसमाचार का प्रचार कर रही हूँ! क्या तुम मुझे सिर्फ इसलिए धौंस देने की कोशिश कर रहे हो क्योंकि मैं बूढ़ी हूँ? मैं तुम्हें बता दूँ, ऐसा नहीं होने वाला! जाकर लोगों से पूछ लो—मैं अपने पूरे जीवन में किसके आगे झुकी हूँ?” क्या ऐसे स्वभाव वाले लोग सत्य स्वीकार सकते हैं? निश्चित रूप से नहीं। वे न सिर्फ काट-छाँट स्वीकार नहीं करते, बल्कि जो उनकी काट-छाँट करते हैं उन्हें कोसते भी हैं। क्या वे बहुत दुर्भावनापूर्ण नहीं हैं? जो लोग शैतान और दानव होते हैं, वे कुटिल, धूर्त, विश्वासघाती और चालाक होते हैं। चूँकि सत्य के प्रति उनका रवैया शत्रुता और आक्रमण का होता है, इसलिए जब उनके बुरे कर्म उजागर किए जाते हैं और उन्हें बहिष्कृत या निष्कासित करने की बारी आती है, और उनके आशीष पाने की कोई उम्मीद नहीं बचती, तो वे शिष्ट या विनम्र बिल्कुल भी नहीं रहेंगे, बल्कि प्रतिरोध करने के साधन अपनाएँगे। कुछ लोग झूठ गढ़ते हैं, कहते हैं कि अगुआ और कार्यकर्ता उन्हें सता रहे हैं, दूसरों को अपने बचाव में आने के लिए उकसाते हैं, जानबूझकर कलीसिया के कार्य में बाधा डालते हैं। कुछ दूसरे लोग यह कहते हुए समर्पण का ढोंग करते हैं, “परमेश्वर का घर मेरे साथ चाहे जैसा भी व्यवहार करे, अगर मुझे बी समूह में भेज दिया जाए या निकाल दिया जाए, तो भी मैं अपना कर्तव्य निभाऊँगा। मैं परमेश्वर के प्रति वफादार हूँ और कभी इस मार्ग से इनकार नहीं करूँगा या अपने कर्तव्य का त्याग नहीं करूँगा।” वे लोगों को ठगने के लिए दिखावा करते हैं जिससे यह लगे मानो उन्होंने पश्चात्ताप कर लिया है, मानो परमेश्वर का घर उनके साथ कैसा भी व्यवहार करे, वे स्वीकार और समर्पण कर सकते हैं और अपना कर्तव्य नहीं छोड़ेंगे। दरअसल, वे तुम्हें धोखा दे रहे हैं और तुम्हारे साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। वे मन ही मन सोचते हैं : “हम्म! सेवा करने के लिए मेरा इस्तेमाल करना चाहते हो? ठेंगा! जब मैं तुम्हारे सामने अपना संकल्प व्यक्त करता हूँ और कहता हूँ कि मैं अपना कर्तव्य निभाने को तैयार हूँ, तब वह सिर्फ एक औपचारिकता होती है, मैं तुम लोगों को बेवकूफ बना रहा होता हूँ!” बाहरी तौर पर, वे विशेष रूप से विनम्र और आज्ञाकारी दिखाई देते हैं, जिससे लोगों को लगता है कि वे कर्तव्य निभाने को तैयार हैं। लेकिन जब तुम वास्तव में उनके लिए कर्तव्य निभाने की व्यवस्था करते हो, तो वे लापरवाह होते हैं, छल-कपट करते हैं और तुम्हें धोखा देते हैं, यहाँ तक कि तुम्हारे सामने से गायब भी हो जाते हैं। उन्हें कोई कार्य सौंपे हुए दस दिन से ज्यादा हो सकते हैं और कोई प्रगति नहीं होगी। कुछ लोग अज्ञानी होते हैं और भेद नहीं पहचानते, और उन्हें यह चीज हैरतअंगेज लगेगी, वे सोचेंगे : “जब उसने यह करने के लिए हामी भरी थी, तो वह काफी गंभीर था, कह रहा था कि वह अपना कर्तव्य निभाने को तैयार है। ऐसा नहीं लगता था कि वह झूठ बोल रहा है। अब वह कहीं नजर क्यों नहीं आ रहा?” मैं तुम्हें सच बता दूँ : वे बस बड़े ठग हैं, वे दानव हैं। जो दानव हैं वे कर्तव्य निभाने को क्या समझते हैं? वे इसे परमेश्वर के घर द्वारा सेवा करने के लिए अपना इस्तेमाल करना, अपने साथ खिलवाड़ करना समझते हैं। जो दानव हैं उनकी कर्तव्य निभाने के प्रति यही मानसिकता रहती है। तुममें ऐसा क्या है जो इस्तेमाल किए जाने लायक हो? ज्यादा से ज्यादा, तुम किसी खास पेशे के बारे में थोड़ी समझ रखते हो। अगर परमेश्वर के घर को इस क्षेत्र