सत्य का अनुसरण कैसे करें (16) भाग चार

जो लोग उचित-अनुचित का भेद नहीं पहचान सकते, वे कुछ सही और सकारात्मक कथनों से सहमत हो सकते हैं या बाहर से, कुछ सकारात्मक चीजों को पसंद करने और उनकी लालसा रखने में दूसरों का अनुसरण कर सकते हैं। हालाँकि एक बार समय बीत जाने के बाद, परिवेश बदलेगा और साथ ही लोग, घटनाएँ और चीजें बदलेंगी, ये सकारात्मक चीजें उनके दिलों की गहराइयों में तुरंत नकारात्मक चीजें बन जाएँगी, जबकि नकारात्मक चीजें जिन्हें वे सही मायने में पसंद करते हैं, तब सकारात्मक चीजें बन जाएँगी, उनके अनुसरण की वस्तुएँ बन जाएँगी। कहने का मतलब यह है कि अपनी पसंद की किसी भी नकारात्मक चीज को देखने से पहले सकारात्मक चीजें उनके लिए सिर्फ एक धर्म-सिद्धांत होती हैं और वे बहाव के साथ बह सकते हैं और झुंड का अनुसरण कर सकते हैं, लेकिन जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती जाएगी और समय बीतता जाएगा, वे अपने दिलों में जिन चीजों से सही मायने में प्रेम करते हैं और उनके जो सच्चे दृष्टिकोण हैं वे स्वाभाविक रूप से प्रकट हो जाएँगे। उदाहरण के लिए, कुछ लोग अक्सर कहते हैं, “परमेश्वर में विश्वास रखना अच्छा है; जो लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हैं वे सही मार्ग पर चलते हैं और बुराई नहीं करते हैं; वे सभी अच्छे लोग हैं।” लेकिन जब उन्हें परमेश्वर में विश्वास रखते हुए कुछ वर्ष हो जाते हैं और वे देखते हैं कि परमेश्वर के घर के सभी धर्मोपदेश और संगतियाँ लोगों को ईमानदार होने, सत्य का अनुसरण करने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य करने के लिए कहती हैं तो उसके बाद वे इससे विमुख हो जाते हैं, और उन्हें लगता है कि परमेश्वर में विश्वास रखना व्यर्थ है और वे कलीसिया छोड़ना और दुनिया में लौट जाना चाहते हैं; उनके दिल कलीसिया में नहीं होते हैं। सत्य से प्रेम नहीं करने वाले लोग ऐसे ही होते हैं। दरअसल, इस तरह का व्यक्ति सकारात्मक चीजों को पसंद नहीं करता है और उसके दिल में बहुत-से टेढ़े-मेढ़े तर्क और पाखंड होते हैं। उसके लिए, ये टेढ़े-मेढ़े तर्क और पाखंड सकारात्मक चीजें हैं, जबकि अपने दिल की गहराइयों में वह सही मायने में सकारात्मक चीजों से विमुख होता है, उनसे नफरत करता है, उनका तिरस्कार करता है और उन्हें कभी नहीं स्वीकारता है। चूँकि वह सकारात्मक चीजों को कभी नहीं स्वीकारता और वह नकारात्मक चीजों को पसंद करता है, ठीक इसी वजह से इस तरह के व्यक्ति की मानवता में उचित-अनुचित का भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कुछ लोग जब पहली बार परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करते हैं तब वे सिर्फ आशीषों के लिए ही ऐसा करते हैं। बहुत-से वर्षों तक धर्मोपदेश सुनने के बाद अंततः वे समझ जाते हैं : “परमेश्वर में विश्वास रखने का मतलब है कि लोगों से ईमानदार होने, समर्पित होने और अपना कर्तव्य करने में कीमत चुकाने को तैयार रहने, परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होने, लापरवाही से और मनमाने ढंग से कार्य नहीं करने और परमेश्वर के घर के हितों को बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है। विशेष रूप से जब परमेश्वर के घर के हित उनके अपने हितों से टकराते हैं तब उन्हें परमेश्वर के घर के हितों को बनाए रखना होगा और अपने व्यक्तिगत हितों को छोड़ देना होगा।” सत्य के सभी अलग-अलग पहलुओं के बारे में जानने के बाद उन्हें