के कार्य में कोई जरूरत है, तो इसका मतलब ज्यादा से ज्यादा यह है कि तुम उस कर्तव्य को निभाने के लिए उपयुक्त हो। कर्तव्य निभाने के मामले का तुम्हें मापने और तुमसे अपेक्षाएँ करने के लिए इस्तेमाल करना तुम्हारा उत्कर्ष है। अगर तुम मना करते हो और स्वीकार नहीं करते, तो तुम दया की कद्र करने में विफल हो रहे हो। जो लोग दानव हैं वे तर्क से पूरी तरह अछूते होते हैं, यह बस यही दर्शाता है। वे कर्तव्य निभाने की माँग करते हैं और जब कलीसिया उनके लिए कार्य की व्यवस्था करती है, तब वे मान लेते हैं कि परमेश्वर का घर उनका इस्तेमाल करना चाहता है। अगर तुममें कलीसिया में इस्तेमाल किए जाने के लिए सचमुच कोई मूल्य है, तो यह तुम्हारे लिए सौभाग्य की बात है या दुर्भाग्य की? (सौभाग्य की।) यह तुम्हारे लिए आफत है या आशीष? (आशीष।) तुम क्यों कहते हो कि यह आशीष है? (परमेश्वर के लिए सेवा करने में समर्थ होना परमेश्वर का उत्कर्ष है, इसलिए यह एक आशीष है।) तुम्हें यह समझना चाहिए : परमेश्वर के लिए सेवा करना परमेश्वर का उत्कर्ष है। उत्कर्ष का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि तुममें जो यह थोड़ी-सी व्यावसायिक सामर्थ्य है इसका इस्तेमाल परमेश्वर के घर के कार्य में किया जा सकता है, जो कि परमेश्वर द्वारा तुम्हें दिया गया एक मौका है, परमेश्वर ने तुम्हें अपने लिए सेवा करने का मौका दिया है, उद्धार प्राप्त करने का मौका दिया है, और यह तुम्हारे लिए आशीष पाने की एक मूलभूत शर्त है। जब तुममें यह मूलभूत स्थिति होती है, केवल तभी तुम्हें सत्य स्वीकारने और कदम-दर-कदम सत्य का अभ्यास करने और उद्धार पाने का मौका मिल सकता है। अगर तुममें कतई कोई मुक्तिदायक गुण नहीं है, तो परमेश्वर के घर में तुम निकम्मे हो। क्या परमेश्वर का घर तब भी तुम्हारा मुफ्त में भरण-पोषण करेगा? अगर परमेश्वर के घर में तुम्हारे निभाने के लिए कोई कर्तव्य नहीं है, तो परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध बनाए रखने के लिए तुम्हारे पास एक उपयुक्त और उचित साधन और मूलभूत स्थिति का अभाव है। अगर परमेश्वर के घर में तुम्हारा किसी विशिष्ट कार्य में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, तो इसका अर्थ है कि तुमने परमेश्वर के साथ कोई संबंध स्थापित नहीं किया है और इस तरह तुम्हारे पास परमेश्वर के सामने आने का कोई मौका नहीं है, मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य का कोई चरण या अवधि स्वीकारने का कोई मौका नहीं है। तो क्या तुम्हारे पास अभी भी उद्धार प्राप्त करने का मौका और स्थितियाँ हैं? इसलिए, अगर यह कहा जाए कि तुम्हारा इस्तेमाल किए जाने योग्य मूल्य है, तो यह गैर-विश्वासी दुनिया में असहज लग सकता है और शायद “इस्तेमाल” वहाँ एक नकारात्मक शब्द है—लेकिन परमेश्वर के घर में तुम्हें यह देखना होगा कि तुम्हारा इस्तेमाल कौन कर रहा है। इस “इस्तेमाल” की व्याख्या कैसे की जानी चाहिए? अगर परमेश्वर तुम्हारा इस्तेमाल करता है, तो इससे साबित होता है कि तुम्हारा अभी भी कुछ मूल्य है और तुम अभी भी परमेश्वर के लिए सेवा कर सकते हो। जब तुम परमेश्वर के लिए सेवा करते हो, तब क्या यह परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उत्कर्ष करना नहीं है? (हाँ, है।) यह परमेश्वर द्वारा तुम्हें एक मौका देना है, परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उत्कर्ष करना है। यह एक अच्छी चीज है; इससे साबित होता है कि परमेश्वर तुम्हारे प्रति कुछ सम्मान रखता है और वह अभी भी तुम्हें एक मौका देने का इच्छुक है। तो क्या परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया जाना शर्मनाक है? क्या यह नुकसान है? क्या इस्तेमाल किए जाने से तुम्हें कोई नुकसान होता है? क्या इससे तुम्हारा आत्मसम्मान या गरिमा नष्ट होती है? नहीं, तुम्हें इससे कहीं ज्यादा मिलता है। इससे तुम्हें परमेश्वर के सामने आकर सत्य और परमेश्वर का उद्धार स्वीकारने का मौका मिलता है। तुम्हें बिल्कुल भी नुकसान नहीं होता; तुम्हें बहुत बड़ा लाभ होता है। लेकिन जिन्होंने दानवों से पुनर्जन्म लिया है, वे इसे इस तरह नहीं देखते। उनमें बुरी प्रकृति होती है। शैतान चाहे उन्हें कैसे भी इस्तेमाल करे और भ्रष्ट करे, उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती; वे इससे पूरी तरह संतुष्ट रहते हैं। अगर सरकारी अधिकारी उनका इस्तेमाल करते हैं, तो वे इसे सौभाग्य, समृद्धि का संकेत मानते हैं। वे इसका भेद नहीं पहचानते, इसका विरोध नहीं करते, इसका प्रतिरोध नहीं करते या इसे अस्वीकार नहीं करते। लेकिन कलीसिया में, अगर उन्हें कोई कर्तव्य निभाने के लिए पदोन्नत किया जाता है, तो उन्हें लगता है कि यह सेवा करना है, वे खुद को बेच रहे हैं और कलीसिया उनका इस्तेमाल कर रही है। उदाहरण के लिए, एक खास महिला किसी खास पेशेवर कौशल के बारे में थोड़ी-बहुत समझ रखती है, इसलिए कलीसिया उसके लिए उस क्षेत्र में काम करने की व्यवस्था करती है। वह न सिर्फ इसे परमेश्वर से स्वीकार नहीं कर सकती, बल्कि अपने दिल में विशेष रूप से घृणा भी महसूस करती है : “मेरा इस्तेमाल करने की कोशिश? दोबारा सोचो! मैं उतनी मूर्ख नहीं हूँ! मैं इतने लंबे समय से जीवित हूँ और किसी ने कभी मेरा इस्तेमाल नहीं किया। ऐसा कोई माई का लाल अभी तक पैदा ही नहीं हुआ जो मेरा इस्तेमाल कर सके!” तुम्हें इतना उत्तेजित होने की जरूरत नहीं है। अगर तुम अपना कर्तव्य निभाने के इच्छुक हो, तो उसे परमेश्वर से स्वीकार लो और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाओ। अगर तुम अपना कर्तव्य निभाने के इच्छुक नहीं हो, तो परमेश्वर के घर से चले जाओ। परमेश्वर के घर का द्वार खुला है; तुम किसी भी समय जा सकते हो और जहाँ चाहो वहाँ जा सकते हो। परमेश्वर लोगों को मुफ्त में सत्य प्रदान करता है। परमेश्वर का लोगों को सत्य प्रदान करना और उसके द्वारा लोगों को जीवन की आपूर्ति, सब निःशुल्क है। क्या उसने तुमसे एक पैसा भी माँगा है? (नहीं।) तुम थोड़ा-सा कर्तव्य निभाते हो और फिर भी इसे परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया जाना समझते हो। क्या यह जमीर की कमी नहीं है, दया की कद्र नहीं करना नहीं है? क्या हुआ अगर परमेश्वर तुम्हारा इस्तेमाल करता है? क्या यह गलत है? तुम्हारा जीवन ही परमेश्वर का दिया हुआ है। क्या परमेश्वर तुम्हारा इस्तेमाल करने के योग्य नहीं है? क्या वह पात्र नहीं है? क्या तुम सिर्फ इसलिए अहंकारी और अकड़ू बन सकते हो कि तुम किसी पेशे के बारे में थोड़ा जानते हो? क्या परमेश्वर को तुम्हारा ताबेदार होना होगा, सम्मानपूर्वक तुमसे विनती करनी होगी, तुम्हें चीजें देने का वादा करना होगा, तुम्हें ऊँचा रखना होगा और सिंहासन पर बिठाना होगा—क्या इससे तुम खुश होगे? सामान्य मानवता से रहित लोग कर्तव्य निभाने का मामला ठीक से नहीं समझ सकते। वे हमेशा कहते हैं, “परमेश्वर का घर मेरा इस्तेमाल