परमेश्वर में विश्वास रखने का पछतावा होता है, कहते हैं, “मुझे लगा था कि परमेश्वर में विश्वास रखने का मतलब है एक बड़े समूह का हिस्सा होना, एक शक्तिशाली ताकत पाना जिस पर भरोसा किया जा सके और जब तक लोग बहुत कुछ त्याग करते हैं, कष्ट सहते हैं और कीमत चुकाते हैं तब तक वे राज्य में प्रवेश कर सकते हैं और एक अच्छा गंतव्य पा सकते हैं और गर्जन करते हुए अगले युग में जा सकते हैं, उसके मालिक बन सकते हैं और राजाओं की तरह शासन कर सकते हैं। लेकिन अब पता चला कि ऐसा नहीं है। परमेश्वर में विश्वास रखना दरअसल लोगों को यह सिखाना है कि उन्हें कैसे आचरण करना है, कैसे परमेश्वर के प्रति समर्पण करना है और कैसे बुराई से दूर रहना है। अगर लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हैं तो विशेष रूप से उनसे हमेशा ईमानदार होने और ईमानदारी से बोलने के लिए कहा जाता है और हमेशा सत्य का अभ्यास करने के लिए कहा जाता है; उन्हें अंतिम निर्णय लेने की अनुमति नहीं होती। तो फिर परमेश्वर में विश्वास रखने का क्या मतलब है?” फिर उनके दिलों में शिकायतें उत्पन्न हो जाती हैं और वे अपनी आस्था से पीछे हटना चाहते हैं। लेकिन फिर वे सोचते हैं, “मुझे परमेश्वर में विश्वास रखते हुए कई वर्ष हो गए हैं; अगर मैं अब रुक गया तो क्या मेरा विश्वास व्यर्थ नहीं जाएगा?” उस बिंदु पर वे हार मानने के अनिच्छुक होते हैं। लेकिन अगर उन्होंने विश्वास रखना जारी रखा तो उन्हें सत्य में कोई दिलचस्पी नहीं है। परमेश्वर का घर हमेशा सत्य का अनुसरण करने और वास्तविकता में प्रवेश करने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने, सत्य की तलाश करने और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने की बात करता है। वे इन चीजों के बारे में सुन-सुनकर थक चुके होते हैं और अब इनके बारे में और नहीं सुनना चाहते हैं। विशेष रूप से जब परमेश्वर का घर सत्य का अभ्यास करने की बात करता है तब वे अंदर ही अंदर परेशान और दुखी महसूस करते हैं; जब सकारात्मक चीजों का जिक्र किया जाता है तब वे अपने दिलों में उनसे विमुखता महसूस करते हैं और उनका तिरस्कार करते हैं और वे सुनने को तैयार नहीं होते। कुछ लोग यह एहसास होने के बाद कि अगर उन्होंने अंत तक विश्वास रखा तो भी उन्हें सत्य या अच्छा गंतव्य नहीं मिलेगा, वे बस विश्वास रखना ही बंद कर देते हैं। उनमें से कुछ लोग नौकरी ढूँढ़ने या कारोबार करने लग जाते हैं और कुछ शादी करने के लिए घर वापस चले जाते हैं। वे परमेश्वर में विश्वास रखना छोड़ देते हैं क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते। परमेश्वर का घर हमेशा सत्य के बारे में बात करता रहता है और सत्य पर संगति करता रहता है जिससे वे विशेष रूप से विमुख होते हैं। यह दर्शाता है कि इस तरह के व्यक्ति में कोई जमीर और विवेक नहीं होता और वह उचित-अनुचित का भेद नहीं पहचान सकता। उचित-अनुचित का भेद पहचानने में असमर्थ होने का मतलब है कि अपनी मानवता में उनके पास सकारात्मक और नकारात्मक चीजों को पहचानने का मानक और क्षमता नहीं होती; यह कुछ ऐसी चीज है जो उनके पास नहीं है। तो क्या इस तरह के व्यक्ति में सामान्य मानवता होती है? (नहीं।) वह गैर-मनुष्य है। अगर किसी व्यक्ति में सही मायने में मानवता हो तो एक चीज इसे प्रमाणित कर सकती है : वह अपने दिल में सकारात्मक चीजों से प्रेम करता है और उनकी लालसा करता है। यहाँ तक कि जब वह सत्य नहीं समझता तब भी वह एक ऐसे न्यायपूर्ण