कर रहा है। मैं इतना मूर्ख नहीं हूँ; सिर्फ मूर्ख ही परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किए जाने के लिए तैयार होते हैं!” देखो, यह विचार विकृत भी है और बुरा भी, और पूरी तरह से अनुचित है! ऐसे लोगों के साथ कैसे व्यवहार किया जाना चाहिए? यह आसान है : चाहे उन्हें बाहर निकालना हो या बी समूह में रखना हो, बस उन्हें दूर कर दो। अगर तुम इस्तेमाल किए जाने से इतना डरते हो, तो तुम अब भी परमेश्वर के घर से क्यों चिपके हो और क्यों कहते हो कि तुम कोई कर्तव्य निभाना चाहते हो? क्या यह पाखंड और लोगों को धोखा देना नहीं है? अगर तुम इस्तेमाल किए जाने से डरते हो, तो परमेश्वर का घर कभी भी कोई कर्तव्य निभाने के लिए तुम्हारा इस्तेमाल नहीं करेगा; परमेश्वर का घर लोगों पर चीजें थोपता नहीं है। अब समय आ गया है कि हर किसी को उसके प्रकार के अनुसार छाँटा जाए। जो कोई अपना कर्तव्य निभाने के लिए तैयार है, वह रहेगा; जो कोई अपना कर्तव्य निभाने के लिए तैयार नहीं है, उसे तुरंत कलीसिया से चले जाना चाहिए और कभी वापस नहीं आना चाहिए। परमेश्वर का घर किसी को मजबूर नहीं करता। जो लोग स्वेच्छा से अपना कर्तव्य निभाते हैं, सिर्फ वे ही परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं। जो लोग अपना कर्तव्य निभाने के लिए तैयार नहीं हैं, वे सब शैतान के नौकर हैं जो यहाँ कलीसिया के कार्य में बाधा डालने के लिए हैं। कुछ लोग अपना कर्तव्य निभाकर आशीष प्राप्त करना चाहते हैं, लेकिन साथ ही इस्तेमाल किए जाने से डरते भी हैं। क्या इन लोगों में जमीर और विवेक है? (नहीं।) ये हमेशा नुकसान उठाने से डरते हैं, हमेशा महसूस करते हैं कि परमेश्वर का घर उनका फायदा उठा रहा है, उन्हें बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है। क्या यह, यह पहचानने में विफलता नहीं है कि उनके लिए क्या अच्छा है? तुम्हें क्या नुकसान हुआ है? अगर तुम अपने तकनीकी कौशलों का विनिमय सत्य और उद्धार से करने की कोशिश करते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम वह विनिमय नहीं कर सकते; तुम योग्य नहीं हो, तुम पात्र नहीं हो। परमेश्वर के वचन जीवन हैं; वे मानवजाति के लिए भ्रष्ट स्वभाव त्यागने और शैतान के प्रभाव से मुक्त होने के सबसे शक्तिशाली हथियार हैं। सिर्फ परमेश्वर के वचन, सिर्फ सत्य ही उस पुरानी मानवजाति का उन्मूलन कर सकते हैं जिसमें शैतान का प्रकृति सार है। सिर्फ परमेश्वर का जीवन, सिर्फ सत्य ही इस मानवजाति को जीवित रहने दे सकता है और शैतान की नियति समाप्त कर सकता है। परमेश्वर का जीवन और सत्य अमूल्य निधियाँ हैं; दुनिया की किसी भी भौतिक चीज का और किसी भी ऐसी चीज का जिसे लोग बहुमूल्य समझते हैं, उनके साथ विनिमय नहीं किया जा सकता। लोग अपना जीवन अर्पित करके भी उसके विनिमय से परमेश्वर का जीवन और सत्य नहीं पा सकते, लोगों के तुच्छ तकनीकी कौशलों की तो बात ही छोड़ो। सत्य बिक्री के लिए नहीं है; परमेश्वर का घर सत्य नहीं बेचता, जीवन नहीं बेचता। तो लोग जीवन पाने के लिए भला क्या कर सकते हैं? सिर्फ सत्य स्वीकार कर, सत्य के प्रति समर्पण करके, परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी और ईमानदारी अर्पित करके और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाकर ही वे जीवन प्राप्त कर सकते हैं।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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