समाज की लालसा करता है जो अंधकार से मुक्त हो, वह सकारात्मक चीजों की लालसा करता है और यह लालसा करता है कि सत्य का शासन हो। लेकिन यह बुरा समाज उसके लिए यह जगह प्रदान नहीं करता और अगर लोग कुछ सकारात्मक चीजें प्रकट करते हैं तो उन्हें अलग कर दिया जाता है और कुचल दिया जाता है। इन हालातों में मानवता वाले लोग उन सकारात्मक चीजों को प्राप्त नहीं कर सकते जिन्हें वे पसंद करते हैं और जिनकी वे लालसा करते हैं, इसलिए वे अपने दिलों में व्यथित महसूस करते हैं। लेकिन जब वे परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, उसके बाद परमेश्वर के वचनों को पढ़कर और धर्मोपदेशों को सुनकर वे बहुत-से सत्य समझ जाते हैं और ये सत्य उन सकारात्मक चीजों के अनुरूप होते हैं और उनसे मेल खाते हैं जिन्हें उनकी मानवता पसंद करती है, जिससे सकारात्मक चीजों के लिए उनकी जरूरतें सटीक रूप से पूरी हो जाती हैं। इसलिए, उनके दिल सकारात्मक चीजों की और भी ज्यादा लालसा करते हैं। हालाँकि वे अभी पूरी तरह से सत्य को अभ्यास में नहीं ला सकते हैं—परिवेशी सीमाओं, अपने छोटे आध्यात्मिक कद या कुछ भ्रष्ट स्वभावों से बाधित और बँधे होने के कारण—फिर भी उनमें यह संकल्प और इच्छा होती है कि वे किसी दिन सत्य और परमेश्वर के वचनों के अनुसार पूरी तरह से अभ्यास कर पाएँगे जिससे वे परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण प्राप्त कर सकेंगे और अपनी उन जरूरतों को पूरा कर सकेंगे जो उनके सकारात्मक चीजों को पसंद करने से उत्पन्न होती हैं। ऐसे लोगों की मानवता में उचित-अनुचित का भेद पहचानने में समर्थ होने का गुण होता है; वे मानवता वाले लोग होते हैं। अगर तुम सिर्फ यह दावा करते हो कि तुम्हें सकारात्मक चीजें पसंद हैं और मौखिक रूप से स्वीकार करते हो कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह अच्छा होता है तो यह सिर्फ धर्म-सिद्धांत बोलना और नारे लगाना है। सुखद शब्द और सही सिद्धांत कहना, या बड़े-बड़े शब्द बोलना—ऐसा कोई भी कर सकता है। इससे यह प्रकट नहीं होता कि तुम सही मायने में सकारात्मक चीजों को पसंद करते हो। लेकिन जब तुम सत्य सुनते हो तब अगर तुम उससे प्रेम कर सकते हो और उसकी लालसा कर सकते हो और जितना ज्यादा तुम सत्य सुनते हो, उतना ही ज्यादा तुम सत्य की लालसा करते हो और उसे तलाशने की तुम्हारी इच्छा उतनी ही ज्यादा हो जाती है और परमेश्वर का अनुसरण करने और उद्धार प्राप्त करने में तुम्हारी आस्था उतनी ही दृढ़ हो जाती है; और अगर परमेश्वर में विश्वास रखने की प्रक्रिया में तुम्हें अपने विभिन्न प्रयासों में लाभ प्राप्त होते हैं, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव धीरे-धीरे त्याग दिए जा रहे हैं और परमेश्वर का प्रतिरोध करने और उसके खिलाफ विद्रोह करने के तुम्हारे क्रियाकलाप लगातार कम होते जा रहे हैं—तो तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सकारात्मक चीजें पसंद करता है, तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसके पास सत्य वास्तविकता है। ऐसे लोग परमेश्वर में अपने विश्वास में सफल होते हैं और लाभ प्राप्त करते हैं। तुम यह महसूस कर सकते हो कि तुम बदल गए हो और परमेश्वर और सत्य के प्रति तुम्हारा रवैया पहले से भिन्न है। इससे पहले तुम परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करते थे और परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करते थे और तुम बहुत छोटे मामलों में भी सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते थे। लेकिन अनुसरण के इन वर्षों के जरिए, कर्तव्य करने के इन वर्षों के जरिए और सभी पहलुओं में अपने प्रयासों के जरिए तुमने कुछ सत्य समझ लिया है और जब मामलों से तुम्हारा सामना होता है तब तुम सत्य की तलाश कर सकते हो और अपने देह की इच्छाओं के खिलाफ विद्रोह कर सकते हो। सिद्धांतों से जुड़े कुछ बड़े मामलों में तुम सिद्धांतों का पालन भी कर सकते हो और तुम्हारे लिए अपनी इच्छानुसार कार्य नहीं करना संभव है और तुम परमेश्वर के घर के हितों को बनाए रख सकते हो और कलीसिया के कार्य को बनाए रख सकते हो। इसका मतलब है कि तुम्हारा कुछ आध्यात्मिक कद है, तुम्हारे पास अपने खिलाफ विद्रोह करने और सत्य स्वीकारने और उसके प्रति समर्पण करने में कुछ अभ्यास और प्रवेश है और तुम्हारे विभिन्न भ्रष्ट स्वभाव भी अलग-अलग मात्रा में बदल चुके हैं। यह उन लोगों में उचित-अनुचित का भेद पहचानने की अभिव्यक्ति है जिनमें सही मायने में मानवता होती है।

जो लोग उचित-अनुचित का भेद नहीं पहचान सकते, हो सकता है कि वे भी सत्य स्वीकार करना चाहें और उद्धार का अनुसरण करने के इच्छुक हों, लेकिन जब उनका सामना चीजों से होता है तब वे सत्य को अभ्यास में नहीं ला सकते हैं। वे अभी भी अपने भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार जीते हैं, अक्सर परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करते हैं और उसका प्रतिरोध करते हैं, बिना यह जाने कि वे ऐसा कर रहे हैं। दस वर्ष पहले उन्होंने परमेश्वर के खिलाफ इसी तरह से विद्रोह किया था और दस वर्ष बाद अब भी वे ऐसा ही कर सकते हैं। वे न तो सत्य स्वीकारते हैं और न ही उसका अभ्यास करते हैं। इसके दो कारण हैं : एक तो यह कि वे यह बिल्कुल नहीं समझते कि सत्य क्या है और बस अपने तर्क, अपनी खुद की कहावतों और अपने खुद के नजरियों से चिपके रहते हैं। दूसरा यह कि वे सत्य स्वीकारने वाले लोग तो बिल्कुल भी नहीं हैं। दस वर्ष पहले उन्होंने जिस भी तरीके से परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह किया था, दस वर्ष बाद अब भी वे उसी तरीके से ऐसा कर रहे हैं, इसमें कोई बदलाव नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर में विश्वास रखते हुए उन्हें कितने वर्ष हो चुके हैं, उनके पास सत्य स्वीकारने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने की कोई गवाही नहीं है, और देह और अपने भ्रष्ट स्वभावों के खिलाफ विद्रोह करने की गवाही तो और भी कम है। इससे यह प्रकट होता है कि वे सत्य स्वीकारने वाले लोग नहीं हैं। ऐसे लोग उचित-अनुचित का भेद पहचानने वाले लोग नहीं हैं। यह भी कहा जा सकता है कि वे मानवता वाले लोग नहीं हैं—सादे शब्दों में कहा जाए तो वे मनुष्य नहीं हैं। कुछ लोग इन शब्दों को सुनने के बाद अपने दिलों में आश्वस्त नहीं होते। वे कहते हैं, “मुझे परमेश्वर में विश्वास रखते हुए दस वर्ष से ज्यादा हो चुके हैं और मैं हमेशा अपना कर्तव्य करता रहा हूँ। बस यही है कि मैं कभी-कभी कुछ गलतियाँ कर बैठता हूँ और कुछ काट-छाँट से गुजरता हूँ। क्या यह बहुत सामान्य नहीं है? हर किसी में भ्रष्ट स्वभाव होते हैं; गलतियाँ कौन नहीं करता? जो भी हो, मैं सच्चा विश्वासी हूँ। तुम यह कैसे कह सकते हो कि मुझमें कोई मानवता नहीं है?” यह सच है कि तुम सच्चे विश्वासी हो, लेकिन क्या सच्चा विश्वासी होने का मतलब यह है कि तुम सत्य स्वीकार सकते हो? क्या सच्चा विश्वासी होने का मतलब यह है कि तुम देह के खिलाफ विद्रोह कर सकते हो और तुम उद्दंड नहीं होगे? क्या सच्चा विश्वासी होने का मतलब यह है कि तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हो? ऐसा नहीं है। सच्चा विश्वासी होना ही सब कुछ नहीं है और इसका मतलब यह नहीं है कि तुम उद्धार प्राप्त कर सकते हो। उद्धार प्राप्त करना निर्णायक रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि क्या तुम्हारी मानवता सत्य स्वीकार सकती है और क्या तुम उचित-अनुचित का भेद पहचान सकते हो। सच्चा विश्वासी होना लोगों के लिए अंततः उद्धार प्राप्त करने की सबसे जरूरी शर्त नहीं है और न ही यह मूलभूत शर्त है। तुम कहते हो कि तुम सच्चे विश्वासी हो, लेकिन तुमने कितना सत्य समझा है और प्राप्त किया है? जब परमेश्वर के घर के हितों की बात आती है तब तुमने कितने अवसरों पर उन्हें बनाए रखा है? अगर तुम यह सोचते हो कि तुम सच्चे विश्वासी हो, तुममें जमीर और मानवता है और तुम सच्चे व्यक्ति हो तो उसी मामले में अगर तुम दस वर्ष पहले परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह कर सके थे तो क्या अब भी तुम परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह कर सकते हो? क्या तुम बदल गए हो? क्या तुमने देह के खिलाफ विद्रोह किया है? अगर तुमने देह के खिलाफ विद्रोह नहीं किया है तो क्या तुम अगले दस वर्षों में ऐसा कर सकते हो? अगर तुम अभी भी देह के खिलाफ विद्रोह नहीं कर सकते हो और अभी भी परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह कर सकते हो तो यह दर्शाता है कि तुम्हारी मानवता में कोई समस्या है। तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते हो, इसलिए अगर तुम यह कहते हो कि तुम सच्चे विश्वासी हो तो यह बेकार है। तुम कहते हो कि तुम कष्ट सहने और कीमत चुकाने के इच्छुक हो और तुम लगन से अपना कर्तव्य करने के इच्छुक हो, लेकिन यह इच्छुक होना बेकार है। यह तुम्हारे लिए सत्य का अभ्यास करने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने की बस एक पूर्वापेक्षा है, लेकिन तुम अंततः इसे अभ्यास में ला सकते हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुममें मानवता है या नहीं। अगर तुम्हारा दिल अपने भ्रष्ट स्वभावों पर अंकुश लगाने और नियंत्रण करने में हमेशा असमर्थ रहता है और तुम अपने खुद के हितों को बनाए रखना चुनते हो और सकारात्मक चीजों के बजाय नकारात्मक चीजों को चुनते हो तो यह दर्शाता है कि तुम्हारी मानवता सत्य से प्रेम नहीं करती और उसमें तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों को नियंत्रित करने की क्षमता नहीं है। अगर जब तुम सत्य नहीं समझते थे तब तुममें अपने भ्रष्ट स्वभावों के प्रकाशनों को नियंत्रित करने की क्षमता नहीं थी तो यह क्षम्य है। लेकिन अब स्थिति भिन्न है। तुमने बहुत-से वर्षों से सत्य के बारे में धर्मोपदेश सुने हैं, फिर भी तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों को नियंत्रित नहीं कर सकते हो जिससे तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कर सको और जब चीजों से तुम्हारा सामना हो तब तुम सही चुनाव कर सको। तुम बुरे लोगों को कलीसिया के कार्य में बाधा डालते हुए स्पष्ट रूप से देखते हो, फिर भी तुम परमेश्वर के घर के हितों का बचाव करने के लिए उठ खड़े नहीं हो सकते। लेकिन जब कोई तुम्हारे हितों को चोट पहुँचाता है तब तुम उनका बचाव करने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा सकते हो। यह चीज यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि तुम्हें नियमित और नियंत्रित करने के लिए तुम्हारी मानवता में कोई जमीर या विवेक नहीं है जिससे तुम अभ्यास का सही मार्ग और सिद्धांत चुन सको। अगर तुम ऐसे अनुचित कार्य करते हो और फिर भी यह दावा करते हो कि तुम मनुष्य हो तो यह दर्शाता है कि तुम्हारा जमीर और विवेक अब और काम नहीं कर रहे हैं। तो फिर तुम एक सामान्य व्यक्ति नहीं हो क्योंकि तुम्हारी मानवता में कोई जमीर और विवेक नहीं है और न ही ऐसा कुछ है जो तुम्हें सही चुनाव करने में समर्थ बना सके। समझे? कुछ लोग कहते हैं, “अभी मेरा आध्यात्मिक कद छोटा है। अपने पारिवारिक परिवेश और परवरिश के कारण मैं स्वेच्छाचारी, अति लिप्त रहने वाला और अभिमानी हूँ। लेकिन वास्तविक जीवन में मैं जानता हूँ कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं और नकारात्मक चीजें क्या होती हैं और मैं जानता हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। बस यही है कि मेरा आध्यात्मिक कद छोटा है और मेरे पास कोई ऐसा व्यक्ति नहीं रहा जो सत्य समझता हो ताकि वह मुझे प्रबुद्ध कर सके, मेरा पर्यवेक्षण कर सके और मुझसे आग्रह कर सके, इसलिए मैं सत्य को अभ्यास में नहीं लाया और मैंने कुछ अपराध किए हैं और मुझे अंदर से थोड़ा पछतावा महसूस होता है।” वास्तविक जीवन में ऐसे लोग अपने आचरण को नियमित करने और खुद को संयमित करने के लिए अपने जमीर का उपयोग कर सकते हैं ताकि वे सही मार्ग पर चल सकें। ये वे लोग हैं जिन्हें बचाया जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सत्य स्वीकार सकते हैं, कुछ सत्य को अभ्यास में ला सकते हैं, और वे कुछ बदलावों से गुजर चुके हैं। बस यही है कि उनकी प्रगति की गति औसत से जरा-सी धीमी है और उनका विकास कुछ हद तक कम व्यापक है, लेकिन वे बदल रहे हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे कुछ बीज अच्छी मिट्टी में तेजी से उगते हैं, जबकि कुछ रेत या चट्टान की दरारों में धीरे-धीरे और ज्यादा मुश्किल से उगते हैं; लेकिन जब तक उनमें जीवन रहता है तब तक वे उगते रहते हैं। लोगों के साथ भी ऐसा ही है। जब तक उनकी मानवता में वह जमीर और विवेक होता है जो लोगों में होना चाहिए तब तक यह प्रमाणित होता है कि उनमें मानव जीवन है—जब वे सत्य स्वीकार लेंगे, उसके बाद वे बदल जाएँगे। भले ही यह बदलाव धीमा हो—दूसरे लोग दस वर्षों में बड़ी प्रगति कर लेते हैं जबकि वे बीस-तीस वर्षों में सिर्फ थोड़ी-सी प्रगति करते हैं—धीमेपन के बावजूद वे एक सकारात्मक दिशा में विकसित हो रहे हैं, वे बदल रहे हैं और उनका जीवन निरंतर बढ़ रहा है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी तेजी से या धीरे-धीरे बढ़ते हैं, इस तरह के व्यक्ति में मानवता का गुण होता है। हालाँकि एक और तरह का व्यक्ति भी है जिसे परमेश्वर में विश्वास रखते हुए बहुत-से वर्ष हो गए हैं, लेकिन उसने कोई जीवन विकास प्राप्त नहीं किया है। चाहे कोई भी सत्य पर संगति क्यों न करे, वह विमुखता का बोध महसूस करता है और सुनने का इच्छुक नहीं होता है। परमेश्वर चाहे कैसा भी परिवेश बनाए, वह सत्य की तलाश नहीं करता है, उससे सबक नहीं सीख सकता और उससे सकारात्मक मार्गदर्शन और मदद प्राप्त नहीं कर सकता। वह अपने दिल में सकारात्मक चीजों से विमुख होता है। उसका स्वेच्छाचारी स्वभाव और जीवनशैली कभी नहीं बदली है। ऐसे लोग बिना जमीर और विवेक वाले होते हैं। वे मनुष्य नहीं हैं—वे गैर-मनुष्य हैं। जब मैं इसे इस तरीके से समझाता हूँ, तो क्या यह तुम्हारे लिए ज्यादा स्पष्ट और ज्यादा समझने योग्य हो रहा है? (हाँ।)

एक और तरह का व्यक्ति भी है : वह जानता है कि परमेश्वर में विश्वास रखना अच्छा है, लेकिन वह यह नहीं समझता कि सकारात्मक और नकारात्मक चीजें क्या होती हैं; इसके अतिरिक्त, वह अपनी वाणी और क्रियाकलापों को नियमित या नियंत्रित करने के लिए अपने जमीर का उपयोग करने के बिल्कुल भी करीब नहीं होता है। ऐसे लोगों का भेद पहचानना आसान है। वे सकारात्मक चीजों को पसंद करने के बिल्कुल भी करीब नहीं होते और न ही वे चीजों का मतलब समझने के पास पहुँचते हैं। यह सब उनके लिए एक उलझन है। अगर तुम उनसे पूछते हो कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं तो वे धर्म-सिद्धांतों के लिहाज से बात करेंगे और कहेंगे कि परमेश्वर जो कहता और करता है, वे सब सकारात्मक चीजें हैं। वे जो कहते हैं वह सुनने में तो काफी अच्छा लगता है, लेकिन जब उनका सामना चीजों से होता है तब वे उन्हें परमेश्वर के वचनों से नहीं जोड़ पाते या उनका भेद नहीं पहचान पाते; उनके मन खिचड़ी बन जाते हैं, वे भ्रमित हो जाते हैं और उनमें किसी भी चीज के बारे में कोई स्पष्टता नहीं होती है। अगर तुम उनसे पूछते हो कि इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखने से उन्हें क्या सत्य प्राप्त हुए हैं तो वे कहते हैं, “परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है, वह मनुष्य के लिए जो कुछ भी करता है वह अच्छा है और परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है। शैतान परमेश्वर का प्रतिरोध करता है और शैतान मनुष्य को चोट पहुँचाता है, उसे सताता है और उसके साथ दुर्व्यवहार करता है।” अगर तुम उनसे पूछते हो कि उन्होंने और क्या प्राप्त किया है तो वे कहते हैं, “हमें अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करना चाहिए, ज्यादा कष्ट सहना चाहिए और ज्यादा बड़ी कीमत चुकानी चाहिए।” अगर तुम उनसे पूछते हो कि अपना कर्तव्य करने में किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए तो वे कहते हैं, “हमसे ऊपर वाले जो भी कहते हैं, हमें उसे मानना चाहिए और हमसे जो भी करने को कहा जाता है, हमें उसे करना चाहिए। अगर वह कार्य गंदा और थकाऊ हो तो भी हमें उसे अच्छी तरह से करना चाहिए; हमें गड़बड़ नहीं करनी चाहिए और बाधा नहीं डालनी चाहिए या परेशानी उत्पन्न नहीं करनी चाहिए। हमें ऐसी चीजें करनी चाहिए जो सभी के लिए और परमेश्वर के घर के लिए फायदेमंद हैं।” वे जो ये धर्म-सिद्धांत बोलते हैं, वे सभी सही हैं, उनमें एक भी गलत शब्द नहीं है। लेकिन जब उनका सामना चीजों से होता है तब वे सिर्फ कुछ विकृत और बेवकूफी भरे दृष्टिकोण प्रकट करते हैं और चाहे तुम उन्हें कितनी भी बार क्यों न सुधारो, वे बदल नहीं सकते हैं। ऐसे लोग किस तरह के नीच हैं? (वे भ्रमित लोग हैं।) क्या भ्रमित लोग मनुष्य होते हैं? (नहीं।) भ्रमित लोग क्या होते हैं? (जानवर।) इसके लिए सभ्य शब्द “पशु” है और बोलचाल का शब्द “जानवर” है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितने धर्मोपदेश सुनते हैं, वे यह नहीं समझते कि सत्य क्या है, सकारात्मक चीजें क्या होती हैं या नकारात्मक चीजें क्या होती हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे ऐसी कितनी चीजें करते हैं जो परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करती हैं, उन्हें अपने दिलों में इसकी कोई जागरूकता नहीं होती और फिर भी उन्हें लगता है कि वे स्वाभाविक रूप से रहमदिल हैं और उनके पास सहानुभूति भरा दिल है। जब वे किसी को कष्ट सहते देखते हैं तब वे अपने दिलों में दुखी महसूस करते हैं और सोचते हैं कि काश वे उसकी जगह कष्ट सह सकते। जब वे देखते हैं कि किसी के पास खाने-पहनने के लिए कुछ भी नहीं है तब वे उसे अपने खुद के कपड़े और भोजन देना चाहते हैं। वे मानवजाति की भ्रष्टता को उजागर करने वाले परमेश्वर के चाहे कितने भी वचन क्यों न सुन लें, उन्हें अभी भी यही लगता है कि वे बहुत अच्छे हैं, हर किसी से बेहतर हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी सारी गलत चीजें करते हैं, उन्हें पता ही नहीं होता कि उनसे कहाँ गलती हुई और वे कभी स्वीकार नहीं करते कि उनमें भ्रष्ट स्वभाव है। अगर तुम उनसे पूछते हो, “क्या तुम भ्रष्ट मनुष्य हो? क्या तुममें भ्रष्ट स्वभाव है?” वे कहते हैं, “हाँ, है। हर किसी में भ्रष्टता होती है, तो मुझमें कैसे नहीं होगी? तुम बेवकूफी भरे शब्द बोल रहे हो!” वे तुम्हें बेवकूफ तक बुला देते हैं। लेकिन जब वे कुछ गलत चीज करते हैं तब वे उसे स्वीकार नहीं करते हैं और यहाँ तक कि दोष भी दूसरों के मत्थे मढ़ देते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे क्या गलत करते हैं, वे उसे स्वीकार नहीं करते और चाहे उनके द्वारा किए गए बुरे कर्म कितने भी गंभीर हों, खुद को सही ठहराने के लिए उनके पास हमेशा बहाने और कारण होते हैं। क्या ऐसे लोगों के पास कोई विवेक होता है? क्या वे उचित-अनुचित का भेद पहचान सकने वाले लोग हैं? (उनके पास कोई विवेक नहीं होता और वे उचित-अनुचित का भेद नहीं पहचान सकते।) ऐसा लगता है कि वे हर रोज बहुत मेहनत करते हैं, सुबह से शाम तक धर्मोपदेश सुनते हैं और परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं, लेकिन वे सत्य का एक भी वाक्य नहीं समझ सकते, ऐसी एक भी चीज नहीं कर सकते जो सत्य सिद्धांतों के अनुरूप हो और ऐसा एक भी शब्द नहीं बोल सकते जो सत्य के अनुरूप हो। सत्य के अनुरूप शब्दों की तो बात ही छोड़ो—वे तो ऐसा भी एक शब्द नहीं बोल सकते जो मानवता के जमीर और विवेक के अनुरूप हो; वे सिर्फ उलझे हुए और बेतुके शब्द बोलते हैं और सिर्फ टेढ़ी-मेढ़ी दलीलें देते हैं। ऐसे लोग जमीर और विवेक होने की कसौटी पर बिल्कुल खरे नहीं उतरते; वे सिर्फ भ्रमित लोग हैं, जो टेढ़े-मेढ़े तर्कों से लबालब भरे हुए हैं। बहुत-से धर्मोपदेश सुनने के बाद वे कुछ आध्यात्मिक शब्द बोल सकते हैं। जब तुम उन्हें आध्यात्मिक शब्द बोलते हुए सुनते हो तब तुम्हें लगता है कि वे काफी कुशल और स्पष्ट हैं, लेकिन जब मामलों को सँभालने की बात आती है तब वे तुम्हें उलझे हुए और बेतुके लगते हैं। जब वे टेढ़ी-मेढ़ी दलीलें देते हैं, तब वे तुम्हें अवाक कर सकते हैं। “तुम्हें अवाक कर सकते हैं” का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि तुम कल्पना नहीं कर सकते कि कोई ऐसे बेतुके शब्द भी कह सकता है या सोचने का ऐसा तरीका भी अपना सकता है, यह तुम्हारे लिए समझ से बिल्कुल परे है और अंत में, तुम सिर्फ चुप्पी से ही उनका जवाब दे सकते हो, जो कि उनसे निपटने का सबसे अच्छा तरीका है।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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